HAMARIVANI

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Monday, September 14, 2020

कभी हो जाये जब यूँ ही --

 कभी हो जाये जब यूँ ही बोझिल मन, तब देखिये इन तस्वीरों को, एक सुखद अहसास होगा।   

































Friday, August 28, 2020

कोरोना काल में मंद मंद चलती जिंदगी ...


आँखों देखी :

लगभग ५-६ महीने बाद एयरपोर्ट जाना हुआ। जिस रास्तों से आना जाना हुआ , उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था , मानो वर्षों बाद वहां से गुजरे हों। सब कुछ जैसे नया नया सा लग रहा था। दूसरी ओर ऐसा भी लग रहा था जैसे कुछ नहीं बदला, सब वैसा का वैसा ही है। ऐसा अहसास हो रहा था कि ये दुनिया यूँ ही चलती रहती है, भले ही आप हों या ना हों।

यमुना पार कर बारापुला पर पहुंचे तो ऐसा लगा कि पुल पर नई लाइट्स लगाई गईं हैं।  फिर सोचा तो पाया कि लाइट्स तो पहले भी थीं। और ध्यान से देखा तो यह निश्चित भी हो गया क्योंकि पोल पुराने ही दिख रहे थे। लेकिन यह नए पुराने का अहसास हैरान सा कर रहा था। एयरपोर्ट के पास पहुंचे तो ऐरोसिटी को लगभग उजाड़ सा वीरान सा पाया। कभी होटल्स का ये जमघट बड़ा वाइब्रेंट लगता था। लेकिन अब शायद वहां यात्री नहीं , कोविड के रोगी रहते हैं, क्वरेन्टीन पूरा करने के लिए।  ऐरोसिटी के आगे एयरपोर्ट तक का रास्ता पहले से कहीं ज्यादा हरा भरा और सुन्दर नज़र आया। हालाँकि एयरपोर्ट पर अब उतनी भीड़ नज़र नहीं आई जितनी अक्सर हुआ करती थी।

वापसी पर चाणक्य पुरी स्थित कमला नेहरू पार्क जो अक्सर युवाओं और प्रेमी युगलों से भरा रहता था, बिलकुल खाली पड़ा था। बाहर से खूबसूरत तो उतना ही दिखा लेकिन सोचने पर मज़बूर हो गए कि क्या पार्क में अब लोगों की जगह वायरस विचरण करता है। नेहरू पार्क के एक छोर पर दिल्ली का सबसे पुराना और जाना पहचाना अशोक होटल बाहर से बड़ा उदासीन सा लग रहा था। पार्किंग में इक्की दुक्की गाड़ियां ही खड़ी थीं। लेकिन इसके तुरंत बाद रेसकोर्स रोड़ पर हरियाली मानो कई गुना बढ़ गई थी। प्रधान मंत्री निवास से लेकर अगली रैड लाइट तक इतनी घनी हरियाली देखकर अचंभित सा होना पड़ा।

यदि दिल्ली का इतिहास देखें तो नई दिल्ली जो स्वतंत्र भारत की राजधानी बनी, का निर्माण १९१९ में आरम्भ हुआ और १९३१ में पूर्ण हुआ। नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, और आस पास के सरकारी भवन, संसद भवन, इंडिया गेट, और सम्पूर्ण अति विशिष्ठ आवासीय क्षेत्र जिसमे चाणक्य पुरी स्थित एम्बेसीज भी शामिल हैं, एक अति आधुनिक, हरा भरा और स्वच्छ आवासीय एवं कार्यकारी क्षेत्र बना। इस क्षेत्र में देश के सभी सांसद , ज़ज़ , आई ऐ एस अफ़सर और अन्य अति विशिष्ठ व्यक्ति रहते हैं। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि यह क्षेत्र बहुत ही सुन्दर, स्वच्छ और हरियाली युक्त है।

आज सम्पूर्ण वी आई पी क्षेत्र बहुत ही हरा भरा नज़र आ रहा था। सावन भादों की बरसात में धुले लगभग १०० साल पुराने पेड़, जगह जगह बनाये गए गोलाकार पार्क, वी आई पी बंगलों के बाहर लगे पेड़ पौधे इंसानों की गतिविधियां कम होने के कारण जैसे अपने पूरे यौवन पर थे। सुन्दर तो पहले भी रहा लेकिन यह क्षेत्र इतना खूबसूरत जैसे पहले कभी नहीं लगा। आखिर कर इंडिया गेट पहुंचे तो इंडिया गेट के चारों ओर पुलिस के बैरिकेड देखकर अवश्य मायूसी सी हुई क्योंकि उसे पार कर इंडिया गेट के पास जाना और नव निर्मित शहीद स्मारक देख पाना अब असंभव हो गया है। इंडिया गेट के लॉन्स में भी घास की कटाई न होने के कारण यह कोरोना के कष्टदायक काल की जैसे कहानी सुना रहा था। 

इंडिया गेट के सर्कल से आई टी ओ जाने वाले तिलक मार्ग पर स्थित उच्चतम न्यायालय के सामने सड़क ना जाने किस विधि से बनाई गई है कि इस एक किलोमीटर लम्बे रास्ते पर टायरों से ऐसी आवाज़ आती है जैसे कार नहीं बल्कि टैंक चल रहा हो। आई टी ओ का चौराहा शायद सबसे बड़ा चौराहा है। इसीलिए यहाँ पैदल लोगों के लिए एक स्काईवॉक बनाई गई है।  हालाँकि इस डेढ़ किलोमीटर लम्बी जिग जैग वाक पर जाता हुआ नज़र कोई नहीं आता।  लेकिन बड़ा मन है कि कभी बस यूँ ही इस पर चढ़कर पैदल यात्रा की जाये और आस पास का नज़ारा देखा जाये। आई टी ओ चौराहे पर एक बच्चा पन्नी में लपेट कर गुलाब के फूल बेच रहा था।  मैले कुचैले बालक से जाने कौन गुलाब खरीदता होगा।  सामने ही फुटपाथ पर बैठी उसकी मां एक और नन्हे मुन्ने को गोद में खिला रही थी। पास ही उसका पिता खड़ा था, पतला दुबला  लेकिन डिजाइनर बालों वाला, अपने मोबाइल पर कुछ कुछ करता हुआ। बस भिखारी के हाथ में ही मोबाइल देखना बाकि रह गया था, वह तमन्ना भी अब पूरी हो गई।     
कोरोना पेंडेमिक के कारण लगभग ठप्प हुई जिंदगी में जैसे सभी विकास कार्य भी ठप्प हो गए। बस जैसे तैसे जिंदगियां चली जा रही हैं। ज़ाहिर है, यदि जिन्दा रहे तो कार्य भी फिर आरम्भ होंगे और विकास कार्य भी। अभी कब तक ऐसा चलेगा, कोई नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि कोरोना वायरस ने लोगों को घुटनों पर ला दिया है। प्रकृति के सामने मनुष्य बहुत छोटा होता है लेकिन यह लोगों को समझ में अब आने लगा है। या शायद अब भी नहीं।       
       


             

Friday, August 7, 2020

कोरोना से ऐसे किया बचाव --


कोरोना का डर - थर्ड ईयर सिंड्रोम :

जब हम मेडिकल कॉलेज के थर्ड ईयर में थे , तब पहली बार वार्ड जाकर रोगियों से संपर्क हुआ।  तृतीय वर्ष में ही क्लिनिकल विषय पहली बार पढ़ाये जाते हैं। जब पहली बार रोगों के बारे में जाना , तब जब भी किसी रोग के बारे में पढ़ते या ऐसे रोगी को देखते , तब ऐसा महसूस होने लगता था जैसे हम खुद भी उस रोग से ग्रस्त हैं।  यानि जैसे जैसे रोगों के बारे में पढ़ते गए, वैसे वैसे खुद में उन रोगों को देखने लगे। हर रोग के होने का भय सताने लगा। इसी को कहते हैं थर्ड इयार सिंड्रोम जो लगभग हर छात्र को उस समय होने लगता है।   
 अब कोरोना काल में भी कुछ ऐसा ही हाल रहा।  क्योंकि हम डॉक्टर हैं, इसलिए रोग के बारे में जानकारी होने और इसके परिणाम अच्छी तरह से जानने के कारण डर भी ज्यादा था।  लेकिन कहते हैं न कि डर के आगे ही जीत है।  फिर हम तो दूसरों को सिखाते रहे , इसलिए बचाव के तरीके स्वयं भी इस्तेमाल करने आवश्यक थे। आइये देखते हैं, कोरोना से बचने के लिए क्या क्या हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। 

ऑफिस में :
ऑफिस में जाते ही हम पहला काम करते हैं, सारे फर्नीचर को सेनेटाइज करने का। टेबल चेयर , कंप्यूटर टेबल, माउस , स्विच , कीबोर्ड आदि हर वो चीज जिसे छुआ जा सकता है, हम स्वयं अल्कोहल हैंड रब से साफ करते हैं।  इसे देखकर पुराने ज़माने की एक घटना याद आ जाती है। एक बार हमारे गांव से एक आदमी फ़ौज में भर्ती होने के लिए रिक्रूटमेंट ऑफिस चला गया।  वहां ऑफिसर ने पूछा - रसोइये का काम करोगे ? आदमी ज़रा बहरा था , बोला क्या ? ऑफिसर ने जोर से कहा - रोटियां बनाने का काम करोगे।  आदमी बोला -- रोटियां बनाने वाली घर में तीन हैं। (उसकी दो बीवियां थीं और एक बहन) और भाग आया। अब भले ही हमारे भी ऑफिस को मेंटेन करने के लिए दो तीन अटेंडेंट्स हैं , लेकिन हम तो अपना काम स्वयं करना पसंद करते हैं। 
 
कोरोना का प्रभाव यह रहा कि अब हम न कहीं जाते हैं , न कोई हमसे मिलने आता है।  बस बैठे बैठे अपना काम करते रहते हैं।  अधिकतर काम ऑनलाइन ही हो रहा है।  खाना अकेले ही खाते हैं। खाना भी बस जीने लायक ही खाते हैं। कोई दिखाई भी देता है तो मुंह बांधे हुए. न कोई हंसी , न मुस्कराहट।  बस चिंतित से चेहरे ही नज़र आते हैं। थक गए हैं लोग कोरोना काल में ड्यूटी करते करते।   

घर में :




घर आने पर सबसे पहला काम होता है , जेब में रखी सारी चीजों को सेनेटाइज करना। मोबाइल, गाड़ी की चाबी, पैन , घडी , बैल्ट , यहाँ तक कि बैग को भी सेनेटाइज करके रखते हैं। फिर मास्क को उतारकर डिस्पोज ऑफ़ करते हैं, फिर स्नान कर कपडे बदलते हैं और पहने हुए कपड़ों को धोने के लिए डाल देते हैं।  उसके बाद भाप लेते हैं।  तब जाकर लगता है कि अब घर में रहने लायक हो गए।   

खाना :

पिछले कई महीनों से खाना तो कम कर ही दिया है, खाने में नए नए आइटम भी शामिल हो गए हैं।  अब गर्मियों में भी अदरक वाली चाय पीते हैं, हल्दी वाला दूध और फलाहार नियमित होता है।

दवाएं:

विटामिन सी , विटामिन डी और विटामिन बी का सेवन बढ़ गया है। होमियोपैथी की एक दवा आयुष विभाग ने दी है। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन भी कुछ लोग लेते हैं। 

मज़बूरियां:

सबसे ज्यादा मज़बूरी तो यह रही कि चाह कर भी किसी दोस्त या रिश्तेदार से मिल नहीं पाए। इस बीच जान पहचान और रिश्तेदारों में कहीं किसी की मृत्यु हुई , कोई बीमार पड़ा, लेकिन हम किसी से भी मिलने नहीं जा पाए। ख़ुशी हो या ग़म, सबने अकेले ही सहन किया।

अब धीरे धीरे जिंदगी पटरी पर आ रही है, लेकिन देश में कोरोना संक्रमण के केस अभी भी बढ़ ही रहे हैं।  इसलिए शहर से बाहर जाने की सोच भी नहीं सकते।  इसीलिए लगभग पहली बार ऐसा हुआ कि हम गर्मियों में किसी हिल स्टेशन पर नहीं जा पाए। घर से बाहर निकलने की आदत भी जैसे छूट सी गई है। अब तो घर में रहकर ही आनंद आने लगा है। लेकिन ऐसा कुछ समय तक तो सही है , परन्तु लम्बे समय तक रहा तो निश्चित ही दुनिया के लिए बहुत कष्टदायक होगा। आशा करते हैं कि इस कोरोना काल से जल्दी निजात पाएं और जीवन फिर से पहले की तरह खुशहाल लगने लगे।   

अंत में यही कहेंगे कि ये तीन काम ही आपको कोरोना संक्रमण से बचा सकते हैं :
घर से बाहर मास्क पहनकर रहना। 
सभी से दो गज की दूरी बनाये रखना। 
बार बार हाथ धोना या सेनेटाइज करना। 

ज़ाहिर है, यह मज़बूरी है , लेकिन ज़रूरी है।


Wednesday, August 5, 2020

कोरोना के इफेक्ट्स और बचने के उपाय --


कोरोना काल अनुभव भाग २ :

हमने देखा है कि इंसान डर से ही डरता है। डर चोर डाकुओं का हो, या चोट लगने का , सज़ा का हो, बीमारी का हो या मृत्यु का।  कोरोना एपिमेडिक ही ऐसा संक्रमण है जिसमे डर जितना मृत्यु का है, उतना ही बीमारी का भी रहा। इसका कारण यह था कि यह एक नया रोग होने के कारण लोगों में और चिकित्सकों में भी इसकी जानकारी लगभग न के बराबर थी। इस कारण इसके उपचार में न केवल उचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी, बल्कि हर दिन सरकार के निर्देश भी बदल जाते थे। आम जनता के मन में भय था कि यदि संक्रमण हो गया तो डॉक्टर्स न जाने कहां भर्ती करके रखेंगे।  इसलिए लोग संक्रमण को छुपाने लगे थे। घर से बाहर अनजान जगह रहने और बाल बच्चों को छोड़ने का डर सबको सताता था। यदि आई सी यू में भर्ती करना पड़ा तो घरवाले शक्ल देखने को भी तरस जाते थे। मृत्यु होने पर तो सरकारी कर्मचारी ही दाह संस्कार कर देते थे और घरवाले अंतिम दर्शन को भी तरस जाते थे।  इस कारण लोगों में दहशत रहती थी।   

लगभग ढाई महीने के लॉक डाउन काल में घर से बाहर बस इतना निकलना होता था कि रोज सुबह कोई एक सदस्य गेट तक जाकर दूध ले आता था।  बाकि सामान भी गेट पर ही सप्लाई होता था।  बाहर जाने की चप्पलें अलग होती जिन्हे बाहर वाले कमरे में ही निकाल दिया जाता। मास्क पहनकर किसी भी वस्तु से  लिफ्ट का बटन दबाकर जाते और वापस आते ही हाथ धोना एक आदत सी बन गई। दूध की थैलियों को सोप सोल्युशन से धोया जाता और कपडे की थैली को भी धोना पड़ता।

लेकिन डॉक्टर्स और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए लॉक डाउन तो जैसे था ही नहीं। कम ही सही लेकिन अस्पताल जाना पड़ता तो श्रीमती जी तो ऐसे तैयार होती जैसे चाँद पर जा रही हों। सावधानी बरतने के मामले में उनका कोई सानी नहीं था। सबसे बड़ी बात ये थी कि वे हमें प्रोटेक्ट करती रही। इसलिए अस्पताल से वापस आते समय दुकान से सारा सामान खुद ही खरीद लाती और हमें बुजुर्ग समझकर घर से बाहर निकलने ही नहीं देती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारा रोल रिवर्सल हो गया।  यानि अब श्रीमती जी घर के बाहर के काम करती और हम घर संभालते। कहने को हम वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे लेकिन असल में वर्क एट होम करना पड़ रहा था।  इसका एक परिणाम यह भी निकला कि अब हम भी गृह कार्य में दक्ष हो गए।       



क्योंकि कामवाली बाई भी वर्क फ्रॉम होम कर रही थी, इसलिए झाड़ू पोंछा, बर्तन मांजना यहाँ तक कि खाना बनाने का काम भी हम ही करने लगे। 

लॉक डाउन में सबसे ज्यादा परेशानी ये थी कि दिन भर खाने और टी वी देखने के अलावा कोई काम नहीं था। पार्क की सैर या जिम जाने का तो सवाल ही नहीं था। इसलिए बहुत से लोग इन दिनों में मोटापे के शिकार हो गए। शारीरिक श्रम या व्यायाम न होने से ब्लड शुगर और बी पी बढ़ना स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। लेकिन हमने न केवल वज़न को बढ़ने नहीं दिया, बल्कि वज़न कई किलो घटा लिया। सारे कपडे ढीले हो गए, पैंट कमर में टिकनी बंद हो गई , इस तरह खिसकने लगी जैसे लो वेस्ट की जींस। लेकिन यह अपने आप नहीं हुआ।  इसके लिए हमने बड़ी मेहनत की। रोजाना एक घंटा एक्सरसाइज करना एक रूटीन सा बन गया। जिसमे:   



                                                                           योगा

                                                         
                                                                 स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज





और डांस की भूमिका मुख्य रही।  एक घंटा पसीना बहाकर तन और मन दोनों चुस्ती और स्फूर्ति से भर जाते थे।  सभी मित्रों और रिश्तेदारों से दूर लॉक डाउन में घर में बंद रहकर, मानसिक तनाव और बेचैनी होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे में बहुत से लोगों को मानसिक विकार पैदा हो जाते हैं।  चिड़चिड़ापन, नींद न आना , बात बात पर झगड़ना आदि हरकतें इस दौरान बहुत देखने में आईं। इससे बचने के लिए आवश्यक होता है कि आप अपने आप को व्यस्त रखें, कुछ ऐसे काम करें जो समय के आभाव में पहले नहीं कर पा रहे थे, नए शौक बनायें या पुराने शौक पूरे करें। हमने भी सोशल डिस्टेंसिंग रखते हुए सोशल साइट्स पर खूब सोशियलाइज किया।  कवितायेँ लिखी , ऑनलाइन काव्य पाठ किये , गाने गाये , डांस सीखे और किये और कई तरह के वीडियोज बनाकर सोशल साइट्स पर डाले।       



और जो लोगो में स्मार्ट फोन आने के बाद पिछले कई सालों में लोगों में नया शौक जगा है सेल्फी लेने का , हमने भी जमकर सेल्फी ली। 

अगले भाग में कोरोना से बचने के तौर तरीके।  क्रमशः ... 

Saturday, August 1, 2020

कोरोना काल की ज़िंदगी - एक अनुभव:


कोरोना एपिडेमिक के कारण . ठहरी हुई ज़िंदगी को १२५ दिन पूरे हो चुके हैं। इन १२५ दिनों में जिंदगी की गाड़ी ऐसे हिचकौले खाते हुए चली है जैसे गाड़ी का एक पहिया टूटने पर गाड़ी चलती है।  कभी आशा, कभी निराशा, कभी डर, कभी राहत के अहसासों के बीच झूलते हुआ अब जाकर बेचैनी कुछ कम हुई है जब दिल्ली में कोरोना संक्रमण के केस कम होने लगे हैं, हालाँकि देश में कुल केस दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं जो काफी चिंताज़नक बात लगती है।

मार्च के महीने में जब लॉक डाउन घोषित हुआ, तब सब घरों में जैसे कैद से हो गए।  लेकिन हमारा तो क्वारेंटीन  पहले ही आरम्भ हो चुका था क्योंकि बेटा लन्दन से घर वापस आया था और सरकार के आदेश अनुसार उसके साथ सभी घरवालों को १४ दिन क्वारेंटीन में रहना था। आरम्भ में इस रोग के बारे में किसी को कोई ज्ञान नहीं था।  इसलिए सरकार की ओर से भी रोजाना सुबह शाम निर्देश ज़ारी किये जा रहे थे। जनता में भी सही जानकारी के अभाव में अफवाहों का बाजार गर्म था।  ऐसे में १४ दिन का क्वारेंटीन कब २८ दिनों में बदल गया , पता ही नहीं चला, क्योंकि जितने मुंह, उतनी बातें होती थीं। इसी कारण सोसायटी के लोगों में डर और अविश्वास के रहते, तरह तरह की बातें सुनी जाने लगीं। लोग डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी के नाम से ही डरने लगे थे।  कुछ तो अनाप शनाप बातें भी करने लगे थे।  कहीं कहीं तो स्वास्थ्यकर्मियों को घर में ना घुसने देने के समाचार भी आने लगे थे।  अंतत: जब सरकार ने निर्देश निकाला कि स्वास्थ्यकर्मियों के साथ बदसलूकी करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी और जेल भी हो सकती है, तब कहीं जाकर लोगों का व्यवहार ठीक हुआ।  कुछ हद तक हमें भी इस दौर से गुजरना पड़ा।  लेकिन अनुभवी और वरिष्ठ होने के कारण हमने जल्दी ही स्थिति को संभाल लिया और सोसायटी के अध्यक्ष को पत्र लिख कर वास्तविक स्थिति से अवगत कराया और सोसायटी के निवासियों को कोरोना से बचाव से सम्बंधित जानकारी वितरित कराई।   

लॉक डाउन और क्वारेंटीन का आरंभिक एक महीना बड़ी कशमकश में बीता। उस समय इंग्लैण्ड में कोरोना तेजी से बढ़ रहा था, इसलिए वहां से आने वाले यात्रियों में संक्रमण की सम्भावना बहुत ज्यादा दिखाई देती थी। दूसरी ओर अस्पतालों में भी सम्पूर्ण और उचित चिकित्सीय व्यवस्था का अभाव था। ऐसे में यही डर सताता था कि यदि संक्रमण हुआ तो घर बार को छोड़कर सभी को अस्पताल या कोविड सेंटर में भर्ती होना पड़ेगा। यह भी विदित था कि इस रोग में सबसे ज्यादा हानि वरिष्ठ नागरिकों को ही होती है।  हालाँकि भारत में कोरोना की मृत्यु दर ३% के आस पास रही है, लेकिन ६० वर्ष की आयु से ऊपर वालों में यह दर ६ % से भी ज्यादा है। भले ही वरिष्ठ लोगों में भी केवल ६% की ही मृत्यु होती है , लेकिन मृत लोगों में आधे से ज्यादा ६०+ वाले लोग ही हैं।  यही सबसे ज्यादा चिंताजनक बात रही। बहुत से केस ऐसे सुनने में आ रहे थे कि किस तरह किसी को बुखार हुआ और एक दो दिन बात मृत्यु हो गई। वैसे तो मृत्यु एक वास्तविकता ही है , इसलिए मृत्यु से कैसा घबराना।  लेकिन इस तरह बिना बात बैठे बिठाये चले जाना किसी को भी गंवारा नहीं हो सकता।     

कहते हैं, इग्नोरेंस इज ब्लिस। यानि यदि आप अनभिज्ञ हैं तो आप सुखी हैं।  हमारे साथ यही प्रॉब्लम थी कि दोनों डॉक्टर होने के कारण  हम थर्ड ईयर सिंड्रोम से ग्रस्त थे। हर तरफ़ अदृश्य कोरोना ही कोरोना दिखाई देता था। लेकिन लॉक डाउन में यह तो समझ में आता था कि जब तक घर में ही हैं,तब तक सुरक्षित हैं ।  एक और अच्छी बात यह रही कि क्वारेंटीन के दौरान सोसायटी ने प्रबंध कर दिया था कि रोजमर्रा की ज़रुरत की चीजें गार्ड द्वारा सीधे घर पहुंचा दी जाती थीं।  इस मामले में पड़ोस में अकेली अकेली रहने वाली दो वृद्ध महिलाओं ने भी यथासंभव सहायता प्रदान की। ज़ाहिर है, बाद में अब हम उनका ध्यान रख रहे हैं।

महीनों लगातार घर में बंद रहकर अहसास हुआ कि कैद क्या होती है, हालाँकि जेल और घर में बहुत फर्क है।  लेकिन जब आपकी स्वतंत्रता पर अंकुश लग जाये और आप समाज से, सगे सम्बन्धियों से और सम्पूर्ण विश्व से अलग होकर मात्र आभासी संपर्क में ही रह पाएं तो भले ही जीवन भौतिक रूप से ज्यादा कष्टदायक नहीं लगता, लेकिन देर सबेर आपको मानसिक रूप से बेचैनी सी होने लगती है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अकेले जीवन जीने वाले समय से आगे बढ़ चुका है।  यही कारण है कि दीर्घकालीन लॉक डाउन में बहुत से लोगों को मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं।
डर और डर का निवारण -- क्रमश:अगली पोस्ट में .... 


Thursday, July 30, 2020

एक दिन किनारा मिल ही जायेगा --



जिंदगी के सागर में,
उम्र की पनडुब्बी पर खड़े ,
हम देख रहे हैं, दूर क्षितिज में ,
भीषण तूफ़ान के काले बादलों तले ,
समुद्र में उठती ऊँची लहरों में ,
गोता लगाते, डूबते उभरते एक जहाज को।

खारे पानी की हर उफनती लहर के साथ,
जहाज में सवार कुछ नाविक,
समा जाते और खो जाते समुद्र की गहराइयों में।
जिन्होंने बात ना मानी, ना पहनी
लाइफ जैकेट, कैप्टेन के आदेश पर।

पनडुब्बी चल दी जहाज की ओर ,
उसे इस घोर संकट से उबारने के लिए।
किन्तु हम जानते हैं कि ,
जहाज का बहादुर कप्तान ,
निकाल ही लेगा अपनी सूझ बूझ से,
जहाज को इस तूफान के बीच ,
किनारे की और।

आशा ही नहीं,
विश्वास है हमें कि ,
कुशल नेतृत्त्व के आधीन ,
देश का जहाज पा ही लेगा ,
साहिल को एक दिन ,
हराकर इस ''कोरोना'' तूफ़ान को।
 
  

Thursday, July 23, 2020

कोरोना से कैसे बदला इंसान --


1.
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान।
सब देशों में भेज कोरोना , विलेन बना वुहान। 
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान।

आया समय बड़ा बेढंगा , मुंह छुपाकर रहता हर बंदा ,
बंद हुए स्कूल और कॉलेज , बंद हुआ सब काम और धंधा।
कोरोना के कारण बंद हैं शोरूम मॉल और दुकान ,
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान।

ये सुन्दर से दिखने वाले , निकले कितने फरेबी बन्दे, 
तन के गोरे मन के काले, देख लिए सब इनके धंधे ।  
इन ही की काली करतूतों से , बना ये विश्व मसान । 
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान।  

जो लोग घरों में ही रहते, कोरोना के केस क्यों बढ़ते ,
काहे पड़ोसी आपस में डरते, पुलिस के डंडे ना पड़ते।
क्यों बंद होती पार्टियां क्यों होती शादियां बिन मेहमान ,
कितना बदल गया इंसान , कितना बदल गया इंसान। 

2.

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,
कितना सम्भल गया इंसान, कितना सम्भल गया इंसान।
दूर ही रह्ते, हाथ भी धोते, घर आते ही करते स्नान, 
कितना सम्भल गया इंसान, कितना सम्भल गया इंसान।


आया समय बड़ा रंगीला , हुई धरा हरी आसमाँ नीला ,
साफ़ हवा और प्रदुषण कम, हुआ सडको पे ट्रैफिक ढीला।
बंद हुए सब ठेके बार , और बंद हैं बीड़ी सिगरेट पान ,
कितना सम्भल गया इंसान , कितना सम्भल गया इंसान।


खुद ही जलेबी घर मे बनाई , नहीं चाहिए अब हलवाई ,
ना कहीं अब आना जाना , अब ना आती घर में बाई।
खुद ही लगाएं झाड़ू पोंछा , और खुद ही बनाएं पकवान ,
कितना सम्भल गया इंसान , कितना सम्भल गया इंसान।


गर्मी में भी सब काढ़ा पीते , अदरक वाली चाय बनाते
अब ना किसी से हाथ मिलाते , देख दूर से ही मुस्काते  ,
हाथ जोड़ सब करें नमस्ते, संस्कृति बनी अपनी पहचान ,
कितना सम्भल गया इंसान , कितना सम्भल गया इंसान।




Tuesday, July 21, 2020

मूंछों पर कोरोना की मार --



एक मित्र हमारे ,
बन्दे सबसे न्यारे।

मूंछें रखते भारी   ,
सदा सजी संवारी ।

कोई छेड़ दे मूंछों की बात ,
फरमाते लगा कर मूछों पर तांव।

भई मूंछें होती है मर्द की आन ,
और मूंछ्धारी , देश की शान ।

जिसकी जितनी मूंछें भारी ,
समझो उतना बड़ा ब्रह्मचारी ।



फिर एक सुहाने सन्डे ,
जोश में आकर , मूंछ मुंडवाकर ,
बन गए मुंछ मुंडे।


मैंने कहा मित्र , अब क्या है टेंशन ,
माना कि साइज़ जीरो का है फैशन।

और फैशन भी है नेनो टेक्नोलोजी का शिकार ,
तो क्या ब्रह्मचर्य को छोड़ इस उम्र में ,
अब बसाने निकले हो घर संसार ।


वो बोला दोस्त , ये फैशन नहीं ,
रिसेशन की मार है ।
जिससे पीड़ित सारा संसार है ।

और मैंने भी मूंछें नहीं कटवाई हैं ,
ये तो खाली कॉस्ट कटिंग करवाई है ।

अरे ये तो घर की है खेती ,
फिर निकल आएगी ।

पर सोचो जिसकी नौकरी छूटी ,
क्या फिर मिल पाएगी ?

वो देखो जो सामने बेंच पर बैठा है ,
अभी अभी पिंक स्लिप लेकर लौटा है ।

और ये जो फुटपाथ पर लेटा है ,
शायद किसी मज़दूर का बेटा है ।

दो दिन हुए शहर से गांव आया है ,
तब से एक टूक भी नहीं खाया है ।

कृषि प्रधान देश में ये जो नौबत आई है,
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।

अरे अन्न के भरे पड़े हैं भंडार ,
फिर क्यों मची खाने की दुहाई है !


ग़र देश की जनता में हो अनुशासन ,
लॉक डाउन के नियमों का करें पालन।

हाथ धोते रहें बार  बार ,
बाहर जाएँ तो मास्क पहने हर बार। 

लक्ष्मण रेखा का ना अतिक्रमण हो ,
फिर कभी ना कोरोना का संक्रमण हो।

देश जब कोरोना मुक्त हो जायेगा ,
खुशहली का वो दौर फिर आएगा।

जनता जब भय मुक्त हो जाएगी,
तो भैया ये मूंछें भी तब लम्बी हो जाएँगी ।


माना कि मूंछें मर्द की आन हैं ,
मूंछ्धारी देश की शान हैं ।

मगर इस मंदी की मार से ,
कोरोना से मचे हाहाकार से ,
ग़र सबको मिले मुक्ति ,
तो ये मूंछें , एक नहीं ,
बारम्बार कुर्बान हैं , बारम्बार कुर्बान हैं ।


Saturday, July 18, 2020

कामवाली बाई - वर्क फ्रॉम होम --


तीन महीने
वर्क फ्रॉम होम करके,
जब कामवाली बाई ,
काम करने आई ।
पत्नी को कोरोना का ख्याल आया,
तो उसे बस ,
झाड़ू पोंछा करने को लगाया।
तीन दिन काम करके,
कामवाली बेचैन सी होली,
और पत्नी से बोली ।
बीबी जी हमारा कैसे काम चलेगा,
यदि आप हमसे झाड़ू पोंछ ही लगवाएंगे।
अब हमसे देखा नही जाता,
आखिर कब तक साहब से बर्तन मंजवाएंगे।
पत्नी ने हालात को फ़ौरन संभाल लिया,
और अगले ही दिन कामवाली को,
झाड़ू पोंछे के काम से भी निकाल दिया।

और फिर हमसे कहा, 
अब लगिये काम पर,  
आप बहुत दिनों से आराम कर रहे हैं। 
आखिर दफ्तर से छुट्टी मारकर, 
आप भी तो वर्क फ्रॉम होम ही कर रहे हैं।  

*निर्मल हास्य*

Monday, April 27, 2020

कोरोना को भगाना है तो घर बैठो और आराम करो --



एक मित्र बोले भैया आजकल कहां दुम दबाकर बैठे हो ,
इस कोरोना के डर से क्यों घर में मुँह छुपाकर रहते हो ।
क्या रखा है बेवज़ह डरने में, कभी मित्रों से मुलाकात करो,
कब तक डर कर घर बैठोगे, कभी मिलकर हमसे बात करो।
हम बोले सुनो मोदी जी को और ३१ मई तक पूर्ण विराम करो ,
कोरोना को भगाना है तो घर बैठो और आराम करो आराम करो।


आराम स्वास्थ्य का शस्त्र है जिससे क्वारेंटाइन होता है,
आराम ही ऐसा अस्त्र है जो कोरोना संक्रमण को खोता है।
आराम शब्द में राम है रहता जो पुरुषों में उत्तम होता है,
आ राम आ राम रटने से तो कोरोना वायरस भी डरता है।
इसलिए मैं कहता हूँ तुम भी घर बैठो कुछ ना काम करो ,
लॉकडाउन का पालन करो और आराम करो आराम करो।


यदि कुछ करना ही है तो घर के छूटे पूर्ण काम करो ,
सुबह शाम आसन लगाकर घर में ही व्यायाम करो।
क्या रखा बाहर जाने में जो मज़ा है घर में रहने में ,
जो खाली रहने में लुत्फ़ है, वो कहाँ आवारा फिरने में ।
मुझसे पूछो मैं बतलाऊँ, है मज़ा सुस्त कहलाने में ,
ज्यादा खाने में क्या रखा जो रखा सीमित खाने में।


मैं यही सोचकर घर से बाहर, कम ही जाया करता हूँ ,
जो गले पड़ने के आदि होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दिन में एक बार दूध लेने को घर से बाहर जाया करता हूँ,
पुलिस के डंडे के डर से जल्दी घर वापस आया करता हूँ।
मेरी वॉल पर लिखा हुआ, जो देश प्रेम में कौशल होते हैं,
वे केवल फेसबुक और वाट्सएप्प पर ही सोशल होते हैं।


अब नहीं ऑफिस जाने की चिंता, ये सोचकर आनंद आता है,
पेट्रोल , पार्किंग और प्रदूषण से , मन स्वच्छंद हो जाता है।
सुबह से शाम सारा समय , जब अपना नज़र आता है ,
तो सच कहता हूँ जीने का जैसे , मज़ा निखर आता है।
लेकर हाथ में चाय का प्याला फिर मैं बालकनी में बैठ जाता हूँ ,
धरा पर हरा और स्वच्छ आसमां के नीले रंगों से जुड़ जाता हूँ।


तुम को भी मैं कोरोना से बच कर रहने का ये राज़ बता देता हूँ ,
छींकते खांसते वक्त मुँह पर पकड़ा रखो ये सीख सदा देता हूँ।
मैं आरामी हूँ मुझको तो अब सब बस इसी नाम से जानते हैं ,
किन्तु उनको खांसी से चैन नहीं जो लॉकडाउन को नहीं मानते हैं।
इसीलिए मैं कहता हूँ तुम घर बैठो और मेरी तरह से काम करो ,
दो गज की दूरी रखो सबसे , और आराम करो आराम करो।

Monday, April 13, 2020

लॉकडाउन की जिंदगी --


लॉकडाउन जब हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर दो वस्त्र हों और खाने को दो रोटी ,
फिर बस अदरक वाली चाय चाहिए पीने के लिए ।

पैंट कमीज़ जूते घड़ी सब टंगी पड़ी बेकार ,
बस एक लुंगी ही चाहिए तन ढकने के लिए ।

कमला बिमला शांति पारो का क्या है करना ,
ये बंदा ही काफी है झाड़ू पोंछा करने के लिए। 

वर्क फ्रॉम होम को वर्क एट होम समझा कर ,
मैडम एक गठरी कपड़े और दे गई धोने के लिए ।

ग़र नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजारा करने के लिए ।

हैण्ड वाशिंग मुंह पे मास्क रेस्पिरेटरी हाइजीन और,
लॉकडाउन का पालन करो कोरोने से बचने के लिए। 

आदमी तो बेशक हम भी थे काम के 'तारीफ़',
किन्तु घर बैठे हैं केवल औरों को बचाने के लिए। r

   

Monday, March 30, 2020

लॉकडाउन की मज़बूरी --


शोर मचाते
छोटे छोटे बच्चे
'बेघर' नर नारी
'घर' जाने को आतुर
जा रहे थे एक ओर
अपने अपने 'घरों' से निकल।
जाने वालों की कतारें में
हज़ारों की भीड़ देख
आने लगे वापस
जाने को विद्यालय
मिटाने को भूख
सरकारी लंगर में।
भूख और आशियाना
कोरोना पर भारी पड़ गया।
हम खड़े खड़े देखते रहे
सातवें माले की बालकनी से
लॉकडाउन के नाज़ुक
ताले को टूटते हुए।

Wednesday, March 25, 2020

डेढ़ सौ साल पहले लिखी गई कविता आज चरितार्थ हो रही है --


और लोग घरों में बंद रहे
और पुस्तकें पढ़ते सुनते रहे
आराम किया कसरत की
कभी खेले कभी कला का लिया सहारा 
और जीने के नए तरीके सीखे।
फिर ठहरे
और अंदर की आवाज़ सुनी
कुछ ने ध्यान लगाया
किसी ने की इबादत
किसी ने  नृत्य किया
कोई अपने साये से मिला
और लोगों का नजरिया बदला।
लोग स्वस्थ होने लगे 
उनके बिना जो थे नासमझ 
ख़तरनाक़, अर्थहीन, बेरहम 
और समाज के लिए खतरा।
फिर ज़मीं के जख्म भी भरने लगे
और जब खतरा खत्म हुआ 
लोगों ने एक दूसरे को ढूँढा 
मिलकर मृत लोगों का शोक मनाया अंग्रेज़ी
और नया विकल्प अपनाया 
एक नयी दृष्टि का स्वप्न बुना
जीवन के नए रास्ते निकाले
और पृथ्वी को पूर्ण स्वस्थ बनाया
जिस तरह स्वयं को स्वस्थ बनाया।

* एक मित्र से प्राप्त कैथलीन ओ मीरा (Kathleen O'Meara) द्वारा १८६९ में अंग्रेजी में लिखित कविता का हिंदी रूपांतरण।  

Saturday, March 21, 2020

कोरोना और वर्क फ्रॉम होम --


कोरोना का कहर जब शहर में छाया ,
तब हुकमरान ने ये फरमान सुनाया।

कि स्कूल, कॉलेज, ज़िम, क्लब सब होंगे बंद ,
पर हमें तो वर्क फ्रॉम होम का आईडिया बड़ा पसंद आया।

लेकर बुजुर्गी का सहारा हमने अर्ज़ी लगाई,
कि कमज़ोर तो नहीं है ये साठ साल की काया।

इसलिए कोरोना से तो हम कभी ना डरेंगे ,
परन्तु कल से हम वर्क फ्रॉम होम ही करेंगे।

किन्तु पत्नी को देर न लगी ये बात समझते ,
कि घर तो क्या हम तो ऑफिस में भी कुछ काम नहीं करते। 

हम भी वर्क फ्रॉम होम का मतलब तब समझे ,
जब पत्नी ने कहा कि अब ये सुस्ती नहीं चलेगी।

उठो और हाथ में झाड़ू पोंछा सम्भालो,
आज से कामवाली बाई भी वर्क फ्रॉम होम ही करेगी।



Monday, March 16, 2020

इस साल गले मिलने को गले ही नहीं मिले --


हर साल होली पर मिलते थे हर एक से गले,
इस साल गले मिलने वाले वो गले ही नहीं मिले।  

कोरोना का ऐसा डर समाया दिलों में,
कि दिलों में ही दबे रह गए सब शिकवे गिले।

पडोसी पार्क में बुलाते रहे पकौड़े खाने को,
डरे सहमे लोग अपने अपने घरों से ही नहीं हिले।

ना निकली बस्ती में मस्तों की टोली,
ना पिचकारी ना रंग गुलाल ही लगे भले। 

ना रंग बरसे ना भीगी किसी की चुनड़िया,
लेकर गुलाल बुजुर्ग भी बैठे रह गए पेड़ों तले।

गुमसुम से रहे कवि जेब रह गई खाली,
होली के कवि सम्मलेन भी जब कल पर टले।

होलिका तो जल गई होली दहन में ,
ये मुए कोरोना वायरस फिर भी नहीं जले।

जले मगर मकान और दुकानें तो बहुत ''दोस्तों'',
अब दुआ करो कि कोरोना नहीं सद्भावना फूले फले।

Wednesday, March 11, 2020

बुरा ना मानो होली है , टी वी प्रोग्राम्स --


हमें अभी अहसास हुआ कि हम पिछली चार बार से हर वर्ष टी वी पर होली मनाते आये हैं। प्रस्तुत हैं कुछ झलकियां : 




२०१७ की होली , यू पी के एक चैनल पर।






२०१८ की होली, दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर। 





२०१९ की होली, आज तक के तेज चैनल पर.




२०२० की होली, CCN DEN चैनल पर।   




साल में एक बार ही सही, टी वी पर प्रोग्राम देना अच्छा लगता है। 


Friday, March 6, 2020

कोई ऐसा काम करो ना , कि गले पड़ जाये कोरोना --


जो जंगली जानवरों को जाल में फंसाते हैं,
फिर उनको अधमरा अधपका खा जाते हैं ,
कोरोना वायरस को वही लोग पसंद आते हैं।

जब यही लोग विदेश के सफ़र पर जाते हैं ,
खुले आम छींक मारने से बाज नहीं आते हैं,
यही लोग हवा में रोग के कीटाणु फैलाते हैं।

जो रोगी बिना हाथ धोये ही हाथ मिलाते हैं ,
दूसरों को ज़बरदस्ती प्यार से गले लगाते हैं ,
वही यारी दोस्ती में दोस्तों को रोग दे जाते हैं।

जो लोग डर कर रोग के लक्षणों को छुपाते हैं,
कोरोना वायरस का टैस्ट कराने से घबराते हैं,
वही संक्रमण को रोकने में बाधा बन जाते हैं।

जो लोग त्रासदी का नाज़ायज़ फायदा उठाते हैं,
चीज़ों की जमाखोरी कर ज्यादा मुनाफ़ा कमाते हैं,
वही व्यापारी देश के असली दुशमन कहलाते हैं।

कोरोना वायरस के नाम से ही लोग घबरा जाते हैं ,
जाने क्यों लोग दहशत में आसानी से आ जाते हैं,
बस स्वास का संक्रमण है डॉक्टर्स यही समझाते हैं। 

होली पर चलो प्यार से नहीं ध्यान से गले लगाते हैं,
ग़र हो जाए सर्दी खांसी बुखार तो मिलने से कतराते हैं,
सात्विक भोजन और नमस्कार ही कोरोना से बचाते हैं।


Wednesday, March 4, 2020

छोटी बह्र की ग़ज़ल --


फ़िल्मी मशहूर हस्तियों और मॉडल्स के परिधान देखकर उपजी ये छोटी बह्र की ग़ज़ल :

वस्र छै गज रंगा ,         ( वस्र = वस्त्र )
तन फिर भी नंगा।

कहने को मैया ,
मैली क्यों गंगा।

मन में रख विग्रह ,       ( विग्रह = वैर / शत्रुता )
कर दें कब दंगा ।

धर्म के हैं गुरु ,
मत लेना पंगा ।

जग में हो अमन ,
मन रहता चंगा।

तज दे हर व्यसन ,
बीड़ी  या   छंगा ।        ( छंगा छाप तम्बाकु )

नोट : मैट्रिक क्रम = २,२,२,२,२ 

Sunday, February 23, 2020

ताऊ को कहीं देखा ?


ताऊ कौन है ?
आजकल फेसबुक पर फिर से ताऊ अवतरित हुए हैं । ये ताऊ साल भर अंतर्ध्यान रहते हैं लेकिन जब जब होली आती है, ये ताऊ फेसबुक की ओर अग्रसर हो लेते हैं। वैसे तो हरियाणा का एक एक बंदा ताऊ ही होता है। लेकिन ये ताऊ स्पेशल है। क्योंकि ये हरियाणवी ताऊ से भी ज्यादा ताऊ हैं । इनकी एक खास बात ये है कि इन्हें ईश्वर अल्लाह की तरह किसी ने आज तक नहीं देखा। दूसरी खास बात ये है कि ये दुनिया मे सिर्फ दो लोगों से डरते हैं , एक ताई से और दूसरे हम से ( कमाल है कोई हम से भी डरता है )।

ताई से डरने का कारण तो खुद ही बता देते हैं, जो है ताई का लट्ठ। वैसे दुनिया मे ऐसा कोई खुदा का बंदा नहीं बना जो पत्नी से ना डरता हो। लेकिन इन्हें ताई के लट्ठ की आदत इस कद्र पड़ गई है कि जब तक दो चार ना खा लें तब तक ना इन्हें भूख लगती है ना प्यास और ना ही नींद आती है। और तो और यदि कब्ज़ हो जाये तो भी इलाज़ ताई का लट्ठ ही करता है। अब तो हमने भी इनके पास नेचुरोपैथी के लिए मरीज़ रेफेर करने शुरू कर दिए हैं।
अब बताते हैं हम से डरने का कारण। हुआ यूं कि एक बार हिमालय पर ट्रेकिंग करते हुए ताऊ से हमारी मुलाकात हो गई। हमने फौरन ताऊ के साथ एक सेल्फी ले ली। तब तो ताऊ ने खुशी खुशी पाउट बनाते हुए फोटो खिंचवा ली लेकिन फिर डर सताने लगा कि कहीं हम फेसबुक पर ना डाल दें । आखिर हमारी आदत से वे भी वाकिफ़ थे।
अब जब ताऊ फिर से रायता फैलाने की धमकी दे रहे हैं तो हमने ताऊ को फोन कर पूछा कि फोटो डाल दूं। तब से ताऊ परेशान घूम रहे हैं , कभी किसी की सिफारिश लगवा रहे हैं कभी किसी की। लगभग आधे पुराने ब्लॉगर्स के फोन आ चुके ताऊ के लिए। इतने फोन तो DMC के होने वाले चुनाव के लिए डॉक्टर्स के भी नही आये। हमने भी सोच लिया है कि इधर ताऊ ने हमारे ब्लॉग पर रायता फैलाया, उधर हमने ताऊ का झुर्रीदार ओरांगउटांग जैसा चेहरा दुनिया को दिखाया। आखिर ताऊ ने कौन सा अपनी शक्ल को पेटेंट करा रखा है।

तो दोस्तो इस बार होली तक शाहीन बाग का धरना खत्म हो ना हो लेकिन ताऊ के उजागर होने की संभावना दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फिलहाल ट्रम्प के दर्शन करिए और ताऊ के लिए इंतज़ार।
नोट: यह होली विशेष पोस्ट ब्लॉगर्स के लिए है। लेकिन नॉन ब्लॉगर्स भी ताऊ से परिचित हो सकते हैं।

Friday, February 7, 2020

कामना करता हूँ कि इस साल के चुनाव में --


कामना करता हूँ कि इस साल के चुनाव में --

सब नेताओं की मुरादें पूरी हों,
ना किसी की इच्छाएं अधूरी हों।

उम्मीदवारों को कम से कम ५% मत मिलें ,
ना जब्त हो, सभी को वापस जमानत मिले।

सर्वोत्तम पार्टी को अच्छा जनमत मिले,
जनमत भी ऐसा कि पूर्ण बहुमत मिले।

जनता को आटा चावल दाल मिले,
और दो रूपये किलो हर माल मिले। 

बेघर को झुग्गी डालने की डगर मिले,
जल्दी ही झुग्गी की जगह पक्का घर मिले। 

अनाधिकृत घर का मालिकाना हक़ मिले,
मालिक को बिजली पानी नेट मुफ्त मिले। 

सब्ज़ी मार्किट में सस्ता प्याज मिले ,
और बैंक खातों में ज्यादा ब्याज मिले।

लेकिन ये सब मिलें ना मिलें,
पर कामना करता हूँ कि --

शहर में शांतिपूर्ण चुनाव हो,
ना कोई सांप्रदायिक तनाव हो।

ना कोई मतदाता भयभीत हो,
और अंतत: लोकतंत्र की जीत हो।