Monday, December 11, 2017

यदि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल :


यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। कुछ ऐसी ही हालत हो गई है आजकल मेडिकल प्रॉफ़ेशन की।  नोबल प्रॉफ़ेशन कहलाये जाने वाले चिकित्सा जगत में डॉक्टर्स को कभी भगवान माना जाता था।  लेकिन अब नहीं , बल्कि अब तो डॉक्टर्स पर आए दिन हमले और दुर्व्यवहार होते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण है आम जनता के लिए समुचित चिकित्सा सम्बन्धी सेवाओं का उपलब्ध न होना। हमारे देश में मुख्य रूप से चिकित्सा सेवाएं दो तरह से प्रदान की जा रही हैं।  एक सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरीज।  दूसरे प्राइवेट अस्पताल , नर्सिंग होम्स और क्लिनिक्स।  लेकिन जब से निजी अस्पतालों पर कॉर्पोरेट का कब्ज़ा हुआ है तब से न सिर्फ छोटे नर्सिंग होम्स बंद हो गए हैं या बंद होने की कगार पर हैं , बल्कि इन फाइव स्टार अस्पतालों का एक छत्र राज होता जा रहा है।  अधिकांश प्राइवेट अस्पताल बड़े बिजनेस घरानों द्वारा चलाये जा रहे हैं।  उनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना होता है।  बेशक , बड़ी इन्वेस्टमेंट द्वारा ये अस्पताल सब तरह के आधुनिक उपकरण और सुविधाएँ मुहैया कराने में सफल रहते हैं , लेकिन यहाँ इलाज कराना इतना महंगा पड़ता है कि या तो यह आम आदमी की पहुँच से बाहर होता है या फिर वे अपना पेट काटकर इलाज कराते हैं।

लेकिन अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर के भी जब या तो रोगी की मृत्यु हो जाती है या ज़रुरत से ज्यादा और अपेक्षित रूप से ज्यादा बड़ा बिल सामने आता है तो रोगी के सम्बन्धी दुर्व्यवहार पर उतर आते हैं।  हालाँकि लोगों को इस तरह स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने का कोई अधिकार नहीं है , और मार पीट तथा तोड़ फोड़ तो निश्चित ही गैर कानूनी है।  लेकिन अक्सर भावनाओं में बहकर लोग यह धृष्टता कर बैठते हैं। रोगियों के रिश्तेदारों की इन प्रतिक्रियाओं को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता और न्यायालय द्वारा उन पर यथोचित कानूनी कार्यवाई करने का प्रावधान है। लेकिन इस के बावजूद कभी कभी तोड़ फोड़ की बड़ी घटनाएं घट जाती हैं जो निंदनीय हैं। 

जहाँ जनता को भी यह समझना होगा कि वास्तव में डॉक्टर्स भगवान नहीं होते।  वे केवल उपचार करते हैं और सही उपचार से अधिकांश रोगी रोगमुक्त भी हो जाते हैं।  लेकिन डॉक्टर्स किसी को भी अमर नहीं कर सकते।  डॉक्टर क्या भगवान भी किसी को अमर नहीं बनाता।  यदि ऐसा होता तो दुनिया में किसी की मृत्यु ही नहीं होती। एक डॉक्टर केवल रोग का उपचार करता है , दर्द का निवारण करता है और गंभीर रोगों का भी दवा या शल्य चिकित्सा द्वारा उपचार कर रोगी को रोगमुक्त करता है।  लेकिन जितनी आयु विधाता ने निश्चित कर दी , उस से एक दिन ज्यादा भी कोई नहीं जिन्दा रख सकता।  यह बात जनता को समझानी पड़ेगी और उन्हें समझनी पड़ेगी। 

तथापि चिकित्सा जगत को भी अपनी कार्यप्रणाली में कुछ सुधार लाना आवश्यक हैं। अति आधुनिक कॉर्पोरेट अस्पतालों को सिर्फ अपने आर्थिक लाभ के बारे में न सोचकर , अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व के बारे में भी सोचना होगा। यदि पैसा ही कमाना है तो और बहुत से व्यवसाय हैं।  कम से कम चिकित्सा को धंधा और अस्पतालों को पैसा कमाने की मशीन तो न बनाया जाये। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि कोई भी डॉक्टर जान बूझ कर कभी किसी रोगी के साथ लापरवाही नहीं बरतता।  बल्कि सरकारी हो या प्राइवेट , हर डॉक्टर के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक और सुखद अनुभव होता है जब उसका रोगी उसके उपचार से ठीक हो जाता है। रोगी का सही उपचार करना सभी डॉक्टर्स के लिए एक चुनौती होती है जिसे स्वीकार करना एक डॉक्टर का पेशा ही नहीं बल्कि धर्म होता है और हर डॉक्टर उसे बखूबी निभाने की कोशिश करता है। 

यहाँ सरकार की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। भले ही आम आदमी के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है , लेकिन एक ओर रोगियों की बढ़ती संख्या और दूसरी ओर स्टाफ और सुविधाओं की कमी , सरकारी अस्पतालों में उपचार में बाधा उत्पन्न करते हैं। यदि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स और अन्य कर्मियों की संख्या समुचित हो तो किसी को भी उपचार से वंचित न होना पड़े।  दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज बहुत महंगा पड़ता है।  हालाँकि , अधिकांश बड़े प्राइवेट अस्पतालों को सरकार से भूमि कम दाम पर उपलब्ध कराई गई है , ताकि वे गरीबों का इलाज नियमनुसार निशुल्क कर सकें , लेकिन सरकार इस नियम को लागु करने में लगभग विफल रही है। इसलिए सभी अस्प्तालों में २५ % बाह्य विभाग और १०% बेड्स गरीबों के लिए उपलब्ध होने का प्रावधान होने के बावजूद , बहुत कम रोगी ही इसका लाभ प्राप्त करने में सफल रहते हैं। 

इस मामले में मीडिया का रोल भी बहुत महत्त्वपूर्ण रहता है।  अक्सर मीडिया एक छोटी सी घटना को बहुत बड़ी दुर्घटना का रूप देकर सनसनी फ़ैलाने का प्रयास करता है।  यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया को अपना उत्तरदायित्त्व समझते हुए जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि प्रचंड प्रतिस्पर्धा के ज़माने में समाचारों को बढ़ चढ़ कर दिखाना जैसे उनकी मज़बूरी सी बन गई है।   

कहते हैं शराब ख़राब नहीं होती , खराबी पीने वाले में होती है।  यदि कोई पीकर उधम मचाये या नाली में गिरा मिले तो यह पीने वाले की कमी है।  इसी तरह चिकित्सा जगत में अक्सर डॉक्टर्स का कोई कसूर नहीं होता। जहाँ सरकारी डॉक्टर्स को अत्यधिक रोगियों की संख्या का सामना करना पड़ता है , वहीँ प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टर्स को प्रबंधन की अनुचित मांगों को मानते हुए विवशतापूर्ण वातावरण में काम करना पड़ता है। इसीलिए अक्सर सरकारी अस्प्तालों में इलाज में कमी और प्राइवेट अस्पतालों में अनावश्यक टैस्ट्स और ओवर ट्रीटमेंट का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यदि कहीं कमी रहती है तो वो क्रमश: सरकार और कॉर्पोरेट में मालिकों के प्रबंधन और कार्य प्रणाली में होती है। इसलिए किसी भी दुर्घटना या इलाज में कौताही के आरोप पर डॉक्टर्स के विरुद्ध आँख बंद कर कार्यवाई करना अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। डॉक्टर्स समाज का सबसे ज्यादा शिक्षित और प्रशिक्षित हिस्सा है।  इन्हे यूँ बदनाम न किया जाये और जीवन भर के कठिन परिश्रम का ऐसा इनाम न दिया जाये कि उन्हें समाज में लज़्ज़ित होना पड़े। 

यहाँ यह कहना सर्वथा अनुचित नहीं होगा कि डॉक्टर्स को भी हिप्पोक्रेटिक ओथ के अंतर्गत अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समाज और रोगियों की सेवा में तत्पर रहते हुए ईमानदारी और श्रद्धापूर्वक अपना काम करना चाहिए।  

Wednesday, November 29, 2017

दिल्ली , जहाँ ट्रैफिक में रोंग इज राइट ---


प्रस्तुत है , दिल्लीवालों की यातायात सम्बंधित अनुशासनहीनता पर एक हास्य व्यंग कविता :


चौराहे पर जब लाल बत्ती हुई हरी ,
तो एक कार चालक ने कार स्टार्ट करी। 
दूसरी ओर दूसरे ने बाइक पर किक लगाई ,
तीसरे ने तीसरी ओर से स्कूटी आगे बढाई ।

पहला अभी चला भी नहीं था ,
कि रोंग साइड से दूसरा और तीसरा। 
दोनों चौराहे के बीच आ गए ,
और आपस में टकरा गए। 

दूसरा बोला -- अबे दिखता नहीं है ,
मैं रैड लाइट जम्प कर रहा हूँ। 
तीसरा गुर्राया -- चुप साले ,
मैं भी तो वही कर रहा हूँ।

देखते देखते दोनों में झगड़ा सरे आम हो गया ,
और इसी गर्मागर्मी में ट्रैफिक जाम हो गया। 
मौका देख दोनों दुपहिया चालक तो खिसक गए ,
पर सही होकर भी कार वाले महाशय फंस गए। 

तभी ट्रैफिक पुलिस वाले ने पुकार लगाई ,
अरै तू साइड में आ ज्या भाई।
ज़नाब लाइसेंस और गाड़ी की आर सी दिखाना ,
रैड लाइट जम्प करने का भरना पड़ेगा जुर्माना। 


नोट : दिल्ली में लाल बत्ती हरी होते ही पहले चारों ओर से दोपहिया वाहन चालक रैड लाइट जम्प करना अपना अधिकार समझते हैं। 

Sunday, November 12, 2017

दिल्ली का प्रदुषण ---


दिल जीवन भर धड़कता है ,
साँस जिंदगी भर चलती है ,
पर कभी अहसास नहीं होता ,
दिल के धड़कने का, साँसों के चलने का।
ग़र होने लगे अहसास,
दिल की धड़कन का ,
या साँस के चलने का ,
तो जिंदगी के इम्तिहान में ,
दिल और साँस, दोनों फेल हो जाते हैं।
ग़र नहीं चाहते अहसास ,
दिल की धड़कन का , साँसों की रफ़्तार का ,
तो पर्यावरण को बचाओ ,
गंदगी और प्रदूषण से, वरना
ना साँस चलेगी , ना रहेगी जिंदगी की आस।   

Saturday, November 4, 2017

लेह से पैंगोंग लेक -- लेह लद्दाख यात्रा का अंतिम पड़ाव :

लेह से १४० किलोमीटर दूर भारत चीन सीमा पर है विश्व की सबसे ऊँचाई पर बनी प्राकृतिक झील , पैंगोंग लेक। यहाँ जाने के लिए लेह मनाली हाइवे से होकर जाना पड़ता है। पैंगोंग जाने के लिए सुबह जल्दी निकलना पड़ेगा ताकि आप आराम से शाम तक वापस आ सकें। हाइवे को छोड़ने के बाद आप उबड़ खाबड रास्ते से होते हुए पहुँचते हैं १८००० फ़ीट पर स्थित चांगला पास जो विश्व का दूसरा सबसे ऊँचाई पर बना वाहन लायक सड़क है।  यह पूरे वर्ष खुला रहता है और अपेक्षाकृत आसान रास्ता है।  यहाँ इस रास्ते पर पहली बार बर्फ मिलेगी।  





चांगला पास :


चांगला पास पर खारदुंगला पास की तरह न तो भीड़ भाड़ थी और न ही तेज हवा।  हालाँकि बाहर का तापमान  -- ४ डिग्री था ।  यहाँ से निकलने के बाद ढलान शुरू हो जाती है।  रास्ते में कई गांव पड़ते हैं जिनमे सक्ती गांव बहुत हरा भरा और संपन्न गांव दिखाई दिया।





लगभग सुनसान सड़क से होकर आखिर आप पहुँच जाते हैं पैंगोंग लेक जो दूर से भी दिखाई देने लगती है। पास के बाद रास्ता अच्छा है और दृश्य बहुत सुन्दर।  अलग अलग रंग रूप के पहाड़ मन मोह लेते हैं । लेकिन पास पहुंचकर लेक की असली सुंदरता के दर्शन होते हैं।  गहरे नीले रंग का पानी कई रंगों में नज़र आता है।  आस पास के पहाड़ बेहद खूबसूरत दिखाई देते हैं।





लेक का पानी इतना साफ है कि किनारे से काफी दूर तक तल के पत्थर साफ नज़र आते हैं।  दिल करता है कि दौड़ कर पानी में घुस जाओ और दौड़ते चले जाओ।





विभिन्न भागों में पानी का रंग विभिन्न रंगों में नज़र आता है।  यह पानी में पहाड़ और आसमान की झलकती छवि के कारण होता है।





झील के किनारे अनेक रेस्ट्रां हैं जहाँ झटपट खाद्य पदार्थ और पेय आसानी से मिल जाते हैं।  झील किनारे बैठकर गर्मागर्म चाय पीने का मज़ा ही कुछ और है।





आम तौर पर सैलानी झील के शुरू में ही रुक कर झील का आनंद लेते  हैं।  यहीं पर सारी गतिविधियां भी हैं जैसे थ्री इडियट्स वाला करीना कपूर का स्कूटर जिस पर बैठकर लोग शौक से फोटो खिंचवाते हैं। लेकिन आप आगे लगभग ७ किलोमीटर तक जा सकते हैं।  आगे झील का पाट थोड़ा चौड़ा है।  यहाँ से दोनों ओर का नज़ारा भी बहुत सुन्दर है।   झील के आस पास कई टैंटों वाले कैम्प हैं जहाँ रात को रुका जा सकता है।  हालाँकि रात में हवा तेज चलती है और टैंट में ठण्ड लग सकती है।  फिर भी यहाँ एक रात रुकना अपने आप में एक बढ़िया अनुभव हो सकता है।


रेंचो स्कूल : करीब दो घंटे रुकने के बाद हम वापस चल पड़ते हैं लेह की ओर।  लेह पहुँचने से पहले फिल्म थ्री इडियट्स में दिखाया गया रैंचो स्कूल देखना न भूलें। यह पांच बजे तक  जनता के लिए खुला रहता है जिसमे कोई प्रवेश शुल्क नहीं है।  एक गाइड आपको उस दीवार तक ले जाएगी जहाँ फिल्म की शूटिंग हुई थी।


द्वार के पास ही बना है यह सुन्दर कैफे , हालाँकि कॉफी बनाने में बहुत समय लगता है।  इसलिए हम तो बिना पीये ही आ गए।





फिर भी एक फोटो तो ले ही लिया।





और ये है वो दीवार जिसका दृश्य आपको याद आ ही गया होगा।




लेह से वापसी का हवाई सफ़र बहुत शानदार है। पूरी पर्वतमाला बहुत पास नज़र आती है।



और पहाड़ों पर गिरी बर्फ ऐसे दिखाई देती है जैसे बर्फ का समुन्द्र हो। बस आपकी सीट खिड़की के पास होनी चाहिए जो आपके कहने से आसानी से मिल सकती है।  अंत में हम लौट आते हैं एक बेहद शानदार सफ़र से वापस घर की ओर।   

Saturday, October 21, 2017

वर्तमान परिवेश में हमारे पर्व --


दिवाली के अवसर पर हिन्दुओं के पंचपर्व की श्रंखला में आज अंतिम पर्व है , भैया दूज।  यह महज़ एक संयोग हो सकता है कि हिन्दुओं के सभी त्यौहार तीज के बाद आरम्भ होकर मार्च में होली पर जाकर समाप्त होते हैं।  फिर ५ महीने के अंतराल के बाद पुन: तीज पर आरम्भ होते हैं। निश्चित ही इसके सामाजिक , आर्थिक , भूगोलिक  और मौसमी कारण भी हो सकते हैं।  मार्च के बाद गर्मियां आरम्भ हो जाती हैं जो देश में किसानों के लिए फसल काटने और धनोपार्जन का समय होता है। साथ ही गर्मी और बरसात का मौसम भौतिक सुविधाओं के अभाव में गांवों में रहने वाले लोगों के लिए अत्यंत कष्टदायक रहता था। इसलिए सावन की रिमझिम फुहारों के साथ जब मौसम सुहाना होने लगता है , और किसानों की मेहनत की कमाई भी फसल के रूप में घर आ जाती है , तब आराम के दिनों में तीज त्यौहारों को मनाने का  आनंद आता है।शायद यही कारण आगे चलकर सम्पूर्ण देश में पर्वों का कैलेंडर बनाने में सहायक सिद्ध हुआ होगा।

समय के साथ देश में हुए विकास के कारण निश्चित ही देशवासियों के रहन सहन , दिनचर्या और सामर्थ्य में परिवर्तन आया है।  आज यहाँ भी किसी भी विकसित देश में मिलने वाली सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। बदले हुए परिवेश में हमारी जीवन शैली बदलना स्वाभाविक है। पर्वों के स्वरुप भी बदल रहे हैं। आज आवश्यकता है कि हम वर्तमान परिवेश अनुसार अपनी सोच को भी बदलें। आदिकाल से चले आये पर्वों की कालग्रस्त परमपराओं और कुरीतियों को त्याग कर सिर्फ अच्छी बातों को ही अपनाएं। जो रीति रिवाज़ सदियों पहले तर्कसंगत रही होंगी , वे अब अर्थहीन हो गई हों तो उन्हें छोड़ना और तोडना ही अच्छा है।  

त्यौहार हमारे जीवन में माधुर्य प्रदान करते हैं।  यह सामाजिक , पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को सुदृढ़ बनाने का अच्छा अवसर भी होता है। इसलिए पर्व पर सभी आपसी मन मुटाव भुलाकर सभी को एक होकर मर्व मनाना चाहिए।  भले ही विभिन्न धर्मों के पर्व भिन्न होते हैं , लेकिन सभी धर्मों के पर्वों का सम्मान करते हुए दूसरे धर्मों के पर्वों में भी यथानुसार अपने निकटतम सहयोगी और मित्रों को बधाई अवश्य देनी चाहिए। तभी समाज और देश में पारस्परिक सौहार्द बनाये रखा जा सकता है।   

Friday, October 13, 2017

लेह से नुब्रा , विश्व के सबसे ऊंचे खरदुंगला पास से होकर , एक रोमांचक सफ़र ---


लेह में दो दिन के स्थानीय आवास और विश्राम के बाद आप पूर्णतया स्वस्थ और अभ्यस्त हो जाते हैं।  अगले दिन आप निकल पड़ते हैं दो दिन के नुब्रा वैली टूर पर।  नुब्रा वैली लेह से करीब १४० किलोमीटर दूर है जहाँ विश्व की सबसे ऊंची वाहन योग्य सड़क द्वारा खरदुंगला पास से होकर पहुंचा जा सकता है। सुबह नाश्ते के बाद ९ बजे चलकर आप २ या ३ बजे तक आराम से नुब्रा पहुँच सकते हैं। 



लेह से खररदुंगला पास की दूरी ३९ किलोमीटर है जो एक ही पहाड़ पर चलकर आता है। यहाँ तक का रास्ता आसान ही है , हालाँकि जगह जगह सड़क को चौड़ा करने का काम चल रहा था , लेकिन ड्राइव करने में कोई विशेष दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ रहा था। हमारे साथ तो ड्राइवर था लेकिन बहुत से लोग अपनी गाड़ी द्वारा भी लेह घूमने आते हैं।  फोटो में दूर लेह वैली नज़र आ रही है और पृष्ठभूमि में बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियां जो कोणकरम पर्वतमाला है।   





खरदुंगला पास से ठीक पहले ये पहाड़ दूर से ही नज़र आ रहे थे लेकिन पास से इनकी खूबसूरती और भी निखर आई।




पास के पार बर्फ और भी ज्यादा थी। ज़ाहिर है , यह बची खुची बर्फ ही थी जो अभी तक पिघली नहीं थी।  सर्दियों में तो सारा ही पहाड़ बर्फ से ढका रहता है और बर्फ को काटकर रास्ता बनाना पड़ता है। यह काम सेना करती है।   





खारदुंगला पास की ऊँचाई १८३८० फ़ीट है और यह विश्व का सबसे ऊंचा स्थान है जहाँ वाहन योग्य सड़क है। इस स्थान पर फोटो खिंचवाने के लिए लाइन में लगना पड़ता है। लेकिन निश्चित ही यह भी एक उपलब्धि ही लगती है। 




बीच में सड़क और चारों ओर छोटी छोटी पहाड़ियां देखकर नहीं लगता कि हम इतनी ऊँचाई पर हैं जहाँ ठण्ड और ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से कई लोगों को उल्टी आ जाती है। खरदुंगला पास की मन में कुछ ऐसी तस्वीर थी कि कोई बहुत संकरा सा बर्फ से ढका दुर्गम रास्ता होगा जिसे बड़ी मुश्किल से ही पार कर पाते होंगे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि अभी तक हमने रोहतांग पास ही देखा था जहाँ गर्मियों में भी बर्फ के बीच से संकरी सी सड़क से होकर जाना पड़ता है।  लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं था , बल्कि लग ही नहीं रहा था कि हम इतनी ऊँचाई पर खड़े हैं।  बस हवा की रफ़्तार कुछ ज्यादा थी जो चेहरे को चीरती हुई जा रही थी। 





ठन्डे मौसम में सकूं देते हैं यहाँ बने कई ढाबे जहाँ गर्मागर्म चाय और कॉफी पीकर तन और मन को गरमाहट मिलती है।  पास को पार करने पर ढलान शुरू हो जाती है।




पास के बाद सड़क बिलकुल नई बनाई गई थी और मक्खन मलाई जैसी लग रही थी। निरंतर ढलान के साथ यहां आपके साथ जलधारा भी बहने लगती है जो कि बर्फीले पहाड़ों से निरंतर पिघलती बर्फ से बनती है।  कुछ दूर जाने पर खरदुंग गांव आता है जो इस दिशा में नुब्रा वैली का पहला गांव है।  चारों ओर सूखे , नंगे , भूरे रंग के पहाड़ों के बीच में हरा भरा गांव देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।  गांव को पार करने के बाद जो पहाड़ दिखाई देते हैं उनको देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी चित्रकार ने कैनवास पर खूबसूरत चित्रकारी की हो। यहाँ पहाड़ों पर पत्थर नज़र नहीं आते।  ऐसा लगता है मानो सारा पहाड़ एक ही पत्थर से बना है।  उनकी सतह भी एकदम साफ और चिकनी सी नज़र आती है।  लेकिन पूरे पहाड़ पर सैंकड़ों हज़ारों नालियां सी नज़र आती हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने कुल्हाड़ी से काटकर बनाया हो।  यह बर्फ के पिघलकर बहने के कारण होता है जो सदियों से होता चला आया होगा।  पानी की काट ही ऐसी होती है कि पत्थर को भी काटकर आकार दे देती है। 





खरदुंग गांव के बाद जल्दी ही आप पहुँच जाते हैं श्योक नदी के पास जिसके साथ साथ चलते हुए हम आ जाते हैं नुब्रा वैली के अंदर। यहाँ नदी के दो भाग हो जाते हैं।  एक नदी नुब्रा कहलाती है और दूसरी श्योक नदी। अब हम श्योक नदी के साथ साथ आगे बढ़ते हुए अंतत : पहुँच जाते हैं दिस्कित गांव जहाँ हमारा कैम्प है।   



दोनों नदियों के संगम के पास काफी चौड़ा पाट है जो रेतीला समतल स्थान है।  यहाँ वापसी में हमने डेजर्ट स्कूटर चलाने का भी आनंद लिया।  यहाँ दो गांव हैं , पहला दिस्कित और दूसरा करीब १० किलोमीटर दूर हुन्डर गांव। नुब्रा में रात में रुकने के लिए बहुत से कैम्प लगाए गए हैं जो ज्यादातर इन्ही दो गांवों में पड़ते हैं।  इन कैम्पों में टेंट में रहने की सुविधा होती है जिसमे सभी आवशयक सुविधाएँ जुटाई गई हैं।  नहाने के लिए गर्म पानी और टॉयलेट के साथ डबल बैड और बरामदा जिसमे बैठ कर आप प्रकृति को निहार सकते हैं। खाने के लिए डाइनिंग रूम जिसमे स्वादिष्ट बुफे आयोजित किया जाता है।  यहाँ आपके आराम का पूरा ख्याल रखा जाता है। 



कैम्प के चारों ओर के पहाड़ बहुत खूबसूरत दिखाई देते हैं और धूप छाँव का अद्भुत मिश्रण सुबह मन मोह लेता है। कैम्प को भी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में बनाया सजाया गया है। 




शाम के समय हुन्डर गांव में जाकर सूर्यास्त के समय ऊँट की सवारी बहुत दिलकश लगती है।  यहाँ दो कूबड़ वाले ऊँट होते हैं जिनपर बैठना बड़ा आनंददायक लगता है।




ऊँट पर बैठकर ऊंटों का काफिला चल देता है सैंड ड्यून्स की ओर। २०० रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से  करीब १५ मिनट की डेजर्ट सफ़ारी कोई घाटे का सौदा नहीं है। लेकिन टोकन नंबर का कोई विशेष महत्त्व नहीं रहता , लोग बिना नंबर के भी घुस जाते हैं और यदि आपने ध्यान नहीं दिया तो आप खड़े ही रह जायेंगे और बाद में आने वाले आपसे पहले सवारी कर चुके होंगे।  इसलिए अपने नंबर के लिए सतर्क रहना ज़रूरी है। 





दिस्कित गांव अपने आप में एक छोटा सा शहर है।  यहाँ दुकानें , पोस्ट ऑफिस , अस्पताल , विधालय, बिजली , पानी ,टेलिफ़ोन और इंटरनेट आदि सभी आम नागरिक सुविधाएँ हैं। सुदूर पहाड़ों में ये सभी सुविधाएँ देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता होती है। सुबह वापसी में हम जाते हैं गांव के पास ही एक पहाड़ी पर बने इस ५०० वर्ष गोम्पा को देखने जहाँ सैंकड़ों मोंक्स भी रहते हैं।  यहाँ से घाटी का नज़ारा बेहद सुन्दर दिखाई देता है। 





गोम्पा के साथ ही है ये मोनास्ट्री जो थिकसे मोनास्ट्री का ही भाग है।




ये चार पहियों वाला स्कूटर वास्तव में बड़ा मज़ेदार लगा।  इसको चलाने के लिए बस एक लीवर है जिसे दबाते ही यह दौड़ने लगता है।  उसी से स्पीड कंट्रोल कर सकते हैं और छोड़ने पर यह रुक जाता है। गाइड ने साथ बैठकर जो एक टीले से नीचे डाइव करवाया तो ऐसा लगा जैसे सैंकड़ों फ़ीट से नीचे कूद गए हों।  एक तरह से यह रेगिस्तान का राफ्टिंग जैसा है। 




नुब्रा से सुबह ९ बजे चलकर आप २ बजे तक लेह पहुँच जाते हैं।  लंच के बाद आराम करने के बाद शाम को लेह बाजार के साथ ही बना लेह पैलेस पैदल ही पहुंचा जा सकता है , हालाँकि गाड़ी से जाने के लिए सड़क भी बनी है। लेह पैलेस लकड़ी और मिटटी से बना हुआ है और नौ मंज़िला है।  यहाँ से एक ओर पूरा लेह शहर नज़र आता है। 




वहीँ दूसरी ओर लेह घाटी और इसमें बने नए बहुमंज़िला होटल्स दिखाई देते हैं।  यह क्षेत्र नया लेह है।





लेह पैलेस की आठवीं मंज़िल तक जाया जा सकता है।  पीछे एक पहाड़ी पर बनी एक और मोनास्ट्री शाम के समय बहुत सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती है।  सूरज ढलने के साथ ही हम नीचे उतर आते हैं बाजार की ओर , हालाँकि रास्ता बड़ा टेढ़ा मेढा और कई जगह संकरा भी है लेकिन पैदल के लिए सही है , बशर्ते कि आपके घुटने सही सलामत हैं।



Tuesday, October 10, 2017

अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं ---

दो सत्य लघु कथाएं :   
१ )
कॉलेज के दिनों में हमें भी धूम्रपान की आदत लग गई थी। दिसंबर १९८३ में मारुती गाड़ियां आने के बाद दिल्ली में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।  १९९० में जब हमारी पहली गाड़ी मारुती ८०० आई तब तक दिल्ली में लगभग दस लाख वाहन हो चुके थे और उत्सर्जन पर कोई भी नियंत्रण न होने के कारण दिल्ली में लगातार बढ़ता हुआ वायु प्रदुषण चरम सीमा पर पहुँच गया था। तब न PUC होते थे और न ही गाड़ियों में उत्सर्जन मानक। ऐसे में अक्सर शाम के समय दिल्ली के मुख्य चौराहों पर धुंए का बादल सा छा जाता था।  ऐसे ही एक दिन जब हमने दिल्ली के सबसे ज्यादा व्यस्त चौराहों  में से एक ITO पर रैड लाइट होने पर स्कूटर रोका तो देखा कि धुआं इतना ज्यादा था कि अपनी ही साँस कड़वी सी लग रही थी।  तभी हमने देखा कि एक और स्कूटरवाला आकर रुका और रुकते ही उसने तुरंत जेब से निकाल कर सिगरेट जलाई।  यह देखकर हमें लगा कि यह कैसा बंदा है , बाहर का धुआं कम था जो यह सिगरेट का धुआं भी फेफड़ों में भर रहा है ! तभी हमें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और उसके बाद हमने फिर कभी धूम्रपान नहीं किया।  अभी इतवार को जब हमने अपना PFT कराया तो बिलकुल नॉर्मल निकला। 
२ )
एक बार गौतम बुद्ध कहीं जा रहे थे थे।  रास्ते में डाकू उंगलीमाल आ गया।  वह लोगों को लूट कर उनकी एक उंगली काट कर अपने गले में माला बनाकर पहनता था। जैसे ही उसने बुद्ध को देखा तो जोर से बोला -- ठहर जा।  बुद्ध ने कहा -- मैं तो ठहर गया , तू कब ठहरेगा ! अंत में जब गौतम बुद्ध ने उसे बात का मर्म समझाया तो वह सदा के लिए लूटपाट को छोड़कर शरीफ इंसान बन कर रहने लगा ।

आज दिल्ली में उस समय की दस गुना यानि करीब एक करोड़ गाड़ियाँ हैं।  कई कारणों से दिल्ली में प्रदुषण दशहरे के बाद ही बढ़ने लगता है।  इस भयंकर वायु प्रदुषण से बदलते मौसम में लाखों लोगों को स्वास रोग होने लगते हैं।  कृपया सिर्फ एक मिनट साँस रोककर देखिये कि आपको कैसा लगता है। हम जीवन भर साँस लेते रहते हैं लेकिन कभी उसका पता नहीं चलता।  जिसे दमा जैसी साँस की बीमारी होती है , उसे एक एक साँस के लिए न सिर्फ अथक प्रयास करना पड़ता है बल्कि घोर कष्ट भी उठाना पड़ता है।  स्वास रोग न जात पात देखता है , न धर्म। आपकी क्षणिक मिथ्या ख़ुशी दूसरों के लिए जीवन भर का रोग न बने , इतना प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं।