Saturday, April 22, 2017

नारी की सुरक्षा में ही मानव जाति की सुरक्षा है ---


यह मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ लगभग आधी शताब्दी पूर्व मानव चरण चाँद पर पड़े थे , मंगल गृह पर यान उतर चुके हैं और अंतरिक्ष में भी मनुष्य तैरकर , चलकर , उड़कर वापस धरती पर सफलतापूर्वक उतर चुका है , वहीँ दूसरी ओर आज भी हमारे देश में विवाहित महिलाओं पर न सिर्फ दहेज़ के नाम पर अत्याचार किये जा रहे हैं , बल्कि उन्हें आग में झोंक दिया जाता है। यह अमानवीय व्यवहार किसी भी तरह क्षमा के योग्य नहीं है। इन कुकृत्यों के अपराधियों की  सज़ा कारावास से बढाकर फांसी कर देना चाहिए। शायद तभी ये शैतान रुपी लालची मनुष्य इंसान बन पाएंगे।

शिक्षा : लेकिन यहाँ यह सवाल भी उठता है कि कोई लड़की क्यों वर्षों तक ससुराल वालों के अत्याचार सहन करे। इसके मूल कारण हैं लड़कियों का अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य न होना। जब तक हमारी बेटियां सुशिक्षित होकर स्वयं सक्षम न होकर दूसरों पर निर्भर रहेंगी , तब तक इस समस्या का सामाजिक समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए सबसे पहला काम है बेटियों को पढ़ाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। जब अपने बलबूते पर जीवन जीने का आत्मविश्वास होगा , तभी महिलाओं में इन शैतानों से लड़ने का साहस आ पायेगा।  

तलाक : हमारे देश में आज भी पति पत्नी का साथ सात जन्मों का माना जाता है , जबकि विकसित देशों में कभी कभी एक ही जन्म मे महिलाएं सात शादियां कर डालती हैं। इसका कारण है सहनशीलता के नाम पर अत्याचार सहते हुए साथ रहना जो एक मज़बूरी सी होती है।  लेकिन यदि महिला आर्थिक और शैक्षिक रूप से सक्षम हो तो इस आवश्यकता से अधिक सहनशीलता की आवश्यकता नहीं होती।  यदि सभी प्रयासों के बावजूद आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा तो पति पत्नी का अलग होना ही दोनों के लिए हितकारी है। निसंदेह , तलाक के बाद सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव बच्चों पर पड़ता है और अक्सर बच्चों के कारण पति पत्नी तलाक के बारे में नहीं सोच पाते , लेकिन बच्चों को प्रतिदिन के पति पत्नी के झगड़ों का सामना करना पड़े , इससे बेहतर तो दोनों का अलग होना ही है।
समाज को भी तलाकशुदा पति पत्नी की ओर अपना रवैया बदलना होगा।  आखिर यह दो इंसानों के बीच का आपस का मामला है जिसमे किसी भी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप सही नहीं।

कानून और समाज  : शादियों में दहेज़ मांगना तो एक अपराध होना ही चाहिए , साथ ही दहेज़ देने को भी हतोत्साहित करना चाहिए।  अक्सर पैसे वाले लोग अपनी शान शौकत दिखाने के लिए शादियों में करोड़ों रूपये तक खर्च कर डालते हैं , जो अन्य व्यक्तियों के लिए एक गलत सन्देश पहुंचाता है। लोगों को इस दिखावे और झूठी शान का मोह छोड़ना होगा।  लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता , इसलिए सरकार को ही ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसमे शादियों पर होने वाले खर्च की सीमा निर्धारित हो।  हालाँकि यह काम सामाजिक संस्थायें बेहतर कर सकती हैं। सादगी और सरलता में जो बात है वह बनावटी चमक धमक में कहाँ !

किसी भी रूढ़िवादी परम्परा को बदलने में समय लगता है।  लेकिन समय के साथ साथ परिवर्तन भी अवश्यम्भावी है। बस हम थोड़ा सा प्रयास सक्रीय होकर करें तो शायद हमारे आपके समय में ही यह सामाजिक परिवर्तन आ सकता है जो मानव जाति के हित में होगा। नारी की सुरक्षा में ही मानव जाति की सुरक्षा है।  

   

Saturday, April 15, 2017

बाघ जो देखन मैं चला, बाघ मिला ना कोय ---

बाघ जो देखन मैं चला, बाघ मिला ना कोय,
जो तुमको देखा प्रिये , याद आया न कोय ।

जिन लोगों के पास फालतु पैसा होता है , वो शादी की सालगिरह पर विदेश जाते हैं या जश्न मनाने कम से कम फाइव स्टार होटल में जाते हैं । जिनके पास काम ज्यादा और पैसा कम होता है , उनके लिए सालगिरह भी बस एक और दिन ही होता है।  हमारे पास फालतु पैसा तो कभी नही रहा लेकिन वक्त की कमी कभी नहीं रही।  इसलिए हम हर साल सालगिरह पर बाहर ज़रूर जाते हैं। लेकिन लगभग पिछले दस सालों से हम सिर्फ जंगलों में ही जाते हैं। हालाँकि इसका वानप्रस्थ आश्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।

इस बार भी जाना हुआ जिम कॉर्बेट के जंगल में बसा एक गाँव मरचुला जहाँ बना है स्टर्लिंग रिजॉर्ट्स।


 उत्तराखंड के रामनगर शहर से करीब ३२ किलोमीटर की दूरी पर चारों ओर हरे भरे पहाड़ों से घिरा यह रिजॉर्ट दो साल पहले ही बना है और हम तभी से यहाँ जाने का कार्यक्रम बना रहे थे। इसके ठीक सामने बहती है रामगंगा नदी जिसका सम्बन्ध रामायण काल से जुड़ा है। सुना है यहीं कहीं कभी सीता मैया भी रही थीं। शहर से दूर एकदम शांत , सुन्दर , स्वच्छ वातावरण लेकिन सभी सुविधाओं से परिपूर्ण यह स्थान मन को मोह लेता है।  यहाँ गाड़ियों का शोर और प्रदुषण नहीं होता बल्कि सुबह शाम चिड़ियों की चहचाहट , रंग बिरंगी चिड़ियाँ जो शहर में कभी देखने को नहीं मिलती , नदी के बहते पानी की कर्णप्रिय कलकल करती आवाज़ और एक ठहरा हुआ सा समय , मानो जिंदगी स्थिर सी हो गई हो।  सब मिलकर तनावग्रस्त तन और मन को पूर्ण रूप से विषमुक्त कर देते हैं। सिर्फ दो दिन का वास ही मन को हर्ष और उल्लास से भर देता है।  




मरचुला गाँव , यहाँ तक आने के लिए रामगंगा नदी पर एक पुल बनाया गया है।  पुल से बलखाती नदी का एक दृश्य।    




मरचुला गाँव की हरी भरी वादियों के बीच बहती नदी किनारे यह एक नंगी पहाड़ी भी दिखी जिससे कई बार भूस्खलन हुआ लगता है।  इसके ठीक नीचे बने एक रिजॉर्ट को देखकर लगा मानो बहुत खतरनाक जगह है।  लेकिन बताया गया कि यह ज़रा हटकर है , इसलिए रिजॉर्ट को कोई खतरा नहीं है।




गाँव की सड़क पर बनी यह दुकान देखने में शराब की दुकान जैसी लगी।  लेकिन पास जाकर देखा तो पाया कि कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों को बड़े करीने से सजाया गया था जिससे यह एक बार जैसी दिख रही थी। यहाँ बैठकर चाय पीना भी एक सुखद अहसास था।  




स्टर्लिंग रिजॉर्ट के सामने सड़क से नीचे उतरकर करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर नदी का पानी कलकल करता बहता नज़र आता है। यहाँ नदी किनारे कई और रिजॉर्ट्स भी बने हैं।  हालाँकि यह क्षेत्र अभी विकसित हो रहा है।  इसलिए एक गाँव जैसा मह्सूस होता है।




चारों ओर पहाड़ और बीच में बहती नदी हो । नदी का किनारा हो , अपना कोई पास हो , और दिन कोई खास हो , तो वातावरण स्वयं ही रोमांचित हो जाता है।




नदी का कलकल करता बहता पानी , शांत वातावरण में जिसे संगीत सा घोल देता है।




सभी सुविधाओं से सुसज्जित इस रिजॉर्ट में स्विमिंग पूल भी है , जिससे यहाँ की खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं।

यदि संभव हो तो शादी की सालगिरह पर सभी को एक दो दिन के लिए घर से बाहर कहीं दूर निकल जाना चाहिए। शहर के कंक्रीट जंगल से दूर किसी प्राकृतिक जंगल में रहकर आप गुजरे साल के सारे गिले शिकवे ( यदि कोई हों तो ) भूल जायेंगे और अगले एक साल तक के लिए तन मन में एक मीठा मीठा सा अहसास भर जायेगा जब आप होंगे , आपकी खास होगी और तीसरा कोई पास नहीं होगा।

Monday, April 10, 2017

आराम करो , आराम करो : एक बिलकुल नया प्रयोग ---


प्रस्तुत है , श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी की एक हास्य कविता की पैरोडी : एक बिलकुल नया प्रयोग --

जो भी मित्र मिलते हैं , बोलते हैं , भई आजकल क्या करते हो ,
इस महंगाई के दौर में बिना जॉब के कैसे गुजर करते हो !
क्या रखा है बेवज़ह घूमने में , कुछ तो शर्म लिहाज़ करो ,
कब तक खाली घर बैठोगे , अब कुछ तो काम काज करो।
मैं कहता हूँ , किया काम ताउम्र , अब तो पूर्ण विराम करो ,
इस भाग दौड़ में क्या रखा है , आराम करो , आराम करो।

आराम स्वस्थता की कुंजी , इससे ना थकावट होती है ,
आराम उत्कंठा की एक दवा , मन का तनाव खोती है।
आराम शब्द में राम छिपा,  हराम में भी राम होता है,
जब दोनों में ही राम है तो आराम कैसे हराम होता है।
इसलिए तुमसे कहता हूँ , मत हमको यूँ बदनाम करो ,
पल दो पल के यौवन जीवन, आराम करो आराम करो।

यदि कुछ करना ही है तो स्वस्थ रहने की बात करो ,
सुबह शाम पार्क में जाकर , लम्बी लम्बी वॉक करो।
क्या रखा काम धाम में , जो मज़ा है जिम जाने में ,
जो वेट्स उठाने में लुत्फ़ है , वो कहाँ थैला उठाने में।
मुझसे पूछो मैं बतलाऊँ , है मज़ा सुस्त कहलाने में ,
काम काज में क्या रखा , जो रखा खिसक जाने में।

मैं यही सोचकर घर से बाहर , कम ही जाया करता हूँ ,
जो कामकाज़ी जन होते हैं , उनसे कतराया करता हूँ।  
दफ्तरों की छुट्टी होने से पहले , बाहर जाया करता हूँ,
शाम अँधेरा होने पर ही , घर वापस आया करता हूँ।
मेरी किताब में लिखा हुआ , जो सच्चे योगी होते हैं ,
वे कम से कम बाइस घंटे तो , बेकाम भोगी होते हैं।

वार्ड ना मरीज़ों की चिंता, सोचकर आनंद आता है ,
रोगी , मृत्यु , बुढ़ापे से , मन स्वच्छंद हो जाता है।
जब सुबह से शाम सारा समय , अपना नज़र आता है ,
तो सच कहता हूँ जीने का जैसे , मज़ा निखर आता है।
लेकर लैप में लैपटॉप फिर फेसबुक की ओर मुड़ जाता हूँ ,
कविता , रचना , गीत , नज़्म , नगमा से जुड़ जाता हूँ।

मैं औरों को भी जिंदगी की , यही सीख सदा देता हूँ ,
एक दिन में बस एक काम करो, ये राज़ बता देता हूँ।
मैं बैरागी हूँ मुझको तो बस , आराम में राग फूटते हैं ,
उनको भी तो चैन कहाँ जो सोये बिना जाग उठते हैं।
इसीलिए मैं कहता हूँ तुम सुनो, मेरी तरह से काम करो ,  
ये माया का बंधन छोडो , खाओ पीओ और आराम करो।  

Wednesday, March 15, 2017

इस शहर के लोग ---


लोग पैट पालने का शौक तो पाल लिया करते हैं ,
लेकिन पैट का पेट फुटपाथ पर साफ़ कराते हैं जिस पर खुद चला करते हैं।
फिर कहीं पैर में पैट का पेट त्याग न लग जाये ,
इस डर से इस शहर में लोग सर उठाकर नहीं , सर झुकाकर चला करते हैं।

लोग गऊ को गौ माता तो कह कर बुलाया करते हैं ,
लेकिन कूड़ा कचरा खाने को उन्हें सडकों पर आवारा छोड़ दिया करते हैं।
फिर कहीं पावन गोबर में गाड़ी के टायर न सन्न जाएँ ,
इस डर से इस शहर में लोग सडकों पर गाड़ी जिग जैग चलाया करते हैं।

लोग जंक फ़ूड खाने का शौक तो रख लिया करते हैं ,
लेकिन प्लास्टिक के रैपर और खाली बोतल सड़क पर ही फेंक दिया करते हैं।
फिर गंदगी से कहीं महामारी न फ़ैल जाये ,
इस डर से नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को ही सारा दोष दिया करते हैं।

लोग बड़ी बड़ी गाड़ियां तो सडकों पर चलाया करते हैं ,
लेकिन बेतरतीब चलाते ट्रैफिक के नियमों का पालन नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं ज़रा सा छूने पर इज़्ज़त न चली जाये ,
इस डर से इस शहर के लोग रोड रेज़ में मरने मारने पर उतर आया करते हैं।

लोग बड़े बड़े मंचों पर बड़ी बड़ी बातें तो बनाया करते हैं ,
लेकिन मुसीबत में फंसे किसी मुसीबत के मारे की मदद नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्कर में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग अक्सर नज़र बचाकर निकल जाया करते हैं।  

लोग बेटी बचाओ आंदोलन तो चलाया करते हैं ,
लेकिन बेटे की चाहत में अजन्मे बच्चे का लिंग परिक्षण कराया करते हैं।
फिर कहीं स्वास्थ्य विभाग की नज़र में न आ जायें ,
इस डर से इस शहर के लोग चोरी चुपके से गर्भपात भी कराया करते हैं।

इस शहर के लोग मौज मस्ती से जीया करते हैं ,
लेकिन इनकम टैक्स , सेल्स टैक्स और वैट की चोरी किया करते हैं।
फिर कहीं इनकम टैक्स विभाग की जाँच में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग बात बात पर रिश्वत लिया दिया करते हैं।



Monday, January 30, 2017

प्रकृति सबसे बड़ा डॉक्टर है ---



चिकित्सा के क्षेत्र में अक्सर कहा जाता है -- we treat , he cures . यानि डॉक्टर्स का कहना होता है कि हम सिर्फ इलाज़ करते हैं , रोगी को ठीक तो वो ऊपरवाला ही करता है। यह सच है कि एक डॉक्टर केवल इलाज़ कर के एक सीमा तक ही स्वास्थ्य लाभ में रोगी की सहायता कर सकता है। इसलिए डॉक्टर भगवान नहीं होता। वह किसी को निश्चित अवधि के बाद सांसें नहीं दे सकता। यह सब कुछ प्रकृति या भगवान के हाथ में है।

लेकिन चिकित्सा के मामले में कई ऐसी स्थितियां और परिस्थितियां भी होती हैं जहाँ डॉक्टर उपचार करने का प्रयास कर सकता है और सफल भी हो जाता है।  परंतु यदि डॉक्टर द्वारा इलाज़ न भी किया जाये , तो भी प्रकृति स्वयं ही रोग को ठीक कर देती है। यह हमारे लिए प्रकृति की देन है।  आइये , जानते हैं ऐसी ही शारीरिक समस्याओं में बारे में जब बिना इलाज़ के भी हम ठीक हो सकते हैं :

१ )  दस्त या आंत्रशोध : दस्त यानि डायरिया एक ऐसा रोग है जो रोग न होकर आंत्र संक्रमण के विरुद्ध शरीर की एक प्रतिक्रिया है।  यानि जब भी आँतों में कोई बाहरी संक्रमण होता है तो हमारी आंतें उस संक्रमण को बाहर धकेल कर उससे छुटकारा पाने का प्रयास करती हैं।  इस प्रक्रिया में शरीर का कुछ पानी और साल्ट्स का ह्रास अवश्य होता है , जिसे हम डायरिया या दस्त कहते हैं।

दस्तों का न कोई उपचार है , न ही अक्सर कोई आवश्यकता होती है। संक्रमण निष्काषित होने पर यह स्वतः ही ठीक हो जाता है।  इसलिए दस्तों में दवा देने की कोई ज़रुरत नहीं होती।  केवल पानी और साल्ट की कमी को पूरा करने के लिए ORS की आवश्यकता होती है।

२ ) वायरल फीवर : वायरस के संक्रमण से होने वाला बुखार सेल्फ लिमिटिंग होता है।  यानि यह आम तौर पर १ से ७ दिन अपने आप ठीक हो जाता है।  इसलिए इसके इलाज़ में किसी विशेष दवा की आवश्यकता नहीं होती।

बस तापमान को कम रखने के लिए पैरासिटामोल की गोली ही काफी है।  

३ )  Chalazion : यह एक मेडिकल टर्म है।  यह वास्तव में आँखों की पलकों में एक गाँठ के रूप में दिखाई देती है। इसकी शुरुआत होती है पलक में मौजूद मीबोमिअन ग्लैंड ( तेल ग्रंथि ) में संक्रमण होने से।  अक्सर ऐसा आँखों पर गंदे हाथ लगने से होता है। शुरू में ग्रंथि में सूजन और तेज दर्द होता है।  इस अवस्था में एंटीबायोटिक्स से इसे ठीक किया जा सकता है।  लेकिन एक बार पुराना हो गया तो तेल ग्रंथि में रुकावट होने से एक गांठ बन जाती है जिसमे न दर्द होता है , न ही कोई और तक़लीफ़।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है।  इसलिए रोगी डॉक्टर के पास जाता है।

अक्सर डॉक्टर इसका ऑप्रेशन करने की सलाह देते हैं। क्योंकि इस पर एंटीबायोटिक्स का कोई प्रभाव नहीं होता।

लेकिन इस दशा में किसी उपचार की ज़रुरत नहीं होती। बस साफ रुई को गर्म  पानी में डुबोकर दिन में कई बार इसकी सिकाई करें , कुछ ही दिनों में यह गांठ गायब हो जाएगी। बिलकुल चमत्कारिक ढंग से।

४ ) Ganglion  :  यह भी एक गांठ जैसी ही होती है जो अक्सर हाथ पर या हथेली के जोड़ के पास बन जाती है।  इसमें भी कोई दर्द नहीं होता।  न ही इससे कोई हानि होती है।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है या कभी कभी चोट आदि लगने से परेशानी हो सकती है।

डॉक्टर इसके इलाज़ के लिए या तो सिरिंज से इसका पानी निकाल कर पट्टी बाँध देंगे या ऑप्रेशन द्वारा काट कर निकाल देंगे। अक्सर इसमें स्टीरॉयड्स का इंजेक्शन लगाकर भी इलाज़ किया जाता है।  लेकिन इन सबके बाद भी दोबारा होने की सम्भावना काफी ज्यादा रहती है।

लेकिन यदि इसमें कोई दर्द नहीं है और डॉक्टर ने इसे गैंगलिओन ही बताया है तो चिंता की कोई बात नहीं है।  क्योंकि अक्सर यह कुछ समय के बाद स्वयं ही पिघल जाती है और अचानक गायब हो जाती है।  प्रकृति का एक और चमत्कार।

५ )  मस्से ( warts ) : अक्सर हाथों पर या चेहरे पर बन जाते हैं। अक्सर इनमे कोई दर्द नहीं होता लेकिन देखने में भद्दे लगते हैं।  ये भी एक वायरल संक्रमण के कारण होते हैं।  

डॉक्टर इन्हें तरह तरह से ठीक करते हैं लेकिन यदि इलाज़ नहीं भी किया जाये तो कुछ ही दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं।  अक्सर पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स दर्द करते है और चलना मुश्किल कर देते हैं।  कई बार इनका ऑप्रेशन करना पड़ सकता है।

यदि दर्द नहीं है तो कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।  कुछ समय बाद ये स्वयं ठीक हो जायेंगे। पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स होमिओपैथी के इलाज़ से जल्दी ठीक हो जाते हैं।

इस तरह प्रकृति रोगों से स्वयं ही हमारा बचाव करती है।  लेकिन इसके लिए एक बार डॉक्टर से परामर्श कर यह सुनिश्चित अवश्य करा लें कि रोग का निदान सही है।  यदि निदान गलत हुआ तो बहुत हानि भी हो सकती है क्योंकि किसी भी रोग का इलाज़ यदि जल्दी किया जाये तो ठीक होने की सम्भावना ज्यादा रहती है।  इसलिए सेल्फ ट्रीटमेंट कभी नहीं करना करना चाहिए।  जो भी करें , डॉक्टर की देख रेख में ही करें ।  

Monday, January 9, 2017

नए साल की शुभकामनायें --

भाग १ :

गुजर गया एक और साल , जाते जाते कर गया क्या हाल।
कल तक जो मालामाल थे , वो एक पल में हो गए कंगाल।

नीले नोटों का रंग बदला , लोगों के जीने का ढंग बदला।
नींद उड़ गई अमीरों की , पर मौज करने लगा हर कंगला।

लोग रिक्शा छोड़ कतार में लग गए , पैसे के व्यापार में लग गए।
दिन भर खड़े रहे बैंक के सामने , फिर ठेके की कतार में लग गए।

मोदी ने नोटों का ऐसा दांव लगाया , पस्त हो गई ममता माया।
नर्म पड़ गए नितीश मुलायम , पर धरती हिली ना भूकंप आया।


पंजाब को सरे आम लूट गई भंग , सिद्धू का भाजपा से छूट गया संग ,
साल भर आप से लड़ते रहे नज़ीब , फिर खुद मैदान छोड़ गए जंग।

पठानकोट में चूक हो गई ज़रा सी , बड़ी दर्दनाक घटना थी उरी की।
किसी आतंकी को ना लगी फांसी , पर केजरी की ठीक हो गई खांसी।

विजेंद्र ने कईयों के घमंड किये चूर , हिंदी फिल्मों ने भी कमाया भरपूर।
पाकिस्तानी एक्टर्स तो भागे दुम दबा के , पर सैफीना को हो गया तैमूर।

रागा मोदी राग गाता रह गया ,  करण का यौवन आंसुओं में बह गया ,
अरबाज़ को छोड़ गई मलाईका , सलमान इस साल भी कुंवारा रह गया।

न्यू इयर पर होटलों को हुआ घाटा , कलाकारों ने अपना रेट आधा काटा ,
मिस्त्री की समझ ना आई मिस्ट्रि , क्यों टाटा ने सायरस को किया टाटा।  

आई एस आई एस की ज़ारी रही बर्बादी , अभी वश में नहीं आया बगदादी ,
पर अमेरिका ने हिला कर रख दिया , जब ट्रम्प ने हिलेरी की वाट लगा दी।

ऑलम्पिक्स में मैडल जीते कई रंग के , कुश्ती में साक्षी मलिक के बजे डंके ,
आमिर खान ने सहिष्णु होकर दिया नारा , म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के।

अभी भी जिन लोगों के चेहरे हैं उदास , सोचते हैं कि दिन तो पूरे हो गए पचास ,
उनको कहता हूँ, सोच बदलो, देश बदलेगा , मत सोचो मोदी जी फेल हुए या पास।

भाग २ :

कामना करता हूँ कि इस नए साल में सबके जीवन में :

हँसी के फुव्वारे हो , खुशी के गुब्बारे हो,

न आपसी विवाद हो, न कोई आतंकवाद हो !

और इस नए साल में मुक्ति मिले --

भूखों को भूख से ,घूसखोरों को घूस से ,

किसानो को कर्ज से , मरीजों को मर्ज से ,

गरीबों को कुपोषण से , शरीफों को शोषण से !

बाबुओं को फाइलों से, अस्पतालों को घायलों से ,

चुनाओं को फर्जी वोटों से , देश को नकली नोटों से !

और इस नए साल में , सलामत रहे--

बच्चों की मुस्कान, पंछियों की उड़ान,

फूलों के रंग, अपनों का संग,

बड़ों का दुलार, और भाई भाई का प्यार!

सलामत रहे--

देश की आज़ादी, वीरों के हौसले फौलादी,

लोकतंत्र में अटल विश्वास, और डिजिटल भारत की आस!

और कामना करता हूँ कि --

इस वर्ष ये नया साल , करदे दिलों का वो हाल,

कि ढह जायें सब मज़हब और नफरत की दीवारें,

और सर्व धर्म मिल कर पुकारें ,

मुबारक हो नया साल, सबको मुबारक हो नया साल!

जनता जब सुख चैन से सो पायेगी 
बेटियां भी जब सुरक्षित हो जाएँगी।    
इंसान में जब इंसानियत जाग जायेगी ,
नव वर्ष की कामना तभी शुभ हो पायेगी।