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Wednesday, June 22, 2022

चैल, शिमला के पास एक सुंदर, शांत हिल स्टेशन --

यदि आप भीड़ भाड़ से दूर एक शांत जगह पर गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ों में कुछ दिन बिताना चाहते हैं तो चैल (चायल) एक ऐसी ही सुंदर, शांत और प्रकृति के नज़दीक जगह है। दिल्ली से लगभग 350 किलोमीटर दूर, यहां जाने के लिए रास्ता भी बिलकुल सीधा और साफ़ है। कालका शिमला हाइवे पर कंडाघाट से दायीं ओर एक सड़क जाती है जो विभिन्न गांवों से होती हुई सीधे चैल जाती है।

चैल में दो या तीन रात रुकना काफ़ी है। यहां एक पहाड़ पर काली टिब्बा नाम की चोटी पर काली मंदिर है, जहां से 360 डिग्री व्यू नज़र आता है। इसके अलावा चैल शहर में चैल पैलेस ही देखने लायक जगह है, जहां प्रवेश के लिए 100 रुपये का टिकट है। महल में कुछ खास नहीं है, लेकिन उसके बाहर लॉन और आस पास का क्षेत्र बहुत हरा भरा और मनमोहक है। आप चाहें तो यहां एक रात रह भी सकते हैं। लेकिन एक रात का किराया महाराजा सुइट में 25000, महारानी सुइट में 11500 है। हालांकि सबसे सस्ता कमरा राजकुमार का 5200 का है। बाकी एक क्रिकेट ग्राउंड है जिसे दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना क्रिकेट मैदान कहते हैं। हालांकि इसमें देखने वाली कोई बात नही है।
आप चैल से शिमला घूमकर भी शाम तक वापस आ सकते हैं। रास्ते में एक चोटी पर स्टोन टेम्पल बना है, जहां तक पहुंचने में आपकी ड्राइविंग स्किल्स का पूरा इम्तिहान हो जाएगा। शिमला के रास्ते मे कुफरी भी आता है, जहां आपको भीड़ के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन कोई बात नहीं, वहां आप सरकारी कैफे में कॉफी पीकर आगे बढ़ सकते हैं।
चैल में रुकने के लिए ग्रैंड सनसेट होटल एक बढ़िया विकल्प है जो शुरू में ही मेन रोड़ पर है। यहां से वैली व्यू और सनसेट बहुत बढिया नज़र आता है। यह आस पास स्थित सभी होटल्स में सबसे बढ़िया है।
-- क्रमश:
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Thursday, July 9, 2015

चैल -- एक प्राकृतिक स्थल जहाँ शहर और जंगल दोनों का लुत्फ़ एक साथ आता है ---


गर्मियों में छुट्टियां बिताने और कुछ दिन की सैर के लिए दिल्ली के आस पास शिमला सबसे पुराना और ऐतिहासिक हिल स्टेशन है।  लेकिन शिमला में बढ़ती आबादी , भवन निर्माण और गाड़ियों की भरमार से शिमला एक कंक्रीट जंगल बन कर रह गया है।  यदि आपको कुछ दिन शहर की भीड़ भाड़ और शोर शराबे से दूर प्रकृति के बीच शांत जगह पर छुट्टियां बिताने का विचार मन में आये तो शिमला के पास चैल ( चायल ) एक ऐसी जगह है जहाँ जाकर आपको वास्तव में मन की शांति और सकूँ मिलेगा।



 दिल्ली से चैल जाने के लिए राष्ट्रिय राजमार्ग १ से होकर करनाल , अम्बाला और पंचकुला होते हुए , कालका बाई पास से होकर शिमला के लिए सीधी सड़क है। रास्ते में कुरुक्षेत्र में मिला ये हाइवे रेस्ट्रां जहाँ हाथ मुँह धोकर और खा पीकर आप तरो ताज़ा होकर निकल पड़ते हैं आगे के सफर के लिए।    




अब कालका बाई पास बनने से सफ़र बहुत आसान हो गया है।  बाई पास से गुजरते हुए बिलकुल विदेश में होने जैसा अहसास होता है।  सोलन होते हुए कंडाघाट पहुंचकर दायीं ओर मुड़कर एक पतली लेकिन खाली सड़क पर ड्राईव करते हुए एक नदी को पार कर आप पहुँच जाते हैं चैल से करीब ३ किलोमीटर पहले बने होटल्स में जहाँ आपको शांत जगह पर हरी भरी वादियों के बीच एक या दो दिन रहने में बहुत आनंद आएगा।



सड़क किनारे बने होटल ग्रैंड सनसेट से सामने वादी का खूबसूरत नज़ारा आपका मन मोह लेगा।




वादी के बायीं ओर का क्षेत्र बहुत घने जंगल से बना है।  इस जंगल से होकर एक सड़क सोलन तक जाती है।  लेकिन इस सुनसान सड़क पर दिन में भी सफ़र करना एक साहसिक कार्य लगता है क्योंकि करीब २५ किलोमीटर तक आपको न कोई इंसान मिलेगा न कोई वाहन।



यहाँ करीब १० -११ होटल्स बने हैं जो काफी आरामदायक , भीड़ भाड़ से दूर और शांत जगह है।  चैल में पहाड़ों की कई अलग अलग चोटियां हैं जहाँ तक आप ड्राईव कर के जा सकते हैं।  एक चोटी पर बना है महाराजा पटियाला का महल जिसमे प्रवेश के अब प्रति व्यक्ति १०० रूपये देने पड़ेंगे।  महल को एक होटल में परिवर्तित किया गया है जहाँ आपको २५०० से ३५०० रूपये में एक कमरा मिल जायेगा।




भूतल पर आप महल में बैठने और फोटो खींचने का आनंद ले सकते हैं।  यहीं पर एक रेस्ट्रां है जहाँ ३०० रूपये में आप बुफे लंच का लुत्फ़ उठा सकते हैं।



पैलेस के बाहर एक बड़ा मैदान है जहाँ आप धूप का सेवन करते हुए आस पास की हरियाली को निहार सकते हैं।  इस मैदान के चारों ओर पैदल पथ बना है जहाँ सैर करते हुए प्रकृति के बेहद निकट महसूस किया जा सकता है।



पैलेस के ड्राईव वे से ही एक रास्ता जाता है एक छोटी सी पहाड़ी पर , जिसे लवर्स हिल कहते हैं।  इसके चारों ओर घूमने के लिए रास्ता बना है जिसे लवर्स लेन नाम दिया गया है।  इस रास्ते पर टहलते हुए आप चैल के चारों ओर की घनी हरियाली का मनमोहक नज़ारा देख सकते हैं।





चैल एक पुराना क़स्बा सा है।  इसकी दूसरी पहाड़ी की चोटी पर बना है विश्व का सबसे ऊँचाई पर स्थित क्रिकेट ग्राउंड।  यह क्षेत्र पूर्णतया सेना के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन आम जनता भी बुकिंग कराकर खेलों के लिए इस्तेमाल कर  सकती है ।  यहाँ सभी तरह के खेलों के टूर्नामेन्ट आयोजित किये जा सकते हैं।



ग्राउंड में एक पुराना ऐतिहासिक सूखा वृक्ष।



चैल कस्बे से करीब ३ किलोमीटर की दूरी पर एक और पहाड़ की चोटी पर बना है ये महाकाली मंदिर जहाँ तक गाड़ी से जाया जा सकता है, लेकिन आखिरी १ किलोमीटर की ड्राईव ज़रा मुश्किल लगेगी क्योंकि सड़क काफी टूटी फूटी है।  लेकिन मंदिर के अहाते में पार्किंग की अच्छी सुविधा है।




यहाँ से चारों ओर का ३६० डिग्री नज़ारा गज़ब का खूबसूरत है।  ऐसा महसूस होने लगता है जैसे आप अंतरिक्ष से पृथ्वी का दृश्य देख रहे हों।  यहाँ ठहरने के लिए कमरे भी बने हैं , हालाँकि खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है ।




शाम को होटल की टेरेस से सूर्यास्त का नज़ारा बेहद खूबसूरत था।  रात में चमकते तारों को देखते हुए यह महसूस होने लगा कि बड़े शहर में रहकर हम तो जैसे चाँद सितारों को देखना ही भूल गए हैं।
शहर के प्रदुषण , शोर शराबे और भीड़ भाड़ से दूर चैल एक शांत जगह है जहाँ आप प्रकृति के साथ मिलकर जीवन का निर्मल आनंद ले सकते हैं।
( अगली पोस्ट में शिमला रिविजिटेड .....)


Tuesday, June 22, 2010

वो बड़े खुशनसीब होते हैं , जिनके आप जैसे दोस्त होते हैं ---

सन १९७७ का जून महीना दिल्ली के सात भावी डॉक्टर शिमला घूमने गए । अपना तो यह पहला अवसर था जब हमने दिल्ली से बाहर कदम रखा था । यहीं पैदा हुए , पले बढे , पढ़े । कोई रिश्तेदार भी दिल्ली से बाहर नहीं । आखिर दोस्तों के साथ चल ही दिए ।

शिमला घूम घाम कर जब वापस लौटने का दिन आया तो सबने सोचा कि घरवालों के लिए शिमला की कोई अच्छी सी निशानी लेकर चलना चाहिए । कोई ऐसी वस्तु जो शिमला की विशेषता हो , जिसे देख सब वाह वाह कर उठें ।
सबने खूब दिमाग लगाया, खूब दिमाग लगाया और अंत में यही फैसला हुआ ।

सबने एक एक किलो शिमला मिर्च तुलवाई और ठूंस ठूंस कर बैग में भर ली

बड़ी शान से घर पहुंचे । बेटा पहली बार बाहर जाकर वापस आया था । हमने भी छूटते ही घोषणा कर दी कि एक बहुत खूबसूरत तोहफा लाये हैं शिमला से । लेकिन इसके बाद एक के बाद एक , हमें तीन शॉक लगे

पहला झटका तब लगा जब हमने बताया कि हम शिमला मिर्च लाए हैं और मां ने बताया कि ये तो दिल्ली में भी मिलती है ।
खैर इस झटके से उभरकर हमने कहा कि मिलती होगी लेकिन हम जितनी सस्ती लाए हैं उतनी सस्ती यहाँ नहीं मिल सकती ।
अब दूसरा झटका लगा । पता चला कि दिल्ली में तो इससे भी सस्ती मिलती है ।

लेकिन हमने भी बड़े साहस से काम लेते हुए कहा कि इतनी ताज़ा और बढ़िया किस्म यहाँ मिल ही नहीं सकती ।
लेकिन तीसरे झटके से तो हम आज तक भी नहीं उभर पाए हैं । क्योंकि जब बैग खोला , तो जून की गर्मी में २४ घंटे से बैग में ठूंसी हुई शिमला मिर्च का मलीदा बना हुआ था । आखिर, सारी की सारी फेंकनी पड़ी ।

अब इस कारनामे पर सब इतने हतोत्साहित थे कि आज तक किसी ने किसी से नहीं पूछा कि उसके घर पर क्या तमाशा हुआ ।
आज उनमे से कोई अमेरिका , कोई कनाडा , कोई ब्रिटेन में और बाकि यहीं , उच्च श्रेणी के डॉक्टर हैं

शिमला के माल रोड पर चार मित्रइनमे हम कौन से हैं ?

आज जब कभी सोचता हूँ तो लगता है , हमसे समझदार तो अपना साहबजादा ही रहा । बेटा पांच वर्ष की उम्र में स्कूल की ओर से मसूरी घूमने गया तो वहां से अपनी मां के लिए १५ रूपये खर्च कर एक हैण्ड पर्स लेकर आया । श्रीमती जी ने आज १५ साल बाद भी संभाल कर रखा है , बेटे की पहली गिफ्ट कोजब भी सोचता हूँ , हामिद का चिमटा याद जाता है


पिछले वर्ष आज ही के दिन हमें विदेश भ्रमण का पहला अवसर मिला । अपने उसी दोस्त की वज़ह से , जिसने हमें शिमला घुमाया था ।

डॉ विनोद वर्मा के साथ , घर के बाहरदोनों कैसे बच्चों की तरह खुश हो रहे हैं

तीन सप्ताह तक हम सपरिवार वर्मा परिवार के साथ रहे । साथ घूमे फिरे , खाया पीया , मौज मस्ती की ।
हमें अपनी कवितायेँ सुनाने का भी मौका मिला ।

स्कारबोरो , टोरोंटो , बोब्केजियोन , एल्गोन्क्विन , एजेक्स और क्यूबेक जैसे शहरों में अपना कविता पाठ हुआ ।

यह अलग बात है कि ज्यादातर कवि सम्मेलनों में श्रोता अपने मित्रगण और उनके बच्चे ही होते थे

डॉ वर्मा के घर पर मित्रगण-बाएं से हमारे साथ अनिल जी , संजय , डॉ वर्मा , पीछे खड़े प्रदीप और राज सिंह

एक कवि सम्मलेन में तो श्रोता सिर्फ दो ही थेहमारे मेज़बान पति -पत्नी

जी हाँ जुलाई को हमें श्री समीर लाल जी के दर्शनों का लाभ मिला , उनके निवास स्थान पर जो डॉ वर्मा के निवास के काफी करीब ही था

भले ही पहली बार मिले थे , लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि पहली बार मिले हैं । साधना भाभी जी ने जो स्वादिष्ट खाना खिलाया , उसका स्वाद आज भी याद है ।

समीर लाल जी के निवास पर , डॉ वर्मा और हमलेकिन सबने अपना हाथ मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है ?

हम शिमला से तो शिमला मिर्च लेकर आये थे । कनाडा से लाये - Tim Hortons की कैपुचिनो फ्रेंच वनिला कॉफ़ी का एक डिब्बा जिसका स्वाद हमें वैसे ही भाया था जैसे मेरठ मेडिकल कॉलिज के बाहर ढल्लू के ढाबे की चाय पसंद आई थी ।


कहते हैं खाने के बगैर जिंदगी नहीं । गुजर बसर करने के लिए खाते पीते तो सभी हैं । लेकिन जो मज़ा दोस्तों के साथ बैठकर खाने पीने , सुनने सुनाने , सुख दुःख बांटने और बतियाने गपियाने में है , वह और किसी बात में नहीं है ।

खुशकिस्मत हैं वो लोग , जिनके दोस्त होते हैं
वो और भी खुशनसीब होते हैं , डॉ विनोद वर्मा और समीर लाल जी जैसे दोस्त जिनके करीब होते हैं

लेकिन ध्यान रहे कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजतीदूसरे हाथ को भी अपना फ़र्ज़ याद रखना पड़ता है