Friday, October 26, 2018

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ---



किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई !

तीन तीन नौकरों की मेहनत लगी थी ,
साथ में मशीनों की मशक्कत लगी थी ।
वक्त की पाबन्दी की दिक्कत सच्ची थी ,
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी।

नकली फूलों से धूल की धुलाई मार गई,
कई फालतू सामान की फेंकाई मार गई।
खाली खड़े खड़े टांगों की थकाई मार गई,
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।

वैसे तो हम मोदी जी के भक्त बड़े थे ,
स्वच्छता अभियान के भी पीछे पड़े थे।
पॉलिटिक्स में 'आप' के ना साथ कड़े थे,
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।

डर डर करते लाइट्स की सफाई मार गई,
गमलों में सूखे पौधों की छंटाई मार गई।
घर भर के साफ पर्दों की धुलाई मार गई ,
नौकर बनाके हमें आपकी भौजाई मार गई।

किताबों पे देखा कि काफी धूल चढ़ी थी,
मिली वो चीज़ें जो अर्से से खोई पड़ी थी।
क्या रखें क्या फेंकें ये मुसीबत बड़ी थी ,
उस पर डंडा लेकर हाथ में बीवी खड़ी थी।

वाट्सएप के लेखों की लंबाई मार गई,
आभासी संदेशों की बधाई मार गई ।
दोस्तों के फोन्स की बेरुखाई मार गई ,
जूए में हारे हज़ारों की बुराई मार गई।

दफ्तर में जब हम बड़े अफ़सर होते थे ,
दीवाली पर कमाई के अवसर होते थे ।
जाने अनजाने लोग गिफ्ट्स लाते थे ,
हम भी बॉस और मंत्री जी के घर जाते थे ।

पीछे छूटे गिफ्ट्स की लुटाई मार गई ,
दफ्तर में होते जश्न की जुदाई मार गई।
लोगों से बिछड़े ग़म की तन्हाई मार गई ,
रिटायर होकर दफ्तर से विदाई मार गई।

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई !

Saturday, October 20, 2018

रावण -- एक विचार ...


जलते हए रावण ने
जलाते हुए बन्दों से कहा ,
अरे आधुनिक भक्तो
हर साल मुझे जिलाते हो ,
फिर जिन्दा ही जलाते हो !
ऐसी क्या थी मेरी खता
जो इतने मुझसे हो खफा !
अधूरा सा ही तो था गुनाह
फिर क्यों करते हो मेरा दाह !
देखो अपने आस पास
कितने क़ुरावण रहते हैं !
हरण होती हैं रोज सीतायें
जिनके निशाँ तक मिट जाते हैं !
जाओ पहले किसी ऐसे एक
असुर को सज़ा दिलाकर दिखाओ !
तब ऐ कलयुगी भक्तों तुम मुझे जलाओ !

# एक विचार #

Wednesday, October 17, 2018

मी टू --

जिस तरह ''मी टू'' अभियान के अंतर्गत एक के बाद एक आरोप लगाए जा रहे हैं, यह कोई हैरानी की बात नहीं बल्कि एक ऐसी हकीकत है जो ''टिप ऑफ़ द आइसबर्ग'' की तरह है। समाज में यौन शोषण केवल बच्चियों और महिलाओं का ही नहीं होता बल्कि लड़कों का भी होता आया है। ऐसा पाया गया है कि १८ साल की उम्र तक १५-२० % लड़के यौन शोषण का शिकार हो चुके होते हैं।  एक सर्वेक्षण के अनुसार ३०% बच्चों के यौन शोषण में जान पहचान वाले या रिश्तेदारों का ही हाथ होता है। निसंदेह इसे रोकने के लिए इस विषय को उजागर करना अत्यंत आवश्यक है।

अब सरकार ने कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौनाचार पर रोक लगाने के लिए आवश्यक अधिनियम लागु किया हुआ है जिसके अंतर्गत कोई भी महिला अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार के बारे में गठित समिति से शिकायत कर दोषी के विरुद्ध कार्रवाई करा सकती है। लेकिन निजी क्षेत्र में विशेषकर सिनेमा जैसे आकर्षक व्यवसाय में महिलाओं की सुरक्षा के कोई पुख्ता उपाय न होने और कलाकारों का व्यक्तिगत रूप से निर्देशक आदि पर निर्भर होने के कारण महिला कलाकारों का यौन शोषण सदा ही होता आया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हालाँकि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अक्सर कहीं न कहीं महिलाएं भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं।  लेकिन समाज में महिलाओं की सुरक्षा का उत्तरदायित्त्व सभी पर है और कर्तव्य भी है। इस दिशा में कानून को भी सख्ताई से पेश आना चाहिए।         

Thursday, October 11, 2018

गूगल महाराज की जय --




कुछ ढूंढते ढूंढते हमने देखा कि गूगल सर्च में कुछ भी सर्च करो तो फ़ौरन सारी जानकारी आसानी से मिल जाती 
है।  बस हमने यूँ ही उत्सुकतावश पूछ लिया कि -- Who is Dr T S Daral ? क्लिक करते ही गूगल ने बताया कि 
इसकी जानकारी ११,९०,००० pages में समायी है।  हमने कुछ को खोलकर देखा तो ऐसी ऐसी जानकारियां मिली 
जिनकी जानकारी हमें खुद भी नहीं थी। एक तरह से जब से देश ने कंप्यूटर पर काम करना शुरू किया है, तब 
से अब तक की सारी बातें , कुछ सच्ची , कुछ झूठी , गूगल ने बता डाली। अब एक बात तो तय है कि मनुष्य 
विशेष रहे या न रहे, जब तक सूरज चाँद और गूगल रहेगा, तब तक इंसान तेरा नाम रहेगा। यह फोटो भी हमें 
गूगल से ही मिली      

Thursday, October 4, 2018

एक दिल , कई अफ़साने :


दिल धड़कता है तो समझो,
जीवन का संचार है।

दिल जोर से धड़कता है तो समझो,
किसी से हुआ प्यार है।

दिल फड़फड़ाता है तो समझो, 

बंदा दिल का बीमार है।

दिल धड़कना बंद कर दे तो 

बाय बाय नश्वर संसार है।

दिल बड़ा नाज़ुक होता है ,

ये सदा टूटने को तैयार है।

दिल का रखो पूरा ध्यान, 

यही तो जीवन का आधार है।

Saturday, September 22, 2018

सरकारी अस्पताल --


सरकारी अस्पतालों में क्षमता से ज्यादा रोगियों के आने से सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। ओ पी डी में एक डॉक्टर को एक रोगी को देखने के लिए औसतन मुश्किल से डेढ़ मिनट का ही समय मिलता है। वार्डस में एक बेड पर दो या तीन मरीज़ों को भर्ती किया जाना आम बात है।  हमने डेंगू के समय एक बेड पर चार रोगियों को भर्ती होते देखा है। बच्चों के अस्पताल में एक बेड पर जब तीन बच्चे होते हैं तो माँओं को मिलाकर यह संख्या ६ हो जाती है। उस पर डॉक्टर्स और अन्य कर्मचारियों की सीमित संख्या के साथ साथ जगह की भी कमी महसूस होती है क्योंकि अधिकांश बड़े अस्पताल वर्षों पहले बनाये गए थे और तब किसी ने भविष्य में मरीज़ों की संख्या के बारे में अनुमान नहीं लगाया होगा।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि किस तरह सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को सुधारा जाये ताकि अस्पताल में आने वाले रोगियों को उपचार में ज्यादा इंतज़ार न करना पड़े और उन्हें संतुष्टि भी हो। सैद्धांतिक हल तो बहुत हैं लेकिन कोई व्यावहारिक/ वास्तविक हल सुझाईये जिसे कार्यान्वित कर हम भी अपने अस्पताल में स्वास्थयकर्मियों और रोगियों, दोनों को कुछ राहत प्रदान कर सकें।   

Wednesday, September 12, 2018

ओ स्त्री कल आना --


ओ स्त्री कल आना :

मध्यप्रदश के एक ऐतिहासिक कस्बे चंदेरी की पृष्ठभूमि में फिल्माई गई हिंदी फिल्म "स्त्री" एक हॉर्रर कॉमेडी फिल्म है जिसे देखते हुए लोगों की चीख और हंसी एक साथ फूट पड़ती है। एक महिला पर हुए अत्याचार के कारण महिला की मृत्यु और उसका भूत बनकर गांव / कस्बे के मर्दों को अँधेरी रात में नाम से बुलाकर उनके कपडे उतारकर गायब करने की कहानी के दृश्य अँधेरी सूनी गलियों में बड़ी खूबसूरती से फिल्माए गए हैं। अंधकार में सुनसान जंगली रास्तों पर तीन दोस्तों में से एक का अपहरण और बैकग्राऊंड में अचानक आती तेज आवाज़ दर्शकों को डराने में सफल रहती है। राजकुमार राव का अभिनय एक बार फिर ज़बरदस्त रहा।  फिल्म में एक सस्पेंसफुल भूमिका में श्रद्धा कपूर का रोल और उपस्थिति मनमोहक लगी। अन्य कलाकारों का अभिनय भी सराहनीय है। 

भूत को दूर रखने के लिए अधिकांश घरों के बाहर लाल पेंट से "ओ स्त्री कल आना" लिखा होता है ताकि भूतनी उसे पढ़कर वापस चली जाये। जहाँ नहीं लिखा होता या यदि लिखे हुए को मिटा दिया गया तो वहीँ भूतनी आकर अपना काम कर जाती है। फिल्म को देखकर आनंद तो आता ही है, साथ ही एक बार फिर भूत प्रेतों की दुनिया के बारे में सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है। हालाँकि भूत प्रेतों की कहानियां कपोल कल्पित ही होती हैं जिन पर देहाती लोगों का अंधविश्वास उन्हें मानने के लिए मज़बूर कर देता है। लेकिन इस फिल्म को देखकर महिला के तथाकथित भूत से सहानुभूति और नायक की दृष्टि से प्यार सा होने लगता है। एक बारगी तो लगने लगता है कि काश भूत महिला सदा के लिए ही लड़की के भेष में जिन्दा रह जाती।