Tuesday, June 23, 2020

मूंछों पर कोरोना की मार --



एक मित्र हमारे ,
बन्दे सबसे न्यारे।

मूंछें रखते भारी   ,
सदा सजी संवारी ।

कोई छेड़ दे मूंछों की बात ,
फरमाते लगा कर मूछों पर तांव।

भई मूंछें होती है मर्द की आन ,
और मूंछ्धारी , देश की शान ।

जिसकी जितनी मूंछें भारी ,
समझो उतना बड़ा ब्रह्मचारी ।



फिर एक सुहाने सन्डे ,
जोश में आकर , मूंछ मुंडवाकर ,
बन गए मुंछ मुंडे।


मैंने कहा मित्र , अब क्या है टेंशन ,
माना कि साइज़ जीरो का है फैशन।

और फैशन भी है नेनो टेक्नोलोजी का शिकार ,
तो क्या ब्रह्मचर्य को छोड़ इस उम्र में ,
अब बसाने निकले हो घर संसार ।


वो बोला दोस्त , ये फैशन नहीं ,
रिसेशन की मार है ।
जिससे पीड़ित सारा संसार है ।

और मैंने भी मूंछें नहीं कटवाई हैं ,
ये तो खाली कॉस्ट कटिंग करवाई है ।

अरे ये तो घर की है खेती ,
फिर निकल आएगी ।

पर सोचो जिसकी नौकरी छूटी ,
क्या फिर मिल पाएगी ?

वो देखो जो सामने बेंच पर बैठा है ,
अभी अभी पिंक स्लिप लेकर लौटा है ।

और ये जो फुटपाथ पर लेटा है ,
शायद किसी मज़दूर का बेटा है ।

दो दिन हुए शहर से गांव आया है ,
तब से एक टूक भी नहीं खाया है ।

कृषि प्रधान देश में ये जो नौबत आई है,
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।

अरे अन्न के भरे पड़े हैं भंडार ,
फिर क्यों मची खाने की दुहाई है !


ग़र देश की जनता में हो अनुशासन ,
लॉक डाउन के नियमों का करें पालन।

हाथ धोते रहें बार  बार ,
बाहर जाएँ तो मास्क पहने हर बार। 

लक्ष्मण रेखा का ना अतिक्रमण हो ,
फिर कभी ना कोरोना का संक्रमण हो।

देश जब कोरोना मुक्त हो जायेगा ,
खुशहली का वो दौर फिर आएगा।

जनता जब भय मुक्त हो जाएगी,
तो भैया ये मूंछें भी तब लम्बी हो जाएँगी ।


माना कि मूंछें मर्द की आन हैं ,
मूंछ्धारी देश की शान हैं ।

मगर इस मंदी की मार से ,
कोरोना से मचे हाहाकार से ,
ग़र सबको मिले मुक्ति ,
तो ये मूंछें , एक नहीं ,
बारम्बार कुर्बान हैं , बारम्बार कुर्बान हैं ।


Monday, April 27, 2020

कोरोना को भगाना है तो घर बैठो और आराम करो --



एक मित्र बोले भैया आजकल कहां दुम दबाकर बैठे हो ,
इस कोरोना के डर से क्यों घर में मुँह छुपाकर रहते हो ।
क्या रखा है बेवज़ह डरने में, कभी मित्रों से मुलाकात करो,
कब तक डर कर घर बैठोगे, कभी मिलकर हमसे बात करो।
हम बोले सुनो मोदी जी को और ३१ मई तक पूर्ण विराम करो ,
कोरोना को भगाना है तो घर बैठो और आराम करो आराम करो।


आराम स्वास्थ्य का शस्त्र है जिससे क्वारेंटाइन होता है,
आराम ही ऐसा अस्त्र है जो कोरोना संक्रमण को खोता है।
आराम शब्द में राम है रहता जो पुरुषों में उत्तम होता है,
आ राम आ राम रटने से तो कोरोना वायरस भी डरता है।
इसलिए मैं कहता हूँ तुम भी घर बैठो कुछ ना काम करो ,
लॉकडाउन का पालन करो और आराम करो आराम करो।


यदि कुछ करना ही है तो घर के छूटे पूर्ण काम करो ,
सुबह शाम आसन लगाकर घर में ही व्यायाम करो।
क्या रखा बाहर जाने में जो मज़ा है घर में रहने में ,
जो खाली रहने में लुत्फ़ है, वो कहाँ आवारा फिरने में ।
मुझसे पूछो मैं बतलाऊँ, है मज़ा सुस्त कहलाने में ,
ज्यादा खाने में क्या रखा जो रखा सीमित खाने में।


मैं यही सोचकर घर से बाहर, कम ही जाया करता हूँ ,
जो गले पड़ने के आदि होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दिन में एक बार दूध लेने को घर से बाहर जाया करता हूँ,
पुलिस के डंडे के डर से जल्दी घर वापस आया करता हूँ।
मेरी वॉल पर लिखा हुआ, जो देश प्रेम में कौशल होते हैं,
वे केवल फेसबुक और वाट्सएप्प पर ही सोशल होते हैं।


अब नहीं ऑफिस जाने की चिंता, ये सोचकर आनंद आता है,
पेट्रोल , पार्किंग और प्रदूषण से , मन स्वच्छंद हो जाता है।
सुबह से शाम सारा समय , जब अपना नज़र आता है ,
तो सच कहता हूँ जीने का जैसे , मज़ा निखर आता है।
लेकर हाथ में चाय का प्याला फिर मैं बालकनी में बैठ जाता हूँ ,
धरा पर हरा और स्वच्छ आसमां के नीले रंगों से जुड़ जाता हूँ।


तुम को भी मैं कोरोना से बच कर रहने का ये राज़ बता देता हूँ ,
छींकते खांसते वक्त मुँह पर पकड़ा रखो ये सीख सदा देता हूँ।
मैं आरामी हूँ मुझको तो अब सब बस इसी नाम से जानते हैं ,
किन्तु उनको खांसी से चैन नहीं जो लॉकडाउन को नहीं मानते हैं।
इसीलिए मैं कहता हूँ तुम घर बैठो और मेरी तरह से काम करो ,
दो गज की दूरी रखो सबसे , और आराम करो आराम करो।

Monday, April 13, 2020

लॉकडाउन की जिंदगी --


लॉकडाउन जब हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर दो वस्त्र हों और खाने को दो रोटी ,
फिर बस अदरक वाली चाय चाहिए पीने के लिए ।

पैंट कमीज़ जूते घड़ी सब टंगी पड़ी बेकार ,
बस एक लुंगी ही चाहिए तन ढकने के लिए ।

कमला बिमला शांति पारो का क्या है करना ,
ये बंदा ही काफी है झाड़ू पोंछा करने के लिए। 

वर्क फ्रॉम होम को वर्क एट होम समझा कर ,
मैडम एक गठरी कपड़े और दे गई धोने के लिए ।

ग़र नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजारा करने के लिए ।

हैण्ड वाशिंग मुंह पे मास्क रेस्पिरेटरी हाइजीन और,
लॉकडाउन का पालन करो कोरोने से बचने के लिए। 

आदमी तो बेशक हम भी थे काम के 'तारीफ़',
किन्तु घर बैठे हैं केवल औरों को बचाने के लिए। r

   

Monday, March 30, 2020

लॉकडाउन की मज़बूरी --


शोर मचाते
छोटे छोटे बच्चे
'बेघर' नर नारी
'घर' जाने को आतुर
जा रहे थे एक ओर
अपने अपने 'घरों' से निकल।
जाने वालों की कतारें में
हज़ारों की भीड़ देख
आने लगे वापस
जाने को विद्यालय
मिटाने को भूख
सरकारी लंगर में।
भूख और आशियाना
कोरोना पर भारी पड़ गया।
हम खड़े खड़े देखते रहे
सातवें माले की बालकनी से
लॉकडाउन के नाज़ुक
ताले को टूटते हुए।

Wednesday, March 25, 2020

डेढ़ सौ साल पहले लिखी गई कविता आज चरितार्थ हो रही है --


और लोग घरों में बंद रहे
और पुस्तकें पढ़ते सुनते रहे
आराम किया कसरत की
कभी खेले कभी कला का लिया सहारा 
और जीने के नए तरीके सीखे।
फिर ठहरे
और अंदर की आवाज़ सुनी
कुछ ने ध्यान लगाया
किसी ने की इबादत
किसी ने  नृत्य किया
कोई अपने साये से मिला
और लोगों का नजरिया बदला।
लोग स्वस्थ होने लगे 
उनके बिना जो थे नासमझ 
ख़तरनाक़, अर्थहीन, बेरहम 
और समाज के लिए खतरा।
फिर ज़मीं के जख्म भी भरने लगे
और जब खतरा खत्म हुआ 
लोगों ने एक दूसरे को ढूँढा 
मिलकर मृत लोगों का शोक मनाया अंग्रेज़ी
और नया विकल्प अपनाया 
एक नयी दृष्टि का स्वप्न बुना
जीवन के नए रास्ते निकाले
और पृथ्वी को पूर्ण स्वस्थ बनाया
जिस तरह स्वयं को स्वस्थ बनाया।

* एक मित्र से प्राप्त कैथलीन ओ मीरा (Kathleen O'Meara) द्वारा १८६९ में अंग्रेजी में लिखित कविता का हिंदी रूपांतरण।  

Saturday, March 21, 2020

कोरोना और वर्क फ्रॉम होम --


कोरोना का कहर जब शहर में छाया ,
तब हुकमरान ने ये फरमान सुनाया।

कि स्कूल, कॉलेज, ज़िम, क्लब सब होंगे बंद ,
पर हमें तो वर्क फ्रॉम होम का आईडिया बड़ा पसंद आया।

लेकर बुजुर्गी का सहारा हमने अर्ज़ी लगाई,
कि कमज़ोर तो नहीं है ये साठ साल की काया।

इसलिए कोरोना से तो हम कभी ना डरेंगे ,
परन्तु कल से हम वर्क फ्रॉम होम ही करेंगे।

किन्तु पत्नी को देर न लगी ये बात समझते ,
कि घर तो क्या हम तो ऑफिस में भी कुछ काम नहीं करते। 

हम भी वर्क फ्रॉम होम का मतलब तब समझे ,
जब पत्नी ने कहा कि अब ये सुस्ती नहीं चलेगी।

उठो और हाथ में झाड़ू पोंछा सम्भालो,
आज से कामवाली बाई भी वर्क फ्रॉम होम ही करेगी।



Monday, March 16, 2020

इस साल गले मिलने को गले ही नहीं मिले --


हर साल होली पर मिलते थे हर एक से गले,
इस साल गले मिलने वाले वो गले ही नहीं मिले।  

कोरोना का ऐसा डर समाया दिलों में,
कि दिलों में ही दबे रह गए सब शिकवे गिले।

पडोसी पार्क में बुलाते रहे पकौड़े खाने को,
डरे सहमे लोग अपने अपने घरों से ही नहीं हिले।

ना निकली बस्ती में मस्तों की टोली,
ना पिचकारी ना रंग गुलाल ही लगे भले। 

ना रंग बरसे ना भीगी किसी की चुनड़िया,
लेकर गुलाल बुजुर्ग भी बैठे रह गए पेड़ों तले।

गुमसुम से रहे कवि जेब रह गई खाली,
होली के कवि सम्मलेन भी जब कल पर टले।

होलिका तो जल गई होली दहन में ,
ये मुए कोरोना वायरस फिर भी नहीं जले।

जले मगर मकान और दुकानें तो बहुत ''दोस्तों'',
अब दुआ करो कि कोरोना नहीं सद्भावना फूले फले।