Tuesday, November 27, 2018

जब मृत्यु के द्वार से वापस लौट आते हैं तो कैसा महसूस होता है --


एक समाचार से पता चला है कि न्यूयॉर्क के स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में किये गए शोध कार्य से पता चला है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद व्यक्ति विशेष को कुछ समय तक अपनी मृत्यु के बारे में अहसास रहता है कि वह मर गया है। इसका कारण यह है कि हृदयगति रुकने पर डॉक्टर तो रोगी को मृत घोषित कर देते हैं लेकिन रक्त संचार बंद होने के बाद भी मनुष्य का मस्तिष्क कुछ समय के लिए कार्यशील रहता है।  इससे डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित करने के बाद भी मनुष्य कुछ समय तक देख, सुन और समझ सकता है। यानि उसे मृत्यु के कुछ समय बाद भी जब तक डॉक्टर्स उसे पुनर्जीवित करने में प्रयासरत रहते हैं , रोगी को अपने आस पास घटित होने वाली घटनाओं का पता चलता रहता है। यहाँ तक कि पुनर्जीवन की प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर्स और नर्सें क्या बातें करते हैं , यह भी उसे सुनाई और दिखाई देता है और समझ में आता है। ये बातें उन लोगों से पता चली हैं जो हृदयगति बंद होने के बाद डॉक्टरों के प्रयास से पुनर्जीवित हुए थे।

लेकिन इस शोध में बताई गई कुछ बातें सही नहीं लगती। केवल हृदयगति बंद होने पर डॉक्टर्स किसी भी रोगी को मृत घोषित नहीं करते।  मृत घोषित तभी किया जाता है जब मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है जिसे डॉक्टर्स कुछ टैस्ट्स द्वारा तय करते हैं। हृदयगति बंद होने पर सी पी आर द्वारा रोगी का हृदय दोबारा चालू करने का प्रयास किया जाता है जो अक्सर सफल रहता है और रोगी ठीक हो जाता है। इस बीच निश्चित ही रोगी को सब अहसास रह सकता है। लेकिन हृदय के साथ जब मस्तिष्क भी काम करना बंद कर देता है , तब मृत्यु घोषित की जाती है जो कम से कम १० मिनट या उससे भी ज्यादा तक पुनर्जीवन प्रक्रिया के प्रयास के बाद किया जाता है।  ऐसे में निश्चित ही रोगी के अहसासों के बारे में किसी को पता नहीं चल सकता। 

यहाँ यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि पुनर्जीवन प्रक्रिया के दौरान क्योंकि रोगी को सब अहसास होता रहता है , इसलिए यह  आवश्यक है कि इस दौरान डॉक्टर्स या नर्सें अपना सारा ध्यान रोगी को पुनर्जीवित करने में ही लगाएं और कोई भी ऐसी बात मुँह से न निकालें जो तर्कसंगत न हो या रोगी की दृष्टि से अशोभनीय हो। साथ ही डॉक्टर्स द्वारा पुनर्जीवित करने का भरपूर प्रयास किया जाना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक मस्तिष्क काम करता है , तब तक पुनर्जीवन निश्चित ही संभव है।  लेकिन ब्रेन डेड होने के बाद हृदयगति का आना न सिर्फ निष्फल और निरुपयोगी है, बल्कि रोगी और उसके घरवालों के लिए भी एक असहनीय और लंबित पीड़ा साबित होती है।         
लेकिन मृत्यु शैया पर निश्चेतन या अर्धचेतन अवस्था में लेटे हुए व्यक्ति को वास्तविक रूप से मृत्यु होने तक और
मृत्यु के बाद क्या क्या अनुभव और अहसास होते हैं, यह एक रहस्य ही बना रहेगा।


Saturday, November 24, 2018

२१ वीं सदी में भी पाषाण युग की तरह आदिमानव बनकर रहना कितना उचित है ! एक सवाल, एक विचार --


अंडमान द्वीप समूह में रहने वाले सेंटीनेलिज आदिवासियों के बारे में मिले समाचार से पता चलता है कि देश के एक हिसे में २१ वीं सदी में भी कुछ जनजाति ऐसी हैं जो आधुनिक सभ्यता से पूर्णतया अनभिज्ञ है।  सरकार भी इन्हे इनके मूल स्वरुप में बचाये रखने के लिए भरसक प्रयास कर रही है।  इसीलिए इन द्वीप समूहों मे आधुनिक मानवों का प्रवेश और मिलना जुलना वर्जित है।  इसके पीछे यह सोच है कि ये मनुष्य आधुनिक सभ्यता से दूर होने के कारण आधुनिक जीवन शैली से दुष्प्रभावित हो सकते हैं जिससे ये विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं और इनकी प्रजाति लुप्त हो सकती है। इनमे रोगों से लड़ने की क्षमता न के बराबर होती है।  इनका खान पान आदिमानव की तरह है जो कंदमूल, मछली और वन्य जीवों का शिकार कर अपना पेट भरते हैं। इन्हे भी बहरी मानवों से मिलना जुलना बिलकुल पसंद नहीं, इसलिए यदि कोई इनके क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करता है तो वे अपने तीरों से भेद कर उसे मार डालते हैं जैसा कि एक अमेरिकी क्रिश्चियन मिसिनेरी युवक के साथ हुआ।

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इन्हे आधुनिक सभ्यता से दूर रखा ही क्यों जाये ! भले ही ये स्वयं अपना क्षेत्र, जीवन शैली और खान पान न छोड़ना चाहते हों, लेकिन विकसित होने का अधिकार इनको भी होना चाहिए। यह तो सरकार को देखना चाहिए कि ये लोग मुख्य धारा में सम्मलित होकर आधुनिकता का लाभ उठा सकें।
देश के बाकि हिस्सों में भी तो हम पिछड़ी जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करते हुए उन्हें विकास का लाभ उपलब्ध कराते ही हैं। फिर इन्हे इनके मूल रूप में सभ्यता के पिछड़े स्वरुप में रहकर जीवन यापन करा कर हम क्या हासिल कर रहे हैं, यह समझ से परे है।  पुराने स्मारक हमारी ऐतिहासिक धरोहर हो सकते हैं, लेकिन जीते जागते पिछड़े वर्ग के लोगों को पिछड़े ही रखना क्या उनके प्रति अन्याय नहीं है ! ज़रा सोचना अवश्य चाहिए।