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Tuesday, August 12, 2025

ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है ...

 जन्मदिन पर दोस्तों की दुआएं हों,

और अपनों का साथ हो,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बच्चे केक मंगवाएं,

और केक काटने में पत्नी हाथ बंटाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बेटी विदेश से फूल भिजवाए,

और एक प्यार सा संदेश पहुंचाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


पुत्र केक खिलाए, पुत्रवधू फोटो खींचे,

और पत्नी केक खिलाकर गाल पर केक लगाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


वर्षों के साथी डॉक्टर, ब्लॉगर, और कवि मित्र साथ हंसें मुस्कुराएं,

और जिंदगी सत्तरवें साल में प्रवेश कर जाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है। 

Monday, November 4, 2024

दीवाली, नए रूप में ...

 दीवाली पर्व था मिलने मिलाने का,

खाने पीने, उपहार देने और पाने का। 

किंतु दीवाली अब डिजिटल हो ली है,

उपहार की जगह अब बधाईयों ने ले ली है,

जो प्रत्यक्ष नहीं अब आभासी हो गई हैं। 

व्यक्तिगत नहीं, वो सामूहिक हो गई हैं। 


ना कार्ड ना ई मेल ना एस एम एस करके 

बस वॉट्सएप ग्रुप्स में आती हैं भर भर के।

ग्रुप में पांच दस हों या मेंबर हों सौ पचास कहीं,

बधाई देते हैं सब, पर लेता कोई एक भी नहीं। 

जब कोई नहीं इसको लेता है,

फिर जाने क्यों कौन किसको देता है।


ऐसा हो गया है हाल, 

मानो चरितार्थ हो गई ये कहावत,

कि नेकी कर कुएं में डाल। 

कौन देखता है किसने दी किसने नहीं दी,

किसने देखा और किसने अनदेखी की। 

यह न कोई देखता है, न देखने की जरूरत है,

इस डिजिटल युग में इंसान की यही असली सूरत है। 

Monday, September 30, 2024

हाय रे बुढ़ापा...

 वज़न घटा, पके आम से पिचके गाल, 

देख आइने में खुद का हाल घबराने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा इतराने लगे हैं। 


रफ्ता रफ्ता सर के बाल हुए हलाल,

बचे खुचे सूरजमुखी से बिखरने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा निखरने लगे हैं। 


सूखी फसल बालों की, बची खरपतवार,

उसे भी खिज़ाब से काला कर बंदर लगने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा सुंदर लगने लगे हैं। 


मुंह में बचे दांत नहीं, ओरिजिनल आंख नहीं, 

खामख्वाह हरदम जवां होने का दम भरने लगे हैं,

पर पत्नी कहती है,अब आप ज्यादा हैंडसम लगने लगे हैं। 


दिल्ली को छोड़, बने हरियाणा के हरियाणवी,

अक्ल से और शक्ल से हरियाणवी जाट दिखने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा स्मार्ट लगने लगे हैं। 


ना काम ना धाम, करते बस आराम ही आराम,

अपनी मर्ज़ी से खाते पीते और सोते जगने लगे हैं,

पत्नी कुछ भी कहे, हम फ़ाक़ामस्ती में मस्त रहने लगे हैं। 


बिना रोज लड़े पत्नी से अब तो भूख भी नहीं लगती,

पर जो पहले नहीं किया उसका इजहार करने लगे हैं, 

जीवन के पतझड़ में पत्नी से ज्यादा प्यार करने लगे है। 






Sunday, January 28, 2024

ये सिक्योरिटी चेक वाले...

 हर बार निकल जाती थी, इस बार नहीं निकली,

अटक गई। 

वो गोरी गोरी, लंबी सी जर्मन छोरी, हमारी शेविंग क्रीम झटक गई। 

किफायत का सौदा था, उसमे डिस्काउंट का 33% माल ज्यादा था,

फिर पुराने को छोड़कर, हमने केबिन बैग भी नया नया खरीदा था। 

सुंदर सुघड़ था और उसका डिजाइन भी निराला था,

बस इसी नए डिजाइन ने हमें दुविधा में डाला था। 


यूरोप में सिक्योरिटी चेक में बड़ी मारामारी सहन करनी पड़ती है,

घड़ी, पर्स ,मोबाइल , जूते और बेल्ट तक भी उतारनी पड़ती  है। 

फिर हाथ फैलाकर वे यहां वहां जाने कहां कहां से हाथ निकालते हैं,

बिना बेल्ट के लोग बड़ी मुश्किल से खिसकती पैंट को संभालते हैं। 


इधर सिक्योरिटी जेनटलमेन की जांच खत्म हुई तो हमने खुद को संभाला,

जैसे तैसे ओरिजनल रूप में आए और शर्ट को पेंट में डाला। 


फिर शुरू हुई बैग की तलाश, जब बैग कहीं नज़र नही आया,

और एक सरदारजी को हमे हमारे बैग जैसा बैग थामे पाया। 


तो हमने कहा पा जी कित्थे चले, साड्डा बैग ते छड़ते जाओ,

वो बोला ओए केड़ा बैग, ए ते साड्डे पिंड वाला बैग है बादशाहो। 

तभी सिक्योरिटी वाली लड़की एक बैग को अल्टी पलटी मारती दी दिखाई,

हमने बैग को पहचाना तो सोचा लगता है कोई नई मुसीबत आई। 

हमने डरते डरते कहा मैडम क्या बैग में कोई फजीहत  हो गई,

वो बोली आपकी तो नहीं, परंतु हमारी ज़रूर मुसीबत हो गई। 

डिटेक्टर का सेंसर बार बार आपके बैग में प्रॉब्लम दिखा रहा है, 

पर प्रॉब्लम क्या है कहां है, ये बिलकुल समझ में नहीं आ रहा है। 

आखिर उसके गोरे पर निर्भाव चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई,

जब कपड़ों के बीच हमारी शेविंग क्रीम उसके हाथ आ गई। 


बोली इसका वजन सवा सौ ग्राम है, ये प्लेन में नहीं जा पाएगा,

हम सोचने लगे कि 25 ग्राम एक्स्ट्रा से प्लेन कैसे भारी हो जाएगा। 


हिम्मत कर हमने कहा मैडम, 25 ग्राम को निकाल दें तो चलेगा,

वो बोली निकाल कर तो देखो, अभी 100 यूरो का चालान कटेगा। 


और इस तरह हमारी नई शेविंग क्रीम हमारे देखते देखते फिसल गई,

उस जर्मन छोरी के हाथों हमारी शेविंग क्रीम हमारे हाथों से निकल गई। 


Saturday, January 20, 2024

सर्दियों के दिन ...

 सर्दियों के दिन, हैं बहुत कठिन,

कास्तकार लोगों के जीने के लिए।


धोबी का लड़का रोज पूछता है,

कपड़े हैं क्या प्रैस करने के लिए।


कपड़े भी ऐसे हैं कि फटते ही नहीं,

दर्जी भी पूछे, हैं क्या सीने के लिए। 


ना कोला, ना शरबत, ना ही ठंडाई, 

एक चाय ही काफ़ी है पीने के लिए। 


बैठे बैठे खाते रहते हैं मूंगफली रेवड़ी,

कोई काम नहीं होता पसीने के लिए। 


सर्दियों का मौसम होता स्वस्थ मौसम, पर 

कामवालों के लाले पड़े रहते जीने के लिए।

Friday, January 12, 2024

ग्लोबल वार्मिंग और बदलता मौसम...

 दिल्ली में दिसंबर गर्म है, और शिमला भी सूखा है,

बिना स्नोफॉल कनाडा का, क्रिसमस भी रूखा है। 


कोहरा है, धुंध है, आसमान का रंग भी गहरा है,

घर बैठे हैं, बाहर धीमी धीमी बारिश का पहरा है। 


बारिश की फुहारें भी अदृश्य है, दिखाई नहीं दे रहीं,

बूंदें नवजात शिशु के नर्म स्पर्श सा बस अहसास दे रहीं। 


झील का पानी शांत है, ना कोई बोट ना पानी की कलकल है,

सड़कें वीरान हैं, ना गाड़ियों का शोर है ना हवा में कोई हलचल है।


सुना है पहली बार दिसंबर बिना स्नोफॉल निकल रहा है,

एक चेतावनी है समझो तो, विश्व का मौसम बदल रहा है। 


पृथ्वी की सतह का तापमान हर साल बढ़ता जा रहा है,

लगता है जैसे इस प्लेनेट का अन्तकाल निकट आ रहा है। 


पता चला है पृथ्वी पर 1.3 मिलियन बिलियन मनुष्य रह सकते हैं,

यानि अभी हम और दो लाख गुणा लोगों का बोझ सह सकते हैं। 

किंतु वो जिंदगी भी क्या होगी जब चप्पे चप्पे पर जिंदगानी होगी,

प्राकृतिक संसाधन सब खत्म होंगे, आदिकाल सी कहानी होगी।  


आओ आपसी भेद भाव को भूलकर सब एक जुट हो जाएं,

सब मिलकर करें विचार और धरा को बेवक्त बर्बादी से बचाएं। 


Wednesday, January 3, 2024

विविधता में समानता ...

 अनेक देश, अनेक रेस, 

अनेक सूरतें हैं धरा पर।

पर एक ही मूल रूप है, 

इंसान का हर जगहां पर। 

अलग खान पान, रहन सहन, 

अलग हैं रीति रिवाज।

पर एक ही हैं प्रकृति के 

पांच तत्वों की आवाज़। 

सभी सोते हैं जागते हैं, 

खाते हैं, पीते हैं, 

अपनी अपनी जिंदगी जीते हैं। 

वही भावनाएं, वही संवेदनाएं,

वही गम, वही खुशियां। 

वही दर्द, वही चैन। 

सब कुछ एक जैसे ही तो दिखते हैं। 

फिर क्यों इंसान ने खुद को

बांट लिया है,

रंग, मजहब और सरहदों की दीवारों से। 

कुदरत नहीं करती कोई भेद भाव,

नहीं देखती देश, धर्म और रेस,

जब वो कहर बरसाती है।

फिर क्यों इंसान की फितरत 

कुदरत से टकराती है। 

ये हसीन फिजाएं कुदरत का तोहफ़ा है,

इसे व्यर्थ ना गवाएं,

इंसानियत को समझें, 

आपस में ना टकराएं। 

सब मिलकर पर्यावरण की करें रक्षा,

और विश्व को बेवक्त बर्बादी से बचाएं। 

यही हैं हमारी,

नव वर्ष की शुभकामनाएं। 



Thursday, November 16, 2023

कोरोना हो या हो ना...

 

एक जगह मास्क और सेनेटाइजर 

एक साथ बैठे थे,

दोनों उदास थे जाने किस टेंशन में ऐंठे थे। 

तभी मास्क बोला, 

यार ये कैसी ज़लालत हो गई है, 

अपनी तो एक सेवानिवृत कर्मचारी जैसी 

हालत हो गई है।

अब ना कोई हमें पूछता है, ना मुंह लगाता है,

ना कोई पार्टी या शादी में साथ लेकर जाता है। 

जब अपनी गर्ज थी 

तब मुंह पर लपेटना मंजूर था,

अब मतलब निकल गया तो 

हमारी ओर कोई नहीं ताकता है। 

इस खुदगर्ज इंसान को यही समझाना है,

कि कोई दूसरा आया तो फिर हमे ही मुंह लगाना है। 


सेनेटाइजर बोला,

अब हमे भी कोई हाथ नहीं लगाता है, 

जाने कैसे काम चलाता है। 

जब कोरोना से डरता था, 

तब दिन में पचास बार हाथ मिलाता था। 

पिंक हैंड रब से हैंड्स रब कर कर के

हैंड्स भी पिंक हो जाते थे,

घर में रहें या बाहर या जाएं दफ्तर

हमे जेब में बिठाकर साथ ले जाते थे। 

अब कोई हाथ तक नहीं लगाता,

ये बेरुखा व्यवहार हमें बिलकुल नहीं भाता। 


तभी वहां पर चलता हुआ 

ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर आ गया,

उन दोनों की बातें सुनकर सकपका गया।

बोला, हमें तो विदेशी भारतीयों ने 

बड़े प्रेम से समझाया था,

देश प्रेम में पड़कर 

समाज सेवा के लिए देश भिजवाया था।

पर जब से आए हैं, बंद डिब्बों में कैद पड़े हैं,

अब तो अपना भी सांस घुटने लगा है,

क्योंकि हमारे चेहरे पर धूल के अंबार चढ़े हैं। 


लगता है इंसान की तो आंखें ही बंद है,

या फिर कलयुगी इंसान की बुद्धि जरा मंद है। 

हरे भरे पेड़ों से भरे जंगलों को छांट रहा है,

नादान ये भी नहीं जानता कि

जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। 


माना कि मास्क और सेनेटाइजर की तरह 

हम प्रिवेंटिव नहीं, क्यूरेटिव हैं,

आम जन नहीं केवल रोगियों के लिए इफेक्टिव हैं।

किंतु गर बचाव पर नहीं दिया ध्यान, तो ए इंसान,

निरोग कोई नही होगा, सब रोगी हो जायेंगे,

तब हम ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर ही याद आयेंगे। 


इसीलिए कहते हैं भैया, कोरोना हो या हो ना,

सेनेटाइजर का करो सदा इस्तेमाल 

और मुंह पर मास्क लगाओ,

पर्यावरण की रक्षा करो और पेड़ों को कटने से बचाओ। 

फिर ना कोरोना का रोना होगा 

और ऑक्सीजन भी मिलेगी pure,

आखिर डॉक्टर्स सच ही तो कहते हैं,  

prevention is better than cure....


Thursday, December 1, 2022

वो भी इक दौर था ...

 कभी दो कमरों में रहता था छह जनों का परिवार,

अब छह कमरों के मकान में दो जनों का ठौर है। 

घर में बच्चे बड़े और बुजुर्ग मिल जुल कर रहते थे,

अब बुजुर्गों के अलावा घर में रहता न कोई और है। 

जो गुजर गया वो भी इक दौर था, ये भी इक दौर है। 


कुएं का मीठा पानी पीते, लेते स्वच्छ वायु में सांस,

अब RO का नकली पानी, हवा में धुआं घनघोर है। 

वहां हरे भरे खेतों की पगडंडी पर मीलों तक चलना,

यहां जिम की घुटन में ट्रेड मिल पे चलने पर जोर है। 

शुद्ध सा वो भी इक दौर था, अशुद्ध ये भी इक दौर है। 


ब्याह शादियों में समुदाय का शामिल होना था जरूरी,

अब वॉट्सएप ज़माने में शादी के न्यौते भी कमजोर हैं। 

चौपाल में बुजुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ लगती थी मधुर,

अब वॉट्सएप फेसबुक में सबके जीवन की डोर है।

मस्त मस्त वो भी इक दौर था, पस्त ये भी इक दौर है।

Wednesday, October 19, 2022

विदेश की चमक धमक में इंसान अकेला ...

अकेले दुकेले मिलते हैं, वे फैमिली के झमेले नहीं मिलते,

अकेले दुकेले जो मिलते हैं, वे हम जैसे वेले नहीं मिलते।


थैंक्स और प्लीज़ कहने की तहज़ीब है इस कदर कि,

मीठे केले तो मिलते हैं, पर वो कड़वे करेले नहीं मिलते।


सड़कों पर गाड़ियों की रैलियां तो निकलती है रात दिन,

पर शहर की गलियों में नर नारियों के रेले नहीं मिलते। 


सुख समृद्धि के सभी साधन हैं यहां सभी को मुहैया,

पर वे होली और दशहरा दीवाली के मेले नहीं मिलते।


हाथ में मोबाइल और कान में ईयर फ़ोन लगा 'तारीफ',

अकेले हैं पर साथ बैठ गपियाने वाले अकेले नहीं मिलते। 



Sunday, June 12, 2022

एक लेखक की व्यथा --


फेसबुक पर फेसबुकी 

कवितायेँ लिखते लिखते, 

रामलाल को हो गया गुमान। 

कि अपुन तो लेखक बन गए महान।   

फिर एक दिन हिम्मत करके 

पत्नी के गुल्लक से पैसे निकाले, 

और कर दिए हिम्मत लाल प्रकाशक के हवाले।  

 

सीना २४ इंच से बढ़कर २५ इंच का हो गया, 

जब छपकर हाथ में आ गई किताब। 

सोचा अब तो साहित्य रत्न का 

लेकर रहेंगे खिताब।    

फिर जितने भी मिले बाल लाल पाल,

सबको बाँट कर सोचा , 

लो जी हम भी साहित्य में हो गए मालामाल।   

 

एक रात 

साहित्यकार श्यामलाल से हो गई मुलाकात, 

बात बात में रामलाल ने कहा

श्यामलाल , 

कैसा है हाल चाल ?  

पढ़ी ? 

वो बोला क्या ? 

रामलाल ने कहा, किताब।  

वो बोला ज़नाब,  अभी कहाँ पढ़ी है, 

अभी तो जो पुस्तकें मेले में खरीदी थी, 

वही अलमारी में बंद पड़ी हैं।  

आजकल पढ़ने लिखने का 

वक्त ही कहाँ मिल पाता है।  

फिर कॉम्प्लिमेंट्री का नंबर तो

बड़ी मुश्किल से  ही आता है।    

 

 फिर एक दिन 

मिल गए प्रॉफेसर प्यारेलाल,

बिन पूछे ही हाल चाल

कर दिया वही सवाल, 

कि पढ़ी ? 

सुनते ही प्रॉफेसर ने लगा दी बहानों की झड़ी। 

बोले अभी लेक्चर कई लेने हैं,   

दो साल से पड़े पेपर्स जर्नल्स में देने हैं।  

एग्जाम पास आ रहे हैं, 

अब आप ही बताइये ज़नाब, 

कि पी जी की थीसिस पढ़ें या आपकी किताब।   

 

चार महीने बाद भी 

किताब तो मोहन लाल ने भी नहीं पढ़ी थी, 

पता चला कि 

उन पर एक अजीब मुसीबत आन पड़ी थी।  

बड़े सरकारी अफ़सर हैं पुरजोर , 

पर आजकल हाज़मा बिगड़ा हुआ है, 

टॉयलेट में घंटों लगाना पड़ता है जोर।  

रामलाल बोले, भाई साहब

ज़रा कम खाया करो, 

भला इतना पेट क्यों भरते हैं ।  

वैसे बड़े अफ़सर तो अक़्सर ,

टॉइलेट में बैठकर ही पढ़ा करते हैं।    

 

किताब तो नेता नत्थूलाल

ने भी बड़े शौक से ली थी। 

फिर संभाल कर घर पर रख दी थी। 

लेकिन आज तक भी नहीं पढ़ी थी।

याद दिलाया तो बोले,

भैया आजकल वक्त ही नहीं निकल पाता है। 

जब भी पढ़ने की सोचते हैं,

कोई न कोई चुनाव निकल आता है। 

 

 

काका किशनलाल तो काम में 

इस कदर रहते हैं मशगूल।  

कि किताब का नाम ही गए भूल । 

आलसी तो ऐसे कि 

सारे काम पड़े रहते हैं अधूरे, 

उस पर भुलक्कड़ हैं पूरे। 

एक दिन सारी किताबें कबाड़ी को दे आये,

फिर बड़े घबराए, 

क्योंकि बहुत बड़ा कबाड़ा कर आए थे।  

रामलाल की किताब के साथ साथ 

अपनी पत्नी की किताबें भी कबाड़ी को दे आये थे।  

 

 

दोस्तो, 

लेखन लेखक का जुनून होता है, 

वह जब भी खाता पीता 

जागता सोता है। 

मन में विचारों का ताँता लगा रहता है, 

लेकिन दिल में बस 

यही कामना रखता है।  

कि लोग उन्हें पढें, 

तारीफ़ करें या गलतियां निकालें, 

पर उसकी धरोहर को संभालें ।

क्योंकि एक दिन लेखक तो चला जाता है, 

पर उसका वज़ूद उसकी किताब में रह जाता है।      

 

 

 

 

Friday, February 4, 2022

इंसान खुद निष्काम हो गया --


    इंसान ने अपने आराम के

सभी संसाधन तो बना लिए,

लेकिन खुद बेकाम हो गया।


इसीलिए बी पी शुगर मोटापा

जैसे जीवन शैली रोगों का,

मानव शरीर गुलाम हो गया।


पहले गांवों में लोग काम पर

जाते थे मीलों पैदल चलकर,

अब पैदल चलना भी एक काम हो गया।


और पार्क में पैदल चलकर तो हम

कैलरीज जलाते हैं, पर पार्क जाने को

कार का इस्तेमाल करना आम हो गया।


Wednesday, December 1, 2021

कितना बदल गया संसार --

 कभी दो कमरों में छह जनें रहते थे,

अब छह कमरों में दो जनें रहते हैं। 


घरवाले तकलीफ़ तब भी सहते थे,

घर के बुजुर्ग दुखी अब भी रहते हैं। 


मकां छोटा था पर दिल बड़ा रखते थे,

अब मकां बड़े और दिल छोटे दिखते हैं। 


रोज शाम सब हिल मिल कर हँसते थे,

अब पार्क में हँसी भी नकली हँसते हैं।


डिग्री नहीं पर ज्ञान का भंडार रखते थे,

अब ज्ञानविहीन डिग्री का भार रखते हैं। 


रोज सुबह बुजुर्गों का आशीष प्राप्त करते थे,

अब दूर बैठे व्हाट्सएप्प पर हैलो हाय करते हैं। 


दो चार बच्चे सदा मां बाप के पास रहते थे, 

अब उनके दिल में खाली अहसास रहते हैं। 


तब अभावों में भी ख़ुशी का भाव रखते थे, 

अब विकास में भी मन में तनाव रखते हैं।   


Wednesday, November 24, 2021

ज़िंदगी का सफ़र, अविरल अनवरत --

 

ज़िंदगी का सफ़र 

वक्त के वाहन पर होकर सवार 

चलता जाता है अविरल, अनवरत।  

सफ़र की पगडंडी में 

आते हैं कई मोड़।  

हर एक मोड़ पर 

दिखती है एक नयी डगर।  

अंजानी डगर पर लगता है 

अंजाना सा डर। 

एक राह से पहचान होती है 

कि फिर आ जाता है एक मोड़।  

और एक नयी अंजान डगर,  

आगे बढ़ने के लिए 

अंजानी मंज़िल की ओर। 

मन करता है मुड़कर देखना 

पीछे छूट गये 

पहचाने रास्ते की ओर। 

लेकिन जीने के लिए चलना पड़ता है 

आगे ही आगे, अविरल, अनवरत।  


राहों की तरह ज़िंदगी की मंज़िल भी 

अंजानी होती है।  

फिर भी चलना ही पड़ता है 

अविरल, अनवरत। 

इसी अंजाने सफ़र का नाम जिंदगी है।  



Wednesday, June 30, 2021

घर आना कभी --

मिलते हैं
वो जब कभी,
कहते हैं,
घर आना कभी।
कहते हैं
हम भी वही,
तुम भी
घर आना कभी।
ना वो आते कभी,
ना हम जाते कभी,
वो "कभी"
नही आता कभी।
यही है हाल
ज़माने का अभी।

Thursday, October 15, 2020

पत्नी और कविता --

 

एक दिन एक महिला बोली, 

आप पत्नी विषय पर कविता क्यों नहीं सुनाते हैं ! 


हमने कहा हम पत्नी पर कविता लिखते तो हैं, 

पर सुनाने से घबराते हैं।  


एक बार पत्नी पर लिखी कविता पत्नी को सुनाई , 

गलती ये हुई कि अपनी को सुनाई।  


उस दिन ऐसी मुसीबत आई कि हमें घर छोड़कर जाना पड़ा , 

और सारा दिन फुटपाथ पर बिताना पड़ा। 


तब से हम पत्नी विषय पर कविता तो सुनाते हैं , 

पर अपनी को भूलकर भी नहीं सुनाते हैं।   

  

Thursday, January 31, 2019

जब अपना खाना खुद ही बनाना पड़ा --


एक दिन एक महिला बोली ,
डॉक्टर साहब,
आप पत्नी पर कविता
क्यों नहीं सुनाते हैं।
हमने कहा , हम लिखते तो हैं ,
लेकिन पत्नी को सुनाने से
घबराते हैं।
एक बार हमने,
पत्नी पर लिखी कविता,
पत्नी को सुनाई।
गलती ये हुई कि,
अपनी को सुनाई।
उस दिन ऐसी मुसीबत आई ,
कि हमें
घर छोड़कर जाना पड़ा।
और तीन दिन तक
अपना खाना,
खुद ही बनाना पड़ा।
तब से हम पत्नी पर लिखी
कविता तो सुनाते हैं ,
लेकिन भूलकर भी
पत्नी के सामने नहीं सुनाते हैं।  

Thursday, October 4, 2018

एक दिल , कई अफ़साने :


दिल धड़कता है तो समझो,
जीवन का संचार है।

दिल जोर से धड़कता है तो समझो,
किसी से हुआ प्यार है।

दिल फड़फड़ाता है तो समझो, 

बंदा दिल का बीमार है।

दिल धड़कना बंद कर दे तो 

बाय बाय नश्वर संसार है।

दिल बड़ा नाज़ुक होता है ,

ये सदा टूटने को तैयार है।

दिल का रखो पूरा ध्यान, 

यही तो जीवन का आधार है।

Thursday, July 5, 2018

न जाने क्यों ---


न जाने क्यों ,
बारिश का मौसम है , पर बरखा नहीं आती !
बदल तो आते हैं पर , काली घटा नहीं आती।

न जाने क्यों ,
आंधियां चलती हैं पर , अब पुरवाई नहीं चलती,
मौसम बदलता है पर , अब तबियत नहीं मचलती।  

न जाने क्यों ,
आसमान दिखता है पर , अब नीला नज़र नहीं आता।
जंगल है ये कंक्रीट का , यहाँ कोई मोर नज़र नहीं आता।     

न जाने क्यों ,
लाखों की भीड़ है , पर इंसान अकेला है।
मकां तो शानदार है , पर घर इक तबेला है।

न जाने क्यों ,
विकास तो हुआ है , पर हम विकसित नहीं हुए।
स्कूल कॉलेज अनेक हैं , पर हम शिक्षित नहीं हुए।
  
न जाने क्यों ,
धर्म के चक्कर में , हम अधर्मी हो गए।
इंसानियत को भूले , और हठधर्मी हो गए।  

न जाने क्यों ,
हम समझदार तो हैं , पर ये बात समझ नहीं पाते।
एक दिन खाली हाथ ही जाना है, छोड़ के धन दौलत और रिश्ते नाते। 

फिर भी न जाने क्यों ,
हम व्यस्त हैं,  अस्त व्यस्त होने में।
और मस्त हैं ,  मोह माया का बोझ ढोने में। 
न जाने क्यों , न जाने क्यों !




Monday, July 17, 2017

एक कविता ऐसी भी ---


घर में ऐ सी , दफ्तर में ऐ सी ,
गाड़ी भी ऐ सी।
ऐ सी ने कर दी , 'डी'  की ऐसी की तैसी !

चाय का पैसा , पानी का पैसा ,
चाय पानी का पैसा।
जब सब कुछ पैसा , तो ईमान कैसा !

ना जान , ना पहचान ,
बस जान पहचान।
जब यही समाधान , तो कैसा इम्तिहान !

वधु बिन शादी , शादी बिन प्यार ,
बिन शादी के लिव इन यार।
जब ऐसा व्यवहार , तो व्यर्थ संस्कार !

यार मतलब के , मतलब की यारी ,
बिन मतलब के रिश्ते भी भारी।
मतलब ने मति मारी, विमुख दुनिया सारी !  

भ्रष्ट इंसान , रुष्ट भगवान ,
तो बलिष्ठ तूफ़ान।
फिर ध्वस्त मकान , नष्ट सुन्दर ज़हान !

हिन्दू , सिख , ईसाई,  ना मुसलमान ,
बनो इंसान , रखो ईमान।  
फिर जीवन आसान , बने देश महान !