Monday, November 30, 2015

विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश---


कल चाणक्य पुरी में अशोक होटल के सामने नेहरू पार्क के एक कोने में बने PSOI कल्ब में आयोजित पैलेट फैस्ट २०१५ में जाकर १९७५ - १९८० के दौरान अपने कॉलेज के समय की यादें ताज़ा हो गईं।  वहीँ पास ही चाणक्य सिनेमा हॉल में देखी अनेकों फ़िल्में जिन्हे देखने के लिए अक्सर मेनेजर के पास जाकर सिफारिश लगाकर टिकटें लेनी पड़ती थी।  या फिर ग्रेटर कैलाश में अर्चना सिनेमा हॉल में रॉजर मूर की जेम्स बॉन्ड की अनेकों फ़िल्में , जॉहन ट्रेवोल्टा की सेटरडे नाइट फीवर और अन्य अनेक इंगलिश फ़िल्में जो हमने फ्रंट स्टाल में बैठकर देखी थी ६५ पैसे की टिकेट लेकर।  बोनी एम और एब्बा ग्रुप के गाने जिन्हे आज भी सुनकर तन और मन नृत्य करने लगता है।

निश्चित ही दक्षिण दिल्ली का यह पॉश इलाका सदा ही मन लुभाता रहा है।  आखिर बचपन और जवानी के २० साल हमने यहीं गुजारे थे। इस क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों के निवासियों में उतना ही अंतर दिखाई देता है जितना झुमरी तलैया और मुंबई के हीरानन्दानी क्षेत्र में।  फिल्मों या फैशन शोज में दिखाई जाने वाली पोशाकें पहने सिग्रेट और बियर पीती लड़कियां सिर्फ यहाँ ही दिखाई दे सकती हैं।




उधर सभी ५ सितारा होटलों और जाने माने फ़ूड चैन रेस्ट्रां के एग्जोटिक व्यंजन चखने के लिए आये खाये पीये अघाये कुछ मोटे कुछ थुलथुल लोगों की भीड़ को देखकर कहीं ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमारे देश में कहीं गरीबी भी है।  भूख भले ही न हो , लेकिन भूख लगाने के लिए सूप और स्टार्टर्स से शुरुआत करके मुख्य भोजन करने के बीच मनोरंजन के लिए एक ऊंची सी स्टेज पर एक्रोबेटिक्स करता एक पंजाबी मुंडा चिंघाड़ कर गाता हुआ युवा वर्ग को तालियां बजाने और साथ गाने के लिए लगातार उकसा रहा था।  बेशक हम जैसे नॉट सो युवा भी इसका भरपूर आनंद उठा रहे थे।





आजकल मोबाईल कैमरे ने तो जैसे कल्चर ही बदल दिया है।  सबके हाथों में तने कैमरे पल पल फोटो खींचते हुए इन पलों को कैमरे में कैद किये जा  रहे थे। लेकिन सबसे ज्यादा पॉपुलर तो सेल्फ़ी हो गई है।  हम भी जब सेल्फ़ी ले रहे थे तो एक बहुत ही सुन्दर सी कन्या ने हमें देखा तो बोली , लाइए मैं फोटो ले देती हूँ।  उसकी सुंदरता देखकर श्रीमती जी की तो आँखें ही चुंधिया गई।  लेकिन हमने प्यार से उसका धन्वाद करते हुए कहा कि बेटा फोटो तो हो गई। हालाँकि अंग्रेजी स्टाइल में देसी हसीनाओं को देखकर तो किसी की भी आँखों की पुतलियाँ फ़ैल सकती हैं।



यही है दिल्ली का ग्लेमर वर्ल्ड। आम आदमी के एकदम नज़दीक , लेकिन इतना दूर।
यहाँ एक ही जगह पर ऊंची अट्ठालिकाएँ और झोंपड़ पट्टी , फटेहाल भिखारी और कपडे फाड़ कर पहनने वाले शहरी एक साथ नज़र आते हैं।  ज़ाहिर है , विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश एक विकासशील देश है और लम्बे समय तक रहने वाला है, ऐसे आसार नज़र आते हैं।






10 comments:

  1. "यही है दिल्ली का ग्लेमर वर्ल्ड। आम आदमी के एकदम नज़दीक , लेकिन इतना दूर।"...... सहमत हूँ!

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  2. दिल्ली क्या, अब तो बाकि शहरों में भी पार्टीज में यही महौल देखने को मिलता है. मुझे तो लगता है वर्गीय फासला बहुत कम हुआ है.

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    1. वर्गीय फासला कम नहीं जी , बढ़ रहा है।

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  3. शादी-ब्याह या किसी भी उत्सव का जीता -जगता वर्णन किया है आपने ..बहुत पैसे वाले सौ-सौ किलो के लोग भी इन कार्यक्रमों में मिलने वाले भोजन पर भूखे भेड़ियों की तरह झपटते है ..
    और जब दिल्ली का यह हाल है तो बाकि का क्या कहें ! गगनचुम्बी इमारतों के साथ झोपड़पट्टियां ... शायद यही झोपड़ पट्टियां इन गगनचुम्बी इमारतों को सजाये - संवारे रखतीं है

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  4. अपन के लिए तो दिल्ली दूर है! और पहुँच से भी दूर है यह ग्लैमर की दुनियाँ। बस आभासी दुनियाँ में देख-देख जानकारी प्राप्त करते रहते हैं और आप सब को धन्यवाद देते रहते हैं। :)

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    1. पाण्डेय जी , आप कम से कम शांति से तो रहते हैं ।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (02-12-2015) को "कैसे उतरें पार?" (चर्चा अंक-2178) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. सुंदर प्रस्तुति।

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