Thursday, December 31, 2015

जब साल सोलवां आएगा ---


१ जनवरी २००९ को हमने अपना ब्लॉग बनाया था और पहली पोस्ट डाली थी - नव वर्ष की शुभकामनायें।  आज सात साल पूरे हुए और ये ५०० वीं पोस्ट है।  ७ साल का ये सफ़र बहुत बढ़िया रहा , जिसमे हमें लेखन का अच्छा अनुभव हुआ , नए दोस्त मिले और अनेकों लाभदायक पोस्ट लिखने का अवसर मिला।  लेकिन अब हिंदी ब्लॉगिंग में लोगों की कम होती रूचि और फेसबुक / वाट्सएप आदि सोशल मिडिया के कारण ब्लॉग पर पाठकों के ना आने से ब्लॉगिंग में आकर्षण नहीं रहा।  अत : यह हमारी आखिरी पोस्ट है , जो अपने मन पसंद विषय हास्य व्यंग पर आधारित एक समसामयिक कविता के रूप में प्रस्तुत है :

आमचंद्र कह गए सभी से , जब साल सोलवां आएगा ,
पत्नी करेगी कार ड्राईव और , पति खड़ा रह जायेगा।

एक बात नहीं हैं समझे, ग़र पत्नी संग कार में बैठे ,
पति के संग से कैसे हवा में,  प्रदुषण बढ़ जायेगा ।

छूटे सारे वी आई पी ,  ग़र नहीं तू वी ओ पी भी ,
ईवन ऑड के चक्कर से भैया , फिर नहीं बच पायेगा।

बहुत करी है सबने मस्ती , दस बजे आते थे अक्सर ,
दफ़्तर में सरकारी अफ़सर , अब आठ बजे आ जायेगा।  

ग़र कभी हो पत्नी संग जाना , पेट दर्द का करो बहाना ,
सीट पर लेटो रोगी बनकर , चालान नहीं कट पायेगा।

एक तरीका और है भैया , ओढ़ दुपट्टा बन जाओ मैया ,
ग़र ना हो दाढ़ी रामदेव सी, कोई पकड़ नहीं पायेगा ।

ज़हर भरा दिल्ली की हवा में , धुँआ धुआं है सारी फ़िज़ा में ,
ग़र नहीं तू संभला 'तारीफ' ,  चैन से साँस नहीं ले पायेगा।

नोट : दिल्ली में वायु प्रदुषण चरम सीमा पर है।  उसे कम करने में सभी का सहयोग अपेक्षित है।

नव वर्ष २०१६ के सभी पाठकों को हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएं।  

Wednesday, December 23, 2015

पैसे के पीछे कभी तो दौड़ना छोड़िये ---


हालाँकि आजकल मनुष्य की औसत आयु ( लाइफ एक्सपेक्टेंसी एट बर्थ ) लगभग ७० वर्ष है , लेकिन मनुष्य की जिंदगी कब गुजर जाती है , पता ही नहीं चलता।  देखते देखते जवानी बीत जाती है , बच्चे बड़े होकर अपने काम धंधे पर लगकर अपनी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं।  अक्सर ६० वर्ष की आयु तक आते आते अधिकांश लोगों की सांसारिक जिम्मेदारियां पूर्ण हो जाती हैं।  और घर में रह जाते हैं सेवा निवृत पति पत्नी।  इस उम्र में इंसान के खर्च भी बहुत कम हो जाते हैं।  खाने पर , कपड़ों पर तथा अन्य खर्च कम से कम होते हैं।  ज़ाहिर है , इस समय तक इंसान की आवश्यकताएं न्यनतम रह जाती हैं।

लेकिन देखा गया है कि फिर भी इंसान की पैसे की भूख कम नहीं होती। धन कमाने की होड़ ऐसे लगी रहती है जैसे  अगले जन्मों के लिए भी अभी से जोड़ कर रख लेंगे।  भले ही मनुष्य की जिंदगी की अवधि बढ़ गई है लेकिन जिम्मेदारियां पूर्ण होने के बाद जो भी धन कमाया जाता है, वह अक्सर आवश्यकता से अधिक ही होता है और स्वयं के काम आने की सम्भावना बहुत कम ही होती है।  लेकिन लालच की प्रवृति मनुष्य को यह समझने नहीं देती और हम अंधाधुंध पैसे के पीछे दौड़ लगाते रहते हैं।  

बहुत कम लोग होते हैं जो पैसा कमाते भी हैं और उसका उपयोग भी कर पाते हैं।  ज्यादातर तो जोड़ जोड़ कर खुश होते रहते हैं, या जगह जगह प्रॉप्रटी बनाकर गर्वान्वित महसूस करते रहते हैं।  अक्सर ये प्रॉपर्टीज भी यूँ ही खाली पड़ी रहती हैं , और उनके रख रखाव का काम और बढ़ जाता है।  बच्चे अक्सर बड़े होकर बाहर निकल जाते हैं और रह जाते हैं बुजुर्ग जिनके जब तक हाथ पैर चलते हैं , वे चिपटे रहते हैं धन दौलत से।  फिर एक दिन सब यहीं रह जाता है, अंजान बेकद्र सा।

लेकिन इंसान की समझ में यह बात नहीं आती।  बहुत कम लोग अपनी जिंदगी से संतुष्ट नज़र आते हैं।  काश हम यह समझ सकें तो आधा भृष्टाचार तो स्वयं ही समाप्त हो जाये।  लेकिन भृष्टाचार को ख़त्म कौन करना चाहता है , यह तो जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है।  जब तक इंसान की सोच नहीं बदलेगी ,तब तक यह यूँ ही पनपता रहेगा और हम जीते रहेंगे एक मृग मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए।      

Sunday, December 20, 2015

ऑटोग्राफ प्लीज़ ---



कल एक कवि सम्मेलन में हमने, कविता जैसा कुछ सुनाया ,
श्रोताओं का तो पता नहीं भैया, पर अपुन को बड़ा मज़ा आया।
हम बन गए प्रोफेशनल कवि , कुछ ऐसा होने लगा अहसास ,
जब आयोजक ने हमारे हाथ में, एक मोटा लिफाफा थमाया।

हमने सोचा अच्छा है , चलो इस गरीब का भला हो जायेगा ,
कुछ नहीं तो लिफाफा ही ,किसी शादी में काम आ जायेगा।
लेकिन नोट दिखे तो ये सोच कर फ़ौरन जेब के किये हवाले ,
कुछ हाथ नहीं लगेगा, ग़र श्रीमती जी को पता चल जायेगा।


उधर कवि सम्मेलन के बाद कुछ युवाओं ने कर दिया घेराव ,
किसी ने लेखन के टिप्स मांगे, किसी को था ऑटोग्राफ का चाव।  
अभी तक तो साइन और सिग्नेचर ही सदा करते आये थे हम ,
अब ऑटोग्राफ कहाँ से लाएं , ये सोचकर ही होने लगा तनाव।

एक युवक बोला ,
सर बहुत ठण्ड लगती है ,सर्दी में नहाने का कोई उपाय बतायें ,
हमने कहा इतनी मज़बूरी है तो आप स्वेटर पहन कर नहायें।
वो बोला सर कमाल है , यह कैसा दिया अज़ीबो ग़रीब ज़वाब है ,
हमने कहा जब सवाल ही ग़रीब है तो अमीर ज़वाब कहाँ से लायें।

अरे नर्म नौनिहालो तुम्हे गर्म पानी से भी नहाने में लगता है डर ,
ज़रा उनकी तो सोचो जो सियाचिन की ऊंचाइयों पर रहते हैं बेघर।
माइनस २० डिग्री में भी डटे रहते है प्रहरी बर्फ की चादर ओढ़कर ,
गोलियों की बरसात में भी सीमाओं की रक्षा करते है होकर निडर।

माना कि आज की युवा पीढ़ी के लोग हमें रूढ़िवादी समझते हैं ,
लेकिन जिन्हे जीवन का अनुभव है वो बात यथार्थवादी करते हैं।  
पथभ्रष्ट मत हो जाना पश्चिमी सभ्यता की नकल करते करते ,
हम भारतीय विपरीत परिस्थितयों में भी सदा आशावादी रहते हैं।



Wednesday, December 9, 2015

ये ऑड ईवन का चक्कर तो अफ़्सर से आम बना देगा ---


प्रस्तुत है, दिल्ली में बढ़ते प्रदुषण को रोकने के लिए कारों पर लगे प्रतिबन्ध पर एक हास्य व्यंग कविता :


जब से ईवन ऑड की खबर आई है ,
अपने तो मन पर मुर्दनी सी छाई है।
बिन गाड़ी अब ऑफिस कैसे जाएंगे ,
ये सोचकर श्रीमती जी भी घबराई हैं।


कभी कहते थे कि महंगाई ने मार डाला ,
फिर शादी की तो लुगाई ने मार डाला।
दोनों को नियति समझ किया स्वीकार ,
पर अब प्रदुषण की बुराई ने मार डाला।


गाड़ियां तो हैं पर दोनों  की दोनों ईवन,
ड्राईविंग में भी हम रहे सदा नंबर वन।
जो एक गाड़ी को ऑड से स्वैप करले ,
ढूंढ रहे हैं हम बेसब्री से ऐसा इक जन।


आम आदमी तो फिर साईकिल से काम चला लेगा ,
मिडल क्लास गाड़ी छोड़ मोटरसाईकिल उठा लेगा।
हम चिकने चुपड़े खाए अघाये भारी भरकम कहाँ जाएँ ,
ये ऑड ईवन का चक्कर तो अफ़्सर से आम बना देगा।


अब तो सन्डे के सन्डे ही  गाड़ी निकाल पाएंगे ,
या मूंह अँधेरे निकलेंगे, अँधेरे में ही घर आएंगे।
ग़र इमरजेंसी में भी निकाली गलत नंबर की गाड़ी ,
तो पी यू सी होते हुए भी लुटने से नहीं बच पाएंगे।


या तो दफ़्तर एक दिन छोड़कर जाना पड़ेगा,
या फिर दफ़्तर में ही बिस्तर लगाना पड़ेगा ।
ग़र ऑड दिनों में ईवन नंबर की गाड़ी निकाली,
तो अनजान लोगों को गाड़ी में बिठाना पड़ेगा।


हम जानते थे कि एक दिन अच्छे दिन ज़रूर आएंगे ,
जब समस्याओं को हम मिल जुल कर सुलझाएंगे।
पहले हम ऑफिस जाते थे अलग अलग गाड़ियों में ,
अब श्रीमती जी ड्राईव करेंगी और हम बैठकर जायेंगे ।


Wednesday, December 2, 2015

हम नहीं सुधरेंगे ---


सर पर हेलमेट नहीं पर मोबाईल पर स्क्रीन गार्ड लग जाये ,
सर भले ही फट जाये पर मोबाईल पर खरोंच कभी ना आये।

बना लो जितने स्पीड ब्रेकर , हम ब्रेकर को ही ब्रेक कर जायेंगे ,
ब्रेक में से गाड़ी निकाल लेंगे पर गाड़ी में ब्रेक नहीं लगाएंगे ।

सडकों पर ज़ेबरा क्रॉसिंग बनाना सरकार मज़बूरी तुम्हारी है ,
हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं , सारी सड़क ही हमारी है।

जितने मर्ज़ी ओवरब्रिज बना लो , लगा दो रेलिंग छै फुट ऊंची ,
रेलिंग कूद कर फांद जायेंगे , या बिल बना लेंगे खोदकर मिटटी।











Monday, November 30, 2015

विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश---


कल चाणक्य पुरी में अशोक होटल के सामने नेहरू पार्क के एक कोने में बने PSOI कल्ब में आयोजित पैलेट फैस्ट २०१५ में जाकर १९७५ - १९८० के दौरान अपने कॉलेज के समय की यादें ताज़ा हो गईं।  वहीँ पास ही चाणक्य सिनेमा हॉल में देखी अनेकों फ़िल्में जिन्हे देखने के लिए अक्सर मेनेजर के पास जाकर सिफारिश लगाकर टिकटें लेनी पड़ती थी।  या फिर ग्रेटर कैलाश में अर्चना सिनेमा हॉल में रॉजर मूर की जेम्स बॉन्ड की अनेकों फ़िल्में , जॉहन ट्रेवोल्टा की सेटरडे नाइट फीवर और अन्य अनेक इंगलिश फ़िल्में जो हमने फ्रंट स्टाल में बैठकर देखी थी ६५ पैसे की टिकेट लेकर।  बोनी एम और एब्बा ग्रुप के गाने जिन्हे आज भी सुनकर तन और मन नृत्य करने लगता है।

निश्चित ही दक्षिण दिल्ली का यह पॉश इलाका सदा ही मन लुभाता रहा है।  आखिर बचपन और जवानी के २० साल हमने यहीं गुजारे थे। इस क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों के निवासियों में उतना ही अंतर दिखाई देता है जितना झुमरी तलैया और मुंबई के हीरानन्दानी क्षेत्र में।  फिल्मों या फैशन शोज में दिखाई जाने वाली पोशाकें पहने सिग्रेट और बियर पीती लड़कियां सिर्फ यहाँ ही दिखाई दे सकती हैं।




उधर सभी ५ सितारा होटलों और जाने माने फ़ूड चैन रेस्ट्रां के एग्जोटिक व्यंजन चखने के लिए आये खाये पीये अघाये कुछ मोटे कुछ थुलथुल लोगों की भीड़ को देखकर कहीं ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमारे देश में कहीं गरीबी भी है।  भूख भले ही न हो , लेकिन भूख लगाने के लिए सूप और स्टार्टर्स से शुरुआत करके मुख्य भोजन करने के बीच मनोरंजन के लिए एक ऊंची सी स्टेज पर एक्रोबेटिक्स करता एक पंजाबी मुंडा चिंघाड़ कर गाता हुआ युवा वर्ग को तालियां बजाने और साथ गाने के लिए लगातार उकसा रहा था।  बेशक हम जैसे नॉट सो युवा भी इसका भरपूर आनंद उठा रहे थे।





आजकल मोबाईल कैमरे ने तो जैसे कल्चर ही बदल दिया है।  सबके हाथों में तने कैमरे पल पल फोटो खींचते हुए इन पलों को कैमरे में कैद किये जा  रहे थे। लेकिन सबसे ज्यादा पॉपुलर तो सेल्फ़ी हो गई है।  हम भी जब सेल्फ़ी ले रहे थे तो एक बहुत ही सुन्दर सी कन्या ने हमें देखा तो बोली , लाइए मैं फोटो ले देती हूँ।  उसकी सुंदरता देखकर श्रीमती जी की तो आँखें ही चुंधिया गई।  लेकिन हमने प्यार से उसका धन्वाद करते हुए कहा कि बेटा फोटो तो हो गई। हालाँकि अंग्रेजी स्टाइल में देसी हसीनाओं को देखकर तो किसी की भी आँखों की पुतलियाँ फ़ैल सकती हैं।



यही है दिल्ली का ग्लेमर वर्ल्ड। आम आदमी के एकदम नज़दीक , लेकिन इतना दूर।
यहाँ एक ही जगह पर ऊंची अट्ठालिकाएँ और झोंपड़ पट्टी , फटेहाल भिखारी और कपडे फाड़ कर पहनने वाले शहरी एक साथ नज़र आते हैं।  ज़ाहिर है , विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश एक विकासशील देश है और लम्बे समय तक रहने वाला है, ऐसे आसार नज़र आते हैं।






Friday, November 27, 2015

असहिष्णुता तो दिल्ली की सडकों पर भी है लेकिन बचकर कहाँ जाएँ हम ---


आजकल स्मार्ट फोन के साथ कारें भी स्मार्ट आ गई हैं।  यदि आप घर से बिना सीट बैल्ट लगाये ही निकल पड़े तो आपकी गाड़ी टें टें करके आपके कान खा लेगी जब तक कि आप सीट बैल्ट लगा नहीं लेते।  इसी तरह दरवाज़ा खुला होने पर भी आपको सूचित कर देगी। पैट्रोल कम होने पर वह आपको यह भी बता देगी कि आप कितनी दूर और जा सकते हैं।  इसके अलावा सुख सुविधा के सभी साधन तो गाड़ी में होते ही हैं।

लेकिन दिल्ली जैसे शहर की सडकों पर चलते हुए आपको ट्रैफिक स्मार्ट नहीं मिलेगा।  बल्कि इतना अनुशासनहीन मिलेगा कि यदि आप स्वयं गाड़ी चला रहे हैं तो आपका ब्लड प्रेशर बढ़ना निश्चित है। यातायात के सभी नियमों की धज्जियाँ कैसे उड़ाई जाती हैं , यह आप यहाँ की सडकों पर देखकर खुद भी एक्सपर्ट बन सकते हैं  नियम तोड़ने में।  आइये देखते हैं कि कैसे कैसे उत्पात मचाये जाते हैं दिल्ली की सडकों पर :

चौराहों पर : सबसे ज्यादा अराजकता चौराहों पर नज़र आती है।  यदि ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल न खड़ा हो तो रेड लाइट जम्प करना दोपहिया चालकों का मनपसंद खेल है।  भरे ट्रैफिक में भी ऐसे बीच में घुस जाते हैं जैसे जान की परवाह ही न हो।  और यदि लाइट ख़राब हो जाये तो फिर ऐसी अराजकता देखने को मिलती है कि अपने इंसान होने पर शर्म आने लगती है।  पहले मैं पहले मैं की तर्ज़ पर चारों ओर से सब अपनी गाड़ी को इंच इंच कर आगे बढ़ाते हुए चौराहे को कुछ ही पलों में युद्ध का मैदान बना देते हैं।  फिर फंस कर ऐसे खड़े हो जाते हैं मानो कह रहे हों कि चल अब निकल कर दिखा।  मिनटों में लगे जैम को ख़त्म करने में घंटों लग जाते हैं।

मोड़ पर : अक्सर मोड़ पर बायीं ओर मुड़ते समय बहुत ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि कब कोई आपके बायीं ओर से मोड़ पर ओवरटेक करके निकल जाये , पता ही नहीं चलता।  ऐसे में यदि ज़रा भी चूक हुई तो वो तो गया ही , आप भी मुसीबत में फंस जायेंगे। मोड़ पर ओवरटेक नहीं करते , यह तो जैसे कोई जानता ही नहीं और मानता भी नहीं।  

फ्लाईओवर पर : यहाँ भी ओवरटेक करना मना है लेकिन यह बात कोई नहीं मानता।  आपके पीछे लगकर पीं पीं करके आपको इतना क्रुद्ध कर देंगे कि या तो आपको साइड देनी पड़ेगी या आप कुढ़ते रहेंगे।

लेन ड्राइविंग : तो जैसे कोई जानता ही नहीं।  जब दूसरे लेन में नहीं चलते तब आपके लिए भी लेन में चलना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव ही हो जाता है। कब कौन अचानक बिना इंडिकेटर दिए लेन बदल कर आपके सामने आ जाये , यह डर सदा लगा रहता है।

हाई बीम : रात में हाई बीम पर चलना दूसरों के लिए बहुत कष्टदायक होता है। ऐसा करने पर २००० रूपये जुर्माना भी हो सकता है।  लेकिन आधे से ज्यादा लोग हाई बीम पर ही ड्राइव करते हैं।  इससे न सिर्फ आगे वाली गाड़ी के चालक को दिक्कत आती है , बल्कि सामने से आते ट्रैफिक के लिए भी घातक सिद्ध हो सकती है। शुक्र है कि आजकल कारों में रियर व्यू मिरर में हाई बीम से बचने का इंतज़ाम होता है।

हॉर्न बजाना : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो हम दिल्ली वालों को पैदा होते ही सीखने को मिल जाती है।  किसी भी सड़क के किनारे बने घरों में जाकर देखिये , हॉर्न का इतना शोर होता है कि लगता है जैसे सब पगला गए हैं।  बिना बात हॉर्न बजाना हमारी आदत बन गई है।  मोटर साइकिल वाले तो हॉर्न पर हाथ रखकर ही बाइक चलाते हैं। चौराहे पर लाइट ग्रीन होते ही सब एक स्वर से शुरू हो जाते हैं।  ऐसा पागलपन शायद ही किसी और देश में देखने को मिलता हो। जबकि चौराहे के  १०० मीटर के अंदर हॉर्न बजाना कानूनन अपराध है लेकिन आज तक इस बात पर किसी का चालान नहीं कटा।  

बिना हेलमेट : दोपहियां सवारियों को हेलमेट पहनना न सिर्फ कानूनी तौर पर आवश्यक है बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।  लेकिन एक बाइक पर तीन तीन युवक बैठकर बिना हेलमेट के ट्रैफिक में ज़िग ज़ैग ड्राइव करना तो जैसे फैशन सा बन गया है।  बेशक हर बार दुर्घटना नहीं होती लेकिन यदि हो जाये तो भयंकर परिणाम होना लगभग निश्चित है।

रोड रेज़ : यहाँ बस एक बार किसी की गाड़ी दूसरी गाड़ी से बस ज़रा छू भर जाये , फिर देखिये कैसा दृश्य सामने आता है तू तू मैं मैं का।  यहाँ हर कोई अपने आप को वी आई पी समझता है। या तो तुरंत हाथापाई शुरू हो जाती है या लोग फ़ौरन फोन घुमाना शुरू कर देते हैं अपने साथियों को बुलाने के लिए या नेतागिरि करने के लिए।  अक्सर जितना नुकसान एक्सीडेंट में नहीं होता , उससे ज्यादा लड़ाई झगडे में हो जाता है।

ड्रिंक एंड ड्राइविंग : सबसे खतरनाक है यह उल्लंघन। इसके कारण कई भयंकर हादसे हो चुके हैं।  लेकिन युवा वर्ग बिलकुल परवाह नहीं करता। जबकि सच यहाँ है कि नशे में होने पर स्वयं पर सारा नियंत्रण समाप्त हो जाता है और ड्राईवर अपने लिए और दूसरों के लिए भी खतरा बन जाता है।  हालाँकि आजकल पुलिस वाले जगह जगह एल्कोमीटर लेकर खड़े रहते हैं लेकिन इनकी संख्या अत्यंत कम  होने के कारण प्रभावी नहीं हो पाते।

ड्राइव करते समय फोन का प्रयोग : हानिकारक तो है ही , कानूनन जुर्म भी है।  लेकिन लोग बाज़ नहीं आते और बात करने के नए नए तरीके भी निकल आते हैं।  इनमे सबसे नया है गाड़ी में लगा इंफोटेन्मेंट सिस्टम जिसको आप फोन के साथ सिंक्रोनाइज़ कर सकते हैं और बिना हाथ लगाये बात कर सकते हैं।  पता नहीं पुलिस इस बारे में क्या कहती है।


कानून के उपरोक्त १० उल्लंघनों पर कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त पुलिस न होने के कारण दिल्ली की जनता धड्ड्ले से ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करती है।  ज़ाहिर है , दिल्ली की सडकों पर खतरा सदा मंडराता रहता है।  लेकिन हम समझने को तैयार नहीं।  इंसान सदा डर से डरता है। जब डर नहीं होता तो वो इंसान से शैतान बन जाता है।  वर्ना यही लोग जब अमेरिका , कनाडा या दुबई जैसे देशों में जाकर ड्राइवर का काम करते हैं तो एकदम सीधे सादे और नेक इंसान बन जाते हैं क्योंकि वहां उन्हें पता होता है कि सजा से बच निकलने का वहां कोई मार्ग नहीं होता। काश कानून का यह डर यहाँ भी होता !  









Monday, November 23, 2015

कार्यकुशलता के तीन गुण ---


ये तो आप जानते ही हैं कि हमारा देश एक विकासशील देश है।  विकासशील यानि विकसित जमा अविकसित बटे दो।  यानि हम एक ओर अमेरिका जैसे देश की तरह विकसित हैं , वहीँ दूसरी ओर यहाँ सोमालिया जैसे दृश्य भी देखने को मिल जाते हैं।  यहाँ वो सब कुछ उलपब्ध है जो एक विकसित देश में होता है।  फिर भी आज भी देश के अनेक हिस्सों में सूखे से प्रभावित किसान क़र्ज़ में डूबे आत्महत्या कर रहे हैं। कुपोषण के शिकार बच्चे मिटटी के ढेले खाकर पेट भर रहे हैं। देखा जाये तो समय के साथ साथ हम दोनों दिशाओं में बढ़ रहे हैं।  एक ओर अमीरों की संख्या बढ़ रही है , वहीँ दूसरी ओर गरीबों की भी संख्या बढ़ रही है।  लेकिन गरीबों की संख्या अमीरों की संख्या से कहीं ज्यादा बढ़ रही है।

उलटी दिशा में होने वाले इस बहाव को तभी रोका जा सकता है जब हम सब अपनी पूरी निष्ठां और कर्तव्यपरायणता से अपना काम करें। हम अपने कार्य में तभी प्रभावी हो सकते हैं जब एक स्वास्थ्यकर्मी  के रूप में हम अपनी कार्य शैली में इन तीन गुणों को विकसित कर लें :
उपलब्धता : आपको अपने कार्यस्थल पर समय सारणी अनुसार उपलब्ध होना चाहिए।  इसमें नियमितता , अनुशासन और कर्तव्यपरायणता शामिल है।
मृदु व्यवहार : आपका व्यवहार आपकी कार्य कुशलता में आपको प्रभावी बनाता है। अपने अच्छे व्यवहार से आप दूसरों का दिल जीत सकते हैं।
योग्यता : उपरोक्त दोनों गुणों के साथ योग्यता भी हो तो आप अपने काम में पूर्णतया निपुण रहेंगे।    
( स्वास्थ्यकर्मियों के एक कार्यक्रम में दिए भाषण का एक अंश ) 

Wednesday, November 18, 2015

डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।

प्रस्तुत हैं , डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी  हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।  

१)
अय डाक्टर , चल दवा लिख !
झूठा बिल , फर्ज़ी मेडिकल बना ! 
पी एम रिपोर्ट बदल ,
अजन्मी बेटी का गला दबा ! 
अपनी फीस ले ,
अय डाक्टर , चल झूठा बिल बना ! 

२) 

मैं चाहे ये खाऊँ , मैं चाहे वो खाऊँ 
मैं चाहे जिम छोडूं ,
मैं चाहे दारू के अड्डे पे जाऊं , 
चाहे वेट बढ़े , चाहे पेट बढ़े ,
डाक्टर को दिखाऊँ ना दिखाऊँ , 
मेरी मर्ज़ी ! 

३)

अस्पताल मे 
छोड़ गया बेटा , मुझे 
हाय अकेला छोड़ गया ! 
सब देखते रहे तमाशा ,
मैं सड़क पे घायल ,
पड़ा पड़ा दम तोड़ गया ! 

४)

तू मेरा ईश्वर है , 
तू मेरा रक्षक है ! 
पर फीस मांगी तो  
तू पूरा भक्षक है ! 

५) 

होटल मे टिप् दे देंगे पूरे एक हज़ार , 
जुए मे हम भले ही हज़ारों जाएं हार , 
पर दो चार दिन गर पड़ जाएं बीमार,
तो तो तो तेरी तो ,
अय डाक्टर , चल दवा खिला ,
इंजेक्शन लगा , पर बिल ना बना ! 





Tuesday, November 3, 2015

स्वस्थ और दीर्घायु होने का मन्त्र :

स्वस्थ और दीर्घायु होने का मन्त्र :  

आओ बताऊँ, तुम्हें अस्सी का फंडा,
ये तो है प्यारे , फोकट का ही फंडा !  

हो ना कभी काया, अस्सी किलो से भारी,
रहे नीचे कमर भी , अस्सी से.मी. से तुम्हारी !
दिल की धड़कन भी, रहे अस्सी से ही नीचे,
निचला बी पी हो ना , कभी अस्सी से ऊंचे !

ग़र रहना है अस्सी साल तलक तुम्हे जिंदा,
अपनाओ अभी तुम सभी अस्सी का फंडा ! 

खाली पेट ब्लड शुगर , नहीं अस्सी को कूदे ,
एल डी एल वसा भी , न हीं अस्सी को फांदे !
खान पान हो ना कभी जंक फ़ूड सा गन्दा ,
ये तो हैं धन बटोरने का विदेशियों का धंधा !

ग़र रखना है ऊंचा अपने देश का झंडा ,
स्वदेशी अपनाओ , चाहे बंदी हो या बंदा ।  
आओ बताऊँ, तुम्हें अस्सी का फंडा,
यही है प्यारे, स्वस्थ जीवन का फंडा !  

Saturday, October 31, 2015

एक डॉक्टर का करवा चौथ :


एक डॉक्टर का करवा चौथ :

कल चौथ का चाँद था और पार्क में,
खूबसूरती का हुजूम था लगा हुआ ।

कंगन , चूड़ा , पायल , झुमके , हार ,
नई साड़ियों का रंग था बिखरा हुआ।

जिंदगी में ३६४ दिन थे सास के पर ,
कल बहुओं का रूप था निखरा हुआ।

वो तो करती रही प्रसूति सेवा दिन भर , 
जहाँ नन्हे जीवन से रिश्ता गहरा हुआ।

उसने भी देखा और दिखाया व्रताओं को , 
चाँद जब आसमाँ में छत पर उभरा हुआ।

कल फिर हमने उनकी ओर देखा सीधा , 
बिन छलनी के प्यार फिर सुनहरा हुआ।

Friday, October 16, 2015

दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ ...


राम मिलाई जोड़ी। ये कहावत सिर्फ पति पत्नी पर ही नहीं , खाने पर भी लागु होती है। जैसे दाल- रोटी , दाल- चावल , राज़मा- चावल। लेकिन इसका भी एक वैज्ञानिक कारण होता है।

हमारी शारीरिक संरचना और स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए ९ आवश्यक अमीनो एसिड्स ( essential amino acids) की आवश्यकता होती है। ये एमिनो एसिड्स हमें खाद्य पदार्थों से मिलते हैं। मांसाहार में इन की कोई कमी नहीं होती और वांछित मात्रा खाने से मिल जाती है। लेकिन शाकाहारी भोजन में गेहूं और चावल में लाइसिन नाम के एमिनो एसिड की कमी होती है और मेथिओनिन सहित अन्य सभी एमिनो एसिड्स बहुतायत में होते हैं। जबकि दाल , राज़मा और छोले में लाइसिन बहुतायत में होता है परन्तु मेथिओनिन की कमी होती है।

इस तरह दाल रोटी , दाल चावल , राज़मा चावल आदि के कॉम्बो मील में सभी एमिनो एसिड्स वांछित मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि उत्तर भारत में जहाँ गेहूं का उत्पादन ज्यादा होता है और गेहूं की रोटी मुख्य भोजन है , उसे दाल के साथ खाया जाता है।  वहीँ दक्षिण भारत में चावल की खेती ज्यादा होती है और दाल चावल मुख्य भोजन होता है।  हालाँकि पूर्ण रूप से स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार भी आवश्यक है।  इसीलिए उत्तर भारतीय खाने में शाकाहारी थाली में ये खाद्य पदार्थ अवश्य होते हैं -- रोटी , चावल , दाल , सब्ज़ी , दही / रायता और सलाद।  इससे न पूर्ण ऊर्जा मिलती है बल्कि सभी घटक जैसे वसा , प्रोटीन , कार्बोहाइड्रेट , विटामिन्स , और खनिज पदार्थ उचित मात्रा में मिलते हैं।

इसीलिए कहते हैं कि दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ।

Wednesday, October 7, 2015

दा पत्नी रिटर्न्स :


वो पास होती हैं तो फरमान सुनाती हैं,
अज़ी ऐसा मत करना , वैसा मत करना।
ये मत खाना , वो मत खाना।
कुछ खाओ भी तो ज्यादा मत खाना !

वो दूर जाती हैं तो समझाती हैं ,
अज़ी ऐसा करना , वैसा करना ,
ये खा लेना , वो खा लेना ,
कुछ भी खाना ,पर  भूखा मत रहना !

हम तो हर हाल में,
पत्नी का हुक्म बजाते हैं ,
वो दिन को रात भी कहे तो ,
आँख बंद कर रात ही बताते हैं !

वो हो तो मुसीबत , न हो तो और मुसीबत,
पत्नी तो एक दोधारी तलवार होती है।
परन्तु पत्नी पास हो या दूर , सोते जागते,
उसके मन पर पति की ही चिंता सवार होती है।  

Monday, September 28, 2015

वर्ल्ड रेबीज डे ...


आज वर्ल्ड रेबीज डे है।  क्या आप जानते हैं :

* रेबीज एक १०० % फेटल रोग है।  यानि यदि रेबीज हो गई तो मृत्यु निश्चित है।

* लेकिन यह १०० % प्रिवेंटेबल भी है।  यानि इससे पूर्णतया बचा जा सकता है।

* इसका बचाव भी बहुत आसान है। अब पेट में १४ दर्दनाक ठीके नहीं लगाये जाते।

* कुत्ते या बिल्ली आदि के काटने पर महज घाव को बहते पानी और साबुन से १० मिनट तक धोते रहिये। फिर कोई भी एंटीसेप्टिक लगा दीजिये।  पट्टी बिलकुल मत बांधिए ।  

* उसके बाद बस डॉक्टर की शरण में चले जाइये।  आपका काम हो गया।

Monday, September 14, 2015

एक मुक्तक ...


आज सिर्फ एक मुक्तक :

ज़िंदगी के सफ़र में, हमसफ़र अनेक होते हैं,
कोई बेवफ़ा, कुछ बेग़ैरत, कुछ नेक होते हैं ।
इंसान के कर्म ही बनाते हैं इंसान को शैतान,
वर्ना बन्दे जन्म से तो मासूम हरेक होते हैं ।

अब देखें इसी का हास्य रूप :

ज़िंदगी के सफ़र में, हमसफ़र अनेक होते हैं,
कोई बेवफ़ा, कुछ बेग़ैरत, कुछ नेक होते हैं ।
अच्छी सूरत देख कर झांसे में न आओ यारो ,
फेसबुक पर दिखते चेहरे अक्सर फेक होते हैं।  


Wednesday, September 2, 2015

कुछ साल पहले जब हम जवान थे ...


जिंदगी ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि एक अर्से से कोई हास्य कविता नहीं लिख पाए हम । अब फुर्सत मिली है तो प्रस्तुत है , अधेड़ उम्र के हालातों पर एक हास्य कविता :


कुछ साल पहले जब हम प्रमाणित जवान थे ,
सर पर रंगत थी बालों के लहराते खलिहान थे।
याद बहुत आता है वो गुजरा हुआ ज़माना ,
जब अपने घर में हम भी शाहरुख़ ख़ान थे।


सोचते हैं ग़र बालों पर हम भी लगा लें खिज़ाब,
फिर क्या लगा पाओगे , हमारी उम्र का हिसाब।
दिल तो करता है हम भी दें ज़ुल्फ़ों को झटका ,
पर अब सर पर बाल ही कितने बचे हैं ज़नाब।


हेयर ट्रांसप्लांट का कभी मन में बनता है प्लान ,
पर कीमत सुनकर ही  दिल हो जाता है हलकान।
दो बाल भी दिख जाएँ कंघी में तो कहती है पत्नी ,
लो कर दिया सुबह सुबह डेढ़ हज़ार का नुकसान।


इश्क़ और बुढ़ापे में नींद भी कहाँ आती है ,
दोनों में दिल की धड़कन बढ़ जाती है ।
कभी नींद में भी आते थे हसींन ख्वाब ,
अब कम्बख़्त नींद ही ख्वाब में आती है।


बाल ग़र सारे गिर जाएँ तो ग़म नहीं ,
नींद भले आये रातों में हरदम नहीं ।
मूंह में न रहें दांत भी तो मत समझो ,
कि इन चिकने मसूढ़ों में अब दम नहीं।


अंगारों पर राख हो तो आंच कम नहीं होती ,
बुढ़ापे में भी इश्क की आग कम नहीं होती।
मुँह में दांत और पेट में आंत नहीं तो क्या है ,
जीवन की भूख और प्यास कम नहीं होती।


उम्र एक नम्बर होती है , मगर जिंदगी नहीं ,
जिंदगी में खुश रहने पर कोई पाबन्दी नहीं।
हंसने हंसाने का ही दोस्तो नाम है जिंदगी ,
खुल कर हंसो , हंसने पर कोई पाबन्दी नहीं।


जो लोग हँसते हैं, वे अपना तनाव भगाते हैं , 
जो लोग हँसाते हैं, वे दूसरों के तनाव हटाते हैं।  
हँसाना भी एक परोपकारी काम है दुनिया में , 
चलो हास्य कवियों के लिए तालियां बजाते हैं।  


नोट :  इस रचना का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

Monday, August 17, 2015

वृक्ष और डॉक्टर -- इनकी सुरक्षा में ही सब की सुरक्षा है ।


जिसकी मज़बूत जड़ें जुड़ी हों ज़मीन से ,
उस दरख़्त की डाल पर
जब कोई लटकता है , या झूला झूलता है ,
तो वो झुकती नहीं !
तनी रहती हैं सीना तान कर , टूटती नहीं।

उसी डाल की डालियों से फल तोड़ने ,
जब कोई डालियों को झुकाता है ,
तब वो झुक जाती हैं आसानी से , अड़ती नहीं।
फलों के बोझ से मुक्त हो फिर हो जाती सीधी ,
फिर से फलने फूलने के लिए, नई कोपलों के साथ !
थके हारे मुसाफिरों को छाँव देने की खातिर।

लेकिन जब इंसान खोद देता है उसकी जड़ें ,
या घोट देता है तने का गला, कंक्रीट के फंदे से।
वो तड़पने लगता है , इक इक साँस के लिए ,
और खोजने लगता है , जिंदगी के नए आयाम।
कभी कभी दम घुटने से ,  दम ही तोड़ देता है।

नादां इंसां नहीं समझता कि इसी की जिंदगी में ,
बसी है उसकी भी जिंदगी ही।
नहीं जानता कि दूसरों की जड़ें खोदने वालों की
अपनी जड़ें भी हो जाती हैं खोखली।
नहीं समझता कि जिंदगी लेने से नहीं ,
जिंदगी देने से ही मिलती है जिंदगी।

एक डॉक्टर भी होता है वृक्ष जैसा ही,
वो सहारा देता है दर्द और तक़लीफ़ में।
खुद झुकता है अपने स्पर्श से ,
रोगी के दर्द निवारण के लिए ।
जागता है सारी रात , मरीज़ को सुलाने की खातिर।
फिर हाज़िर होता है सुबह रोगी के जागने से पहले।

फिर भी जाने क्यों , ये शेखचिल्ली,
उसी डाल पर आरा चलाते हैं।
जिस पर बैठ वो खाते पीते सोते हैं ,
नादाँ ये भी नहीं समझते कि
उसी से तो नई जिंदगी पाते हैं।
जीवन दाता का जीवन लेना क्या अच्छा है !
कोई तो उन्हें समझाए कि,
इनकी सुरक्षा में ही तो उनकी सुरक्षा है ।


Thursday, July 9, 2015

चैल -- एक प्राकृतिक स्थल जहाँ शहर और जंगल दोनों का लुत्फ़ एक साथ आता है ---


गर्मियों में छुट्टियां बिताने और कुछ दिन की सैर के लिए दिल्ली के आस पास शिमला सबसे पुराना और ऐतिहासिक हिल स्टेशन है।  लेकिन शिमला में बढ़ती आबादी , भवन निर्माण और गाड़ियों की भरमार से शिमला एक कंक्रीट जंगल बन कर रह गया है।  यदि आपको कुछ दिन शहर की भीड़ भाड़ और शोर शराबे से दूर प्रकृति के बीच शांत जगह पर छुट्टियां बिताने का विचार मन में आये तो शिमला के पास चैल ( चायल ) एक ऐसी जगह है जहाँ जाकर आपको वास्तव में मन की शांति और सकूँ मिलेगा।



 दिल्ली से चैल जाने के लिए राष्ट्रिय राजमार्ग १ से होकर करनाल , अम्बाला और पंचकुला होते हुए , कालका बाई पास से होकर शिमला के लिए सीधी सड़क है। रास्ते में कुरुक्षेत्र में मिला ये हाइवे रेस्ट्रां जहाँ हाथ मुँह धोकर और खा पीकर आप तरो ताज़ा होकर निकल पड़ते हैं आगे के सफर के लिए।    




अब कालका बाई पास बनने से सफ़र बहुत आसान हो गया है।  बाई पास से गुजरते हुए बिलकुल विदेश में होने जैसा अहसास होता है।  सोलन होते हुए कंडाघाट पहुंचकर दायीं ओर मुड़कर एक पतली लेकिन खाली सड़क पर ड्राईव करते हुए एक नदी को पार कर आप पहुँच जाते हैं चैल से करीब ३ किलोमीटर पहले बने होटल्स में जहाँ आपको शांत जगह पर हरी भरी वादियों के बीच एक या दो दिन रहने में बहुत आनंद आएगा।



सड़क किनारे बने होटल ग्रैंड सनसेट से सामने वादी का खूबसूरत नज़ारा आपका मन मोह लेगा।




वादी के बायीं ओर का क्षेत्र बहुत घने जंगल से बना है।  इस जंगल से होकर एक सड़क सोलन तक जाती है।  लेकिन इस सुनसान सड़क पर दिन में भी सफ़र करना एक साहसिक कार्य लगता है क्योंकि करीब २५ किलोमीटर तक आपको न कोई इंसान मिलेगा न कोई वाहन।



यहाँ करीब १० -११ होटल्स बने हैं जो काफी आरामदायक , भीड़ भाड़ से दूर और शांत जगह है।  चैल में पहाड़ों की कई अलग अलग चोटियां हैं जहाँ तक आप ड्राईव कर के जा सकते हैं।  एक चोटी पर बना है महाराजा पटियाला का महल जिसमे प्रवेश के अब प्रति व्यक्ति १०० रूपये देने पड़ेंगे।  महल को एक होटल में परिवर्तित किया गया है जहाँ आपको २५०० से ३५०० रूपये में एक कमरा मिल जायेगा।




भूतल पर आप महल में बैठने और फोटो खींचने का आनंद ले सकते हैं।  यहीं पर एक रेस्ट्रां है जहाँ ३०० रूपये में आप बुफे लंच का लुत्फ़ उठा सकते हैं।



पैलेस के बाहर एक बड़ा मैदान है जहाँ आप धूप का सेवन करते हुए आस पास की हरियाली को निहार सकते हैं।  इस मैदान के चारों ओर पैदल पथ बना है जहाँ सैर करते हुए प्रकृति के बेहद निकट महसूस किया जा सकता है।



पैलेस के ड्राईव वे से ही एक रास्ता जाता है एक छोटी सी पहाड़ी पर , जिसे लवर्स हिल कहते हैं।  इसके चारों ओर घूमने के लिए रास्ता बना है जिसे लवर्स लेन नाम दिया गया है।  इस रास्ते पर टहलते हुए आप चैल के चारों ओर की घनी हरियाली का मनमोहक नज़ारा देख सकते हैं।





चैल एक पुराना क़स्बा सा है।  इसकी दूसरी पहाड़ी की चोटी पर बना है विश्व का सबसे ऊँचाई पर स्थित क्रिकेट ग्राउंड।  यह क्षेत्र पूर्णतया सेना के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन आम जनता भी बुकिंग कराकर खेलों के लिए इस्तेमाल कर  सकती है ।  यहाँ सभी तरह के खेलों के टूर्नामेन्ट आयोजित किये जा सकते हैं।



ग्राउंड में एक पुराना ऐतिहासिक सूखा वृक्ष।



चैल कस्बे से करीब ३ किलोमीटर की दूरी पर एक और पहाड़ की चोटी पर बना है ये महाकाली मंदिर जहाँ तक गाड़ी से जाया जा सकता है, लेकिन आखिरी १ किलोमीटर की ड्राईव ज़रा मुश्किल लगेगी क्योंकि सड़क काफी टूटी फूटी है।  लेकिन मंदिर के अहाते में पार्किंग की अच्छी सुविधा है।




यहाँ से चारों ओर का ३६० डिग्री नज़ारा गज़ब का खूबसूरत है।  ऐसा महसूस होने लगता है जैसे आप अंतरिक्ष से पृथ्वी का दृश्य देख रहे हों।  यहाँ ठहरने के लिए कमरे भी बने हैं , हालाँकि खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है ।




शाम को होटल की टेरेस से सूर्यास्त का नज़ारा बेहद खूबसूरत था।  रात में चमकते तारों को देखते हुए यह महसूस होने लगा कि बड़े शहर में रहकर हम तो जैसे चाँद सितारों को देखना ही भूल गए हैं।
शहर के प्रदुषण , शोर शराबे और भीड़ भाड़ से दूर चैल एक शांत जगह है जहाँ आप प्रकृति के साथ मिलकर जीवन का निर्मल आनंद ले सकते हैं।
( अगली पोस्ट में शिमला रिविजिटेड .....)


Sunday, June 28, 2015

इक हम ही नहीं हैं तन्हा, पत्नि के सताये हुए ---


चार कवि मित्र आपस में बैठे बातें कर  रहे थे । सब अपनी अपनी पत्नी की बातें सुनाने लगे। हालाँकि , यह काम अक्सर महिलाएं किया करती हैं लेकिन कवि ही ऐसे पुरुष होते हैं जो अपनी घरवाली की बातें सरे आम कर सकते हैं।  देखा जाये तो बहुत से कवियों की रोजी रोटी का माध्यम ही यही चर्चा है।
  
1) पहला कवि  :

मेरी पत्नी मुझ से इस कद्र प्यार करती है,
कि रात रात भर जाग कर मेरा इंतजार करती है।

एक रात जब मैं एक बजे तक भी घर नहीं आया,
उसकी नींद खुली तो मेरे मोबाईल पर फोन लगाया।

और बड़े प्यार से बोली -- अज़ी कहाँ हो ,
क्या आज विचार नहीं है घर आने का !

जिसने फोन उठाया वो बोला मेडम ,
भला ये भी कोई वक्त है घर बुलाने का !

इसी कहा सुनी में उसकी बीबी जाग गई
और इतनी लड़ी झगड़ी कि सुबह होते ही घर छोड़कर भाग गई।


2) दूसरा कवि :

मेरी पत्नी तो ऐसा कमाल करती है
कि बात बात पर मिस काल करती है।

लेकिन मेरा फोन एक ही रिंग पर उठाती है,
फिर फोन पर ही मुझे समझाती है।

अज़ी ज़रा बुद्धि का इस्तेमाल कर लिया होता ,
दो पैसे की बचत हो जाती, यदि एक मिस काल कर दिया होता।  


३) तीसरा कवि :

मेरी पत्नी भी बस कमाल करती है ,
मेरा इतना ज्यादा ख्याल रखती है !

कि एक दिन जब मैं जल्दी में मोबाईल घर भूल आया ,
उसकी नज़र पड़ी तो मेरी परेशानी का ख्याल आया।

और ये बात मुझे बताने को फ़ौरन उसने ,
अपने मोबाईल से मेरे मोबाईल पर फोन मिलाया।


४) चौथा कवि :


मेरी पत्नी तो बड़ी हाई टेक हो गई है ,
मोडर्न टेक्नोलोजी में इस कद्र खो गई है !

कि सारी शॉपिंग क्रेडिट कार्ड से करती है ,
सारे बिल भी अपने ही  कार्ड से भरती है।

फिर जब बिल आता है हजारों का,
तो उसकी पेमेंट मेरे कार्ड से करती है।

इस पर भी कहती है--मियां क्यों इतने मायूस हो गए हैं।
एक पैसा तो खर्च नहीं करते, आजकल आप बड़े कंजूस हो गए हैं।    

कवियों की बातें सुनकर हमें यही लगा कि --

इक हम ही नहीं हैं तन्हा, पत्नी के रुलाये हुए ,
और भी हैं ज़माने में , इस ग़म के सताये हुए ! 

नोट : नोट : पति पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं।  लेकिन थोड़ा हंसी मज़ाक जीवन में रास घोल देता है।  
( कौन सी ज्यादा पसंद आई , ज़रा बताएं ! )


Tuesday, June 23, 2015

जाने कहाँ गए वो दिन :




अब नहीं आते ब्लॉग्स पर पाठक , अब रह गए ब्लॉग्स अकेले !
अब नहीं जागता कोई रात भर , अब नहीं लगते ब्लॉगर्स मेले !!

लेखक वही हैं लेखनी वही है , लेख बदले बदले से आते हैं नज़र !
राही वही हैं सफ़र भी वही है , अब बदली सी नज़र आती है डगर !!

वक्ता वही हैं श्रोता भी वही हैं, अब सभागार लगता गया है बदल !
कवि सही है कविता भी सही है , ब्लॉग्स क्यों है पाठकों से बेदखल !!

Sunday, June 21, 2015

हैप्पी फादर्स डे ---


भूल मत जाना उसको जो जन्मदाता है।
खुद एक कोट में जीवन काटे ,
पर बच्चों को ब्रांडेड कपड़े दिलवाता है।
खुद झेले डी टी सी के झटके ,
पर आपको नैनो के सपने दिखलाता है।
चलना सीखा जिसकी उंगली की जकड़ में ,
अब पकड़ कर हाथ सहारा देना ,
भूल मत जाना उसको जीवन के पतझड़ में। 

Monday, May 25, 2015

खाली दिमाग से मज़े लेकर देखने वाली फिल्म है -- "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स"....




अक्सर ट्रकों पर लिखा देखा होगा -- दिल्ली , यु पी , पंजाब एंड हरियाणा ! 

कल खचाखच भरे हॉल में बैठकर इन्ही राज्यों की पृष्ठभूमि में बनी फिल्म "तनु वेड्स मनु रिटर्न्स" देखी। एक अर्से के बाद हीरोइन को डबल रोल में देखा। फिल्म पूर्णतया कंगना रनाउत की फिल्म है। एक लन्दन रिटर्न्ड आधुनिका और एक हरियाणवी एथलीट के रूप में दोनों ही रोल्स में खूब जमी है। अधिकांश पात्र देहाती दिखाए गए हैं , भले ही वे पंजाब के हों , यु पी या हरियाणा के। कुल मिलाकर एक हल्की फुल्की मनोरंजक फिल्म है जिसे परिवार के साथ देखा जा सकता है। फिल्म के अंत में सभी के चेहरे पर हंसी और ख़ुशी नज़र आ रही थी।

लेकिन पिछले हफ्ते पीकू जैसी क्लास फिल्म देखने के बाद इस फिल्म में दिमाग बंद ही रखना पड़ा। फिल्म में स्टोरी लाइन रास्ता भटक जाती है। अंत में तो ऐसी खिचड़ी बन जाती है कि समझ में नहीं आता कि खाएं या पीयें । फिल्म के शुरू में दिमाग के डॉक्टर्स को दिमाग से खाली दिखाया गया है । बाद में हरियाणा के जाटों की मिट्टी पलीद करके रख दी। हैरानी है कि हरियाणा के जाटों ने अब तक इस पर शोर नहीं मचाया। कंगना को हरियाणवी बोलते सुनकर हंसी कम रोना ज्यादा आ रहा था। उसकी नेजल टोन और मोनोटॉनस लहज़े ने भाषा का सत्यानाश कर दिया। थोड़ी और मेहनत करती तो नतीजा और अच्छा हो सकता था।

कुल मिलाकर खाली दिमाग से मज़े लेकर देखने वाली फिल्म है।

Monday, May 18, 2015

हर इंसान एक छोटा मोटा साइकोलॉजिस्ट होता है ---


वैसे तो सायकॉलॉजी अपने आप में एक पूरा सब्जेक्ट है और एक  साइकोलॉजिस्ट ही ह्यूमन सायकॉलॉजी को बेहतर समझ सकता है।  लेकिन हमने देखा है कि आंशिक रूप से ह्यूमन सायकॉलॉजी को लगभग सभी इंसान समझते हैं।

कई साल पहले की बात है।  तब हम पास की मार्किट में एक नाई की दुकान पर जाकर बाल कटवाते थे। एक दिन बाल काटते काटते युवा नाई बोला -- सर मैंने रिसर्च करके एक बहुत ही बेहतरीन फॉर्मूला खोज निकाला है , बालों को मज़बूत करने का। इससे दो सप्ताह में ही आपके बाल आपकी मसल्स की तरह स्ट्रॉन्ग हो जायेंगे। अभी तक हम उसकी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे , लेकिन उसकी यह बात सुनकर अचानक हमें एक अजीब सी ख़ुशी का अहसास हुआ।  आखिर अपनी तारीफ़ सुनना भला किसे अच्छा नहीं लगता।  अब हमने शीशे में झाँका और उसकी बात का आंकलन करने लगे।  ज़ाहिर था , उसकी कही बात असर दिखा रही थी क्योंकि अब हम थोड़ा और अकड़ कर बैठ गए थे।  खैर , उस दिन तो हमने बाल कटवाये और अगली बार सोचने का वादा किया।

अगले बार फिर उसने फिर अपने फॉर्मूले के बारे में याद दिलाया और कहा की एक बार ट्राई करके देखें।  इस बार भी किसी तरह हमने उसको टाला।  लेकिन जब तीसरी बार भी उसने पीछा नहीं छोड़ा तो हमने आखिर उसे बता ही दिया कि हम एक डॉक्टर हैं।

अब यह सुनते ही उसका चेहरा देखने जैसा हो गया।  वह रिसर्च और फॉर्मूला सब भूलकर अपनी पत्नी की बीमारी बताने लगा और मदद की गुहार करने लगा।
खैर हमने उसे जो भी सलाह देनी थी दी।  अंत में उसने स्वयं स्वीकारा कि सर क्या करें धंधा है , दो पैसे की आमदनी हो जाती है , लोगों को बहला फुसला कर।

 हम तो खैर जानते ही थे कि जिस तरह कमान से निकला तीर और मुँह से निकली बात कभी वापस नहीं आते , उसी तरह सर के उड़े बाल भी कभी वापस नहीं आते।

Sunday, April 19, 2015

आपके महीनों के तनाव को कम करने के लिए एक उपयुक्त जगह है लेंसडाउन ---

दिल्ली से महज़ २४० किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा लेकिन अत्यंत खूबसूरत हिल स्टेशन है , लेंसडाउन। दिल्ली से मोदीनगर होकर और मेरठ बाई पास से होते हुए करीब दो घंटे में आप पहुँच जाते हैं खतौली।  जहाँ से दायीं ओर बिजनौर के लिए सड़क मुड़ जाती है।




यदि आप सुबह जल्दी निकले हैं तो नाश्ते के लिए खतौली में चीतल रेस्ट्रां बहुत लोकप्रिय रहा है।  पहले यह पुराने हाइवे पर पड़ता था जो नया बाई पास बनने से बेकार हो गया था।  इसलिए अब उसे बंद कर मालिकों ने बाई पास और पुरानी खतौली सड़क के जंक्शन पर बहुत ही स्ट्रेटेजिक लोकेशन पर नया रेस्ट्रां खोल लिया है।   इसकी लोकेशन बहुत उपयोगी है।  लेकिन इस बार यहाँ खाना खाने में कोई आनंद नहीं आया। परांठे और चाय दोनों बेकार लगे।  यदि जल्दी ही प्रबंधन ने इस और ध्यान नहीं दिया तो उनको आर्थिक हानि होने से कोई नहीं बचा पायेगा।



खतौली से मीरानपुर की सड़क गांवों और खेतों के बीच से होती हुई  मीरानपुर में नेशनल हाइवे ११९ से जा मिलती है।  यह ड्राईव काफी सुहानी और आरामदायक रही। आगे बिजनौर बाई पास से होकर बिजनौर नज़ीबाबाद सड़क भी बहुत अच्छी है।  नज़ीबाबाद से होकर आप पहुँच जायेंगे कोटद्वार जहाँ से एक नदी के साथ साथ आप पहाड़ी सफर शुरू करते हैं।  सीधे होने से यह सड़क भी बहुत बढ़िया रही।  रास्ते में नदी किनारे एक खोखे वाले की चाय वास्तव में बड़ी स्वादिष्ट थी।




कोटद्वार से आगे एक जगह आती है दुगड्डा।  यहाँ से कई रास्ते अलग अलग दिशा में जाते हैं , जिनमे से एक लेंसडाउन की और जाता है।  थोड़ा आगे जाने पर पाइन ( चीड़ ) के पेड़ों के बीच से जाती सड़क बहुत मनमोहक लगती है।



दिल्ली से २३५ किलोमीटर की दूरी पर लेंसडाउन की सीखा आरम्भ होते है टॉल टैक्स जमा करते ही आ गया ब्लू पाइन रिजॉर्ट जहाँ हमारा ठहरने का इंतज़ाम था।  पहाड़ी की स्लोप पर बना यह रिजॉर्ट काफी आरामदायक लगा।  लेकिन यहाँ ठहरने के लिए आपको फिजिकली फिट होना पड़ेगा क्योंकि यह सारा रिजॉर्ट ढलान पर बना है जिससे कमरों तक जाने के लिए अनेकों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।  लेकिन सामने वैल्ली व्यू दिल को खुश कर देता है।




रिजॉर्ट के पीछे की पहाड़ी पर चढ़कर आपको नज़र आता है दूर बर्फ से ढके पहाड़ों का दृश्य।  हालाँकि मौसम साफ न होने से बर्फ से ढके पहाड़ तो दिखाई नहीं दिए , लेकिन वहां की हरियाली देखकर मन गदगद हो गया।




पहाड़ों में जाएँ और ट्रेकिंग न करें , यह हमसे हो ही नहीं सकता।  रिजॉर्ट से लेंसडाउन सड़क द्वारा करीब ३ - ४ किलोमीटर दूर पड़ता है।  लेकिन रिजॉर्ट के पीछे एक ट्रेकिंग रुट बना है जो घने जंगल से होता हुआ सीधे सड़क से जा मिलता है जहाँ से शहर बस १ किलोमीटर ही रह जाता है।  यह रास्ता मुश्किल से आधा किलोमीटर लम्बा है लेकिन पहली बार जाने वाले को सुनसान और डरावना लगता है।  रिसेप्शन पर किसी ने बताया कि अँधेरे में वापस मत आना , जंगली जानवर हो सकते हैं।  हमें नहीं लगा कि वहां जानवर होंगे लेकिन निश्चित ही अँधेरे में ट्रेकिंग करना कोई बुद्धिमानी भी नहीं होती।  इसलिए  वापसी में  हम सड़क द्वारा ही ४ किलोमीटर पैदल चलकर रिजॉर्ट पहुंचे , हालाँकि अँधेरे भी हो गया था।


 
अगला दिन घूमने का था।  यहाँ घूमने के लिए दो ही विशेष स्थान हैं।  एक यह झील जो शहर के लगभग बीच ही बनी है।  चारों और पाइन के पेड़ों के बीच यह झील ३० फुट गहरी है जहाँ बोटिंग करने के लिए आपको लाइफ जैकेट पहननी पड़ेगी।




इस शांत झील की तरह ही लेंसडाउन भी एक बहुत शांत जगह है जहाँ गढ़वाल रायफल्स का हेड क्वार्टर है। आर्मी के अलावा यहाँ न तो कोई विशेष स्थानीय निवासी हैं , न मार्किट या अन्य सुविधाएँ।  शहर में भी गिने चुने ही होटल्स हैं और बाकि हिल स्टेशंस की तरह कोई विशेष गतिविधि नज़र नहीं आई। लेकिन आर्मी शॉप्स पर कुछ बहुत सुन्दर और सस्ते  गिफ्ट ज़रूर मिल जायेंगे।  



यहाँ दूसरा स्पॉट है टिप एंड टॉप जहाँ से आपको चारों ओर का शानदार दृश्य नज़र आएगा। यहाँ एक के बाद एक कई व्यूइंग गैलरीज बनी हैं जहाँ फोटो खींचने और खिंचवाने का अपना ही मज़ा है।




घने जंगल के बीच फूलों से लदे कई पेड़ तो मन को मोह ही लेते हैं।  मौसम साफ हो तो दूर बर्फ से ढकी चोटियां भी नज़र आएँगी।



यहीं पर गढ़वाल मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस भी बना है जिसमे अनेक बैम्बू कॉटेज बनी हैं।  लेकिन ठहरने के लिए यह जगह एक दम बकवास लगी।  न यहाँ खाने का उचित प्रबंध है न हीं स्टाफ मित्रतापूर्ण लगा। कमरों का किराया भी बिना बात बहुत ज्यादा है।  कुल मिलाकर यहाँ ठहरने के लिए किसी दुश्मन को ही सलाह दी जा सकती है।  



ब्लू पाइन रिजॉर्ट से भी पहाड़ों दृश्य कोई कम रमणीक नहीं हैं।


वापसी में भले ही ग्रैंड चीतल पर खाना न खाया हो , लेकिन फ्रेश होने के लिए यह जगह सर्वोत्तम है।
दिल्ली से वीकएंड पर बाहर जाने के लिए लेंसडाउन एक बहुत ही अच्छी जगह लगी।  साफ़ रास्ता , साफ सुथरी प्रदुषण रहित जगह और शांत वातावरण आपके महीनों के तनाव को कम करने के लिए एक उपयुक्त जगह है लेंसडाउन।



Sunday, March 15, 2015

महिला स्वास्थ्य की अनदेखी -- एक विचारणीय विषय !


किसी भी देश के विकास का एक अच्छा सूचकांक वहां की महिलाओं और बच्चों का स्वास्थ्य  होता है ! हमारा भारत देश एक विकासशील देश है ! ज़ाहिर है , अभी यहाँ विकसित देशों की तरह नागरिकों को सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं ! निश्चित ही इसका प्रभाव महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर अवश्य पड़ता है ! लेकिन हमारे देश मे महिलाएं दो वर्ग मे बंटी हैं , एक जो आर्थिक रूप से उच्च आय वर्ग की हैं और दूसरी जो निम्न और निम्न मध्य आय वर्ग मे आती हैं ! आर्थिक रूप से संपन्न महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि अब हमारे देश मे भी सर्वोत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं ! वे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी होती हैं और स्वतंत्र भी ! लेकिन निम्न और मध्य निम्न वर्ग मे अभी भी महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहती हैं जिसका परिणाम उन्हे विभिन्न प्रकार से अस्वस्थ रहकर भुगतना पड़ता है ! 

सतही तौर पर देखें तो लगता है कि अपने स्वास्थ्य की अनदेखी के लिये महिलाएं स्वयम् ही जिम्मेदार हैं ! लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि महिलाओं के खराब स्वास्थ्य के लिये हमारे समाज मे फैली कुरीतियाँ , गलत धारणाएं , अवमाननाएं और कुंठित सोच ज्यादा जिम्मेदार हैं ! एक महिला के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य प्रजनन माना जाता है , लेकिन अक्सर यही उसके खराब स्वास्थय का कारण भी बनता है ! आज भी एक लाख गर्भवती महिलाओं मे से हर वर्ष करीब ३६० महिलाएं गर्भ के कारण अकाल  मौत के मूँह मे चली जाती हैं ! आधे से ज्यादा गर्भवती महिलाओं को रक्त की कमी पाई जाती है ! 21वीं सदी मे भी हमारे देश मे आधे से ज्यादा प्रसव अशिक्षित दाइयों द्वारा कराये जाते हैं ! निम्न वर्ग मे कुपोषण , संक्रमण , और उचित मात्रा मे भोजन  मिल पाने के कारण गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य निम्न स्तर का ही रह जाता है ! उचित स्वास्थ्य सेवाएं न मिल पाने के कारण न सिर्फ गर्भवती माँ , बल्कि अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ! 

इसके अतिरिक्त महिलाओं के स्वास्थ्य पर परिवार की सोच का भी बहुत प्रभाव पड़ता है ! अक्सर घर मे बड़े बूढ़े विशेषकर सास का हुक्म पत्थर की लकीर होता है ! एकल परिवारों मे भी पुरुष प्रधान समाज की छाप साफ नज़र आती है ! एक गृहणी अपनी मर्ज़ी से न जी पाती है , न अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रह सकती है ! यहाँ तक कि डॉक्टर के पास जाने के लिये भी उसे अपनी सास या पतिदेव की अनुमति चाहिये होती है ! उसे कब और कितने बच्चे पैदा करने हैं ,  अक्सर इसका निर्णय भी स्वयम् उसका नहीं होता ! कई बार देखा गया है कि डॉक्टर की सलाह के बावज़ूद गर्भवती महिला प्रसव के अंत समय तक अस्पताल नहीं जाती और घर बैठी रहती है क्योंकि घरवालों ने इज़ाज़त नहीं दी ! अक्सर इस लापरवाही के परिणाम भयंकर हो सकते हैं जिसमे माँ और बच्चे दोनो को ख़तरा हो सकता है ! लेकिन यहाँ डॉक्टर से ज्यादा सास की सोच , समझ और हुक्म ज्यादा अहम साबित होता है जिसकी हानि महिला को उठानी पड़ती है ! 

जब तक हमारा समाज शिक्षित नहीं होगा , जब तक हमारे अंध विश्वास , गलत धारणाएं और पुरानी कुतर्कीय मान्यताएं समाप्त नहीं होंगी , तब तक हमारे देश की महिलाएं पीड़ित होती रहेंगी और स्वास्थ्य के क्षेत्र मे महिलाओं का दर्ज़ा निम्न स्तर पर बना रहेगा !  जब तक हमारी युवा माएं सुरक्षित नहीं होंगी , हमारा ये विकासशील देश , विकासशील ही बना रहेगा , कभी पूर्णतया विकसित देश नहीं कहलायेगा ! 




Thursday, February 26, 2015

गार्डन ऑफ फाइव सेंसेज मे गार्डन टूरिज्म फेस्टिवल -- एक झलक ....


सर्दियों के कोहरे और ठंड से भरे दिनों के बाद बसंत ऋतु के आते ही मौसम और वातावरण खुशगवार हो जाता है ! चारों ओर रंग बिरंगे फूलों की मनभावन छटा नयनों को सकून प्रदान करती है ! ऐसे मे बाग़ , बगीचे , पार्क और घरों की फुलवाड़ी मे तरह तरह के फूलों को देखना अपने आप मे एक सुखद अनुभव होता है ! 
यही उद्देश्य पूरा होता है हर वर्ष गार्डन ऑफ फाइव सेंसेज़ मे आयोजित होने वाले गार्डन टूरिज्म फेस्टिवल मे जहां विभिन्न किस्मों के हज़ारों फूल आपका मन मोह लेते हैं ! 




अनेक रंगों और प्रकार के फूलों के इकेबाना मे सजे फूल सिर्फ यहीं दिखाई दे सकते हैं ! 




ये पर्पल कलर के फूल तो वास्तव मे बहुत सुन्दर दिखाई दे रहे थे ! 




रंगों की ये छटा भी कोई कम नहीं ! 





सही मायने मे बसंती रंग लिये ये फूल बहुत आकृषक लगे ! 




अलग अलग तरह के गुलदस्ते देखते ही बनते हैं ! 





एक और पुष्‍प गुच्छ ! 



मेले मे बच्चों के लिये सॉफ्ट एडवेंचर गेम्स भी थे ! 




फूल मार्केट : घर के लिये आप यहाँ फूलों और पौधों की खरीदारी भी कर सकते हैं ! 




शाम के समय लोक संगीत और नृत्य का कार्यक्रम वातावरण मे खुशहाली भर देता है ! 





फोटो खिंचवाने के लिये तो यहाँ अनेक अवसर और उपयुक्त पोज़ मिल जायेंगे ! 


Monday, February 2, 2015

तुम्हे देखूँ तो दिल की दुनिया आबाद होती है ---


कई दिनों के बाद आज ज़रा फुरसत मिली है तो मूड फ्रेश सा लग रहा है ! ऐसे मे ज़ेहन मे कुछ शे'र आ रहे हैं ! शे'र लिखने का यह नया तज़ुर्बा है : 

उनको शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते , 
कैसे बतायें बिन उनके हम रह नहीं सकते ! 

तुम्हे देखूँ तो दिल की दुनिया आबाद होती है ,
तेरी एक झलक से पूरी मन की मुराद होती है !

कुछ पल की दूरी भी ना सही जाये ये जुदाई , 
तू खुदा नहीं पर बसती है तुझ मे ही खुदाई ! 

ऐसा नहीं कि एक हम ही हैं तेरे चाहने वाले , 
कोई नहीं लेकिन जग मे हम जैसे  मतवाले ! 

तारीफ़ तेरी करे कोई तो जलता है 'तारीफ', 
मिलेगा भला कोई यहाँ हम जैसा शरीफ ! 

Sunday, January 25, 2015

निकलो ना यूं अयां होकर : एक प्रेम ग़ज़ल ---

बसंत पंचमी पर होली का डंडा गड़ जाता है ! यानि मस्ती भरे एक खुशहाल दौर की शुरुआत हो जाती है ! घर बाहर खेत खलियान , सभी जगह रंग बसंती छाने लगता है ! ऐसे मे प्रस्तुत है , एक प्रेम / शृंगार ग़ज़ल : 


निकलो ना यूं अयां होकर , के दुनिया बड़ी खराब है ,
रखना इसे संभाल कर , ये हुस्न लाज़वाब है ! 

नयनों की गहराई मे , राही ना डूब जाये कहीं ,
आँखें ये तेरी झील सी , मचलती हुई चेनाब हैं ! 

होठों की सुर्ख़ लालिमा ,  यूं लुभा रही है हमे ,
मयकश को मयख़ाने मे, ज्यों बुला रही शराब है ! 

गालों के बसंती रंग पे , शरमाये खुद शृंगार भी,
ठंड की सुहानी धूप मे , ये खिलते हुए गुलाब हैं ! 

चर्चे तुम्हारे हुस्‍न के , होने लगे हैं गली गली , 
कैसे संभाले दिल कोई , ये ज़लवा बेहिसाब है ! 

तारीफ़ तुम्हारे रूप की , करे क्या "तारीफ" , 
तू जागती आँखों का , इक हसीन ख्वाब है ! 

Sunday, January 18, 2015

दातों मे पीड़ा , कीड़ा या केरीज --


बहुत वर्ष पहले की बात है ! बस  मे बैठे हम चंडीगढ़ की ओर जा रहे थे ! रास्ते मे एक स्टेंड पर एक सेल्समेन बस मे चढ़ा और बोलना शुरू हो गया अपनी विशेष आवाज़ मे ! भाईयो , बहनों , मेहरबान , कद्रदान , ज़रा सुनो लगा कर कान ! क्या आपके दांत मे दर्द रहता है ? दांत मे कीड़ा लगा है ? डाक्टर को दिखाया , कोई आराम नहीं आया ! अब घबराने की कोई ज़रूरत नहीं ! हमारे पास है एक नायाब नुश्खा , ये दवा की शीशी जिसकी एक बूंद लगाते ही आपके दांत का कीड़ा घुट कर मर जायेगा और आपका दर्द तुरंत गायब हो जायेगा ! ईलाज़ की गारंटी है , एक बार इस्तेमाल करके देखिये , आपको खुद ही विश्वास हो जायेगा ! 
इसके बाद उसने कहा -- आप मे से किसी के दांत मे दर्द रहता है ? एक साथ कई लोग बोल पड़े -- जी रहता है ! उसने एक आदमी को कहा -- मूँह खोलो ! आपके दांत मे कीड़ा लगा है ! अभी दवा की एक बूंद लगाता हूँ , फिर असर देखिये ! फिर उसने शीशी खोलकर माचिस की एक तिल्ली उसमे डुबोई और उस व्यक्ति के दांत पर लगा दी ! दो तीन मिनट के बाद उसने फिर उसका मूँह खुलवाकर उसी तिल्ली को मूँह मे घुमाया और सबको दिखाते हुए बोला -- लीजिये ज़नाब , कीड़ा मर गया और ये रहा ! तिल्ली की नोक पर एक तिनका सा लगा दिखाई दे रहा था ! उसने बड़ी शान से कहा -- ये है हमारी जादुई दवा , लगाते ही असर करती है ! लेकिन इसकी कीमत सुनकर आप हैरान हो जायेंगे -- कीमत ५० नहीं , २० नहीं , दस भी नहीं , कीमत है मात्र ५ रुपये ! जी हाँ , केवल और केवल ५ रुपये मे आपके दांत का दर्द खत्म ! 
फिर देखते ही देखते उसकी दसियों शीशियाँ बिक गई ! फिर जैसे ही बस चलने को हुई , उसने अपना थैला संभाला और बस से नीचे उतर गया ! और हम डॉक्टर होकर सोचते ही रह गए कि कितना आसान है पब्लिक को बेवकूफ़ बनाना ! 

वास्तव मे दांत का कीड़ा कोई कीड़ा नहीं होता ! इसे डेंटल केरिज कहते हैं जिसमे दांत का सुरक्षा कवच जिसे एनेमल कहते हैं , उसमे ब्रेक हो जाता है ! इसका कारण होता है दांतों के बीच फंसे खाने के कण जिन पर बेक्टीरिया के प्रभाव से अम्ल पैदा होता है जो एनेमल को ब्रेक कर देता है ! ऐसा तभी होता है जब हम अपने मूँह को साफ नहीं रखते , विशेषकर खाने के बाद ! इसलिये मूँह को साफ रखना अत्यंत आवश्यक होता है ! 

अक्सर शहर मे लोग सुबह ब्रश तो करते हैं , कुछ लोग सुबह शाम दोनो वक्त भी करते हैं , लेकिन खाने के बाद बस एक घूँट पानी पीकर ही काम चला लेते हैं ! ऐसा करने से मूँह मे दांतों के बीच खाना रह जाता है जो मूँह मे मौजूद बेक्टीरिया के रिएक्शन से सड़ने लगता है ! इसे ना सिर्फ मूँह मे दुर्गन्ध होने लगती है , बल्कि लम्बे समय तक ऐसा होने से डेंटल एनेमल भी गलने लगती है ! इससे दांत का भीतरी हिस्सा जिसे पॅल्प कहते हैं , एक्सपोज हो जाता है जिससे दांत मे दर्द रहने लगता है ! धीरे धीरे दांत बिल्कुल खाली हो जाता है जिसे आम बोलचाल की  भाषा मे कीड़ा लगना कहते हैं !

जिस तरह खाना खाने से पहले हाथ धोना आवश्यक होता है , उसी तरह खाने के बाद कुल्ला करना आवश्यक होता है ! लेकिन कुल्ला करना अनपढ़ और गांव के लोगों का काम माना जाता है ! खाने के बाद खाली एक घूँट पानी पीकर काम चलाने का ही नतीज़ा होता है कि पढ़े लिखे शहरी लोगों के दांतों मे भी डेंटल केरिज हो जाती है ! इसीलिये मूँह से भी अक्सर दुर्गन्ध आती है ! 
ज़रा सोचिये , फैशन आवश्यक है या स्वास्थ्य ! 


Tuesday, January 13, 2015

ज्यादा बोलने की आदत तो हमे है नहीं ...


एक दिन एक महिला बोली ,

डॉक्टर साहब , मेहरबानी कीजिये ,
और कोई अच्छी सी दवा दीजिये ! 

मेरे पति रात मे बहुत बड़बड़ाते हैं ! 
लेकिन वो क्या बोलते हैं, हम समझ नहीं पाते हैं ! 

हमने दवा लिख कर कहा, यदि आप ये दवा सुबह शाम लेंगे, 
तो आपके पति अवश्य ही नींद मे बड़बड़ाना बंद कर देंगे ! 

वो बोली नहीं डॉक्टर साहब , आप फीस भले ही दुगना कर दें ,
लेकिन दवा ऐसी दीजिये कि वो साफ साफ बोलना शुरू कर दें !

उनके बड़बड़ाने से हम बिल्कुल भी नहीं घबराते हैं ,
लेकिन पता तो चले कि वे नींद मे किस को बुलाते हैं ! 

हमने कहा बहन जी , हमारी दुआ उनके लिये है , 
लेकिन ये दवा उनके लिये नहीं, आपके लिये है ! 

हम आपके पति का हौसला बिना दवा के ही बुलंद कर देंगे , 
आप उन्हे दिन मे बोलने दें , वे रात मे बड़बड़ाना खुद ही बंद कर देंगे !