HAMARIVANI

www.hamarivani.com

Thursday, October 17, 2019

करवा चौथ स्पेशल --


कहते हैं,
खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है।
लेकिन पत्नी पर भैया, भला
किसका वश चलता है।

हमने पत्नी से कहा ,
आप में बस एक कमी है।
आपको हमारी लम्बी उम्र की,
फ़िक्र ही नहीं है।

पत्नी बोली,
देखो मेरा गला ख़राब है,
ज्यादा जोर से बोल नहीं सकती।
लेकिन ना पहले की है नक़ल ,
ना अभी मैं कभी कर नहीं सकती।

माना कि हमारा वर्षों का साथ है ,
किन्तु आपकी उम्र और आपकी सेहत,
आपके ही हाथ है।
जब रोजाना जिम जाते थे ,
६० में भी गबरू नज़र आते थे। 
अब सारा दिन घर में पड़े पड़े,
रोटियां तोड़ते हो।
और लम्बी उम्र का ठीकरा,
हम पर फोड़ते हो।

अज़ी शर्म करो, बिस्तर से उठो,
ज़रा शारीरिक श्रम करो । 
डांस क्लास ही ज्वाइन कर लो,
पर हम पर रहम करो।     
आजकल डांस में भी,
एक्सरसाइज ही तो कराते हैं।
तभी तो सभी डांसर,
एकदम फिट नज़र आते हैं।

पत्नी की बात हमारी समझ में आ गई ,
समझो अकल में समां गई।
किन्तु डांस क्लास ज्वाइन की तो समझे कि ,
इस उम्र में ये बात ,
आहिस्ता आहिस्ता ही समझ में आती है।
जिंदगी भर तो पत्नी ,
एक उंगली पर नचाती रही ,
अब डांस मास्टर अपने इशारों पर नचाती है।


Thursday, October 10, 2019

ज़ुर्माने के हंगामे पर एक पैरोड़ी --



जुर्माना है क्यों इतना, थोड़ी सी तो ही पी है,
नाका तो नहीं तोड़ा, लाइट जम्प तो नहीं की है। 

क्यों उनको नहीं पकड़ा , जिनके हैं शीशे काले ,
क्या जाने उस गाड़ी में , बैठा कोई बलात्कारी है। 

जुर्माना है क्यों इतना ,थोड़ी सी तो ही पी है,
शीशा तो नहीं काला , लाइन क्रॉस भी नहीं की है।...

गाड़ी को लगे धक्का, ट्रैफिक के नतीज़े हैं ,
धुत हमको कहे मालिक, खुद जिसने ही पी है ।

जुर्माना है क्यों इतना. , थोड़ी सी तो ही पी है,
स्पीड लिमिट तो क्रॉस नहीं की, पी यू सी भी है।...

नासमझ और नादाँ, लोगों की ये बातें हैं ,
स्कॉच को क्या जाने, देसी जिसने पी है ।
जुर्माना है क्यों इतना..

हर ठर्रा निकलता है , मंज़ूर ऐ सिपाही से ,
हर बेवड़ा कहता है , रम है तो नशा भी है।

जुर्माना है क्यों इतना, थोड़ी सी तो ही पी है,
नाका तो नहीं तोड़ा, लाइट जम्प तो नहीं की है।

जुर्माना है क्यों इतना...

नोट : यह व्यंगात्मक हास्य पैरोडी सिर्फ यातायात के नियम तोड़ने वालों पर लिखी गई है।


Tuesday, October 1, 2019

मोटर वाहन अधिनियम लागु हो रहा है धीरे धीरे --


जो दौड़ते थे ८० -९० पर , सरकने लगे हैं धीरे धीरे।
मेरे शहर के लोग आखिर, बदलने लगे हैं धीरे धीरे।

हाथ में लटकाकर हेलमेट, उड़ती थी हवा में ज़ुल्फ़ें,
गंजे सर भी अब तो हेलमेट,पहनने लगे हैं धीरे धीरे।

डंडे के डर से मदारी, नचाता है अपने बन्दर को ,
चालान के डर से इंसान, सरकने लगे हैं धीरे धीरे। 

ड्रंक ड्राइविंग का ख़ौफ़, रहता था ११ बजे के बाद ,
मदिरा छोड़ अब फ्रूट जूस , गटकने लगे हैं धीरे धीरे।

देर से ही सही मोटर वाहन अधिनियम आया तो ,
धीरे धीरे ही सही लोग, सुधरने लगे हैं धीरे धीरे।