Wednesday, December 5, 2018

सुबह सुबह , आँखों देखी ---


पूर्वी दिल्ली की दो आवासीय कॉलोनियों के बीच बहते नाले को ढककर बनाई गई सड़क के बनने से इस क्षेत्र में आना जाना काफी आसान हो गया है। सुबह जब पहली रैड लाइट पर रुकना पड़ा और नज़र सड़क के पार गई तो देखा कि दूसरी ओर की स्लिप रोड़ को स्कूल की बाउंड्री होने के कारण एक ओर से बंद कर दिया गया था जिससे कि कोई वाहन उधर न जा सके। इसका फायदा उठाते हुए स्थानीय निवासियों ने इस जगह को धर्म पुण्य के कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हुए कबूतरों को दाना डालने की जगह के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। एक सूटेड बूटेड व्यक्ति गाड़ी सड़क किनारे पार्क करके अपने बैग से सामान निकालकर सड़क पर डाले जा रहा था। जब पॉलीथिन की थैली खाली हो गई तो उसने उसको वहीँ सड़क पर फेंक दिया। अभी हम उसकी धार्मिक मानसिकता का विश्लेषण कर ही रहे थे कि तभी हमने देखा कि वह सड़क से थैली उठा रहा था।  यह देखकर हमें पर्यावरण के प्रति उसकी जागरूकता और कर्तव्यपरायणता     पर ख़ुशी का अहसास हुआ। लेकिन तभी देखा कि उसने थैली उठाकर थोड़ा सा और आगे बाउंड्री के पास फेंक दी। अब तो हमें उसकी अक्ल पर हंसी भी आ रही थी और तरस भी।

तभी एक और व्यक्ति आया और उसी जगह पर खड़ा होकर बाउंड्री की दिवार पर मूत्र वित्सर्जन करने लगा और पहले व्यक्ति के किये पुण्य पर पानी फेर दिया। बेचारा जाने कब से रोके हुए था क्योंकि इतना बहाया कि कबूतरों के लिए सड़क पर पड़े दाने भी भीग गए। अब तक दो तीन और दानी व्यक्ति भी दाने बिखेरने में लग चुके थे इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ। दान और महादान का यह संगम अद्भुत था। पता नहीं रोजाना कितने लोग यहाँ से पुण्य कमाकर जाते हैं लेकिन चौराहे पर सड़क किनारे का यह दृश्य हमें स्वयं को विकसित कहलाने से निश्चित ही रोकता है।     

Tuesday, November 27, 2018

जब मृत्यु के द्वार से वापस लौट आते हैं तो कैसा महसूस होता है --


एक समाचार से पता चला है कि न्यूयॉर्क के स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में किये गए शोध कार्य से पता चला है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद व्यक्ति विशेष को कुछ समय तक अपनी मृत्यु के बारे में अहसास रहता है कि वह मर गया है। इसका कारण यह है कि हृदयगति रुकने पर डॉक्टर तो रोगी को मृत घोषित कर देते हैं लेकिन रक्त संचार बंद होने के बाद भी मनुष्य का मस्तिष्क कुछ समय के लिए कार्यशील रहता है।  इससे डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित करने के बाद भी मनुष्य कुछ समय तक देख, सुन और समझ सकता है। यानि उसे मृत्यु के कुछ समय बाद भी जब तक डॉक्टर्स उसे पुनर्जीवित करने में प्रयासरत रहते हैं , रोगी को अपने आस पास घटित होने वाली घटनाओं का पता चलता रहता है। यहाँ तक कि पुनर्जीवन की प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर्स और नर्सें क्या बातें करते हैं , यह भी उसे सुनाई और दिखाई देता है और समझ में आता है। ये बातें उन लोगों से पता चली हैं जो हृदयगति बंद होने के बाद डॉक्टरों के प्रयास से पुनर्जीवित हुए थे।

लेकिन इस शोध में बताई गई कुछ बातें सही नहीं लगती। केवल हृदयगति बंद होने पर डॉक्टर्स किसी भी रोगी को मृत घोषित नहीं करते।  मृत घोषित तभी किया जाता है जब मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है जिसे डॉक्टर्स कुछ टैस्ट्स द्वारा तय करते हैं। हृदयगति बंद होने पर सी पी आर द्वारा रोगी का हृदय दोबारा चालू करने का प्रयास किया जाता है जो अक्सर सफल रहता है और रोगी ठीक हो जाता है। इस बीच निश्चित ही रोगी को सब अहसास रह सकता है। लेकिन हृदय के साथ जब मस्तिष्क भी काम करना बंद कर देता है , तब मृत्यु घोषित की जाती है जो कम से कम १० मिनट या उससे भी ज्यादा तक पुनर्जीवन प्रक्रिया के प्रयास के बाद किया जाता है।  ऐसे में निश्चित ही रोगी के अहसासों के बारे में किसी को पता नहीं चल सकता। 

यहाँ यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि पुनर्जीवन प्रक्रिया के दौरान क्योंकि रोगी को सब अहसास होता रहता है , इसलिए यह  आवश्यक है कि इस दौरान डॉक्टर्स या नर्सें अपना सारा ध्यान रोगी को पुनर्जीवित करने में ही लगाएं और कोई भी ऐसी बात मुँह से न निकालें जो तर्कसंगत न हो या रोगी की दृष्टि से अशोभनीय हो। साथ ही डॉक्टर्स द्वारा पुनर्जीवित करने का भरपूर प्रयास किया जाना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक मस्तिष्क काम करता है , तब तक पुनर्जीवन निश्चित ही संभव है।  लेकिन ब्रेन डेड होने के बाद हृदयगति का आना न सिर्फ निष्फल और निरुपयोगी है, बल्कि रोगी और उसके घरवालों के लिए भी एक असहनीय और लंबित पीड़ा साबित होती है।         
लेकिन मृत्यु शैया पर निश्चेतन या अर्धचेतन अवस्था में लेटे हुए व्यक्ति को वास्तविक रूप से मृत्यु होने तक और
मृत्यु के बाद क्या क्या अनुभव और अहसास होते हैं, यह एक रहस्य ही बना रहेगा।


Saturday, November 24, 2018

२१ वीं सदी में भी पाषाण युग की तरह आदिमानव बनकर रहना कितना उचित है ! एक सवाल, एक विचार --


अंडमान द्वीप समूह में रहने वाले सेंटीनेलिज आदिवासियों के बारे में मिले समाचार से पता चलता है कि देश के एक हिसे में २१ वीं सदी में भी कुछ जनजाति ऐसी हैं जो आधुनिक सभ्यता से पूर्णतया अनभिज्ञ है।  सरकार भी इन्हे इनके मूल स्वरुप में बचाये रखने के लिए भरसक प्रयास कर रही है।  इसीलिए इन द्वीप समूहों मे आधुनिक मानवों का प्रवेश और मिलना जुलना वर्जित है।  इसके पीछे यह सोच है कि ये मनुष्य आधुनिक सभ्यता से दूर होने के कारण आधुनिक जीवन शैली से दुष्प्रभावित हो सकते हैं जिससे ये विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं और इनकी प्रजाति लुप्त हो सकती है। इनमे रोगों से लड़ने की क्षमता न के बराबर होती है।  इनका खान पान आदिमानव की तरह है जो कंदमूल, मछली और वन्य जीवों का शिकार कर अपना पेट भरते हैं। इन्हे भी बहरी मानवों से मिलना जुलना बिलकुल पसंद नहीं, इसलिए यदि कोई इनके क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करता है तो वे अपने तीरों से भेद कर उसे मार डालते हैं जैसा कि एक अमेरिकी क्रिश्चियन मिसिनेरी युवक के साथ हुआ।

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इन्हे आधुनिक सभ्यता से दूर रखा ही क्यों जाये ! भले ही ये स्वयं अपना क्षेत्र, जीवन शैली और खान पान न छोड़ना चाहते हों, लेकिन विकसित होने का अधिकार इनको भी होना चाहिए। यह तो सरकार को देखना चाहिए कि ये लोग मुख्य धारा में सम्मलित होकर आधुनिकता का लाभ उठा सकें।
देश के बाकि हिस्सों में भी तो हम पिछड़ी जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करते हुए उन्हें विकास का लाभ उपलब्ध कराते ही हैं। फिर इन्हे इनके मूल रूप में सभ्यता के पिछड़े स्वरुप में रहकर जीवन यापन करा कर हम क्या हासिल कर रहे हैं, यह समझ से परे है।  पुराने स्मारक हमारी ऐतिहासिक धरोहर हो सकते हैं, लेकिन जीते जागते पिछड़े वर्ग के लोगों को पिछड़े ही रखना क्या उनके प्रति अन्याय नहीं है ! ज़रा सोचना अवश्य चाहिए।     

Friday, October 26, 2018

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ---



किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई !

तीन तीन नौकरों की मेहनत लगी थी ,
साथ में मशीनों की मशक्कत लगी थी ।
वक्त की पाबन्दी की दिक्कत सच्ची थी ,
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी।

नकली फूलों से धूल की धुलाई मार गई,
कई फालतू सामान की फेंकाई मार गई।
खाली खड़े खड़े टांगों की थकाई मार गई,
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।

वैसे तो हम मोदी जी के भक्त बड़े थे ,
स्वच्छता अभियान के भी पीछे पड़े थे।
पॉलिटिक्स में 'आप' के ना साथ कड़े थे,
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।

डर डर करते लाइट्स की सफाई मार गई,
गमलों में सूखे पौधों की छंटाई मार गई।
घर भर के साफ पर्दों की धुलाई मार गई ,
नौकर बनाके हमें आपकी भौजाई मार गई।

किताबों पे देखा कि काफी धूल चढ़ी थी,
मिली वो चीज़ें जो अर्से से खोई पड़ी थी।
क्या रखें क्या फेंकें ये मुसीबत बड़ी थी ,
उस पर डंडा लेकर हाथ में बीवी खड़ी थी।

वाट्सएप के लेखों की लंबाई मार गई,
आभासी संदेशों की बधाई मार गई ।
दोस्तों के फोन्स की बेरुखाई मार गई ,
जूए में हारे हज़ारों की बुराई मार गई।

दफ्तर में जब हम बड़े अफ़सर होते थे ,
दीवाली पर कमाई के अवसर होते थे ।
जाने अनजाने लोग गिफ्ट्स लाते थे ,
हम भी बॉस और मंत्री जी के घर जाते थे ।

पीछे छूटे गिफ्ट्स की लुटाई मार गई ,
दफ्तर में होते जश्न की जुदाई मार गई।
लोगों से बिछड़े ग़म की तन्हाई मार गई ,
रिटायर होकर दफ्तर से विदाई मार गई।

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई !

Saturday, October 20, 2018

रावण -- एक विचार ...


जलते हए रावण ने
जलाते हुए बन्दों से कहा ,
अरे आधुनिक भक्तो
हर साल मुझे जिलाते हो ,
फिर जिन्दा ही जलाते हो !
ऐसी क्या थी मेरी खता
जो इतने मुझसे हो खफा !
अधूरा सा ही तो था गुनाह
फिर क्यों करते हो मेरा दाह !
देखो अपने आस पास
कितने क़ुरावण रहते हैं !
हरण होती हैं रोज सीतायें
जिनके निशाँ तक मिट जाते हैं !
जाओ पहले किसी ऐसे एक
असुर को सज़ा दिलाकर दिखाओ !
तब ऐ कलयुगी भक्तों तुम मुझे जलाओ !

# एक विचार #

Wednesday, October 17, 2018

मी टू --

जिस तरह ''मी टू'' अभियान के अंतर्गत एक के बाद एक आरोप लगाए जा रहे हैं, यह कोई हैरानी की बात नहीं बल्कि एक ऐसी हकीकत है जो ''टिप ऑफ़ द आइसबर्ग'' की तरह है। समाज में यौन शोषण केवल बच्चियों और महिलाओं का ही नहीं होता बल्कि लड़कों का भी होता आया है। ऐसा पाया गया है कि १८ साल की उम्र तक १५-२० % लड़के यौन शोषण का शिकार हो चुके होते हैं।  एक सर्वेक्षण के अनुसार ३०% बच्चों के यौन शोषण में जान पहचान वाले या रिश्तेदारों का ही हाथ होता है। निसंदेह इसे रोकने के लिए इस विषय को उजागर करना अत्यंत आवश्यक है।

अब सरकार ने कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौनाचार पर रोक लगाने के लिए आवश्यक अधिनियम लागु किया हुआ है जिसके अंतर्गत कोई भी महिला अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार के बारे में गठित समिति से शिकायत कर दोषी के विरुद्ध कार्रवाई करा सकती है। लेकिन निजी क्षेत्र में विशेषकर सिनेमा जैसे आकर्षक व्यवसाय में महिलाओं की सुरक्षा के कोई पुख्ता उपाय न होने और कलाकारों का व्यक्तिगत रूप से निर्देशक आदि पर निर्भर होने के कारण महिला कलाकारों का यौन शोषण सदा ही होता आया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हालाँकि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अक्सर कहीं न कहीं महिलाएं भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं।  लेकिन समाज में महिलाओं की सुरक्षा का उत्तरदायित्त्व सभी पर है और कर्तव्य भी है। इस दिशा में कानून को भी सख्ताई से पेश आना चाहिए।         

Thursday, October 11, 2018

गूगल महाराज की जय --




कुछ ढूंढते ढूंढते हमने देखा कि गूगल सर्च में कुछ भी सर्च करो तो फ़ौरन सारी जानकारी आसानी से मिल जाती 
है।  बस हमने यूँ ही उत्सुकतावश पूछ लिया कि -- Who is Dr T S Daral ? क्लिक करते ही गूगल ने बताया कि 
इसकी जानकारी ११,९०,००० pages में समायी है।  हमने कुछ को खोलकर देखा तो ऐसी ऐसी जानकारियां मिली 
जिनकी जानकारी हमें खुद भी नहीं थी। एक तरह से जब से देश ने कंप्यूटर पर काम करना शुरू किया है, तब 
से अब तक की सारी बातें , कुछ सच्ची , कुछ झूठी , गूगल ने बता डाली। अब एक बात तो तय है कि मनुष्य 
विशेष रहे या न रहे, जब तक सूरज चाँद और गूगल रहेगा, तब तक इंसान तेरा नाम रहेगा। यह फोटो भी हमें 
गूगल से ही मिली