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Friday, April 9, 2021

कोरोना से जंग --

चेहरा मास्क से ढका हुआ ,  

मास्क के ऊपर से झांकती दो आँखें, 

आँखों में अक्सर 

दिखती है एक बेबसी।  

बाकि त्योरियों से भरा मस्तक।  

आजकल इंसान की 

बस यही पहचान रह गई है। 


वो दिखता नहीं है , 

न ही कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह, 

उसमे कोई गंध है न रंग।  

एक अदृश्य दुश्मन की तरह, 

घात लगाकर करता है आक्रमण। 

एक अणु ने परमाणु शक्ति को भी , 

शक्तिविहीन बना दिया है।  


नादाँ सभी जानते तो हैं , 

किन्तु मानते नहीं।  

इस सूक्षम शत्रु से लड़ने के 

तौर तरीके।  

शत्रु जो सीमा पार से नहीं, 

न ही देश के जंगलों से आता है।  

वो रहता है आपके ही हाथों में, 

गले लगने को तत्पर, 

गले लगा तो गले पड़ने को तैयार।  


माना कि जिंदगी आजकल अधूरी है, 

परन्तु जो है तो  , 

कभी पूरी भी होगी। 

बस संयम और संतुलन चाहिए,

टैस्ट, रैस्ट और वैक्स 

तीनों मिलकर लगाएंगे बेडा पार।  

 

Tuesday, February 23, 2021

कोरोना ने हमें क्या क्या सिखा दिया ---

कोरोना से जग ने खुद को बचाना सीख लिया है , 

कलियुग में सात्विक बनकर दिखाना सीख लिया है।    


सीख लिया है सबने कम में गुजारा करना ,

भौतिक इच्छाओं को दबाना सीख लिया है।    


ना लगे मेले ना मिले किसी से साल भर , 

बुजुर्गों ने एकाकी जीवन बिताना सीख लिया है।  


पार्टियां रहीं बंद और बंद सब सैर सपाटा , 

युवाओं ने भी खाना पकाना सीख लिया है।  


ना पार्क ना कॉलेज ना सिनेमा हॉल की मस्ती, 

आशिकों ने डिजिटल इश्क़ फरमाना सीख लिया है।     


शादियां भी होने लगी बिन बैंड बाज़ा बारात के , 

लोगों ने अरमानों पर रोक लगाना सीख लिया है।  


हॉल पंडाल पड़े रहे खाली पूरे साल, कवियों ने , 

मुफ्त में ऑनलाइन कविता सुनाना सीख लिया है।     


यार दोस्त नाते रिश्तेदार सब रहे साल भर दूर, 

इंसान ने खुद का खुद से नाता निभाना सीख लिया है।  



Friday, January 29, 2021

इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है --

 

कनाड़ा के एल्गोन्क़ुइन जंगल में कैम्पिंग :



बात पुरानी है, २००९ में जब हम पहली बार कनाड़ा गए थे, अपने एक मित्र के निमंत्रण पर। तीन सप्ताह के निवास में मित्र ने हमारे सम्मान में एक तीन दिन के जंगल कैम्प का आयोजन किया था, एल्गोंक्विन फॉरेस्ट में। लगभग ६० मिलोमीटर लम्बे जंगल के बीच से होकर एक सड़क गुजरती थी जिस के किनारे जंगल में बने एक कैम्पिंग लॉज में हमारा कैम्प आयोजित किया गया था। घने जंगल के बीचोंबीच बने कैम्पिंग साइट पर हमारे टेंट लग गए।  कुल मिलाकर हम ५ परिवारों के लगभग २० लोग थे बच्चों समेत। जंगल में भालू पाए जाते थे।  इसलिए केयरटेकर की ओर से निर्देश था कि खाने का कोई भी सामान खुले में न रखा जाये क्योंकि भालू खाने की गंध से आकर्षित होते हैं और हमला कर सकते हैं। 

रात में खाना खाने के बाद और सब सामान समेटने के बाद सब लोग एक बड़े टेंट में एकत्रित हो गए और महफ़िल जम गई। कई तरह के कार्यक्रमों के बाद किसी ने सब से एक सवाल पूछा कि आप सबसे ज्यादा किसे प्यार करते हैं। ज़ाहिर है, सबने अलग अलग जवाब दिए।  अभी बातचीत चल ही रही थी कि टेंट के पीछे जंगल की ओर से कुछ गुर्राने की आवाज़ आई। आवाज़ सुनकर सबके कान खड़े हो गए।  टेंट में चुप्पी छा गई। तभी दोबारा आवाज़ आई तो किसी ने कहा कि कहीं भालू तो नहीं आ गया। यह सुनकर सबके होश उड़ गए। सबको एक ही चिंता थी कि यदि भालू टेंट में घुस गया तो किस पर हमला करेगा। ज़ाहिर है, उस समय सबको अपनी जान की चिंता हो रही थी। 

असमंजस और भय के कुछ क्षणों के बाद आखिर एक बंदा हँसता हुआ अंदर आया और पता चला कि भालू के गुर्राने की आवाज़ वह निकाल रहा था। यह जानकर सबकी साँस में साँस आई।  और साथ ही सब ठहाका लगाकर हंस पड़े, क्योंकि अब सबको सवाल का सही जवाब मिल गया था कि इंसान सबसे ज्यादा स्वयं से प्यार करता है।     

कोरोना पेंडेमिक ने भी यही बात साबित करके दिखा दी कि इंसान को अपनी जान की चिंता सबसे पहले होती है। पिछले दस महीनों में लोगों ने यदि चिंता की है तो अपनी की है। दूसरा कोई जिन्दा है, सही सलामत है या नहीं, कोरोना संक्रमण हुआ तो नहीं, किसी ने किसी के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। बेशक सोशल मिडिया पर आपकी गतिविधियों से सबको एक दूसरे की जानकारी मिलती रहती है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर ऐसा बहुत ही कम देखने को मिला जब किसी ने फोन कर किसी का हाल पूछा हो। वो जो दम भरते थे दोस्ती का, साथ उठना बैठना, खाना पीना होता था, आज कहीं नज़र नहीं आते। ज़ाहिर है, हर कोई अपनी ही समस्याओं में इस कदर घिरा रहा कि किसी दूसरे के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला। निश्चित ही, एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि इंसान सोशल होने के बावजूद सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है।                  


Tuesday, January 12, 2021

इंसान वो होता है जो वक्त रहते संभल जाता है --

सर्दियों में वेट बढ़कर पेट अक्सर निकल जाता है,

क्या करें, दावत का रोज ही अवसर मिल जाता है।


कम्बल रज़ाई में बैठे बैठे खाते रहते हैं सारा दिन,

हाथ पैर अकड़े होते हैं, परंतु ये मुंह चल जाता है।


ग़ज़्ज़क, पट्टी, गाजर का हलवा देख मन ललचाये,

खाते पीते नये साल का जश्न भी हिलमिल जाता है।


गर्म कपड़े अभी सम्भले भी नही होते अलमारी में,

पलक झपकते सर्दियों का मौसम निकल जाता है।


पल दो पल की जिंदगी है , जश्न मनाओ 'यारो',

देखते देखते जवां वक्त हाथों से फिसल जाता है।


कोरोना कष्टकाल कम हुआ है, पर बीता नही है,

इंसान वो होता है जो वक्त रहते संभल जाता है।


Monday, December 28, 2020

कैसे कैसे सुधरा इंसान कोरोना काल में --

 

1.

क्वारेन्टीन और डिस्टेंसिंग जैसे शब्द अब यक्ष हो गए हैं ,

आइसोलेशन में पति पत्नी के जुदा शयन कक्ष हो गए हैं ।

कोरोना ने लोगों की जिंदगी में कर दिया ऐसा करेक्शन ,

कि युवा ही नहीं बूढ़े भी अब गृह कार्यों में दक्ष हो गए हैं ।

2.

लॉक डाउन के दिन रात तो नाकाम बीते हैं,

पर कोरोना ने सिखा दिया कि कैसे जीते हैं ।

जो लोग गर्मियों में भी नहाने से कतराते थे ,

अब सर्दियों में भी दिन में दो बार नहाते हैं। 

3.

जो काम ट्रम्प नही कर पाया है,

वो जसिंडा ने कर के दिखाया है ।

हम भी जिंदगी भर नही डरे इतना,

जितना इस कोरोना ने डराया है ।

4.

जिन सांसों से महका करता था घर,

उन्हीं सांसों से अब लगने लगा है डर ।

कोरोना तो भैया मच्छर का भी बाप निकला ,

गुड नाइट ना नाइट क्वीन करती है असर।

5.

लोग कहते हैं मैं भगवान हूँ ,

दिल से अब भी नौजवान हूं ।

पर मांफ करना भाई कोरोना,

तेरे लिए तो मैं बूढ़ा इंसान हूं ।

6.

ग़म के काले बादल अभी और छाएंगे,

जो जीवन को तहस नहस कर जाएंगे।

लेकिन खुशियों का सूरज फिर चमकेगा,

ग़म ना कर गुजरे अच्छे दिन फिर आएंगे।



Tuesday, December 22, 2020

कोरोना का कहर जब शहर में छाया--

 

1.

हर साल होली पर मिलते थे हर एक से गले,

इस साल गले मिलने वाले वो गले ही नहीं मिले।  

कोरोना का ऐसा डर समाया दिलों में,

कि दिलों में ही दबे रह गए सब शिकवे गिले।

2.

कोरोना का कहर जब शहर में छाया ,

हमें तो वर्क फ्रॉम होम का आईडिया बड़ा पसंद आया।

किन्तु पत्नी को देर लगी ये बात समझते ,

कि घर तो क्या हम तो ऑफिस में भी कुछ काम नहीं करते। 

3.

हम भी वर्क फ्रॉम होम का मतलब तब समझे ,

जब पत्नी ने कहा कि अब ये सुस्ती नहीं चलेगी।

उठो और हाथ में झाड़ू पोंछा सम्भालो,

आज से कामवाली बाई भी वर्क फ्रॉम होम ही करेगी।

4.

लॉकडाउन जब हुआ तो हमने ये जाना ,

कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर दो वस्त्र हों और खाने को दो रोटी ,

फिर बस अदरक वाली चाय चाहिए पीने के लिए ।

 

पैंट कमीज़ जूते घड़ी सब टंगी पड़ी बेकार ,

बस एक लुंगी ही चाहिए तन ढकने के लिए ।

कमला बिमला शांति पारो का क्या है करना ,

ये बंदा ही काफी है झाड़ू पोंछा करने के लिए। 

 

आदमी तो बेशक हम भी थे काम के 'तारीफ़',

किन्तु घर बैठे हैं केवल औरों को बचाने के लिए। 

Saturday, December 19, 2020

कोरोना काल के 9 महीने--

 कोरोना काल के 9 महीने:

18 मार्च 2020 को अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद की गईं थीं। आज 9 महीने पूरे हो गये। इस कष्टकाल मे भी कुछ बातें सुखद बनकर सामने आईं हैं, जैसे :

* अब लोगों को मास्क पहनने की आदत सी पड़ गई है। इसलिए कोरोना खत्म होने के बाद भी लोग जापानियों की तरह बिना शरमाये मास्क पहन सकेंगे। इससे निश्चित ही स्वास रोगियों को बहुत लाभ होगा।
* अब शादियों, पार्टियों आदि में जाने की लोगों की आदत छूट सी गई है। आशा है यह आदत भविष्य में बरकरार रहेगी और लोग 50 की सीमा का पालन करते रहेंगे। इससे शादियों का खर्च बहुत कम हो जाएगा जिससे समाज के एक बड़े वर्ग को बहुत राहत मिलेगी।
* लोगों ने समझ लिया कि वर्क फ्रॉम होम करके भी काम चल सकता है। इससे भविष्य में भी कंपनियों को किराए से और कर्मचारियों को ट्रांसपोर्ट के खर्च से राहत मिलती रहेगी।
* इन 9 महीनों में लोगों ने कम में भी गुजारा करना सीख लिया है। मंदी के इस लंबे दौर में यह बहुत सहायक होगा।
* आलसी और कामचोर लोग भी अब अपना काम स्वयं करने लगे हैं। यह आत्मनिर्भरता की ओर पहला कदम है।
* कुछ धंधे बंद हुए या मंद हुए तो कुछ नए धंधे भी शुरू हुए। रोजगार के नए आयाम बने ।
* लोगों ने आम तौर पर स्वच्छता के महत्त्व को समझा और अब न केवल हाथ धोने का प्रचलन बढ़ा, बल्कि बहुत से लोग दिन में दो बार नहाने भी लगे।
* और सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये कि अब सब लोगों से मिलने पर हाथ जोड़ कर अभिवादन करने लगे हैं। यानि अपनी संस्कृति को अपनाने लगे हैं।
बस अब यही आशा और अपेक्षा है कि लोगों में आये ये सुधार आगे भी यूं ही बने रहें । 🤠🤓🤡