सन १९७७ का जून महीना । दिल्ली के सात
भावी डॉक्टर शिमला घूमने गए । अपना तो यह पहला अवसर था जब हमने दिल्ली से बाहर कदम रखा था । यहीं पैदा हुए , पले बढे , पढ़े । कोई रिश्तेदार भी दिल्ली से बाहर नहीं । आखिर दोस्तों के साथ चल ही दिए ।
शिमला घूम घाम कर जब वापस लौटने का दिन आया तो सबने सोचा कि घरवालों के लिए
शिमला की कोई अच्छी सी निशानी लेकर चलना चाहिए । कोई ऐसी वस्तु जो शिमला की विशेषता हो , जिसे देख सब वाह वाह कर उठें ।
सबने खूब दिमाग लगाया, खूब दिमाग
लगाया और अंत में यही फैसला हुआ ।
सबने एक एक किलो शिमला मिर्च तुलवाई और ठूंस ठूंस कर बैग में भर ली । बड़ी शान से घर पहुंचे । बेटा पहली बार बाहर जाकर वापस आया था । हमने भी छूटते ही घोषणा कर दी कि एक बहुत खूबसूरत तोहफा लाये हैं शिमला से । लेकिन इसके बाद एक के बाद एक ,
हमें तीन शॉक लगे
।
पहला झटका तब लगा जब हमने बताया कि हम शिमला मिर्च लाए हैं और मां ने बताया कि ये तो दिल्ली में भी मिलती है ।
खैर इस झटके से उभरकर हमने कहा कि मिलती होगी लेकिन हम जितनी सस्ती
लाए हैं उतनी सस्ती यहाँ नहीं मिल सकती ।
अब दूसरा झटका लगा । पता चला कि दिल्ली में तो इससे भी सस्ती मिलती है ।
लेकिन हमने भी बड़े साहस से काम लेते हुए कहा कि इतनी ताज़ा और बढ़िया किस्म यहाँ मिल ही नहीं सकती ।
लेकिन तीसरे झटके से तो हम आज तक भी नहीं उभर पाए हैं । क्योंकि जब बैग खोला , तो जून की गर्मी में २४ घंटे से बैग में ठूंसी हुई शिमला मिर्च का मलीदा बना हुआ था । आखिर, सारी की सारी फेंकनी पड़ी ।
अब इस कारनामे पर सब इतने हतोत्साहित थे कि आज तक किसी ने किसी से नहीं पूछा कि उसके घर पर क्या तमाशा हुआ ।
आज उनमे से कोई अमेरिका , कोई कनाडा , कोई ब्रिटेन में और बाकि यहीं , उच्च श्रेणी के डॉक्टर हैं ।
शिमला के माल रोड पर चार मित्र । इनमे हम कौन से हैं ? आज जब कभी सोचता हूँ तो लगता है , हमसे समझदार तो अपना साहबजादा ही रहा । बेटा पांच वर्ष की उम्र में स्कूल की ओर से मसूरी घूमने गया तो वहां से अपनी मां के लिए १५ रूपये खर्च कर एक हैण्ड पर्स लेकर आया ।
श्रीमती जी ने आज १५ साल बाद भी संभाल कर रखा है , बेटे की पहली गिफ्ट को । जब भी सोचता हूँ , हामिद का चिमटा याद आ जाता है । पिछले वर्ष आज ही के दिन हमें विदेश भ्रमण का पहला अवसर मिला । अपने उसी दोस्त की वज़ह से , जिसने हमें शिमला घुमाया था ।
डॉ विनोद वर्मा के साथ , घर के बाहर । दोनों कैसे बच्चों की तरह खुश हो रहे हैं । तीन सप्ताह तक हम सपरिवार वर्मा परिवार के साथ रहे । साथ घूमे फिरे , खाया पीया , मौज मस्ती की ।
हमें अपनी कवितायेँ सुनाने का भी मौका मिला ।
स्कारबोरो , टोरोंटो , बोब्केजियोन , एल्गोन्क्विन , एजेक्स और क्यूबेक जैसे शहरों में अपना कविता पाठ हुआ ।
यह अलग बात है कि ज्यादातर कवि सम्मेलनों में श्रोता अपने मित्रगण और उनके बच्चे ही होते थे । 
डॉ वर्मा के घर पर मित्रगण-बाएं से हमारे साथ
अनिल जी , संजय , डॉ वर्मा , पीछे खड़े प्रदीप और राज सिंह । एक कवि सम्मलेन में तो श्रोता सिर्फ दो ही थे । हमारे मेज़बान पति -पत्नी । जी हाँ ९ जुलाई को हमें श्री समीर लाल जी के दर्शनों का लाभ मिला ,
उनके निवास स्थान पर जो डॉ वर्मा के निवास के काफी करीब ही था ।
भले ही पहली बार मिले थे , लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि पहली बार मिले हैं । साधना भाभी जी ने जो स्वादिष्ट खाना खिलाया , उसका स्वाद आज भी याद है ।
समीर लाल जी के निवास पर , डॉ वर्मा और हम । लेकिन सबने अपना हाथ मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है ? हम शिमला से तो शिमला मिर्च लेकर आये थे । कनाडा से लाये -
Tim Hortons की कैपुचिनो फ्रेंच वनिला कॉफ़ी का एक डिब्बा जिसका स्वाद हमें वैसे ही भाया था जैसे मेरठ मेडिकल कॉलिज के बाहर ढल्लू के ढाबे की चाय पसंद आई थी ।
कहते हैं खाने के बगैर जिंदगी नहीं
। गुजर बसर करने के लिए खाते पीते तो सभी हैं । लेकिन जो मज़ा दोस्तों के साथ बैठकर खाने पीने , सुनने सुनाने , सुख दुःख बांटने और बतियाने गपियाने में है , वह और किसी बात में नहीं है ।
खुशकिस्मत हैं वो लोग , जिनके दोस्त होते हैं । वो और भी खुशनसीब होते हैं ,
डॉ विनोद वर्मा और समीर लाल जी जैसे दोस्त जिनके करीब होते हैं । लेकिन ध्यान रहे कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती । दूसरे हाथ को भी अपना फ़र्ज़ याद रखना पड़ता है ।