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Wednesday, September 25, 2019

फेसबुक के चक्कर में ब्लॉगिंग भूल गए --

फेसबुक पर हम इतना झूल गए,
के कविता ही लिखना भूल गए।

जिसे देनी थी जीवन भर छाया ,
उस पेड़ को सींचना भूल गए।

मतलब में अपने कुछ ऐसे डूबे,
देश पर मर मिटना भूल गए ।

नींद में देखते रहे जिसे रात भर ,
आँख खुली तो वो सपना भूल गए।

बड़े भोले थे जाल में जा फंसे ,
फंसे तो पर निकलना भूल गए।

आँखों पर ऐसा पर्दा पड़ा यारो,
भीड़ में कौन है अपना भूल गए।

Tuesday, June 23, 2015

जाने कहाँ गए वो दिन :




अब नहीं आते ब्लॉग्स पर पाठक , अब रह गए ब्लॉग्स अकेले !
अब नहीं जागता कोई रात भर , अब नहीं लगते ब्लॉगर्स मेले !!

लेखक वही हैं लेखनी वही है , लेख बदले बदले से आते हैं नज़र !
राही वही हैं सफ़र भी वही है , अब बदली सी नज़र आती है डगर !!

वक्ता वही हैं श्रोता भी वही हैं, अब सभागार लगता गया है बदल !
कवि सही है कविता भी सही है , ब्लॉग्स क्यों है पाठकों से बेदखल !!

Sunday, September 15, 2013

रंग जो लाई हैं दुआएं , अब उतरने न पाए --

ब्लॉगिंग और फेसबुक की जंग में फेसबुक जीतता नज़र आ रहा है. इसका कारण है लगभग सभी ब्लॉगर्स का फेसबुक की ओर प्रस्थान करना।  हमने जान बूझकर फेसबुक पर भी अधिकांश ब्लॉगर्स को ही मित्र बनाया है. लेकिन सभी ब्लॉगर मित्र फेसबुक पर नहीं हैं , इसलिए उनके लिए प्रस्तुत हैं , फेसबुक पर प्रकाशित कुछ एकल पंक्तियाँ जो कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं :
   
* अब तो अडवाणी जी को भी समझ आ गया होगा कि भा ज पा में सिर्फ कुंवारे ही पी एम बन सकते हैं !

   यह अलग बात है कि यह फ़ॉर्मूला अब उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी भी अपना रहे हैं.  

* कभी कभी ऐसा लगता है , कि हम इस समाज में रहने योग्य ही नहीं !        
                                                                                                
  लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ !                                                             
                                                                                                
* लखनऊ में : पहले आप ! पहले आप !  दिल्ली में : पहले मैं ! पहले मैं !      
                                                                                               
  जाने दिल्लीवाले इतने मिमियाते क्यों हैं !                                          
                                                                                                                                                                                              
* टी वी पर देखा तो ये ख्याल आया : क्यों न डॉक्टरी छोड़कर हम भी कृपा       दृष्टि से ही उपचार करना शुरू कर दें !                                                   
                                                                                                 
 लेकिन सोचते हैं यदि कृपा नहीं आई तो पब्लिक क्या हस्र करेगी !                
                                                                                                
* यदि ज़रूरी मीटिंग के बीच पत्नी का फोन आ जाये तो आप क्या करेंगे ?   
                                                                                                क्या करेंगे जब एक ओर कुआँ हो और दूसरी ओर खाई !                        
                                                                                              
* अक्सर दंगों में मरने वाले मासूम ही होते हैं.                                      
                                                                                              
   नामासूम ना मालूम किस जहाँ में छुप जाते हैं !                                 
                                                                                              
* आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे !                                        
                                                                                              
   दुआ तो रंग ले आई. अब यही देखना है कि यह रंग कब तक टिकता है !    
                                                                                              
* कितना आसां है आसाराम बन जाना।                                              
                                                                                              
   हम तो राम बनने की आस में जीते हैं !                                            
                                                                                              
* दुनिया में दिमाग वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन व्यापक दिमाग वाले   बहुत कम मिलते हैं.                                                                      
                                                                                               
   आखिर दिमाग की बात है , समझने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा।          
                                                                                              
* फेसबुक ही एक ऐसा माध्यम है जहाँ अक्सर लाइक का मतलब लाइक नहीं होता !                                                                                        
                                                                                               
फेसबुक ने हर हालात में हमें खुश रहना सिखा दिया है.                            
                                                                                               
* यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू पा ले, तो सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है।                                                                                           
                                                                                              
यह अलग बात है कि मोक्ष धाम में करने को कोई काम नहीं होता।             
                                                                                              
* बापू की ज़वानी का राज़ क्या है --- हम भी आश्चर्यचकित हैं !                 

आश्चर्यचकित तो इस बात से भी हैं कि अब बापुओं पर भी ज़वानी रहती है.  


और अंत में एक सवाल जिस पर आपने पूरा शब्द कोष ही सामने ला कर रख दिया --सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल को हिंदी में क्या कहेंगे ! इस पर चर्चा अगली पोस्ट में.    



नोट : ब्लॉगिंग और फेसबुक में जंग अभी जारी है.देखते हैं आगे क्या होता है !  



Thursday, June 27, 2013

एक बार फिर वो -- जो अब फेसबुकिया बन गए हैं।


अभी ब्लॉग पर अरविन्द मिश्र जी का लेख पढ़कर फिर वही मुद्दा मन में मचलने लगा कि क्यों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग छोड़कर फेसबुक आदि की ओर जा रहे हैं। लेकिन यह चर्चा यहीं जारी रहे। हमें तो कुछ दिन से फेसबुक पर सक्रियता से जो देखने को मिला , वह प्रस्तुत है इस हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जिसमे हास्य कम, व्यंग ज्यादा नज़र आएगा लेकिन हालात पर खरा उतरेगा।  

१)

वो
सुबह सवेरे , मूंह अँधेरे
उठती है ,
चाय नाश्ता बनाकर
बच्चों को नहला धुलाकर,
टिफिन लगाती है,
बच्चों के साथ
बच्चों के पिता का।
फिर बिठा आती है, बच्चों को
स्कूल बस में ,
अच्छे नागरिक बनाने की चाह में।
फिर करती है
पति को बाय बाय
और बैठ जाती है खुद
सजने संवरने, नहा धोकर।
आखिर उसे भी तो काम पर लगना है।
९ से ५ तक का
क्या हुआ ग़र काम घर पर है ,
यही तो है कॉर्पोरेट कल्चर !
पढ़ती है, लिखती है, टिपियाती है
आँख बंद कर सैकड़ों
चटके लगाती है,
आखिर यह फेसबुकियाना भी
बड़ा चाटू काम है।
दिन भर के काम के बाद
चलो अब आराम किया जाये !
द्वार पर घंटी बजी है ,
अरे पति देव के आने का समय हो गया !
हे राम , अगले जन्म में पत्नि न बनाना
काम ही काम , एक मिनट का नहीं आराम !


२)

वो
सूट बूट पहन कर
फ्रेंच परफ्यूम लगाकर
बालों में करके तीन बार कंघी ,
बैठ जाता है सरकारी कुर्सी पर।
फ़ाइल से पहले खोलता है प्रोफाइल
फेसबुक पर ,
आखिर , स्टेटस अपडेट को
एक घंटा जो बीत गया है।
जाने कितने अपडेट, न्यूज, व्यूज
मिस हो गए होंगे।
ये मुआ दफ्तर भी इतना दूर क्यों है !
आजकल काम भी बहुत बढ़ गया है।
पी एम किसे बनाना है
कैसे चलेगा देश, दिन रात
सताती है यह चिंता।
अभी तो एक घंटा भी हुआ नहीं
कि बड़े साहब का आ गया बुलावा,
लगता है इन्हें देश की कोई चिंता नहीं।
अभी तो बीस लाइक और
चिपकाई हैं चालीस स्माइली,
कमेन्ट न दिए तो आयेंगे कहाँ से।
आखिर, एक हाथ ले, एक हाथ दे, का सिद्धांत
यहाँ से बेहतर कहाँ लागु होता है।
लेकिन यह सिद्धांत साहब को
जाने क्यों समझ नहीं आता है।
देश भक्तों की राहों में
हमेशा आई है रुकावटें ,
चलो फिर लग जाएँ फेसबुक पर
इस छोटे से मीटिंग ब्रेक के बाद।
सरकारी दफ्तर में, काम का आउट पुट
कहाँ निकल पाता है।
सुबह से लगा पायें हैं बस
बारह अपडेट्स।
उफ़ ये मीटिंग्स, लगता है
देश का विकास नहीं होने देंगी।
अब तो उठने में ही भलाई है ,
सरकार भी कहाँ देती है ओवर टाइम !
पत्नि जाने क्यों द्वार खोलने में
लगा रही है देर,
नादान ये भी नहीं जानती कि
पतिदेव थके हारे घर लौटे हैं।
चलो दफ्तर न सही, घर में ही
निपटाते हैं, काम !
आखिर , कॉपोरेट कल्चर अब
सरकारी काम में भी आ गया है।

 नोट : यह पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है। कृपया व्यक्तिगत रूप में न लिया जाये।


Wednesday, May 8, 2013

ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें --


कॉलेज के दिनों में खूब हँसते थे , गाते थे और मस्ती करते थे। दोस्तों में केंद्र बिंदु हम ही होते थे। डॉक्टर बनने के बाद भी यह क्रम जारी रहा। सब मित्र हमारे ही इर्द गिर्द रहकर सामंजस्य बनाये रखते थे। फिर कुछ वर्षों की दुनियादारी निभाने के बाद अस्पताल में नए लोगों से पाला पड़ा। यहाँ भी हमारे साथ हंसने हंसाने का दौर चलता रहा। कुछ लोग तो हमारे पास आते ही हंसने के लिए थे। जो कभी भी कहीं भी नहीं हँसते थे , वे हमारे साथ बैठकर हंसने का कोटा पूरा करते थे।

अक्सर देखने में आता है कि अधिकांश लोग हंसने में बड़ी कंजूसी करते हैं। हमारे एक मित्र , बाल रोग चिकित्सक , हमेशा परेशांन रहते। लेकिन हमारे पास आकर थोड़ी देर के लिए अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाते। फिर एक दिन दूसरे अस्पताल में विभाग अध्यक्ष बन गए। लेकिन अभी भी हाल वही , माथे पर सलवटें , चेहरे पर चिंता के भाव , कंधे झुके हुए, मानो जिंदगी का सारा बोझ वही ढो रहे हैं।

यहाँ ब्लॉगिंग में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं। हालाँकि ब्लॉगिंग करने का ध्येय सबका भिन्न हो सकता है , पसंद नापसंद भी भिन्न हो सकती है, लेकिन हास परिहास और आमोद प्रमोद के बिना ब्लॉग जिंदगी बड़ी सूनी सूनी सी लग सकती है। गत वर्ष हिंदी ब्लॉगर्स में काफी उथल पुथल हुई , कई लोग ब्लॉगिंग छोड़ फेसबुक की ओर हो लिए, कुछ ने नाता ही तोड़ लिया। कई धुरंधर माने जाने वाले ब्लॉगर्स की अनुपस्थिति से नए ब्लॉगर्स के विकास में बाधा उत्पन्न हुई।

ऐसे में एक ब्लॉगर बंधु ने फिर से माहौल को खुशनुमा बनाने की दिशा में प्रयास करना आरम्भ किया है जिसका प्रभाव भी दिखाई दे रहा है। ताऊ के नाम से प्रसिद्द श्री पी सी रामपुरिया का हास्य विनोद, ब्लॉगिंग को फिर से दिलचस्प बना रहा है। ताऊ कविता नहीं करते लेकिन उनकी कल्पना शक्ति किसी बड़े कवि से कम नहीं है। अक्सर लोग हैरानी में पड़ जाते हैं कि ताऊ के पास ऐसे खुरापाती आइडियाज आखिर आते कहाँ से हैं।


ताऊ पी सी रामपुरिया ( मुदगल ) : 


हिंदी ब्लॉगजगत में जब भी ताऊ का नाम आता है , मन में मौज मस्ती की जैसे धारा प्रवाहित होने लगती है। ताऊ की ब्लॉग पहेलियाँ सभी ब्लॉगर्स का ऐसा मानसिक व्यायाम कराती थी जैसे कोई ८१ खानों वाला क्रॉसवर्ड पज़ल करता है। एक चिकित्सक की दृष्टि से देखें तो यह एक्षरसाइज़ करने वालों को एल्ज़िमर्स डिसीज होने का खतरा कम से कम रहता है।

हालाँकि पिछले एक आध साल से ताऊ की ब्लॉगिंग सक्रियता पर ताई का अंकुश लगा रहा और ताऊ ''चैरिटी बिगिन्स एट होम '' के सिद्धांत का पालन करते हुए पूर्णतया ताई सेवा में लीन रहे जिससे पूरे ब्लॉग जगत में मायूसी सी छाई रही। लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ताई ने अब धर्म कर्म में व्यस्त होकर ताऊ पर से ब्लॉगिंग प्रतिबन्ध हटा दिया है और अब ताऊ पूर्ण रूप से स्पेनिश बुल की तरह बलमस्त होकर मैदान में कूद पड़ा है , बुल फाइटर्स को दिन में रंगीन तारे दिखाने के लिए।

ताऊ को देखा कहीं ! : 

ताऊ की एक ख़ास बात यह है कि आज तक उन्हें कोई पहचान नहीं पाया। हमें भी ताऊ से बस एक मुलाकात का अवसर मिला था लेकिन यह देखकर हैरान रह गए कि --

न टोपी , न पगड़ी 
न मूंछ , न दाढ़ी।  
न लट्ठ , न डंडा 
न ताबीज़, न गंडा।   
न बन्दर सी शक्ल , 
न छछूंदर सी अक्ल। 
न चेहरा काला ,
न गले में माला। 
न तन पर धोती, न चुनर,
न ताऊ, न ताऊ की उम्र। 
न देखा बुड्ढा खूंसट हठीला , 
दिखा एक बांका ज़वान सजीला।  


अक्सर हम ब्लॉगर्स स्वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने का भ्रम पाले रहते हैं। लेकिन ताऊ का प्रोफाइल पढ़कर हमारे तो ज्ञान चक्षु खुल गए और अब हम खुद को ज्ञानी समझने की भूल नहीं करते।

'' हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं !'' 

ताऊ अपना अमूल्य ज्ञान प्रदान करें या न करें , लेकिन एक बात निश्चित है कि बिना ज्ञान बघेरे भी ताऊ ब्लॉग जगत को अपने जिंदादिल लेखन से जीने की सही राह दिखा रहे हैं।

दो दिन की है जिंदगी, 
यूँ ही कट जायेगी ,  
कुछ रोने में, कुछ सोने में। 
जीने का मज़ा है ,  
जिंदादिल होने में।   

आइये ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें -- हम भी। 
सबके जीवन में समस्याएं होती हैं , कठिनाइयाँ होती हैं , लेकिन जो इनका सामना करते हुए भी माहौल को खुशनुमा बनाये रखे , उसे ताऊ कहते हैं।  


         

Friday, March 22, 2013

फॉसिल बनने की क्या जल्दी है--



कुछ समय से एक भी ब्लॉग पोस्ट नहीं लिख पा रहे हैं हम। सच तो यह है कि कोई आइडिया ही नहीं आ रहा। लगता है जैसे थॉट ब्लॉक हो गया है। पहले जहाँ नित नए आइडिया दिमाग में घूमते रहते थे, अभिव्यक्त होने के लिए मचलते रहते थे , वहीँ अब जैसे कहीं अटक से गए हैं। जोर लगाने पर भी कोई आइडिया नहीं आ रहा जिस पर कुछ लिखा जाये। ठीक वैसा हाल है जैसा  किसी प्रोस्टेट के मरीज़ का होता है कि पेशाब करने के लिए  जितना जोर लगाओ उतना ही अवरुद्ध होता है।

इसके कई कारण हो सकते हैं। जैसे काम में अत्यधिक व्यस्तता , ब्लॉगिंग में ब्लॉगर्स की रूचि कम होना या फिर फेसबुक की ओर सभी का झुकाव होना। बेशक काम बढ़ने से ज्यादा ध्यान उधर ही रहता है , इसलिए इधर कम हुआ है। ऐसा सभी के साथ हुआ लगता है। लेकिन यह ही सच है कि वे सब ब्लॉगर्स जो पहले ब्लॉग्स पर नज़र आते थे , अब फेसबुक पर वक्त गुज़ारा करते हैं।      

यह भी मानवीय प्रवृति ही है कि वह एक जगह ज्यादा देर तक नहीं टिक पाता। उसकी यही बेचैनी आखिर विकास में भी सहायक सिद्ध हुई है। निरंतर आगे बढ़ते रहने का नाम ही विकास है। जहाँ थम गए , समझो वहीँ जम गए। और जमने के बाद तो बस फॉसिल ही बनता है। फिर फॉसिल बनने की क्या जल्दी है !  


Sunday, March 10, 2013

फेसबुकिया ब्लॉगिंग और ब्लॉग पर फेसबुकिंग -- यही है ज़माने की चाल !


अब जब हमारे सभी ब्लॉगर मित्र बन्धु फेसबुक की ओर कूच कर चुके हैं, तो न चाहते हुए भी हम भी कुछ कुछ फेसबुकिया हो गए हैं। हालाँकि जो मज़ा यहाँ है , वह वहां कहाँ। इसलिए पिछले एक महीने में फेसबुक पर अलग अलग मूड और माहौल में जो कुछ चन्द पंक्तियाँ डाली, उन्हें यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है : 

फेसबुकिया क्षणिकाएं       

१)

२)

आज ---
सारी रात 
मेघा , गरजते रहे 
बरसते रहे ---
नयनों से 
फिर आज ,
सारी रात ---

Thursday, January 17, 2013

फेसबुक ने कर डाला ब्लॉगर्स का ब्रेन ड्रेन ---



आजकल एक पुराना हिंदी फ़िल्मी गाना बहुत याद आता है --

मैं ढूंढता हूँ जिनको , रातों को ख्यालों में 
वो मुझको मिल सके ना , सुबह के उजालों में। 

कुछ यही हाल हिंदी ब्लॉगिंग का हो रहा है। अभी ललित शर्मा जी की पोस्ट पढ़कर यही अहसास हुआ कि वास्तव में सभी जाने माने ब्लॉगर जिन्हें हम ब्लॉग पर ढूंढते ही रह जाते हैं , वे तो सारे के सारे फेसबुक पर बुक्ड और हुक्ड हैं। और हम खामख्वाह यहाँ माथाफोड़ी( यह एक राजस्थानी लफ्ज़ है ) कर रहे हैं। एक तो वैसे ही एक पोस्ट लिखने में घंटों ख़राब हो जाते हैं, फिर पढने वाले भी जब ज्यादा नहीं मिलते तो लो कॉस्ट बेनेफिट रेशो देखकर दम ख़म ही ख़त्म सा हो जाता है। दूसरी ओर फेसबुक पर देखिये। हर घड़ी एक पोस्ट -- नहीं अपडेट। आप जितने चाहो फ्रेंड्स बना लो , जितने चाहो अपडेट्स पढ़ लो। पढने के लिए भी कहाँ गज भर लंबे लेख होते हैं। बस एक या दो पंक्तियाँ , या वो भी नहीं। खाली तस्वीर से भी काम चल जाता है। और अपडेट करने के लिए भी न समय चाहिए , न विचार -- कहीं भी कुछ देखा , फोटो खींचा , और अपडेट कर दिया अपने मोबाइल से। और आपकी पोस्ट/ अपडेट पहुँच गया तुरंत आपके हजारों फ्रेंड्स के पास। अब आपके हज़ार दोस्तों में से सौ पचास तो अवश्य  निठल्ले बैठे ही रहते होंगे , जो तुरंत या तो लाइक का चटका लगा देंगे , या एक दो तुके बेतुके शब्द टाइप कर एंटर दे मारेंगे। और कुछ नहीं तो स्माइली तो रेडीमेड मिलती ही है।  

यह लाइक करने का खेल भी बड़ा दिलचस्प है। आपको बस इतना करना है कि अपडेट के नीचे लाइक इंग्लिश में कहाँ लिखा है, यह ढूंढना है। दिग्गज फेस्बुकिये इसे वैसे ही पहचान लेते हैं जैसे एक टाइपिस्ट बिना देखे कीबोर्ड की कीज को पहचान लेता है। इसके बाद तो दे दनादन लाइक करते जाइये। हो गया आपका सैकड़ों मित्रों के साथ सोशलाइजिङ्ग। यदि --न बोले तुम , न मैंने कुछ कहा -- वाली तर्ज़ पर  वार्तालाप करना है तो चैट का ऑप्शन बड़े काम का है। इसके लिए आपको कहीं जाने की ज़रुरत भी नहीं है। खुद ही चैट में दिलचस्पी रखने वाला आपको आपकी वॉल पर नज़र आ जायेगा। आपको तो बस उसका ज़वाब देना है। इसके बाद  आप जितनी भी उजूल फ़िज़ूल बातें करना चाहें , बस लिखते जाइये और चैट करते रहिये। विश्वास रखिये , आप कुछ भी लिख सकते हैं -- आपके और आपके मित्र के सिवाय कोई नहीं देख पायेगा, यह निश्चित है। वैसे यह जानते हुए भी कि जिस सुन्दर सी दिखने वाली लड़की की फोटो को देखकर आप रोमांचित और रोमांटिक हो कर चैट करते हुए अनाप सनाप लिखते जा रहे हैं , वह लड़की नहीं बल्कि कोई अधेढ़ उम्र का शैतान या कोई विकृत दिमाग का मालिक बुड्ढा भी हो सकता है , आप चैट का मज़ा लेने से बाज़ नहीं आते। यही फेसबुक की खूबी है जो अच्छे अच्छों को ज़मूरा बना देती है। 
    
फेसबुक की एक ओर खासियत है। यहाँ आपको पता चलता रहता है कि कौन कब क्या कर रहा है। कभी पता चलता है कि फलां फलां तो सोने चला गया , कभी पता चलता है कि अमुक अभी अभी सोकर उठा है। यहाँ तक कि कौन किस के साथ बैठा है , क्या खा रहा है -- यह सभी अपडेट होता रहता है। यह अलग बात है कि इन सब बातों से आपको क्या फर्क पड़ता है। लेकिन यदि आपको फर्क नहीं पड़ता तो आप मित्र कैसे ! और इस तरह फ्रेंड -- अन्फ्रेंड हो जाते हैं। कमाल की साईट है भाई ये फेसबुक भी। लोगों को जीने का अजीबो ग़रीब तरीका सिखा रही है। 


एक और बात जो फेसबुक में खास है , वह है अलग अलग पोज में नित नए फोटो खींचकर स्टेट्स पर डालकर चेहरे को तरो ताज़ा रखना। आत्ममुग्ध होना तो किसी भी इन्सान के लिए स्वाभाविक प्रवृति है। फेसबुक ने यह अवसर मुफ्त में दिया है जहाँ आप नित नए फोटो डालकर ,अपने मियां मूंह मिट्ठू बनने के इल्ज़ाम से बचते हुए सेल्फ प्रोमोशन कर सकते हैं। विशेषकर कवियों के लिए तो यह सुविधा बहुत काम की है क्योंकि हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी खूब जम जाता है। 

लेकिन यहाँ भी लेन देन का व्यापार धड़ल्ले से चलता है। यानि आपके स्टेटस को लोग तभी लाइक करेंगे , जब आप उनको करेंगे। यहाँ भी टिप्पणियों का उतना ही महत्तव है जितना ब्लॉग पर। लेकिन यहाँ उनकी संख्या बढ़ाना बड़ा आसान है। स्टेटस पर ही चैट करते जाइये , आपके स्टेटस पर सैंकड़ों टिप्पणियां इकठ्ठा हो जाएँगी। अब इससे आपको संतुष्टि मिलती है तो फेसबुक को धन्यवाद दीजिये। वैसे भी फेसबुक ने लाखों लोगों को रोजी रोटी प्रदान कर रखी है। 

हमारे देश की राजनीति में दल बदलना न कोई गुनाह है , न कोई शर्म की बात। यह अलग बात है कि अब इस पर अंकुश लगा हुआ है। लेकिन यहाँ तो वह डर भी नहीं . यानि आप जब चाहें , ब्लॉगिंग छोडकर फेस्बुकिया सकते हैं। आखिर हिंदी का विकास और प्रोत्साहन तो वहां भी हो ही रहा है। 

छोडो कल की बातें , कल की बात पुरानी।
नए दौर में बोलेंगे,  हम मिलकर बेजुबानी। 

जय जय फेसबुक। जय जय फेसबुक। 

नोट : यह पोस्ट सर्व साधारण के सन्दर्भ में लिखी गई है। इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं है। 



Thursday, September 6, 2012

टेढ़े मेढ़े रास्ते और मंजिल अभी दूर -- एक नए सफ़र पर .


अपनी पिछली पोस्ट पर श्री अरविन्द मिश्र जी ने ब्लॉगिंग से ब्रह्मचर्य रखने की बात कही थी . इस पर हमने टिपियाया -- लगता है आप और हम -- हम उम्र हैं . अब मिश्र जी कुछ समझे या नहीं , नहीं जानते लेकिन तात्पर्य यही था -- अब हमारा भी ब्लॉग ब्रह्मचर्य पालन करने का वक्त आ गया है .

एक दिन एक कोर्ट में एक डॉक्टर की हैसियत से बयान देते हुए डिफेन्स के वकील ने क्रॉस एक्सामिनेशन करते हुए अचानक सवाल किया -- डॉक्टर साहब , सुना है आप कवि भी हैं . हमने कहा -- वकील साहब , एक मुद्दत के बाद आप पहले इन्सान मिले हैं जिन्होंने हमें कवि भी कहा . वर्ना आजकल तो लोग कवि ही कहने लगे हैं , ये तो भूल से गए हैं की हम डॉक्टर भी हैं . जब से कवियों की संगति में रहने लगे हैं , तब से एक विसंगति उत्पन्न हो गई है -- हमारे डॉक्टर मित्र तो हमें कवि समझने लगे हैं , कवि मित्र हमें डॉक्टर समझते हैं , लेकिन हमारे अस्पताल के जो मरीज़ हैं , वे हमें ना डॉक्टर समझते हैं , न कवि . वैसे भी हमने देखा है -- एक सरकारी डॉक्टर को मरीज़ डॉक्टर समझते ही नहीं . अब देखिये एक दिन ओ पी डी में बैठ एक महिला को चेक किया और दवा लिख कर हमने कहा -- आप दवा खरीद लेंगी ? महिला बोली -- जी दवा खरीदनी होती तो आप के पास क्यों आते ! डॉक्टर के पास न जाते !

पिछले कुछ वर्षों से प्रशानिक कार्य करते हुए पब्लिक से बहुत रूबरू होना पड़ा . इस चक्कर में पब्लिक स्पीकिंग करना सीख गए -- मंच पर आने लगे -- कविता करने लगे -- आखिर एक दिन दिल्ली के लाफ्टर चेम्पियन का ख़िताब ही जीत लिया . फिर ब्लॉगिंग शुरू हो गई . लेकिन अब लगता है -- सब छूट जायेगा . सरकार ने हमारे सर पर ताज रखने का विचार बना लिया है . दिल्ली के एक बड़े नवनिर्मित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की देख रेख हमें सौंप दी है . अब दिन रात मेहनत कर हमें इसे चलाना है . अब कांटे चुभें या कीलें , हमने भी ताज सर पर रखना स्वीकार कर ही लिया है .

ज़ाहिर है , इसलिए अब ब्लॉगिंग के लिए समय शायद ही मिल सके . लेकिन अभी दुबई की सैर करवानी बाकि है , जो हम अवश्य कराएँगे .

Wednesday, May 2, 2012

क्या आप भी फेसबुकिया ब्लॉगिंग कर रहे हैं ?


पिछली पोस्ट में फेसबुक और ब्लॉगिंग पर जमकर चर्चा हुई . अधिकांश ब्लॉगर्स का यही मानना है -- फ़ेसबुक पर मौज मस्ती का माहौल ज्यादा रहता है जबकि ब्लॉग्स पर गंभीर और सार्थक लेखन किया जाता है . हालाँकि कुछ मित्रों का यह मानना है --फ़ेसबुक पर आपका लेखन आपके मित्रों की लिस्ट पर निर्भर करता है, जो सही भी है .

हमें तो मूल रूप से यही अंतर नज़र आया -- फ़ेसबुक फास्ट फ़ूड जोइंट की तरह है जहाँ तुरंत खाना परोसा जाता है लेकिन सेहत के लिए सही नहीं होता . जैसे लन्दन में होने वाले ओलंपिक्स को मैक डोनाल्डस स्पोंसर कर रहा है और वहां के डॉक्टर्स ने ऐतराज़ जताया है -- ओलंपिक्स को स्पोंसर , जंक फ़ूड खिलाने वाले क्यों कर रहे हैं ! इसी तरह फ़ेसबुक पर जंक मेटीरियल बहुत मिल जायेगा जिससे आपका हाजमा ही ख़राब होगा . फ़ेसबुक पर सार्थक लेखन उसी तरह अल्पसंख्या में हैं , जैसे देश में पारसी आबादी .

ब्लॉग्स पर सभी तरह का लेखन हो रहा है . अधिकतर लोग अपनी ओर से बढ़िया लिखने का प्रयास करते हैं . सभी तरह की सामग्री भी मौजूद है . लगभग हर विषय पर आपको कोई न कोई लेख , जानकारी या लिंक मिल जायेगा .

लेकिन जिस तरह फ़ेसबुक पर कुछ लोग अच्छा लिखने की कोशिश करते हैं भले ही अल्पसंख्यक हैं , उसी तरह ब्लॉगिंग में भी कुछ लोग यदा कदा ऐसे विषयों पर अनावश्यक बहस शुरू कर दते हैं जिससे पूरे ब्लॉगजगत का माहौल ख़राब हो जाता है .
आजकल जो एनोटोमिकल लेख या कवितायेँ पढने को मिल रही हैं , वे निश्चित ही सुस्वाद नहीं कही जा सकती . किसी ने एक कविता लिखी , मित्रों ने हाय तौबा मचा दी . मित्रों के मित्र अचानक शत्रु जैसे व्यवहार करने लगे .

ऐसे में टिप्पणियों का बहुत बड़ा महत्त्व होता है . विवादास्पद लेख पर एक बार तो सैंकड़ों टिप्पणियां आ जाएँगी . लेकिन विषय को लम्बा खींचने पर अधिकांश समझदार ब्लॉगर कन्नी काट जाते हैं . यह ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखकर ही पता चल जाता है , पोस्ट पसंद आई या नहीं .

ब्लॉगिंग में भी फ़ेसबुक की तरह मित्रों का एक समूह बन जाता है . फर्क सिर्फ यह है --फ़ेसबुक पर आप पहले मित्र बनाते हैं , फिर उनसे वार्तालाप होने लगता है . ब्लॉग पर धीरे धीरे एक दूसरे के लेखन से प्रभावित होकर पाठक आपस में मित्र बनते हैं . लेकिन जब कोई मित्र ही ऐसी पोस्ट लिख दे जिस से आप इत्तेफाक न रखते हों या सहमत न हों , तब क्या किया जाए ! सहमत आप हो नहीं सकते , निंदा करने से अक्सर लोग बुरा मान जाते हैं . ज़ाहिर है , कवियों की तरह ब्लॉगर भी अत्यंत संवेदनशील होते हैं . ऐसे में चुप रहना ही सही लगता है . हालाँकि इसे भी भी लोग कायरता की निशानी कहने लगते हैं . लेकिन चुप रहना या टिप्पणी न देना भी असहमति का सूचक है .

ज़रा सोचिये , आप ब्लॉगिंग क्यों करते हैं ?

* अपनी अभिव्यक्ति की तमन्ना को पूरा करने के लिए ?
* या ज्ञान बाँटने के लिए ?
* परोपकार या सामाजिक सेवा करने के लिए ?
* मित्र बनाने के लिए ?
* या टाइम पास करने के लिए ?

भई हम तो ब्लॉगिंग करते हैं -- डीस्ट्रेस (तनावमुक्त) करने के लिए . हमारे लिए तो यह एक मेडिटेशन जैसा कार्य है . इसीलिए प्रोफाइल में लिखा है --हँसते रहो , हंसाते रहो . जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव भगाते हैं . जो हंसाते हैं , वे दूसरों के तनाव हटाते हैं .

सभी मित्रों से यही अनुरोध है -- कृपया ब्लॉगिंग को फेसबुकिया न बनायें .

Friday, April 27, 2012

फेसबुक ने बदल दी है ब्लॉगिंग की तस्वीर ---


लम्बे सप्ताहांत पर लम्बे सफ़र की लम्बी दास्ताँ जारी रहेगी . हालाँकि अभी दो दिलचस्प किस्त बाकि हैं . लेकिन अभी लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक . ब्रेक के बाद आपको ले चलेंगे असली जंगल में .
इस बीच खुशदीप सहगल ने एक पोस्ट में लिखा -- हिंदी ब्लागिंग में इन दिनों मुझे खालीपन और भारीपन दोनों ही महसूस हो रहा है..खालीपन इसलिए कि मेरे पसंद के कुछ ब्लागरों ​ने लिखना बहुत कम कर दिया है...

खुशदीप भाई, दोस्तों ने लिखना कम नहीं किया , बल्कि पाला बदल लिया है . बल्कि यूँ कहा जाए -मित्र लोग अब पहले से ज्यादा वक्त लेखन में लगा रहे हैं . सुबह से लेकर शाम तक ---शाम से लेकर सुबह तक --लेखन ही कर रहे हैं . ज़रा देखिये तो :


थे
कभी ब्लॉगर जो , फेसबुकिया रहे हैं
छोड़ लेखन अब वो , मौनबतिया रहे हैं

चेहरे नए नए तब, प्रोत्साहित कर रहे थे
चेहरों पर नित अब , टैग टंगिया रहे हैं

रोज लिखते हैं इक , लेख दुनिया दरी पर
मोह टिप्पणी का भी , छोड़ एठियाँ रहे हैं

शाम ढल जाये या , रात बीते सुबह हो
भोर से संध्या तक , खबर छपिया रहे हैं

कौन कब जागा , कब नींद आई रतीयाँ
हाल हर पल का, सब ओर जतिया रहे हैं

चैट करते हैं जो , फेसबुक पर घंटों तक
ब्लॉग पढने का, तज मोह खिसिया रहे हैं

राह में देखे जो , 'तारीफ' राही अनेकों
कोइ रोते से , कुछ रंगरसिया रहे हैं


क्या आपको भी लगता है -- ब्लॉगर्स में ब्लॉगिंग का मोह भंग हो चुका है ?
क्या फेसबुक ने ब्लॉगिंग की तस्वीर बदल दी है ?