Monday, September 28, 2009

और नही , बस और नही ---

पिछले एक महीने में मैंने अपनी ज्यादातर पोस्टों में दिल्ली और दिल्लीवालों के व्यवहार के बारे में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। लेकिन जिस तरह का माहौल ब्लॉग जगत में चल रहा है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है की ---और नही, बस और नहीं बहुत लिख लिया देश सुधार के बारे में। बस टाइम पास करो और खुश रहो।



अपने ब्लॉग का हाल तो दिल्ली के मॉल्स जैसा लगता है। फुट्फाल्स तो बहुत होते हैं, लेकिन कन्वर्जन रेट वही १० से १५ % ही है। यानि पढ़ते तो बहुत लोग हैं, लेकिन टिपण्णी देने का कष्ट कुछ लोग ही करते हैं। अब मॉल्स की बात तो समझ आती है , लेकिन टिपण्णी देने में तो एक पैसा भी नही लगता। ये अलग बात है की समय की भी कीमत होती है। इसलिए जितने भी साथियों ने इसके लिए अपना कीमती समय निकला, मैं उनका आभारी हूँ।



पिछली दो पोस्ट्स में मैंने दिल्ली की बुराइयों और अच्छाइयों को उजागर करने की चेष्टा की है। जैसा की अपेक्षित था, इस विषय पर बात करने में बुकेस कम और ब्रिक्बेट्स मिलने का चांस ज्यादा था। और वही हुआ भी। वैसे भी इस विषय पर तो हमारे नेताओं तक को नही बख्शा गया फ़िर हम क्या चीज़ हैं।



खैर जिन लोगों ने अपने विचार प्रकट किए , उनमे से कुछ का उल्लेख मैं यहाँ करना चाहूँगा।



दिल्ली में रहने वाले निशांत का कहना है की दिल्ली वाले बड़े बदतमीज़ है और बस आलू चाट और कुलचे छोले खाना जानते हैं। भाई निशांत, खाने के शौक तो सब के अलग होते हैं, इस में बुराई भी क्या है।



खुशदीप भाई ने तो दिल्ली को दिल में बसा लिया है, क्योंकि ये उनके दराल सर की दिल्ली हैं। ज्येष्ठ भ्राता स्नेह और सम्मान की ऐसी मिसाल कहीं और मिल सकती है क्या। लेकिन खुश भाई, यार ये सर मत कहा करो। सर कहने से मन पर जिम्मेदारियों का बोझ दस गुना बढ़ जाता है।



रायबरेली के फिजिसियन डॉ अमर कुमार को दिल्ली, नेताओं का लक्ष्य नज़र आती है। डॉ साहब आंशिक रूप से सही कह रहे हैं। लेकिन केन्द्र बिन्दु के इलावा ३६० डिग्री व्यू से अगर देखें तो दिल्ली के बहुमुखी रूप नज़र आयेंगे।

डॉ अमर कुमार का ब्लॉग जगत में काफी नाम है और मैं तो हैरान होता हूँ की डॉ साहब ब्लोगिंग के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं। वैसे इस क्षेत्र में मेडिकल डॉक्टर तो गिने चुने ही हैं। डॉ अमर के इलावा मैं तो अभी तक डॉ अनुराग और डॉ श्याम से ही परिचित हुआ हूँ।



मेरा और डॉ अनुराग का सम्बन्ध तो ठीक वैसा है जैसा मेरा और शाहरुख़ खान का। हाँ, डॉ श्याम से दो तीन बार वार्तालाप ज़रूर हुई है।



हृषिकेश की सुनीता शर्मा जी, दिल्ली के बारे में क्या कहना चाहती हैं, ये तो मेरी समझ में नही आया। इतना ज़रूर समझ में आया की सुनीता जी शायद मेरी बात को समझ नही पायी। आगे से ध्यान रखूंगा।



डॉ श्रीमती अजित गुप्ता जी को दिल्ली बहुत मनभावन लगी। धन्यवाद , आपका स्वागत है। श्री समीर लाल जी, बबली जी, शोभना जी, पं डी के वत्स जी, और निर्मला कपिला जी को दिल्ली के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिली। आप सब महानुभव दिल्ली से बाहर रहते हैं और दिल्ली भारत की राजधानी होने के नाते दिल्ली से लगाव रखते हैं ,आप सबका आभार।



अनाम लोगों के बारे में क्या कहें।



कुल मिलाकर ऐसा लगता है की बस अच्छा अच्छा लिखो, क्योंकि लोग बस अच्छा ही देखना, सुनना और पढना चाहते हैं। यहाँ अच्छा से मतलब बाहरी सुन्दरता से है. वैसे भी जिंदगी में इतनी परेशानियां है की और बातों पर दिमाग पर जोर डालने के लिए किस के पास टाइम है.


तो भई, आज के बाद हम भी बस सुन्दर ही लिखेंगे और सुदरता ही दिखाएँगे. बस ये काम अगली पोस्ट से ही शुरू.वैसे भी दिल्ली वालों को आइना दिखाने का काम आज से दैनिक समाचार पत्र --हिन्दुस्तान टाइम्स ने शुरू कर ही दिया है --दिल्लीवालों के दस कुकृत्यों ( बेड हैबिट्स ) में से रोज एक के बारे में विस्तार से बताकर, फोटोस सहित। अब आप को बुरा लगे या भला , फोटोस तो आज भी छपी हैं. दिल्ली वाले कब तक मुहँ मोडेंगे. हिन्दुस्तान टाइम्स को इस साहसिक कार्य के लिए बधाई.



आप सब को दुशहरे की हार्दिक बधाई। आज लंकापति रावण के साथ साथ अंतर्मन के रावण को भी दहन कर दें, मेरी यही कामना है।

Saturday, September 26, 2009

सुंदर, निर्मल, चंचल, कोमल ---मेरी दिल्ली।--

अपनी पिछली पोस्ट में मैंने दिल्ली के कुरूप चेहरा का वर्णन किया था। उसे पढ़कर कई साथियों को निराशाजनक आर्श्चय हुआ। एक पाठक ने तो इसे कोरी बकवास तक कह डाला।
दोस्तों, सच का सामना करने का साहस सब में होना चाहिए, फ़िर चाहे सच कितना भी कड़वा क्यों न हो।
अगर हम अपने अवगुणों की नही पहचानेगे, तो गुणों का विकास कैसे कर पाएंगे।
लेकिन ऐसा नही है की सच हमेशा कड़वा ही होता है। सच मीठा भी होता है। हमारी दिल्ली का भी दूसरा पहलू ऐसा ही मीठा सच है।
मैं तो दिल्ली का मूल निवासी हूँ । यहीं पैदा हुआ, बड़ा हुआ और पढ़ा लिखा । भला हम से ज्यादा दिल्ली को और कौन समझ सकता है।

प्रस्तुत है दिल्ली का दूसरा रूप :

हम दिल्ली वाले दिल वाले हैं,
जीते हैं शान से।
अब तो शोपिंग भी करते हैं
तो मॉल की दुकान से।


परांठे वाली गली के परांठे,
और फतेहपुरी की लस्सी
कहाँ मिलेगी चाट- पापडी,
जो मिले यू पी एस सी।


गर देखने हैं शहर में,
गाँव के ठाठ बाठ
तो आप भी आइये
दिल्ली हाट ।


लाल किला, जामा- मस्जिद और कुतुब मीनार,
इंडिया गेट, सी पी का सेन्ट्रल पार्क
और मेट्रो की सवारी,
आप भी करना चाहेंगे, बारम्बार।


प्रगति का प्रतीक , प्रगति मैदान
यमुना तीरे नव- निर्मित, अक्षर- धाम।
लोटस टेम्पल और बिरला मंदिर
यही सब तो हैं, मेरी दिल्ली की शान।


दिल्ली है दिलवालों की बस्ती,
ये महमान नवाजी में भी कभी नहीं थकती.
यहाँ के तो लोग भी इतने सीधे सादे और भले हैं,

तभी तो दिल्ली के द्वार सभी के लिए खुले हैं।


दिल्ली के द्वार सभी के लिए खुले हैं
सभी के लिए खुले हैं।

दोस्तों , अगले साल कॉमनवेल्थ गेम्स होने वाले हैं. होटलों में जगह मिले या न मिले, दिल्ली वालों के दिल में ज़रूर जगह मिलेगी. इसलिए अवश्य आइये और दिल्ली की महमान नवाजी का आनंद उठाइये.
अगली पोस्ट में --दिल्ली दर्शन -- मेरे दुसरे ब्लॉग , चित्रकथा पर.

Wednesday, September 23, 2009

मेरी दिल्ली मेरी शान, पर कैसी ---भाग-१

अपनी १९ अगस्त , और सितम्बर की पोस्ट में मैंने दिल्ली के ट्रैफिक और दिल्ली वालों की रोड सेंस पर जो लेख लिखे थे , उन पर श्री रवीश कुमार जी ने १६ सितम्बर के दैनिक हिन्दुस्तान में ब्लॉग चर्चा के अर्न्तगत अपना विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किया हैदिल्ली के ट्रैफिक जाम के डॉक्टर --शीर्षक से छपे इस लेख में श्री रवीश कुमार जी ने मेरी कही बातों का अनुमोदन किया हैइस सार्थक कार्य के लिए श्री रवीश कुमार बधाई के पात्र हैं


कल के अखबार में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार , माननीय ग्रह मंत्री श्री पी चिदंबरम ने दिल्ली वालों के व्यवहार और आदतों पर गहरी चिंता जतायी हैभई, चिंता तो जायज़ है, क्योंकि अगले साल देश में कॉमनवेल्थ गेम्स होने वाले हैं, और दिल्ली वाले हैं की देश की नाक कटाने पर तुले हैं


अब हमारी सरकार तो भरपूर प्रयतन कर रही है, दिल्ली वालों को लाइन पर लाने कीलेकिन कहते हैं की जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो फसल का क्या होगाअब दिल्ली वालों ने तो ठान रखी है की देश की नाक कटा कर रहेंगेइज्ज़त की वाट लगा कर रहेंगे


अखबार में दिल्ली वालों के १० कुकर्मों की लिस्ट दी गई हैबिल्कु़ल सही बात कही हैमैंने तो दो साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसमे इन ज्यादातर बातों का उल्लेख किया गया हैलेकिन कहते हैं की सिक्के के दो पहलू होते हैंतो आज पहला पहलू ---


मेरी दिल्ली , मेरी शान --भाग


मेरी दिल्ली, मेरी शान

पर कैसी दिल्ली , कैसी शान

यहाँ पड़ोसी पड़ोसी अनजान

पर ऊपर सबकी जान पहचान

झूठी आन बान,

शान बने वी आई पी महमान ,

और तेरी गाड़ी मेरी गाड़ी से बड़ी कैसे

सब इस बात से परेशान ,

फ़िर भी मेरी दिल्ली मेरी शान


साठ लाख गाड़ियों का शोर ,

कार्बन और नाइट्रोजन का बढ़ता जोर

बिन मीटर के चलते ऑटोरिक्शा ,

उस पर ब्लूलाइन की खतरनाक सुरक्षा

स्पीड लिमिट ५० की, पर सब ८० पर दोडें ,

सब्वेज को छोड़कर , पब्लिक रेलिंग तोडे

और यहाँ कब किस मोड़ पर,

रोड रेज़ में जाये जान।

फ़िर भी मेरी दिल्ली, मेरी शान


देखिये नगर निगम के ट्रकों की हालत

चौराहों पर सेल्समैन और भिखारियों की हिमाकत ।

सड़क पर गडे पुलिस के बैरिकेड ,

फुटपाथ पर पड़े चरसियों की ब्रिगेड

ट्रैफिक जाम करता वी आई पीज का सफ़र,

उस पर ट्रैफिक पुलिस की पैनी नज़र

और भइया, तिनतेड ग्लास के चक्कर में,

जाने कब कट जाये चालान.

फिर भी मेरी दिल्ली मेरी शान .


दूध में यूरिया, चर्बी का घी ,

और गाजीपुर के मुर्दा मुर्गे,

सड़कों पर आवारा घूमते गाय, भैंस और कुत्ते.

कूडेदान में मुहँ मारते सूअर के बच्चे.

पास खडा खोमचे वाला,

हाथ घोलकर खिलाये गोल गप्पे.

कैमिकल से पके फल और,

इंजेक्सन लगी सब्जियों के बढ़ते दाम.

ऐसे में भला क्या होगा सबका अंजाम.

लेकिन मेरी दिल्ली, मेरी शान.

Monday, September 21, 2009

आखिर ये ब्लॉग्गिंग है क्या बला ???

सबसे पहले तो आप सब को ईद मुबारक और नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं
वैसे अपने लिए तो हर दिन- रात नवरात्रे ही होते हैं। अगर ये बात समझ में आए तो अच्छा, नही आए तो कोई बात नही विस्तार से फ़िर कभी सही।

पिछले दिनों एक सक्रिय ब्लोग्गर की एक नेनो साइज़ की मासूम सी गलती पर एक मित्र की टिपण्णी पर दूसरे मित्र की प्रतिक्रिया और उस प्रतिक्रिया पर ढेरो चाहने वालों की प्रतिप्रतिक्रियाओं से ब्लॉग जगत में भूकंप का एक हल्का सा झटका महसूस होने पर मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया की आख़िर ये ब्लॉग्गिंग है क्या बला।

बहुत सोचा की ये मस्तिष्क के किस कोने की उपज है। जो थोड़ा बहुत समझ में आया , वो यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :

ब्लॉग्गिंग एक ---

असाध्य रोग है, बीमारी है
अनंत इंतज़ार है, बेकरारी है

लेखन का विकट, भूत है
पहचान की अमिट, भूख है

टिप्पणिया पचास तो, खुशी है
रह्जायें पाँच तो, मायूशी है

सीनियर सिटिजन्स का , टाइमपास है
व्यवसायिक युवाओं का , समयह्रास है

मय सा अतुल्य , नशा है
इंसानी नसनस में , बसा है

लेकिन ब्लॉग्गिंग ये भी तो है ---

विचारों की मूक, अभिव्यक्ति है
हजारों की अचूक , शक्ति है

मानविक चेतना की, कड़ी है
सामाजिक एकता की, लड़ी है

सेवानिवृत बुजुर्गों का , सकून है
कार्यरत युवाओं का , जुनून है

प्रणाली पर उठता, सवाल है
बदहाली पर उछलता, बवाल है

मुहब्बत का फैलता, संसार है
सदी का श्रेष्ठतम , आविष्कार है

अब मस्तिष्क का कौनसा भाग हावी है, इसका फ़ैसला तो आपको स्वयम करना पड़ेगा।

और अब एक सवाल, एक ज़वाब :

सवाल: बहादुर इंसान कैसा होता है ?

ज़वाब: बहादुर इंसान उस धावक जैसा होता है, जो दौड़ में भाग लेने तो जाता है, लेकिन दौड़ शुरू होने के बाद भी , आरम्भ रेखा पर ही खड़ा रहता है। क्योंकि जिस समय बाकि सभी धावक मैदान में पीठ दिखा कर भाग रहे होते हैं, एक अकेला वही इंसान होता है, जो मैदान में डटा रहता है।

Friday, September 18, 2009

देखिये, आज के ज़माने में नेनोटेकनोलोजी का कमाल--

नेनो यानि अति सूक्षम। पिछले कुछ अरसे से नेनो की धूम मची हुई है। जी नही, मैं टाटा निर्मित नेनो कार की बात नही कर रहा हूँ, हालांकि धूम तो उसने भी खूब मचा रखी है।
मैं बात कर रहा हूँ एक नेनोमीटर साइज़ के पार्टिकल यानि वाइरस की जिसकी वजह से आजकल मानव जाति की नींद उड़ गई है। कॉमन कोल्ड से लेकर, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू और ऐड्स तक जैसी बीमारियाँ इन्ही नेनो साइज़ के दुश्मनों से फ़ैल रही है। अब भई, वाइरस तो कुदरत की देन है, कोई हम या आपने तो इन्हे संसार में बुलाया नही। इतेफाक से इंसान की नब्ज़ इनके हाथ में ऐसी आ गई है की, कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है की --

एक वाइरस इंसान को क्या से क्या बना देता है।

दूसरी तरफ़ देखें तो आज मानव भी नेनोटेकनोलोजी का इस्तेमाल जमकर कर रहा है। मैंने देखा है की इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल तो हमारी फैशन इंडस्ट्री कर रही है।

अब देखिये पिछले साल भारत में हुए आई पी एल के २०-२० मैचों के दौरान चीअर लीडर्स की ड्रेस को लेकर काफी हंगामा हुआ। क्योंकि उनकी ड्रेस में नेनोटेकनोलोजी का इस्तेमाल किया गया था। अब भइया, भज्जी थप्पड़ काण्ड के बाद भी अगर क्रिकेट को जेंटलमेंस गेम कह सकते हैं, तो इस विचार से चीअर लीडर्स को तो वेल ड्रेस्ड कहना चाहिए।

कम से कम आजकल के समाचार पत्रों में छपी तस्वीरों को देखकर तो यही लगता है।

एक बड़े अखबार के फ्रंट पेज पर बड़ा सा समाचार पढ़ा, कुछ साल पहले --लिखा था ,
***** मैगजीन के द्वारा *** ***बेस्ट ड्रेस्ड वूमेन घोषित की गई। नीचे उसका पूरा फोटो बना हुआ था।
मैं पूरे एक घंटे तक ढूँढता रहा, मगर मुझे वो ड्रेस नज़र नही आई। भई , ड्रेस होती तो नज़र आती।
वो तो बाद में पता चला की ड्रेस तो थी, पर उसमे भी नेनोटेकनोलोजी का इस्तेमाल किया गया था।

और दोस्तों, ये नेनोटेकनोलोजी का ही कमाल है की जहाँ पहले घरों में बड़े बूढों के सामने बहु बेटियाँ नज़रें नीची रखती थी, आजकल बेटियाँ ऐसे कपड़े पहनती हैं की बड़ों को नज़रें नीची रखनी पड़ती हैं।

मैं तो
जब भी
देखता हूँ ,
यही
सोचता हूँ .
की कहाँ
टिकी है ,
कैसे
टिकी है ,
ये
लो वेस्ट
की जींस .

Thursday, September 10, 2009

कौन कमबख्त बीडी, पीने के लिए पीता है.....


हर साल मई का आखरी सप्ताह हम धूम्रपान विरोधी अभियान चलाते हैं. इसका आइडिया लगता है ट्रैफिक पुलिस से मिला है, क्योंकि ये सप्ताह मनाने का काम अक्सर पुलिस वाले ही किया करते हैं. लेकिन ये काम भी तो पुलिसियाई जैसा ही तो है. क्योंकि इस पूरे हफ्ते एक स्पेशल स्क्वाड गठित किया जाता है जिसका काम होता है , सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान करने वालों का चालान काटना और जुरमाना करना जो कम से कम १०० रूपये होता है.

उस दिन भी हम हफ्ता वसूल करने....अररर..... माफ़ कीजिये, चालान काटने के लिए निकले थे, अस्पताल के परिसर में. दोपहर की गर्मी में पसीने पसीने हुए जा रहे थे. लेकिन बीडी सिगरेट पीने वालों की आदत छुडाने का ठेका लिया था. सो, एक के बाद एक चालान काटे जा रहे थे. लेकिन----
तभी हमारी नज़र पेड़ के नीचे बैठे एक ७० साल के बुजुर्ग पर पड़ी. बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा था. देखने से ही लग रहा था की वो अस्थमा से पीड़ित था. फिर भी बड़े इत्मीनान से बैठा बीडी का सुट्टा लगाये जा रहा था.

उसकी हालत देखकर मुझसे रहा न गया और मैंने उससे पूछा, बाबा तुम्हे सांस तो आ भी नहीं रही है, ऊपर से बीडी पी रहे हो. बाबा शायद शाहरुख़ खान का दीवाना था, और लगता है देवदास कई बार देख चुका था. छूटते ही बोला --कौन कमबख्त बीडी पीने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूँ ताकि सांस ले सकूँ. उसकी बात सुनकर हम तो हैरान रह गए. हमारी परेशानी देखकर बाबा ने ही हम पर दया की और बोले ---


बेटा, डॉक्टर के पास गया था, वो बोला तुम्हे दमा है, दवाई खाओ और पार्क में बैठकर लम्बी लम्बी सांस लेकर सांस की एक्सेर्साइज़ करा करो. सो, वही कर रहा हूँ.

अब क्या करते, वाह वाह करते हुए वहां से खिसक लिए.


वैसे भी १०० रूपये की उघाई तो एक भी शिकार से नहीं हुई. किसी से १० मिले तो किसी से २० रूपये. कुछ के पास तो खाली छिल्लर ही निकली. एक के पास तो वापस जाने के लिए रिक्शा के लायक भी पैसे नहीं थे. उसका क्या चालान काटते. उल्टे जेब से निकलकर १० रूपये देने पड़े.

लेकिन इन सब लोगों में एक बात कॉमन थी. वो ये की सबकी जेब में बीडी का बण्डल और माचिस की डिबिया ज़रूर थी. यानि भले ही खाने के लिए न मिले लेकिन बीडी पीने के लिए पैसे ज़रूर होने चाहिए.

आज यहाँ ११७ करोड़ के देश में यही हो रहा है. बच्चों को रोटी मिले या न मिले, घर के मुखिया को पीने को ज़रूर मिलना चाहिए --फिर वो बीडी हो या दारु. दोनों ही इम्पोर्टेन्ट हैं. हैं ना ---


अब ज़रा इन तथ्यों पर भी गौर कीजिये :

१। जो दुकान सुबह सबसे पहले खुलती है और रात में सबसे बाद में बंद होती है, वो पान -बीडी -सिगरेट की दूकान होती है.

२। हमारे पड़ोस में दो साल से बनी मार्केट में सिर्फ दो ही दुकाने खुली हैं और चल भी रही हैं --एक अंग्रेजी शराब की, दूसरी पान की.

३. शराब की दुकान पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है ड्राई डे से एक दिन पहले.

Monday, September 7, 2009

सीखिए ,दिल्ली के सिल्ली ट्रैफिक में सेफ ड्राइविंग के दस नुस्खे ---

सीखिए ,दिल्ली के सिल्ली ट्रैफिक में सेफ ड्राइविंग के दस नुस्खे ---

दिल्ली का ट्रैफिक, उफ्फ़ इतना कैओटिक कि सुबह घर से निकल कर शाम को आप या आप की गाड़ी सही सलामत वापस घर पहुँच जाए तो गनीमत समझें। लेकिन इसी ट्रैफिक में उलझकर हमने जो सेफ ड्राइविंग की रिसर्च की , वही आपकी खिदमत में प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिये पेश हैं दिल्ली के सिल्ली ट्रैफिक में सेफ ड्राइविंग के आजमाए हुए दस नुस्खे ---

नुस्खा नंबर -१:

धीरे चलें। वैसे भी दिल्ली के ट्रैफिक में आप तेज़ चल भी नही सकते। अब भले ही स्पीड लिमिट ५० की हो, लेकिन १५ से ऊपर चलने का मौका ही कहाँ मिलता है। अब जो हो नहीं सकता, उस के बारे में कोशिश करके परेशान क्यों हों। याद रखिये, जल्दी से देर भली ( ऑफिस को छोड़कर ) 

नुस्खा नंबर २:

दायीं लेन में चलें। यूँ तो दायीं लेन फास्ट मूविंग ट्रैफिक के लिए होती है, लेकिन धीरे चलने वालों के लिए इससे सेफ लेन और कोई नहीं हो सकती। सच मानिए, आपके पीछे आने वाले १०० में से ९० तो आपकी मनोदशा को समझते हुए ख़ुद ही बायीं ( रोंग ) साइड से ओवरटेक करते हुए आगे निकल जायेंगे। आठ लोग ऐसे होंगे जो दो तीन बार हार्न बजायेंगे और कोई रिस्पोंस न पाकर, आपको खडूस समझकर, बिना कुछ बोले एज यूजुअल रोंग साइड से निकल जायेंगे। सिर्फ़ १०० में से दो गाड़ी वाले ऐसे मिलेंगे जो बार बार हार्न बजाकर आपको परेशान करेंगे। ऐसे में आप रीअर व्यू मिरर में ज़रूर झांक कर देख लें और ज़रा सा भी चेहरा नापसंद आए, तो भैया सलामती इसी में है कि आप फ़ौरन उसे साइड दे दें। वर्ना कोई भरोसा नहीं कि वो नीचे उतर कर आपको सरे आम गोली मार दे। न भी मारे पर धमकी तो ज़रूर दे डालेगा और शरीफों के लिए तो इतना ही काफी है। 

नुस्खा नंबर ३:

यदि आप रात में ड्राइव कर रहे है और आपके पीछे कोई गाडी वाला हाई बीम पर चला आ रहा है और आपकी आँखों में सीधी लाईट पड़ रही है। ऐसे में बस एक ही काम करें, उसे साइड देकर उसके पीछे आ जाएँ और खुद भी हाई बीम ऑन कर दें। अब आपको साफ़ दिखता रहेगा और जैसे को तैसा भी हो जायेगा। 

नुस्खा नंबर ४:

ड्राइविंग सिखाने वाले सिखाते हैं कि ड्राइव करते समय दो गाड़ियों की दूरी यानि ३० फीट पर सड़क को देखते हुए चलना चाहिए। इसका एक फायदा तो यह है कि आप सड़क पर बने गड्ढों से बचे रहेंगे। लेकिन दिल्ली के बम्पर टू बम्पर ट्रैफिक में तो २ फीट से ज्यादा कभी दिखता ही नहीं। फिर भी किस्मत से सड़क खाली मिल जाये और आप गाड़ी दौड़ाने की तमन्ना पूरी करना चाहें तो भैया १०० गाड़ियों की दूरी यानि १५०० फीट पर देखते रहें क्योंकि यही वो डिस्टेंस है जहाँ पुलिस की गाड़ी स्पीड गन लगाये आप की ताक में बैठी होती है। 

नुस्खा नंबर ५:

यदि अपनी धुन में मस्त आपको पुलिस वाहन नज़र न आये या देर से नज़र आये और आप पकडे जाएँ तो घबराइये नहीं। कोई जिरह मत करिए, चुपचाप जुर्माने की राशि निकालकर अपना रस्ता नापें। क्योंकि अगर बहस करने लगे या मिन्नतें करने लगे तो भी ४० मिनट की माथापच्ची के बाद भी पैसे तो उतने ही देने पड़ेंगे। सच मानिए, जुर्माना भरते ही दो मिनट बाद आप बिलकुल नॉर्मल हो जायेंगे और रिलीव्ड फील करेंगे। पैसे न सही, समय की तो बचत कीजिये।  आखिर समय की ही कीमत होती है, पैसा तो हाथ का मैल है।  

नुस्खा नंबर ६ :

यदि आप चौराहे पर पहुंचे है और बत्ती पीली हो गई है, तो रुकिये मत, निकल जाइये। क्योंकि यदि आपने अचानक रुकने की गलती की तो पीछे वाला ठोक देगा और धीरे धीरे रुके तो बीच चौराहे पर पहुँच जाओगे। फिर तो आपका चालान पक्का। यदि निकल गए तो काफी चांस है कि पीछे वाला भी आपके साथ निकलेगा और नंबर तो लास्ट वाली गाड़ी का ही नोट होता है। लेकिन खुदा ना खास्ता आपका नंबर नोट हो भी गया तो यूँ समझो कि रैड लाईट जम्पिंग और स्टॉप लाइन क्रॉस करने का जुर्माना तो एक जैसा ही है। 

नुस्खा नंबर ७:

वैसे तो सड़क पर दुर्घटना हमेशा दूसरे की गलती से ही होती हैं, अपनी गलती तो कभी होती ही नहीं। फिर भी यदि कभी गलती से भी आप से गलती हो जाये और दुर्घटना होते होते बचे, तो ऐसे में आप भूल कर भी दूसरी गाड़ी वाले की आँखों में न झांकें, वर्ना आँखों और मुँह से इतनी गोलियां निकलेंगी कि आप छलनी हो जायेंगे। बस सीधे देखते हुए और मुस्कराते हुए आगे बढ़ जाएँ। आपको उसकी गालियाँ न सुनाई देंगी, न दिखाई देंगी। 

नुस्खा नंबर ८:

यदि आप दुपहिया वाहन चला रहे हैं तो हेलमेट ज़रूर पहनिए। नहीं, जान बचाने के लिए नहीं, माल बचाने के लिए। अब जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ है, जब आनी होगी तो आ ही जायेगी।  लेकिन पुलिस वाले से तो आपको हेलमेट ही बचा सकता है। 

नुस्खा नंबर ९:

सीट बैल्ट लगाइए। दिल्ली के ट्रैफिक में इसका रोल बस इतना ही है कि हर चौराहे पर आपको १०० रूपये नहीं देने पड़ेंगे। अब सोचो अगर ऐसा हुआ तो जितना कमाते नहीं, उससे ज्यादा तो जुर्माना भरना पड़ सकता है। 

नुस्खा नंबर १०:

यदि किसी कारणवश आप ऊपर लिखे नुस्खों का फायदा नहीं उठा सकते तो फिर आप घर से बाहर ही मत निकलिए। ड्राइविंग का शौक तो आप कंप्यूटर गेम्स पर भी पूरा कर सकते हैं। 

तो भई, हैप्पी ड्राइविंग। 

नोट : यह व्यंग लेख २००९ में रविश कुमार (एन डी टी वी ) के सौजन्य से अख़बार में प्रकाशित हुआ था। 

Friday, September 4, 2009

कब सुधरेगी आज की युवा पीढ़ी ???

दिल्ली में चलने वाले ६० लाख वाहनों में आधे से ज्यादा दोपहिये हैं जिनमे से ९० % मोटरसाइकल हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी ये है की जो दूरी कारवाले एक घंटे में तय करते है वो ये आधे घंटे में तय कर लेते हैं। इसकी एक वज़ह तो ये है की इनको सड़क पर चलने के लिए बस दो फुट चौडी जगह चाहिए। ऊपर से जिग जैग चलते हुए आजकल के युवा ऐसे चलाते हैं मानों मौत के कुँए के कलाकार हों।

रोज़ सुबह हॉस्पिटल जाने के लिए दस किलोमीटर का रास्ता तय करने में मुझे तीन निर्माणाधीन फ़्लाइओवर से होकर गुजरना पड़ता है। एक तो वैसे ही ट्रैफिक की स्पीड ५ से १० किलोमीटर से ज्यादा नहीं होती, ऊपर से जगह जगह पुलिस के बैरिकेड। हॉस्पिटल तक पहुंचते पहुंचते सर भन्ना चुका होता है।

उस दिन भी मैं ट्रैफिक से जूझता हुआ आगे बढ़ रहा था। सावन के सफ़ेद बादल बिन बरसे चिढाते हुए से आसमान में अठखेलियाँ कर रहे थे. मेरे मन में एक नयी कविता की भूमिका बन रही थी. तभी मेरे ख्यालों की श्रंखला लगातार आती पीं पीं की आवाज़ से टूट गयी. मैंने रीअर व्यू मिरर में झाँका तो देखा की एक २०-२२ साल का युवक मोटरसाइकल पर, हेलमेट एक हाथ में टंगा हुआ, दुसरे हाथ की उँगलियों के बीच सिगरेट होठों से लगी हुई, बाल हवा में उड़ते हुए, कमीज़ के छाती के बटन खुले हुए, मुहँ से सिगरेट का धुआं ऐसे निकलता हुआ, जैसे पुराने ज़माने में स्टीम इंजिन से निकलता था. स्पीड तेज़ थी इसलिए धुएं के छल्ले तो बन नहीं सकते थे. लड़का अंगूठे को हार्न पर रख लगातार हार्न बजाये जा रहा था. मेरा पारा भी अब धीरे धीरे बढ़ने लगा था . मैं समझ रहा था की वो साइड मांग रहा था, लेकिन साइड तो तब देता जब जगह होती. एक तरफ फुटपाथ, दूसरी तरफ ढेरो गाडियाँ. अचानक मोटरसाइकल वाले ने स्पीड बढाई और शार्प कट मारता हुआ बायीं तरफ से एकदम मेरे आगे से चीते जैसी फुर्ती से जम्प करता हुआ गोली की तरह आगे निकल गया।

इस आकस्मिक आक्रमण के लिए तो मैं तैयार नहीं था। इसलिए स्टीयरिंग वाला हाथ ज़रा घूमा और मैं फुटपाथ से टकराते टकराते बचा. एक ही पल में गुस्सा, फरस्त्रेसन, डर और दहशत की मिली जुली प्रतिक्रियाएँ दिमाग में घूम गयी. गुस्सा तो इतना आया की मन किया की पकड़कर दो झापड़ रशीद कर दूं. लेकिन एक तो वैसे ही हम कानूनी डरपोक, ऊपर से अब उम्र भी ऐसी नहीं की ६ फुट लम्बे चौडे नौजवान से भिड सकें. कहीं उसी ने हमें दो के बदले चार लगा दिए तो. हालाँकि कालिज के दिनों में तो हम भी बॉडी बिल्डर हुआ करते थे और दो महीने तक जे ऍन यु में गुरुंग नाम के ब्लैक बेल्ट २ डान ताइकोन्दो को़च से मार्सिअल आर्ट सीखा था. लेकिन जे ऍन यु में हड़ताल होने की वजह से ट्रेनिंग बीच में ही ख़त्म हो गयी. अब नीम हकीम खतराए जान वाली बात तो आपने सुनी ही होगी. इसलिए ये रिस्क नहीं ले सकते थे.खैर, डॉ अस्थाना की तरह हंसकर तो नहीं, पर लम्बी लम्बी सांसें लेकर हमने अपना बी पी डाउन किया और गाड़ी को संभाला।

अभी आधा किलोमीटर ही ड्राइव किया था की सड़क किनारे भीड़ देखकर मैं रुका। गाड़ियों वाले गाड़ी धीरे करते और देखकर आगे निकल जाते. आजकल किसके पास इतना टाइम है की फालतू में अपनी टांग घुसाएँ. मैंने देखा तो हैरान रह गया. सड़क पर वही युवक औंधा पड़ा था, हेलमेट दूर पड़ा था, सिगरेट का बट अभी तक उसकी उँगलियों में था और धुएं की एक पतली सी लकीर उड़ रही थी. जाहिर था उसका एक्सीडेंट हुआ था. पूछने पर पता चला की मोटरसाइकल के पहिया के नीचे एक ईंट का टुकडा आ गया था, जिसकी वजह से बाइक उलट गयी।

लड़का बेहोश था. कहीं से खून नहीं निकल रहा था. शायद अंदरूनी चोट थी. एक डॉक्टर होने के नाते मुझसे रुका नहीं गया. मैंने उसकी नब्ज़ टटोली, नब्ज़ ठीक थी. शुक्र था की जिन्दा था. मैंने फोरन १०० नंबर पर फोन मिलाया ये सोचकर की पोलिस की पी सी आर कम से कम जल्दी हॉस्पिटल पहुंचा देगी. ऐसे में एक एक पल की कीमत होती है. कुछ ही मिनटों में पी सी आर आ गयी और लेकर चली गयी।

दोपहर को अपना काम निपटाने के बाद जब मैं इमर्जेंसी वार्ड गया राउंड लेने, इमर्जेंसी के इंचार्ज को स्वाएइन फ्लू हो गया है, तो मैंने उसी लड़के को लेटे हुए पाया. पुलिस उसे हमारे ही हॉस्पिटल में ले आई थी. मैंने उसकी रिपोर्ट देखी, सी टी सकेन नोर्मल था. यानि कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी. लड़का अब होश में आ चुका था. साथ ही उसके मात- पिता भी पहुँच चुके थे. पिता को देखकर मुझे हैरानी हुई क्योंकि वो तो मेरे पुराने दोस्त निकले. सारी बात जानने के बाद वो बड़े शर्मिंदा थे. एक पल जो उनकी नज़रें मुझसे मिली तो उन आँखों में क्रत्य्गता और शर्मिंदगी के मिले जुले भाव नज़र आये. युवक आँखे बंद कर लेटा था, शायद सोने का बहाना कर रहा था. मैंने उसके सर पर हाथ फेरा और आगे बढ़ गया दुसरे मरीज़ के पास.
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