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Monday, January 23, 2023

सर्दियों के दिन ---

सर्दियों के दिन, हैं बहुत कठिन,

कास्तकार लोगों के जीने के लिए।


धोबी का लड़का रोज पूछता है,

कपड़े हैं क्या प्रैस करने के लिए।


कपड़े भी ऐसे हैं कि फटते ही नहीं,

दर्जी भी पूछे, हैं क्या सीने के लिए।


ना कोला, ना शरबत, ना ही ठंडाई,

एक चाय ही काफ़ी है पीने के लिए।


बैठे बैठे खाते रहते हैं मूंगफली रेवड़ी,

कोई काम नहीं होता पसीने के लिए।


सर्दियों का मौसम होता स्वस्थ मौसम, पर

कामवालों के लाले पड़े रहते जीने के लिए।

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Devendra Kumar Pandey, Satish Chetal and 15 others

Saturday, January 14, 2023

मित्रो, दोस्तो, यारो , 

ना न्यू ईयर, ना ओल्ड ईयर ,

ना व्हिस्की, ना बीयर।  

कभी तो पुकारो ।    


ना मिठाई, ना बधाई, 

ना शादी, ना सगाई , 

बस कम्बल और रज़ाई, 

कमी को सुधारो ।  


ना डेंगू , ना कोरोना , 

ना मास्क, ना हाथ धोना, 

फिर काहे का रोना , 

कभी तो कहीं पधारो।   


मित्रो, दोस्तों, यारो, 

कभी तो पुकारो।  

Thursday, December 1, 2022

वो भी इक दौर था ...

 कभी दो कमरों में रहता था छह जनों का परिवार,

अब छह कमरों के मकान में दो जनों का ठौर है। 

घर में बच्चे बड़े और बुजुर्ग मिल जुल कर रहते थे,

अब बुजुर्गों के अलावा घर में रहता न कोई और है। 

जो गुजर गया वो भी इक दौर था, ये भी इक दौर है। 


कुएं का मीठा पानी पीते, लेते स्वच्छ वायु में सांस,

अब RO का नकली पानी, हवा में धुआं घनघोर है। 

वहां हरे भरे खेतों की पगडंडी पर मीलों तक चलना,

यहां जिम की घुटन में ट्रेड मिल पे चलने पर जोर है। 

शुद्ध सा वो भी इक दौर था, अशुद्ध ये भी इक दौर है। 


ब्याह शादियों में समुदाय का शामिल होना था जरूरी,

अब वॉट्सएप ज़माने में शादी के न्यौते भी कमजोर हैं। 

चौपाल में बुजुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ लगती थी मधुर,

अब वॉट्सएप फेसबुक में सबके जीवन की डोर है।

मस्त मस्त वो भी इक दौर था, पस्त ये भी इक दौर है।

Wednesday, October 19, 2022

विदेश की चमक धमक में इंसान अकेला ...

अकेले दुकेले मिलते हैं, वे फैमिली के झमेले नहीं मिलते,

अकेले दुकेले जो मिलते हैं, वे हम जैसे वेले नहीं मिलते।


थैंक्स और प्लीज़ कहने की तहज़ीब है इस कदर कि,

मीठे केले तो मिलते हैं, पर वो कड़वे करेले नहीं मिलते।


सड़कों पर गाड़ियों की रैलियां तो निकलती है रात दिन,

पर शहर की गलियों में नर नारियों के रेले नहीं मिलते। 


सुख समृद्धि के सभी साधन हैं यहां सभी को मुहैया,

पर वे होली और दशहरा दीवाली के मेले नहीं मिलते।


हाथ में मोबाइल और कान में ईयर फ़ोन लगा 'तारीफ',

अकेले हैं पर साथ बैठ गपियाने वाले अकेले नहीं मिलते। 



Wednesday, September 28, 2022

विदेश में रह कर अर्जित ज्ञान --

 विदेश का ज्ञान:


जेब में रुमाल, पर्स में पैसे और 

बैक पॉकेट में कंघी नज़र आए तो 

समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है। 


ऊंची बिल्डिंग्स की चोटी को ऐसे देखे 

कि सिर से टोपी ही गिर जाए तो 

समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है। 


आस पास हर शख्स को ताके झांके

और किसी हूर को घूरता नज़र आए तो 

समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है। 


बस का सफ़र हो या ट्रेन का

आते ही चलो चलो बोलने लग जाए तो

समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है। 


चौराहे पर खड़ा हो या जेब्रा क्रॉसिंग

गाड़ी को आते हुए देखते ही रुक जाए तो

समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है। 


बंदा हिंदुस्तानी हो और आपके सामने से

यूँ अकड़ कर निकले जैसे टॉम क्रूज हो तो 

समझ जाओ कि बंदा पक्का हिंदुस्तानी है।

Thursday, July 28, 2022

विदेशी बच्चे और स्वदेशी मात पिता की मज़बूरी --

खुले दरवाज़े की 

बंद जाली के पीछे से 

बूढी अम्मा की पथराई आँखें,

ताक रही थीं सूने कॉरिडोर को।  

इस आशा में कि कोई तो आए, 

या कोई आता जाता ही दिख जाए।  


लेकिन बड़े शहर की 

पॉश बहुमंज़िला ईमारत के, 

एक ब्लॉक के २८ मकानों में 

रहते ही थे ३० लोग ।  

कई मकान थे खाली, कइयों में  

नव विवाहित किरायेदार।  

और बाकियो में रह रहे थे अकेले 

विदेशों में बस गए युवाओं के 

मां-बाप, जो दिखते  

बूढ़े हाथों में सब्ज़ियों का थैला उठाये।   

या खाली मां या अकेला बाप

बूढी अम्मा की तरह।  


ऐसा नहीं कि विदेशी बच्चे 

मात पिता की परवाह नहीं करते।  

अमेज़ॉन से हर दूसरे दिन 

कोई न कोई पैकेट भिजवाकर   

रखते हैं पूरा ख्याल।  

कभी चिप्स, कभी ड्राई फ्रूट्स तो कभी कोला, 

लेकिन जब घर आने के लिए बोला ,

तो बेटे को महँगी टिकट का ख्याल 

मां बाप से ज्यादा आता है।  

बहु को भी बच्चों का बंधन 

बड़ा नज़र आता है।  


उन्ही बच्चों का लालन पालन  

इन्हीं मात पिता ने इसी तरह किया था 

अपने अरमानों पर अंकुश लगाकर।  

आबादी भले ही १४० करोड़ पार कर जाये, 

देश भले ही विश्व में नंबर एक पर आ जाये।  

पर उनका तो एक ही बच्चा है ,

बूढी अम्मा समझती है 

बेटे की दूरी और दूरी की मज़बूरी।  


बस मोतियाबिंद से धुंधलाई आँखों की 

सूखी पलकों में ,

अश्क का एक कतरा अटक गया है। 

कॉरिडोर और धुंधला नज़र आ रहा है , 

शायद कोई आ रहा है, 

या फिर 

कोई आने जाने वाला जा रहा है।   


नोट : यह रचना किसी को रुला भी सकती है।    

Saturday, July 23, 2022

प्रेशियस चाइल्ड की देखभाल --

आज फिर हमने कटिंग कराई,

आज फिर अपनी हुई लड़ाई।

हमनें कहा नाई से,

बाल ज़रा कुछ तो काटो भाई।


ले लो भले ही जितना माल चाहिए,

वो बोला,

काटने के लिए भी तो बाल चाहिए।

सिर पर चार बाल हैं, क्या छाटूँ,

समझ नहीं आता किसे छोडूं किसे काटूं।


जब पैसे देने की बारी आई,

तो हमने दलील सुनाई,

कि अब पैसे भी अनुपात में ही लो भाई।

वो बोला, जनाब

कीमत तो चार बाल की भी पूरी देनी पड़ती है,

आखिर प्रेशियस चाइल्ड की देखभाल

तो सबसे ज्यादा करनी पड़ती है।