Thursday, October 10, 2019

ज़ुर्माने के हंगामे पर एक पैरोड़ी --



जुर्माना है क्यों इतना, थोड़ी सी तो ही पी है,
नाका तो नहीं तोड़ा, लाइट जम्प तो नहीं की है। 

क्यों उनको नहीं पकड़ा , जिनके हैं शीशे काले ,
क्या जाने उस गाड़ी में , बैठा कोई बलात्कारी है। 

जुर्माना है क्यों इतना ,थोड़ी सी तो ही पी है,
शीशा तो नहीं काला , लाइन क्रॉस भी नहीं की है।...

गाड़ी को लगे धक्का, ट्रैफिक के नतीज़े हैं ,
धुत हमको कहे मालिक, खुद जिसने ही पी है ।

जुर्माना है क्यों इतना. , थोड़ी सी तो ही पी है,
स्पीड लिमिट तो क्रॉस नहीं की, पी यू सी भी है।...

नासमझ और नादाँ, लोगों की ये बातें हैं ,
स्कॉच को क्या जाने, देसी जिसने पी है ।
जुर्माना है क्यों इतना..

हर ठर्रा निकलता है , मंज़ूर ऐ सिपाही से ,
हर बेवड़ा कहता है , रम है तो नशा भी है।

जुर्माना है क्यों इतना, थोड़ी सी तो ही पी है,
नाका तो नहीं तोड़ा, लाइट जम्प तो नहीं की है।

जुर्माना है क्यों इतना...

नोट : यह व्यंगात्मक हास्य पैरोडी सिर्फ यातायात के नियम तोड़ने वालों पर लिखी गई है।


Tuesday, October 1, 2019

मोटर वाहन अधिनियम लागु हो रहा है धीरे धीरे --


जो दौड़ते थे ८० -९० पर , सरकने लगे हैं धीरे धीरे।
मेरे शहर के लोग आखिर, बदलने लगे हैं धीरे धीरे।

हाथ में लटकाकर हेलमेट, उड़ती थी हवा में ज़ुल्फ़ें,
गंजे सर भी अब तो हेलमेट,पहनने लगे हैं धीरे धीरे।

डंडे के डर से मदारी, नचाता है अपने बन्दर को ,
चालान के डर से इंसान, सरकने लगे हैं धीरे धीरे। 

ड्रंक ड्राइविंग का ख़ौफ़, रहता था ११ बजे के बाद ,
मदिरा छोड़ अब फ्रूट जूस , गटकने लगे हैं धीरे धीरे।

देर से ही सही मोटर वाहन अधिनियम आया तो ,
धीरे धीरे ही सही लोग, सुधरने लगे हैं धीरे धीरे।

Wednesday, September 25, 2019

फेसबुक के चक्कर में ब्लॉगिंग भूल गए --

फेसबुक पर हम इतना झूल गए,
के कविता ही लिखना भूल गए।

जिसे देनी थी जीवन भर छाया ,
उस पेड़ को सींचना भूल गए।

मतलब में अपने कुछ ऐसे डूबे,
देश पर मर मिटना भूल गए ।

नींद में देखते रहे जिसे रात भर ,
आँख खुली तो वो सपना भूल गए।

बड़े भोले थे जाल में जा फंसे ,
फंसे तो पर निकलना भूल गए।

आँखों पर ऐसा पर्दा पड़ा यारो,
भीड़ में कौन है अपना भूल गए।

Tuesday, September 3, 2019

यदि देश में विकास लाना है तो जनता को अनुशासित होना पड़ेगा --


बचपन में अक्सर नेताओं और मंत्रियों को विदेश जाते देखते थे जो सरकारी खर्चे पर अपने विभाग से सम्बंधित विषय पर जानकारी प्राप्त करने के लिए विदेश का दौरा बनाते थे।  उनके साथ परिवार के सदस्य और विभाग के ऑफिसर्स भी जाते थे। इस तरह हर दौरे पर सरकार के लाखों रूपये खर्च होते थे जो आज के करोड़ों के बराबर होते होंगे। 
लेकिन अपने स्वयं के खर्चे पर विदेश जाकर जो हमने देखा तो पाया कि विदेशों की विकसित व्यवस्था का ज़रा सा भी प्रभाव या अनुसरण यहाँ नज़र नहीं आता। ऐसा प्रतीत होता है कि ये दौरे मात्र सैर सपाटे के लिए ही उपयोग में लाये गए।  आइये देखते हैं टोरंटो कनाडा जैसे शहर में किस तरह की नागरिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं जो हमारे यहाँ नहीं हैं।

सड़कें :

टोरंटो की सड़कें एकदम साफ और समतल हैं।  कहीं कोई गड्ढा नज़र नहीं आता। शहर हो या हाइवे , गाड़ियां सुचारु रूप से चलती हैं। तापमान में बदलाव के कारण सडकों में दरारें अवश्य आती हैं लेकिन इन्हे तुरंत भर दिया जाता है। ज़ाहिर है, सडकों में लगायी गई सामग्री उत्तम गुणवत्ता और बिना किसी मिलावट के होती है। सड़क पर कोई वाहन चालक हॉर्न नहीं बजाता। सभी शांति के साथ बत्ती हरी होने का इंतज़ार करते हैं।  स्टॉप लाइन को कोई पार नहीं करता। पैदल लोगों के लिए भी ज़ेबरा क्रॉसिंग पर लाइट होती है जिस पर हाथ बना होता है।  जहाँ लाइट नहीं होती वहां वाहन चालक पैदल को प्राथमिकता देते हैं। वहां की सडकों पर पैदल चलने वालों का पूरा ध्यान रखा जाता है।  यदि किसी को चोट लग जाये तो भारी जुर्माना होता है। सडकों पर मुख्यतया कारें ही चलती हैं।  हाइवे पर कुछ ट्रक भी नज़र आ जायेंगे। आपको एक भी गाड़ी पर कोई खरोंच या डेंट नज़र नहीं आएगा। सभी कारें साफ और चमचमाती हुई नज़र आती हैं। इन्हे धोने के लिए ऑटोमेटेड वाशिंग स्टेशन्स होते हैं जिसमे कार में ही बैठकर जाना पड़ता है। 

सार्वजनिक परिवहन :

शहर में कारें भी चलती हैं।  लेकिन बसें भी बहुतायत में हैं। बसों के अलावा ट्राम भी चलते हैं। दोनों का एक कॉमन टिकट होता है जिसे एक ही दिशा में  जाने के लिए अंत तक उपयोग में लाया जा सकता है।  टिकट खुद ही लेना पड़ता है। यहाँ सब ईमानदारी से टिकट खरीदते हैं।  बिना टिकट पकड़े जाने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।  हालाँकि हमें एक भी टिकट चेकर नज़र नहीं आया। शहर से बाहर सबअर्ब जाने के लिए ट्रेन चलती है जो बहुत ही आरामदायक है।  सबअर्ब में रहने वाले गाड़ी स्टेशन पर पार्क करते हैं और ट्रेन द्वारा डाउनटाउन में काम करने आते हैं। 

पार्किंग :

गाड़ियां सिर्फ पार्किंग में ही पार्क होती हैं। सडकों पर भी एक साइड में पार्किंग स्लॉट्स बने होते हैं जिसमे आप गाड़ी पार्क कर सकते हैं।  वहीँ साथ में पेमेंट के लिए किऑस्क बना होता है जिसमे कार्ड से पेमेंट कर टिकट ले लिया जाता है।  कहीं किसी भी पार्किंग में कोई अटेंडेंट नहीं होता। सब जगह ईमानदारी से स्वचालित होता है। 

सफाई :

शहर में कहीं भी कूड़ा या कूड़े के ढेर नज़र नहीं आते।  यहाँ कदम कदम पर डस्टबिंस रखे होते हैं जिनमे सामान्य कचरा और रिसाईक्लेबल वेस्ट अलग अलग डालना होता है। कूड़ा कभी ओवरफ्लो नहीं करता। कूड़ा ले जाने वाले ट्रक भी नज़र नहीं आते क्योंकि शायद वे रात में खाली किये जाते हैं। घरों में भी वेस्ट सेग्रिगेशन ईमानदारी से किया जाता है। हर घर में तीन तरह के बैग्स होते हैं। एक में आर्गेनिक वेस्ट दूसरे में प्लास्टिक आदि और तीसरे में सामान्य पेपर आदि।     

ड्रेनेज सिस्टम:

यहाँ अक्सर बारिश होती रहती है।  लेकिन पानी की निकासी इतनी बढ़िया है कि कहीं पानी इकठ्ठा नहीं हो पाता। कहीं कोई ओपन ड्रेन्स नज़र नहीं आती। सारा ड्रेनेज सिस्टम अंडरग्राउंड है। नालियां ब्लॉक होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 

शिष्टाचार :

वैसे तो यहाँ सब अपने आप में मस्त रहते हैं।  कोई किसी के काम में दखलअंदाज़ी नहीं करता। लेकिन सार्वजानिक स्थानों पर सब शिष्टाचार निभाते हैं।  पंक्ति में अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। कोई धक्का मुक्की नहीं करता।  बस या ट्रेन में पहले उतरने वाले उतरते हैं ,फिर चढ़ने वाले चढ़ते हैं। 

लगभग २८ लाख की आबादी वाले शहर टोरंटो में विश्व के लगभग सभी देशों से आये लोग रहते हैं। इनमे चीनी, भारतीय, फिलिपिनी , जापानी लोग बहुत हैं। लगभग ५० % गोर लोग हैं।  लेकिन सभी मिलजुल कर रहते हैं। जून से अगस्त तक के महीने गर्मियों के होते हैं जिनमे स्कूलों की भी छुट्टियां होती हैं। इस समय में यहाँ के लोग आउटडोर लाइफ को  एन्जॉय करते हैं।  सर्दियाँ अक्सर बहुत ठंडी होती हैं। लेकिन सभी घर फुल्ली एयर कण्डीशंड होने के कारण आरामदायक रहते हैं। 

भारत में १ सितम्बर से मोटर वेहिकल एक्ट लागु होने पर कुछ लोग बहुत हो हल्ला मचा रहे हैं। उनका कहना है कि अब पुलिस को ज्यादा रिश्वत देनी पड़ेगी।  यह बहुत अफसोसजनक विचारधारा है। यदि हमें अपने शहर और देश को भी विकसित देशों की तरह उच्च श्रेणी में लाना है और रहने लायक बनाना है तो जनता को अनुशासित होना पड़ेगा। जब तक जनता अपनी सोच नहीं बदलेगी , तब तक खाली सरकार के भरोसे रहकर कुछ उपलब्धि प्राप्त नहीं हो पायेगी। सरकार को भी भ्रष्ट तंत्र से जनता को मुक्ति दिलानी होगी ताकि सार्वजनिक कार्यों पर खर्च होने वाला पैसा कार्यों पर ही खर्च हो सके , न कि भ्रष्ट अफसरों और ठेकेदारों की तिजोरियों में समा जाये।       





  

Tuesday, July 16, 2019

उफ़्फ़ ये दिल्ली की सड़कें --

1.

सोते हुए आदमी ने जागते हुए आदमी से कहा ,
जाग जाओ।
जागते हुए आदमी ने सोते हुए आदमी से कहा ,
भाग जाओ।
ना जागता हुआ आदमी जागा ,
ना सोता हुआ आदमी भागा।
मैं सहमा सहमा , डरा डरा ,
सड़क पर खड़ा खड़ा देखता रहा।
जागते हुए आदमी को सोते हुए ,
और सोते हुए आदमी को भागते हुए।
मेरे जैसे और भी खड़े  थे अनेक ,
खड़े खड़े ये तमाशा देखते हुए।
हाथ में उठाये हुए स्मार्ट फोन
बन्दूक और तलवार की तरहाँ । 

2.

सड़क पर लम्बी लम्बी गाड़ियों के बीच, 
चला जा रहा था मस्त एक बाइक वाला, 
बाइक पर पांच गैस सिलेंडर टिकाये ।  

दूसरा जो शक्ल और अक्ल से दूधिया था,
ड्राइव किये जा रहा था टेढ़ा मेढ़ा होकर , 
बाइक की साइड में दो दो ड्रम लटकाये।  

तीसरा जो सब्ज़ीवाला था, स्कूटी पर, 
जैसे सरक रहा था , बस किसी तरह, 
आगे पीछे तीन तीन बोरियां अटकाए।  

बाइक वालों को बड़ी गाड़ियों वाले भी, 
देखते ही खुद साइड दिए जा रहे थे ,
उन बाइक वालों के बिना हॉर्न बजाये।  

दिल्ली की सडकों पर रोड़ रेज बहुत है, 
किन्तु सड़क पर यह समाजवाद देखकर ,
हमारी आँखों में कम्बख्त आंसू भर आये।  



Thursday, July 4, 2019

बाल यौन शोषण --

बाल यौन शोषण किसी न किसी रूप में सदियों से होता आया है।  भले ही वो इजिप्ट, ग्रीक या रोमन बाल वेश्यालयों का इतिहास हो या पाकिस्तान में बाल्की या आशना रीति , नेपाल में देवकी या दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा, बाल यौन शोषण सदियों से प्रचलित रहा है, लेकिन समाज में इसे कभी पहचाना नहीं गया। विश्वव में पहली बार पश्चिमी देशों में १९६० में बच्चों के शारीरिक शोषण की पहचान हुई। बाल यौन शोषण के अस्तित्व के बारे में तो १९८० के दशक में विश्व ने पहली बार जाना और माना। भारत जैसे विकासशील देशों में इस सामाजिक समस्या के बारे में जन जागरूकता अभी भी बहुत ही कम है। पता चला है कि विश्व भर में प्रति वर्ष १४ वर्ष से कम आयु के ४ करोड़ बच्चे किसी न किसी रूप में शोषण के शिकार होते हैं। ऐसा पाया गया है कि १८ वर्ष तक की आयु के हर ५-६ लड़कों में से एक लड़का कभी न कभी यौन शोषण का शिकार हुआ होता है। इनमे से अधिकांश मामले कभी उजागर नहीं होते।  और सबसे आश्चर्यजनक और कष्टदायक तथ्य यह है कि यौन शोषण करने वाला बहुधा बच्चे का कोई रिश्तेदार या जान पहचान वाला ही होता है। एक गैर सरकारी संगठन ''प्रयास'' द्वारा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय  के साथ मिलकर २००३ में १३ राज्यों में १६८०० बच्चों में किये गए सर्वेक्षण द्वारा पता चलता है कि लगभग ५० % बच्चे किसी न किसी रूप में शोषण का शिकार हुए होते हैं। लगभग ३०% का यौन शोषण जान पहचान के व्यक्ति द्वारा किया गया होता है। 

बच्चे देश के भावी नागरिक होते हैं। बालावस्था शारीरिक और मानसिक विकास का समय होता है।  इस कालावधि में हुआ कोई भी हादसा बच्चे के मन मस्तिष्क पर गहरी और अमिट छाप छोड़ जाता है। यह बच्चे के व्यक्तित्त्व पर अपरिवर्तनीय परिवर्तन का कारण बनता है। एक शोषित बच्चा बड़ा होकर स्वयं भी शोषक बन सकता है। बच्चे अक्सर मासूम होते हैं, सामाजिक बुराइयों को समझ नहीं पाते।  वे अपने बड़ों पर निर्भर भी होते हैं और अक्सर मानव अधिकारों से अनभिज्ञ और वंचित होते हैं। इसलिए बच्चे शोषण के लिए ग्रहणक्षम होते हैं। 

बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए अभिभावकों में यौन शोषण के लक्षणों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है। यदि बच्चे को चलने या बैठने में कष्ट हो रहा है, या अचानक उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया है , विधालय जाने में आनाकानी करने लगा है , शैक्षिक स्तर में गिरावट आ गई है , बुरे सपने आने लगे हैं , बिस्तर गीला करना आरम्भ कर दिया है, बच्चा अचानक ज्यादा या कम खाने लगा है , यौन सम्बंधित बातें करने लगा है या कोई गुप्त रोग या गर्भावस्था हो गई है तो ये लक्षण निश्चित ही बच्चे के यौन शोषण की सम्भावना की ओर इशारा करते हैं और ऐसे में अभिभावकों को सचेत हो जाना चाहिए।

बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए आवश्यक है कि पारिवारिक संबंधों को मज़बूत बनायें। बच्चे के व्यवहार और गतिविधियों पर ध्यान रखें।  नियमित रूप से बच्चे के अध्यापक के संपर्क में रहें।  जहाँ तक संभव हो , बच्चे को घर में अकेला ना छोड़ें और किसी भी रिश्तेदार पर आँख मूँद कर विश्वास ना करें।  बच्चे को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में अवश्य बताएं। यदि कुछ भी विपरीत नज़र आये तो फ़ौरन ध्यान दें और उचित कार्रवाई करें। आवश्यकता पड़ने पर "किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 (जेजे एक्ट)'' के अंतर्गत स्थापित ''बाल कल्याण समिति'' अथवा ''किशोर न्याय बोर्ड'' की सहायता लें। किसी भी अवस्था में सहायतार्थ १०९८ पर फोन कर चाइल्ड हेल्पलाइन की सहायता प्राप्त की जा सकती है। यथासंभव इस विषय पर समाज में अधिकाधिक रूप से विचार विमर्श करें ताकि जनसाधारण तक बाल यौन शोषण के बारे में जानकारी पहुँच सके। तभी बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह पायेगा।     

Thursday, June 6, 2019

चलो ज़रा हंस लिया जाये --

१.

अमीर पत्नी गरीब कवि पति से :  मेरे पास कोठी है , बंगला है , गाड़ी है , साड़ी है , हीरे हैं , जवाहरात हैं।  तुम्हारे पास क्या है !
कवि पति : मेरे पास कविता है , रचना है , कल्पना है , गीत है , नगमा है और नज़मा भी है।

कवि जी अब फुटपाथ पर रहते हैं।

२.

लेबर डे पर पत्नी पति से : देखो कल तापमान ४५ को पार कर गया।  अब आप आज ही ऐ सी की सर्विस कराइये , स्विच ख़राब है , वो भी बदलवाना पड़ेगा , और ये ट्यूब लाइट तो जलती ही नहीं।  फ्रिज में सारी बोतलें खाली पड़ी हैं, भर देना।  अच्छा ऑफिस जाते समय ये चैक जमा कराते जाना।  और शाम को सब्ज़ी लेते आना।  कभी कुछ काम भी कर लिया करो। 

बेटा  :  पापा, मज़दूर दिवस की बधाई।

३.

पत्नी ( दूर से चिल्ला कर ) : अज़ी कहाँ हो !
पति :  अब क्या हुआ ! मैं यहाँ बैठा हूँ शांति के साथ।
पत्नी कमरे में आकर : हे भगवान ! मैं तो डर ही गई थी। आप तो अकेले बैठे हैं।  कहाँ है शांति ?
पति : उसी को तो खोज रहा हूँ।

अगले दिन से कामवाली बाई की छुट्टी हो गई।

४.

पति ( बड़े प्यार से ) :  अज़ी आप बुरा ना माने तो मैं एक दो दिन के लिए मायके हो आऊं !
पति : भाग्यवान, तुलसी दस को छोड़कर भला कौन ऐसा पति होगा जो पत्नी के मायके जाने पर बुरा मानेगा !

पत्नी का मायके जाना कैंसिल।