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Friday, August 28, 2020

कोरोना काल में मंद मंद चलती जिंदगी ...


आँखों देखी :

लगभग ५-६ महीने बाद एयरपोर्ट जाना हुआ। जिस रास्तों से आना जाना हुआ , उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था , मानो वर्षों बाद वहां से गुजरे हों। सब कुछ जैसे नया नया सा लग रहा था। दूसरी ओर ऐसा भी लग रहा था जैसे कुछ नहीं बदला, सब वैसा का वैसा ही है। ऐसा अहसास हो रहा था कि ये दुनिया यूँ ही चलती रहती है, भले ही आप हों या ना हों।

यमुना पार कर बारापुला पर पहुंचे तो ऐसा लगा कि पुल पर नई लाइट्स लगाई गईं हैं।  फिर सोचा तो पाया कि लाइट्स तो पहले भी थीं। और ध्यान से देखा तो यह निश्चित भी हो गया क्योंकि पोल पुराने ही दिख रहे थे। लेकिन यह नए पुराने का अहसास हैरान सा कर रहा था। एयरपोर्ट के पास पहुंचे तो ऐरोसिटी को लगभग उजाड़ सा वीरान सा पाया। कभी होटल्स का ये जमघट बड़ा वाइब्रेंट लगता था। लेकिन अब शायद वहां यात्री नहीं , कोविड के रोगी रहते हैं, क्वरेन्टीन पूरा करने के लिए।  ऐरोसिटी के आगे एयरपोर्ट तक का रास्ता पहले से कहीं ज्यादा हरा भरा और सुन्दर नज़र आया। हालाँकि एयरपोर्ट पर अब उतनी भीड़ नज़र नहीं आई जितनी अक्सर हुआ करती थी।

वापसी पर चाणक्य पुरी स्थित कमला नेहरू पार्क जो अक्सर युवाओं और प्रेमी युगलों से भरा रहता था, बिलकुल खाली पड़ा था। बाहर से खूबसूरत तो उतना ही दिखा लेकिन सोचने पर मज़बूर हो गए कि क्या पार्क में अब लोगों की जगह वायरस विचरण करता है। नेहरू पार्क के एक छोर पर दिल्ली का सबसे पुराना और जाना पहचाना अशोक होटल बाहर से बड़ा उदासीन सा लग रहा था। पार्किंग में इक्की दुक्की गाड़ियां ही खड़ी थीं। लेकिन इसके तुरंत बाद रेसकोर्स रोड़ पर हरियाली मानो कई गुना बढ़ गई थी। प्रधान मंत्री निवास से लेकर अगली रैड लाइट तक इतनी घनी हरियाली देखकर अचंभित सा होना पड़ा।

यदि दिल्ली का इतिहास देखें तो नई दिल्ली जो स्वतंत्र भारत की राजधानी बनी, का निर्माण १९१९ में आरम्भ हुआ और १९३१ में पूर्ण हुआ। नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, और आस पास के सरकारी भवन, संसद भवन, इंडिया गेट, और सम्पूर्ण अति विशिष्ठ आवासीय क्षेत्र जिसमे चाणक्य पुरी स्थित एम्बेसीज भी शामिल हैं, एक अति आधुनिक, हरा भरा और स्वच्छ आवासीय एवं कार्यकारी क्षेत्र बना। इस क्षेत्र में देश के सभी सांसद , ज़ज़ , आई ऐ एस अफ़सर और अन्य अति विशिष्ठ व्यक्ति रहते हैं। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि यह क्षेत्र बहुत ही सुन्दर, स्वच्छ और हरियाली युक्त है।

आज सम्पूर्ण वी आई पी क्षेत्र बहुत ही हरा भरा नज़र आ रहा था। सावन भादों की बरसात में धुले लगभग १०० साल पुराने पेड़, जगह जगह बनाये गए गोलाकार पार्क, वी आई पी बंगलों के बाहर लगे पेड़ पौधे इंसानों की गतिविधियां कम होने के कारण जैसे अपने पूरे यौवन पर थे। सुन्दर तो पहले भी रहा लेकिन यह क्षेत्र इतना खूबसूरत जैसे पहले कभी नहीं लगा। आखिर कर इंडिया गेट पहुंचे तो इंडिया गेट के चारों ओर पुलिस के बैरिकेड देखकर अवश्य मायूसी सी हुई क्योंकि उसे पार कर इंडिया गेट के पास जाना और नव निर्मित शहीद स्मारक देख पाना अब असंभव हो गया है। इंडिया गेट के लॉन्स में भी घास की कटाई न होने के कारण यह कोरोना के कष्टदायक काल की जैसे कहानी सुना रहा था। 

इंडिया गेट के सर्कल से आई टी ओ जाने वाले तिलक मार्ग पर स्थित उच्चतम न्यायालय के सामने सड़क ना जाने किस विधि से बनाई गई है कि इस एक किलोमीटर लम्बे रास्ते पर टायरों से ऐसी आवाज़ आती है जैसे कार नहीं बल्कि टैंक चल रहा हो। आई टी ओ का चौराहा शायद सबसे बड़ा चौराहा है। इसीलिए यहाँ पैदल लोगों के लिए एक स्काईवॉक बनाई गई है।  हालाँकि इस डेढ़ किलोमीटर लम्बी जिग जैग वाक पर जाता हुआ नज़र कोई नहीं आता।  लेकिन बड़ा मन है कि कभी बस यूँ ही इस पर चढ़कर पैदल यात्रा की जाये और आस पास का नज़ारा देखा जाये। आई टी ओ चौराहे पर एक बच्चा पन्नी में लपेट कर गुलाब के फूल बेच रहा था।  मैले कुचैले बालक से जाने कौन गुलाब खरीदता होगा।  सामने ही फुटपाथ पर बैठी उसकी मां एक और नन्हे मुन्ने को गोद में खिला रही थी। पास ही उसका पिता खड़ा था, पतला दुबला  लेकिन डिजाइनर बालों वाला, अपने मोबाइल पर कुछ कुछ करता हुआ। बस भिखारी के हाथ में ही मोबाइल देखना बाकि रह गया था, वह तमन्ना भी अब पूरी हो गई।     
कोरोना पेंडेमिक के कारण लगभग ठप्प हुई जिंदगी में जैसे सभी विकास कार्य भी ठप्प हो गए। बस जैसे तैसे जिंदगियां चली जा रही हैं। ज़ाहिर है, यदि जिन्दा रहे तो कार्य भी फिर आरम्भ होंगे और विकास कार्य भी। अभी कब तक ऐसा चलेगा, कोई नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि कोरोना वायरस ने लोगों को घुटनों पर ला दिया है। प्रकृति के सामने मनुष्य बहुत छोटा होता है लेकिन यह लोगों को समझ में अब आने लगा है। या शायद अब भी नहीं।       
       


             

Saturday, April 7, 2018

वाट्स अप जिंदगी ---


आंधी वर्षा से नरमाई रैन की ,

शीतल सुहानी भोर में अपार्टमेंट की,

बालकॉनी में बैठ चाय की चुस्कियां लेते,

दूर क्षितिज में छितरे बादलों की खिड़की से

शरमाये सकुचाये से सूरज को

ताक झांक करते देखकर हमें सोचना पड़ा।


कि कंक्रीट के इस जंगल में ,

ऊंचे अपार्टमेंट्स की ऊँचाईयों में ,

क्षितिज भी सिकुड़ सा गया है ऐसे ,

जैसे संसार को कर लिया है कैद मुट्ठी में,

हमने, एक स्मार्ट फोन के ज़रिये।


कुछ ही तो वर्ष पहले की बात है जब ,

घर हो या दफ्तर , घरवाले हों या मित्र ,

सब एक साथ बैठकर गपियाते थे ,

उन्मुक्त हँसते मुस्कराते थे ,

व्यस्त होकर भी मिल जाती थी फुर्सत,

आँखों में आँखें डालकर बतियाने की।


देखते देखते ये समां कैसे बदल गया !

अब अंदर हों या बाहर ,

घर हो या दफ्तर , या हो मैट्रो का सफर ,

जिसे देखो वही ,

सज़दे में सर झुकाये नज़र आता है।

न ढंग से खाता है न सोता है ,

बस अपने आप में गुम सा नज़र आता है।


अब नहीं करते पति पत्नी प्यार की बातें ,

नहीं चह्चहाते चिड़ियों से,  बच्चे गले लगकर ।

अब कोई नहीं करता बातें नज़रों से नज़रें मिलाकर ,

नहीं आती कानों में दोस्तों की मधुर आवाज़।

लेकिन आती हैं रोजाना ढेरों शुभकामनायें ,

फूल पत्तियों में लिपटी हुई प्रभात की ''सुप्रभात" ।

आते है नित नए सैंकड़ों सन्देश ,

कॉपी पेस्ट किये हुए, यहाँ से वहां से, जिनके

न जन्मदिन का पता होता है न जन्मदाता का।


यंत्रवत ये जिंदगी बस आभासी बनकर रह गई है।

वाट्सएप्प ने जैसे जिंदगी को गुलाम बना लिया है।

हार्डवेयर ने सरकारी सॉफ्टवेयर को किया था क्रैश ,

परन्तु स्मार्ट फोन के सॉफ्टवेयर ने,

जिंदगी के हार्डवेयर को ही क्रैक कर दिया है।

रोज सुबह होते ही वाट्सएप्प पूछता है,

''वाट्स अप'' जिंदगी !



Wednesday, January 17, 2018

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

धन दौलत जोड़ते रहे जिंदगी भर जोड़कर पाई पाई  ,
बच्चों की जिंदगी बनाने में अपनी सारी जिंदगी बिताई।
एक पल भी ना जी पाए जिंदगी भर कभी खुद के लिए ,
अंत समय बच्चों ने ही उस धन संपत्ति पर नज़र गड़ाई।

डायबिटीज के मरीज़ हैं , मीठा कभी खा नहीं सकते,
ब्लड प्रैशर भी रहता है , नमक का परहेज हैं रखते।
शरीर का वज़न है भारी , बीवी घी भी खाने नहीं देती,
जो धन दौलत कमाई थी, वो भी साथ ले जा नहीं सकते।

दुनिया की रीति है कि बच्चों से ही घर बसता है ,
तिनका तिनका जोड़कर इक मकान बनता है।
कभी एक कमरे में रहता था छै लोगों का परिवार ,
अब बच्चों बिना छै कमरों का घर वीरान लगता है। 

Wednesday, September 2, 2015

कुछ साल पहले जब हम जवान थे ...


जिंदगी ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि एक अर्से से कोई हास्य कविता नहीं लिख पाए हम । अब फुर्सत मिली है तो प्रस्तुत है , अधेड़ उम्र के हालातों पर एक हास्य कविता :


कुछ साल पहले जब हम प्रमाणित जवान थे ,
सर पर रंगत थी बालों के लहराते खलिहान थे।
याद बहुत आता है वो गुजरा हुआ ज़माना ,
जब अपने घर में हम भी शाहरुख़ ख़ान थे।


सोचते हैं ग़र बालों पर हम भी लगा लें खिज़ाब,
फिर क्या लगा पाओगे , हमारी उम्र का हिसाब।
दिल तो करता है हम भी दें ज़ुल्फ़ों को झटका ,
पर अब सर पर बाल ही कितने बचे हैं ज़नाब।


हेयर ट्रांसप्लांट का कभी मन में बनता है प्लान ,
पर कीमत सुनकर ही  दिल हो जाता है हलकान।
दो बाल भी दिख जाएँ कंघी में तो कहती है पत्नी ,
लो कर दिया सुबह सुबह डेढ़ हज़ार का नुकसान।


इश्क़ और बुढ़ापे में नींद भी कहाँ आती है ,
दोनों में दिल की धड़कन बढ़ जाती है ।
कभी नींद में भी आते थे हसींन ख्वाब ,
अब कम्बख़्त नींद ही ख्वाब में आती है।


बाल ग़र सारे गिर जाएँ तो ग़म नहीं ,
नींद भले आये रातों में हरदम नहीं ।
मूंह में न रहें दांत भी तो मत समझो ,
कि इन चिकने मसूढ़ों में अब दम नहीं।


अंगारों पर राख हो तो आंच कम नहीं होती ,
बुढ़ापे में भी इश्क की आग कम नहीं होती।
मुँह में दांत और पेट में आंत नहीं तो क्या है ,
जीवन की भूख और प्यास कम नहीं होती।


उम्र एक नम्बर होती है , मगर जिंदगी नहीं ,
जिंदगी में खुश रहने पर कोई पाबन्दी नहीं।
हंसने हंसाने का ही दोस्तो नाम है जिंदगी ,
खुल कर हंसो , हंसने पर कोई पाबन्दी नहीं।


जो लोग हँसते हैं, वे अपना तनाव भगाते हैं , 
जो लोग हँसाते हैं, वे दूसरों के तनाव हटाते हैं।  
हँसाना भी एक परोपकारी काम है दुनिया में , 
चलो हास्य कवियों के लिए तालियां बजाते हैं।  


नोट :  इस रचना का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

Sunday, May 25, 2014

रोक सको तो रोक लो, जिंदगी और ज़वानी पल पल हाथ से फिसलती जाती है ---


आजकल टी वी पर चल रहे महाराणा प्रताप के सीरियल को देखकर जिज्ञासा हुई तो पता चला कि महाराणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप, दोनो की मृत्यु ५० + की आयु मे ही हो गई थी .    वैसे भी उस समय औसत आयु ५० के आस पास ही रही होगी . १९७० - ८० के दशक मे मनुष्य की औसत आयु ६० के करीब थी . ज़ाहिर है , इस बीच औसत आयु मे बहुत कम ही बढ़त हुई . आजकल यह ७० वर्ष है . यह संभव हुआ है वर्तमान मे स्वास्थ्य सेवाओं मे सुधार के कारण . लेकिन अभी भी और शायद कभी भी मनुष्य मृत्यु पर काबू नहीं पा सकता . जहां मृत्यु एक सच है , वहीं एजिंग यानी बुढ़ापा आना भी एक निश्चितता है . बचपन से बुढापे का यह सफ़र कब पूरा हो जाता है, पता भी नहीं चलता. 

यूं तो आने वाले एक पल का भी कोई भरोसा नहीं , लेकिन औसत आयु के हिसाब से आज हम और हमारी उम्र के लोग लगभग तीन चौथाई जिंदगी जी चुके हैं . सोचा जाये तो कल की ही बात लगती है जब १९८४ मे हमारी शादी हुई थी और जिंदगी की एक नई शुरुआत .  



                                                                              १९८४  


देखते देखते तीस साल बीत गए और हम जाने कहाँ कहाँ से गुजर गए . वैसे तो जिंदगी मे बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन यह हमारा सौभाग्य रहा कि हमने जिंदगी को ऊँचाई की ओर चढ़ते ही पाया . एक गांव के साधारण से वातावरण मे पैदा होकर आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं , वह स्वयं के लिये आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है . एक तरह से मैं स्वयं को सौभाग्यशाली महसूस करता हूँ . बेशक , हमने जिंदगी को भरपूर जीया है . 



                                                                          २०१४ 


कहते हैं सौभाग्य पिछले जन्म के अच्छे कर्मों का फल होता है . लेकिन यदि यह पिछले जन्म का फल हुआ तो फिर हमारे हाथ मे क्या रहा. फिर तो भाग्यशाली होना भी भाग्य की ही बात हुई . क्या आपके वर्तमान जीवन का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ? 

बचपन मे एक कहानी सुनी थी . एक सज्जन पुरुष जो जिंदगी भर अच्छे कर्म करता रहा , रास्ते से गुजर रहा था कि अचानक उसके पैर मे एक मोटी सी शूल घुस गई . वह दर्द से कराह उठा . तभी वहां से एक दुराचारी व्यक्ति गुजरा जो बड़ा खुश नज़र आ रहा था . उसने बताया कि वो खुश इसलिये है कि उसे २००० रुपये का ख़ज़ाना मिला था . यह देखकर सज्जन पुरुष बड़ा दुखी हुआ और रोने लगा . तभी वहां एक साधु आया तो सज्जन पुरुष को रोते देखकर रोने का कारण पूछा . उसने बताया कि वह सारी जिंदगी अच्छे कर्म करता रहा , फिर भी उसके पैर मे इतनी मोटी शूल घुस गई और वह दुर्जन सारी जिंदगी पाप करता रहा फिर भी उसको २००० रुपये का इनाम मिला , यह कैसा न्याय है . साधु ने कहा भैया , तुम्हारे पिछले जन्म के कर्म इतने बुरे थे कि तुम्हे आज सूली पर चढ़ना था लेकिन तुम्हारे इस जन्म के अच्छे कर्मों ने तुम्हारी सज़ा को घटाकर शूल तक सीमित कर दिया . जबकि इस दुर्जन के पिछले कर्म इतने अच्छे थे कि इसे आज २ लाख का इनाम मिलना था , लेकिन इसके इस जन्म के बुरे कर्मों ने इसके इनाम की राशि को घटाकर २००० कर दिया . यह सुनकर सज्जन पुरुष अपना सारा दर्द भूल गया और उसने शूल को पकड़कर खींच कर निकाल दिया और संतुष्ट भाव से अपने रास्ते चला गया . 



                                                                          २०३४ 

कहने को तो जिंदगी इतनी लम्बी होती है लेकिन ज़वानी कब हाथ से फिसल जाती है , पता ही नहीं चलता . यदि जिंदगी रही तो एक दिन ऐसा रूप होना स्वाभाविक है . 

इसलिये आवश्यक है कि वर्तमान का एक एक दिन भरपूर जीया जाये क्योंकि वर्तमान को ही जीया जा सकता है . भूतकाल अच्छा था या बुरा , वह बीत गया . अब उस पर क्या पछताना ! भविष्य अन्जान और अनिश्चित होता है , हालांकि एक निश्चितता की ओर निश्चित ही बढ़ता है . हमारे वर्तमान के अच्छे कर्म ना सिर्फ वर्तमान को सुधारते हैं , बल्कि अगले जन्म के लिये भी सौभाग्य का आरक्षण कराते हैं .   

नोट : एक पुराने मित्र की ई मेल से प्रेरित . तीसरा फोटो मित्र की मेल से साभार . 

Saturday, November 3, 2012

जिंदगी के सफ़र में डगर वही जो मंजिल तक पहुंचाए --


बहुत दिनों से ब्लॉग के हैडर की तस्वीर को बदलने की सोच रहा था. आखिर यह तस्वीर पसंद आई और लगा दी. श्री देवेन्द्र पाण्डेय जी ने पसंद का चटका भी लगा दिया. लेकिन उनका कमेन्ट पढ़कर हमने इस तस्वीर को ध्यान से देखा और जो समझ आया , वह इस प्रकार है : 

* जिंदगी एक सफ़र है. 
* इन्सान राहगीर हैं. 
* जिंदगी के सफ़र की डगर भिन्न भिन्न हैं.
* कोई राह ऊबड़ खाबड़ है तो कोई इस सड़क की तरह साफ और चिकनी सतह वाली. 
* कहीं काँटों भरी राह मिलती है तो कहीं फूलों भरी. 
* कोई राह सीधी होती है , कोई टेढ़ी मेढ़ी . 
* किसी राह पर हमसफ़र मिल जाते हैं , कभी अकेले ही चलना पड़ता है.

अब सवाल यह उठता है -- हम किस राह पर चलें . 

* अक्सर हमें जो राह मिलती है , उस पर हमारा कोई वश नहीं होता. लेकिन एक बार राह पर चल पड़ें तो उसे आसान बनाना हमारे हाथ में अवश्य होता है . 
* यदि राह के बारे में हमारे सामने विकल्प हों तो यह हम पर निर्भर करता है की हम कौन सी राह चुनते हैं. 
* सही राह का चुनना अत्यंत आवश्यक होता है.
* अक्सर राह तो मिल जाती है, लेकिन राह भटकना बड़ा आसान होता है। 
* राह वही जो मंजिल तक पहुंचाए. हालाँकि हमारी मंजिल क्या है , यह समझना बड़ा मुश्किल होता है. 

अंत में यही कहा जा सकता है -- हमारे कर्म ऐसे होने चाहिए की हम जहाँ भी चलें, राह की कठिनाइयाँ स्वयं दूर हो जाएँ , डगर पर सफ़र सुहाना लगे -- जैसा इस तस्वीर को देखकर लग रहा है. 

नोट:  यह तस्वीर कनाडा के टोरंटो शहर के पास एल्गोंक्विन नामक जंगल की है, जिसके मध्य से होकर यह ६० किलोमीटर लम्बी सड़क गुजरती है.   

Wednesday, September 19, 2012

And they lived happily ever after -- यह कथन सुखांत कहानियों में ही देखने को मिलता है --


मनुष्य का बचपन जिंदगी से अन्जान होता है . युवावस्था नादान होती है . दोनों ही अवस्थाओं में मनुष्य दुखों की अनुभूति नहीं कर पाता . लेकिन एक उम्र के बाद जिंदगी के असली रूप सामने आने लगते हैं . वास्तव में , शादी के एक दो साल बाद ही चिंता और तनाव का दौर शुरू हो जाता है . किसी को जल्दी बच्चा होने का टेंशन , किसी को न होने का . यदि हो जाये तो दो साल बाद ही स्कूल में एडमिशन का टेंशन . पहले एक का , फिर दूसरे का . और इसी तरह बच्चों को पालते पालते, स्कूल से कॉलेज आने तक का सफ़र कब कट जाता है , पता ही नहीं चलता . आजकल कॉलेज में एडमिशन भी अक्सर शहर से बाहर ही होता है और नौकरी तो निश्चित ही किसी दूसरे शहर में ही मिलती है . यानि बच्चों के बड़े होते ही आप रह गए अकेले .

कुल मिलाकर यही लगता है -- आधुनिक मानव तभी तक सुख का आनंद ले पाता है जब तक बच्चे छोटे होते हैं . फिर एक ऐसा दौर भी आता है जब परिवार और निकट सम्बन्धियों में आने का कम और जाने का सिलसिला ज्यादा होने लगता है . हमारे देश में जहाँ अभी भी पारिवारिक सम्बन्ध बने हुए हैं , लोग एक दूसरे से जुड़े हैं -- वहां किसी भी परिवार में कोई संकट आने पर सभी का प्रभावित होना स्वाभाविक है . विशेषकर किसी की मृत्यु होने पर १३ दिन का शोक आपकी सारी सामान्य दैनिक प्रक्रिया को अस्त व्यस्त कर देता है . यदि आप ५० को पार कर गए हैं तो निश्चित ही यह अवसर अनचाहे ही यदा कदा आता ही रहता है और आप कुछ नहीं कर सकते .

अक्सर लोगों को यह कहते सुना है - अमुक काम हो जाए तो गंगा नहा आऊँ . यानि हम सोचते हैं , एक विशेष अवस्था के बाद सुख चैन की जिंदगी बिता पाएंगे . लेकिन यह एक भ्रम ही होता हैं . सच तो यह है -- इन्सान की जिंदगी में ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव हो ही नहीं सकता जिसके बाद आपका हमेशा सुखी रहना अवश्यम्भावी हो . इसलिए यह कथन --- and they lived happily ever after --- मात्र कहानियों में ही फिट बैठ सकता है .

इसीलिए इस सन्दर्भ में यह कहना कदाचित अनुचित नहीं होगा -- जो आज है , वही सर्वोपरि है . वर्तमान के हर पल का जी भर कर आनंद लेना चाहिए . क्योंकि कल कभी नहीं आता . और कोई नहीं जानता , कल क्या होने वाला है . यदि खुशियों को कल पर छोड़ा तो शायद यह अवसर कभी हाथ न आए .

Sunday, August 5, 2012

क्या लेकर आए हो , क्या लेकर जाओगे -- .


मनुष्य संसार में अकेला आता है -- खाली हाथ, और एक दिन अकेला ही चला जाता है -- खाली हाथ . लेकिन इस आने जाने के बीच करीब ७० साल में ( वर्तमान औसत आयु ) जीवन में अनेक पड़ावों से गुजरता है . बचपन गुजरने के बाद यौवन आता है , फिर शादी -- एक से दो , दो से चार होते हुए सांसारिक उपलब्धियों की लाइन सी लग जाती है . हर इन्सान की कोशिश रहती है , जीवन में सभी भौतिक सुविधाओं का भोग करते हुए , जिंदगी चैन और ऐशो आराम में गुजारने की .

कुछ गरीब पैदा होते हैं और गरीब ही मर जाते हैं . कुछ अमीर घर में पैदा होकर सभी सुख सुविधाओं को बचपन से ही हासिल कर लेते हैं . लेकिन एक बड़ा वर्ग होता है मध्यम वर्ग का , जिनके पास आरम्भ में सीमित संसाधन होते हैं , लेकिन आर्थिक उन्नत्ति करते हुए एक दिन सर्व सम्पन्नता प्राप्त कर लेते हैं . ऐसे ही एक परिवार में गाँव में पैदा होकर ( लेकिन अभाव में नहीं ) , जब शहर में आए तो स्वयं को दूसरों से आर्थिक रूप में कम भाग्यशाली पाया . लेकिन फिर धीरे धीरे आर्थिक विकास की सीढ़ी चढ़ते हुए इस मुकाम तक पहुँच ही गए जहाँ इन्सान सुखी होने के भ्रम में भ्रमित रहकर अपने भाग्य और उपलब्धि पर इतराता है .

कॉलिज के दिनों में गाने का बड़ा शौक था . एक बार समूह गान को लीड करते हुए पुरुस्कार भी मिला . हालाँकि गाना कभी सीखा नहीं , इसलिए गाना कभी नहीं आया . लेकिन शौक इस कद्र हावी था -- कॉलेज पास करते ही इन्टरनशिप में गाने पर प्रयोग करते हुए लता मंगेशकर के साथ अपने युगल गानों की रिकोर्डिंग कर डाली . उन दिनों में डब्बे जैसे टेप प्लेयर / रिकॉर्डर होते थे जिसमे केसेट प्ले होते थे . १९८० के दशक में गुलशन कुमार ने टी सीरिज के सस्ते टेप बनाकर संगीत की दुनिया में अपनी धाक जमाकर टी सीरिज कंपनी को आसमान की उचाईयों पर पहुँचा दिया था . कहीं से दो टेप रिकॉर्डर का इंतजाम किया और ३-४ मित्रों की मंडली बैठ गई गानों की रिकॉर्डिंग करने के लिए . एक मित्र टेप चलाता, दूसरा रिकॉर्डिंग वाला टेप ओंन करता और रफ़ी की जगह हम अपना राग अलापते . कुल मिलाकर नतीजा ग़ज़ब का रहा .

जिस तरह चिकित्सा के क्षेत्र में नॉलेज बहुत जल्दी बदलती रहती है , उसी तरह इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में भी तकनीक बहुत जल्दी बदल जाती है . १९८० के दशक में टेप आए तो टू इन वन मिलने लगे . फिर वीडियो प्लेयर , वी सी आर --- फिर वॉकमेन --- सी डी प्लेयर -- थ्री इन वन आदि तरह तरह के म्यूजिक सिस्टम मिलने लगे . एक समय था जब लोग हाई आउट पुट म्यूजिक सिस्टम को जोर जोर से बजाते थे जिससे सारी बिल्डिंग हिलने लगती थी . ऐसे ही समय हमने भी एक म्यूजिक सिस्टम खरीदा बड़े शौक से , लेकिन उसके बाद फिर तकनीक इतनी तेजी से बदली -- देखते ही देखते संगीत माइक्रो चिप्स में घुसकर कंप्यूटर और मोबाइल फोन्स में ही आने लगा . अब किसी म्यूजिक सिस्टम की ज़रुरत ही नहीं रही . और बेकार हो गया हजारों रूपये की कीमत का हजारों वाट का म्यूजिक सिस्टम जिस पर सभी तरह की सीडी , टेप , केसेट और ऍफ़ एम् रेडियो आदि सुने जा सकते थे .

पिछले दस बारह सालों में जो सांसारिक खज़ाना हाथ लगा था , अब श्रीमती जी को पुराना लगने लगा था . पुराने आइटम्स से उन्हें उकताहट होने लगी , हालाँकि हमें तो अभी भी कोई शिकायत नहीं थी . लेकिन गृह स्वामिनी ने फरमाइश की और हमने मान ली . वैसे भी समय के साथ जब घर बदल जाते हैं , घरवाले बदल जाते हैं तो भला इन निर्जीव सामान की क्या बिसात .



वैसे भी पिछले दस पंद्रह सालों में ड्राइंग रूम बदल गया लेकिन ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाते हुए ये साजो सामान अभी तक विराजमान थे . अब शुरू हुआ इन्हें बेचने का अभियान जो शुरू होने से पहले ही नाकाम हो गया क्योंकि पता चला -- आजकल पुराने सामान के कोई खरीदार ही नहीं मिलते . एक ज़माना था जब अक्सर विदेशी राजनयिक ट्रांफर होने पर घर का सारा सामान बेच कर जाते थे जिनकी बाकायदा सेल लगती थी . इम्पोर्टेड सामान के लालच में सारा सामान फटाफट बिक जाता था . एक दो बार हम भी इस तरह की सेल देखने तो गए लेकिन खरीद कुछ नहीं पाए .

हमने भी अख़बार में आए सभी इस्तेहारों पर फोन कर बेचने की इच्छा ज़ाहिर की लेकिन एक भी जगह से एक भी ग्राहक नहीं आया . गोतिये की यह वॉल केबिनेट जो बड़ी खूबसूरत दिखती थी , अब किसी के काम की नहीं थी . लेकिन हमारा भी खून पसीने का पैसा लगा था , इसलिए हमने भी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए इसके नट बोल्ट खोले और इसे वन इन टू बना दिया -- साइड के कॉलम्स को खोलकर अलग अलग किया , बीच के पैनल्स अलग किये और बन गए दो खूबसूरत कॉर्नर्स, जिन्हें सजा दिया दो बेडरूम्स में .

२९ इंच का टी वी दे दिया अपनी कामवाली बाई को , एक महीने की पगार के बदले . लगभग मुफ्त में पाकर बाई धन्य हो गई . उसके चेहरे पर झलकती ख़ुशी को देखकर दिल खुश हो गया . और समझ आया -- जो वस्तु आपके लिए बेकार हो चुकी है , वह किसी और की अपार ख़ुशी का माध्यम बन सकती है .




लेकिन अभी भी म्यूजिक सिस्टम बचा था जिसे देने का हमारा मन बिल्कुल नहीं था . हमारे लिए यह हमारी संगीत साधना का यंत्र था जिसे हमें असीम प्रेम सा था . लेकिन काफी समय से इस्तेमाल नहीं हो पाया था , इसलिए डिस्युज होकर इसके सारे अस्थि पंजर जाम हो चुके थे . करीब एक महीना यूँ ही पड़ा रहा असमंजस की स्थिति में . सोचा इसे ठीक कराकर इस्तेमाल किया जाए . लेकिन अब तो सुनने की फुर्सत ही कहाँ होती है . खाली समय में टी वी और नेट पर ही समय गुजर जाता है . इस बीच इसकी भी खरीददार मिल गई -- हमारी कामवाली बाई की विवाहित बेटी . एक दिन चुपके से पत्नी ने बुला लिया , तभी हमें पता चला . लेकिन सोचा न था --कभी ऐसे भी मोल भाव करना पड़ेगा . उसे अगले दिन आने के लिए कहकर हमने अपने पुराने मेकेनिक को फोन किया जिसने एक दो बार टी और म्यूजिक सिस्टम की सर्विस की थी . उसने बताया -- सर अब इन्हें कोई नहीं खरीदता . मैंने स्वयं भी १४-१५ सेट कबाड़ी को बेचे हैं ३०० -३०० रूपये में . कोई एक हज़ार दे दे तो गनीमत समझना .

अब तक हमारा विवेक जाग उठा था . दिल ने कहा -- क्यों मोह माया के जाल में उलझे हो मूर्ख . उठो , जागो -- देखो दुनिया में क्या क्या है , और क्या क्या नहीं है . क्या लेकर आये थे जो साथ लेकर जाओगे . इन बच्चों के चेहरों को देखो -- कितनी आस के साथ आए हैं , जेब में थोड़े से पैसे डालकर -- सिस्टम खरीदने . पैसे का लालच तो यूँ भी कभी नहीं रहा , लेकिन गाढ़ी कमाई के सामान को फेंकना भी मंज़ूर नहीं रहा .

लेकिन यह अवसर कुछ और था . हमारे लिए मृत पड़े सामान से किसी को अपार खुशियाँ मिल सकती थी . बस इसी विचार से हमने निर्णय लिया और बच्चों को बुलाकर सोंप दिया अपना प्यारा म्यूजिक सिस्टम जो कभी हमने बड़े अरमान से खरीदा था -- बिल्कुल मुफ्त . लेकिन देने से पहले उसकी आरती उतारी और यह फोटो खींच लिया यादगार के लिए .

आज खाली पड़ी खिड़की को देखकर एक अजीब सी संतुष्टि महसूस हो रही है . चलो फिर किसी के चेहरे पर मुस्कराहट तो देखने को मिली .


Thursday, April 21, 2011

रीयर व्यू मिरर में जिंदगी कितनी करीब दिखाई देती है ---

कार के रीयर व्यू मिरर में चीजें दूर दिखाई देती हैं


लेकिन जिंदगी के रीयर व्यू मिरर में झांकें तो बीती बातें कल की सी बात लगती हैं

२००० में नया मिलेनियम शुरू हुआ इन दस सालों में जाने कहाँ कहाँ से गुजर गए

२००० से २००२ तक न्यूक्लियर मेडिसिन में पोस्ट ग्रेजुएशन --२००५ में लाफ्टर चैलेन्ज से हास्य में दिलचस्पी का पुनुर्जन्म --२००७ में दिल्ली हंसोड़ दंगल विजय --२००८ में कविता में रुझान --२००९ में ब्लोगिंग का शुभारम्भ

इन सवा दो सालों में २०० पोस्ट लिख डाले , सभी व्यस्ताओं के बावजूद

विषय भी बहुत भिन्न भिन्न रहे :

) सामाजिक मुद्दे : ४७ पोस्ट

विषय --मोबाईल मेनिया , हंसने का महत्त्व , भिखारी , भ्रष्टाचार , दिल्ली का ट्रेफिक , शादियाँ और फिजूलखर्ची , संस्कृति , अंध विश्वास , खाद्य पदार्थों में मिलावट , होली , दिवाली , सगोत्रीय विवाह , अपनापन , धूम्रपान , आडम्बर , गीता का ज्ञान , पीपल की महिमा , भंडारा , पागल , रीति रिवाजें , आस्था , घरेलु हिंसा , एच आइ वी और शादी , प्रकृति , पर्यावरण , बचपन आदि

) कविता : ४३ पोस्ट

हास्य कवितायेँ , ग़ज़ल , नज्में , दोहे , मुक्तक --सभी पर प्रयोग


) दिल्ली दर्शन और सैर सपाटा ( फोटोग्राफी ) : ३० पोस्ट

कनाडा -टोरोंटो , क्यूबेक , एल्गोन्क़ुइन
दिल्ली - लोदी गार्डन , नेहरु पार्क , इण्डिया गेट , ट्रेड फेयर , रिज पार्क , पुराना किला , लाल किला , ज़ामा मस्जिद , कवि नीरज से मुलाकात , दिल्ली हाट , तालकटोरा पार्क , गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसिज और राष्ट्र मंडल खेलों का दिल्ली पर प्रभाव

अंडमान निकोबार द्वीप समूह

गोवा की सैर


) हास्य -व्यंग लेख : ३० पोस्ट

) स्वास्थ्य संबंधी लेख : १९ लेख

मोटापा , ग्लोबल वार्मिंग , बाल शोषण , एपिलेप्सी , एड्स , ह्रदयघात , हिपेटाईटिस , सिंड्रोम एक्स , हाईपरटेनशन, कोबाल्ट ६० , रेबीज , गाउट , आर्थराईटिस , आर एस , हाइपोथायरायडिज्म , हाईपरथायरायडिज्म, ८० तक कैसे जियें और विश्व स्वास्थ्य दिवस की रिपोर्ट


) फिल्म समीक्षा और अभिनेत्रियाँ : ४ पोस्ट -- थ्री इडियट्स , मुग़ले आज़म, मीना कुमारी , माधुरी दीक्षित पर लेख ।

) लघु कथा :

) अन्य --विविधा : २६ पोस्ट


इस तरह राजनीति को छोड़कर लगभग सब विषयों पर लिखा , एक ऑल राउंडर की तरह

इस बीच ब्लोगर्स आते रहे और जाते रहे । आरम्भ की टिप्पणियों को देखें तो कई ब्लोगर बन्धु ब्लोगिंग से विदा ले चुके हैं । कईयों ने लिखना काफी कम कर दिया है । कुछ ही हैं जो टिके हुए हैं ।

हम भी सोच रहे हैं कि कोई माने माने , हम भी अब सीनियर ब्लोगर बन चुके हैं

इसलिए नए ब्लोगर्स के लिए जगह खाली करनी चाहिए ।
वैसे भी मनुष्य को हमेशा नए मुकाम की तलाश लगी रहती है । तभी तो विकास होता है ।

अब कुछ नया किया जाएशायद पुस्तक प्रकाशन ! या फिर मंच पर उपस्थिति बढ़ाना
जो भी हो , एक्स्ट्रा क्यूरिकुलर एक्टिविटी तो चलती रहनी चाहिएहालाँकि यदा कदा ब्लोग्स पर भी दिखाई देना होता रहेगा

शुभकामनायें

Friday, April 8, 2011

जिंदगी तेरे कितने रूप ---

आज फिर प्रस्तुत हैं , कुछ नज्में -जिंदगी से जुडी हुई :

१) रिक्शाचालक

वह गाँव से दूर
महानगर में आकर
साईकलरिक्शा चलाता ।
दस घंटे बहाकर पसीना
रोज
१५० रुपल्ली कमाता।
पचास गुल्लक में
घर का महीना ,
पचास
रोज का हफ्ता ,
और पचास को खा 'पीकर'
उसी रिक्शे पर
मज़े से सो जाता ।

) भिखारिन

वह
दुबली पतली
अल्हड़ कमसिन सी
रोज उसी चौराहे पर
तीन छोटे भाई बहनों के
हाथ पकड़कर
हाथ फैलाती
लाल बत्ती पर खड़ी
लम्बी गाड़ियों के
मालिकों के सामने ।
कोई एक रुपया देता
कोई फटकार
वह आगे बढ़ जाती
उछलती
कूदती फांदती
झलकते
वक्षस्थल को
घूरती , ललचाई
वहशी नज़रों से बेखबर ।
अब उसके हाथों में
एक नन्हा शिशु
आ गया है ।
उसकी
फिर से गर्भवती हो गई
मां
बेवक्त
नानी बन गई है ।


) वेश्या

वह रोज सवेरे
लहला धुलाकर
सजाती संवारती
नन्ही सी जान को ।
और बिठा देती
स्कूल के रिक्शा में
एक अच्छा
नागरिक
बनाने
की चाह में ।

फिर
नहा धोकर
खुद सजती,
संवारती
अपने जिस्म को
और बैठ जाती
काम के इंतजार में ।
इंतजार जो
काम का कम
आराम का अधिक
किन्तु
कभी ख़त्म होने वाला ।

स्कूल के रजिस्टर में
एक कॉलम
अभी तक खाली पड़ा है ।
बच्ची रोज पूछती है
मां से
अपने पिता का नाम ।

नोट : हम कुँए के मेंढक हैंअपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैंबाहर निकलकर देखें तो दुनिया के कितने अनजाने रंग दिखाई देते हैं

Thursday, March 17, 2011

जिंदगी के मायने कितने जुदा होते हैं----

इससे पहले कि सब के साथ हम भी होली के रंग में रंग जाएँ , आज प्रस्तुत हैं कुछ बेहद गंभीर नज़्में , जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों को दर्शाते हुए


I) जिंदगी के मायने :

सूने आसमां को ताकते
किसान के माथे पर
चिंता की लकीरें उभर आई हैं,
बरसात की देरी से
सूखती
फसल को देखकर ।

कुम्हार ने ख़ुशी ख़ुशी अभी
दबाया है कच्चे बर्तनों को
अंगारों में ।

तभी आसमां में उमड़ते बादलों को देख
किसान मुस्करा उठा ,
कुम्हार के मस्तक पर
चिंता की लकीरें उभर आई ।

जिंदगी के मायने कितने जुदा होते हैं


II) रक्षक और भक्षक :


जेठ की गर्मी में झुलसते
जंगल में
सूखे पेड़ की टूटी टहनी पर बैठा
भूखा गिद्ध देख रहा था
बकरियों को घास चरते ।
और सोच रहा था कि
कोई मरे तो पेट भरे !

तभी एक बाज़
कहीं से उड़ता आया
और
उठा ले गया
एक जिंदा मेमने को ।
और खा गया मारकर।

रब ने किसी को रक्षक , किसी को भक्षक बनाया है


III) साँझ और सवेरा :



अस्पताल के आपातकालीन विभाग में
एक मरीज़ दम तोड़ रहा था ,
उसके सम्बन्धी तन मन से
जुटे थे
जिंदगी की दुआ मांगने में ।
सांस अभी चल रही थी ।

बाहर गेट पर
एक शव वाहन चालक
खड़ा था मायूस सा ,
वाहन पर कोहनी टिकाये
मन में उम्मीद लिए कि
कोई स्वर्ग सिधारे
तो उसका दिन सुधरे ।
कल भी तो फाका ही गया था ।

तभी एक एम्बुलेंस आई
दुर्घटना के शिकार
एक युवक को लेकर ,
वाहन चालक की आँखों में
एक अज़ीब सी चमक उभर आई ।

संसार में कहीं साँझ होती है , तो कहीं सवेरा

नोट : ये नज्में अस्पताल से निकलते हुए गेट पर देखे दृश्य से प्रेरित होकर लिखी गई हैं

Tuesday, March 15, 2011

डॉक्टर मुझे बचा लो , मैं अभी मरना नहीं चाहता ----

कभी कभी सोचता हूँ , जिंदगी भी कितनी अज़ीब चीज़ हैमनुष्य अभावों में रहकर जिंदगी गुजार देता है, अच्छे भविष्य की आस मेंअपनी जिम्मेदारियां पूरी करते करते आदमी की जिंदगी पूरी हो जाती हैअभावों से छुटकारा मिलता है तो जिंदगी का भाव ख़त्म हो जाता हैउधर एक तरफ इच्छाएं बढती जाती हैं , दूसरी तरफ मन में जीने की लालसा भी बढती जाती है

प्रस्तुत है , जिंदगी की ऐसी ही एक कशमकश :


I)

डिस्पेंसरी के डॉक्टर से
बोला बीमार
सरकार ,
मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।

अभी करनी है बहन की शादी
घर में दादा दादी ,
और मात पिता का भार है ,
अभी जी भर के देखना संसार है ।

छोटे छोटे हैं बच्चे
उम्र में कच्चे ,
रोज चॉकलेट मांगते हैं ।
नादां नहीं जानते हैं
कितनी महंगाई है ,
फिर मैंने भी तो नई नई नौकरी पाई है ।
उस पर ये बीमारी
वर्ना नहीं कराहता
डॉक्टर मुझे बचालो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।

II)

डॉक्टर अब नर्सिंग होम में बैठा था
टेबल पर लेटा था ,
वही मरीज़ , कह रहा था
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।
बेटे के कॉलिज की फीस भरनी है
शादी भी करनी है ,
बेटी स्यानी हो गई है ।
ताउम्र
किराये पर रहकर ,
पत्नी भी दीवानी हो गई है ।
डी डी ए पर आँख लगाए बैठी है ,
एल टी सी लेकर
चार धाम यात्रा की आस लगाए बैठी है ।
पर लाचारी है
ये कैसी बीमारी है
मैं नहीं जानता ,
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं मरना नहीं चाहता ।

III)

डॉक्टर का नर्सिंग होम
अब बन गया है कॉर्पोरेट अस्पताल ,
दिल का हाल
प्राइवेट रूम में लेटा इस बार ,
सुना रहा है वही बीमार ।
इस दिल को संभालो ।
मैं अभी मरना नहीं चाहता
डॉक्टर मुझे बचा लो

बंगला नया बनाया है ,
अभी उद्घाटन भी नहीं कराया है ।
लगाया है ,
स्टॉक्स में कुछ पैसा
खरीदे कुछ गहने हैं ।
प्लॉट के रेट भी तो अभी बढ़ने हैं ।
बस दिल में एक स्टेंट डलवा लूँ ,
घुटने दोनों बदलवा लूँ ।
कटवा लूँ
टिकेट यू एस की ,
बेटे ने बुलावा भेजा है ।
देखना है पोते का चेहरा
दिल मेरा ,
बहुत करता है जाने का ।
अभी तो रंग देखना है जमाने का ।
दिल करता है लेने का
चैन की सांस ,
आस पास की तरक्की का अहसास ,
अब होने लगा है ।
दुनिया की रंगीनियों में अब
मन खोने लगा है ।

क्रूज , केसिनो , क्लब, रेस्तरां, एस्केलेटर
मेट्रो , मॉल , मोबाइल , टी थ्री ट्रेवेलेटर
हर कोई कितना नहीं सराहता
डॉक्टर मुझे बचा लो
मैं अभी मरना नहीं चाहता ।



नोट : बीता कल गुजर गया भविष्य का किसी को पता नहीं जो आज है , वही सच है आज के एक एक क्षण को ख़ुशी से जीया जाए बस यही फ़लसफ़ा है जिंदगी का