Sunday, May 27, 2018

कुदरत की देन को संभालना तो खुद ही पड़ता है - यूरोप , एक सैर ....


पिछले १७ -१८ दिन से हम आपको यूरोप की मुफ्त सैर करा रहे हैं।  अच्छी अच्छी फोटोज दिखा रहे हैं , लुभा रहे हैं , चिड़ा रहे हैं और शायद जला भी रहे हैं। लेकिन अब समय है सभी मानवीय भावनाओं को अलग रखकर कुछ आत्मनिरीक्षण करने का। आईये देखते हैं क्या अंतर है यूरोपियन देशों और हमारे देश में और इसके लिए कौन और कैसे जिम्मेदार है।

यूरोप की ख़ूबसूरती :

१. बेहतरीन मौसम : जहाँ गर्मी में भी पल पल बदलता मौसम , कभी धूप कभी बादल और बिना गरज के छींटे , वातावरण को खुशगवार बनाते हुए।  बेशक यह कुदरत की देन है।  लेकिन कुदरत के इस तोहफे को यूरोपियन्स ने बड़ी ही समझदारी से भुनाया है।

२. जनसँख्या : उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है जनसँख्या पर नियंत्रण।  लगभग सभी यूरोपियन देशों में जनसँख्या वृद्धि की दर शून्य के करीब है।  कुछ देशों में तो यह माइनस में है।  यानि वहां बढ़ती जनसँख्या की कोई चिंता ही नहीं है।

३.सक्रीयता :  इसका एक परिणाम यह है कि वहां वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन इसकी आपूर्ति वे लोग ८० -८५ वर्ष की आयु तक भी काम करके पूरी करते हैं।  यह देखकर बड़ी हैरानी होती है कि एक बड़े से स्टोर में एक अकेली बुढ़िया अपने पोपले मुँह से मुस्कारते हुए आपको सामान बेच रही होती है। लेकिन देखने में वह ५०-६० की ही लग रही होती है। वहां काम के मामले में कोई छोटा बड़ा नहीं होता।  कोई नौकर और मालिक नहीं होता।  रेस्टोरेंट का मैनेजर भी ज़रुरत पड़ने पर सर्विस देने लगता है। बंद करने के समय मैनेजर भी झाड़ू लगाता नज़र आएगा। 

४. कर्तव्यपरायणता :  स्विट्ज़रलैंड को आसानी से विश्व का सबसे खूबसूरत देश कहा जा सकता है क्योंकि वहां एक ही नज़र में मीलों तक फैले हरे भरे मैदान,  मैनिक्यूर्ड लॉन्स और लहलहाते हरियाली भरे खेत नज़र आते हैं।  लेकिन इसको हरा भरा बनाये रखने के लिए वे सरकार पर निर्भर नहीं रहते।  हर गांववाला अपने खेतों,  क्षेत्र और जायदाद को हरा भरा रखने के लिए खुद जिम्मेदार होता है।  सरकारी ज़मींन को भी गांववाले बारी बारी से घास काटने और मेन्टेन करने का काम करते हैं।

५. सफाई : कोई भी शहर तभी सुन्दर दिख सकता है जब वहां सफाई का विशेष ध्यान रखा जाये। वहां सभी शहरों की गलियां , सड़कें और अन्य सार्वजानिक स्थान एकदम स्पॉटलेसली क्लीन नज़र आते हैं। बार बार होती बारिश निश्चित ही इसमें सहायक सिद्ध होती है लेकिन उनका कचरा नियंत्रण बेहतरीन है।  साथ ही जनता में सफाई के प्रति बेहद जागरूकता है , कोई भी कुछ भी सड़क पर नहीं फेंकता , बल्कि जगह जगह बने कूड़ादान में ही डालते हैं।

६. सड़कें : वहां की सड़कें बहुत कम चौड़ी हैं और दो ही लेन की होती हैं।  लेकिन इसके बावजूद सडकों पर वाहन बहुत ही अनुशासित रूप से चलते हैं , लाल बत्ती पर रुकते हैं , लेन में चलते हैं , कभी हॉर्न नहीं बजाते और कभी ओवरटेक नहीं करते। सड़कें भी एकदम चिकनी , साफ और समतल जिस पर गाड़ी के चलने का पता भी नहीं चलता। 

७. पब्लिक टॉयलेट्स : टूरिस्ट्स को अक्सर कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वहां कहीं भी खुले में अपनी मर्ज़ी से लघु शंका का निवारण नहीं कर सकते। हालाँकि अधिकांश रेस्टोरेंट्स , मॉल्स , होटल्स में टॉयलेट्स उपलब्ध होते हैं लेकिन कई जगह ये पेड होते हैं। एक बार का खर्चा ५० से १०० रूपये तक हो सकता है। लेकिन सफाई की कुछ कीमत तो होती है ना।   

८. मौज मस्ती : अधिकांश दुकानें ६ बजे बंद हो जाती हैं।  यानि उसके बाद सभी मौज मस्ती करते हैं। रेस्टोरेंट्स के बाहर फुटपाथ पर टेबल चेयर लगी रहती हैं जिन पर अक्सर लोग बैठे बियर पी रहे होते हैं।  शुक्रवार को लॉन्ग वीकएंड शुरू हो जाता है और अक्सर शुक्रवार को पब्स के बाहर बीयर मेला सा लगा नज़र आता है।  ज़ाहिर है , सप्ताह भर की मेहनत के बाद यह एन्जॉय करने का समय होता है। 

९. टूरिज्म : पूरे यूरोप के देशों में हर देश में जितनी आबादी है , उसके तीन गुना टूरिस्ट हर समय मौजूद रहते हैं।  ज़ाहिर है , सिर्फ टूरिज्म से ही उनकी बेइंतहा कमाई होती रहती है।  यूरोप महंगा भी बहुत है , फिर भी भारत और चीन से सबसे ज्यादा टूरिस्ट्स वहां जाते हैं।  और एक यूरो के बदले ८२ रूपये खर्च करते हैं। 

१०. इतिहास : सभी यूरोपियन शहर ऐतिहासिक रूप से प्रभवशाली हैं।  हर एक शहर की अपनी शैली है , मकानों और इमारतों की शैली एक पूरा इतिहास दर्शाती है।  सैंकड़ों , हज़ारों साल पहले बने ये भवन आज भी मज़बूती के साथ खड़े हैं और देखने वालों की आँखें फ़ैल जाती हैं उनकी भव्यता देखकर। 

अब इन दस पॉइंट्स पर खुद को रखकर देखिये और जानिए कि क्यों हम अभी तक पिछड़े पड़े हैं और एक विकासशील देश बनकर रह गए हैं।  विकास , जो कभी पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा। बेशक हमारा इतिहास भी पूर्णतया गौरवशाली रहा है और हमारे संस्कार सर्वोत्तम माने जाते हैं।  लेकिन इस तेजी से बदलते समय में हम कब तक दम घुटते संस्कारों की दुहाई देते हुए पिछड़ेपन का शिकार बने रहेंगे !  जागो देशवासियो जागो।