Saturday, September 22, 2018

सरकारी अस्पताल --


सरकारी अस्पतालों में क्षमता से ज्यादा रोगियों के आने से सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। ओ पी डी में एक डॉक्टर को एक रोगी को देखने के लिए औसतन मुश्किल से डेढ़ मिनट का ही समय मिलता है। वार्डस में एक बेड पर दो या तीन मरीज़ों को भर्ती किया जाना आम बात है।  हमने डेंगू के समय एक बेड पर चार रोगियों को भर्ती होते देखा है। बच्चों के अस्पताल में एक बेड पर जब तीन बच्चे होते हैं तो माँओं को मिलाकर यह संख्या ६ हो जाती है। उस पर डॉक्टर्स और अन्य कर्मचारियों की सीमित संख्या के साथ साथ जगह की भी कमी महसूस होती है क्योंकि अधिकांश बड़े अस्पताल वर्षों पहले बनाये गए थे और तब किसी ने भविष्य में मरीज़ों की संख्या के बारे में अनुमान नहीं लगाया होगा।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि किस तरह सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को सुधारा जाये ताकि अस्पताल में आने वाले रोगियों को उपचार में ज्यादा इंतज़ार न करना पड़े और उन्हें संतुष्टि भी हो। सैद्धांतिक हल तो बहुत हैं लेकिन कोई व्यावहारिक/ वास्तविक हल सुझाईये जिसे कार्यान्वित कर हम भी अपने अस्पताल में स्वास्थयकर्मियों और रोगियों, दोनों को कुछ राहत प्रदान कर सकें।   

Wednesday, September 12, 2018

ओ स्त्री कल आना --


ओ स्त्री कल आना :

मध्यप्रदश के एक ऐतिहासिक कस्बे चंदेरी की पृष्ठभूमि में फिल्माई गई हिंदी फिल्म "स्त्री" एक हॉर्रर कॉमेडी फिल्म है जिसे देखते हुए लोगों की चीख और हंसी एक साथ फूट पड़ती है। एक महिला पर हुए अत्याचार के कारण महिला की मृत्यु और उसका भूत बनकर गांव / कस्बे के मर्दों को अँधेरी रात में नाम से बुलाकर उनके कपडे उतारकर गायब करने की कहानी के दृश्य अँधेरी सूनी गलियों में बड़ी खूबसूरती से फिल्माए गए हैं। अंधकार में सुनसान जंगली रास्तों पर तीन दोस्तों में से एक का अपहरण और बैकग्राऊंड में अचानक आती तेज आवाज़ दर्शकों को डराने में सफल रहती है। राजकुमार राव का अभिनय एक बार फिर ज़बरदस्त रहा।  फिल्म में एक सस्पेंसफुल भूमिका में श्रद्धा कपूर का रोल और उपस्थिति मनमोहक लगी। अन्य कलाकारों का अभिनय भी सराहनीय है। 

भूत को दूर रखने के लिए अधिकांश घरों के बाहर लाल पेंट से "ओ स्त्री कल आना" लिखा होता है ताकि भूतनी उसे पढ़कर वापस चली जाये। जहाँ नहीं लिखा होता या यदि लिखे हुए को मिटा दिया गया तो वहीँ भूतनी आकर अपना काम कर जाती है। फिल्म को देखकर आनंद तो आता ही है, साथ ही एक बार फिर भूत प्रेतों की दुनिया के बारे में सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है। हालाँकि भूत प्रेतों की कहानियां कपोल कल्पित ही होती हैं जिन पर देहाती लोगों का अंधविश्वास उन्हें मानने के लिए मज़बूर कर देता है। लेकिन इस फिल्म को देखकर महिला के तथाकथित भूत से सहानुभूति और नायक की दृष्टि से प्यार सा होने लगता है। एक बारगी तो लगने लगता है कि काश भूत महिला सदा के लिए ही लड़की के भेष में जिन्दा रह जाती।     

Wednesday, September 5, 2018

हमें शिकायत है :

हमें शिकायत है ,
"उन दोस्तों से जो वाट्सएप्प पर हमें हर सन्डे को 'हैप्पी सन्डे' का मेसेज भेजते हैं लेकिन मंडे से सैटरडे तक हमें हमारे हाल पर छोड़ देते हैं !
ये भी नहीं सोचते कि शुभकामनाओं के बगैर हमारे बाकि दिन कैसे गुजरेंगे !!!!"

हमें शिकायत है,
"उन मित्रों से जो मंगलवार के दिन ना नॉन वेज खाते हैं, ना शराब पीते हैं, और ना ही बाल कटवाते हैं !
ये भी नहीं सोचते कि दो दिन तक जाने कितने दुकानदारों के गल्ले (काले) धन से कैसे भरेंगें ! 
आखिर सोमवार को तो दुकाने वैसे ही बंद होती हैं। फिर मंगल को भी अमंगल !"

हमें शिकायत है,
"उन फेसबुक मित्रों ( महिलाएं और पुरुष , दोनों  ) से जिनसे किसी कार्यक्रम में मुलाकात होने से पहले ही वे सेलेब्रिटी बन गए । अब उनके दुर्लभ दर्शन कैसे सुलभ हो पाएंगे, ये सोच सोच कर ही खाते पीते हुए भी हम दुबले हुए जा रहे हैं !"

हमें शिकायत है,
"उन पत्नियों से जो बोल बोल कर पति की बोलती बंद कर देती हैं, फिर पति से बोलती हैं कि वे कुछ बोलते क्यों नहीं !"  

हमें शिकायत है,
"उन सरकारी अफसरों से जो किसी सरकारी मीटिंग में लंच के लिए खाने की ऐसी थाली मंगवाते हैं जिसे न खाया जाये न छोड़ा जाये !
शाही पनीर , दाल मक्खनी , मिक्स वेज , रायता , चावल / पुलाव और दो लच्छा परांठा , साथ में सलाद और अंत में एक मिठाई !
माना कि सरकारी अफसरों को 'खाने' की आदत होती है।  पर लंच में इतना खाकर तो सिर्फ सोया ही जा सकता है! कोई हैरानी नहीं कि सरकारी काम बहुत धीरे धीरे होते हैं !"


हमें शिकायत है,
"उन लोगों से जो हमारे देश को गरीब बताते हैं। अरे जितना हम खाते हैं, उससे ज्यादा तो हम फेंक देते हैं !"

नोट : पता चला है कि हमारे देश में अन्न की पैदावार ज़रुरत से ज्यादा ही होती है। लेकिन हमारे पास स्टोर करने के लिए सिर्फ ३५ % की ही क्षमता है। लगभग ४० % अन्न नष्ट हो जाता है। यानि बाकि बचे २५ % में हम न सिर्फ अपना गुजारा करते हैं , बल्कि दूसरों को भी खिला देते हैं , एक्सपोर्ट करके। है कोई हम जैसा दानवीर !

Thursday, August 23, 2018

बारौठी , एक हरियाणवी रिवाज़ जो अब लुप्त हो गई है ---


बारौठी :

शहर और हरियाणवी गांवों की शादियों में बहुत अंतर होता है। हालाँकि अब शहरों में रहने वाले हरियाणवी लोग भी गांव की रीति रिवाज़ों को छोड़ कर शहरी ढंग से शादियां करने लगे हैं। लेकिन यू एस से आये लड़के के परिवार को सांकेतिक रूप में सब रीति रिवाजों को निभाने की इच्छा थी।  इसलिए शहर के परिवेश में पारम्परिक रूप से सभी रस्में निभाई गईं।  फिर भी एक रिवाज़ रह गई जिसे बारौठी कहते हैं क्योंकि इसके लिए गुंजाईश ही नहीं थी। आइये बताते हैं कि बारौठी क्या होती थी :

पुराने ज़माने में लड़का और लड़की शादी से पहले ना तो एक दूसरे से मिल पाते थे , और ना ही देख पाते थे।  जो घर के बड़ों ने तय कर दिया, वही मंज़ूर होता था। लेकिन शादी के दिन बारात आने के बाद सबसे पहला काम यही होता था कि लड़का लड़की एक दूसरे को देख लें और स्वीकृति प्रदान कर दें।  हालाँकि यह भी केवल सांकेतिक रूप में और औपचारिकता निभाने के लिए ही होता था क्योंकि आज तक हमने कभी नहीं सुना कि किसी ने किसी को शादी वाले दिन देखकर नापसंद किया हो।  दूल्हा बैंड बाजे के साथ दुल्हन के घर जाता था , जहाँ उसे द्वार पर रोक दिया जाता था।  सामने दुल्हन के घर की सभी महिलाएं स्वागत में खड़ी होती थी और दूल्हे के पीछे एक चादर तान दी जाती थी ताकि बाकि सब लोग न देख पाएं।  इसी बीच अचानक चुपके से दुल्हन आकर एक झलक दूल्हे की देख लेती थी।  अक्सर दूल्हे को पता भी नहीं चलता था कि लड़की कब देखकर चली गई।  लड़की दूल्हे पर चावल के कुछ दाने फेंककर घर के अंदर चली जाती थी।  इसका मतलब यह होता था कि दुल्हन ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी।  इसके बाद दूल्हा घर में प्रवेश करता था जहाँ उसे एक चारपाई पर बिठाकर घर की औरतें मिठाई खिलाकर दूल्हे का मुंह मीठा कराती।  इस तरह स्वीकृति के बाद बाकि सब रस्में बाद में निभाई जाती थी।

लेकिन शहरों में यह रिवाज़ निभाना संभव ही नहीं हो सकता क्योंकि पंडाल के द्वार पर घर के सब लोग बारात और दूल्हे का स्वागत करते हैं और दूल्हा सीधा स्टेज पर पहुँच जाता है जहाँ थोड़ी देर बाद दुल्हन भी पहुँच जाती है। वैसे भी आजकल या तो लड़का लड़की पहले से ही एक दूसरे को जानते हैं या आयोजित (अरेंजड मैरिज) में भी प्रेमालाप (कोर्टशिप) से अच्छी जान पहचान हो जाती है। अब तो शादी से पहले लड़का लड़की मिलकर अपनी विवाह पूर्व (प्री मेरीज) फिल्म भी बनवाने लगे हैं। इसलिए सभी हो हल्ले के बीच एक यही रिवाज़ है जो अब देखने में नहीं आती।   

Thursday, August 16, 2018

हम और तुम --


जिंदगी भर जीते रहे ,
जिन्हे जिंदगी देने,
सजाने और संवारने में।
अब जब ,
वे नभ में उड़ चले,
और व्यस्त हैं ,
स्वच्छंद जिंदगी बनाने में।
तब एक बार फिर
बस हम और तुम हैं ,
तीसरा नहीं कोई हमारे बीच।
बस 'तू' रहे और तेरा साथ ,
डाले हाथों में हाथ,
यूँ ही साथ साथ।
चलो एक बार फिर से खोज लें ,
हम और तुम, दोनों, अपने आप को।

Thursday, August 9, 2018

हमारी धार्मिक आस्था के नाम पर अराजकता फ़ैलाने पर रोक लगनी चाहिए --


सावन के उमस भरे महीने में कंधे पर गंगा जल से भरे लोटे का भार उठाये हुए, पैरों में पड़े छालों की परवाह किये बिना, नंगे पांव २५० किलोमीटर पैदल चलते हुए, अपनी मंज़िल तक पहुंचना, सचमुच दिल की गहराइयों में बसी शिव भक्ति और श्रद्धा भावना का प्रतीक है। यह देखकर कांवड़ियों के प्रति प्रेम और सहानुभूति की मिली जुली भावना मन में आना स्वाभाविक है। कुछ युवक तो साल दर साल इस यात्रा में सम्मिलित होकर गर्वान्वित मह्सूस करते हैं। यह और बात है कि इस बेहद कष्टदायक प्रक्रिया को पूर्ण करने से व्यक्ति विशेष को सिवाय मन की आंतरिक प्रसन्नता के कुछ और हासिल नहीं होता।

लेकिन शिव भक्ति की आड़ में कुछ असामाजिक तत्त्व समाज और कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी मनमानी करते नज़र आते हैं। यह समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। ज़रा सोचिये,
* ट्रकों पर हज़ारों वाट का म्यूजिक सिस्टम लगाकर, शराब पीकर, रास्ते में भांगड़ा करते १२ साल से लेकर २०-२२ साल तक की आयु के युवा क्या कहलायेंगे !
* या फिर एक बाइक या स्कूटर पर गेरुआ टी शर्ट और कच्छा पहनकर, हाथों में बेसबॉल बैट पकड़े, बिना हेलमेट के  तीन तीन युवा बैठकर सडकों के बीचों
  बीच सीधी उलटी दिशा में बेधड़क ड्राईव करते हुए क्या शिव भक्त कहलायेंगे ! 
* कानून भी ऐसे में धार्मिक आस्था के नाम पर मनमानी करने के लिए खुली छूट दे देता है।
* इसी कारण इन दिनों में दिल्ली की सडकों पर कोई भी गेरुए वस्त्र पहनकर बाइक पर बिना हेलमेट मस्ती करता हुआ घूम सकता है क्योंकि उसे विश्वास होता
  है कि कोई ट्रैफिक पुलिस वाला उसका चालान नहीं काट पायेगा। 
*  देखा जाये तो यह धार्मिक सहिष्णुता का दुरूपयोग है जिसका दुष्परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है।     
कुछ लोग इसे विभिन्न धर्मों से जोड़कर दलील देते हैं कि जब अन्य धर्मों के लोग धर्म का दुरूपयोग करते हैं, तब कोई शोर नहीं मचता। धर्म चाहे कोई भी हो , कोई भी धर्म अनुयायियों को गलत रास्ते पर चलने का निर्देश नहीं देता, न ही बाध्य करता है। एक दूसरे को देखकर गलतियाँ करते रहना धर्म का ही विनाश है। धर्म हमारा सही रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन करता है। इसलिए धर्म और धार्मिक आस्था की आड़ में अमानवीय व्यवहार सहन नहीं किया जाना चाहिए और इसे रोकने के लिए प्रशासन को ठोस और कठोर कदम उठाने चाहिए।         

Friday, July 20, 2018

फिर न होगा कोई ऐसा -- श्री गोपाल दास नीरज -- श्रद्धांजलि --






श्री गोपाल दास नीरज से हमारी पहली और अंतिम मुलाकात ८ साल पहले दिल्ली के हिंदी भवन में हुई थी जब हमें उनका एकल कविता पाठ सुनने का सुअवसर मिला था। लगभग दो घंटे तक अकेले ही श्रोताओं से खचाखच भरे हॉल को नई और पुरानी कवितायेँ और गीत सुनाकर उन्होंने ऐसा समां बांधा कि सब मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी सुनाई कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं :

तन से भारी सांस है , इसे जान लो खूब
मुर्दा जल में तैरता , जिन्दा जाता डूब ।

ज्ञानी हो फिर भी न कर , दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है भले ही , मणि हो उसके पास ।


जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितना भारी बक्सा होगा
उतना तू हैरान रहेगा ।

आज भले ही नीरज जी हमारे बीच नहीं रहे , लेकिन उनके सर्वप्रिय गीतों और कविताओं में वे सदा जिन्दा रहेंगे। नमन ... विनम्र श्रद्धांजलि ...