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Wednesday, June 22, 2022

चैल, शिमला के पास एक सुंदर, शांत हिल स्टेशन --

यदि आप भीड़ भाड़ से दूर एक शांत जगह पर गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ों में कुछ दिन बिताना चाहते हैं तो चैल (चायल) एक ऐसी ही सुंदर, शांत और प्रकृति के नज़दीक जगह है। दिल्ली से लगभग 350 किलोमीटर दूर, यहां जाने के लिए रास्ता भी बिलकुल सीधा और साफ़ है। कालका शिमला हाइवे पर कंडाघाट से दायीं ओर एक सड़क जाती है जो विभिन्न गांवों से होती हुई सीधे चैल जाती है।

चैल में दो या तीन रात रुकना काफ़ी है। यहां एक पहाड़ पर काली टिब्बा नाम की चोटी पर काली मंदिर है, जहां से 360 डिग्री व्यू नज़र आता है। इसके अलावा चैल शहर में चैल पैलेस ही देखने लायक जगह है, जहां प्रवेश के लिए 100 रुपये का टिकट है। महल में कुछ खास नहीं है, लेकिन उसके बाहर लॉन और आस पास का क्षेत्र बहुत हरा भरा और मनमोहक है। आप चाहें तो यहां एक रात रह भी सकते हैं। लेकिन एक रात का किराया महाराजा सुइट में 25000, महारानी सुइट में 11500 है। हालांकि सबसे सस्ता कमरा राजकुमार का 5200 का है। बाकी एक क्रिकेट ग्राउंड है जिसे दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना क्रिकेट मैदान कहते हैं। हालांकि इसमें देखने वाली कोई बात नही है।
आप चैल से शिमला घूमकर भी शाम तक वापस आ सकते हैं। रास्ते में एक चोटी पर स्टोन टेम्पल बना है, जहां तक पहुंचने में आपकी ड्राइविंग स्किल्स का पूरा इम्तिहान हो जाएगा। शिमला के रास्ते मे कुफरी भी आता है, जहां आपको भीड़ के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन कोई बात नहीं, वहां आप सरकारी कैफे में कॉफी पीकर आगे बढ़ सकते हैं।
चैल में रुकने के लिए ग्रैंड सनसेट होटल एक बढ़िया विकल्प है जो शुरू में ही मेन रोड़ पर है। यहां से वैली व्यू और सनसेट बहुत बढिया नज़र आता है। यह आस पास स्थित सभी होटल्स में सबसे बढ़िया है।
-- क्रमश:
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Wednesday, May 8, 2019

उत्तर भारतियों को उत्तर पूर्व भारतियों से ही कुछ सीख लेना चाहिए --


उत्तर पूर्व भारत के राज्य मेघालय की राजधानी शिलॉन्ग को पूर्व का स्कॉटलैंड कहा जाता है। समुद्र तल से लगभग ५००० फुट की ऊँचाई पर स्थित शिलॉन्ग एक हिल स्टेशन जैसा ही है। हालाँकि यह उत्तर भारत के हिल स्टेशंस की तरह पहाड़ की ढलान पर नहीं बसा है। सारा शहर लगभग समतल भूमि पर बसा है और चारों ओर छोटी छोटी पहाड़ियां हैं। लगभग सवा लाख की जनसँख्या वाले शहर में गाड़ियों की भीड़ देखकर एक बार तो घबराहट सी होने लगती है। शहर में प्रवेश करने के बाद शहर के मध्य तक पहुँचने में यदि एक घंटा भी लग जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी। 




लेकिन गाड़ियों और लोगों की भीड़ भाड़ होने के बावजूद यहाँ कभी ट्रैफिक जैम नहीं होता , न ही किसी को कोई परेशानी होती है। इसका कारण है यहाँ के लोगों में यातायात के नियमों के प्रति जागरूक होना। यहाँ विदेशों की तरह पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाती है ताकि उन्हें सड़क पार करने में कोई कठिनाई न हो। कितना भी भारी ट्रैफिक क्यों न हो, पैदल सड़क पार करने वाले को देखकर गाड़ियां स्वत: ही रुक जाती हैं। यहाँ की सड़कें भले ही कम चौड़ी हों, लेकिन सड़क के दोनों ओर पक्के टाइल्स लगे हुए साफ सुथरे फुटपाथ बने हैं जिन पर पैदल चलने में बहुत सुविधा रहती है। 



यहाँ के निवासियों में महिलाओं की औसत ऊँचाई ५ फुट और पुरुषों की साढ़े पांच फुट नज़र आई।  यानि यहाँ के लोग आम तौर पर कम कद के हैं लेकिन स्वाभाव में सीधे और निश्छल नज़र आये। कहीं भी सडकों के किनारे कूड़े के ढेर नज़र नहीं आये। ज़ाहिर है, यहाँ प्रशासन का कूड़ा प्रबंधन उत्तम दर्ज़े का है। साथ ही यहाँ के निवासी भी सफाई पसंद और स्वच्छता के प्रति जागरूक हैं। बस यही जागरूकता और कर्तव्यपरायणता यदि उत्तर भारत के लोगों में भी आ जाये तो निश्चित ही सरकार का स्मार्ट सिटीज बनाने का सपना अवश्य पूरा हो पायेगा।            

Sunday, May 27, 2018

कुदरत की देन को संभालना तो खुद ही पड़ता है - यूरोप , एक सैर ....


पिछले १७ -१८ दिन से हम आपको यूरोप की मुफ्त सैर करा रहे हैं।  अच्छी अच्छी फोटोज दिखा रहे हैं , लुभा रहे हैं , चिड़ा रहे हैं और शायद जला भी रहे हैं। लेकिन अब समय है सभी मानवीय भावनाओं को अलग रखकर कुछ आत्मनिरीक्षण करने का। आईये देखते हैं क्या अंतर है यूरोपियन देशों और हमारे देश में और इसके लिए कौन और कैसे जिम्मेदार है।

यूरोप की ख़ूबसूरती :

१. बेहतरीन मौसम : जहाँ गर्मी में भी पल पल बदलता मौसम , कभी धूप कभी बादल और बिना गरज के छींटे , वातावरण को खुशगवार बनाते हुए।  बेशक यह कुदरत की देन है।  लेकिन कुदरत के इस तोहफे को यूरोपियन्स ने बड़ी ही समझदारी से भुनाया है।

२. जनसँख्या : उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है जनसँख्या पर नियंत्रण।  लगभग सभी यूरोपियन देशों में जनसँख्या वृद्धि की दर शून्य के करीब है।  कुछ देशों में तो यह माइनस में है।  यानि वहां बढ़ती जनसँख्या की कोई चिंता ही नहीं है।

३.सक्रीयता :  इसका एक परिणाम यह है कि वहां वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन इसकी आपूर्ति वे लोग ८० -८५ वर्ष की आयु तक भी काम करके पूरी करते हैं।  यह देखकर बड़ी हैरानी होती है कि एक बड़े से स्टोर में एक अकेली बुढ़िया अपने पोपले मुँह से मुस्कारते हुए आपको सामान बेच रही होती है। लेकिन देखने में वह ५०-६० की ही लग रही होती है। वहां काम के मामले में कोई छोटा बड़ा नहीं होता।  कोई नौकर और मालिक नहीं होता।  रेस्टोरेंट का मैनेजर भी ज़रुरत पड़ने पर सर्विस देने लगता है। बंद करने के समय मैनेजर भी झाड़ू लगाता नज़र आएगा। 

४. कर्तव्यपरायणता :  स्विट्ज़रलैंड को आसानी से विश्व का सबसे खूबसूरत देश कहा जा सकता है क्योंकि वहां एक ही नज़र में मीलों तक फैले हरे भरे मैदान,  मैनिक्यूर्ड लॉन्स और लहलहाते हरियाली भरे खेत नज़र आते हैं।  लेकिन इसको हरा भरा बनाये रखने के लिए वे सरकार पर निर्भर नहीं रहते।  हर गांववाला अपने खेतों,  क्षेत्र और जायदाद को हरा भरा रखने के लिए खुद जिम्मेदार होता है।  सरकारी ज़मींन को भी गांववाले बारी बारी से घास काटने और मेन्टेन करने का काम करते हैं।

५. सफाई : कोई भी शहर तभी सुन्दर दिख सकता है जब वहां सफाई का विशेष ध्यान रखा जाये। वहां सभी शहरों की गलियां , सड़कें और अन्य सार्वजानिक स्थान एकदम स्पॉटलेसली क्लीन नज़र आते हैं। बार बार होती बारिश निश्चित ही इसमें सहायक सिद्ध होती है लेकिन उनका कचरा नियंत्रण बेहतरीन है।  साथ ही जनता में सफाई के प्रति बेहद जागरूकता है , कोई भी कुछ भी सड़क पर नहीं फेंकता , बल्कि जगह जगह बने कूड़ादान में ही डालते हैं।

६. सड़कें : वहां की सड़कें बहुत कम चौड़ी हैं और दो ही लेन की होती हैं।  लेकिन इसके बावजूद सडकों पर वाहन बहुत ही अनुशासित रूप से चलते हैं , लाल बत्ती पर रुकते हैं , लेन में चलते हैं , कभी हॉर्न नहीं बजाते और कभी ओवरटेक नहीं करते। सड़कें भी एकदम चिकनी , साफ और समतल जिस पर गाड़ी के चलने का पता भी नहीं चलता। 

७. पब्लिक टॉयलेट्स : टूरिस्ट्स को अक्सर कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वहां कहीं भी खुले में अपनी मर्ज़ी से लघु शंका का निवारण नहीं कर सकते। हालाँकि अधिकांश रेस्टोरेंट्स , मॉल्स , होटल्स में टॉयलेट्स उपलब्ध होते हैं लेकिन कई जगह ये पेड होते हैं। एक बार का खर्चा ५० से १०० रूपये तक हो सकता है। लेकिन सफाई की कुछ कीमत तो होती है ना।   

८. मौज मस्ती : अधिकांश दुकानें ६ बजे बंद हो जाती हैं।  यानि उसके बाद सभी मौज मस्ती करते हैं। रेस्टोरेंट्स के बाहर फुटपाथ पर टेबल चेयर लगी रहती हैं जिन पर अक्सर लोग बैठे बियर पी रहे होते हैं।  शुक्रवार को लॉन्ग वीकएंड शुरू हो जाता है और अक्सर शुक्रवार को पब्स के बाहर बीयर मेला सा लगा नज़र आता है।  ज़ाहिर है , सप्ताह भर की मेहनत के बाद यह एन्जॉय करने का समय होता है। 

९. टूरिज्म : पूरे यूरोप के देशों में हर देश में जितनी आबादी है , उसके तीन गुना टूरिस्ट हर समय मौजूद रहते हैं।  ज़ाहिर है , सिर्फ टूरिज्म से ही उनकी बेइंतहा कमाई होती रहती है।  यूरोप महंगा भी बहुत है , फिर भी भारत और चीन से सबसे ज्यादा टूरिस्ट्स वहां जाते हैं।  और एक यूरो के बदले ८२ रूपये खर्च करते हैं। 

१०. इतिहास : सभी यूरोपियन शहर ऐतिहासिक रूप से प्रभवशाली हैं।  हर एक शहर की अपनी शैली है , मकानों और इमारतों की शैली एक पूरा इतिहास दर्शाती है।  सैंकड़ों , हज़ारों साल पहले बने ये भवन आज भी मज़बूती के साथ खड़े हैं और देखने वालों की आँखें फ़ैल जाती हैं उनकी भव्यता देखकर। 

अब इन दस पॉइंट्स पर खुद को रखकर देखिये और जानिए कि क्यों हम अभी तक पिछड़े पड़े हैं और एक विकासशील देश बनकर रह गए हैं।  विकास , जो कभी पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा। बेशक हमारा इतिहास भी पूर्णतया गौरवशाली रहा है और हमारे संस्कार सर्वोत्तम माने जाते हैं।  लेकिन इस तेजी से बदलते समय में हम कब तक दम घुटते संस्कारों की दुहाई देते हुए पिछड़ेपन का शिकार बने रहेंगे !  जागो देशवासियो जागो।   


 

Monday, October 9, 2017

लेह दर्शन -- दूसरा दिन :

लेह पहुँचने पर पहला दिन आराम करते हुए ही बिताना चाहिए ताकि आप अपने शरीर को जलवायु अनुसार ढाल सकें। इससे आपको ऊँचाई के कारण होने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। दूसरे दिन नाश्ते के बाद आप निकल पड़ते हैं लेह के स्थानीय स्थलों के दर्शन के लिए।



लेह शहर लेह घाटी में बसा हुआ है। इसके चारों ओर हलके भूरे रंग के नंगे पहाड़ दिखाई देते हैं।




लेकिन घाटी और शहर में हरियाली है। शहर में होटलों की बहुतायत है और हर बजट के लोगों के लिए यहाँ आवास उपलब्ध है। 




लेह बाज़ार :  यहाँ जितनी साफ़ सफाई नज़र आई , इतनी किसी और हिल स्टेशन पर कभी नहीं दिखी। बीच में पक्का फर्श और बैठने के लिए बेंच बने हैं जिसके दोनों ओर दुकानों की कतारें हैं जिनमे लगभग हर तरह का सामान मिलता है।  हालाँकि सारा सामान श्रीनगर या दिल्ली आदि से ही आता है। इसलिए सामान्य से ज़रा ज्यादा दाम पर ही मिलेगा। यहीं पर एक गुरुद्वारा , मस्जिद , पोस्ट ऑफिस , बैंक और पर्यटन सूचना केंद्र भी हैं।   



पहले दिन के टूर के आरम्भ में सबसे पहले आप पहुंचते हैं , लेह श्रीनगर राजमार्ग पर बने सेना द्वारा नियंत्रित 'हॉल ऑफ़ फेम' जो वास्तव में इस क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों का स्मृति स्थल है।  यहाँ एक म्यूजियम है जहाँ सेना की चौकसी से सम्बंधित सभी उपकरण प्रदर्शित किये गए हैं और ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण दिया गया है।




बाहर खुले अहाते में शहीद स्मारक और शहीदों की याद में पत्थर भी लगाए गए हैं। आप स्वयं ही शहीदों की याद में नतमस्तक हो जाते हैं। यहाँ ८० रूपये का एंट्री टिकट है।



चारों और खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा यह स्थल बेहद मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।





लेह से २५ मील दूर इसी हाइवे पर बना है गुरुद्वारा पत्थर साहब।  कहते हैं यहाँ गुरु नानक जी ने तपस्या की थी लेकिन एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। एक बार उसने एक बहुत बड़ा पत्थर लुढ़का कर नानक जी को मारने का प्रयास किया लेकिन उनके प्रताप से पत्थर पिघल कर मोम जैसा नर्म हो गया। राक्षस ने जब पैर मारा तो उसका पैर पत्थर में धंस गया जो आज भी वहां मौजूद है।   




यहाँ से थोड़ा सा आगे जाने पर एक जगह आती है जिसे मेग्नेटिक हिल कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ सड़क पर एक सुनिश्चित जगह पर गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी करने पर वह अपने आप ऊपर की ओर चलने लगती है।  हालाँकि ऐसा लगा नहीं क्योंकि उस स्थान के दोनों ओर ढलान नज़र आ रही थी और गाड़ियां भी स्थिर ही थीं। 





आगे जाकर सैम वैली के रास्ते में आता है जंस्कार और इंडस ( इन्दु ) नदियों का संगम जो ऊँचाई से बहुत खूबसूरत दिखाई देता है। यहाँ राफ्टिंग भी कराई जाती है और चाय पानी का इंतज़ाम है। 





वापसी में लेह एयरपोर्ट के पास है स्पितुक मोनास्ट्री जिसकी ऊँचाई से चारों घाटी और पहाड़ों का अद्भुत दृश्य नज़र आता है।  यहीं पर काली माता का मंदिर भी है जिसमे लोग तेल की बोतल , जूस आदि चढ़ाते हैं।  हालाँकि यहाँ कोई पंडित या संरक्षक नज़र नहीं आया। तेल की बोतलों के भंडार देखकर बड़ा अजीब लगा लेकिन स्थानीय लोगों की मान्यताओं के आगे नतमस्तक होना ही पड़ता है।   सामने लेह एयरपोर्ट नज़र आ रहा है।




दोपहर तक वापस आकर होटल में खाना खाकर धूप में बैठने का भी अपना ही आनंद था।



शाम के समय सूर्यास्त से पहले ८ किलोमीटर की दूरी पर एक पहाड़ी पर बने स्पितुक गोम्पा अवश्य जाना चाहिए।  यहाँ से चारों ओर की पहाड़ियों पर पड़ती सूर्य की किरणें और उनसे बदलता रंग बेहद खूबसूरत लगता है।  साथ ही इंडस रिवर और घाटी की हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।

इसके अलावा लेह बाजार के छोर पर बस्ती की गलियों से होकर एक रास्ता जाता है लेह पैलेस के लिए जो एक ऊंची पहाड़ी पर बना ९ मंज़िला भवन है जिसे लकड़ी से बनाया गया है और दीवारों पर मिटटी का लेप है।  यहाँ से भी घाटी का दृश्य बहुत सुन्दर और मनभावन होता है। रात में स्वादिष्ट खाने के बाद आराम कर हम तैयार हो जाते हैं नुब्रा वैली के लिए प्रस्थान करने के लिए। 



Thursday, July 9, 2015

चैल -- एक प्राकृतिक स्थल जहाँ शहर और जंगल दोनों का लुत्फ़ एक साथ आता है ---


गर्मियों में छुट्टियां बिताने और कुछ दिन की सैर के लिए दिल्ली के आस पास शिमला सबसे पुराना और ऐतिहासिक हिल स्टेशन है।  लेकिन शिमला में बढ़ती आबादी , भवन निर्माण और गाड़ियों की भरमार से शिमला एक कंक्रीट जंगल बन कर रह गया है।  यदि आपको कुछ दिन शहर की भीड़ भाड़ और शोर शराबे से दूर प्रकृति के बीच शांत जगह पर छुट्टियां बिताने का विचार मन में आये तो शिमला के पास चैल ( चायल ) एक ऐसी जगह है जहाँ जाकर आपको वास्तव में मन की शांति और सकूँ मिलेगा।



 दिल्ली से चैल जाने के लिए राष्ट्रिय राजमार्ग १ से होकर करनाल , अम्बाला और पंचकुला होते हुए , कालका बाई पास से होकर शिमला के लिए सीधी सड़क है। रास्ते में कुरुक्षेत्र में मिला ये हाइवे रेस्ट्रां जहाँ हाथ मुँह धोकर और खा पीकर आप तरो ताज़ा होकर निकल पड़ते हैं आगे के सफर के लिए।    




अब कालका बाई पास बनने से सफ़र बहुत आसान हो गया है।  बाई पास से गुजरते हुए बिलकुल विदेश में होने जैसा अहसास होता है।  सोलन होते हुए कंडाघाट पहुंचकर दायीं ओर मुड़कर एक पतली लेकिन खाली सड़क पर ड्राईव करते हुए एक नदी को पार कर आप पहुँच जाते हैं चैल से करीब ३ किलोमीटर पहले बने होटल्स में जहाँ आपको शांत जगह पर हरी भरी वादियों के बीच एक या दो दिन रहने में बहुत आनंद आएगा।



सड़क किनारे बने होटल ग्रैंड सनसेट से सामने वादी का खूबसूरत नज़ारा आपका मन मोह लेगा।




वादी के बायीं ओर का क्षेत्र बहुत घने जंगल से बना है।  इस जंगल से होकर एक सड़क सोलन तक जाती है।  लेकिन इस सुनसान सड़क पर दिन में भी सफ़र करना एक साहसिक कार्य लगता है क्योंकि करीब २५ किलोमीटर तक आपको न कोई इंसान मिलेगा न कोई वाहन।



यहाँ करीब १० -११ होटल्स बने हैं जो काफी आरामदायक , भीड़ भाड़ से दूर और शांत जगह है।  चैल में पहाड़ों की कई अलग अलग चोटियां हैं जहाँ तक आप ड्राईव कर के जा सकते हैं।  एक चोटी पर बना है महाराजा पटियाला का महल जिसमे प्रवेश के अब प्रति व्यक्ति १०० रूपये देने पड़ेंगे।  महल को एक होटल में परिवर्तित किया गया है जहाँ आपको २५०० से ३५०० रूपये में एक कमरा मिल जायेगा।




भूतल पर आप महल में बैठने और फोटो खींचने का आनंद ले सकते हैं।  यहीं पर एक रेस्ट्रां है जहाँ ३०० रूपये में आप बुफे लंच का लुत्फ़ उठा सकते हैं।



पैलेस के बाहर एक बड़ा मैदान है जहाँ आप धूप का सेवन करते हुए आस पास की हरियाली को निहार सकते हैं।  इस मैदान के चारों ओर पैदल पथ बना है जहाँ सैर करते हुए प्रकृति के बेहद निकट महसूस किया जा सकता है।



पैलेस के ड्राईव वे से ही एक रास्ता जाता है एक छोटी सी पहाड़ी पर , जिसे लवर्स हिल कहते हैं।  इसके चारों ओर घूमने के लिए रास्ता बना है जिसे लवर्स लेन नाम दिया गया है।  इस रास्ते पर टहलते हुए आप चैल के चारों ओर की घनी हरियाली का मनमोहक नज़ारा देख सकते हैं।





चैल एक पुराना क़स्बा सा है।  इसकी दूसरी पहाड़ी की चोटी पर बना है विश्व का सबसे ऊँचाई पर स्थित क्रिकेट ग्राउंड।  यह क्षेत्र पूर्णतया सेना के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन आम जनता भी बुकिंग कराकर खेलों के लिए इस्तेमाल कर  सकती है ।  यहाँ सभी तरह के खेलों के टूर्नामेन्ट आयोजित किये जा सकते हैं।



ग्राउंड में एक पुराना ऐतिहासिक सूखा वृक्ष।



चैल कस्बे से करीब ३ किलोमीटर की दूरी पर एक और पहाड़ की चोटी पर बना है ये महाकाली मंदिर जहाँ तक गाड़ी से जाया जा सकता है, लेकिन आखिरी १ किलोमीटर की ड्राईव ज़रा मुश्किल लगेगी क्योंकि सड़क काफी टूटी फूटी है।  लेकिन मंदिर के अहाते में पार्किंग की अच्छी सुविधा है।




यहाँ से चारों ओर का ३६० डिग्री नज़ारा गज़ब का खूबसूरत है।  ऐसा महसूस होने लगता है जैसे आप अंतरिक्ष से पृथ्वी का दृश्य देख रहे हों।  यहाँ ठहरने के लिए कमरे भी बने हैं , हालाँकि खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है ।




शाम को होटल की टेरेस से सूर्यास्त का नज़ारा बेहद खूबसूरत था।  रात में चमकते तारों को देखते हुए यह महसूस होने लगा कि बड़े शहर में रहकर हम तो जैसे चाँद सितारों को देखना ही भूल गए हैं।
शहर के प्रदुषण , शोर शराबे और भीड़ भाड़ से दूर चैल एक शांत जगह है जहाँ आप प्रकृति के साथ मिलकर जीवन का निर्मल आनंद ले सकते हैं।
( अगली पोस्ट में शिमला रिविजिटेड .....)


Sunday, April 19, 2015

आपके महीनों के तनाव को कम करने के लिए एक उपयुक्त जगह है लैंसडौन ---

दिल्ली से महज़ २४० किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा लेकिन अत्यंत खूबसूरत हिल स्टेशन है , लैंसडौन । दिल्ली से मोदीनगर होकर और मेरठ बाई पास से होते हुए करीब दो घंटे में आप पहुँच जाते हैं खतौली।  जहाँ से दायीं ओर बिजनौर के लिए सड़क मुड़ जाती है।




यदि आप सुबह जल्दी निकले हैं तो नाश्ते के लिए खतौली में चीतल रेस्ट्रां बहुत लोकप्रिय रहा है।  पहले यह पुराने हाइवे पर पड़ता था जो नया बाई पास बनने से बेकार हो गया था।  इसलिए अब उसे बंद कर मालिकों ने बाई पास और पुरानी खतौली सड़क के जंक्शन पर बहुत ही स्ट्रेटेजिक लोकेशन पर नया रेस्ट्रां खोल लिया है।   इसकी लोकेशन बहुत उपयोगी है।  लेकिन इस बार यहाँ खाना खाने में कोई आनंद नहीं आया। परांठे और चाय दोनों बेकार लगे।  यदि जल्दी ही प्रबंधन ने इस और ध्यान नहीं दिया तो उनको आर्थिक हानि होने से कोई नहीं बचा पायेगा।



खतौली से मीरानपुर की सड़क गांवों और खेतों के बीच से होती हुई मीरानपुर में नेशनल हाइवे ११९ से जा मिलती है।  यह ड्राईव काफी सुहानी और आरामदायक रही। आगे बिजनौर बाई पास से होकर बिजनौर नज़ीबाबाद सड़क भी बहुत अच्छी है।  नज़ीबाबाद से होकर आप पहुँच जायेंगे कोटद्वार जहाँ से एक नदी के साथ साथ आप पहाड़ी सफर शुरू करते हैं।  सीधे होने से यह सड़क भी बहुत बढ़िया रही।  रास्ते में नदी किनारे एक खोखे वाले की चाय वास्तव में बड़ी स्वादिष्ट थी।




कोटद्वार से आगे एक जगह आती है दुगड्डा।  यहाँ से कई रास्ते अलग अलग दिशा में जाते हैं , जिनमे से एक लैंसडौन की ओर जाता है।  थोड़ा आगे जाने पर पाइन ( चीड़ ) के पेड़ों के बीच से जाती सड़क बहुत मनमोहक लगती है।



दिल्ली से २३५ किलोमीटर की दूरी पर लैंसडौन की सीखा आरम्भ होते ही, टॉल टैक्स जमा करते ही आ गया ब्लू पाइन रिजॉर्ट जहाँ हमारा ठहरने का इंतज़ाम था।  पहाड़ी की स्लोप पर बना यह रिजॉर्ट काफी आरामदायक लगा।  लेकिन यहाँ ठहरने के लिए आपको फिजिकली फिट होना पड़ेगा क्योंकि यह सारा रिजॉर्ट ढलान पर बना है जिससे कमरों तक जाने के लिए अनेकों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।  लेकिन सामने वैल्ली व्यू दिल को खुश कर देता है।




रिजॉर्ट के पीछे की पहाड़ी पर चढ़कर आपको नज़र आता है दूर बर्फ से ढके पहाड़ों का दृश्य।  हालाँकि मौसम साफ न होने से बर्फ से ढके पहाड़ तो दिखाई नहीं दिए , लेकिन वहां की हरियाली देखकर मन गदगद हो गया।




पहाड़ों में जाएँ और ट्रेकिंग न करें , यह हमसे हो ही नहीं सकता।  रिजॉर्ट से लैंसडौन सड़क द्वारा करीब ३ - ४ किलोमीटर दूर पड़ता है।  लेकिन रिजॉर्ट के पीछे एक ट्रेकिंग रुट बना है जो घने जंगल से होता हुआ सीधे सड़क से जा मिलता है जहाँ से शहर बस १ किलोमीटर ही रह जाता है।  यह रास्ता मुश्किल से आधा किलोमीटर लम्बा है, लेकिन पहली बार जाने वाले को सुनसान और डरावना लगता है।  रिसेप्शन पर किसी ने बताया कि अँधेरे में वापस मत आना , जंगली जानवर हो सकते हैं।  हमें नहीं लगा कि वहां जानवर होंगे लेकिन निश्चित ही अँधेरे में ट्रेकिंग करना कोई बुद्धिमानी भी नहीं होती।  इसलिए  वापसी में  हम सड़क द्वारा ही ४ किलोमीटर पैदल चलकर रिजॉर्ट पहुंचे , हालाँकि अँधेरे भी हो गया था।


 
अगला दिन घूमने का था।  यहाँ घूमने के लिए दो ही विशेष स्थान हैं।  एक यह झील जो शहर के लगभग बीचों बीच ही बनी है।  चारों और पाइन के पेड़ों के बीच यह झील ३० फुट गहरी है जहाँ बोटिंग करने के लिए आपको लाइफ जैकेट पहननी पड़ेगी।




इस शांत झील की तरह ही लैंसडौन भी एक बहुत शांत जगह है जहाँ गढ़वाल रायफल्स का हेड क्वार्टर है। आर्मी के अलावा यहाँ न तो कोई विशेष स्थानीय निवासी हैं , न मार्किट या अन्य सुविधाएँ।  शहर में भी गिने चुने ही होटल्स हैं और बाकि हिल स्टेशंस की तरह कोई विशेष गतिविधि नज़र नहीं आई। लेकिन आर्मी शॉप्स पर कुछ बहुत सुन्दर और सस्ते  गिफ्ट ज़रूर मिल जायेंगे।



यहाँ दूसरा स्पॉट है टिप एंड टॉप जहाँ से आपको चारों ओर का शानदार दृश्य नज़र आएगा। यहाँ एक के बाद एक कई व्यूइंग गैलरीज बनी हैं जहाँ फोटो खींचने और खिंचवाने का अपना ही मज़ा है।




घने जंगल के बीच फूलों से लदे कई पेड़ तो मन को मोह ही लेते हैं।  मौसम साफ हो तो दूर बर्फ से ढकी चोटियां भी नज़र आएँगी।



यहीं पर गढ़वाल मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस भी बना है जिसमे अनेक बैम्बू कॉटेज बनी हैं।  लेकिन ठहरने के लिए यह जगह एक दम बकवास लगी।  न यहाँ खाने का उचित प्रबंध है न हीं स्टाफ मित्रतापूर्ण लगा। कमरों का किराया भी बिना बात बहुत ज्यादा है।  कुल मिलाकर यहाँ ठहरने के लिए किसी दुश्मन को ही सलाह दी जा सकती है।



ब्लू पाइन रिजॉर्ट से भी पहाड़ों का दृश्य कोई कम रमणीक नहीं हैं।


वापसी में भले ही ग्रैंड चीतल पर खाना न खाया हो , लेकिन वाशरूम जाने के लिए यह जगह सर्वोत्तम है।
दिल्ली से वीकएंड पर बाहर जाने के लिए लैंसडौन एक बहुत ही अच्छी जगह लगी।  साफ़ रास्ता , साफ सुथरी प्रदुषण रहित जगह और शांत वातावरण आपके महीनों के तनाव को कम करने के लिए एक उपयुक्त जगह है लैंसडौन ।



Wednesday, June 25, 2014

मसूरी की सैर पर एक कवितामयी चित्रकथा ----


दिल्ली की गर्मी की मज़बूरी ,
ऐसे मे याद आ गई मसूरी ! 
मोदी प्रभाव कहें या यू पी सरकार की समझदारी ,
दो घंटे मे तय हो गई मुज़फ़्फरनगर तक की दूरी !



आठ बजे थे नाश्ते का क्या वक्त था, 
ढाबे पर खाना भी कहाँ उपयुक्त था ! 
खटिया पर बैठ चाय पीना भला लगा , 
शायद ढाबे वाला भी मोदी भक्त था ! 






मसूरी मे सुबह का मौसम सुहाना था,
अपने हाथों मे वक्त का ख़ज़ाना था ! 
सुबह की सैर पर हमे हुआ ये अहसास, 
धुंध से आए हैं इक धुंध मे जाना था ! 




यूं पहाड़ों की जिंदगी ज़रा सुस्त होती है , 
लेकिन पहाड़ियों की चाल चुस्त होती है ! 
हम दो किलोमीटर पैदल चले तो जाना,
कि खोखे की चाय भी बड़ी मस्त होती है ! 



दिन मे मस्ती का चाव छा गया , 
दिल मे साहस का भाव आ गया ! 
डरते डरते पहली बार हमने भी , 
कमर कसी और हवा मे समा गया ! 





शाम को जब सांझ होने को आई , 
आसमान मे थी काली बदली छाई ! 
रंग बिरंगे रंगों ने फिर आसमां मे , 
आधुनिक कला की कलाकृति बनाई ! 





सूरज ने जब पर्वतों पर अंतिम किरणें डाली , 
फैल गई किसी पहाडिन के गालों सी लाली !
दूर किसी चोटी पर बज उठी एक बांसुरिया ,   
और चहकने लगी चिड़ियाँ भी डाली डाली ! 





मॉल की दुकान पर सजी थी मिठाईयां , 
रंगों की छटा लिये ज्यों पंजाबी लुगाईयां ! 
छोटे मोटे पतले लम्बे खाते पीते हंसते , 
मस्ती करते पकड़े बच्चों की कलाईयाँ ! 





हमारा नव विवाहित जोड़ी सा गर्म खून था , 
हम पर भी फोटो खिंचवाने का ज़ुनून था ! 
ना कजरा ना गजरा ना पायल ना सिन्दूर ,
भई आखिर ये हमारा पचासवां हनीमून था ! 




इन वादियों ने देखे होंगे जाने कितने सावन , 
इस मौसम मे गुजरे होंगे जाने कितने यौवन ! 
कहीं वक्त की मार ठूंठ न कर दे इस वादी को, 
आओ हम मिलकर रखें पर्यावरण को  पावन !