Thursday, December 18, 2014

जितनी स्कूल कॉलेज की औपचारिक शिक्षा आवश्यक होती है , उतनी ही अनौपचारिक शिक्षा भी आवश्यक होती है ---


आजकल के बच्चे हमारे ज़माने के बच्चों से ज्यादा भाग्यशाली होते हैं ! न सिर्फ आजकल सुख सुविधाएं ज्यादा उपलब्ध हैं , बल्कि शिक्षा के क्षेत्र मे भी अब अभिभावकों द्वारा बच्चों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है ! ६० और ७० के दशक मे मात पिता जीविका उपार्जन मे ही इतने व्यस्त रहते थे कि बच्चों की पढ़ाई की ओर ध्यान ही नहीं जा पाता था ! बच्चा विधालय मे क्या कर रहा है , होम वर्क करता है या नहीं या फिर वह अपना समय कैसे व्यतीत करता है , इस ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता था ! शिक्षा के क्षेत्र मे भी मेधावी छात्रों के लिये मेडिकल और इंजीनियरिंग के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था ! जो बच्चे इन दो क्षेत्रों मे नहीं जा पाते थे और जिन्हे कुछ कर दिखाने का ज़ुनून होता था , वे अक्सर कॉलेज मे आर्ट्स सब्जेक्ट लेकर सिविल सर्विसिज की तैयारी करते थे ! इसके अलावा विधालय मे मास्टर बनना ही एक विकल्प रह जाता था ! 

लेकिन आजकल शिक्षा और व्यवसाय के मामले मे बच्चों और युवाओं के सामने अनेक विकल्प होते हैं ! मेडिकल की पढ़ाई तो अत्यंत सख्त होती है और बहुत से बच्चे इसे पसंद ही नहीं करते ! लेकिन इंजीनियरिंग मे बच्चों की रुचि दिन पर दिन बढ़ती जा रही है ! हालांकि अधिकतर बच्चे इसके बाद एम बी ए करने की कोशिश करते हैं और अपना कार्य क्षेत्र ही बदल लेते हैं ! अब अभिभावक भी बच्चों की पढ़ाई मे बच्चों जितना ही शामिल होते हैं ! होम वर्क करना हो , या ट्यूशन ले जाना हो , यहाँ तक कि परीक्षा दिलाने के लिये भी अभिभावक काम से छुट्टी लेकर बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित रहते हैं ! 

इन सब के रहते , आश्चर्य नहीं कि अब हमारे बच्चे शिक्षा के क्षेत्र मे विश्व भर मे अग्रणी रहते हैं ! बहुत से बच्चे अब विदेशों मे जाकर शिक्षा ग्रहण करने लगे हैं ! लेकिन आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ साथ इससे जुड़ी समस्याएं भी सामने आने लगी हैं ! अब बच्चे अपने संस्कार भूलते जा रहे हैं ! कहते हैं , जितनी स्कूल कॉलेज की औपचारिक शिक्षा आवश्यक होती है , उतनी ही अनौपचारिक शिक्षा भी आवश्यक होती है , जो घर मे बड़ों से मिलती है ! औपचारिक शिक्षा से जहां भौतिक विकास होता है , वहीं अनौपचारिक शिक्षा से नैतिक विकास होता है ! असली विकास वही होता है जब आधुनिकता के साथ साथ हम अपने संस्कारों को भी जीवित रख सकें ! वर्ना आधुनिकता की आंधी मे संस्कार खत्म होकर हम अपनी पहचान ही खो जायेंगे ! 

१७ - १८ की उम्र मे शिक्षा के अलावा कुछ और बातों का भी ध्यान रखना ज़रूरी है ! इनमे सबसे महत्त्वपूर्ण है किसी भी नशे की लत से बचना ! इस उम्र मे प्रभावित होना बहुत सहज और सरल होता है ! इसलिये अक्सर युवा अपने संगी साथियों के प्रभाव मे आकर धूम्रपान जैसी आदत का शिकार हो जाते हैं ! धूम्रपान एक ऐसा मीठा ज़हर है जो धीरे धीर अपना प्रतिकूल प्रभाव छ्ड़ता है और हमारे शरीर को हानि पहुंचाता है ! जब तक हम इसका अहसास करते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ! इसलिये इन व्यसनों से बचे रहना अत्यंत आवश्यक होता है ! 

याद रखिये, धूम्रपान करने से क्या हस्र होता है :

सिगरेट पीते थे हमदम , हम दम भरकर, 
अब हरदम हर दम पर दम निकलता है !   

Wednesday, November 12, 2014

आओ , जीव जंतुओं से ही कुछ सीख लिया जाये ... एक लघु चित्रकथा !


दोपहर का समय , सूरज लगभग सर पर , अक्टूबर माह की तेज लेकिन सुहानी धूप और हरा भरा पार्क ! वायु का प्रवाह ना के बराबर होने से झील का साफ पानी एकदम स्थिर ! पानी मे आस पास के पेड़ों का प्रतिबिम्ब झील की सुंदरता को बढ़ाते हुए ! कुल मिलाकर एक नयनाभिराम दृश्य मन को शांति और सकूं पहुंचाता हुआ ! ऐसे मे दूध सी सफेद बतखों का एक झुण्ड पार्क की हरी घास से निकल कर पानी की ओर बढ़ता हुआ जैसे किसी राजा की पंक्तिबद्ध सेना युद्ध के मैदान की ओर जाती हुई !  


झुण्ड के सबसे आगे झुण्ड के सरदार और उसके पीछे सेनापति सबसे पहले पानी मे अवतरित हुए तो झील के शांत पानी मे ऐसी तरंगें पैदा हुई जैसे किसी षोडशी को देखकर किसी तरुण के दिल मे उत्पन्न होती हैं ! पेड़ों की छाया भी जैसे प्रेमासक्त नागिन सी लहराने सी लगी ! छपाक की आवाज़ ने कानों मे ऐसा मधुर स्वर घोल दिया जैसे किसी संगीतकार की बांसुरी की धुन पर किसी तबलची ने धाप छोड़ी हो ! पार्क की खामोशी मे छई छप्पा छई की तान जैसे वातावरण मे गूँजने लगी ! 





फिर एक अनुशासित बटालियन की तरह बतखों का समूह चल पड़ा अपनी मंज़िल की ओर जैसे सरदार ने सबको कोई मूक संदेश दे दिया हो ! झील के गहरे नीले पानी मे सफेद रंग की बतखें मोतियों सी चमक रही थी ! पानी की सतह पर वे जैसे स्‍वत: ही तैर और चल रही थी ! पानी की तरंगों का दायरा अब फैलता जा रहा था जो पानी मे बनी बाकि छवियों को लहराता सा जा रहा था !




बतखें अब अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गई थी ! शायद यह उनकी जीविका का रोजमर्रा का हिस्सा था क्योंकि उन्हे मालूम था कि चारा कहाँ मिलने वाला था ! चारा डालने वाले भी जैसे तैयार ही बैठे थे ! 


अब सब तन्मयता से चुग्गा चुगने मे व्यस्त हो गई थी ! दाना खाने मे उनकी तत्परता देखते ही बनती थी ! लेकिन अब वे अकेली नहीं थी ! पानी मे रहने वाले अन्य जीव भी इस प्रक्रिया मे शामिल हो गए थे ! जिसका दांव लग रहा था वही मूँह मे दाना दबोच लेता था ! इंसान और अन्य जीव जंतुओं मे यह मूक रिश्ता बड़ा दिलचस्प लग रहा था ! मनुष्य उन्हे खाते देख कर खुश थे और वे मनुष्य के हाथों दावत पाकर !    



क्या हम सभ्य समाज मे रहने वाले सभी जीवों मे सबसे ज्यादा विकसित प्राणी इंसान बनकर इन जलस्थलचर प्राणियों की तरह बिना लड़े झगड़े मिल जुल कर नहीं रह सकते !!  


Sunday, October 26, 2014

दमन से सिलवासा , एक खूबसूरत सफ़र , जहां झील और पहाड़ आपका मन मोह लेते हैं ...


मुंबई से दमन हालांकि मात्र १८० किलोमीटर दूर है लेकिन एक रात रुकने के बाद आपको देखने को कुछ विशेष नहीं मिलेगा ! यदि आप दो रात रुकने के लिये आये हैं तो एक बढिया विकल्प है सिलवासा की सैर ! दमन से सिलवासा मात्र २५ किलोमीटर दूर है और उसी सड़क पर पड़ता है जिससे होकर आप हाईवे से दमन पहुंचते हैं ! दमन से सीधी सड़क हाईवे को पार कर दादरा होती हुई सिलवासा को जाती है ! दादरा भी दमन की तरह केन्द्रशासित प्रदेश है जबकि सिलवासा गुजरात मे पड़ता है !   



यूँ तो दादरा सिलवासा सड़क काफी धूल भरी लगी लेकिन सिलवासा के बायीं ओर का क्षेत्र बहुत हरा भरा है ! शहर से पहले ही एक पार्क है जिसमे एक सुन्दर झील बनी है ! विश्वास नहीं होता कि एक वर्णनातीत शहर मे इतना खूबसूरत पार्क कैसे अनुरक्षित है !        





झील के चारों ओर और हरी भरी घास के मध्य फुटपाथ बने हैं जिस पर चलकर यूँ लगता है जैसे हम मेडिटेशन कर रहे हों ! हालांकि बाहर सड़क पर वतावरण धूल मिश्रित था , लेकिन हरी हरी घास और उसके बीच धोलपुर स्टोन मे बना फुटपाथ ऐसा लग राहा था जैसे बारिश मे नहाया हुआ हो !  




सिलवासा शहर से बाहर निकलते ही बायीं ओर ही एक छोटी सी सड़क जाती है जो मधुबन रिजर्वायर को जाती है ! घनी हरियाली के बीच से होकर एक पतली सी सड़क डैम तक जाती है जिसके पास के छोर पर एक सरकारी रेस्ट हाउस बना है जिसके बाहर से आम जनता रिजर्वायर से बनी सुन्दर विशाल झील का सुन्दर नज़ारा देख सकती है ! क्योंकि हम स्वयं एक सरकारी अफसर हैं , इसलिये हमने यह लुत्फ अंदर जाकर उठाया ! यहीं पर बने रेगुलेटर से निकलती है दमन गंगा नाम की नदी जो दमन जाकर अरब सागर से मिलती है !     
डैम से वापस आते हुए रास्ते मे एक छोटा सा टाईगर सफारी है जो बड़ा निराशाज़नक लगा ! बहुत कम क्षेत्र मे एक अकेली मरियल सी शेरनी को देखने के लिये एक रिकेटी गाड़ी मे बैठकर घूमना २५ रुपये प्रति सवारी भी समय और धन की बर्बादी ही लगी ! ज़ाहिर है , इसे आसानी से छोड़ा जा सकता है ! मेन रोड पर आकर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक डियर पार्क भी बना है जहां यदि फालतू समय हो तो जाया जा सकता है ! हालांकि लंच के बाद शाम को ३-६ बजे तक ही  खुला रहता है !  




इस रिज़रवायर से बनी झील इतनी विशाल है कि मीलों तक बस पानी ही पानी दिखाई देता है जिसके बीच हरे भरे टापू भी नज़र आते हैं ! झील के आखिरी छोर तक जाने के लिये और ३० किलोमीटर आगे जाना पड़ता है ! मेन रोड़ से मुड़ने के बाद जल्दी ही घनी हरियाली से होती हुई सुन्दर सड़क छोटे छोटे गांवों से होती हुई पहाड़ी क्षेत्र मे आ जाती है ! यहाँ ऐसा लगता है जैसे हम किसी खूबसूरत हिल स्टेशन पर जा रहे हों ! एक जगह पर सबसे ऊंचे स्थान से झील का नज़ारा अत्यंत रमणीक दिखाई देता है !      




घने पेडों के बीच से झील का एक और दृष्य ! 




पहाड़ से सड़क धीरे धीरे ढलान पर होती हुई घाटी मे आ जाती है जहाँ हरे भरे समतल क्षेत्र से होती हुई कभी उपर कभी नीचे होती हुई हिचकोले खिलाती हुई सड़क पर गाड़ी सरपट दौड़ती है ! यहाँ आकर सफ़र और भी सुहाना हो जता है ! ऐसा लगता है जैसे हम किसी सुनसान इलाके मे जा रहे हों ! लेकिन अन्तत : दूधनी नाम का एक कस्बा दिखाई देता है जहाँ स्कूल , चिकित्सा केन्द्र और अन्य सरकारी दफ्तर दिखाई देते हैं जिन्हे देखकर लगता है जैसे जंगल मे मंगल हो गया हो !     




इक्के दुक्के मकानों से बने दूधनी कसबे के अन्त मे बना है यह पर्यटन विभाग का रेस्ट हाउस जिसके खूबसूरत हरे भरे लॉन को देखकर ही यहाँ एक रात बिताने का मन करने लगता है ! इसमे कई कोटेजिज बनी हुई हैं , हालांकि हमने इसमे रुकने के लिये सम्बन्धित जानकारी हासिल नहीं की ! लेकिन झील किनारे बने इस रेस्ट हाउस को देखकर ही आनंद आ जाता है ! 




और यह है झील का किनारा दूधनी एंड पॉइंट , जहाँ से आप झील मे बोटिंग करने के लिये बोट और शिकारा किराए पर ले सकते हैं ! चार व्यक्तियों की बोट का किराया था २०० रुपए , आधे घंटे के लिये ! बोटिंग के लिये इतना खूबसूरत प्लेटफार्म हमने पहले कभी नहीं देखा !   




यूँ तो डैम से बनी झील काफी बड़ी है और विशाल क्षेत्र मे फैली है , लेकिन पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण झील के आस पास अनेक गांव और खेत खलिहान नज़र आते हैं ! झील भी छोटे छोटे टुकडों मे बटी नज़र आती है ! लेकिन हौले हौले बहती पवन झील के पानी मे छोटी छोटी लहरें पैदा करती हैं जिन पर जब सूर्य की किरणें गिरती हैं तो ऐसा लगता है जैसे झील के पानी मे सोने के टुकडे बिखर गए हों !       




चप्पू से चलने वाली बोट करीब आधे घंटे मे एक टापू पर पहुंच जाती है जहाँ हम आधे घंटे तक रुक कर प्रकृति का आनंद ले सकते हैं ! इसके लिये टोटल किराया २५० रुपए है ! यहाँ एक खूबसूरत बगीचा बनया गया है जिसके चारों ओर खूबसूरत कोटेज बनी हैं जहाँ आप रात के लिये रुक सकते हैं !      



यह स्थान बहुत खूबसूरत लगा और यदि पहले पता होता तो यहा रुकने का प्रबन्ध किया जा सकता था जो अपने आप मे एक अनुपम अनुभव होता ! चारों ओर पहाड़ और उनके बीच मे झील जैसे एक स्वर्गिक अहसास देती हुई !  




इस सुहाने सफ़र से वापस आकर शाम को समुद्र किनारे बने रेस्ट्रां के बार मे बैठकर चिल्ड बियर पीते हुए सागर की लहरों को देखना वास्तव मे शब्दों मे अवर्णनीय एक सुखद अहसास है ! लेकिन यह तभी सम्भव है जब आप अपने किसी खास के साथ हों और दिलों मे प्यार हो ! इसलिये यदि संभव हो या कभी अवसर मिले तो अपनी इच्छाओं का दमन न करते हुए आप दमन जाइये और मुंबई के करीब एक पर्यटक स्थल का आनंद लीजिये !     


Friday, October 10, 2014

मुम्बई से दमन , एक सप्ताहंत यात्रा ---


दिल्ली के आस पास २०० से ३०० किलोमीटर की दूरी पर अनेक पर्यटक स्थल हैं जहां देश विदेश से सैलानी घूमने के लिये आते हैं ! दिल्ली वालों के लिये भी ये स्थल अच्छे वीकेंड एस्केप का काम करते हैं ! इसी तरह मुम्बई के आस पास भी कुछ स्थान ऐसे हैं जहां मुम्बईकार सप्ताहांत मज़े से बिताकर तरो ताज़ा महसूस कर सकते हैं ! इन्ही मे से एक है , केन्द्रीय शासित प्रदेश दमन !  



मुम्बई से दमन की दूरी मात्र १८० किलोमीटर है ! यहाँ जाने के लिये आपको राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर ८ पर जाना पड़ेगा जो मुम्बई से अहमदाबाद को जाता है ! रास्ते मे ३-४ टॉल प्लाज़ा मिलेंगे जहां आपको टॉल टैक्स देना पड़ेगा ! लेकिन हाईवे बहुत अच्छा बनाया गया है और बहुत ही खूबसूरत हरी भरी वादियों से होता हुआ गुजरता है ! इसलिये जल्दी ही आप टॉल की मार को भूल जाते हैं ! 




दोनो ओर छोटे छोटे हरे भरे पहाड़ विभिन्न आकृतियों मे आपका मन मोह लेते हैं ! महाराष्ट्र गुजरात बॉर्डर पर आपको गाड़ी का एंट्री पास भी बनवाना पड़ेगा ! अन्तत: वापी नाम के शहर से बायीं ओर मुड़कर करीब १२ किलोमीटर के बाद आप पहुंच जाते हैं दमन ! यूं तो यह एक छोटा सा कस्‍बा जैसा ही है लेकिन समुद्र किनारे अनेकों होटल और रिजॉर्ट्स बने हैं जहां ठहरना अपने आप मे एक अनुपम अनुभव होता है ! अधिकतर होटल्स देवका बीच रोड़ पर बने हैं जिनमे रेस्ट्रां समुद्र किनारे इस तरह बनाये गए हैं कि आप खाते पीते हुए समुद्र की लहरों का आनंद ले सकते हैं !     


लेकिन यह तभी संभव है जब समुद्र मे पानी हो ! चौंकिये मत , पहली नज़र मे आपको ऐसा ही लगेगा ! दिन के समय समुद्र का तल काफी नीचे हो जाता है जिससे पानी किनारे से २००-३०० मीटर दूर चला जाता है ! और आपको दिखाई देते हैं ये काले काले पत्थर जिनके बीच कहीं कहीं थोड़ा सा पानी ऐसे नज़र आता है जैसे समुद्र मे भी सूखा पड़ गया हो !  




लेकिन यदि दिल मे उमंग हो और अपनों का साथ हो तो रेगिस्तान मे भी आनंद मनाया जा सकता है ! घूमने वाले पत्थरों और रेतीले पानी को पार कर दूर समुद्र किनारे तक पहुंच ही जाते हैं ! विशेषकर शाम के समय नज़ारा अद्भुत होता है जब अरब सागर मे पश्चिम की ओर सूर्य की लालिमा समुद्र की लहरों के साथ अठखेलियाँ करने लगती है ! सैलानी इस अलौकिक दृश्य को आँखों मे भरकर भाव विभोर हो जाते हैं ! 



सूरज के ढलने के साथ ही समुद्र तल उपर उठने लगता है और पानी का स्तर भी बढ़ने लगता है ! अब सभी किनारे की ओर प्रस्थान करने लगते हैं ! हालांकि मौज मस्ती के मूड मे आये कुछ युवा लोग पानी के किनारे बैठ कर बीयर का सेवन करते नज़र आते हैं , लेकिन शाम के समय जब पानी का स्तर बढ़ने लगता है , तब ऐसा दुस्साहस करना एक मूर्खतापूर्ण कदम साबित हो सकता है ! 



बीच पर बने सभी होटल्स मे रेस्ट्रां समुद्र की ओर बनाये गए हैं ताकि खाने पीने के साथ साथ आप समुद्र से आती शीतल हवा का भी आनंद ले सकें ! शाम के समय यहाँ संगीत और ग़ज़लों के स्वर भी गूँजने लगते हैं ! सभी रेस्ट्रां मे बार भी उपलब्ध हैं ताकि इनहॉउस ही मदिरापान का लुत्फ़ उठाया जा सके ! हालांकि दमन मे मुम्बई की अपेक्षा शराब बहुत सस्ती है लेकिन बार मे तो रेट महंगे ही मिलेंगे ! फिर भी पीने वालों को रेट नहीं टेस्ट की फिक्र होती है जो यहाँ पूर्ण होती है ! 



रात मे समुद्र तल इतना उपर आ चुका होता है कि पानी अब किनारे तक पहुंच चुका होता हैं ! यह एक अज़ब नज़ारा होता है कि जहां दिन मे दूर दूर तक पत्थर दिखाई देते हैं , वहीं सवेरा होने पर पानी ही पानी दिखाई देता है !  


हालांकि दो दिन का ब्रेक भी आपमे नई चुस्ती और स्फूर्ति का संचार कर सकता है और आप एक अच्छा सप्ताहंत मना सकते हैं , लेकिन यदि आप बीच और समुद्र मे नहाने के शौकीन हैं तो दमन मे बीच निराश ही करेगी ! यहाँ सिर्फ दो ही बीच हैं और दोनो ही काले रंग के पथरीले रेत और रोड़ियों से भरी हैं ! साथ ही पत्थरों के बीच पानी मे नहाना निश्चित ही खतरनाक है ! लेकिन यह शौक पूरा करने के लिये यहाँ एक वाटर पार्क है जिसमे कृत्रिम बीच बनाई गई है जहां आप समुद्र की लहरों का मज़ा ले सकते हैं जैसे टोरंटो के वंडरलेंड मे है ! इसके अलावा दमन मे कुछ विशेष नहीं है ! 
लेकिन निराश मत होइये , यदि आप प्रकृति के बीच घूमने के शौकीन हैं तो अगली पोस्ट पढ़ना मत भूलियेगा ! 


Thursday, September 18, 2014

किसी होटल मे जाएं , बिना खाये ही आयें , इच्छाशक्ति मज़बूत बनाएं ---


तन का मन से सीधा सम्बंध होता है ! यदि इच्छाशक्ति मज़बूत हो तो मनुष्य अपनी सामर्थ्य से ज्यादा बड़े से बड़ा काम भी कर सकता है ! संसार मे सबसे मुश्किल काम होता है किसी आदत को छोड़ना ! इंसान के जीवन मे कई लत ऐसी हैं जो अनचाहे ही गले पड़ जाती हैं ! फिर इनसे छुटकारा पाने की समस्या आ खड़ी होती है ! अक्सर हम इन्हे छोड़ने मे सफल भी होते हैं लेकिन यदि इच्छाशक्ति कम हुई तो दोबारा लत पड़ने की संभावना बनी रहती है ! धूम्रपान , शराब , जुआ , चोरी करना , यौन क्रिया , शॉपिंग यहाँ तक कि खाना भी एक लत बन सकती है जो ना हमारे शरीर को प्रभावित करती है बल्कि हमे मानसिक , आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी क्षीण बना देती है ! इनसे छुटकारा पाने का एक ही तरीका है , और वह है इच्छाशक्ति का द्रढ होना ! बुरी आदतों से निज़ात पाने के लिये चिकित्सीय उपचार भी उपलब्ध हैं , लेकिन इसका प्रभाव भी तभी पड़ता है जब मनुष्य स्वयम् मानसिक रूप से इसके लिएे तैयार हो और द्रढ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करे ! 

इच्छाशक्ति तभी द्रढ मानी जाती है जब : 

* आप धूम्रपान छोड़ चुके हों और सिगरेट देखकर मन ना ललचाये ! 
* आप शराब छोड़ चुके हों , शराब की बोतल सामने रखी हो और हाथ तक ना लगाएं ! 
* आप मॉल घूमने जाएं और बिना शॉपिंग किये ही वापस आ जाएं ! 
* आप बुफ्फे डिनर पर जाएं और सीमित मात्रा मे ही खाना खाएं ! 

कॉलेज के दिनों मे अक्सर हम कई मित्र ज़ेब मे दस रुपये डालकर मार्केट घूमने जाते ! खूब घूम फिर कर और खाने की दुकानों के भी दो चक्कर लगाकर बिना कुछ खाये ही वापस आ जाते ! क्या करते , इतना ही जेबखर्च मिलता था ! लेकिन यह कह कर दिल समझा लेते कि ऐसा करने से इच्छाशक्ति मज़बूत होती है ! ऐसा करते करते इच्छाशक्ति इतनी मज़बूत हो गई कि अब एक पैसा भी खर्च करने का दिल नहीं करता ! कभी कभी तो श्रीमती जी से भी यही सुनना पड़ता है कि हे भगवान कैसे कंजूस से पाला पड़ा है ! अब तो ये आलम है कि यदि कहीं दस बीस रुपये खर्च करने पड़ जाएं तो अपनी तो जान सी निकल जाती है ! ऐसा लगता है जैसे बहुत बड़ा नुकसान हो गया हो ! इसलिये हमने तो खरीदारी का सारा काम श्रीमती जी पर ही छोड़ दिया है ! जब तक अपने हाथ से पैसे नहीं जाते तब तक हमे कोई दुख नहीं होता ! इस तरह, हम भी खुश और श्रीमती जी भी खुश !  

मेरी पत्नी इतनी हाईटेक हो गई है ,
मॉडर्न टेक्नोलॉजी मे इस कद्र खो गई है ! 
कि सारी शॉपिंग क्रेडिट कार्ड से करती है , 
सारे बिल भी अपने कार्ड से ही भरती है ! 
फिर जब उसका बिल आता है हज़ारों का ,
तो उसकी पेमेन्ट मेरे कार्ड से करती है ! 
फिर भी कहती हैं कि सजना , क्यों मायूस हो गए हैं , 
एक पैसा खर्च नहीं करते , आप बड़े कंजूस हो गए हैं ! 

Monday, September 8, 2014

इट'स वेरी ईज़ी तो स्टॉप स्मोकिंग , एंड आइ हॅव डन इट सो मेनी टाइम्स ---


युवावस्था मे , विशेषकर कॉलेज के दिनों मे, मूँह मे सिगरेट लगाना मित्रों के संग एक शौक के रूप मे आरंभ होता है ! लेकिन जल्दी ही यह शौक एक लत बन जाता है ! आरंभ के दिनों मे मूँह मे धुआँ भरकर उड़ाना अच्छा लगता है लेकिन जल्दी ही समझ मे आ जाता है या मित्रों द्वारा समझा दिया जाता है कि सिगरेट पीने का सही तरीका क्या है ! यानि धुआँ मूँह मे भरकर गहरी सांस लेते हुए धुएं को फेफड़ों मे भरना पड़ता है ! धीरे धीरे निकोटीन अपना प्रभाव दिखाने लगती है और एक और मासूम युवक धूम्रपान की लत का शिकार हो जाता है ! 

हमारे फेफड़ों मे जाने वाले धुएं मे मौजूद कार्बन के कण फेफड़ों की कोशिकाओं मे जमकर अपना घर बना लेते हैं ! यदि वर्षों तक धूम्रपान किया जाता रहा तो काफी मात्रा मे कार्बन जमा होकर फेफड़ों को गला देता है जिससे हमारी सांस लेने की प्रक्रिया मे बाधा उत्पन्न होने लगती है ! यह क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस , ब्रोंकिओकटेसिस , दमा , टी बी और कैंसर जैसे भयंकर रोगों को जन्म देती है ! अन्तत: फेफड़े इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि एक एक सांस लेने के लिये भी दम लगाना पड़ता है ! सिगरेट के धुएं मे मौजूद निकोटिन ना सिर्फ लत लगाकर मज़बूर कर देती है बल्कि हमारे शरीर की कई प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करती है जैसे ब्ल्ड प्रेशर और हृदय गति का बढ़ना जिससे धीरे धीरे हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है !  

वर्षों पहले दिल्ली के आई टी ओ चौराहे पर लाल बत्ती पर स्कूटर पर इंतज़ार करते हुए हमने देखा कि वहां बहुत ज्यादा वायु प्रदूषण था ! उस समय दिल्ली मे वायु प्रदूषण अपने जोरों पर था ! धुआँ इतना ज्यादा था कि सांस लेने मे भी कड़वाहट महसूस हो रही थी ! तभी साथ मे खड़े हुए एक और स्कूटर वाले ने सिगरेट निकाली और सुलगाकर आराम से कश लगाने लगा ! यह देखकर हमे अचानक यह महसूस हुआ कि हम तो धुएं से पहले ही परेशान हैं और यह शख्श सिगरेट पिये जा रहा है ! क्या बाहर धुएं की कमी है जो और धुआँ फेफड़ों मे भर रहा है ! 
यह विचार आते ही हमारे ज्ञान चक्षु खुल गए , हमे दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और हमे ऐसी विरक्ति हुई कि उसके बाद हमने कभी सिगरेट को हाथ नहीं लगाया ! 

धूम्रपान से ऐसे ही एक झटके मे निज़ात पाई जा सकती है ! बस द्रढ निश्चय और पक्का इरादा चाहिये ! वर्ना एक बहुत बड़े मेडिसिन के प्रोफ़ेसर ने कहा था : इट'स वेरी ईज़ी तो स्टॉप स्मोकिंग , एंड आइ हॅव डन इट सो मेनी टाइम्स ! 


Saturday, August 23, 2014

काश कि वक्त ठहर जाता ---एक संस्मरण मीठी यादों का !


वो बहुत खूबसूरत थी।  बहुत ही खूबसूरत थी।  बहुत ही ज्यादा खूबसूरत थी। १७ साल की उम्र में कम से कम हमें तो यही लगता था। शायद रही भी होगी।  तभी तो उसके चर्चे दूर दूर तक के कॉलेजों में फैले थे । अक्सर दूसरे कॉलेजों के छात्र शाम को कॉलेज की छुट्टी के समय गेट पर लाइन लगाकर खड़े होते, उसकी एक झलक पाने के लिये  !  हल्का गोरा रंग , बड़ी बड़ी मासूम सी काली आँखें , लम्बी सुन्दर नाक , मखमल से कोमल गाल , औसत हाइट और वेट ! कुल मिलाकर सुन्दरता की प्रतिमूर्ति ! नाक की बाइं ओर यौवन की निशानी के रूप मे किसी पुराने छोटे से मुहांसे का छोटा सा स्कार , जिसे वो बायें हाथ के अंगूठे से जब होले होले सहलाती तो लगता जैसे कोई दस्तकार हीरे को चमका रहा हो ! निश्चित ही उपर वाले ने उसे कदाचित किसी फुर्सत के क्षणों मे ही बनाया होगा ! 

हमारी सरकारी आवासीय कोलोनी और उसकी पॉश कोलोनी दोनों साथ साथ होने की वज़ह से कॉलेज से वापसी अक्सर साथ ही होती ! खचाखच भरी बस मे क्लास के कई लड़के लड़कियाँ आस पास ही खड़े होते ! लेकिन बाहरी मनचलों का आतंक इस कद्र होता कि इज़्ज़त बचानी मुश्किल हो जाती ! ऐसे मे हम यथासम्भव प्रयास करते साथ की लड़कियों को गुंडों से बचाने की ! अक्सर सफल रहते लेकिन कभी कभी असामाजिक तत्व  भारी भी पड़ जाते ! उन दिनों बसों मे छेडखानी आम बात होती थी !  बस का कंडकटर भी गेट मे फंस कर खड़ा रहता ! कुल मिलाकर बसों मे मुश्किल दिन होते थे ! 

पूरे एक साल हम साथ रहे , पढे , आये गए ! लेकिन इसके बावज़ूद आपस मे कभी बात नहीं हुई ! होती भी कैसे , उस समय लड़के लड़की एक ही क्लास मे पढते हुए भी आपस मे बात नहीं करते थे ! वैसे भी वह हम सबका प्री मेडिकल का एक साल का कोर्स था ! सभी अपना करियर बनाने के लिये दिन रात मेहनत मे लगे रहते !  आखिर एक साल पूरा हुआ और लगभग सभी का मेडिकल कॉलेज मे एडमिशन हो गया ! लेकिन हम लड़कों के कॉलेज मे और वो गर्ल्स कॉलेज मे चली गई ! अगले पाँच साल तक उसके दर्शन तभी हुए जब कभी सब कोलेजों की सामूहिक हड़ताल होती थी !  ऐसा नहीं था कि हमारा कोई किसी किस्म का नाता था , लेकिन कभी कभार उसकी खूबसूरती याद आ जाती तो अनायास ही मन को गुदगुदा जाती !   

वो आखिरी दिन था जब हमने उसे आखिरी बार देखा था ! सुबह के दस बजे थे ! कोलोनी के पास वाली मार्केट मे हमने अपनी बुलेट मोटरसाईकल पार्क की ! स्टेंड पर खड़ा कर ताला लगाकर जैसे ही हम चलने को तैयार हुए तो बिल्कुल साथ खड़ी हरे रंग की फिएट कार मे दुल्हन के लिबास मे  बैठी लड़की पर नज़र पड़ी तो हम चौंक गए ! अरे वही तो थी , दुल्हन के भेष मे , सोलह श्रृंगार किए ! वही गज़ब की खूबसूरती ! लेकिन हमारे पास भी ज्यादा सोचने का वक्त ही कहाँ था ! हम भी तो मार्केट के खुलने का इंतज़ार ही कर रहे थे ! और मार्केट मे दुकाने खुल चुकी थी ! बिना ज्यादा सोचे , हम यन्त्रवत से चल दिये साडियों की एक दुकान की ओर जहाँ से हमे एक साड़ी उठानी थी जिसे मां पसंद कर के गई थी ! आखिर ११ बजे मां पिताजी को लड़की वालों के घर पहुंचना था , अपनी होने वाली डॉक्टर बहु के रोकने की रस्म पूरी करने के लिये !  

आज उस लम्हे को गुजरे हुए तीस वर्ष बीत चुके हैं ! कुछ समय पहले संयोगवश उस की एक सहेली और सहपाठी से मुलाकात हुई तो पता चला कि वो शादी करके अमेरिका चली गई थी ! ज़ाहिर है , वो वहीं सेटल हो गई होगी ! लेकिन कभी कभी जब यूं ही उसकी खूबसूरती की याद चली आती है तो सोचता हूँ कि : 

जाने कहाँ होगी ,
वो कैसी होगी ?
क्या वैसी ही होगी !   
या वक्त के बेरहम हाथों ने ,
खींच दी होंगी , 
उस खूबसूरत चेहरे पर , 
आड़ी टेढ़ी तिरछी सैंकड़ों लकीरें !  
काश कि वक्त ठहर जाता ! 


Tuesday, August 5, 2014

ये जिन्दगी एक हादसों का सफ़र है, लेकिन वो साथ है तो क्या फिक्र है --- एक संस्मरण !

घूमने का शौक तो हमे कॉलेज के दिनों से ही रहा है ! लेकिन पहाडों से विशेष लगाव रहा है ! १९९० मे जब पहली बार कार हाथ मे आई तो उसके बाद शिमला , मसूरी , नैनीताल तथा उत्तर भारत अन्य के पहाड़ी स्थलों पर कार द्वारा ही जाना हुआ ! लेकिन दिल्ली से मनाली लगभग ६५० किलोमीटर दूर है ! पहली बार यहाँ १९९० मे जाना हुआ था ! तब ना कार थी ना वोल्वो बसें लेकिन डीलक्स बसें सुबह ६ बजे चलकर रात १० बजे मनाली पहुंचती थी ! हमने भी दो सीटें बुक कराई और पहुंच गए मनाली रात के दस बजे ! लेकिन जून का महीना था और हमने होटल की बुकिंग भी नहीं कराई थी ! बस से उतरकर सामान एक जगह रखा और इधर उधर देखा लेकिन सिवाय अंधकार के कुछ और नज़र नहीं आया ! तभी बस की सवारियों मे से एक हमउम्र दंपत्ती हमारे पास आये और अपना परिचय देते हुए कहा कि चलिये मिलकर कमरा ढूंढते हैं ! हम भी पहली बार मनाली आए थे और इसके बारे मे कुछ भी पता नहीं था ! हमने महिलाओं को सामान के पास छोड़ा और पुरुष चल दिये होटल्स की ओर ! लेकिन दो तीन होटल देखने के बाद ही अहसास हो गया कि उस वक्त कोई कमरा नहीं मिलने वाला था क्योंकि सीजन होने के कारण सभी होटल्स फुल थे !  हारकर हम वापस आ गए और बताया कि कोई कमरा उपलब्ध नहीं है ! अभी हम निराश से खड़े थे कि तभी एक व्यक्ति हमारे पास आया और बोला कि उसके घर पर दो कमरे खाली हैं , चाहें तो हम वहां ठहर सकते हैं ! अब यह तो हमारे लिये एक असमंजस की बात हो गई कि कैसे एक अज़नबी पर विश्वास करें ! उसने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं , उसके पास टैक्सी है और वो हमे ले जायेगा ! हमने भी विचार विमर्श किया और सोचा कि घबराने की क्या बात है , आखिर हम पांच लोग थे ! अन्तत: हमने उसके साथ जाने का निर्णय लिया और रात बिताने के लिये दो साधारण से कमरे मिल ही गए ! सुबह होने पर हम निकल पड़े कमरों की तलाश मे और १० बजे चेकआऊट के समय आखिर कमरे मिल ही गए ! 
बाद मे हमे पता चला कि उस दिन कई लोगों को रात फुटपाथ पर बैठकर ही बितानी पड़ी ! खुले मे रात बिताने वालों मे एक नवविवाहित जोड़ा भी शामिल था ! उधर हमारे नए बने मित्र ने बताया कि वो तो अक्सर ऐसा करते हैं कि जब भी किसी नई जगह जाते हैं तो सबसे पहले किसी दंपत्ती को मित्र बना लेते हैं ! इस तरह अज़नबी जगह भी साथ मिल जाता है ! 

मनाली अगली बार १९९९ मे जाना हुआ ! लेकिन तब हमारा प्रोग्राम बना अपनी मारुति कार द्वारा जाने का ! लेकिन इतना लम्बा सफर हमने एक दिन मे कभी नहीं किया था ! इसलिये जाते समय हम रास्ते मे पड़ने वाले मॅंडी शहर मे रुक गए ! इस तरह हम बिना थके आराम से अगले दिन मनाली पहुंच गए जहां हमारा ठहरने का इंतज़ाम था स्टर्लिंग रिजॉर्ट्स मे जिसके ठीक पीछे श्री अटल बिहारी बाजपेई जी का बंगला था ! इत्तेफाक़ से उसी समय उनका भी आने का कार्यक्रम था , इसलिये सारे रिजॉर्ट मे सुरक्षाकर्मी फैले हुए थे ! लेकिन तभी पता चला कि पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण कर दिया था और बाजपेयी जी का आना केन्सिल हो गया ! लेकिन हमने अपनी मारुति उठाई और १४००० मीटर ऊंचे रोह्ताँग पास पहुंच गए ! हमारे लिये यह सबसे ज्यादा ऊँचाई पर ड्राईव करने का पहला अनुभव था ! हालांकि नीचे आते समय लहराती बल खाती नई बनी सड़क पर ड्राईव कर के आनंद आ गया ! 

सन २००६ मे एक बार फिर मनाली जाने का प्रोग्राम बना ! लेकिन इस बार हमने साहस का परिचय देते हुए तय किया कि हम एक ही दिन मे पूरा सफर तय करेंगे ! क्योंकि हम गाड़ी ज्यादा तेज कभी नहीं चलाते , इसलिये अनुमान था कि १५-१६ घंटे अवश्य लग जायेंगे ! इसलिये हम मूँह अंधेरे सवा चार बजे घर से रवाना हो गए ताकि पौ फटने तक हम हाईवे पर पहुंच जाएं ! आराम से ड्राईव करते हुए हम करीब पौने पांच बजे आज़ाद पुर मोड से होकर हाईवे पर पहुंच गए ! अभी हल्का हल्का सा अंधेरा था लेकिन रौशनी होने लगी थी ! हमने भी राम का नाम लिया और राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर एक पर अपनी टाटा इंडिगो को मोड दिया ! अभी मुश्किल से ५ मिनट ही हुए होंगे कि सामने बायीं ओर एक कट नज़र आया जिसे देख हम थोड़ा स्लो हो गए ! लेकिन तभी हमारे होश उड़ गए ! बायीं स्लिप रोड के तिराहे पर एक भयंकर एक्सीडेंट हो गया था जिसमे हाईवे पर जाती एक कार और स्लिप रोड से आते एक ट्रेक्टर ट्रॉली मे भिड़ंत हो गई थी ! सड़क पर दसियों लाशें बिछी पड़ी थीं ! टक्कर इतनी भयंकर थी कि सब के सब लोगों की मृत्यु ऑन दा स्पॉट हो गई थी ! कुछ ही मिनटों मे वहां लोग इकट्ठा हो गए थे लेकिन सभी हेल्पलेस महसूस कर रहे थे ! इतना भयंकर एक्सीडेंट हमने कभी नहीं देखा था ! सुबह के करीब पांच बजे थे और हमे ६५० किलोमीटर का रास्ता तय करना था ! अब हमारे सामने चलने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था ! लेकिन उस समय हमारी हालत क्या हुई होगी, इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल है ! मौत का तांडव हमसे बस चंद ही मिनट दूर हुआ था ! कार मे जाने वाले यात्री भी हमारे जैसे सैलानी ही रहे होंगे ! 

लेकिन शायद इसी का नाम जिंदगी है ! यह हर हाल मे चलती रहती है ! और हम इसके पुतले हैं ! हाड़ मांस के पुतले जिनमे जब तक जान है तब तक जीवन रहता है ! कब कहाँ किस मोड पर क्या हो जाये , कोई नहीं जानता ! इसलिये हम तो अक्सर यह मानकर चलते हैं कि हम कुछ भी नहीं , सब कुछ उपर वाले के हाथ मे है ! बस उसे याद रखिये तो वो आपको याद रखेगा ! वह हर पल हर जगह मौजूद होता है ! बस आवश्यकता है , उसे महसूस करने की, उसे याद रखने की , ताकि वो आपकी रक्षा कर सके ! 
हमारा सफ़र तो आनंददायक रहा , लेकिन आज भी जब वह वाकया याद आता है तो तन मन को विचलित कर जाता है !   

Sunday, July 27, 2014

हर सुबह की शाम होती है, लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ---


रोजमर्रा की भाग दौड़ की ज़िदगी से हटकर यदि कुछ दिनों  के लिये भी आप शहर से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले जाएं , तो तन और मन मे नई ऊर्ज़ा और स्फूर्ति का संचार हो जाता है 


पर्वतों की रानी मसूरी मे एक सुहानी सुबह , धुंध भरी ! वृक्ष भी जैसे मिलकर हमारा मनोरंजन करने के लिये तैयार थे !  




लेकिन शाम का धुंधलका सूर्य और बादलों के साथ आंख मिचौली खेलता हुआ , पर्वतीय धरा पर अपना रंगई जादू बिखेर रहा था ! 




पर्वतों मे कुछ ही दिन का आराम और सुबह की सैर , और रास्ते मे खोखे की चाय , जीवन को असली आनंद से भर देती है ! 




इस छोटे से स्तूप को अक्सर हम मिस कर जाते थे ! लेकिन देखिये तस्वीर मे कितना भव्य लग रहा है ! 





ये टेढ़े मेढ़े पहाड़ी रास्ते हमे बताते हैं कि जिंदगी कभी सीधी नहीं चलती ! इसमे ना जाने कितने मोड़ , उतार चढ़ाव और पड़ाव आते हैं !   




हमारे लिये तो हर यात्रा एक हनीमून जैसी होती है ! फिर आपकी शादी को तीन दिन हुए हों या तीस साल , क्या फर्क पड़ता है ! यह फोटो एक नवविवाहित युग्ल द्वारा ली गई है ! 




इस वृक्ष ने हमे सिखाया कि कैसे हर विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है ! बहारें फिर भी आती हैं , फिर भी आयेंगी , बस हौसला बनाये रखना आवश्यक होता है ! 





अब पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर भी ध्यान दिया जा रहा है ! यह अच्छी बात है ! 





दिल को सकूं पहुंचाती एक और सुहानी शाम ढलने वाली है !  




अगली भोर ने फिर अपनी सुंदरता बिखेर दी ! 




यहाँ मौसम भी घड़ी घड़ी अंगडाई लेता है ! कभी धूप कभी छाँव ! यही तो खूबसूरती है मसूरी की ! 




शहर मे ही घना जंगल हो तो वायु भी शुद्ध ही होती है ! बस इसे अशुद्ध ना कर दें , यह हमारा फ़र्ज़ है ! 





एक पैरामिलिट्री फोर्स के गेट के पास से मसूरी का यह नज़ारा बड़ा मनमोहक होता है ! कुछ देर तक निहारने के बाद जब हमने एक ज़वान से फोटो लेने का अनुरोध किया तो उसने बड़े प्यार से कहा कि सर मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा था कि आप मुझे फोटो खींचने के लिये कहें ! फिर उसने धड़ाधड़ कई फोटो खींच डाले ! शायद उसे हम मे अपने माँ पिता नज़र आ रहे थे !  





हर सुबह की शाम होती है ! लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ! यही संदेश देती हुई इस शाम के सुनहरे नज़ारे को आँखों मे भरकर हमने अगले दिन दिल्ली के लिये प्रस्थान करने की तैयारी की , मन मे एक बार फिर मसूरी आने की तमन्ना के साथ ! 

Thursday, July 17, 2014

दिल्ली गर्मी मे जले और और मुम्बई मे रिमझिम बारिश पड़े ---


यूं तो मुम्बई जाना किसी व्यक्तिगत काम से हुआ था ! लेकिन जब आ ही गए थे तो आम के आम और गुठलियों के दाम वसूलना तो हमे भी खूब आता है ! इसलिये काम के साथ साथ हमने मुम्बई के मित्रों से भी मिलने की सोची ! लेकिन बारिश के मौसम मे हमारे साथ साथ मुम्बईकारों की भी शायद हिम्मत नहीं पड़ी मिलने मिलाने की ! इसलिये यह काम इस बार अधूरा ही रहा ! हालांकि हमारे पास भी वक्त कम ही था ! 

दिल्ली की गर्मी से त्रस्त जब हम मुम्बई पहुंचे तो बारिश धीमे धीमे ऐसे हो रही थी जैसे इन्द्र देवता थककर कूल डाउन वॉक कर रहे हों जैसे हम पार्क मे आधा घंटा ब्रिस्क वॉक करने के बाद करते हैं ! बाद मे टैक्सी मे बैठने पर टैक्सी वाले ने भी बताया कि एक दिन पहले जम कर बारिश हुई थी जो मुम्बई मे एक सीजन मे केवल तीन बार होती है ! एक तो हो गई थी , बाकी दो का इंतज़ार था ! उस दिन के अखबार मे भी "मुम्बई पानी पानी" जैसे खबरें छपी थीं ! लेकिन गर्मी से परेशान हम दिल्ली वालों को तो यह बारिश पत्नी से भी ज्यादा प्यारी लग रही थी ! 

मुम्बई मे लगातार बारिश होने से यहाँ घरों की दीवारें अक्सर काली पड़ जाती हैं !  सड़कों पर भी गीला गीला अहसास रहता है , लेकिन यहाँ की ज़मीन ज्यादा रेतीली नहीं है जिसकी वज़ह से मकानों और कपड़ों पर धूल नहीं जमती ! लेकिन एक बात ने विशेष तौर पर हमारा ध्यान आकृषित किया ! यहाँ ज्यादातर घरों / मकानों मे बालकनी नहीं होती ! उसकी जगह पर खिड़की मे ग्रिल लगाकर कपड़े सुखाने का इंतज़ाम किया जाता है ! यह बात हम दिल्लीवालों को नहीं भाती ! हमे खुले मे बैठने की बड़ी आदत है ! 

वैसे तो मुम्बई का अधिकांश भाग पुराना सा ही लगता है और कहीं से भी विकसित देश जैसा नहीं लगता ! लेकिन पवई क्षेत्र मे बना हीरानन्दानी आवासीय क्षेत्र का कोई ज़वाब नहीं ! यहाँ आकर एक मुद्दत के बाद किसी विकसित देश जैसा अनुभव हुआ ! बहुमञ्ज़लीय सुन्दर इमारतों के पीछे पहाड़ियों का दृश्य जैसे गज़ब ढा रहा था ! 



मुम्बई आने से पहले हमने फ़ेसबुक पर अपने आने की सूचना इसलिये दी थी ताकि यदि संभव हो तो एक ब्लॉगर मिलन का आयोजन किया जा सके ! लेकिन बारिश , हमारी व्यस्तता और सही संपर्क ना होने से यह संभव ना हो सका ! वैसे भी कुछ एक लोगों को छोड़कर आजकल लगभग सभी आभासी दुनिया मे ज्यादा व्यस्त रहने लगे हैं ! लेकिन सभी विषमताओं के बावज़ूद हमने समय निकालकर एक कार्यक्रम बना ही लिया , मालाड मे रहने वाले श्री हरिवंश शर्मा जी से मिलने का ! देर रात तक उनके घर पर और इस बीच घर के पास मौजूद बीच पर बारिश मे भुट्टा खाते हुए हम चार नौज़वानों ने खूब लुत्फ उठाया !  



आजकल सभी छोटे बड़े शहरों मे मॉल कल्चर खूब पनप रहा है ! सर्दी , गर्मी , या हो बरसात , मॉल्स मे हर समय युवा दिलों की भरमार रहती है ! अधिकतर लोग तो आयु मे भी युवा होते हैं , लेकिन कुछ हमारे जैसे तन से प्रौढ़ लेकिन मन से युवाओं के युवा लोग भी नज़र आ जाते हैं ! 



दिल्ली मे भी मॉल्स मे सिनेमा हॉल होते हैं लेकिन ऐसे नहीं जैसे यहाँ देखे ! हॉल की आखिरी दो पंक्तियों मे रिकलाइनिंग सोफे लगे थे जिन्हे आप सीधे बैठने की पोजीशन से पूरा लेटने की मुद्रा तक एड्जस्ट कर सकते हैं ! यानि आप अपनी कमर के हिसाब से आगे पीछे करते हुए घड़ी घड़ी पोजीशन बदल सकते हैं ! अच्छी बात यह लगी कि यदि फिल्म बोर हो तो आप चैन की नींद सो सकते हैं ! 



दिल ना माने मगर आना भी था ! वो तो समय रहते हमने पहले से ही टैक्सी बुक करा दी थी , वर्ना ऐसी बारिश मे ट्रेन पकड़ना बड़ा मुश्किल पड़ता ! मीटर से डेढ़ गुना किराया तय कर हमने टैक्सी वाले को पहले ही खुश कर दिया था ! लेकिन उसे भी यह आभास नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला था ! एक तो उसकी पचास साल पुरानी फिएट जो अस्सी साल की बुढिया की तरह ज़र्ज़र हालत मे थी, उस पर बारिश का कहर ! सामने वाले शीशे मे भी एक ही वाईपर जिसे वह एक खटका दबाकर एक बार चलाता और बंद कर देता ! शायद एक बार से ज्यादा चलना उसके बस का ही नहीं रहा होगा ! एक समय तो सड़क पर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था !    

वैसे तो मुम्बई की सड़कें अधिक बारिश के कारण आर सी सी से बनाई गई हैं , इसलिये दिल्ली की तरह एक बारिश पड़ते ही गड्ढे नहीं बन जाते ! लेकिन कई जगह पानी की निकासी सही ना होने से हाईवे पर भी पानी भर जाता है , जिससे ट्रैफिक जाम हो जाता है ! हमारे इलाहाबादी ड्राईवर भैया की गाड़ी भी एक दमे के रोगी की तरह मुश्किल से सांस लेती हुई धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी ! हमारी ही उम्र का भैयन भी हमको अंक्ल कहता हुआ बार बार डरा रहा था कि गाड़ी अब बंद हुई और तब बंद हुई ! हमने देखा कि मुम्बई मे मेहनत मज़दूरी करने वाले लोग किसी भी पढ़े लिखे दिखने वाले व्यक्ति को अंकल कहकर ही बुला रहे थे, भले ही उम्र मे वो उससे छोटा हो ! 
अब हाल यह होने लगा था कि हमे डर लगने लगा था कि पता नहीं ट्रेन मिलेगी या नहीं ! हम तो यह सोच कर डर रहे थे कि पता नहीं कैसे स्टेशन पहुंचेंगे और टैक्सी वाला यह सोचकर डर रहा था कि अब वापस कैसे जाउंगा ! अब उसे यह विचार भी सताने लगा था कि उसने कम पैसे मे क्यों हाँ भर दी जबकि वह पहले ही डेढ़ गुना चार्ज कर रहा था ! वह यह सोचकर परेशान था कि आज तो बारिश मे नुकसान हो गया और हम यह सोचकर कि यदि ट्रेन छूट गई तो विमान का टिकेट लेने मे कितने का नुकसान होगा ! इस बीच वह हनुमान का जाप किये जा रहा था कि कहीं टैक्सी बंद ना हो जाये और हम भगवान को याद कर रहे थे कि कहीं ट्रेन ना छूट जाये ! अंत मे दोनो की प्रेयर काम आई और ना गाड़ी रुकी और ना ही ब्रेक फेल हुआ जिसका डर था ! हम समय से पहले ही स्टेशन पहुंच गए थे ! हमने भी उसका ध्यान रखते हुए उसे १०० रुपये ईनाम मे दिये और चल पड़े अपनी मंज़िल की ओर ! 

अब यहाँ बैठे है झेलते हुए दिल्ली की गर्मी !

Wednesday, July 9, 2014

मनुष्य अपने मित्रों से जाना पहचाना जाता है ---


जो ख़ुशी में इतराये ना ,
ग़म से कभी घबराये ना !
ऐसे शख्स का संग भी ,
सत्संग जैसा होता है !

जो ख़ुशी में बुलाये ना ,
ग़म में साथ निभाए ना !
ऐसे शख्स का याराना ,
नादानों जैसा होता है !


जो दिल की बात बताये ना,
दिल की लगी को भुलाये ना !
ऐसे शख्स से दिल लगाना ,
आत्मघात जैसा होता है !




Thursday, July 3, 2014

जब ताई कै चढ़ ग्या ताप -- एक शुद्ध हरयाणवी हास्य कविता !


आज फोकस हरयाणा टी वी चैनल पर एक छोरी को हरयाणवी में समाचार पढ़ते देखकर बहुत हंसी आई ! पहले तो समझ ही नहीं आया कि वो भाषा कौन सी बोल रही थी। फिर स्क्रॉल पर लिखा हुआ पढ़ा तो जाना कि वो तो हरयाणवी बोल रही थी।  उसकी हरयाणवी ऐसी थी जैसे कटरीना की हिंदी ! खैर , उसे देखकर हमें भी जोश आ गया और  ठेठ हरयाणवी में एक हास्य कविता लिख डाली । अब आप भी आनंद लीजिये :


ताई बोल्ली , ऐं रे रमलू , तेरै ताप चढ़ रह्या सै ?
रमलू बोल्या , ना ताई ,
ताई बोल्ली --  रे भाई ,
तू तै बच रह्या सै , पर मेरै चढ़ रह्या सै !

पाहयां में मरी सीलक चढ़ गी ,
ज्यां तै हाडां में निवाई सी बन गी !
पेडू में दर्द सै , कड़ में बा आ ग्या  ,
चस चस करैं सै सारे हाथ पां  !

पांसुआ में चब्बक चब्बक सी हो री सै ,
मात्थे की नस तै , पाटण नै हो री सै ।
देखे रे छाती में तै हुक्का सा बाज्जै सै !
साँस कुम्हार की धोंकनी सा भाज्जै सै !

काळजा भी धुकड़ धुकड़ कर रह्या सै ,
ऐं रे ,मेरा तै हलवा खाण नै जी कर रह्या सै !
रमलू बोल्या  री ताई ,
तू मतना करै अंघाई ।
ख़त्म हो रह्या सै, तू लापसी बणवा ले ,
अर पप्पू की माँ तै पाँह दबवा ले ।
काढ़ा पी ले अर सौड़ ओढ़ कै लोट ज्या  ,
फेर देख यो ताप क्योंकर ना भाज ज्या !

ताई बोली , पाँ तै बेट्टा तेरा ताऊ दबाया करै था ,
मेरी ताहीं गाजरपांख लको कै ल्याया करै था ।
जब्बी दिल्ली जात्ता , चीज़ो ल्याया करै था ,
अर देखे जीमण जात्ता ना, तै बावन लाड्डू खाया करै था !

आग्गै बतावण में सरम सी आवै सै ,
रे मुए तू क्यों मन्नै बात्तां में लगावै सै !
पर देख तेरे ताऊ के नाम का चमत्कार ,
उस नै याद कर कै ए उतर ग्या बुखार !

बेट्टा मर्द बीर का तै सात जनम का हो सै साथ,
पराई लुगाई कैड़यां कदै मतना उठाइये आँख !
आच्छा माणस वो हो सै जो सदाचारी हो सै  ,
जो पराई औरत कै हाथ न लगावै वोए ब्रह्मचारी हो सै। 





नोट : इस कविता में शुद्ध हरयाणवी शब्द इस्तेमाल किये गए हैं।  समझ में न आये तो हम बता देंगे।



Wednesday, June 25, 2014

मसूरी की सैर पर एक कवितामयी चित्रकथा ----


दिल्ली की गर्मी की मज़बूरी ,
ऐसे मे याद आ गई मसूरी ! 
मोदी प्रभाव कहें या यू पी सरकार की समझदारी ,
दो घंटे मे तय हो गई मुज़फ़्फरनगर तक की दूरी !



आठ बजे थे नाश्ते का क्या वक्त था, 
ढाबे पर खाना भी कहाँ उपयुक्त था ! 
खटिया पर बैठ चाय पीना भला लगा , 
शायद ढाबे वाला भी मोदी भक्त था ! 






मसूरी मे सुबह का मौसम सुहाना था,
अपने हाथों मे वक्त का ख़ज़ाना था ! 
सुबह की सैर पर हमे हुआ ये अहसास, 
धुंध से आए हैं इक धुंध मे जाना था ! 




यूं पहाड़ों की जिंदगी ज़रा सुस्त होती है , 
लेकिन पहाड़ियों की चाल चुस्त होती है ! 
हम दो किलोमीटर पैदल चले तो जाना,
कि खोखे की चाय भी बड़ी मस्त होती है ! 



दिन मे मस्ती का चाव छा गया , 
दिल मे साहस का भाव आ गया ! 
डरते डरते पहली बार हमने भी , 
कमर कसी और हवा मे समा गया ! 





शाम को जब सांझ होने को आई , 
आसमान मे थी काली बदली छाई ! 
रंग बिरंगे रंगों ने फिर आसमां मे , 
आधुनिक कला की कलाकृति बनाई ! 





सूरज ने जब पर्वतों पर अंतिम किरणें डाली , 
फैल गई किसी पहाडिन के गालों सी लाली !
दूर किसी चोटी पर बज उठी एक बांसुरिया ,   
और चहकने लगी चिड़ियाँ भी डाली डाली ! 





मॉल की दुकान पर सजी थी मिठाईयां , 
रंगों की छटा लिये ज्यों पंजाबी लुगाईयां ! 
छोटे मोटे पतले लम्बे खाते पीते हंसते , 
मस्ती करते पकड़े बच्चों की कलाईयाँ ! 





हमारा नव विवाहित जोड़ी सा गर्म खून था , 
हम पर भी फोटो खिंचवाने का ज़ुनून था ! 
ना कजरा ना गजरा ना पायल ना सिन्दूर ,
भई आखिर ये हमारा पचासवां हनीमून था ! 




इन वादियों ने देखे होंगे जाने कितने सावन , 
इस मौसम मे गुजरे होंगे जाने कितने यौवन ! 
कहीं वक्त की मार ठूंठ न कर दे इस वादी को, 
आओ हम मिलकर रखें पर्यावरण को  पावन !