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Monday, June 15, 2026

ग़ज़ल के कद्रदान अभी बाकी हैं...

 बड़े से मॉल की आंखों में चुभ रही है जो,

गली के मोड़ पे इक छोटी दुकान अभी बाकी है।


हर शख़्स इस शहर में नज़र आता है ग़मगीन,

शुक्र है कुछ चेहरों पर मुस्कान अभी बाकी है।


पोथी पढ़ पढ़ कर इल्म तो बहुत कर लिया हासिल,

पर असल जिंदगी का इम्तिहान अभी बाकी है।


जिसे भी देखो वही दिखाई देता है यहां नेता,

तसल्ली है कुछ लोगों में ईमान अभी बाकी है।


रिश्वतखोरी के दलदल में भी रहते पाक साफ,

वो खुद्दार जिनमें आत्मसम्मान अभी बाकी है।


हैरान ना हो देखकर मुर्दों की मुर्दानगी,

शहर के कुछ मर्दों में जान अभी बाकी है।


वक्त ने कुछ तो भर दिए जो दिए थे जालिमों ने,

उन बेदर्द जख्मों के कुछ निशान अभी बाकी हैं।


रुकसत हुआ वो शख्स जो महीनों से पड़ा था बीमार,

फुटपाथ पर उसका बस कुछ सामान अभी बाकी है।


मत सोचो गुजर गया जल जमी से वो जलजला,

हार्मोज के सागर में उफनता तूफान अभी बाकी है।


बिसराने वाले तो बहुत मिल जाएंगे डॉ दराल,

तू लिखता चल तेरी लेखनी के कद्रदान अभी बाकी हैं। 

Monday, September 9, 2024

एक ग़ज़ल...

 पसीने की गंध जिनके गात नहीं आती,

नींद उनको सारी सारी रात नहीं आती। 


वो काम करते नहीं जब तलक,

काम के बदले सौगात नहीं आती। 


सड़कें टूटी, नालियां बंद, तो क्या,

इस शहर में कभी बरसात नहीं आती। 


बेटियां घर दफ्तर में महफूज हों,

देश में ऐसी कोई रात नहीं आती। 


जज़्बा बहुत है लड़ने का किंतु,

शैतान को देनी मात नही आती। 


क्या बतलाएं तुमको हम जात अपनी,

सिवा इंसानियत कोई जात नहीं आती। 


नेता हम भी बन जाते ' तारीफ', पर,

सच को छोड़ कोई बात नहीं आती। 

Wednesday, June 30, 2021

घर आना कभी --

मिलते हैं
वो जब कभी,
कहते हैं,
घर आना कभी।
कहते हैं
हम भी वही,
तुम भी
घर आना कभी।
ना वो आते कभी,
ना हम जाते कभी,
वो "कभी"
नही आता कभी।
यही है हाल
ज़माने का अभी।

Wednesday, January 17, 2018

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

धन दौलत जोड़ते रहे जिंदगी भर जोड़कर पाई पाई  ,
बच्चों की जिंदगी बनाने में अपनी सारी जिंदगी बिताई।
एक पल भी ना जी पाए जिंदगी भर कभी खुद के लिए ,
अंत समय बच्चों ने ही उस धन संपत्ति पर नज़र गड़ाई।

डायबिटीज के मरीज़ हैं , मीठा कभी खा नहीं सकते,
ब्लड प्रैशर भी रहता है , नमक का परहेज हैं रखते।
शरीर का वज़न है भारी , बीवी घी भी खाने नहीं देती,
जो धन दौलत कमाई थी, वो भी साथ ले जा नहीं सकते।

दुनिया की रीति है कि बच्चों से ही घर बसता है ,
तिनका तिनका जोड़कर इक मकान बनता है।
कभी एक कमरे में रहता था छै लोगों का परिवार ,
अब बच्चों बिना छै कमरों का घर वीरान लगता है। 

Tuesday, December 6, 2016

फोन पर नक्कालों से सावधान ---

यूँ ही बैठे ठाले , एक फोन के बाद :

मोबाईल पर जानी पहचानी रिंग टोन के बाद -- हैलो !
"हेल्लो , टी एस द -- र --ल जी बोल रहे हैं ? "
-- जी।
"जी मैं स्टेट बैंक से बोल रहा हूँ।"
यह सुनते ही कान खड़े हो गए , मन में बिजली सी कौंधी और हम चौकन्ने हो गये।  फिर शरारत सूझी तो हमने कहा -- हाँ भैया , का होयो ।
"जी स्टेट बैंक में आपका अकाउंट है ?"
--- जे तै पतौ ना भैया। पण गोरमेंट पिल्सण तौ भेजै है खात्ते में।
"आप डेबिट कार्ड इस्तेमाल करते हैं ? "
--- यो घिट पिट का होवै है भैया ? मोहे तौ पतौ ना।
"जी डेबिट कार्ड , जिससे ऐ टी एम मशीन से पैसे निकलते हैं।"
--- अच्छा अच्छा वो पिलास्टिक की पतरी। हाँ वो तौ लौंडा ले जा है अर मसीन में डालतै ई नोट बऱसण लग ज्यां। पण ईब तौ चलै ई ना।
"देखिये , आपका कार्ड ब्लॉक हो गया है।  आप जल्दी से उसे बदलवा लीजिये वरना बहुत पेनल्टी लग जाएगी। आप अपना कार्ड नंबर और पासवर्ड हमें बताइये , हम उसे अभी चालू कर देंगे।"
--- भैया ईब इस बुढ़ापा में तै अपणी बुढ़िया का नाम भी याद ना रहै , फिर कारड का लम्बर कैसे याद रह सकै। तू ठहर , मैं लौंडा कु बुला कै मंगवाऊँ हूँ। पण तू न्यू बता के तू कौण है अर कहाँ सू बोल रह्या है।  
"जी मैं स्टेट बैंक से बोल रहा हूँ।"
--- भैया रे , देस में तौ २९ इस्टेट हैंगे। तेरा कौण सौ इस्टेट बैंक है , न्यू बता ।
"जी , स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया।"
--- रै तू मनै बावला मति बणावै । इंडिया भारत नै ही तो कहैं हैं ना। आच्छा , ईब न्यू बता , तेरो नाम का है अर बैंक का पता का है ।
"जी मेरा नाम ----"
-- अरै रुक ज्या ससुर के नाती , न्यू याद न रहैगो , कागच पै लिखणा पड़ैगो।  अरै पप्पू , भैया मेरी कलम दवात तै दीज्यो।
पप्पू -- दद्दू , कलम तो ये रही लेकिन दवात में स्याही नहीं है।  वो मां ने नील समझ कर कपड़ों में डाल दी धोते समय।
--- अरै नासपिट्टे , तम उज्जड के उज्जड ही रहियो।  चल वो नई ल्या जै कल ल्यायो हौ।
"दद्दू , उसे तो पापा बैंक ले गये। लोगों की उंगली पर लगाने के लिए। "
--- सत्यानास हो थारा ,  कदी तौ दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो। ईब मैं काय से लिखूं , दिखै ना है बैंक सौ साब का फोन आयो है। अच्छा भैया , तम ऐसौ करो , तम नाम पतौ बोलो , हम फोन में ही रिकॉर्ड कर लेंग्गे। इरै कहौं है इसकौ रिकॉर्ड बटन।
उधर से तुरंत फोन कट।

नोट : जनहित में जारी।  

Wednesday, December 2, 2015

हम नहीं सुधरेंगे ---


सर पर हेलमेट नहीं पर मोबाईल पर स्क्रीन गार्ड लग जाये ,
सर भले ही फट जाये पर मोबाईल पर खरोंच कभी ना आये।

बना लो जितने स्पीड ब्रेकर , हम ब्रेकर को ही ब्रेक कर जायेंगे ,
ब्रेक में से गाड़ी निकाल लेंगे पर गाड़ी में ब्रेक नहीं लगाएंगे ।

सडकों पर ज़ेबरा क्रॉसिंग बनाना सरकार मज़बूरी तुम्हारी है ,
हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं , सारी सड़क ही हमारी है।

जितने मर्ज़ी ओवरब्रिज बना लो , लगा दो रेलिंग छै फुट ऊंची ,
रेलिंग कूद कर फांद जायेंगे , या बिल बना लेंगे खोदकर मिटटी।











Thursday, September 18, 2014

किसी होटल मे जाएं , बिना खाये ही आयें , इच्छाशक्ति मज़बूत बनाएं ---


तन का मन से सीधा सम्बंध होता है ! यदि इच्छाशक्ति मज़बूत हो तो मनुष्य अपनी सामर्थ्य से ज्यादा बड़े से बड़ा काम भी कर सकता है ! संसार मे सबसे मुश्किल काम होता है किसी आदत को छोड़ना ! इंसान के जीवन मे कई लत ऐसी हैं जो अनचाहे ही गले पड़ जाती हैं ! फिर इनसे छुटकारा पाने की समस्या आ खड़ी होती है ! अक्सर हम इन्हे छोड़ने मे सफल भी होते हैं लेकिन यदि इच्छाशक्ति कम हुई तो दोबारा लत पड़ने की संभावना बनी रहती है ! धूम्रपान , शराब , जुआ , चोरी करना , यौन क्रिया , शॉपिंग यहाँ तक कि खाना भी एक लत बन सकती है जो ना हमारे शरीर को प्रभावित करती है बल्कि हमे मानसिक , आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी क्षीण बना देती है ! इनसे छुटकारा पाने का एक ही तरीका है , और वह है इच्छाशक्ति का द्रढ होना ! बुरी आदतों से निज़ात पाने के लिये चिकित्सीय उपचार भी उपलब्ध हैं , लेकिन इसका प्रभाव भी तभी पड़ता है जब मनुष्य स्वयम् मानसिक रूप से इसके लिएे तैयार हो और द्रढ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करे ! 

इच्छाशक्ति तभी द्रढ मानी जाती है जब : 

* आप धूम्रपान छोड़ चुके हों और सिगरेट देखकर मन ना ललचाये ! 
* आप शराब छोड़ चुके हों , शराब की बोतल सामने रखी हो और हाथ तक ना लगाएं ! 
* आप मॉल घूमने जाएं और बिना शॉपिंग किये ही वापस आ जाएं ! 
* आप बुफ्फे डिनर पर जाएं और सीमित मात्रा मे ही खाना खाएं ! 

कॉलेज के दिनों मे अक्सर हम कई मित्र ज़ेब मे दस रुपये डालकर मार्केट घूमने जाते ! खूब घूम फिर कर और खाने की दुकानों के भी दो चक्कर लगाकर बिना कुछ खाये ही वापस आ जाते ! क्या करते , इतना ही जेबखर्च मिलता था ! लेकिन यह कह कर दिल समझा लेते कि ऐसा करने से इच्छाशक्ति मज़बूत होती है ! ऐसा करते करते इच्छाशक्ति इतनी मज़बूत हो गई कि अब एक पैसा भी खर्च करने का दिल नहीं करता ! कभी कभी तो श्रीमती जी से भी यही सुनना पड़ता है कि हे भगवान कैसे कंजूस से पाला पड़ा है ! अब तो ये आलम है कि यदि कहीं दस बीस रुपये खर्च करने पड़ जाएं तो अपनी तो जान सी निकल जाती है ! ऐसा लगता है जैसे बहुत बड़ा नुकसान हो गया हो ! इसलिये हमने तो खरीदारी का सारा काम श्रीमती जी पर ही छोड़ दिया है ! जब तक अपने हाथ से पैसे नहीं जाते तब तक हमे कोई दुख नहीं होता ! इस तरह, हम भी खुश और श्रीमती जी भी खुश !  

मेरी पत्नी इतनी हाईटेक हो गई है ,
मॉडर्न टेक्नोलॉजी मे इस कद्र खो गई है ! 
कि सारी शॉपिंग क्रेडिट कार्ड से करती है , 
सारे बिल भी अपने कार्ड से ही भरती है ! 
फिर जब उसका बिल आता है हज़ारों का ,
तो उसकी पेमेन्ट मेरे कार्ड से करती है ! 
फिर भी कहती हैं कि सजना , क्यों मायूस हो गए हैं , 
एक पैसा खर्च नहीं करते , आप बड़े कंजूस हो गए हैं ! 

Thursday, June 5, 2014

विकास की आंधी ने संस्कारों को चूर चूर कर दिया है ---


रोज शाम होते ही बीवी गुहार लगाती है, 
पार्क की सैर करने के गुण समझाती है !
हार कर एक दिन हमने भी गाड़ी उठाई ,
और पत्नी को संग बिठा, पार्क की ओर दौड़ाई !   
गेट से घुसते ही , फुटपाथ पर कदम रखते ही 
सोचा कि चलो अब काम पर लगा जाये , 
पेट और वेट घटाने को ज़रा तेज चला जाये ! 
तभी गांव याद कर मन मे विचार आया,  
कि यह भी कैसा मुकाम है !
वहां काम पर जाते थे पैदल चलकर,
यहाँ पैदल चलना भी एक काम है !
पार्क मे पैदल चलकर हम केलरिज जलाते हैं, 
लेकिन पैदल चलने के लिये बैठकर कार मे जाते हैं !

लेकिन पार्क का नज़ारा भी अज़ब होता है, 
टहलने वालों मे जिसे देखो वही बेढब होता है ! 
फिट बंदे तो नज़र ही कहाँ आते हैं,
क्योंकि फिट होते हैं आदमी खास,
और खास आदमी फिटनेस पाने, 
पार्क मे नहीं , ए सी जिम मे जाते हैं ! 
और आम आदमी के पास नहीं होता वक्त,  
वो बेचारे तो शाम के वक्त ठेला लगाते हैं !

पार्क मे आने वाले तो होते हैं मिडल क्लास,
और मिडल क्लास ना आम होते हैं ना खास 
उनके पास नहीं जिम के लायक पैसा होता है,
पर पास करने के लिये वक्त ज्यादा होता है ! 
उम्र निकल जाती है जिंदगी को ढोते ढोते,
पहले पालते हैं बच्चे और फिर पोती पोते !  
सेहत की ओर ध्यान ही कहाँ जा पाता है,
घर का भार उठाते उठाते शरीर का भार बढ़ जाता है ! 
फिर घेर लेते है बी पी, शुगर और आरथ्राईटिस,  
और सेहत की हो जाती है टांय टांय फिस ! 
रिटायर होते होते ज़वाब दे जाते हैं घुटने,
इसलिये वॉक के नाम पर पार्क जाते हैं बस टहलने ! 

एक पेड़ के नीचे दस बूढ़े बैठे बतिया रहे थे,
सुनने वाला कोई नहीं था पर सब बोले जा रहे थे ! 
भई उम्र भर तो सुनते रहे बीवी और बॉस की बातें,
दिन मे चुप्पी और नींद मे बड़बड़ाकर कटती रही रातें ! 
अब सेवानिवृत होने पर मिला था बॉस से छुटकारा,
बरसों से दिल मे दबा गुब्बार निकल रहा था सारा !

वैसे भी बुजुर्गों को मिले ना मिले रोटी का निवाला ,
पर मिलना चाहिये कोई तो उनकी बातें सुनने वाला ! 
लेकिन बहू बेटा व्यस्त रहते हैं पैसा कमाने की दौड़ मे , 
और बच्चे कम्प्यूटर पर सोशल साइट्स के गठजोड़ मे !
विकास की आंधी ने संस्कारों को चूर चूर कर दिया है , 
एक ही घर मे रहकर भी परिवारों को दूर कर दिया है ! 

फिर एक साल बाद :
उसी पेड़ तले वही बुजुर्ग बैठे बतिया रहे थे,
लेकिन आज संख्या में आधे नज़र आ रहे थे।
अब वो बातें भी कर रहे थे फुसफुसा कर,
चहरे पर झलक रहा था एक अंजाना सा डर।
शायद चिंतन मनन हो रहा था इसका,
कि अब अगला नंबर लगेगा किसका।
पार्क में छोटे बच्चों की नई खेप दे रही थी दिखाई,
शायद यह आवागमन ही जिंदगी की रीति है भाई।



Saturday, February 8, 2014

शहर की शादियों में संवेदनहीनता ---


अभी तक हमें यही अहसास परेशान कर रहा था कि आजकल लोग शादी का कार्ड तो कुरियर से भेज देते हैं लेकिन स्वयं व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित नहीं करते।  ऐसे में मेहमान के लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है यह निर्णय लेने में कि जाया जाये या नहीं। लेकिन हाल ही में एक ऐसा  अनुभव हुआ जिसे देख कर शादियों के बारे में गम्भीरता से सोचने पर मज़बूर होना पड़ा।

हुआ यूँ कि एक मित्र सपत्नीक निमंत्रण देने आए और जोर देकर शामिल होने का आग्रह किया।  साथ में एक डिब्बा तथाकथित मिठाई भी दे गए। पुराने मित्र थे , इसलिए न जाने का कोई कारण ही नहीं था। हालाँकि घर से दूर था लेकिन समय बहुत उपयुक्त लगा।  पूरा  विवरण कुछ इस प्रकार रहा :

कार्ड पर लिखा था :

बारात असेम्बली -- शाम ६ बजे
विवाहस्थल के लिए प्रस्थान --- ७ बजे
दूरी --- २०० मीटर

घर से दूरी ---- २५ -३० किलोमीटर शहर के बीच
समय लगा --- २ घंटे
असेम्बली पॉइंट --- पौने दस बजे -- कोई नहीं मिला
विवाहस्थल पर --- रात दस बजे -- न दूल्हा , न घरवाले
साढ़े दस बजे -- दूल्हा गेट पर
रात ग्यारह बजे -- दूल्हा प्रवेश

रात ग्यारह बजे दूल्हे के प्रवेश के साथ खाना खोल दिया गया।  इस बीच मेट्रो से आने वाले बाराती प्रस्थान कर चुके थे , चाट पकोड़ी खाकर।  ज़ाहिर है , लिफाफा भी उनकी ज़ेब में ही रह गया।  अब हो सकता है कि अगले दिन घर जाकर देना पड़े।  हमने भी कुछ छुट पुट खाकर ठंडा पीया और इंतज़ार करते रहे कि कोई घरवाला दिखे तो लिफाफा सौंपें और घर का रास्ता नापें जिसमे फिर एक घंटा लगना निश्चित था और अगले दिन फिर ऑफिस जाना भी आवश्यक था।  आखिर मित्र के बेटे की शादी की ख़ुशी में सरकारी अवकाश होने की सम्भावना तो निश्चित ही नहीं थी।

बारात तो सारी की सारी पहले ही अंदर थी।  दुल्हे के साथ थी तो बस एक घोड़ी , दो चार रिश्तेदार और बाकि बैंड वाले।  लेकिन इन्ही चार रिश्तेदारों ने सड़क पर चक्का जाम कर सब का खाना ख़राब कर रखा था।  सर्दी में भी पसीना बहाते हुए ये जाँबाज़ गेट के बाहर ही आधे घंटे तक ऐसे डटे रहे जैसे लोंगोवाल की लड़ाई में हमारे रण बांकुरे अपनी जान की परवाह किये बगैर जमे रहे थे। हमने भी मित्र को उस भीड़ में ढूंढ निकाला और बड़ी आत्मीयता से बधाई देने लगे।  लेकिन मित्र न जाने किस पिनक में थे कि लगा जैसे पहचाना ही न हो।  वैसे भी हमें तो नाचने का शौक कभी नहीं रहा , इसलिए वहां से हटकर मिष्ठान खाने के लिए आगे बढ़ लिए।

लेकिन इस रिहाई से पहले एक अत्यंत आवश्यक काम भी करना था , लिफाफा सौंपने का।  अक्सर यह काम हमें सबसे कठिन काम लगता है।  एक तो वैसे ही लिफाफा देते हुए अज़ीब सा लगता है।  ऊपर से लेते हुए मेज़बान के  नखरे देखकर तो ऐसा महसूस होता है जैसे हम कोई गुनाह कर रहे हों। लेकिन इस महत्त्वपूर्ण कार्य करने के बाद ऐसा रिलीफ मिलता है जैसे सर से कोई बोझ उतर गया हो।  फिर भी हमने देखा है कि अक्सर लिफाफा देने वालों की भीड़ सी लग जाती है और पहले मैं पहले मैं की  नौबत सी आ जाती है।

आखिर उस दिन भी सफलतापूर्वक लिफाफा विसर्जन के बाद जब हमने प्रस्थान करने की सोची तो पत्नी श्री की फरमाइश आई कि अरे हमने दूल्हा दुल्हन को तो देखा ही नहीं। हमने श्रीमती जी को लगभग खींचते हुए अपनी एक कविता सुनाते हुए गाडी में बिठाया और ड्राइवर को कहा कि चलो , हो गई शादी :

इस भीड़ भाड़ में कौन है अपना कौन पराया
किसने निमंत्रण स्वीकारा,  कौन नहीं आया !

दूल्हा कैसा दिखता है, दुल्हन की कैसी सूरत है
यह न कोई देखता है , न देखने की ज़रुरत है !

आजकल मेहमानों को दूल्हा दुल्हन से प्यारा होता है खाना
और मेज़बानों को सम्बन्धियों से ज्यादा प्यारा नाच गाना !

इसी अफ़साने की शिकार प्रेम संबंधीं की ख्वाहिश हो गई है ,
और शादियां आजकल काले धन की बेख़ौफ़ नुमाइश हो गई हैं !



Friday, November 1, 2013

दीवाली के मच्छरों पर एक सामाजिक शोध कविता ---


दीवाली पर मच्छरों की भरमार पर प्रस्तुत है एक पूर्व प्रकाशित रचना :




एक दिन हमारी कामवाली बाई
सुबह सुबह घर आते ही बड़बड़ाई ।

बाबूजी, ये द्वार पर कौन मेहमान खड़े हैं ,
हैं तो लाखों करोड़ों, पर सब बेज़ान पड़े हैं ।

ये कहाँ से आते हैं, क्यों आते हैं,
हम तो समझ ही नहीं पाते हैं ।

और इनका नाज़ुक मिजाज़ देखिये ,
रोज रूपये की तरह लुढ़क जाते हैं ।

मैंने कहा बेटा, ये बिन बुलाये मेहमान जो बेज़ान हो गए हैं,
ये स्वतंत्र भारत के वो नागरिक हैं जो अपनी पहचान खो गए हैं ।

इनका तो जन्म लेना भी कुदरत की बड़ी माया है ।
क्योंकि इनके लघु जीवन पर प्रदूषण की पड़ी छाया है ।

प्रदुषण से परिवर्तित इनका अस्तित्त्व हो गया है ।
इसीलिए नेताओं की तरह इनका भी व्यक्तित्व खो गया है ।

उस दिन शाम रौशन होते ही वो फिर आ गए ।
दीवाने परवाने से हर विद्धुत शमा पर छा गए ।

मैंने पूछा -- आप कौन हैं
कहाँ से आए हैं, और क्यों आए हैं ?

उनमे से एक जो ज्यादा ख़बरदार था,
शायद उस झुण्ड का सरदार था ।

बोला --हम उत्तर भारत से आए हैं,
रोजी रोटी की तलाश में, दिल्ली के आसरे ।

हमने कहा आइये, आपका स्वागत है,
अरे हम नहीं हैं बेरहम बेशर्म बावरे ।

हम दिल्लीवाले दिल वाले हैं, मेहमान नवाज़ी के साये में पाले हैं ।
तभी तो दिल्ली के द्वार सभी के लिए खुले हैं ।

लेकिन यह तो बताईये, आप रोज रोज क्यों चले आते हैं ?
वो बोला हम तो इंसानी सभ्यता की चकाचौंध से खिंचे चले आते हैं ।

लेकिन इस रौशन दुनिया को
इतना असभ्य और मतलबपरस्त पाते हैं ।

कि जल कर राख ना हो जाये अपनी ही लौ में शमा ,
इसलिए हम तो पतंगा बन, खुद ही पस्त हो जाते हैं ।

देखिये ये जो हमारी खेप अभी उड़कर आई है ।
ये सही में मच्छर नहीं, देश में बढती महंगाई है ।

सामने वाली लाईट पर जो इनकी भरमार है ।
वह दरअसल देश में फैला हुआ भ्रष्टाचार है ।

और जो ज़मीं पर बिखरा इनका सामान है ।
वो असल में इंसान का गिरा हुआ ईमान है ।

अरे हमें मच्छर समझना आपका भ्रम है ।
क्योंकि हम मच्छर नहीं इंसान के बुरे कर्म हैं ।

जिस दिन इंसान में इंसानियत जाग जायेगी !
हमारी ये नस्ल लुप्त हो खुद ही भाग जायेगी !

Saturday, May 4, 2013

जब पहली बार हमें एक अपराधी जैसा होना महसूस हुआ -- ऐ विजिट टू दिल्ली एयरपोर्ट।


एक समय था जब दिल्ली एयरपोर्ट तभी जाना होता था जब कनाडा में रहने वाले हमारे मित्र साल दो साल में एक बार दिल्ली आते थे। उन्हें लेने जाते तो आधी रात तक बेसब्री से इंतजार करते। ट्रॉली पर सामान लादे दोनों हाथों से ट्रॉली धकाते हुए जब वे सामने आते तो पहचान कर चेहरे पर जैसे एक विजयी मुस्कान फ़ैल जाती। इसी तरह विदेश जाते समय सभी दोस्त और रिश्तेदार मिलकर उन्हें विदा करने जाते। इस अवसर पर सब प्रस्थान क्षेत्र में बने रेस्तराँ में बैठकर चाय कॉफ़ी का आनंद लेते और बाहर चलते हवाई ज़हाज़ों को देखकर रोमांचित होते।

उन दिनों प्रस्थान टर्मिनल का नज़ारा भी बड़ा दिलचस्प होता था। अक्सर पंजाब से लोग दल बल सहित आते और विदेश जाने वाले प्यारे मुंडे को फूल मालाओं से लाद कर गले मिलकर खूब रोते। एक एक बन्दे को छोड़ने ४०-५० लोग तक बस या ट्रक भर कर आते। पता नहीं कि तब विदेश जाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता था या हवाई ज़हाज़ में बैठना , या शायद दोनों। हमने भी जब पहली बार हवाई यात्रा की तब अपना वी आई पी होने का भ्रम ज़ेहन में अन्दर तक उतर गया था। ट्रॉली में एक छोटा सा बैग रखकर हम ऐसे चल रहे थे जैसे बरसों बाद विदेश से लौटे हों। स्वागत में तख्ती लिए खड़े एक एक शख्स को देखते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे थे जैसे हमारे ही स्वागत में खड़े हों।   

लेकिन अब जब देश में लो कॉस्ट एयरलाइन्स के चलते हवाई यात्रा पहले के मुकाबले सस्ती हो गई है और साथ ही मिडल क्लास की खर्च करने की क्षमता अपेक्षाकृत बढ़ गई है , तब हवाई यात्रा और एयरपोर्ट जाना उतना दुर्लभ नहीं रहा। महीने दो महीने में दोनों बच्चों में से किसी एक को लाने या छोड़ने का क्रम चलता ही रहता है। हालाँकि अब एयरपोर्ट तक मेट्रो उपलब्ध है लेकिन दिल्ली वालों को अपनी गाड़ी में चलने की बड़ी बुरी आदत है। इसी के चलते एयरपोर्ट पर गाड़ियों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि अब वहां रुकने की इज़ाज़त ही बंद कर दी गई है।

अब डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर पिकअप करने के लिए बस ५ मिनट का ही समय मिलेगा। उसके बाद १०० रूपये का टिकेट कट जायेगा। और यदि आपको एक घंटा रुकना पड़ गया तो समझो ६०० का चूना लग गया। हालाँकि पार्किंग में गाड़ी पार्क करने के आधे घंटे के ५० रूपये देने पड़ते हैं।

ऐसे में अक्सर देखने में आता है कि पिकअप करने के लिए जाने वाले गाड़ीवाले एयरपोर्ट से पहले ही सड़क पर  
साइड में गाड़ी लगाकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन जल्दी ही ट्रैफिक पुलिस वाले लाउड स्पीकर पर गाड़ी का नंबर पुकारते हुए वहां से हटने को मजबूर कर देते हैं। यह नज़ारा अब आम हो गया है।

कुछ दिन पहले हम भी एक्सप्रेस हाइवे आरम्भ होने से पहले वाले स्थान पर रात १० बजे बेटी का प्लेन लैंड होने का इंतजार कर रहे थे। तभी देखा कि आगे पीछे जो और गाड़ियाँ थीं , सब अचानक चल दिए। कुछ सेकंड्स बाद ही एक पुलिस की गाड़ी हमारे साइड में आकर रुकी और उसमे बैठा पुलिसमेंन हमें घूर कर देखने लगा। हमें भी लगा जैसे हम कोई अपराधी हैं। अब तक हम यह भी समझ गए थे कि यहाँ से खिसक लेना ही बेहतर है। हालाँकि हमें एक महिला (पत्नि) के साथ देर रात यूँ सड़क पर रुके होने का अर्थ उन्होंने क्या लगाया होगा , यह सोचकर ही हंसी आ गई।    

हाइवे पर चढ़ते ही नज़ारा और भी दिलचस्प हो गया। जहाँ दायीं लेन में चलती हुई गाड़ियों में तेज चलने की रेस लगी थी , वहीँ बायीं लेंन में वे सब चल रहे थे जिन्हें एयरपोर्ट जाना था। बायीं लेन में चलने वालों में एक तरह से धीरे चलने की होड़ सी लगी थी। ज़ाहिर था , किसी को भी जाने की जल्दी नहीं थी। आखिर एक जगह जहाँ फ़्लाइओवर में मोड़ सा था , वहां पर जाकर सारी गाड़ियाँ रुकने लग गई। वहां न सिर्फ मोड़ था , बल्कि अँधेरा भी था। फिर भी लोग इत्मिनान से गाड़ी रोककर इंतजार कर रहे थे , घड़ी की सूइयों के आगे बढ़ने का। कुल मिलाकर सारा दृश्य एक संस्पेस्फुल फिल्म के  सैट जैसा लग रहा था।

इंतजार करते हुए यही विचार मन में आ रहा था कि ५ से १५ लाख की गाड़ियों में बैठे हम शहरी खाते पीते लोग वहां सिर्फ इसलिए खड़े थे क्योंकि पार्किंग के ५० रूपये बचाने थे। यह अलग बात है कि यदि पिकअप करने में ५ मिनट से ज्यादा की देरी हो जाये तो ५० बचाने के चक्कर में १०० रूपये भी देने पड़ सकते हैं। उधर फ़्लाइओवर के ऊपर से होती हुई एयरपोर्ट मेट्रो जा रही थी , बिल्कुल खाली। एयरपोर्ट आने वाली मेट्रो में भी मुश्किल से १० सवारियां थीं। ज़ाहिर था कि हम दिल्ली वालों को अपनी गाड़ी से ही चलने की भयंकर आदत है। इसीलिए सब जगह पार्किंग की समस्या बढती जा रही है।           

अब सवाल यह उठता है कि इन परिस्थितियों में दोष किसे दिया जाये।

क्या उन्हें जो अपने प्रिय परिजनों को लेने एयरपोर्ट अपनी गाड़ी में जाते हैं ?
या एयरपोर्ट मेट्रो लोगों को लुभा नहीं पा रही है ?  
या फिर एयरपोर्ट अधिकारीगण इस समस्या का कोई बेहतर समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं ? 

जब तक कोई बेहतर विकल्प नहीं मिलता , तब तक लगता है कि दिल्ली के सांभ्रांत लोग यूँ ही मन में एक अपराधबोध लिए सडकों पर पुलिस से बचते फिरते रहेंगे।   



Monday, January 28, 2013

दिल्ली की सर्दियों में शादी और शादी में खाने की बर्बादी ---


एक समय था जब एक के बाद एक सभी मित्रों की शादी होने लगी थीं। अब 25-30 साल बाद जिंदगी का दूसरा दौर शुरू हो गया है जब मित्रों के बच्चों की शादियाँ होने लगी हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पहले जिसकी बधाई गाई  थी, अब उसी का सेहरा गा रहे हैं। शायद यही जीवन चक्र है जो अविरल चलता रहता है। उस ज़माने में शादियाँ भी घर के पास सड़क पर या गली में या पार्क में टेंट गाड़कर हो जाती थी। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं। आजकल मिडल और अपर मिडल क्लास में शादियाँ या तो फार्म हाउस में होती हैं या किसी सितारा होटल में। लो मिडल और लो क्लास की पहुँच समुदाय भवन तक ही होती है जो लगभग हर कॉलोनी में बने हैं। लेकिन आजकल शादियों का स्वरुप इस कद्र बदल गया है कि कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हो गया है। पिछली पोस्ट में आपने शादियों की तैयारियों के बारे में पढ़ा। आइये अब आपको एक आधुनिक शादी में लेकर चलते हैं। 

शादी में कितने बजे पहुंचा जाये ?

सबसे पहले तो विचार करने की बात यह है कि शादी में कितने बजे पहुंचा जाये। कार्ड में कुछ भी लिखा हो, लेकिन यदि आप रात 9 बजे से पहले पहुँच गए तो यह निश्चित है कि आपका स्वागत करने वाला कोई नहीं मिलेगा। उलटे आपको ही मेजबानों का स्वागत करना पड़ सकता है। एक कार्ड में लिखा था , बारात ठीक सात बजे पहुँच जाएगी, और शादी की सभी रस्में , 11 बजे तक संपन्न हो जाएँगी। हम अक्सर समय के पाबंद रहते हैं। इसलिए जल्दी घर आकार पत्नी से कहा -  भई जल्दी से तैयार हो जाओ, छै बज चुके हैं। पत्नी बोली -- एक घंटा पहले बन ठन कर क्या हो जायेगा। मैंने कहा भाग्यवान, एक घंटा तो तुम्हारे श्रृंगार में ही लग जायेगा। फिर भी पत्नी ने सजने में पूरे दो घंटे लगाये और हम विवाहस्थल पर साढ़े आठ बजे ही पहुँच पाए। जाकर देखा तो पाया , कुछ लोग इधर उधर चक्कर लगा रहे थे। पता चला वे तो टेंट वाले थे, अभी टेबल चेयर लगा रहे थे। आखिर फिर वही काम करना पड़ा। बाहर खड़े होकर बारात का इंतजार करना पड़ा।  

बारात :

अब यदि आपको लड़की की शादी का निमंत्रण मिला है तो ज़ाहिर है आप सीधे विवाहस्थल ही पहुंचेगे। लेकिन आजकल लड़के की शादी में भी मेहमान बारात के साथ चलने के बजाय सीधे पंडाल में ही पहुँच जाते हैं। इसलिए क्या बाराती और क्या घराती , सब एक सामान नज़र आते है। इसका फायदा कभी कभी कुछ युवक फ़ोकट में मेहमान बनकर दावत उड़ाकर उठाते हैं।  हमने देखा है कि आजकल बाराती तो सीधे  विवाहस्थल पर पहुँच जाते हैं , और दुल्हे के साथ एक घोड़ी , दो रिश्तेदार, और बाकि बैंडवाले ही रह जाते हैं। उधर दुल्हे के चंद दोस्त दारू चढ़ाकर बैंड के साथ हुडदंग मचा रहे होते हैं, इधर बाराती और घराती सब मिलकर दावत उड़ा रहे होते हैं। फिर जाते जाते दूल्हा दिख गया तो बधाई , वर्ना लिफाफा पिता को सोंप काम तो निपटा ही दिया था भाई ।   

खाना :

शादियों में सभी मेहमानों को भी,चाहे लड़के वालों की तरफ से हों या लड़की वालों की तरफ से, बस एक ही काम होता है , खाने का काम। दिल्ली जैसे बड़े शहर में अक्सर शादियों में जान पहचान वाले या तो बहुत कम मिलते हैं या हेलो हाय करने के बाद अपने में मस्त हो जाते हैं। वैसे भी शादियों में डी जे का इस कद्र शोर होता है  कि बात करने के लिए भी, जोर लगाना पड़ता है। लेकिन गौर से देखा जाये तो बात करने की नौबत ही कहाँ आती है, क्योंकि तीस आइटम्स खाने के बाद पता चलता है , अभी तो चालीस और बाकि हैं।  

सबसे पहले तो गेट में घुसते ही ताबेदार ट्रे में रंग बिरंगे पेय पदार्थ लिए तत्परता से आपका स्वागत करते हैं, मानो कड़ाके की ठंड में भी प्यास से आपका गला सूख रहा हो। फिर आप ढूंढते हैं अपने मेज़बान को क्योंकि उनके पास तो इतनी फुर्सत होती नहीं कि वे स्वयं आपसे मिल सकें। आरंभिक औपचारिकतायें निभाने के बाद आप स्वतंत्र होते हैं खाद्य यात्रा पर निकलने के लिए। हमारे जैसे बुद्धिमान मेहमान यात्रा का आरम्भ करते हैं फ्रूट चाट की दुकान से-- मांफ कीजिये फ्रूट स्टाल से। कभी इम्पोर्टेड कपड़ों का बोलबाला होता था , आजकल इम्पोर्टेड फ्रूट्स का होता है। 
चाट पापड़ी: इसके बाद एक ही लाइन में गोल गप्पे , भल्ला पापड़ी , आलू  चाट , आलू टिक्की ,  चिल्ला , पाव भाजी , राज कचोरी , लच्छा टोकरी देखकर आप राजसी भोजन का आनंद लेने से खुद को नहीं रोक पाएंगे।   
पंजाबी रसोई :  यहाँ आपको मिलेंगे छोले बठूरे , मक्के दी रोटी ते सरसों दा साग , साथ में लस्सी जिन्हें खाने के लिए मंजी ( खाट ) बिछाई गई हैं। 
दक्षिण भारतीय : इस स्टाल पर गर्मागर्म सांभर के साथ डोसा , इडली , बड़ा आदि तुरंत तैयार मिलेगा। 
चाइनीज़ : यदि आपका चीनी खाना खाने का मूड है तो चाउमीन , नूडल्स , मंचूरियन आदि आप सामने खड़े होकर बनवा सकते हैं। 
पिज़्ज़ा : यहाँ आप जो भी टॉपिंग चाहेंगे , बिना हील हुज्ज़त के पाइपिंग हॉट पिज़्ज़ा के साथ पाएंगे। 
स्नैक्स : अलग अलग तरह के स्नैक्स जो अक्सर ड्रिंक्स के साथ लिए जाते हैं, वेटर्स ट्रे में लिए बार बार आपके सामने लेकर आते रहेंगे। अंतत: आप स्वयं ही बोर होकर उन्हें देखते ही हाथ से इशारा कर भगाते नज़र आयेंगे। 
सूप : इतना कुछ खाने के बाद अब निश्चित ही आपको एपेटाईज़र की ज़रुरत महसूस होने लगेगी, वर्ना खाना कैसे खाया जायेगा । एक्स्ट्रा मसाले डाल कर आप सूप को एक्स्ट्रा स्ट्रोंग बनाकर मेन कोर्स के लिए साहस जुटाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं प्लेट उठाने के लिए प्लेट्स के प्लेटफोर्म की ओर। आखिर एक प्लेट तो आपके नाम की भी रखी गई है जिसका आप न अनादर कर सकते हैं, न उपेक्षा।                   
एक ज़माना था जब लोग लड़की की शादी में प्लेट यह सोचकर छोड़ देते थे कि लड़की के पिता का कुछ खर्चा बचेगा। और चाट पकोड़ी खाकर ही पेट भर लेते थे।  लेकिन आजकल यह सोच आउटडेटड हो गई है। 

खाने का आखिरी पड़ाव : होता है सम्पूर्ण खाना। लेकिन यह क्या -- सामने एक स्टाल और बची है जहाँ मिल रहे हैं तवे की रोटी और दाल , तवा रोटी और साग , तवा सब्जियां और इन सबके साथ नान , तंदूरी रोटी , मिस्सी रोटी और देसी घी का तड़का। अब आपका कन्फ्यूज होना स्वाभाविक है। क्या गेट से होकर हॉल में प्रवेश करना चाहिए जहाँ रखे हैं सजे सजाये -- तरह तरह के पुलाव, पनीर की कई तरह की सब्जियां , मटर मशरूम , कोफ्ते, दही भल्ले , कढ़ी कोफ्ते, आलू भाजी , पालक कोफ्ते, और भी न जाने कितने तरह की सब्जियां जिन्हें देखकर लगता है जैसे अभी तक किसी ने उन्हें छुआ ही न हो। आखिर कन्फ्यूजन में आप क्या खाएं , यह आपको स्वयं भी न समझ आता है , न निर्णय कर पाते हैं।  

एक और आखिरी पड़ाव : 

अंत में आप स्वीट्स की ओर अग्रसर होते हैं। थोड़ा सा गाजर हलवा , मूंग का हलवा भी थोड़ा सा , दो चार जलेबियाँ , उस पर रबड़ी , एक गुलाब जामुन भी रख ही लेते हैं। अब तक प्लेट भर चुकी है , इसमें और रखने की जगह नहीं बची। कोई बात नहीं,  आइस क्रीम के साथ रसमलाई एक अलग प्लेट में बाद में ले लेंगे। सब चट करने के बाद अब इसे हज्म करने के लिए गर्मागर्म दूध तो होना चाहिए , मलाई मार के। किसी तरह मुश्किल से ख़त्म कर के बाहर आते हैं, टाई के पीछे पेट पर हाथ फिराते हुए। बस अब तो घर का रास्ता नापना चाहिए। 

लेकिन यह क्या , बाहर जाने का रास्ता तो दुल्हे ने घेर कर रखा है जो पिछले आधे घंटे से न जाने क्या कर रहे हैं कि अन्दर आ ही नहीं रहे। आप सोचते हैं , चलो कॉफ़ी ही हो जाये , उसे भी क्यों छोड़ा जाये।  जब तक कॉफ़ी ख़त्म करेंगे तब तक तो रास्ता साफ हो ही जायेगा। अंतत : गेट पर आकर पता चलता है कि पान मुफ्त में मिल रहे हैं तो क्यों न यह शौक भी फरमा लिया जाये। यार सादा ही लगाना , मीठा अब नहीं खाया जायेगा -- यह कहते हुए पान का बीड़ा मूंह में डालते हैं , और चल पड़ते हैं मूंह हाथ से पोंछते हुए, गाड़ी की ओर यह सोचते हुए कि :

*  हम शादियों में ऐसे ठूंस ठूंस कर क्यों खाते हैं जैसे एक ड्राइवर गाड़ी को हिला हिला कर पेट्रोल भरवाता है टैंक फुल करवाने के लिए ? 
* शादियों में इतना खाना ही क्यों बनवाते हैं जो खाया ही न जाये ? 
* बाहर खाने के इतने सारे व्यंजन होने के बाद क्या अन्दर के खाने की आवश्यकता रह जाती है ? 
ज़रा सोचिये।    

Thursday, January 17, 2013

फेसबुक ने कर डाला ब्लॉगर्स का ब्रेन ड्रेन ---



आजकल एक पुराना हिंदी फ़िल्मी गाना बहुत याद आता है --

मैं ढूंढता हूँ जिनको , रातों को ख्यालों में 
वो मुझको मिल सके ना , सुबह के उजालों में। 

कुछ यही हाल हिंदी ब्लॉगिंग का हो रहा है। अभी ललित शर्मा जी की पोस्ट पढ़कर यही अहसास हुआ कि वास्तव में सभी जाने माने ब्लॉगर जिन्हें हम ब्लॉग पर ढूंढते ही रह जाते हैं , वे तो सारे के सारे फेसबुक पर बुक्ड और हुक्ड हैं। और हम खामख्वाह यहाँ माथाफोड़ी( यह एक राजस्थानी लफ्ज़ है ) कर रहे हैं। एक तो वैसे ही एक पोस्ट लिखने में घंटों ख़राब हो जाते हैं, फिर पढने वाले भी जब ज्यादा नहीं मिलते तो लो कॉस्ट बेनेफिट रेशो देखकर दम ख़म ही ख़त्म सा हो जाता है। दूसरी ओर फेसबुक पर देखिये। हर घड़ी एक पोस्ट -- नहीं अपडेट। आप जितने चाहो फ्रेंड्स बना लो , जितने चाहो अपडेट्स पढ़ लो। पढने के लिए भी कहाँ गज भर लंबे लेख होते हैं। बस एक या दो पंक्तियाँ , या वो भी नहीं। खाली तस्वीर से भी काम चल जाता है। और अपडेट करने के लिए भी न समय चाहिए , न विचार -- कहीं भी कुछ देखा , फोटो खींचा , और अपडेट कर दिया अपने मोबाइल से। और आपकी पोस्ट/ अपडेट पहुँच गया तुरंत आपके हजारों फ्रेंड्स के पास। अब आपके हज़ार दोस्तों में से सौ पचास तो अवश्य  निठल्ले बैठे ही रहते होंगे , जो तुरंत या तो लाइक का चटका लगा देंगे , या एक दो तुके बेतुके शब्द टाइप कर एंटर दे मारेंगे। और कुछ नहीं तो स्माइली तो रेडीमेड मिलती ही है।  

यह लाइक करने का खेल भी बड़ा दिलचस्प है। आपको बस इतना करना है कि अपडेट के नीचे लाइक इंग्लिश में कहाँ लिखा है, यह ढूंढना है। दिग्गज फेस्बुकिये इसे वैसे ही पहचान लेते हैं जैसे एक टाइपिस्ट बिना देखे कीबोर्ड की कीज को पहचान लेता है। इसके बाद तो दे दनादन लाइक करते जाइये। हो गया आपका सैकड़ों मित्रों के साथ सोशलाइजिङ्ग। यदि --न बोले तुम , न मैंने कुछ कहा -- वाली तर्ज़ पर  वार्तालाप करना है तो चैट का ऑप्शन बड़े काम का है। इसके लिए आपको कहीं जाने की ज़रुरत भी नहीं है। खुद ही चैट में दिलचस्पी रखने वाला आपको आपकी वॉल पर नज़र आ जायेगा। आपको तो बस उसका ज़वाब देना है। इसके बाद  आप जितनी भी उजूल फ़िज़ूल बातें करना चाहें , बस लिखते जाइये और चैट करते रहिये। विश्वास रखिये , आप कुछ भी लिख सकते हैं -- आपके और आपके मित्र के सिवाय कोई नहीं देख पायेगा, यह निश्चित है। वैसे यह जानते हुए भी कि जिस सुन्दर सी दिखने वाली लड़की की फोटो को देखकर आप रोमांचित और रोमांटिक हो कर चैट करते हुए अनाप सनाप लिखते जा रहे हैं , वह लड़की नहीं बल्कि कोई अधेढ़ उम्र का शैतान या कोई विकृत दिमाग का मालिक बुड्ढा भी हो सकता है , आप चैट का मज़ा लेने से बाज़ नहीं आते। यही फेसबुक की खूबी है जो अच्छे अच्छों को ज़मूरा बना देती है। 
    
फेसबुक की एक ओर खासियत है। यहाँ आपको पता चलता रहता है कि कौन कब क्या कर रहा है। कभी पता चलता है कि फलां फलां तो सोने चला गया , कभी पता चलता है कि अमुक अभी अभी सोकर उठा है। यहाँ तक कि कौन किस के साथ बैठा है , क्या खा रहा है -- यह सभी अपडेट होता रहता है। यह अलग बात है कि इन सब बातों से आपको क्या फर्क पड़ता है। लेकिन यदि आपको फर्क नहीं पड़ता तो आप मित्र कैसे ! और इस तरह फ्रेंड -- अन्फ्रेंड हो जाते हैं। कमाल की साईट है भाई ये फेसबुक भी। लोगों को जीने का अजीबो ग़रीब तरीका सिखा रही है। 


एक और बात जो फेसबुक में खास है , वह है अलग अलग पोज में नित नए फोटो खींचकर स्टेट्स पर डालकर चेहरे को तरो ताज़ा रखना। आत्ममुग्ध होना तो किसी भी इन्सान के लिए स्वाभाविक प्रवृति है। फेसबुक ने यह अवसर मुफ्त में दिया है जहाँ आप नित नए फोटो डालकर ,अपने मियां मूंह मिट्ठू बनने के इल्ज़ाम से बचते हुए सेल्फ प्रोमोशन कर सकते हैं। विशेषकर कवियों के लिए तो यह सुविधा बहुत काम की है क्योंकि हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी खूब जम जाता है। 

लेकिन यहाँ भी लेन देन का व्यापार धड़ल्ले से चलता है। यानि आपके स्टेटस को लोग तभी लाइक करेंगे , जब आप उनको करेंगे। यहाँ भी टिप्पणियों का उतना ही महत्तव है जितना ब्लॉग पर। लेकिन यहाँ उनकी संख्या बढ़ाना बड़ा आसान है। स्टेटस पर ही चैट करते जाइये , आपके स्टेटस पर सैंकड़ों टिप्पणियां इकठ्ठा हो जाएँगी। अब इससे आपको संतुष्टि मिलती है तो फेसबुक को धन्यवाद दीजिये। वैसे भी फेसबुक ने लाखों लोगों को रोजी रोटी प्रदान कर रखी है। 

हमारे देश की राजनीति में दल बदलना न कोई गुनाह है , न कोई शर्म की बात। यह अलग बात है कि अब इस पर अंकुश लगा हुआ है। लेकिन यहाँ तो वह डर भी नहीं . यानि आप जब चाहें , ब्लॉगिंग छोडकर फेस्बुकिया सकते हैं। आखिर हिंदी का विकास और प्रोत्साहन तो वहां भी हो ही रहा है। 

छोडो कल की बातें , कल की बात पुरानी।
नए दौर में बोलेंगे,  हम मिलकर बेजुबानी। 

जय जय फेसबुक। जय जय फेसबुक। 

नोट : यह पोस्ट सर्व साधारण के सन्दर्भ में लिखी गई है। इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं है। 



Friday, April 27, 2012

फेसबुक ने बदल दी है ब्लॉगिंग की तस्वीर ---


लम्बे सप्ताहांत पर लम्बे सफ़र की लम्बी दास्ताँ जारी रहेगी . हालाँकि अभी दो दिलचस्प किस्त बाकि हैं . लेकिन अभी लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक . ब्रेक के बाद आपको ले चलेंगे असली जंगल में .
इस बीच खुशदीप सहगल ने एक पोस्ट में लिखा -- हिंदी ब्लागिंग में इन दिनों मुझे खालीपन और भारीपन दोनों ही महसूस हो रहा है..खालीपन इसलिए कि मेरे पसंद के कुछ ब्लागरों ​ने लिखना बहुत कम कर दिया है...

खुशदीप भाई, दोस्तों ने लिखना कम नहीं किया , बल्कि पाला बदल लिया है . बल्कि यूँ कहा जाए -मित्र लोग अब पहले से ज्यादा वक्त लेखन में लगा रहे हैं . सुबह से लेकर शाम तक ---शाम से लेकर सुबह तक --लेखन ही कर रहे हैं . ज़रा देखिये तो :


थे
कभी ब्लॉगर जो , फेसबुकिया रहे हैं
छोड़ लेखन अब वो , मौनबतिया रहे हैं

चेहरे नए नए तब, प्रोत्साहित कर रहे थे
चेहरों पर नित अब , टैग टंगिया रहे हैं

रोज लिखते हैं इक , लेख दुनिया दरी पर
मोह टिप्पणी का भी , छोड़ एठियाँ रहे हैं

शाम ढल जाये या , रात बीते सुबह हो
भोर से संध्या तक , खबर छपिया रहे हैं

कौन कब जागा , कब नींद आई रतीयाँ
हाल हर पल का, सब ओर जतिया रहे हैं

चैट करते हैं जो , फेसबुक पर घंटों तक
ब्लॉग पढने का, तज मोह खिसिया रहे हैं

राह में देखे जो , 'तारीफ' राही अनेकों
कोइ रोते से , कुछ रंगरसिया रहे हैं


क्या आपको भी लगता है -- ब्लॉगर्स में ब्लॉगिंग का मोह भंग हो चुका है ?
क्या फेसबुक ने ब्लॉगिंग की तस्वीर बदल दी है ?




Saturday, January 1, 2011

नए वर्ष में कुछ भी हो , लेकिन क्यों न हम नव वर्ष का स्वागत हंसने हंसाने के साथ करें--

एक और वर्ष बीत गयाअगर सोचें कि गत वर्ष में क्या खोया , क्या पाया तो यही लगता है कि पाया भी बहुत और खोया भी बहुत

अब फिर एक नया वर्ष , नई आशाओं के साथ पधार चुका है

नए वर्ष में कुछ भी हो , लेकिन क्यों न हम नव वर्ष का स्वागत हंसने हंसाने के साथ करें ।

)
एक तिज़ोरी पर लिखा था --तोड़ने की ज़रुरत नहीं । बस बटन दबाओ और १५२ प्रेस करो । तिज़ोरी खुल जाएगी । एक चोर ने यह पढ़ा और यही किया । लेकिन यह क्या --१५२ प्रेस करते ही सायरन बज उठा , शोर मचा , पुलिस आई और उसे पकड़ लिया ।
इस पर चोर ने कहा --आज मेरा इंसानियत से भरोसा उठ गया

)

पिता ने बेटे से पूछा --रिजल्ट का क्या हुआ ?
बेटा --पांच सब्जेक्ट में फेल ।
पिता -- आज से मुझे पापा नहीं बोलना ।
बेटा --कम ऑन डैड ! इट वाज नॉट माई डी एन टेस्ट

)

बच्चा पैदा होते ही नर्स से --लाईट आ रही है क्या ?
नर्स ---नहीं बच्चा ।
बच्चा --साला फिर यू पी में पैदा हो गया

)

मंदिर के बाहर जूते उतारने और मिस काल करने में क्या समानता है ?

दोनों में यही डर लगा रहता है कि कहीं कोई उठा ना ले

)

सेल्समेन ने द्वार पर दस्तक दी --ठक ठक ।
अन्दर से मालिक ने पूछा --कौन है ?
सेल्समेन : opportunity ।
मालिक : झूठ । opportunity never knocks twice

आइये संकल्प करें कि कितनी भी मुश्किलें क्यों न आयें , नव वर्ष में हम हँसते रहेंगे , मुस्कराते रहेंगे


सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

नोट : सारे जोक्स उधार के हैंलेकिन जल्दी ही स्वरचित भी


Wednesday, December 29, 2010

मंडे की मंडी पर मंदी की मार---

नव वर्ष अब आने ही वाला है, नई आशाओं के साथ। लेकिन यदि गुजरे वर्ष पर एक नज़र डालें तो क्या कुछ बदला है ? आप स्वयं ही देख लीजिये ।

प्रस्तुत है , पिछले साल महंगाई पर लिखी एक कविता , जो आज भी उतनी ही ताज़ी लगती है ।

एक् सुबह जब हमने अखबार उठाये
हैडलाइंस पढ़कर मन ही मन मुस्कराए।

लिखा था,महंगाई दर शून्य से नीचे चली जा रही है
हमने सोचा मतलब, मंदी की मार में कमी आ रही है।

खुश होकर पत्नी से कहा,
देखो, सावन की काली घटा चढी है, कुछ चाय पकोडे खिलाओ
पत्नी बोली, टोकरी खाली पड़ी है, पहले सब्जियाँ खरीदकर लाओ।

आज लगती है यहाँ मंडे की मंडी
सब्जियां मिलती हैं वहां सबसे मंदी।

तो भई मन में पकोडों की तस्वीर बनाये
हम चल दिए मंडी की ओर थैला उठाये।

मंडी जाकर जब हमने नज़र घुमाई
और फूल सी फूलगोभी नज़र आई।

तो मैंने सब्जीवाले से पूछा, भैया गोभी क्या भाव ?
वो बोला १५ रूपये
मैंने पुछा, किलो ? वो बोला जी नहीं, पाव।

ये सुनकर हम तो झटका खा गए
आसमां से जैसे, धरा पर आ गए।

फिर शर्माए से बोले,
अच्छा बीन्स का रेट बतलाओ
वो बोला, ये भी १५ में ले जाओ।

मैंने पूछा,
क्या आज सारी सब्जियां १५ रूपये पाव हैं ?
वो बोला जी नहीं, यह १०० ग्राम का भाव है।

सब्जियों का रेट सुन मन हिम्मत खोने लगा
उधर अपनी आई क्यु पर भी शक होने लगा।

इसी उधेड़बुन में हमें, हरे हरे नींबू नज़र आ गए
लेकिन अपुन तो वहां भी चक्कर खा गए।

साहस बटोरकर कहा,बस इनका रेट और बतला दो
वो खीजकर बोला बाबूजी , अब कुछ ले भी तो लो।

अच्छा चलो आप , २५ के ढाईसौ ले जाइए
मैंने कहा भाई, मुझे तो बस ५ ही चाहिए।

बाबूजी, इतने कम में कैसे काम चलेगा
५ ग्राम में तो एक टिंडा भी पूरा नहीं चढेगा।

अब हम समझे,
सब्जीवाला तो शोर्टकट मार रहा था,
पर अपनी तो इज्ज़त उतार रहा था।

अब तो हम मन ही मन बड़े शर्मिंदा थे,
क्योंकि ये भी जान चुके थे,कि वो नींबू नहीं टिंडा थे।

फिर भी इज्ज़त तो बचानी थी
इसलिए जिद भी दिखानी थी।

सो अकड़कर कहा, मुझे तो पांच टिंडे ही चाहिए
२५ रूपये लेकर वो बोला,मुझे क्या , ले जाइए।

मैंने महंगाई को जमकर कोसा,
मन ही मन हिसाब लगाकर सोचा।

भई पांच रूपये का मिला एक टिंडा !
अरे ये टिंडा है या,शतुरमुर्ग का अंडा।

एक दूकान से तो हम , बिना भाव पूछे ही वापस आ गए
वहां रखे प्याज़ देखकर ही , आँखों में आंसू आ गए ।

फिर बस कुछ अदरक, धनिया, आलू, टमाटर
और मटर की छोटी छोटी पोटलियाँ बनवाकर।

जब घर पहुंचे तो पत्नी बोली
ये क्या, खाली पड़ी है सारी झोली।

अज़ी सब्जियां खरीदने गए थे,ये क्या उठाकर लाये हैं?
मैंने कहा भाग्यवान,
रूपये तो आपने बस ५०० दिए थे, पर
हमारी सौदेबाजी देखिये,फिर भी पूरे ५० बचाकर लाये हैं।

प्रिये मंडे की मंडी पर,पड़ गई है मंदी की मार
सब्जियां खरीदने को अगले मंडे ,रूपये देना पूरे हज़ार।

भले ही महंगाई दर ढाई अंक नीचे ढह गई है,
लेकिन सब्जियाँ अब केवल दर्शनार्थ रह गयी हैं।


Friday, December 17, 2010

सर्दियों का मौसम और दिल्ली की शादियाँ, तौबा तौबा ---

लगभग पौने दो करोड़ आबादी वाला दिल्ली शहर

इसे पंडितों की मेहरबानी कहें या हमारा विश्वास , शादियों के लिए वर्ष में गिने चुने दिन । नतीजा , एक दिन में हजारों शादियाँ । कभी कभी एक दिन में तीन तीन शादियों के निमंत्रण ।

शादियाँ भी अब गली के नुक्कड़ या पार्क में नहीं , बल्कि ३०-३५ किलोमीटर दूर किसी फार्म हाउस में । जाने में ही लगे दो घंटे का समय । यदि ट्रेफिक जाम में फंस गए तो सारा मज़ा किरकरा ।



पहले तो निमंत्रण पत्र देखकर ही आप सकते में सकते हैं

आजकल शादी के कार्ड नहीं छपवाए जाते , बल्कि डिजाइनर पैक बनवाए जाते हैं , जिसमे एक तरफ आधा किलो बादाम , दूसरी ओर सिल्क के कपडे में लिपटा असंख्य पर्तों वाला कार्ड , जिसमे कम से कम चार दिन का प्रोग्राम बुक होता है ।

सिल्क का कपडा भी इतना कि उसमे किसी आधुनिका की दो तीन जोड़ी ड्रेस बन जाएँ

पुरुषो को तैयार होने में सिर्फ दस मिनट लेकिन महिलाओं को चाहिए दो घंटे ।

इस पर विडंबना यह कि फार्म हाउस की खुली हवा में थ्री पीस सूट में भी ठण्ड से ठिठुरने लगते हैं दिसंबर की सर्दी में ।
लेकिन मात्र एक साड़ी में लिपटी शुद्ध भारतीय नारी स्वेटर या शाल को हाथ पर लटकाए मज़े से चटकारे लेकर चाट पापड़ी खाती नज़र आयेंगी

इधर मेन गेट पर बैठे शहनाई वाले या तबलची ढोलक बजाएं , उधर स्टेज के पास बना डी जे का फ्लोर और चिंघाड़ता हजारों वाट का म्यूजिक सिस्टम हिंदी फिल्मों के लेटेस्ट हिट सोंग्स परोसता हुआ ।

आप चाहें भी तो किसी से बात करने की जुर्रत नहीं कर सकते

वैसे भी आजकल कौन किस से बात करने में दिलचस्पी रखता है

रही सही कसर बरात में छूटने वाली चाइनीज आतिशबाजी पूरी कर देती है

खाने की ओर देखें तो बड़े से बड़ा विद्वान भी चकरा जाए कि क्या खाएं , क्या न खाएं ।

उत्तर भारतीय , दक्षिण भारतीय , चाइनीज , कॉन्टिनेंटल , इंटर कॉन्टिनेंटल , यहाँ तक कि एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल व्यंजनों की कतार देखकर समझदार भी असमंजस में पड़ जाएँ

हलवाई की पूरी दुकान देखकर डायबिटिक्स भी अपनी बीमारी भूल जाएँ ।

रात के खाने में तीन रोटियां खाने वाले सीधे सादे प्राणी को ३०० व्यंजन देखकर अपने गरीब होने का अहसास होने लगता है

अंत में यदि आपको अपने मेज़बान के दर्शन हो जाएँ और आप अपना लिफाफा सौंपने में कामयाब हो जाएँ तो जीवन कृतार्थ लगने लगता है

ऐसी होती हैं दिल्ली की शादियाँ


ज़ाहिर है , मेहमान कितने ही हों , लेकिन देखकर यही लगता है कि इस तरह की शादियों में खाना बहुत बचता होगा । मैंने एक केटरर से पूछा कि वो इस बचे हुए खाने का क्या करते हैं ।

उसने बताया कि वो इसे फेंक देते हैं

अब ज़रा सोचिये यदि वह सच बोल रहा था तो यह कितना भयंकर सच होगा

जिस देश में अन्न पैदा करने वाला किसान भूख और क़र्ज़ के बोझ से मर जाता है , वहां खाने की ऐसी बेकद्री !

और यदि वह झूठ बोल रहा था तो , उस खाने का क्या होता होगा , यह सोचकर ही दिल कांपने लगता है

यदि आपको पता चल जाए कि उस बचे हुए खाने का क्या होता है तो शायद आप शादियों में खाना खाना ही छोड़ दें

नोट : शादियों के मौसम में अगली पोस्ट में पढना भूलें , शादियों के चटपटे अनुभव , हास्य कविता के रूप में