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Wednesday, November 18, 2015

डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।

प्रस्तुत हैं , डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी  हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।  

१)
अय डाक्टर , चल दवा लिख !
झूठा बिल , फर्ज़ी मेडिकल बना ! 
पी एम रिपोर्ट बदल ,
अजन्मी बेटी का गला दबा ! 
अपनी फीस ले ,
अय डाक्टर , चल झूठा बिल बना ! 

२) 

मैं चाहे ये खाऊँ , मैं चाहे वो खाऊँ 
मैं चाहे जिम छोडूं ,
मैं चाहे दारू के अड्डे पे जाऊं , 
चाहे वेट बढ़े , चाहे पेट बढ़े ,
डाक्टर को दिखाऊँ ना दिखाऊँ , 
मेरी मर्ज़ी ! 

३)

अस्पताल मे 
छोड़ गया बेटा , मुझे 
हाय अकेला छोड़ गया ! 
सब देखते रहे तमाशा ,
मैं सड़क पे घायल ,
पड़ा पड़ा दम तोड़ गया ! 

४)

तू मेरा ईश्वर है , 
तू मेरा रक्षक है ! 
पर फीस मांगी तो  
तू पूरा भक्षक है ! 

५) 

होटल मे टिप् दे देंगे पूरे एक हज़ार , 
जुए मे हम भले ही हज़ारों जाएं हार , 
पर दो चार दिन गर पड़ जाएं बीमार,
तो तो तो तेरी तो ,
अय डाक्टर , चल दवा खिला ,
इंजेक्शन लगा , पर बिल ना बना ! 





Sunday, April 6, 2014

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता -- भूली बिसरी यादें ...


तब हम नए नए डॉक्टर बने थे . ऊर्जा , जोश और ज़वानी के उत्साह से भरपूर दिल , दिमाग और शरीर मे जैसे विद्युत धारा सी प्रवाह करती थी . काम भी तत्परता से करते थे . सीखने की भी तमन्ना रहती थी . उन दिनों ६ महीने का पहला जॉब सर्जरी डिपार्टमेंट मे किया था . सप्ताह मे दो दिन ओ पी डी होती थी, दो दिन वार्ड मे काम और दो दिन ओ टी जाना होता था . ऐसी ही किसी एक ओ पी डी मे एक दिन एक युवा लड़की अपनी मां के साथ दिखाने आई . सांवली सलोनी सी , घबराई सी , उम्र यही कोई १८ वर्ष . सिख परिवार से थी . उसके एक स्तन मे गांठ थी जिसके उपचार के लिये आई थी . हमने उसे एग्जामिनेशन रूम मे जाकर स्तन दिखाने के लिये कहा तो वह रोने लगी . हालांकि साथ ही उसकी माँ भी खड़ी थी और एकांत का भी पूरा ध्यान रखा गया था , लेकिन लड़की थी कि कपड़े हटाने को तैयार ही नहीं थी . ऐसे मे किसी भी डॉक्टर को गुस्सा आ सकता था क्योंकि ओ पी डी मे भीड़ बहुत थी और एक एक मिनट कीमती था . 

लेकिन समझा बुझा कर आश्वस्त करने की पूरी कोशिश के बावज़ूद भी जब उसने रोना बंद नहीं किया तो हमे जाने क्यों उससे सहानुभूति सी हुई . हमने उसे वहीं रुकने के लिये कहा और बाहर आकर अपने सीनियर कन्सल्टेंट को सारी बात बताई और उनसे अनुरोध किया कि वो खुद लड़की को देख लें . सफेद बालों वाले कन्सल्टेंट लगभग बुजुर्ग से थे और शक्ल से भी शरीफ दिखते थे . उन्होने उसका मुआयना किया और उसे आपरेशन के लिये भर्ती कर लिया . आपरेशन सही सलामत हो गया और जैसा कि अनुमान था , कोई गंभीर रोग भी नहीं निकला 


लेकिन जाने क्या हुआ कि उसके बाद ना सिर्फ वो लड़की बल्कि उसका सारा परिवार हमारा भक्त सा बन गया . लड़की ने तो किसी और डॉक्टर को हाथ लगाने से भी मना कर दिया . अब उसकी सारी देखभाल हमे ही करनी पड़ रही थी . अन्तत : पूर्णतया ठीक होने पर उसे छुट्टी दे दी गई . लेकिन उसके बाद फॉलोअप मे वह हमारे पास ही आती रही और उसका पूरा परिवार भी आत्मीयता दिखाता रहा . ऐसा लगता था जैसे वे हमारे एक सामान्य से व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए थे . 

१३ अप्रैल १९८४ को हमारी शादी हो गई . फिर भी यदा कदा उनका आना जाना चलता रहा था हालांकि अब हम भी काम मे बहुत व्यस्त हो गए थे . फिर ३१ अक्टूबर १९८४ को सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए . उसके बाद उसकी और उनके परिवार की हमे कभी कोई खबर नहीं मिली . आज भी जब कभी याद आ जाती है तो उसका मासूम सा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है . राम जाने ---

Friday, April 5, 2013

कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या ---


होली के कुछ दिन बाद शाम का समय था। अस्पताल से घर जाते हुए सड़क पर ट्रैफिक बहुत मिला। ऊपर से सड़क पर पुलिस के बैरिकेड, मानो स्पीड कम करने के लिए बस इन्ही की ज़रूरत थी। ऐसे ही एक बैरिकेड के आगे एक मनुष्य सा दिखने वाला जीव बैठा हिल डुल रहा था। मैला कुचैला , होली के रंगों में रंगा लेकिन बेहद गन्दा। सामने एक अद्धे जैसी बोतल रखी थी जिसमे गोल्डन रंग का कोई द्रव्य भरा था। बोतल आधी खाली थी। कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या पेशाब। दूसरी सम्भावना ज्यादा लग रही थी क्योंकि वह मानव जीव हवा में हाथ घुमाते हुए खुद से बातें किये जा रहा था। ज़ाहिर था, वह कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त पुराना रोगी था।

ऐसे में एक विचार मन में आकर कुलबुलाने लगा कि इस बन्दे का क्या किया जाना चाहिए। यदि विभिन्न पहलुओं पर गौर करें तो कुछ बातें सामने आती हैं :

१) कानून की दृष्टि से : 

कानूनन उसे उठाकर किसी अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिये जहाँ उसका उचित उपचार किया जा सके। तद्पश्चात उसे किसी अनाथालय या सेवा आश्रम में सहारा मिलना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि ऐसा करेगा कौन। आजकल सब को भागमभाग रहती है। अपने काम ही नहीं संभाले जाते , फिर कोई किसी आवारा की ओर क्यों देखेगा। पुलिस को भी कहाँ फुर्सत है अपराधियों से जो दिल्ली की सड़कों पर एक ढूंढो तो सौ मिलते हैं।    

२) चिकित्सा की दृष्टि से :   

मरीज़ कितना भी गन्दा हो , किसी भी हालत में हो, भले ही शरीर में कीड़े पड़े हों , एक चिकित्सक के लिए वह एक रोगी ही है। उसकी पूरी चिकित्सीय देखभाल करना एक डॉक्टर का फ़र्ज़ है।
लेकिन ऐसे रोगी को डॉक्टर्स भी नहीं देखना चाहते। भर्ती कर भी लिया तो एक दो दिन में बेड खाली कराने का प्रयास रहता है। डॉक्टर्स भी क्या करें , सरकारी अस्पतालों में पहले ही एक बेड पर दो दो तीन तीन मरीज़ पड़े होते हैं। वे गंभीर रोगियों का इलाज़ करें या ऐसे रोगी पर ध्यान दें।      

३) मानवता की दृष्टि से : 

हर मनुष्य को जीने का अधिकार है। असहाय, बीमार और कष्ट भोगते हुए इन्सान के प्रति उदारता सभी मनुष्यों का फ़र्ज़ है और इंसानियत का तकाज़ा है।
लेकिन हमारे जैसे देश में जहाँ इन्सान थोक के भाव पैदा होते हैं , वहां भला एक ऐसे व्यक्ति की क्या कीमत होगी जो खुद किसी काम का नहीं।   

कुछ इसी तरह के विचार मन में विचरने लगे। यानि यदि आप इंसानियत और कानून का पालन करते हुए उसे किसी अस्पताल में भर्ती करा भी दें तो क्या होगा। कुछ दिन और यथासंभव उपचार के बाद उसे भगा दिया  
जायेगा या वह खुद ही भाग जायेगा। पुराने मानसिक रोगी को मानसिक रोगों के अस्पताल के अलावा और कहीं रखा भी नहीं जा सकता। शारीरिक रोगों का उपचार तो संभव है लेकिन मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसे रोगी को स्वस्थ करना अक्सर संभव नहीं होता।  

इन हालातों में ऐसे मनुष्य का जिन्दा रहना किस के लिए उपयोगी है ? देश के लिए, या समाज के लिए ? परिवार के लिए, या स्वयं के लिए ? वैसे तो ऐसे रोगी का न कोई परिवार होता है , न समाज।  ऐसे रोगी हकीकत की दुनिया से दूर एक अलग ही दुनिया में विचरते रहते हैं जिसका हकीकत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता। फिर उसका जिन्दा रहने का क्या उद्देश्य है ?
वह न सिर्फ समाज पर बल्कि स्वयं पर भी एक बोझ है। ऐसी निरुद्देश्य जिंदगी का क्या फायदा ?

क्या ऐसे में कुछ अलग हटकर सोचा जा सकता है ? यही अहम सवाल है !     
            

Thursday, July 14, 2011

क्या आपके किसी रिश्तेदार में कभी भूत प्रेत आया है ?

दृश्य १ :( बचपन में गाँव में )

घर के आँगन में एक २५ -३० वर्ष की महिला ज़मीन पर बैठी जोर जोर से हिल रही है और हाथ पैर पटकती हुई सर को गोल गोल घुमाती हुई भर्राई हुई आवाज़ में बडबडा रही है --मैं सबको देख लूँगा ---अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी--- आज से हर सोमवार मेरे लिए हलवा पूरी बनाया करो---- पहले घर की बहु को खिलाओ , फिर सब लोग खाओ--वगैरह वगैरह .

सारे गाँव में खबर फ़ैल जाती है --फलाने की बहु में फलाना दादा आ गया .


अक्सर ऐसे किस्से सुनने में आते रहते थे . एक परिवार के पूर्वज जो रिश्ते में हमारे परदादा लगते थे --अक्सर उनके नाम का भूत उन्ही के परिवार के किसी न किसी व्यक्ति में आ जाता था . अक्सर वह व्यक्ति घर की कोई बहु होती थी .

फिर गाँव के ओझा को बुलाया जाता . ओझा गाँव के निम्न जाति के समुदाय से होता था जिसका दावा था की उसने शमशान में घोर तपस्या करने के बाद भूतों से छुटकारा दिलाने की सिद्धि प्राप्त की है .
वह आता और अपने तंत्र मन्त्र से बहु में आए भूत को बोतल में बंद कर ले जाता और दबा देता कहीं दूर ज़मीन के नीचे .

यह और बात है की कुछ दिन बाद वही भूत फिर किसी बहु के शरीर में प्रवेश कर तहलका मचा देता .

शहर में आने के बाद मैं अक्सर सोचा करता --यहाँ शहर में कभी किसी में भूत क्यों नहीं आता ?



दृश्य २ : ( अस्पताल के आपातकालीन विभाग में )

एक २५-३० वर्षीय महिला को उसके रिश्तेदार लेकर आते हैं . महिला प्रत्यक्ष में बेहोश दिख रही है लेकिन हाथ पैर पटक रही है . टेबल पर लिटाकर उसके पतिदेव जुट जाते हैं उसकी सेवा करने में --हाथ पैरों को मसल रहे हैं . दूसरा रिश्तेदार आकर घबराई आवाज़ में कहता है --डॉक्टर जल्दी कीजिये --देखिये इसे क्या हुआ --बेहोश हो गई है --बैठी बैठी अचानक बेहोश हो गई . पूछने पर पता चलता है की पति पत्नी में कुछ कहा सुनी हुई , उसके बाद वह बेहोश हो गई .

पति बताता है --इसको अक्सर ऐसे दौरे पड़ जाते हैं .

पूरा मुआयना करने के बाद डॉक्टर उसका मर्ज़ समझ जाता है . वह उसे एक मेडिकल ईत्र सुंघाता है . महिला पहले तो साँस रोक लेती है लेकिन जल्दी ही उसका साँस टूट जाता है और वह आँख खोल देती है और होश में आ जाती है . उसकी आँखों के कोर से आंसू की एक बूँद बह निकलती है .

रोगी आज के लिए ठीक हो गई है .
डॉक्टर उसके पति को समझाता है --जितनी सेवा तुम आज कर रहे थे , घर में यदि इसकी आधी भी करो तो यह ठीक रहेगी . इसका ख्याल रखा करो .

निष्कर्ष :

मनुष्य के व्यक्तित्त्व पर परिस्तिथियों का बहुत प्रभाव पड़ता है . बहुत सी बातें हमारे सब्कौन्शिय्स ( अर्धचेतन ) मस्तिष्क में जमा होती रहती हैं . विपरीत परिस्तिथियों में ये बातें अन्जाने ही बाहर आने लगती हैं . अक्सर अज्ञानतावश हम इन्हें कोई विकार मान लेते हैं . इन्ही बातों का नाजायज़ फायदा उठाकर कई तरह के ओझा , बाबा , तथाकथित साधू महात्मा तंत्र मन्त्र का नाटक कर सीधे सादे लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते हैं .

सच तो यह है --भूत प्रेत नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं .

विपरीत परिस्तिथियों में मानव मस्तिष्क अलग अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है .
ऐसे हालातों में अक्सर तीन तरह के रोगी आते हैं :

१ ) मैलिंगर्स :

ये वे रोगी होते हैं जो जान बूझ कर बीमार होने का नाटक करते हैं . इसका सबसे कॉमन उदहारण है --जेब कतरे .
यदि पकडे जाएँ तो उनका नाटक देखने लायक होता है .
वैसे बड़े बड़े नेता , धर्म गुरु या पहुंचे हुए लोग भी इस विद्या में कुछ कम नहीं .

२ ) फंक्शनल :

चिकित्सा की भाषा में ये वे रोगी होते हैं जैसा दृश्य १ और २ में दिखाया गया है .
मन में दबी हुई भावनाओं और इच्छाओं को लिए ये लोग अक्सर विपरीत परिस्तिथियों में बीमार होने का बहाना करते हैं लेकिन इनको पता नहीं होता की ये बहाना कर रहे हैं . यानि ये अर्ध चेतन अवस्था में बीमार होते हैं . कभी कभी इसका इलाज करना भी बहुत सरल नहीं होता जैसे हिस्टीरिया .
इन्हें सायकोथेरपी की ज़रुरत होती है .
हालात सुधरने पर सुधार की आशा की जा सकती है .

३) सिजोफ्रेनिक :

ये वास्तव में मानसिक रोगी होते हैं . अक्सर इनका रोग हालातों पर निर्भर नहीं करता . लेकिन फिर भी हालात का थोडा रोल रह सकता है . इन्हें यथोचित उपचार द्वारा ही ठीक किया जा सकता है . इन्हें पागल कहना या पागल समझ कर दुत्कारना सही नहीं .

निश्चित ही दुनिया का कोई ओझा , बाबा ,या सिद्ध पुरुष इनका इलाज नहीं कर सकता. इनके धोखे में न आएं .

नोट : भूत प्रेतों का कोई अस्तित्त्व होता है या नहीं , इनका कोई प्रमाण है या नहीं --यह वाद विवाद का विषय हो सकता है . लेकिन ये रोगी किसी भूत प्रेत के शिकार नहीं होते, यह निश्चित है .

(प्रकृति की गोद में जाकर भी आधे रोग दूर हो जाते हैं )


Wednesday, June 30, 2010

पहले जिंदगी सरकती थी , अब दौड़ लगाती है -----

पिछली पोस्ट के वादानुसार, प्रस्तुत है एक कविता अस्पताल में लिखी गई , आँखों देखी , सत्य घटनाओं पर आधारित ।


शहर के बड़े अस्पताल में ,खाते पीते लोग
भारी भरकम रोग का उपचार कराते हैं ।


तीन दिन बाद रोगी हृष्ट पुष्ट और रोगी से ज्यादा
उसके
सहयोगी , बीमार नज़र आते हैं ।


यहाँ कर्मचारी तो सभी दिखते हैं ,पतले दुबले और अंडर वेट
पर कस्टमर होते हैं मोटे ताज़े , कमज़ोर दिल और ओवरवेट

भारी पेट का वेट , बड़ी मुश्किल से उठा पाते हैं
फिर भी खाने से पहले , सूप ज़रूर मंगवाते हैं


एक दफ्तर के बड़े साहब की बीबी , बीमार हो गई
अस्पताल में सी सी यू के बिस्तर पर, सवार हो गई।


साहब ने बेंच पर बैठे बैठे , पूरी रात गुज़ार दी
बोले भैया डॉक्टर ने आज , सारी अफ़सरी उतार दी ।


उधर एक हरियाणवी को जब , हार्ट अटैक हो गया
अस्पताल में ही खाप का मिलन , सैट हो गया ।


बेटा बेटी , पोते नाती और सास बहुओं का , ताँता लग गया
हर रूप रंग के लोगों से अस्पताल का , कोना कोना पट गया।


सब अपना खाना पीना और बिस्तर साथ लाये थे
कुछ तो बाल बच्चों समेत , १०० कोस दूर से आये थे ।


और जब वह अपार जन समूह , एक नेता का सम्मान करने लगा
उस बड़े अस्पताल का प्रांगण , किसान रैली का मैदान लगने लगा ।


एक पेज थ्री की पात्र महिला , काला चश्मा लगा मटक रही थी
शायद पिछली रात की मदिरा , उसकी आँखों में खटक रही थी।


मोहतरमा अपने लिव इन पार्टनर को दिखाने लाई थी
सोशल वर्कर थी , एड्स की काउंसेलिंग कराने आई थी।


एक मिडल क्लास मरीज़ को जूनियर डॉक्टर , सरे आम समझा रहा था
उसके टूटे दिल की रिपेयरिंग का , हिसाब किताब बता रहा था ।


उधर उसका युवा बेटा फोन पर डिस्कस कर रहा था
अपने पिता के जीवन की कीमत फिक्स कर रहा था ।


कुछ नई पीढ़ी के युवा भी रोगी सेवा में व्यस्त थे
पर कान में इयर फोन लगा , अपने में मस्त थे ।


जिसे देखो मोबाइल पर बतियाए जा रहा था
कोई पूछ रहा था , कोई हाल बताये जा रहा था ।


मैं हैरान था याद कर , तीस साल पहले का हाल
जब न गाड़ियाँ होती थी , और न मोबाईल ।


उपचार तब भी होता था , इलाज़ अब भी होता है
लाचार तब दिल को रोता था , बंदा अब बिल को रोता है ।


माहौल भले ही जुदा कितना है
लेकिन फर्क आज बस इतना है ।


जिंदगी अब मौत से भी होड़ लगाती है
पहले जिंदगी सरकती थी , अब दौड़ लगाती है।


नोट : इस कविता में किसी की भावनाओ को ठेस पहुँचाने का प्रयास नहीं किया गया है। डॉक्टर्स के लिए सभी तरह के मरीज़ समान होते हैं । व्यक्तिगत जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता । कृपया अन्यथा न लें ।

Sunday, June 27, 2010

बड़ा मुश्किल होता है एक डॉक्टर के लिए मरीज़ का रिश्तेदार होना---

सरकारी नौकरी का एक फायदा तो है कि आप जब चाहो , छुट्टियाँ ले सकते हो। हमने भी गर्मियों में बाहर जाने के ख्याल से १५ दिन का अर्जित अवकाश ले लिया । सोचा था कि इस बार कुछ दिन के लिए शिमला के पास चैल ही हो आते हैं । वहां अपने एक दोस्त का होटल है जिसमे डिस्काउंट भी मिल जाता है ।

लेकिन जो सोचा , वही हो , यह ज़रूरी नहीं । हुआ भी कुछ ऐसा ही । अचानक पिता जी की तबियत खराब हुई और उन्हें एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा । अब एक सप्ताह के लिए हम सब व्यस्त हो गए । हालाँकि अब ठीक हैं और छुट्टी कर घर आ चुके हैं ।

लेकिन इस एक सप्ताह में कुछ अलग ही अनुभव हुए , जो आपके साथ बांटता हूँ

बीमारी में सबसे ज्यादा मुश्किल होती है , रोगी के रिश्तेदारों की । विशेष तौर पर उनको जिन्हें अस्पताल में रहना पड़े , दिन रात । अब रोगी को तो भर्ती कर दिया जाता है , आइ सी यू या सी सी यू में , जहाँ दिन रात नर्सें उनकी देखभाल करती रहती हैं ।

और रिश्तेदार बैठे रहते हैं बाहर बेंच पर , दिन रात । यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक मरीज़ को जेनरल वार्ड में नहीं भेज दिया जाता । अब यदि आपको प्राइवेट रूम मिला है तो आप के लिए भी सोने का इंतजाम हो जायेगा । वर्ना वहां भी ज़मीन पर लेट लगाओ।

लेकिन मुझे लगता है कि एक अटेंडेंट के रूप में एक डॉक्टर की हालत सबसे दयनीय होती है । अब जो नॉन मेडिकल रिश्तेदार होते हैं , वे तो डॉक्टर से बात करके संतुष्ट हो जाते हैं । डॉक्टर ने कहा है कि सब टेस्ट भेज दिए हैं , शाम तक रिपोर्ट आ जाएगी । चिंता की कोई बात नहीं है ---वगैरा वगैरा ।

लेकिन एक डॉक्टर को तो पता होता है कि किस टेस्ट का क्या मतलब है । यदि पोजिटिव आया तो क्या परिणाम हो सकता है । वो बेचारा तो चिंता में घुला रहता है जब तक सब कुछ ठीक ठाक नहीं हो जाता ।

सच बड़ा मुश्किल होता है एक डॉक्टर के लिए मरीज़ का रिश्तेदार होना

खैर हम भी पहले दिन सी सी यू के बाहर बेंच पर बैठे रहे । खाली , कोई काम नहीं । लेकिन रहना भी ज़रूरी था ।
बैठे बैठे आते जाते लोगों को देखते रहे । और कर भी क्या सकते थे । लोगों की बातें भी सुनते रहे । अलग अलग किस्म के लोग । सबकी अलग अलग समस्याएँ । सबकी अलग अलग प्रतिक्रियाएं ।

सुनकर बड़ा अजीब लग रहा थामरीजों के रिश्तेदारों के बीच बैठकर और उनकी बातें सुनकर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे ऊपर वाला अपना धाम छोड़कर पृथ्वी पर उतर आया हो , जनता से ये जानने के लिए कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैंया फिर ऐसा जैसे कोई राजा भेष बदलकर प्रजा के बीच घूम रहा हो उनकी बातें सुनते हुए

इस अनुभव को शब्दों में बयाँ करना बड़ा कठिन है । एक आम आदमी के लिए कितना कठिन हो सकता है , जीवन मृत्यु के बारे में निर्णय लेना । कभी कभी ऐसा लगता था कि मैं किसी को कुछ सलाह दे डालूंलेकिन फिर यही लगता कि बिन मांगे सलाह देना भी कोई उचित बात नहीं । वैसे भी ये फैसले आप खुद ही लें तो बेहतर है ।

खैर , कहते है कि खाली दिमाग शैतान का घर । लेकिन एक कवि का दिमाग भला कहाँ खाली रह सकता है । तो भई खाली बैठे बैठे हमने भी सोचा कि क्यों न इन्ही हालातों पर एक कविता लिख दी जाये । वो भी हास्य व्यंग कविता । आखिर कुछ नज़ारे तो वास्तव में ही बड़े हास्यस्पद लग रहे थे ।

आप भी सोच रहे होंगे कि भला अस्पताल में हास्यस्पद हालात कैसे बन सकते हैंअब यह तो हमारी कविता पढ़कर ही पता चलेगा

तो इंतज़ार कीजिये अगली पोस्ट का