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Monday, January 30, 2017

प्रकृति सबसे बड़ा डॉक्टर है ---



चिकित्सा के क्षेत्र में अक्सर कहा जाता है -- we treat , he cures . यानि डॉक्टर्स का कहना होता है कि हम सिर्फ इलाज़ करते हैं , रोगी को ठीक तो वो ऊपरवाला ही करता है। यह सच है कि एक डॉक्टर केवल इलाज़ कर के एक सीमा तक ही स्वास्थ्य लाभ में रोगी की सहायता कर सकता है। इसलिए डॉक्टर भगवान नहीं होता। वह किसी को निश्चित अवधि के बाद सांसें नहीं दे सकता। यह सब कुछ प्रकृति या भगवान के हाथ में है।

लेकिन चिकित्सा के मामले में कई ऐसी स्थितियां और परिस्थितियां भी होती हैं जहाँ डॉक्टर उपचार करने का प्रयास कर सकता है और सफल भी हो जाता है।  परंतु यदि डॉक्टर द्वारा इलाज़ न भी किया जाये , तो भी प्रकृति स्वयं ही रोग को ठीक कर देती है। यह हमारे लिए प्रकृति की देन है।  आइये , जानते हैं ऐसी ही शारीरिक समस्याओं में बारे में जब बिना इलाज़ के भी हम ठीक हो सकते हैं :

१ )  दस्त या आंत्रशोध : दस्त यानि डायरिया एक ऐसा रोग है जो रोग न होकर आंत्र संक्रमण के विरुद्ध शरीर की एक प्रतिक्रिया है।  यानि जब भी आँतों में कोई बाहरी संक्रमण होता है तो हमारी आंतें उस संक्रमण को बाहर धकेल कर उससे छुटकारा पाने का प्रयास करती हैं।  इस प्रक्रिया में शरीर का कुछ पानी और साल्ट्स का ह्रास अवश्य होता है , जिसे हम डायरिया या दस्त कहते हैं।

दस्तों का न कोई उपचार है , न ही अक्सर कोई आवश्यकता होती है। संक्रमण निष्काषित होने पर यह स्वतः ही ठीक हो जाता है।  इसलिए दस्तों में दवा देने की कोई ज़रुरत नहीं होती।  केवल पानी और साल्ट की कमी को पूरा करने के लिए ORS की आवश्यकता होती है।

२ ) वायरल फीवर : वायरस के संक्रमण से होने वाला बुखार सेल्फ लिमिटिंग होता है।  यानि यह आम तौर पर १ से ७ दिन अपने आप ठीक हो जाता है।  इसलिए इसके इलाज़ में किसी विशेष दवा की आवश्यकता नहीं होती।

बस तापमान को कम रखने के लिए पैरासिटामोल की गोली ही काफी है।  

३ )  Chalazion : यह एक मेडिकल टर्म है।  यह वास्तव में आँखों की पलकों में एक गाँठ के रूप में दिखाई देती है। इसकी शुरुआत होती है पलक में मौजूद मीबोमिअन ग्लैंड ( तेल ग्रंथि ) में संक्रमण होने से।  अक्सर ऐसा आँखों पर गंदे हाथ लगने से होता है। शुरू में ग्रंथि में सूजन और तेज दर्द होता है।  इस अवस्था में एंटीबायोटिक्स से इसे ठीक किया जा सकता है।  लेकिन एक बार पुराना हो गया तो तेल ग्रंथि में रुकावट होने से एक गांठ बन जाती है जिसमे न दर्द होता है , न ही कोई और तक़लीफ़।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है।  इसलिए रोगी डॉक्टर के पास जाता है।

अक्सर डॉक्टर इसका ऑप्रेशन करने की सलाह देते हैं। क्योंकि इस पर एंटीबायोटिक्स का कोई प्रभाव नहीं होता।

लेकिन इस दशा में किसी उपचार की ज़रुरत नहीं होती। बस साफ रुई को गर्म  पानी में डुबोकर दिन में कई बार इसकी सिकाई करें , कुछ ही दिनों में यह गांठ गायब हो जाएगी। बिलकुल चमत्कारिक ढंग से।

४ ) Ganglion  :  यह भी एक गांठ जैसी ही होती है जो अक्सर हाथ पर या हथेली के जोड़ के पास बन जाती है।  इसमें भी कोई दर्द नहीं होता।  न ही इससे कोई हानि होती है।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है या कभी कभी चोट आदि लगने से परेशानी हो सकती है।

डॉक्टर इसके इलाज़ के लिए या तो सिरिंज से इसका पानी निकाल कर पट्टी बाँध देंगे या ऑप्रेशन द्वारा काट कर निकाल देंगे। अक्सर इसमें स्टीरॉयड्स का इंजेक्शन लगाकर भी इलाज़ किया जाता है।  लेकिन इन सबके बाद भी दोबारा होने की सम्भावना काफी ज्यादा रहती है।

लेकिन यदि इसमें कोई दर्द नहीं है और डॉक्टर ने इसे गैंगलिओन ही बताया है तो चिंता की कोई बात नहीं है।  क्योंकि अक्सर यह कुछ समय के बाद स्वयं ही पिघल जाती है और अचानक गायब हो जाती है।  प्रकृति का एक और चमत्कार।

५ )  मस्से ( warts ) : अक्सर हाथों पर या चेहरे पर बन जाते हैं। अक्सर इनमे कोई दर्द नहीं होता लेकिन देखने में भद्दे लगते हैं।  ये भी एक वायरल संक्रमण के कारण होते हैं।  

डॉक्टर इन्हें तरह तरह से ठीक करते हैं लेकिन यदि इलाज़ नहीं भी किया जाये तो कुछ ही दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं।  अक्सर पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स दर्द करते है और चलना मुश्किल कर देते हैं।  कई बार इनका ऑप्रेशन करना पड़ सकता है।

यदि दर्द नहीं है तो कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।  कुछ समय बाद ये स्वयं ठीक हो जायेंगे। पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स होमिओपैथी के इलाज़ से जल्दी ठीक हो जाते हैं।

इस तरह प्रकृति रोगों से स्वयं ही हमारा बचाव करती है।  लेकिन इसके लिए एक बार डॉक्टर से परामर्श कर यह सुनिश्चित अवश्य करा लें कि रोग का निदान सही है।  यदि निदान गलत हुआ तो बहुत हानि भी हो सकती है क्योंकि किसी भी रोग का इलाज़ यदि जल्दी किया जाये तो ठीक होने की सम्भावना ज्यादा रहती है।  इसलिए सेल्फ ट्रीटमेंट कभी नहीं करना करना चाहिए।  जो भी करें , डॉक्टर की देख रेख में ही करें ।  

Wednesday, November 18, 2015

डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।

प्रस्तुत हैं , डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी  हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।  

१)
अय डाक्टर , चल दवा लिख !
झूठा बिल , फर्ज़ी मेडिकल बना ! 
पी एम रिपोर्ट बदल ,
अजन्मी बेटी का गला दबा ! 
अपनी फीस ले ,
अय डाक्टर , चल झूठा बिल बना ! 

२) 

मैं चाहे ये खाऊँ , मैं चाहे वो खाऊँ 
मैं चाहे जिम छोडूं ,
मैं चाहे दारू के अड्डे पे जाऊं , 
चाहे वेट बढ़े , चाहे पेट बढ़े ,
डाक्टर को दिखाऊँ ना दिखाऊँ , 
मेरी मर्ज़ी ! 

३)

अस्पताल मे 
छोड़ गया बेटा , मुझे 
हाय अकेला छोड़ गया ! 
सब देखते रहे तमाशा ,
मैं सड़क पे घायल ,
पड़ा पड़ा दम तोड़ गया ! 

४)

तू मेरा ईश्वर है , 
तू मेरा रक्षक है ! 
पर फीस मांगी तो  
तू पूरा भक्षक है ! 

५) 

होटल मे टिप् दे देंगे पूरे एक हज़ार , 
जुए मे हम भले ही हज़ारों जाएं हार , 
पर दो चार दिन गर पड़ जाएं बीमार,
तो तो तो तेरी तो ,
अय डाक्टर , चल दवा खिला ,
इंजेक्शन लगा , पर बिल ना बना ! 





Monday, August 17, 2015

वृक्ष और डॉक्टर -- इनकी सुरक्षा में ही सब की सुरक्षा है ।


जिसकी मज़बूत जड़ें जुड़ी हों ज़मीन से ,
उस दरख़्त की डाल पर
जब कोई लटकता है , या झूला झूलता है ,
तो वो झुकती नहीं !
तनी रहती हैं सीना तान कर , टूटती नहीं।

उसी डाल की डालियों से फल तोड़ने ,
जब कोई डालियों को झुकाता है ,
तब वो झुक जाती हैं आसानी से , अड़ती नहीं।
फलों के बोझ से मुक्त हो फिर हो जाती सीधी ,
फिर से फलने फूलने के लिए, नई कोपलों के साथ !
थके हारे मुसाफिरों को छाँव देने की खातिर।

लेकिन जब इंसान खोद देता है उसकी जड़ें ,
या घोट देता है तने का गला, कंक्रीट के फंदे से।
वो तड़पने लगता है , इक इक साँस के लिए ,
और खोजने लगता है , जिंदगी के नए आयाम।
कभी कभी दम घुटने से ,  दम ही तोड़ देता है।

नादां इंसां नहीं समझता कि इसी की जिंदगी में ,
बसी है उसकी भी जिंदगी ही।
नहीं जानता कि दूसरों की जड़ें खोदने वालों की
अपनी जड़ें भी हो जाती हैं खोखली।
नहीं समझता कि जिंदगी लेने से नहीं ,
जिंदगी देने से ही मिलती है जिंदगी।

एक डॉक्टर भी होता है वृक्ष जैसा ही,
वो सहारा देता है दर्द और तक़लीफ़ में।
खुद झुकता है अपने स्पर्श से ,
रोगी के दर्द निवारण के लिए ।
जागता है सारी रात , मरीज़ को सुलाने की खातिर।
फिर हाज़िर होता है सुबह रोगी के जागने से पहले।

फिर भी जाने क्यों , ये शेखचिल्ली,
उसी डाल पर आरा चलाते हैं।
जिस पर बैठ वो खाते पीते सोते हैं ,
नादाँ ये भी नहीं समझते कि
उसी से तो नई जिंदगी पाते हैं।
जीवन दाता का जीवन लेना क्या अच्छा है !
कोई तो उन्हें समझाए कि,
इनकी सुरक्षा में ही तो उनकी सुरक्षा है ।


Tuesday, January 13, 2015

ज्यादा बोलने की आदत तो हमे है नहीं ...


एक दिन एक महिला बोली ,

डॉक्टर साहब , मेहरबानी कीजिये ,
और कोई अच्छी सी दवा दीजिये ! 

मेरे पति रात मे बहुत बड़बड़ाते हैं ! 
लेकिन वो क्या बोलते हैं, हम समझ नहीं पाते हैं ! 

हमने दवा लिख कर कहा, यदि आप ये दवा सुबह शाम लेंगे, 
तो आपके पति अवश्य ही नींद मे बड़बड़ाना बंद कर देंगे ! 

वो बोली नहीं डॉक्टर साहब , आप फीस भले ही दुगना कर दें ,
लेकिन दवा ऐसी दीजिये कि वो साफ साफ बोलना शुरू कर दें !

उनके बड़बड़ाने से हम बिल्कुल भी नहीं घबराते हैं ,
लेकिन पता तो चले कि वे नींद मे किस को बुलाते हैं ! 

हमने कहा बहन जी , हमारी दुआ उनके लिये है , 
लेकिन ये दवा उनके लिये नहीं, आपके लिये है ! 

हम आपके पति का हौसला बिना दवा के ही बुलंद कर देंगे , 
आप उन्हे दिन मे बोलने दें , वे रात मे बड़बड़ाना खुद ही बंद कर देंगे ! 

Sunday, April 6, 2014

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता -- भूली बिसरी यादें ...


तब हम नए नए डॉक्टर बने थे . ऊर्जा , जोश और ज़वानी के उत्साह से भरपूर दिल , दिमाग और शरीर मे जैसे विद्युत धारा सी प्रवाह करती थी . काम भी तत्परता से करते थे . सीखने की भी तमन्ना रहती थी . उन दिनों ६ महीने का पहला जॉब सर्जरी डिपार्टमेंट मे किया था . सप्ताह मे दो दिन ओ पी डी होती थी, दो दिन वार्ड मे काम और दो दिन ओ टी जाना होता था . ऐसी ही किसी एक ओ पी डी मे एक दिन एक युवा लड़की अपनी मां के साथ दिखाने आई . सांवली सलोनी सी , घबराई सी , उम्र यही कोई १८ वर्ष . सिख परिवार से थी . उसके एक स्तन मे गांठ थी जिसके उपचार के लिये आई थी . हमने उसे एग्जामिनेशन रूम मे जाकर स्तन दिखाने के लिये कहा तो वह रोने लगी . हालांकि साथ ही उसकी माँ भी खड़ी थी और एकांत का भी पूरा ध्यान रखा गया था , लेकिन लड़की थी कि कपड़े हटाने को तैयार ही नहीं थी . ऐसे मे किसी भी डॉक्टर को गुस्सा आ सकता था क्योंकि ओ पी डी मे भीड़ बहुत थी और एक एक मिनट कीमती था . 

लेकिन समझा बुझा कर आश्वस्त करने की पूरी कोशिश के बावज़ूद भी जब उसने रोना बंद नहीं किया तो हमे जाने क्यों उससे सहानुभूति सी हुई . हमने उसे वहीं रुकने के लिये कहा और बाहर आकर अपने सीनियर कन्सल्टेंट को सारी बात बताई और उनसे अनुरोध किया कि वो खुद लड़की को देख लें . सफेद बालों वाले कन्सल्टेंट लगभग बुजुर्ग से थे और शक्ल से भी शरीफ दिखते थे . उन्होने उसका मुआयना किया और उसे आपरेशन के लिये भर्ती कर लिया . आपरेशन सही सलामत हो गया और जैसा कि अनुमान था , कोई गंभीर रोग भी नहीं निकला 


लेकिन जाने क्या हुआ कि उसके बाद ना सिर्फ वो लड़की बल्कि उसका सारा परिवार हमारा भक्त सा बन गया . लड़की ने तो किसी और डॉक्टर को हाथ लगाने से भी मना कर दिया . अब उसकी सारी देखभाल हमे ही करनी पड़ रही थी . अन्तत : पूर्णतया ठीक होने पर उसे छुट्टी दे दी गई . लेकिन उसके बाद फॉलोअप मे वह हमारे पास ही आती रही और उसका पूरा परिवार भी आत्मीयता दिखाता रहा . ऐसा लगता था जैसे वे हमारे एक सामान्य से व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए थे . 

१३ अप्रैल १९८४ को हमारी शादी हो गई . फिर भी यदा कदा उनका आना जाना चलता रहा था हालांकि अब हम भी काम मे बहुत व्यस्त हो गए थे . फिर ३१ अक्टूबर १९८४ को सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए . उसके बाद उसकी और उनके परिवार की हमे कभी कोई खबर नहीं मिली . आज भी जब कभी याद आ जाती है तो उसका मासूम सा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है . राम जाने ---

Saturday, January 5, 2013

क्या हो बलात्कारियों की सज़ा -- फांसी का फंदा या डॉक्टर की सुई !


गाँव में अक्सर देखते थे कि कैसे गायों के बछड़ों को ज़वान होते ही पशु चिकित्सालय ले जाकर मेकेनिकल कासट्रेशन करा दिया जाता था। इस प्रक्रिया में बछड़े के अंडकोषों को एक मशीन से दबाकर क्रश कर दिया जाता था जिससे कुछ ही दिनों में अंडकोष सिकुड़ कर अट्रोफिक हो जाते थे। इसके बाद न बांस होता था , न बजती थी बांसुरी। यानि युवा बैल की न सिर्फ प्रजनन क्षमता ख़त्म हो जाती थी बल्कि उसकी यौन इच्छा भी ख़त्म हो जाती थी।  लेकिन उसकी शारीरिक ताकत पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़ने से , वह किसान के लिए खेती के काम में पूर्ण उपयोगी रहता था। 

आजकल दामिनी के बलात्कारियों को सज़ा देने के मुद्दे पर जम कर बहस हो रही है। जहाँ अधिकांश लोगों की पुकार है कि इन दरिंदों को फांसी की सज़ा होनी चाहिए , वहीँ केमिकल या फिजिकल कासट्रेशन की भी बात हो रही है। अमेरिका सहित कई देशों में बलात्कारियों के लिए इस सज़ा का प्रावधान है।  कासट्रेशन का मुख्य उद्देश्य दोषी को गाय के बछड़े की तरह यौन क्षमता से वंचित करना है ताकि वह भविष्य में यह कुकर्म न कर सके। लेकिन क्या यह सही है और इससे वांछित न्याय मिलने की सम्भावना है , इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। 

कासट्रेशन :

केमिकल कासट्रेशन में मनुष्य को एंटीएंड्रोजेनिक इंजेक्शन लगाये जाते हैं। ये इंजेक्शन एक डॉक्टर द्वारा लगाये जाते हैं जिनका असर तीन से छै महीने तक ही रहता है। यानि ये बार बार लगाने पड़ते हैं और जब तक लगाते  रहेंगे तब तक यह अपना असर दिखाते रहेंगे। इनके प्रभाव से मनुष्य के शरीर में टेस्टोस्टिरोंन हॉर्मोन की मात्रा कम हो जाती है। फलस्वरूप उसकी मर्दानी ताकत ख़त्म हो जाती है यानि वह सेक्स करने के काबिल नहीं रहता। न उसमे सेक्स की इच्छा रहती है और न ही क्षमता। चिकित्सा के क्षेत्र में इनका उपयोग ऐसे रोगियों में किया जाता है जिनकी यौन इच्छा अप्राकृतिक रूप से अत्यधिक होती है। ज़ाहिर है , यह रोगी द्वारा स्वयं उपचार कराने की इच्छा ज़ाहिर करने पर ही इस्तेमाल किया जाता है। इन दवाओं का विपरीत प्रभाव भी होता है जो काफी कष्टदायक हो सकता है। इनमे हड्डियों का कमज़ोर होना , हृदय रोग और महिलाओं जैसे शारीरिक परिवर्तन प्रमुख हैं। यह इलाज़ महंगा होता है। हालाँकि इंजेक्शन या गोलियों द्वारा किया गया कासट्रेशन रिवर्सिबल होता है। 

फिज़िकल कासट्रेशन में अंडकोषों को स्थायी तौर पर नष्ट करने से या सर्जिकलि काट देने से नामर्दी भी स्थायी होती है। इसलिए इसे सज़ा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि अपने देश में इसका इस्तेमाल शायद ही कभी किया गया हो। लेकिन अमेरिका और युरोपियन देशों में कैदियों को कभी कभी यह सज़ा सुनाई जाती है। 

क्या कासट्रेशन एक उपयुक्त तरीका है ? 

अक्सर बलात्कार में बिना रज़ामंदी के अवांछित सम्भोग ही नहीं होता बल्कि शारीरिक हिंसा, मार पीट, अपहरण और चोट आदि भी होते हैं। अपराध इन सभी श्रेणियों में भी होता है। इसलिए सज़ा भी कई काउंट्स पर दी जाती है। कासट्रेशन से यौन क्षमता तो ख़त्म हो जाती है लेकिन शारीरिक क्षमता में कोई कमी नहीं होती। ऐसा मनुष्य और भी खतरनाक हो सकता है। भले ही वह यौन सम्बन्ध न बना सके लेकिन शारीरिक तौर पर शक्तिशाली होने से हिंसा के लायक तो रहता ही है। अधिकांश बलात्कारी हिंसक और अपराधिक प्रवृति के होते हैं। ऐसे लोग यौन क्षमता के न रहते और भी हिंसक हो सकते हैं। इसीलिए कासट्रेशन सिर्फ लम्बी कैद की सज़ा प्राप्त कैदियों में ही किया जाता है। 

बलात्कार : 

महिलाओं के प्रति इससे ज्यादा जघन्य अपराध और कोई नहीं हो सकता। इसे निसंदेह रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। इसलिए इसकी सज़ा भी सख्त से सख्त होनी चाहिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि इस दुखद घटना के बाद भी दिल्ली में बलात्कार बेख़ौफ़ हो रहे हैं। इसलिए दामिनी के अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा देकर फांसी पर टांग देना चाहिए ताकि भावी बलात्कारियों को मौत का खौफ़ नज़र आए। आशा करते हैं कि सरकार जल्दी ही संविधान में आवश्यक परिवर्तन कर इस अमानवीय सामाजिक कुकृत्य से नागरिकों को सुरक्षित रखने की दिशा में तत्परता से कार्यवाही करेगी।  

Wednesday, December 5, 2012

लेडी हार्डिंग में ताऊ


मेडिकल कॉलेज में हमारे बैच में सिर्फ लड़के थे , लड़की एक भी नहीं थी. अक्सर हम सबको यह बेइंसाफी सी लगती. ऐसे में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज जो गर्ल्स कॉलेज था, हमारे बीच बहुत लोकप्रिय था. आज भी लेडी हार्डिंग का नाम आते ही सभी के चेहरे पर एक रौनक सी आ जाती है. प्रस्तुत है, इसी विषय पर एक हास्य कविता : 

एक हरियाणवी ताऊ का छोरा, जब टॉप कर गया
रिजल्ट देख कर ताऊ का दिल,  गर्व से भर गया .

उसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिन याद गए
जो दिल के सोए बरसों पुराने अरमान जगा गए .

बोला , अब तो काली कम्बली वाले को भेंट चढाऊंगा ,
और सोच लिया , छोरे को लेडी हार्डिंग में ही पढ़ाऊंगा .

ताऊ ने अपनी हीरो साईकलएल एच की ओर दौड़ाई .
परन्तु गेट पर ही एक सुन्दर सी कन्या से जा टकराई .

लड़की ने अपनी बिखरी किताबें टटोली 
फिर शरमाई सकुचाई सी धीरे से बोली .

ताऊ गेट देख कर नहीं पार सकते थे
कम से कम एक घंटी तो मार सकते थे .

ताऊ बोला सॉरी ,पर छोरी ईब के तेरी आरती उतारूँ .
अरै बावली, पूरी साइकिल मार दी, ईब घंटी अलग तै मारु .

लड़की यूँ तो लेडी हार्डिंग की छात्रा थी
पर वो भी पूरी हरियाणवी पात्रा थी .

बोली, शर्म नहीं आती बुड्ढे, कब्र में लटके हैं पैर,   
और करने चले हैं साईकल पर सी पी की सैर.

ताऊ बोला, दो चार को तो अब भी चक्कर दे सकता हूँ .
मैं तो मल्लिका सहरावत से भी टक्कर ले सकता हूँ .

रिसेप्शन पर जाकर बोला, ये फॉर्म भरवाना है
लड़के को एम् बी बी एस में दाखिल करवाना है .

रिसेप्शनिस्ट बोली ताऊ ये फॉर्म नहीं भर सकते
ये तो गर्ल्स कॉलेज है ,यहाँ लड़के नहीं पढ़ सकते.

ताऊ बोला -- 
जब यु सी एम् एस में लड़कियां पढ़ सकती हैं
तो फिर एल एच में लड़कों पर क्यों सख्ती है .

माना के म्हारे हरियाणे में लड़कियों का अभाव है
लेकिन यहाँ तो सरासर लड़कों के साथ भेद भाव है .

अब तो मैं 52 गावों के खाप की पंचायत बुलाऊंगा
और यहीं खटोला बिछाकर अन्ना सा धरना लगाऊंगा .

लड़की ने समझाया , ताऊ
लड़के को यु सी एम् एस में भर्ती करा दे ,उसका भी बहुत नाम है .
हॉस्टल , केन्टीन , प्लेग्राउंड, लाइब्रेरी, सबका बढ़िया इंतजाम है .

ताऊ बोला पता है बेटी , वहां पढाई तो अच्छी करवाते हैं
लेकिन दीक्षांत समारोह अभी भी, उधार की जगह करवाते हैं .

आखिर ताऊ ने छोरा यु सी एम् एस में भर्ती करवाया
लेकिन जाते जाते छोरे को अच्छी तरह से समझाया .

बेटा एम् बी बी एस तो तू यु सी एम् एस से कर लेना
लेकिन एम् डी तो शर्तिया,  लेडी हार्डिंग से ही करना .

बेशक पढाई में यु सी एम् एस का नहीं कोई सानी है
लेकिन डॉक्टर बहु तो मैंने लेडी हार्डिंग से ही लानी है .

छोरा बोला बापू , बहु डॉक्टर हो या इन्जीनियर 
प्रेम विवाह हो या आयोजित, कोई फर्क नहीं पड़ना।
पर एक विनती है आपसे, दहेज़ मांगकर मेरी
और मेरी उच्च शिक्षा का, बेडा गर्क नहीं करना।  

नोट : यु सी एम् एस = यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसिज
         एल एच एम् सी = लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज , दिल्ली . 

Thursday, June 28, 2012

मैं तो पानी पीता ही नहीं ---


पिछली पोस्ट में गंभीर विचार विमर्श के बाद अब कुछ थोड़ा मस्ती का माहौल बनाया जाए . इसी उद्देश्य से अपना टाइम खोटी कीजिये, बिना किसी शिकायत के .

रोजाना की तरह डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक में बैठे थे . तभी एक मरीज़ आया और बोला -- डॉक्टर साहब पेट में बहुत दर्द रहता है . पेट बढ़ता भी जा रहा है . कोई उपाय बताइए .
डॉक्टर साहब ने पूरा मुआयना किया और पूछा -- शराब पीते हो ?
मरीज़ बोला -- डॉक्टर साहब , झूठ नहीं बोलूँगा , वो तो मैं पीता हूँ .
डॉक्टर : देखिये , शराब पीने की वज़ह से आपका ज़िगर ख़राब हो गया है . और पेट में पानी भी भर गया है .
मरीज़ : डॉ साहब , ज़िगर तो ठीक है लेकिन पेट में पानी कैसे भर गया ? मैं तो पानी पीता ही नहीं . मैं तो दारू भी नीट पीता हूँ .

फिर कुछ सोचकर मरीज़ बोला -- डॉ साहब , याद आया बचपन में जब पीना शुरू किया था तब पानी मिलाकर पीता था . पहले व्हिस्की ली पानी के साथ , पर वो चढ़ गई . फिर रम पीने लगा, लेकिन वो भी चढ़ जाती थी . फिर मैंने वोदका लेनी शुरू कर दी पानी के साथ . लेकिन जब वो भी चढ़ गई , तो मैंने पानी पीना ही छोड़ दिया .

डॉक्टर : नहीं नहीं , देखिये आपको शराब बंद करनी पड़ेगी .
मरीज़ : डॉ साहब , प्लीज़ बंद करने के लिए मत कहिये , मैं मर जाऊंगा . हाँ , कम कर सकता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा कितनी पीते हो ?
मरीज़ : जी झूठ नहीं बोलूँगा --बस चार पैग पीता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा आज से तीन कर दो और दो हफ्ते बाद आकर मिलो .
दो सप्ताह बाद---
डॉक्टर : अब कैसा लग रहा है ?
मरीज़ ; जी कुछ आराम तो है पर अभी भी दर्द रहता है .
डॉक्टर : ठीक है , आज से दो पैग ही लेना .
मरीज़ : ठीक है डॉ साहब . लेकिन दो से कम मत करना . वो क्या है ना, पूरी बोतल एक पैग में आ ही नहीं सकती .

एक महीने तक मरीज़ वापस नहीं आया . फिर एक दिन घूमता घूमता क्लिनिक पहुंचा तो देखा --बाहर एक तख्ती टंगी थी जिस पर लिखा था -- डॉक्टर इज आउट . मरीज़ ने कम्पाउन्दर से पूछा --क्या डॉ साहब कहीं बाहर गए हैं . वो बोला -- नहीं अन्दर हैं , खुद ही देख लो . मरीज़ ने अन्दर जाकर देखा --डॉ साहब कुर्सी पर चित पड़े हैं . उसने हाथ से हिलाकर उन्हें उठाया तो देखते ही डॉक्टर बोला --अरे तुम ! फिर आ गए ! मरीज़ बोला --नहीं नहीं डॉक्टर साहब , मैं अब ठीक हूँ . मैंने पीनी छोड़ दी है . बस कभी कभी पेट में दर्द होता है . डॉक्टर बोला --चिंता नहीं करना . मैं अभी सूई लगाता हूँ . तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे .
डॉक्टर ने सिरिंज भरा और लगा दिया कूल्हे में जैसे भैंस को इंजेक्शन लगाते हैं .

अगले दिन मरीज़ फिर आया तब डॉक्टर पूरे होश हवास में था . देखते ही बोला -तुम फिर आ गए .
मरीज़ बोला --डॉक्टर साहब , आपकी दुआ से मैं अब बिल्कुल सही हूँ . बस ये पूछने आया था --कल जो आपने सूई लगाई थी , उसे कब निकालेंगे ?

और अंत में :

असली शराबी वो कहलाये ,
जो पीने की शुरुआत करे बचपन में नीट बियर से ,
और इक दिन नीट व्हिस्की पीता नज़र आए ,
और इसका कारण ये बतलाये,
भई क्या करें आज ड्राई डे है . इसलिए नो वाटर , नो सोडा , नो आइस .


Sunday, June 24, 2012

डॉक्टर साहब , क्या आप डॉक्टर हैं ? एक अहम सवाल ---


मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने पर अक्सर सीनियर्स द्वारा फ्रेशर्स से एक सवाल पूछा जाता है -- डॉक्टर क्यों बनना चाहते हो ! आजकल तो पता नहीं लेकिन हमारे समय में अक्सर बच्चे यही ज़वाब देते थे -- जी देश के लोगों की सेवा करना चाहता हूँ . इस पर सीनियर्स ठहाका लगाकर हँसते और कहते -- देखो देखो यह देश की सेवा करना चाहता है . यह रैगिंग का एक ही एक हिस्सा होता था .

लेकिन डॉक्टर बनने के बाद समझ आया--- यह भी तो एक प्रोफेशन ही है . जो डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में हैं , उन्हें दिन रात पैसा कमाने की ही चिंता सताती रहती है . यह अलग बात है , इस प्रक्रिया में वे रोगियों का उपचार कर भला काम भी करते हैं . लेकिन यदि सोचा जाए तो सरकारी डॉक्टर्स को सही मायने में ज़रूरतमंद लोगों की सेवा और सहायता करने का पूर्ण अवसर मिलता है क्योंकि अपनी ड्यूटी सही से की जाए तो बहुत लोगों का भला किया जा सकता है .

लेकिन डॉक्टर्स भी इन्सान होते हैं . उनकी भी बाकि नागरिकों जैसी आवश्यकताएं होती हैं . ऐसे में एक सवाल उठता है --क्या डॉक्टर्स आम आदमी से अलग होते हैं !

मसूरी में स्टर्लिंग रिजॉर्ट में आरामपूर्वक छुट्टियाँ बिताते हुए एक दिन रिसेप्शन से फोन आया -- डॉ साहब , आप डॉक्टर हैं ? मैंने पूछा --यह कैसा सवाल है ? रिसेप्शन मेनेजर बोला -- सर एक महिला को कुछ परेशानी हो रही है . क्या आप देख सकते हैं ? एक पल सोचने के बाद मैंने कहा --ठीक है , देख लेता हूँ .

बताये गए अपार्टमेन्ट नंबर पर गया तो देखा -- कमरे में अधेड़ उम्र की तीन फैशनपरस्त महिलाएं मौजूद थीं जिनमे से एक बेड पर लेटी थी . सरकारी अस्पताल में काम करते हुए हमें मैले कुचैले गरीब से मरीजों को ही देखने की आदत सी पड़ गई है . मुद्दतों बाद एक हाई सोसायटी रोगी को देखकर हमें भी थोडा विस्मय हो रहा था . लेकिन जल्दी ही हमने कौतुहल पर काबू पाकर अपना काम शुरू किया और उनसे उनकी तकलीफ़ के बारे में पूछा . महिला ने बताया -- बड़ी घबराहट हो रही है , छाती में भारीपन हो रहा है और साँस भी नहीं आ पा रहा है . यह लक्षण सुनकर कोई भी डॉक्टर सबसे पहले हार्ट के बारे में सोचते हुए यही संदेह करता --कहीं एंजाइना या हार्ट अटैक तो नहीं हो रहा .

लेकिन हमारे पास जाँच करने के लिए न तो स्टेथोस्कोप था , न बी पी इंस्ट्रूमेंट. ई सी जी का तो सवाल ही नहीं था . ऐसे में कैसे पता चलता , क्या रोग है . वैसे भी आजकल डॉक्टर्स जाँच यंत्रों पर ही पूर्णतया निर्भर रहते हैं . इसीलिए ज़रुरत हो या न हो , सभी टेस्ट करा डालते हैं . हालाँकि इसमें सी पी ऐ का बहुत बड़ा रोल है .

लेकिन अनुभव एक ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के हमेशा काम आती है , हर क्षेत्र में . मेडिकल प्रोफेशन में भी अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता . इसीलिए अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए हमने भी बिना किसी सुविधा के उस महिला का निदान करने का प्रयास किया .

मेडिकल कंसल्टेशन में डॉक्टर दो बातों पर निर्भर करता है --एक हिस्टरी , दूसरा फिजिकल एक्सामिनेशन . अब फिजिकल एक्सामिनेशन के लिए तो हमारे पास कोई औजार थे नहीं , इसलिए हिस्टरी के सहारे हमने बीमारी के बारे में पता किया . पता चला --उनको अक्सर नर्वसनेस हो जाती है . फैमिली में भी एडजस्टमेंट प्रॉब्लम थी . सारी परिस्थितयां देख कर यही समझ आ रहा था --उनको सायकोलोजिकल प्रॉब्लम ज्यादा थी बजाय हृदय रोग के .
लेकिन यह निदान करने से पहले सारे टेस्ट करने ज़रूरी होते हैं जो वहां संभव नहीं थे .

एक चिकित्सक की भूमिका में बड़ी असमंजस की स्थिति थी . मरीज़ की हालत देखकर कोई भी परेशान हो सकता था . हमारे सामने दो ही विकल्प थे -- या तो ज्यादा रिस्क न लेते हुए उन्हें किसी मेडिकल सेंटर में रेफेर कर देते . उस हालत में तीनों की दिक्कत बढ़ जाती . या फिर अपनी सूझ बूझ पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाते , की चिंता न करें , बिलकुल ठीक हो जायेंगे . बहुत बड़ा डाइलेमा था . मन कह रहा था --रिस्क नहीं लेनी चाहिए , रेफेर कर देते हैं . वैसे भी हार्ट के मामले में न कोई लापरवाही चल सकती है , न कभी पता होता है कब क्या हो जाए . लेकिन दिल कह रहा था -- हमारा डायग्नोसिस सही है . ये ठीक हो जाएँगी , इन्हें बस रिएस्युरेंस की ज़रुरत है . आखिर हमने अपनी योग्यता पर विश्वास रखते हुए उन्हें बताया --चिंता की कोई बात नहीं है , आप ठीक हो जाएँगी . बस आराम कीजिये . रिलेक्स करने के लिए एक गोली एंटी एनजाईटी पिल भी बता दी .

उन महिलाओं से मिलकर पता चला , आजकल हर उम्र की महिलाएं ग्रुप बनाकर घूमने निकल पड़ती हैं , परिवारों को छोड़कर , यह शायद नया ट्रेंड चल पड़ा है . या यूँ कहिये यह भी कन्ज्युमेरिज्म का ही एक रूप है . हालाँकि अधेड़ उम्र में शारीरिक रूप से स्वस्थ न होने से यह मिसएडवेंचर भी हो सकता है .

अपने कमरे में आकर थोड़ी चिंता हुई -- कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए . यानि भला करने निकले और बुराई सर आ पड़े . उससे भी ज्यादा ज़रूरी था उस महिला का स्वस्थ होना . हालाँकि उन्हें बता दिया था --यदि आराम करने पर भी छाती में दर्द / घबराहट आदि बढती जाए तो अस्पताल जाना पड़ेगा . फिर भी उनकी चिंता तो रही .

शाम के समय बौन फायर का कार्यक्रम था . माल पर घूमकर जब हम वापस पहुंचे तब देखा , सब लोग खूब एन्जॉय कर रहे थे . वे तीनों महिलाएं भी वहां मौजूद थी . हमारी पेशेंट भी मज़े से प्रोग्राम देख रही थी . उन्होंने बताया अब वो ९९ % ठीक थी . ज़ाहिर था , हमारा डायग्नोसिस सही निकला . हमने भी राहत की एक लम्बी साँस ली .
एक सरदारजी , ख़ुशी से मुफ्त में सभी को पेग पिला रहे थे . दिल तो हमारा भी किया --- इसी बात का जश्न मनाया जाए . लेकिन फिर श्रीमती जी को देख कर मन मारना पड़ा .

अक्सर सुनते आए हैं -- डॉक्टर्स ट्रेन या प्लेन में यात्रा करते हुए नाम के आगे डॉक्टर नहीं लिखते ताकि उनकी पहचान छुपी रहे . क्योंकि पता होने पर किसी भी इमरजेंसी में आपको बुलाया जा सकता है . ज़ाहिर है , छुट्टियों पर वे डिस्टर्ब होना नहीं चाहते . लेकिन सोचता हूँ --क्या यह सही है ?
क्या एक डॉक्टर अपने फ़र्ज़ से मूंह मोड़ सकता है ?
क्या हमें इतना स्वार्थी होना चाहिए ?

लेकिन यह भी सच है -- डॉक्टर की सही या गलत सलाह किसी को जिंदगी दे या ले भी सकती है .
सब ठीक रहा तो ठीक वर्ना ---!
भली करी तो मेरे भाग , वर्ना मरियो नाइ बाह्मण !
ऐसे में -- आ बैल मुझे मार-- क्या सही रहेगा !

ज़रा बताएं -- आपको क्या लगता है , क्या सही है , क्या गलत .


Wednesday, May 23, 2012

जाको रखे साइयाँ , मार सके न कोय --


एक पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा , चिकित्सा के क्षेत्र में चमत्कार नहीं होते . यह बात चमत्कारी दावों पर ज्यादा लागु होती है . लेकिन चिकित्सा में कभी कभी ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं , जो किसी चमत्कार से कम नहीं होती . आखिर डॉक्टर्स भी इन्सान ही होते हैं . जीवन देना भले ही डॉक्टर्स के हाथ में हो , लेकिन मृत्यु से बचाना अक्सर डॉक्टर्स के हाथ में नहीं होता . यदि ऐसा होता तो संसार में कोई मृत्यु ही नहीं होती . डॉक्टर सिर्फ सही उपचार ही कर सकता है . असंभावित घटनाओं पर उसका कोई वश नहीं होता .

बात उन दिनों की है जब मैं अस्पताल के आपातकालीन विभाग में केजुअल्टी में काम करता था . केजुअल्टी को प्राइवेट अस्पतालों और विदेशों में इमरजेंसी रूम ( ER ) कहा जाता है . उस दिन मैं नाईट ड्यूटी पर था . रात के चार बजे थे . यह वह समय होता है जब अक्सर डॉक्टर्स , नर्सिज और अन्य कर्मचारियों समेत मरीजों को भी नींद आने लगती है . शोर शराबे वाली केजुअल्टी जैसी जगह पर भी पूर्ण शांति होती है .

तभी ट्रॉली में लेटा ५५-६० वर्ष का एक मरीज़ आया जिसे उसका लड़का लेकर आया था . दोनों पढ़े लिखे और खाते पीते परिवार से लग रहे थे . मैंने उसका मुआइना किया और पाया , उसे हार्ट अटैक हुआ था . यथोचित कार्यवाही कर अभी उसे दूसरे कमरे में शिफ्ट कर ही रहे थे की तभी एक दूसरा मरीज़ दाखिल हुआ , बिल्कुल उसी हालत में . उसे भी हार्ट अटैक ही हुआ था .

सर्दियों में अक्सर अर्ली मोर्निंग हार्ट अटैक होने की सम्भावना बहुत ज्यादा होती है .

लेकिन दूसरा मरीज़ एक नेपाली था , किसी कॉलोनी में चौकीदार था . साथ में उसकी ज़वान लड़की और लड़का भी थे . उन्हें देख कर उनकी गरीबी का आभास हो रहा था . दोनों मरीजों को देखकर मन में बड़ा अजीब सा ख्याल आया . वैसे तो हम डॉक्टर्स रोगियों को देख कर कभी भावुक नहीं होते . लेकिन उस दिन एक साथ दो एक जैसे लेकिन आर्थिक रूप से भिन्न रोगियों को देख कर मन थोडा विचलित सा हुआ . यही लगा की पहला रोगी तो शायद इलाज और उसके बाद का खर्च सहन कर पाने की आर्थिक स्थिति में था , लेकिन दूसरा गरीब मरीज़ बेचारा क्या करेगा .
हालाँकि उन दिनों एन्जिओग्राफी और स्टेंट डालने की सुविधा नहीं थी . दवाओं से ही हार्ट अटैक का इलाज किया जाता था . लेकिन दवाएं भी कहाँ सस्ती होती हैं .

अभी दूसरे मरीज़ को भी शिफ्ट किया जा रहा था की अचानक उसकी लड़की दौड़ी दौड़ी आई और हांफते हांफते बोली --पापा साँस नहीं ले रहे हैं . मैंने भी तुरंत जाकर देखा -- उसको कार्डिअक अरेस्ट हो गया था . यानि दिल की धड़कन अचानक बंद हो गई थी . ऐसे में यदि तुरंत उपचार न किया जाए तो कुछ ही मिनट्स में मृत्यु निश्चित होती है . कार्डिअक अरेस्ट का एक ही उपचार होता है -- CPR और DC शॉक . लेकिन इसकी व्यवस्था न होने पर ठीक दिल के ऊपर छाती पर एक जोरदार घूँसा लगाने से भी दिल की धड़कन शुरू हो जाती है .

यहाँ जीवन और मृत्यु के बीच कुछ ही पलों की दूरी थी . मरीज़ कॉरिडोर में था . अक्सर इमरजेंसी इलाज करते समय रोगी के रिश्तेदारों को दूर कर दिया जाता है ताकि इलाज में बाधा उत्पन्न न हो . लेकिन उस वक्त न ऐसी स्थिति थी न समय .
बिना एक पल की देर किये , मैंने वही किया जो करना चाहिए था . एक जोरदार घूँसा, जिंदमी में पहली और शायद आखिरी बार , लगाते ही रोगी के दिल की धड़कन लौट आई . वह साँस लेने लगा . ऑक्सिजन लगाकर और CPR करते हुए उसे इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया .

सुबह होने पर ड्यूटी खत्म कर घर आने से पहले उत्सुकतावश सोचा , क्यों न दोनों मरीजों का हाल जान लिया जाए .
मालूम किया तो पता चला -- पहला रोगी जो ठीक ठाक लग रहा था, उसकी मृत्यु हो गई थी . उसे वार्ड में ही दूसरा अटैक आ गया था . दूसरा जो लगभग जा चुका था , सही सलामत बैठा चाय पी रहा था .

इस घटना ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया -- ऊपर वाले की मर्ज़ी क्या है , यह कोई नहीं जान सकता . डॉक्टर्स भी नहीं .

Friday, September 30, 2011

झोला छाप ही नहीं , सड़क छाप डॉक्टर भी होते हैं ---

यह तो हम सभी जानते हैं कि जिनके पास मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं होती, लेकिन फिर भी मेडिकल प्रैक्टिस करते हैं , उन्हें झोला छाप डॉक्टर कहते हैं । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके पास न तो डिग्री होती है , न वे प्रैक्टिस करते हैं , फिर भी लोगों का इलाज करते हैं ।

आपने जगह जगह सड़क किनारे टेंट लगा देखा होगा , जिस पर लिखा होगा ----खानदानी सफाखाना ।
या फिर --पहलवान --हड्डी जोड़ तोड़ इलाज ।
या बसों में दवा बेचते भिखारी जैसे लोग ।
और तो और , यदि आप मनाली जैसे हिल स्टेशन पर घूमने जाएँ तो झोला टांगे कोई चरसी सा दिखने वाला व्यक्ति आकर कहेगा --साब थोड़ी सी दूँ --एक बार इस्तेमाल कर के देखिये !

इन्हें सड़क छाप डॉक्टर कह सकते हैं ।

आइये मिलते हैं , कुछ ऐसे ही सड़क छाप डॉक्टरों से :

दृश्य १ :

करीब बीस साल पहले की बात है । मैं बस में बैठा चंडीगढ़ की ओर जा रहा था । अम्बाला के पास बस एक ढाबे पर रुकी तो चलने से पहले बस में एक ऐसा ही व्यक्ति घुस आया और लगा अपनी सुनाने ।
साहेबान , ज़रा ध्यान दीजिये --क्या आपके दांत में कीड़ा है --डॉक्टर की फीस देकर तंग आ चुके हैं --कोई फायदा नहीं हो रहा --घबराइए नहीं --हमारे पास इसका इलाज है ।
एक आदमी से बोला --क्या आपके दांत में कीड़ा लगा है ?
आदमी बोला -जी हाँ ।
साहेबान देखिये , अभी आपके सामने इनके दांत का कीड़ा बाहर आता है एक मिनट में ।
उसके बाद उसने एक छोटी सी शीशी निकाली, उसमे से एक तिल्ली पर द्रव की एक बूँद लगाई और व्यक्ति के मूंह में लगा दिया । थोड़ी देर बाद उसने मूंह खोलने के लिए कहा और ये लो तिल्ली पर एक छोटा सा तिनका जैसा लगा था जिसे दिखाकर बोला --लीजिये साहेबान कीड़ा बाहर आ गया । न कोई ऑपरेशन , न कोई चीर फाड़ और कीड़ा बाहर ।
यदि आप के या आप के किसी रिश्तेदार के दांत में कीड़ा लगा हो तो एक शीशी ले जाइये --कीमत मात्र पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी दस शीशियाँ बिक गई । पचास रूपये संभाल वह चुपचाप नीचे उतर कर गायब हो गया ।

दृश्य २ :

एक छोटे से कस्बे में सड़क पर एक कोने में एक जगह लोगों की भीड़ लगी थी । गोल दायरे में खड़े लोगों के बीच एक मदारी सा व्यक्ति तमाशा दिखा रहा था । फर्क बस इतना था की उसके पास जमूरा नहीं था , बल्कि खुद ही तमाशा दिखाने में लगा था ।
पहले उसने एक कटोरी में पानी लिया । फिर उसमे थोडा लाल रंग मिला दिया । फिर बोला --

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --आपकी आँखें दुखनी आई हों तो आप डॉक्टर के पास जाते हैं । डॉक्टर अपनी फीस ले लेता है लेकिन आपको कोई आराम नहीं आता । आप निराश हो जाते हैं । फिर डॉक्टर बदलते हैं --फिर फीस . फिर कोई आराम नहीं ।

लेकिन निराश न होइये --हमारे पास ऐसा इलाज है जो आँख की हर लाली को मिटा देगा ।
इसके बाद उसने कटोरी के पानी में दो चार बूँद किसी द्रव की डाली --और ये लो , पानी का रंग साफ हो गया ।

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --एक बार तालियाँ हो जाएँ --हमारे इलाज की कोई काट नहीं --नकली साबित करने वाले को हज़ार रूपये का इनाम --और इस इलाज की कीमत --साहेबान कोई १०० रूपये नहीं --पचास भी नहीं --दस भी नहीं --ज़नाब इसकी कीमत है बस पांच रूपये --जी हाँ , सिर्फ पांच रूपये , पांच रूपये , पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी बीस शीशियाँ बिक गई ।

उसके बाद उसने दूसरा तमाशा शुरू किया --

फिर एक कटोरी में पानी -- पानी में एक पाउडर सा डाला --थोड़ी देर में पानी जमकर जैली जैसा हो गया --एक युवक से कहा , इसे उल्टा करके देखो -- जितना मर्जी हिला लो , एक कतरा भी नहीं गिरेगा ---

हम बच्चे थे , कुछ समझ नहीं पाए ।

लेकिन देखते ही देखते उसकी सारी शीशियाँ बिक गई ।

नोट : सड़क छाप डॉक्टर ही नहीं होते , मरीज़ भी होते हैं ।


Saturday, August 27, 2011

रिश्तों कीं कीच ---

आज मूढ़ लाईट करने के लिए थोडा कुछ हल्का फुल्का हो जाए --

डॉक्टर मानसिक रोगी से : तुम पागल कैसे हुए ?

रोगी : मैंने एक विधवा से शादी कर ली ---- उसकी ज़वान बेटी से मेरे बाप ने शादी कर ली ----तो मेरी वो बेटी मेरी मां बन गई ---- उनके घर बेटी हुई तो वो मेरी बहन हुई ----मगर मैं उसकी नानी का शौहर था , इसलिए वो मेरी नवासी भी हुई ----इसी तरह मेरा बेटा अपनी दादी का भाई बन गया और मैं अपने बेटे का भांजा और मेरा बाप मेरा दामाद बन गया और मेरा बेटा अपने दादा का साला बन गया और ----और ----

डॉक्टर : करदे साले मुझे भी पागल करदे

नोट : कृपया इसे बस हास्य के रूप में ही लेंचिकित्सा क्षेत्र में आजकल इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता




Saturday, July 23, 2011

इसे पढ़कर आप भी डॉक्टर बन सकते हैं ---.

एक समाचार से पता चला की दिल्ली में हर तीसरा व्यक्ति इन दिनों वाइरल बुखार से ग्रस्त है .हालाँकि हालात इतने बुरे भी नहीं हैं , लेकिन यह सच है की बरसात के दिनों में वाइरल इन्फेक्शन बहुत बढ़ जाते हैं .

आम आदमी की जुबान में इन दिनों डॉक्टरों की चांदी हो जाती है .

लेकिन यदि आप वाइरल फीवर की चपेट में आ ही जाएँ , तो क्या करना चाहिए --आइये हम बताते हैं ( बिना किसी फीस के ).

बुखार :

अचानक बुखार होने का सबसे प्रमुख कारण है वाइरल इन्फेक्शन . यूँ तो वाइरस लाखों किस्म के होते हैं लेकिन इनमे से कुछ ही मनुष्य को प्रभावित करते हैं .
इनमे सबसे कॉमन है --राईनोवाइरस --जिससे कॉमन कोल्ड यानि जुकाम होता है .

१) कॉमन कोल्ड : यह सबसे कॉमन इन्फेक्शन है , बदलते मौसम में . सबसे पहले नाक बहने लगती है , फिर गला ख़राब और खांसी , साथ में बुखार . अक्सर बहती नाक २-३ दिन में रुक जाती है लेकिन खांसी यदि ज्यादा हो जाए तो दवा लेना ज़रूरी हो जाता है . बुखार भी २-४ दिन में उतर जाता है .
डॉक्टर्स इसे यु आर आई कहते हैं .

२) वाइरल फीवर : इसमें सिर्फ बुखार होता है , साथ में सर दर्द , बदन दर्द , कमजोरी और थकावट होती है . ज़ाहिर है , इस बुखार में जुकाम और खांसी नहीं होती . यह बुखार १--७ दिन में अपने आप उतर जाता है , बिना दवा लिए भी .

१ और २ नंबर के बुखार एयर बोर्न इन्फेक्शन हैं यानि इनके वाइरस वायु में रहते हैं और साँस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं . इसलिए इनसे बच पाना लगभग नामुमकिन है .

३) अन्य वाइरल फीवर : डेंगू , चिकनगुनिया , येल्लो फीवर आदि . इनमे से डेंगू और चिकनगुनिया कॉमन हैं , लेकिन ये बुखार मच्छर के काटने से होते हैं , इसलिए इनकी रोकथाम की जा सकती है . येल्लो फीवर भारत में नहीं होता .

४) मलेरिया : ठण्ड के साथ अचानक बुखार चढ़ जाता है . यह भी मच्छर के काटने से ही होता है . इसलिए रोकथाम की जा सकती है .

५) यदि ७ दिन तक बुखार न उतरे और रोगी की हालत सही न लग रही हो तो typhoid होने की सम्भावना बढ़ जाती है .

६) यदि खांसी के साथ हल्का बुखार २-३ सप्ताह से चल रहा हो तो टी बी हो सकती है .

बुखार के उपरोक्त कारण हमारे देश में मुख्य तौर पर पाए जाते हैं . इस तरह के संक्रमण मुख्यतया विकासशील देशों में ही होते हैं जहाँ रहन सहन का स्तर ज्यादा अच्छा नहीं है .

बुखार का घरेलु इलाज :

बुखार का इलाज स्वयं नहीं करना चाहिए . डॉक्टर से परामर्श लेना अनिवार्य होता है वर्ना बहुत बड़ा धोखा खा सकते हैं .
लेकिन जब तक डॉक्टर के पास जा पायें , तब तक घर में क्या उपचार किया जा सकता है , यह जानिए :

१) आराम : बुखार में पहला काम करें --आराम . इससे बुखार जल्दी उतरेगा .
२) दवा : यदि बुखार १०० के आस पास या ज्यादा है तो एक गोली पेरासिटामोल ले सकते हैं जिसे ४-६ घंटे में दोबारा लिया जा सकता है . यह सबसे सुरक्षित दवा है . कभी भी एस्पिरिन न लें , यह खतरनाक हो सकती है .
३) हाइड्रोथेरपी : बुखार १०१-१०२ या इससे ऊपर होने पर स्पोंजिंग करने से राहत मिलेगी .
४) खाना : हल्का खाना अवश्य खाएं . न खाने से कमजोरी ज्यादा आएगी .
५) पानी : बुखार में dehydration होने का खतरा रहता है . इसलिए द्रव्य जैसे पानी , दूध , चाय , शरबत आदि उचित मात्रा में पीते रहना चाहिए .
६) समय मिलते ही एक बार डॉक्टर को अवश्य मिल लें .

याद रहे वाइरल बुखार एक से सात दिन में बहुधा उतर जाता है . इससे ज्यादा चलने पर जांच आवश्यक हो जाती हैं .
कहते हैं वाइरल फीवर दवा लेने से एक सप्ताह में ठीक हो जाता है . दवा न लेने से सात दिन में उतर जाता है .
अब ज़रा सोचिये -- एक मरीज़ एक डॉक्टर से ६ दिन तक इलाज कराता रहा लेकिन बुखार नहीं उतरा . सातवें दिन उसने डॉक्टर बदल लिया . दूसरे डॉक्टर ने दवा दी और बुखार ख़त्म . दूसरा डॉक्टर मरीज़ की नज़र में काबिल डॉक्टर बन गया .

क्या करें हमारे देश में ऐसा ही होता है .


Tuesday, March 15, 2011

डॉक्टर मुझे बचा लो , मैं अभी मरना नहीं चाहता ----

कभी कभी सोचता हूँ , जिंदगी भी कितनी अज़ीब चीज़ हैमनुष्य अभावों में रहकर जिंदगी गुजार देता है, अच्छे भविष्य की आस मेंअपनी जिम्मेदारियां पूरी करते करते आदमी की जिंदगी पूरी हो जाती हैअभावों से छुटकारा मिलता है तो जिंदगी का भाव ख़त्म हो जाता हैउधर एक तरफ इच्छाएं बढती जाती हैं , दूसरी तरफ मन में जीने की लालसा भी बढती जाती है

प्रस्तुत है , जिंदगी की ऐसी ही एक कशमकश :


I)

डिस्पेंसरी के डॉक्टर से
बोला बीमार
सरकार ,
मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।

अभी करनी है बहन की शादी
घर में दादा दादी ,
और मात पिता का भार है ,
अभी जी भर के देखना संसार है ।

छोटे छोटे हैं बच्चे
उम्र में कच्चे ,
रोज चॉकलेट मांगते हैं ।
नादां नहीं जानते हैं
कितनी महंगाई है ,
फिर मैंने भी तो नई नई नौकरी पाई है ।
उस पर ये बीमारी
वर्ना नहीं कराहता
डॉक्टर मुझे बचालो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।

II)

डॉक्टर अब नर्सिंग होम में बैठा था
टेबल पर लेटा था ,
वही मरीज़ , कह रहा था
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।
बेटे के कॉलिज की फीस भरनी है
शादी भी करनी है ,
बेटी स्यानी हो गई है ।
ताउम्र
किराये पर रहकर ,
पत्नी भी दीवानी हो गई है ।
डी डी ए पर आँख लगाए बैठी है ,
एल टी सी लेकर
चार धाम यात्रा की आस लगाए बैठी है ।
पर लाचारी है
ये कैसी बीमारी है
मैं नहीं जानता ,
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं मरना नहीं चाहता ।

III)

डॉक्टर का नर्सिंग होम
अब बन गया है कॉर्पोरेट अस्पताल ,
दिल का हाल
प्राइवेट रूम में लेटा इस बार ,
सुना रहा है वही बीमार ।
इस दिल को संभालो ।
मैं अभी मरना नहीं चाहता
डॉक्टर मुझे बचा लो

बंगला नया बनाया है ,
अभी उद्घाटन भी नहीं कराया है ।
लगाया है ,
स्टॉक्स में कुछ पैसा
खरीदे कुछ गहने हैं ।
प्लॉट के रेट भी तो अभी बढ़ने हैं ।
बस दिल में एक स्टेंट डलवा लूँ ,
घुटने दोनों बदलवा लूँ ।
कटवा लूँ
टिकेट यू एस की ,
बेटे ने बुलावा भेजा है ।
देखना है पोते का चेहरा
दिल मेरा ,
बहुत करता है जाने का ।
अभी तो रंग देखना है जमाने का ।
दिल करता है लेने का
चैन की सांस ,
आस पास की तरक्की का अहसास ,
अब होने लगा है ।
दुनिया की रंगीनियों में अब
मन खोने लगा है ।

क्रूज , केसिनो , क्लब, रेस्तरां, एस्केलेटर
मेट्रो , मॉल , मोबाइल , टी थ्री ट्रेवेलेटर
हर कोई कितना नहीं सराहता
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।



नोट : बीता कल गुजर गया भविष्य का किसी को पता नहीं जो आज है , वही सच है आज के एक एक क्षण को ख़ुशी से जीया जाए बस यही फ़लसफ़ा है जिंदगी का