Saturday, October 21, 2017

वर्तमान परिवेश में हमारे पर्व --


दिवाली के अवसर पर हिन्दुओं के पंचपर्व की श्रंखला में आज अंतिम पर्व है , भैया दूज।  यह महज़ एक संयोग हो सकता है कि हिन्दुओं के सभी त्यौहार तीज के बाद आरम्भ होकर मार्च में होली पर जाकर समाप्त होते हैं।  फिर ५ महीने के अंतराल के बाद पुन: तीज पर आरम्भ होते हैं। निश्चित ही इसके सामाजिक , आर्थिक , भूगोलिक  और मौसमी कारण भी हो सकते हैं।  मार्च के बाद गर्मियां आरम्भ हो जाती हैं जो देश में किसानों के लिए फसल काटने और धनोपार्जन का समय होता है। साथ ही गर्मी और बरसात का मौसम भौतिक सुविधाओं के अभाव में गांवों में रहने वाले लोगों के लिए अत्यंत कष्टदायक रहता था। इसलिए सावन की रिमझिम फुहारों के साथ जब मौसम सुहाना होने लगता है , और किसानों की मेहनत की कमाई भी फसल के रूप में घर आ जाती है , तब आराम के दिनों में तीज त्यौहारों को मनाने का  आनंद आता है।शायद यही कारण आगे चलकर सम्पूर्ण देश में पर्वों का कैलेंडर बनाने में सहायक सिद्ध हुआ होगा।

समय के साथ देश में हुए विकास के कारण निश्चित ही देशवासियों के रहन सहन , दिनचर्या और सामर्थ्य में परिवर्तन आया है।  आज यहाँ भी किसी भी विकसित देश में मिलने वाली सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। बदले हुए परिवेश में हमारी जीवन शैली बदलना स्वाभाविक है। पर्वों के स्वरुप भी बदल रहे हैं। आज आवश्यकता है कि हम वर्तमान परिवेश अनुसार अपनी सोच को भी बदलें। आदिकाल से चले आये पर्वों की कालग्रस्त परमपराओं और कुरीतियों को त्याग कर सिर्फ अच्छी बातों को ही अपनाएं। जो रीति रिवाज़ सदियों पहले तर्कसंगत रही होंगी , वे अब अर्थहीन हो गई हों तो उन्हें छोड़ना और तोडना ही अच्छा है।  

त्यौहार हमारे जीवन में माधुर्य प्रदान करते हैं।  यह सामाजिक , पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को सुदृढ़ बनाने का अच्छा अवसर भी होता है। इसलिए पर्व पर सभी आपसी मन मुटाव भुलाकर सभी को एक होकर मर्व मनाना चाहिए।  भले ही विभिन्न धर्मों के पर्व भिन्न होते हैं , लेकिन सभी धर्मों के पर्वों का सम्मान करते हुए दूसरे धर्मों के पर्वों में भी यथानुसार अपने निकटतम सहयोगी और मित्रों को बधाई अवश्य देनी चाहिए। तभी समाज और देश में पारस्परिक सौहार्द बनाये रखा जा सकता है।   

Friday, October 13, 2017

लेह से नुब्रा , विश्व के सबसे ऊंचे खरदुंगला पास से होकर , एक रोमांचक सफ़र ---


लेह में दो दिन के स्थानीय आवास और विश्राम के बाद आप पूर्णतया स्वस्थ और अभ्यस्त हो जाते हैं।  अगले दिन आप निकल पड़ते हैं दो दिन के नुब्रा वैली टूर पर।  नुब्रा वैली लेह से करीब १४० किलोमीटर दूर है जहाँ विश्व की सबसे ऊंची वाहन योग्य सड़क द्वारा खरदुंगला पास से होकर पहुंचा जा सकता है। सुबह नाश्ते के बाद ९ बजे चलकर आप २ या ३ बजे तक आराम से नुब्रा पहुँच सकते हैं। 



लेह से खररदुंगला पास की दूरी ३९ किलोमीटर है जो एक ही पहाड़ पर चलकर आता है। यहाँ तक का रास्ता आसान ही है , हालाँकि जगह जगह सड़क को चौड़ा करने का काम चल रहा था , लेकिन ड्राइव करने में कोई विशेष दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ रहा था। हमारे साथ तो ड्राइवर था लेकिन बहुत से लोग अपनी गाड़ी द्वारा भी लेह घूमने आते हैं।  फोटो में दूर लेह वैली नज़र आ रही है और पृष्ठभूमि में बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियां जो कोणकरम पर्वतमाला है।   





खरदुंगला पास से ठीक पहले ये पहाड़ दूर से ही नज़र आ रहे थे लेकिन पास से इनकी खूबसूरती और भी निखर आई।




पास के पार बर्फ और भी ज्यादा थी। ज़ाहिर है , यह बची खुची बर्फ ही थी जो अभी तक पिघली नहीं थी।  सर्दियों में तो सारा ही पहाड़ बर्फ से ढका रहता है और बर्फ को काटकर रास्ता बनाना पड़ता है। यह काम सेना करती है।   





खारदुंगला पास की ऊँचाई १८३८० फ़ीट है और यह विश्व का सबसे ऊंचा स्थान है जहाँ वाहन योग्य सड़क है। इस स्थान पर फोटो खिंचवाने के लिए लाइन में लगना पड़ता है। लेकिन निश्चित ही यह भी एक उपलब्धि ही लगती है। 




बीच में सड़क और चारों ओर छोटी छोटी पहाड़ियां देखकर नहीं लगता कि हम इतनी ऊँचाई पर हैं जहाँ ठण्ड और ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से कई लोगों को उल्टी आ जाती है। खरदुंगला पास की मन में कुछ ऐसी तस्वीर थी कि कोई बहुत संकरा सा बर्फ से ढका दुर्गम रास्ता होगा जिसे बड़ी मुश्किल से ही पार कर पाते होंगे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि अभी तक हमने रोहतांग पास ही देखा था जहाँ गर्मियों में भी बर्फ के बीच से संकरी सी सड़क से होकर जाना पड़ता है।  लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं था , बल्कि लग ही नहीं रहा था कि हम इतनी ऊँचाई पर खड़े हैं।  बस हवा की रफ़्तार कुछ ज्यादा थी जो चेहरे को चीरती हुई जा रही थी। 





ठन्डे मौसम में सकूं देते हैं यहाँ बने कई ढाबे जहाँ गर्मागर्म चाय और कॉफी पीकर तन और मन को गरमाहट मिलती है।  पास को पार करने पर ढलान शुरू हो जाती है।




पास के बाद सड़क बिलकुल नई बनाई गई थी और मक्खन मलाई जैसी लग रही थी। निरंतर ढलान के साथ यहां आपके साथ जलधारा भी बहने लगती है जो कि बर्फीले पहाड़ों से निरंतर पिघलती बर्फ से बनती है।  कुछ दूर जाने पर खरदुंग गांव आता है जो इस दिशा में नुब्रा वैली का पहला गांव है।  चारों ओर सूखे , नंगे , भूरे रंग के पहाड़ों के बीच में हरा भरा गांव देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।  गांव को पार करने के बाद जो पहाड़ दिखाई देते हैं उनको देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी चित्रकार ने कैनवास पर खूबसूरत चित्रकारी की हो। यहाँ पहाड़ों पर पत्थर नज़र नहीं आते।  ऐसा लगता है मानो सारा पहाड़ एक ही पत्थर से बना है।  उनकी सतह भी एकदम साफ और चिकनी सी नज़र आती है।  लेकिन पूरे पहाड़ पर सैंकड़ों हज़ारों नालियां सी नज़र आती हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने कुल्हाड़ी से काटकर बनाया हो।  यह बर्फ के पिघलकर बहने के कारण होता है जो सदियों से होता चला आया होगा।  पानी की काट ही ऐसी होती है कि पत्थर को भी काटकर आकार दे देती है। 





खरदुंग गांव के बाद जल्दी ही आप पहुँच जाते हैं श्योक नदी के पास जिसके साथ साथ चलते हुए हम आ जाते हैं नुब्रा वैली के अंदर। यहाँ नदी के दो भाग हो जाते हैं।  एक नदी नुब्रा कहलाती है और दूसरी श्योक नदी। अब हम श्योक नदी के साथ साथ आगे बढ़ते हुए अंतत : पहुँच जाते हैं दिस्कित गांव जहाँ हमारा कैम्प है।   



दोनों नदियों के संगम के पास काफी चौड़ा पाट है जो रेतीला समतल स्थान है।  यहाँ वापसी में हमने डेजर्ट स्कूटर चलाने का भी आनंद लिया।  यहाँ दो गांव हैं , पहला दिस्कित और दूसरा करीब १० किलोमीटर दूर हुन्डर गांव। नुब्रा में रात में रुकने के लिए बहुत से कैम्प लगाए गए हैं जो ज्यादातर इन्ही दो गांवों में पड़ते हैं।  इन कैम्पों में टेंट में रहने की सुविधा होती है जिसमे सभी आवशयक सुविधाएँ जुटाई गई हैं।  नहाने के लिए गर्म पानी और टॉयलेट के साथ डबल बैड और बरामदा जिसमे बैठ कर आप प्रकृति को निहार सकते हैं। खाने के लिए डाइनिंग रूम जिसमे स्वादिष्ट बुफे आयोजित किया जाता है।  यहाँ आपके आराम का पूरा ख्याल रखा जाता है। 



कैम्प के चारों ओर के पहाड़ बहुत खूबसूरत दिखाई देते हैं और धूप छाँव का अद्भुत मिश्रण सुबह मन मोह लेता है। कैम्प को भी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में बनाया सजाया गया है। 




शाम के समय हुन्डर गांव में जाकर सूर्यास्त के समय ऊँट की सवारी बहुत दिलकश लगती है।  यहाँ दो कूबड़ वाले ऊँट होते हैं जिनपर बैठना बड़ा आनंददायक लगता है।




ऊँट पर बैठकर ऊंटों का काफिला चल देता है सैंड ड्यून्स की ओर। २०० रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से  करीब १५ मिनट की डेजर्ट सफ़ारी कोई घाटे का सौदा नहीं है। लेकिन टोकन नंबर का कोई विशेष महत्त्व नहीं रहता , लोग बिना नंबर के भी घुस जाते हैं और यदि आपने ध्यान नहीं दिया तो आप खड़े ही रह जायेंगे और बाद में आने वाले आपसे पहले सवारी कर चुके होंगे।  इसलिए अपने नंबर के लिए सतर्क रहना ज़रूरी है। 





दिस्कित गांव अपने आप में एक छोटा सा शहर है।  यहाँ दुकानें , पोस्ट ऑफिस , अस्पताल , विधालय, बिजली , पानी ,टेलिफ़ोन और इंटरनेट आदि सभी आम नागरिक सुविधाएँ हैं। सुदूर पहाड़ों में ये सभी सुविधाएँ देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता होती है। सुबह वापसी में हम जाते हैं गांव के पास ही एक पहाड़ी पर बने इस ५०० वर्ष गोम्पा को देखने जहाँ सैंकड़ों मोंक्स भी रहते हैं।  यहाँ से घाटी का नज़ारा बेहद सुन्दर दिखाई देता है। 





गोम्पा के साथ ही है ये मोनास्ट्री जो थिकसे मोनास्ट्री का ही भाग है।




ये चार पहियों वाला स्कूटर वास्तव में बड़ा मज़ेदार लगा।  इसको चलाने के लिए बस एक लीवर है जिसे दबाते ही यह दौड़ने लगता है।  उसी से स्पीड कंट्रोल कर सकते हैं और छोड़ने पर यह रुक जाता है। गाइड ने साथ बैठकर जो एक टीले से नीचे डाइव करवाया तो ऐसा लगा जैसे सैंकड़ों फ़ीट से नीचे कूद गए हों।  एक तरह से यह रेगिस्तान का राफ्टिंग जैसा है। 




नुब्रा से सुबह ९ बजे चलकर आप २ बजे तक लेह पहुँच जाते हैं।  लंच के बाद आराम करने के बाद शाम को लेह बाजार के साथ ही बना लेह पैलेस पैदल ही पहुंचा जा सकता है , हालाँकि गाड़ी से जाने के लिए सड़क भी बनी है। लेह पैलेस लकड़ी और मिटटी से बना हुआ है और नौ मंज़िला है।  यहाँ से एक ओर पूरा लेह शहर नज़र आता है। 




वहीँ दूसरी ओर लेह घाटी और इसमें बने नए बहुमंज़िला होटल्स दिखाई देते हैं।  यह क्षेत्र नया लेह है।





लेह पैलेस की आठवीं मंज़िल तक जाया जा सकता है।  पीछे एक पहाड़ी पर बनी एक और मोनास्ट्री शाम के समय बहुत सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती है।  सूरज ढलने के साथ ही हम नीचे उतर आते हैं बाजार की ओर , हालाँकि रास्ता बड़ा टेढ़ा मेढा और कई जगह संकरा भी है लेकिन पैदल के लिए सही है , बशर्ते कि आपके घुटने सही सलामत हैं।



Tuesday, October 10, 2017

अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं ---

दो सत्य लघु कथाएं :   
१ )
कॉलेज के दिनों में हमें भी धूम्रपान की आदत लग गई थी। दिसंबर १९८३ में मारुती गाड़ियां आने के बाद दिल्ली में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।  १९९० में जब हमारी पहली गाड़ी मारुती ८०० आई तब तक दिल्ली में लगभग दस लाख वाहन हो चुके थे और उत्सर्जन पर कोई भी नियंत्रण न होने के कारण दिल्ली में लगातार बढ़ता हुआ वायु प्रदुषण चरम सीमा पर पहुँच गया था। तब न PUC होते थे और न ही गाड़ियों में उत्सर्जन मानक। ऐसे में अक्सर शाम के समय दिल्ली के मुख्य चौराहों पर धुंए का बादल सा छा जाता था।  ऐसे ही एक दिन जब हमने दिल्ली के सबसे ज्यादा व्यस्त चौराहों  में से एक ITO पर रैड लाइट होने पर स्कूटर रोका तो देखा कि धुआं इतना ज्यादा था कि अपनी ही साँस कड़वी सी लग रही थी।  तभी हमने देखा कि एक और स्कूटरवाला आकर रुका और रुकते ही उसने तुरंत जेब से निकाल कर सिगरेट जलाई।  यह देखकर हमें लगा कि यह कैसा बंदा है , बाहर का धुआं कम था जो यह सिगरेट का धुआं भी फेफड़ों में भर रहा है ! तभी हमें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और उसके बाद हमने फिर कभी धूम्रपान नहीं किया।  अभी इतवार को जब हमने अपना PFT कराया तो बिलकुल नॉर्मल निकला। 
२ )
एक बार गौतम बुद्ध कहीं जा रहे थे थे।  रास्ते में डाकू उंगलीमाल आ गया।  वह लोगों को लूट कर उनकी एक उंगली काट कर अपने गले में माला बनाकर पहनता था। जैसे ही उसने बुद्ध को देखा तो जोर से बोला -- ठहर जा।  बुद्ध ने कहा -- मैं तो ठहर गया , तू कब ठहरेगा ! अंत में जब गौतम बुद्ध ने उसे बात का मर्म समझाया तो वह सदा के लिए लूटपाट को छोड़कर शरीफ इंसान बन कर रहने लगा ।

आज दिल्ली में उस समय की दस गुना यानि करीब एक करोड़ गाड़ियाँ हैं।  कई कारणों से दिल्ली में प्रदुषण दशहरे के बाद ही बढ़ने लगता है।  इस भयंकर वायु प्रदुषण से बदलते मौसम में लाखों लोगों को स्वास रोग होने लगते हैं।  कृपया सिर्फ एक मिनट साँस रोककर देखिये कि आपको कैसा लगता है। हम जीवन भर साँस लेते रहते हैं लेकिन कभी उसका पता नहीं चलता।  जिसे दमा जैसी साँस की बीमारी होती है , उसे एक एक साँस के लिए न सिर्फ अथक प्रयास करना पड़ता है बल्कि घोर कष्ट भी उठाना पड़ता है।  स्वास रोग न जात पात देखता है , न धर्म। आपकी क्षणिक मिथ्या ख़ुशी दूसरों के लिए जीवन भर का रोग न बने , इतना प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं।       

Monday, October 9, 2017

लेह दर्शन -- दूसरा दिन :

लेह पहुँचने पर पहला दिन आराम करते हुए ही बिताना चाहिए ताकि आप अपने शरीर को जलवायु अनुसार ढाल सकें। इससे आपको ऊँचाई के कारण होने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। दूसरे दिन नाश्ते के बाद आप निकल पड़ते हैं लेह के स्थानीय स्थलों के दर्शन के लिए।



लेह शहर लेह घाटी में बसा हुआ है। इसके चारों ओर हलके भूरे रंग के नंगे पहाड़ दिखाई देते हैं।




लेकिन घाटी और शहर में हरियाली है। शहर में होटलों की बहुतायत है और हर बजट के लोगों के लिए यहाँ आवास उपलब्ध है। 




लेह बाज़ार :  यहाँ जितनी साफ़ सफाई नज़र आई , इतनी किसी और हिल स्टेशन पर कभी नहीं दिखी। बीच में पक्का फर्श और बैठने के लिए बेंच बने हैं जिसके दोनों ओर दुकानों की कतारें हैं जिनमे लगभग हर तरह का सामान मिलता है।  हालाँकि सारा सामान श्रीनगर या दिल्ली आदि से ही आता है। इसलिए सामान्य से ज़रा ज्यादा दाम पर ही मिलेगा। यहीं पर एक गुरुद्वारा , मस्जिद , पोस्ट ऑफिस , बैंक और पर्यटन सूचना केंद्र भी हैं।   



पहले दिन के टूर के आरम्भ में सबसे पहले आप पहुंचते हैं , लेह श्रीनगर राजमार्ग पर बने सेना द्वारा नियंत्रित 'हॉल ऑफ़ फेम' जो वास्तव में इस क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों का स्मृति स्थल है।  यहाँ एक म्यूजियम है जहाँ सेना की चौकसी से सम्बंधित सभी उपकरण प्रदर्शित किये गए हैं और ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण दिया गया है।




बाहर खुले अहाते में शहीद स्मारक और शहीदों की याद में पत्थर भी लगाए गए हैं। आप स्वयं ही शहीदों की याद में नतमस्तक हो जाते हैं। यहाँ ८० रूपये का एंट्री टिकट है।



चारों और खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा यह स्थल बेहद मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।





लेह से २५ मील दूर इसी हाइवे पर बना है गुरुद्वारा पत्थर साहब।  कहते हैं यहाँ गुरु नानक जी ने तपस्या की थी लेकिन एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। एक बार उसने एक बहुत बड़ा पत्थर लुढ़का कर नानक जी को मारने का प्रयास किया लेकिन उनके प्रताप से पत्थर पिघल कर मोम जैसा नर्म हो गया। राक्षस ने जब पैर मारा तो उसका पैर पत्थर में धंस गया जो आज भी वहां मौजूद है।   




यहाँ से थोड़ा सा आगे जाने पर एक जगह आती है जिसे मेग्नेटिक हिल कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ सड़क पर एक सुनिश्चित जगह पर गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी करने पर वह अपने आप ऊपर की ओर चलने लगती है।  हालाँकि ऐसा लगा नहीं क्योंकि उस स्थान के दोनों ओर ढलान नज़र आ रही थी और गाड़ियां भी स्थिर ही थीं। 





आगे जाकर सैम वैली के रास्ते में आता है जंस्कार और इंडस ( इन्दु ) नदियों का संगम जो ऊँचाई से बहुत खूबसूरत दिखाई देता है। यहाँ राफ्टिंग भी कराई जाती है और चाय पानी का इंतज़ाम है। 





वापसी में लेह एयरपोर्ट के पास है स्पितुक मोनास्ट्री जिसकी ऊँचाई से चारों घाटी और पहाड़ों का अद्भुत दृश्य नज़र आता है।  यहीं पर काली माता का मंदिर भी है जिसमे लोग तेल की बोतल , जूस आदि चढ़ाते हैं।  हालाँकि यहाँ कोई पंडित या संरक्षक नज़र नहीं आया। तेल की बोतलों के भंडार देखकर बड़ा अजीब लगा लेकिन स्थानीय लोगों की मान्यताओं के आगे नतमस्तक होना ही पड़ता है।   सामने लेह एयरपोर्ट नज़र आ रहा है।




दोपहर तक वापस आकर होटल में खाना खाकर धूप में बैठने का भी अपना ही आनंद था।



शाम के समय सूर्यास्त से पहले ८ किलोमीटर की दूरी पर एक पहाड़ी पर बने स्पितुक गोम्पा अवश्य जाना चाहिए।  यहाँ से चारों ओर की पहाड़ियों पर पड़ती सूर्य की किरणें और उनसे बदलता रंग बेहद खूबसूरत लगता है।  साथ ही इंडस रिवर और घाटी की हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।

इसके अलावा लेह बाजार के छोर पर बस्ती की गलियों से होकर एक रास्ता जाता है लेह पैलेस के लिए जो एक ऊंची पहाड़ी पर बना ९ मंज़िला भवन है जिसे लकड़ी से बनाया गया है और दीवारों पर मिटटी का लेप है।  यहाँ से भी घाटी का दृश्य बहुत सुन्दर और मनभावन होता है। रात में स्वादिष्ट खाने के बाद आराम कर हम तैयार हो जाते हैं नुब्रा वैली के लिए प्रस्थान करने के लिए। 



Thursday, October 5, 2017

एक अलग सा अनुभव -- लेह लद्दाख यात्रा ---






देश भ्रमण में पर्वतीय भ्रमण सर्वोत्तम होता है क्योंकि पहाड़ों की शुद्ध और ताज़ा हवा हमारे तन और मन को तरो ताज़गी से भर देती है। दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में रहने वालों के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वर्ष में एक या दो बार पहाड़ों की सैर पर निकल जाएँ ताकि फेफड़ों को कुछ राहत मिल सके। हमारे देश में जहाँ सभी पर्वतीय भ्रमण स्थल लगभग एक जैसे हरे भरे लेकिन कम ऊँचाई पर हैं , वहीँ एकमात्र लद्दाख क्षेत्र ऐसा पर्वतीय स्थल है जहाँ पहाड़ एकदम सूखे , नंगे , वृक्षरहित और ऊंचे हैं। इसीलिए लद्दाख के दुर्गम लेह शहर में हर वर्ष लाखों सैलानी यात्रा करने जाते हैं और कई तरह की कठिनाइयां उठाते हुए भी आनंदित महसूस करते हैं। 

लेह जाने के लिए सबसे बढ़िया मौसम मई जून से लेकर मध्य अक्टूबर तक रहता है।  इसके बाद बर्फ़बारी और सर्दियाँ बहुत बढ़ जाती हैं और लगभग सभी होटल्स और अन्य सुविधाएँ बंद हो जाती हैं। यहाँ जाने के लिए दो रास्ते हैं -- हवाई यात्रा या सड़क द्वारा।  सड़क से दो जगहों से जाया जा सकता है -- एक मनाली से और दूसरा श्रीनगर से।  दोनों ही दशाओं में एक रात रास्ते में रुकना पड़ता है।  लेकिन हवाई ज़हाज़ से मात्र सवा घंटे में लेह पहुँच जाते हैं। सड़क द्वारा यात्रा का एक लाभ यह रहता है कि आप रास्ते भर एक से एक सुन्दर पहाड़ और घाटियां देख पाते हैं जबकि हवाई यात्रा में आपको आसमान से बर्फ से ढके पहाड़ अपनी पूरी सुंदरता में दिखाई देते हैं। इसलिए सबसे बढ़िया है कि आप सड़क द्वारा जाएँ और हवाई ज़हाज़ से वापस आएं। इससे आपको जलवायु-अनुकूलन में भी सहायता मिलेगी और पर्वत दर्शन भी बेहतर होगा। 

लेह शहर की ऊँचाई ११००० -१२००० फुट के करीब है।  यानि यह आम हिल स्टेशंस की अपेक्षा दुगनी ऊँचाई पर है। इसलिए यहाँ जाने से पहले कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना पड़ता है। यहाँ सबसे ज्यादा कठिनाई होती है ऊँचाई के कारण होने वाली ऑक्सीजन की कमी। ऑक्सीजन की कमी के कारण आप भयंकर रूप से बीमार पड़ सकते हैं और कभी कभी तो यह जानलेवा भी हो सकता है।  इसे हाई ऑल्टीट्यूड सिकनेस कहते हैं।  यह तीन प्रकार से हो सकती है :
१ )   हाई ऑल्टीट्यूड सिकनेस -- यह आम तौर पर बहुत से लोगों को पहाड़ों पर जाने से हो जाता है।  इसमें लक्षण हलके ही होते हैं जैसे सर दर्द होना , जी मिचलाना , उलटी , भूख न लगना और नींद न आना। अक्सर यह एक दिन में ठीक भी हो जाता है।
२ ) पल्मोनेरी इडीमा ( pulmonary edema ) -- इसमें ऑक्सीजन की कमी के कारण साँस फूलने लगता है और साँस लेने में कठिनाई भी हो सकती है। यह फेफड़ों में पानी भरने के कारण होता है।  इसलिए ऑक्सीजन की कमी होते ही तुरंत कृत्रिम ऑक्सीजन साँस के साथ लेना आवशयक हो जाता है।  इसके लिए सभी होटलों में ऑक्सीजन सिलेंडर मिलते हैं।  लेकिन ज्यादा होने पर अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ सकता है जहाँ हाइपरबारिक ऑक्सीजन से इलाज किया जाता है। कभी कभी आराम न होने पर हेलीकॉप्टर द्वारा ऐसे रोगी को निचले क्षेत्र में भी भेजना पड़ जाता है।  इसके लिए सेना की सहायता लेनी पड़ती है लेकिन कम ऊँचाई पर आते ही यह रोग स्वत: ठीक हो जाता है। हालाँकि आपका घूमने का प्रोग्राम तो खराब हो ही जाता है।
३ ) सेरिब्रल इडिमा ( cerebral edema ) -- यह सबसे खतरनाक हालात होती है।  इसमें व्यक्ति को दिमाग में सूजन आने से बेहोशी होने लगती है और एक बार बेहोश हुए तो करीब ५० % लोगों को दोबरा होश नहीं आता। इसलिए तुरंत चिकित्सीय सहायता से दिमाग की सूजन को ठीक करने का प्रयास करना पड़ता है।      

ऑक्सीजन की कमी से बचने के उपाय :
* यदि संभव हो तो आप सड़क यात्रा करते हुए लेह जाएँ।  इससे आपको जलवायु का अभ्यस्त होने में सहायता मिलेगी।
* diamox २५० mg की एक गोली सुबह शाम यात्रा से दो दिन पहले शुरू कर दें और २-३ दिन बाद तक और खाएं। इससे इस रोग के लक्षण काफी हद तक नियंत्रण में रहते हैं। हालाँकि यह कैसे काम करती है , यह साफ़ नहीं है।  लेकिन निश्चित ही प्रभावशाली है। 
* लेह पहुँच कर पहले दिन सिर्फ आराम करें और कोई भी थकाने वाला काम न करें।
* पानी पीते रहें लेकिन बहुत ज्यादा भी न पीयें।
* उचित मात्रा में खाना भी अवश्य खाएं , हालाँकि आपको भूख का अहसास नहीं होगा।
* सिगरेट , शराब आदि का सेवन बिलकुल न करें।
ऐसा करने से आने वाले दिनों में आप स्वस्थ रहेंगे और लेह दर्शन का भरपूर आनंद उठा पाएंगे।

लेह में सुविधाएँ :

लेह पहुंचकर भले भी आपको सब कुछ सूखा सूखा सा लगे लेकिन यहाँ शहर में सब सुख सुविधाएँ उचित दाम पर उपलब्ध हैं।  अच्छे साफ सुथरे होटल्स , उत्तर भारतीय स्वादिष्ट खाना , नहाने के लिए प्रचुर मात्रा में गर्म पानी और मार्किट में सभी वस्तुएं मिल जाती हैं।  यहाँ के लोग मूलत: बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और बहुत शांतिप्रिय हैं। प्रसन्नचित्त , सहयतापरक और ईमानदार लोगों से आपको कोई कठिनाई महसूस नहीं होगी। अधिकांश अच्छे होटल्स पुराने लेह रोड पर बने हैं जो मेन बाजार के बहुत करीब हैं जहाँ आप शाम के समय अच्छा समय बिता सकते हैं।

लेह लद्दाख दर्शन अगली पोस्ट्स में।