Monday, June 18, 2018

देश को कैसे विकास की राह पर आगे ले जाएँ ---


हमारे देश की सबसे बड़ी और जन्मदाता समस्या है जनसँख्या। १३० + करोड़ की जनसँख्या में जिस तरह निरंतर वृद्धि हो रही है, उससे यह निश्चित लगता है कि अगले ५ वर्षों में हम चीन को पछाड़ कर विश्व के नंबर एक देश हो जायेंगे। लेकिन जिस तरह के हालात हमारे देश में हैं, उससे बढ़ती जनसँख्या अन्य समस्याओं की जन्मदाता बन जाती है। महंगाई , बेरोजगारी , संसाधनों की कमी , प्रदुषण और भ्रष्टाचार इसी की अवैध संतानें हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। हालाँकि निसंदेह देश का विकास सरकार के हाथ में है, लेकिन सिर्फ सरकार को दोष देना सर्वथा अनुचित है। जब तक देश के लोग अपना कर्तव्य नहीं समझेंगे और उसका पालन नहीं करेंगे , तब तक हालात बद से बदतर ही होते जायेंगे।

१. जनसँख्या :  १९८० के बाद जनसँख्या वृद्धि दर भले ही २.०  से घटकर 1.२ हो गई हो , लेकिन तथ्य बताते हैं कि पिछले ४० सालों में जनसँख्या लगभग दोगुनी हो गई है। २१वीं सदी में लगभग ३० % जनसँख्या बढ़ी है। इतनी स्पीड से कोई देश नहीं बढ़ रहा। ज़ाहिर है, बढ़ती जनसँख्या में गरीबों की संख्या ही ज्यादा बढ़ रही है।  आज देश में ८०% लोगों की आय न्यूनतम वेतन के बराबर या उससे भी कम है।  भले ही हमारे देश में करोड़पति और अरबपति लोगों की संख्या भी बहुत है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से तो हम नीचे और नीचे ही जा रहे हैं।

२. भ्रष्टाचार :  इस मामले में भी हम दूसरे देशों की अपेक्षा काफी आगे हैं। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त है। निजी संस्थानों और उपक्रमों में भी पैसा कमाना ही उद्देश्य रह गया है। नेता हों या ब्यूरोक्रेसी , अफसर हो या चपरासी , सभी अपना दांव लगाते रहते हैं।  कोई भी विभाग भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। सरकारी नौकरी हो या कोई  हो , पैसा या सिफारिश लगाकर काम कराना लोगों की आदत सी बन गई है।

३. कर चोरी : किसी भी देश या राज्य में अनंत काल से राजा या सरकारें जनता के लिए कार्य करने हेतु जनता से कर वसूलते आये हैं। यदि कर की राशि जनहित में खर्च की जाये तो इसमें कोई बुराई भी नहीं, बल्कि एक आवश्यक प्रक्रिया है। लेकिन हमारे देश में कर की चोरी करना एक आम बात है।  ऐसा लगता है कि सरकारी नौकरों को छोड़कर जिनका कर श्रोत पर ही काट लिया जाता है , कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से कर नहीं चुकाता।  भले ही आयकर हो या  बिक्री कर या फिर संपत्ति कर , कर चोरी एक आम बात है। बिना कर चुकाए सरकार से विकास की उम्मीद रखना भी एक बेमानी है। यहाँ सरकार का भी कर्तव्य है कि जनता से लिया गया कर देश के कार्यों में इस्तेमाल किया जाये न कि नेताओं और बाबुओं की जेब भरने के काम आये।     

४. नैतिकता : किसी भी देश में पूर्ण विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश के नागरिक नैतिक रूप से सशक्त ना हों। अक्सर हम बहुत सी समस्याओं को सरकार के भरोसे छोड़ देते हैं। जब तक सरकारी काम को भी हम अपना काम समझकर नहीं करेंगे, तब तक विकास में बढ़ाएं उत्पन्न होती रहेंगी।

५. अनुशासन : आज हमारे देश में अनुशासन की सबसे ज्यादा कमी है। घर हो या बाहर , सडकों पर , दफ्तरों में और अन्य सार्वजानिक स्थानों पर हमारा व्यवहार अत्यंत खेदपूर्ण रहता है।  सडकों पर थूकना , कहीं भी पान की पिचकारी मारना , खुले में पेशाब करना , गंदगी फैलाना , यातायात के नियमों का पालन न करना आदि ऐसे कार्य हैं जो हमें सम्पन्न होते हुए भी अविकसित देश की श्रेणी की ओर धका रहे हैं।   

६. अपराध : जनसँख्या अत्यधिक होने से अपराध भी बढ़ते हैं। लेकिन इसमें ज्यादा दोष है न्यायिक प्रणाली में ढील होना।  इंसान डर से ही डरता है।  डर सजा का या फिर जुर्माने का।  यदि डर ही न हो तो कोई भी इंसान बेईमान और हैवान बन सकता है।  विदेशों में कानून का सख्ताई से पालन किया जाता है।  इसलिए वहां कानून का उल्लंघन करने वालों की संख्या कम रहती है। लेकिन यहाँ चोरी , डकैती , लूटपाट , हत्या , बलात्कार और अपहरण जैसी वारदातें करते हुए अपराधी लोग ज़रा भी नहीं डरते। जांच पड़ताल में खामियां और न्याय में देरी  से बहुत से अपराधी साफ बरी हो जाते हैं जिससे अपराधियों का हौंसला और बढ़ जाता है।   

ज़ाहिर है, यदि हमें अपने देश को विकास की राह पर अग्रसर रखना है तो हमें सरकार पर पूर्णतया निर्भर न रहते हुए अपने फ़र्ज़ का पालन करते हुए विकास में अपना योगदान देना होगा।  तभी हमारा देश विकास की रह पर आगे बढ़ सकता है। वर्ना अमीर और अमीर होते जायेंगे और गरीब बहुत गरीब।  यह बिगड़ती हुई  सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था कभी भी विनाश की जड़ बन सकती है।    
    

Thursday, June 7, 2018

डर है तो इंसान है , वर्ना हैवान है ...

हम भारतीय अपने देश में जितना चाहे अराजकता फैला लें , लेकिन विदेश जाकर सभ्य इंसानों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देते हैं।  इसका कारण है वहां नियमों और कानून का सख्ताई से पालन किया जाना। यानि कोई नियम या कानून तोड़ने पर आपको भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। उस दशा में ना कोई चाचा ( सिफारिश ) काम आता है न ही धन दौलत ( रिश्वत )। इसका साक्षात उदाहरण हमने देखा अपने यूरोप टूर पर। आईये देखते हैं , कैसे :

१. सीट बेल्ट :

यूरोप में बस की सभी सीटों पर बैल्ट लगी होती हैं और हर यात्री को सीट बैल्ट बांध कर रखनी पड़ती है। टूर मैनेजर ने बताया कि हाईवे पर कहीं भी कभी भी अचानक पुलिस सामने आ जाती है और गाड़ी की चेकिंग करती है।  यदि कोई बिना सीट बैल्ट बांधे पकड़ा गया तो जुर्माना सीधे १५० यूरो होता है। ज़ाहिर है , सभी ने तुरंत हिसाब लगा लिया कि १२००० रूपये का जुर्माना ! फिर तो सभी बैठते ही बैल्ट बांध लेते थे।

२. बाथरूम को गीला करना :

यह जानकर आपको अजीब लगेगा कि वहां बाथरूम में ड्रेनेज नहीं होता। नहाने के लिए टब बने होते हैं जिसमे पर्दा या स्क्रीन का पार्टीशन होता है जिससे कि पानी बाहर ना आये। इसलिए यदि वॉशबेसिन में हाथ धोते हुए आपने पानी बिखेर दिया तो उसे निकलने की जगह ही नहीं मिलेगी। मैनेजर ने बताया कि ऐसा होने पर चेक आउट के समय आपसे बड़ी रकम हरज़ाने के रूप में वसूल की जा सकती है।  एक बार एक मेहमान को २०० यूरो (१६००० रूपये) भरने पड़ गए थे। हो सकता है यह बात सिर्फ डराने के लिए कही गई हो, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि सभी बाथरूम का इस तरह ध्यान रखते थे जैसे वो बाथरूम नहीं बल्कि घर का मंदिर हो।

३. समय का पाबंद होना :

पैकेज टूर में यात्रा कार्यक्रम पहले से बना होता है और समय की बड़ी पाबन्दी होती है। इसलिए सभी यात्रियों का समय पर तैयार होना और बस में बैठना आवश्यक होता है।  हमारी मैनेजर बार बार यही ध्यान दिलाती थी कि यदि समय पर नहीं पहुंचे तो बस छोड़कर चली जाएगी , किसी का इंतज़ार नहीं करेगी।  फिर आना खुद टैक्सी पकड़कर।  साथ ही वह बड़ी गंभीरता से अगले गंतव्य का पता और रुट भी बता देती थी। अब यह सुनकर सभी को सोचने पर मज़बूर होना पड़ता था कि अनजान शहर में टैक्सी पकड़कर कैसे पहुंचेंगे।  इसी से सभी ने समय का ध्यान रखा और नियमितता का पालन किया।

उपरोक्त बातें छोटी छोटी सी हैं और हम सब जानते हैं।  लेकिन अपने देश में न तो पालन करने की आवश्यकता मह्सूस करते हैं और न ही किसी का डर होता है।  लेकिन विदेशों में भारी जुर्माने के डर से हम भीगी बिल्ली बन जाते हैं और अनुशासित रूप में व्यवहार करने लगते हैं।  ज़ाहिर है, इंसान डर से ही डरता है।  डर चाहे वो जुर्माने का हो, या सज़ा का। डर नहीं तो इंसान इंसान नहीं रहता। पता नहीं हमारे देश में यह डर कब पैदा होगा और कब हम भी इंसान बनेंगे !  

Sunday, May 27, 2018

कुदरत की देन को संभालना तो खुद ही पड़ता है - यूरोप , एक सैर ....


पिछले १७ -१८ दिन से हम आपको यूरोप की मुफ्त सैर करा रहे हैं।  अच्छी अच्छी फोटोज दिखा रहे हैं , लुभा रहे हैं , चिड़ा रहे हैं और शायद जला भी रहे हैं। लेकिन अब समय है सभी मानवीय भावनाओं को अलग रखकर कुछ आत्मनिरीक्षण करने का। आईये देखते हैं क्या अंतर है यूरोपियन देशों और हमारे देश में और इसके लिए कौन और कैसे जिम्मेदार है।

यूरोप की ख़ूबसूरती :

१. बेहतरीन मौसम : जहाँ गर्मी में भी पल पल बदलता मौसम , कभी धूप कभी बादल और बिना गरज के छींटे , वातावरण को खुशगवार बनाते हुए।  बेशक यह कुदरत की देन है।  लेकिन कुदरत के इस तोहफे को यूरोपियन्स ने बड़ी ही समझदारी से भुनाया है।

२. जनसँख्या : उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है जनसँख्या पर नियंत्रण।  लगभग सभी यूरोपियन देशों में जनसँख्या वृद्धि की दर शून्य के करीब है।  कुछ देशों में तो यह माइनस में है।  यानि वहां बढ़ती जनसँख्या की कोई चिंता ही नहीं है।

३.सक्रीयता :  इसका एक परिणाम यह है कि वहां वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन इसकी आपूर्ति वे लोग ८० -८५ वर्ष की आयु तक भी काम करके पूरी करते हैं।  यह देखकर बड़ी हैरानी होती है कि एक बड़े से स्टोर में एक अकेली बुढ़िया अपने पोपले मुँह से मुस्कारते हुए आपको सामान बेच रही होती है। लेकिन देखने में वह ५०-६० की ही लग रही होती है। वहां काम के मामले में कोई छोटा बड़ा नहीं होता।  कोई नौकर और मालिक नहीं होता।  रेस्टोरेंट का मैनेजर भी ज़रुरत पड़ने पर सर्विस देने लगता है। बंद करने के समय मैनेजर भी झाड़ू लगाता नज़र आएगा। 

४. कर्तव्यपरायणता :  स्विट्ज़रलैंड को आसानी से विश्व का सबसे खूबसूरत देश कहा जा सकता है क्योंकि वहां एक ही नज़र में मीलों तक फैले हरे भरे मैदान,  मैनिक्यूर्ड लॉन्स और लहलहाते हरियाली भरे खेत नज़र आते हैं।  लेकिन इसको हरा भरा बनाये रखने के लिए वे सरकार पर निर्भर नहीं रहते।  हर गांववाला अपने खेतों,  क्षेत्र और जायदाद को हरा भरा रखने के लिए खुद जिम्मेदार होता है।  सरकारी ज़मींन को भी गांववाले बारी बारी से घास काटने और मेन्टेन करने का काम करते हैं।

५. सफाई : कोई भी शहर तभी सुन्दर दिख सकता है जब वहां सफाई का विशेष ध्यान रखा जाये। वहां सभी शहरों की गलियां , सड़कें और अन्य सार्वजानिक स्थान एकदम स्पॉटलेसली क्लीन नज़र आते हैं। बार बार होती बारिश निश्चित ही इसमें सहायक सिद्ध होती है लेकिन उनका कचरा नियंत्रण बेहतरीन है।  साथ ही जनता में सफाई के प्रति बेहद जागरूकता है , कोई भी कुछ भी सड़क पर नहीं फेंकता , बल्कि जगह जगह बने कूड़ादान में ही डालते हैं।

६. सड़कें : वहां की सड़कें बहुत कम चौड़ी हैं और दो ही लेन की होती हैं।  लेकिन इसके बावजूद सडकों पर वाहन बहुत ही अनुशासित रूप से चलते हैं , लाल बत्ती पर रुकते हैं , लेन में चलते हैं , कभी हॉर्न नहीं बजाते और कभी ओवरटेक नहीं करते। सड़कें भी एकदम चिकनी , साफ और समतल जिस पर गाड़ी के चलने का पता भी नहीं चलता। 

७. पब्लिक टॉयलेट्स : टूरिस्ट्स को अक्सर कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वहां कहीं भी खुले में अपनी मर्ज़ी से लघु शंका का निवारण नहीं कर सकते। हालाँकि अधिकांश रेस्टोरेंट्स , मॉल्स , होटल्स में टॉयलेट्स उपलब्ध होते हैं लेकिन कई जगह ये पेड होते हैं। एक बार का खर्चा ५० से १०० रूपये तक हो सकता है। लेकिन सफाई की कुछ कीमत तो होती है ना।   

८. मौज मस्ती : अधिकांश दुकानें ६ बजे बंद हो जाती हैं।  यानि उसके बाद सभी मौज मस्ती करते हैं। रेस्टोरेंट्स के बाहर फुटपाथ पर टेबल चेयर लगी रहती हैं जिन पर अक्सर लोग बैठे बियर पी रहे होते हैं।  शुक्रवार को लॉन्ग वीकएंड शुरू हो जाता है और अक्सर शुक्रवार को पब्स के बाहर बीयर मेला सा लगा नज़र आता है।  ज़ाहिर है , सप्ताह भर की मेहनत के बाद यह एन्जॉय करने का समय होता है। 

९. टूरिज्म : पूरे यूरोप के देशों में हर देश में जितनी आबादी है , उसके तीन गुना टूरिस्ट हर समय मौजूद रहते हैं।  ज़ाहिर है , सिर्फ टूरिज्म से ही उनकी बेइंतहा कमाई होती रहती है।  यूरोप महंगा भी बहुत है , फिर भी भारत और चीन से सबसे ज्यादा टूरिस्ट्स वहां जाते हैं।  और एक यूरो के बदले ८२ रूपये खर्च करते हैं। 

१०. इतिहास : सभी यूरोपियन शहर ऐतिहासिक रूप से प्रभवशाली हैं।  हर एक शहर की अपनी शैली है , मकानों और इमारतों की शैली एक पूरा इतिहास दर्शाती है।  सैंकड़ों , हज़ारों साल पहले बने ये भवन आज भी मज़बूती के साथ खड़े हैं और देखने वालों की आँखें फ़ैल जाती हैं उनकी भव्यता देखकर। 

अब इन दस पॉइंट्स पर खुद को रखकर देखिये और जानिए कि क्यों हम अभी तक पिछड़े पड़े हैं और एक विकासशील देश बनकर रह गए हैं।  विकास , जो कभी पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा। बेशक हमारा इतिहास भी पूर्णतया गौरवशाली रहा है और हमारे संस्कार सर्वोत्तम माने जाते हैं।  लेकिन इस तेजी से बदलते समय में हम कब तक दम घुटते संस्कारों की दुहाई देते हुए पिछड़ेपन का शिकार बने रहेंगे !  जागो देशवासियो जागो।   


 

Monday, April 16, 2018

अध्यक्ष के चुनाव में फूलवालों की होड़ ...

सभा समाप्त होते ही :

नव निर्वाचित अध्यक्ष पर फूल मालाओं की जो लगी झड़ी।
सारे श्रोताओं में फोटो खिंचवाने की जैसे होड़ सी लग पड़ी।

देखते देखते श्रोताओं से सारा मंच खचाखच भर गया ,
मैं तो ये प्रेमासक्त अद्भुत नज़ारा देखकर ही डर गया।

एक श्रोता दूसरे श्रोताको धकाकर आगे बढ़ रहा था।
दूसरा फोटो के लिए तीसरे के काँधे पर ही चढ़ रहा था।

भीड़ अध्यक्ष के अगल बगल जब तक एक कतार लगाती ,
तब तक पहली कतार के आगे एक और कतार लग जाती।

एक बार हम भी छलांग मार करीब जाने में सफल हो गए। 
पर तभी एक जोरदार धक्का खाकर गिरे और विफल हो गए।

आलम ये थे कि इधर धड़ाधड़ फोटो खींचे जा रहे थे,
उधर हम कभी दाएं कभी बाएं धकियाये जा रहे थे।

और लोग तो जंगल में हिरणों की तरह कुलांचे मारते रहे ,
हम बस शेर की तरह शिकार को हाथ से जाते देखते रहे।

फोटोग्राफर भी बेचारा दे दनादन फोटो उतार रहा था ,
हमें तो पूरा शक था कि पट्ठा खाली फलैश मार रहा था।

वैसे फोटो खिंचवाने को हम भी १5 बार ट्राई मार चुके थे,
पर मायूस से खड़े थे क्योंकि आखिरी ट्राई भी हार चुके थे।

हमें संघर्ष करते देख एक सज्जन की नज़र हम पर पड़ गई ,
पर कुछ लम्बूओं के सामने हमारी तो हाईट ही कम पड़ गई।

तभी हमें महमूद ग़ज़नवी का इतिहास याद आया ,
और १७ वीं बार प्रहार करने का प्रयास याद आया।

आखिरकार १७वीं बार में हम भी कामयाब हो गए ,
और अध्यक्ष जी के साथ कैमरे में आबाद हो गए। 

Saturday, April 7, 2018

वाट्स अप जिंदगी ---


आंधी वर्षा से नरमाई रैन की ,

शीतल सुहानी भोर में अपार्टमेंट की,

बालकॉनी में बैठ चाय की चुस्कियां लेते,

दूर क्षितिज में छितरे बादलों की खिड़की से

शरमाये सकुचाये से सूरज को

ताक झांक करते देखकर हमें सोचना पड़ा।


कि कंक्रीट के इस जंगल में ,

ऊंचे अपार्टमेंट्स की ऊँचाईयों में ,

क्षितिज भी सिकुड़ सा गया है ऐसे ,

जैसे संसार को कर लिया है कैद मुट्ठी में,

हमने, एक स्मार्ट फोन के ज़रिये।


कुछ ही तो वर्ष पहले की बात है जब ,

घर हो या दफ्तर , घरवाले हों या मित्र ,

सब एक साथ बैठकर गपियाते थे ,

उन्मुक्त हँसते मुस्कराते थे ,

व्यस्त होकर भी मिल जाती थी फुर्सत,

आँखों में आँखें डालकर बतियाने की।


देखते देखते ये समां कैसे बदल गया !

अब अंदर हों या बाहर ,

घर हो या दफ्तर , या हो मैट्रो का सफर ,

जिसे देखो वही ,

सज़दे में सर झुकाये नज़र आता है।

न ढंग से खाता है न सोता है ,

बस अपने आप में गुम सा नज़र आता है।


अब नहीं करते पति पत्नी प्यार की बातें ,

नहीं चह्चहाते चिड़ियों से,  बच्चे गले लगकर ।

अब कोई नहीं करता बातें नज़रों से नज़रें मिलाकर ,

नहीं आती कानों में दोस्तों की मधुर आवाज़।

लेकिन आती हैं रोजाना ढेरों शुभकामनायें ,

फूल पत्तियों में लिपटी हुई प्रभात की ''सुप्रभात" ।

आते है नित नए सैंकड़ों सन्देश ,

कॉपी पेस्ट किये हुए, यहाँ से वहां से, जिनके

न जन्मदिन का पता होता है न जन्मदाता का।


यंत्रवत ये जिंदगी बस आभासी बनकर रह गई है।

वाट्सएप्प ने जैसे जिंदगी को गुलाम बना लिया है।

हार्डवेयर ने सरकारी सॉफ्टवेयर को किया था क्रैश ,

परन्तु स्मार्ट फोन के सॉफ्टवेयर ने,

जिंदगी के हार्डवेयर को ही क्रैक कर दिया है।

रोज सुबह होते ही वाट्सएप्प पूछता है,

''वाट्स अप'' जिंदगी !



Tuesday, April 3, 2018

हमारे रंग देख कर तो गिरगिट क्या नेता भी जलते हैं --


एक हास्य कवि ने चुनाव में नामांकरण पत्र भर दिया,
तो एक पत्रकार ने मंच पर ही कवि जी को धर लिया। 

बोला, ज़नाब क्या एक सवाल का जवाब दे पाएंगे !
आप तो कवि हैं, फिर आप जनता को क्या दे पाएंगे !

कवि बोला, हम लोगों के स्वास्थ्य में सुधार लाएंगे।
हंसा हंसा कर देश को एक स्वस्थ भारत बनाएंगे। 

पत्रकार बोला , ज़नाब एक पते की बात बताएँगे ,
क्या आप विरोधी पक्ष के लोगों को भी हंसाएंगे !

कवि बोला , कवियों का न कोई पक्ष न विपक्ष होता है।
हमारा तो बस जनता को हंसाने का ही लक्ष होता है।

श्रोताओं का मन भांप कर बनाते हैं सुनाने का मन ,
और कितना सुनाना है, तय करता है लिफाफे का वज़न।

भक्तों की भीड़ देखी तो मोदी का गुणगान कर दिया ,
विरोधियों के जलसे में जुमलों का व्याख्यान कर दिया।

दलितों ने बुलाया तो मायावती को बहन बना लिया ,
किया ग़र मुशायरा तो ग़ालिब को चचा बता दिया।

हम कवि भी हवा का रुख देखकर रंग बदलते हैं ,
हमारे रंग देख कर तो गिरगिट क्या नेता भी जलते हैं।