Thursday, August 16, 2018

हम और तुम --


जिंदगी भर जीते रहे ,
जिन्हे जिंदगी देने,
सजाने और संवारने में।
अब जब ,
वे नभ में उड़ चले,
और व्यस्त हैं ,
स्वच्छंद जिंदगी बनाने में।
तब एक बार फिर
बस हम और तुम हैं ,
तीसरा नहीं कोई हमारे बीच।
बस 'तू' रहे और तेरा साथ ,
डाले हाथों में हाथ,
यूँ ही साथ साथ।
चलो एक बार फिर से खोज लें ,
हम और तुम, दोनों, अपने आप को।

Thursday, August 9, 2018

हमारी धार्मिक आस्था के नाम पर अराजकता फ़ैलाने पर रोक लगनी चाहिए --


सावन के उमस भरे महीने में कंधे पर गंगा जल से भरे लोटे का भार उठाये हुए, पैरों में पड़े छालों की परवाह किये बिना, नंगे पांव २५० किलोमीटर पैदल चलते हुए, अपनी मंज़िल तक पहुंचना, सचमुच दिल की गहराइयों में बसी शिव भक्ति और श्रद्धा भावना का प्रतीक है। यह देखकर कांवड़ियों के प्रति प्रेम और सहानुभूति की मिली जुली भावना मन में आना स्वाभाविक है। कुछ युवक तो साल दर साल इस यात्रा में सम्मिलित होकर गर्वान्वित मह्सूस करते हैं। यह और बात है कि इस बेहद कष्टदायक प्रक्रिया को पूर्ण करने से व्यक्ति विशेष को सिवाय मन की आंतरिक प्रसन्नता के कुछ और हासिल नहीं होता।

लेकिन शिव भक्ति की आड़ में कुछ असामाजिक तत्त्व समाज और कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी मनमानी करते नज़र आते हैं। यह समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। ज़रा सोचिये,
* ट्रकों पर हज़ारों वाट का म्यूजिक सिस्टम लगाकर, शराब पीकर, रास्ते में भांगड़ा करते १२ साल से लेकर २०-२२ साल तक की आयु के युवा क्या कहलायेंगे !
* या फिर एक बाइक या स्कूटर पर गेरुआ टी शर्ट और कच्छा पहनकर, हाथों में बेसबॉल बैट पकड़े, बिना हेलमेट के  तीन तीन युवा बैठकर सडकों के बीचों
  बीच सीधी उलटी दिशा में बेधड़क ड्राईव करते हुए क्या शिव भक्त कहलायेंगे ! 
* कानून भी ऐसे में धार्मिक आस्था के नाम पर मनमानी करने के लिए खुली छूट दे देता है।
* इसी कारण इन दिनों में दिल्ली की सडकों पर कोई भी गेरुए वस्त्र पहनकर बाइक पर बिना हेलमेट मस्ती करता हुआ घूम सकता है क्योंकि उसे विश्वास होता
  है कि कोई ट्रैफिक पुलिस वाला उसका चालान नहीं काट पायेगा। 
*  देखा जाये तो यह धार्मिक सहिष्णुता का दुरूपयोग है जिसका दुष्परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है।     
कुछ लोग इसे विभिन्न धर्मों से जोड़कर दलील देते हैं कि जब अन्य धर्मों के लोग धर्म का दुरूपयोग करते हैं, तब कोई शोर नहीं मचता। धर्म चाहे कोई भी हो , कोई भी धर्म अनुयायियों को गलत रास्ते पर चलने का निर्देश नहीं देता, न ही बाध्य करता है। एक दूसरे को देखकर गलतियाँ करते रहना धर्म का ही विनाश है। धर्म हमारा सही रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन करता है। इसलिए धर्म और धार्मिक आस्था की आड़ में अमानवीय व्यवहार सहन नहीं किया जाना चाहिए और इसे रोकने के लिए प्रशासन को ठोस और कठोर कदम उठाने चाहिए।         

Friday, July 20, 2018

फिर न होगा कोई ऐसा -- श्री गोपाल दास नीरज -- श्रद्धांजलि --






श्री गोपाल दास नीरज से हमारी पहली और अंतिम मुलाकात ८ साल पहले दिल्ली के हिंदी भवन में हुई थी जब हमें उनका एकल कविता पाठ सुनने का सुअवसर मिला था। लगभग दो घंटे तक अकेले ही श्रोताओं से खचाखच भरे हॉल को नई और पुरानी कवितायेँ और गीत सुनाकर उन्होंने ऐसा समां बांधा कि सब मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी सुनाई कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं :

तन से भारी सांस है , इसे जान लो खूब
मुर्दा जल में तैरता , जिन्दा जाता डूब ।

ज्ञानी हो फिर भी न कर , दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है भले ही , मणि हो उसके पास ।


जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितना भारी बक्सा होगा
उतना तू हैरान रहेगा ।

आज भले ही नीरज जी हमारे बीच नहीं रहे , लेकिन उनके सर्वप्रिय गीतों और कविताओं में वे सदा जिन्दा रहेंगे। नमन ... विनम्र श्रद्धांजलि ...

Thursday, July 19, 2018

संजू -- एक बड़े लेकिन शरीफ बाप के बिगड़े बेटे की दर्दभरी कहानी ---

पहले हमने सोचा कि ये फिल्म पहले ही बहुत कमा चुकी है, इसलिए क्या फर्क पड़ता है !  फिर ना ना करते देख ही ली।  हालाँकि देखकर अच्छा भी लगा और कुछ बुरा भी। फिल्म के पहले भाग में संजय दत्त की जिंदगी की डार्क साइड दिखाई गई है जिसे देखकर बहुत दुःख होता है कि किस तरह अच्छे घरों और बड़े मां बाप के बेटे बिगड़ जाते हैं। हालाँकि इसमें अक्सर उनका कोई कसूर नहीं होता। लेकिन दूसरे भाग में बेटे का पिता के प्रति प्यार और मान सम्मान देखकर अच्छा लगा ( यदि कहानी में सत्य पर ध्यान दिया गया है तो निश्चित ही यह सराहनीय है।) जेल के दृश्य वास्तव में विचलित करते हैं।  संजय दत्त को विदेश में फटेहाल भीख मांगते देखकर बहुत अफ़सोस हुआ।   

लेकिन फिल्म में रणबीर कपूर का अभिनय और मेकअप दोनों ही गज़ब के हैं। दोनों का कद लगभग एक जैसा होने और चेहरे में समानता होने से और आवाज़ को भी मिला देने से बहुत बढ़िया इफेक्ट आया है। साथ ही फिल्म में दोस्त की भूमिका में विक्की कौशल का सहनायक के रूप में रोल भी बहुत जमा और हास्य का पुट आया जिसने फिल्म को बोझिल होने से बचा लिया। फिल्म में दसियों जाने माने कलाकार हैं जिनमे सभी का रोल बढ़िया रहा। 

कुल मिलाकर यही महसूस हुआ कि सुनील दत्त जैसी जेंटलमेन व्यक्ति के लिए कितना मुश्किल हुआ होगा परिस्थितियों से जूझना, जब एक ओर पत्नी कैंसर से लड़ रही थी, और दूसरी ओर इकलौता बेटा बर्बादी की राह पर जा रहा था।  किसी भी बाप के लिए इससे ज्यादा कष्टदायक और कुछ नहीं हो सकता। निश्चित ही औलाद का ग़म ऐसा ही होता है।    

Wednesday, July 11, 2018

टाइम बैंक -- बुजुर्गों का साथी :



देश में बुजुर्गों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। विशेषकर शिक्षित परिवारों में बुजुर्गों के एकाकीपन की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है क्योंकि अक्सर बच्चे पढ़ लिख कर घर, शहर या देश ही छोड़ देते हैं और मात पिता अकेले रह जाते हैं। अक्सर ऐसे में बुजुर्गों को सँभालने वाला कोई नहीं रहता जो उनकी रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में सहायता कर सके।

पता चला है कि स्विट्ज़रलैंड में सरकार द्वारा ऐसे टाइम बैंक स्थापित किये गए हैं जिनमे आपका समाज सेवा का लेखा जोखा रखा जाता है। वहां युवा वर्ग और शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ लोग अपने फालतू समय में समाज के बुजुर्गों के लिए काम करते हैं और जितने घंटे काम किया , उतने घंटे उनके खाते में जमा हो जाते हैं। यह कार्य स्वैच्छिक और सुविधानुसार होता है जिसे वे तब तक करते हैं जब तक स्वयं समर्थ होते हैं। जब वे स्वयं असमर्थ हो जाते हैं, तब अपने टाइम बैंक के खाते से घंटे निकाल लेते हैं।  यानि बैंक उनकी सहायता के लिए किसी और को घर भेज देता है जो सहायता करता है।  इस तरह यह क्रम चलता रहता है। आपके खाते में जितने घंटे जमा हुए , उतने घंटों की सेवा आप प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए किसी बुजुर्ग को न तो अकेलापन महसूस होता है और न ही उन्हें वृद्ध आश्रम में जाकर रहना पड़ता है।

यदि इस तरह की कोई योजना यहाँ भी बनाई जाये तो शायद बुढ़ापे में बहुत से लोगों को राहत मिल सकती है। लेकिन हमारे देश और स्विट्ज़रलैंड में बहुत अंतर है।  वहां आबादी कम है और संसाधन ज्यादा।  लोग भी मेहनती , निष्ठावान और कर्मयोगी होते हैं।  वे अपने देश से प्रेम करते हैं और नियमों का पालन करते हैं।  लेकिन हमारे यहाँ अत्यधिक आबादी , भ्रष्टाचार , कामचोरी , हेरा फेरी और धोखाधड़ी का बोलबाला है।  ऐसे में यह योजना सफल होना तो दूर, कोई इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। ज़ाहिर है , पहले हमें अपनी बुनियादी समस्याओं से सुलझना होगा।  तभी हम विकसित देशों के रास्ते पर चल पाएंगे। 

  

Thursday, July 5, 2018

न जाने क्यों ---


जाने क्यों ,
बारिश का मौसम है , पर बरखा नहीं आती !
बदल तो आते हैं पर , काली घटा नहीं आती।

जाने क्यों ,
आंधियां चलती हैं पर , अब पुरवाई नहीं चलती,
मौसम बदलता है पर , अब तबियत नहीं मचलती।  

जाने क्यों ,
आसमान दिखता है पर , अब नीला नज़र नहीं आता।
जंगल है ये कंक्रीट का , यहाँ कोई मोर नज़र नहीं आता।     

जाने क्यों ,
लाखों की भीड़ है , पर इंसान अकेला है।
मकां तो शानदार है , पर घर इक तबेला है।

जाने क्यों ,
विकास तो हुआ है , पर हम विकसित नहीं हुए।
स्कूल कॉलेज अनेक हैं , पर हम शिक्षित नहीं हुए।
  
जाने क्यों ,
धर्म के चक्कर में , हम अधर्मी हो गए।
इंसानियत को भूले , और हठधर्मी हो गए।  

जाने क्यों ,
हम समझदार तो हैं , पर ये बात समझ नहीं पाते।
एक दिन खाली हाथ ही जाना है, छोड़ के धन दौलत और रिश्ते नाते। 

फिर भी जाने क्यों ,
हम व्यस्त हैं,  अस्त व्यस्त होने में।
और मस्त हैं ,  मोह माया का बोझ ढोने में। 
जाने क्यों , जाने क्यों !




Saturday, June 23, 2018

कुछ बातें इतिहास के पन्नों में दब कर गुम हो जाती हैं --



देश के इतिहास में १९७५ -७७ का समय एक काला धब्बा माना जाता है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश में एमरजेंसी लागु कर दी थी। इसी दौरान इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी माने जाने वाले उनके छोटे सुपुत्र श्री संजय गाँधी भी फैमिली प्लानिंग योजना को लागु करने में हुए कुप्रबंध और कुशासन के कारण बहुत बदनाम हुए थे। लेकिन यदि ध्यान से सोचा जाये तो हम पाते हैं कि संजय गाँधी एक बहुत ही साहसी और दूरगामी दृष्टि वाले नेता थे।  देश के इतिहास में अभी तक सिर्फ संजय गाँधी ने ही देश की अनियंत्रित बढ़ती आबादी के बारे में सोचा।  उससे पहले और उसके बाद आज तक किसी भी नेता या प्रधानमंत्री ने देश की इस सबसे बड़ी समस्या का हल निकालने के लिए कोई कदम उठाने की हिम्मत नहीं की। फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम को बदनाम  कराने वाले भी वो सरकारी नौकर ही थे जिन्हे नसबंदी को प्रोत्साहन देने के लिए ५ - ५ केस कराने की जिम्मेदारी दी गई थी लेकिन कुछ लोगों ने मेहनत करने के बजाय हेरा फेरी करते हुए नाबालिग बच्चों को पकड़कर जबरन नसबंदी करा डाली। हालाँकि इसमें डॉक्टर्स का रोल भी गैर जिम्मेदाराना ही माना जायेगा। परिणामस्वरूप न सिर्फ यह प्रोग्राम फेल हुआ बल्कि आज तक फिर किसी ने नसबंदी का नाम लेने की हिम्मत नहीं की।

आज पुरुष नसबंदी स्वैच्छिक रूप से की जाती है लेकिन स्वेच्छा से नसबंदी कराने के लिए बहुत ही कम पुरुष सामने आते हैं। नतीजा सामने है , कुछ ही वर्ष में आबादी के मामले में हम विश्व के नंबर एक देश बन जायेंगे। जहाँ चीन ने एक बच्चे की सीमा निर्धारित कर अपनी बढ़ती जनसँख्या पर नियंत्रण पा लिया , वहीँ आज भी हम   ४ - ६ बच्चे धड़ल्ले से पैदा किया जा रहे हैं। इसमें किसी धर्म विशेष को दोष न दें, क्योंकि बढ़ती जनसँख्या का कारण धार्मिक विश्वास ही नहीं बल्कि अशिक्षा , गरीबी और अज्ञानता ज्यादा है। लगता है कि अब समय आ गया है जब सरकार को चीन की तरह एकल बाल परिवार योजना लागु कर देनी चाहिए।  तभी अगले तीस सालों में हम अपनी बढ़ती जनसँख्या को स्थिर कर पाएंगे। लेकिन ऐसा करने के लिए सरकार को वोट की राजनीति से ऊपर उठना होगा , तभी इस नियम को सख्ताई से लागु कर पाएंगे।