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Thursday, July 28, 2022

विदेशी बच्चे और स्वदेशी मात पिता की मज़बूरी --

खुले दरवाज़े की 

बंद जाली के पीछे से 

बूढी अम्मा की पथराई आँखें,

ताक रही थीं सूने कॉरिडोर को।  

इस आशा में कि कोई तो आए, 

या कोई आता जाता ही दिख जाए।  


लेकिन बड़े शहर की 

पॉश बहुमंज़िला ईमारत के, 

एक ब्लॉक के २८ मकानों में 

रहते ही थे ३० लोग ।  

कई मकान थे खाली, कइयों में  

नव विवाहित किरायेदार।  

और बाकियो में रह रहे थे अकेले 

विदेशों में बस गए युवाओं के 

मां-बाप, जो दिखते  

बूढ़े हाथों में सब्ज़ियों का थैला उठाये।   

या खाली मां या अकेला बाप

बूढी अम्मा की तरह।  


ऐसा नहीं कि विदेशी बच्चे 

मात पिता की परवाह नहीं करते।  

अमेज़ॉन से हर दूसरे दिन 

कोई न कोई पैकेट भिजवाकर   

रखते हैं पूरा ख्याल।  

कभी चिप्स, कभी ड्राई फ्रूट्स तो कभी कोला, 

लेकिन जब घर आने के लिए बोला ,

तो बेटे को महँगी टिकट का ख्याल 

मां बाप से ज्यादा आता है।  

बहु को भी बच्चों का बंधन 

बड़ा नज़र आता है।  


उन्ही बच्चों का लालन पालन  

इन्हीं मात पिता ने इसी तरह किया था 

अपने अरमानों पर अंकुश लगाकर।  

आबादी भले ही १४० करोड़ पार कर जाये, 

देश भले ही विश्व में नंबर एक पर आ जाये।  

पर उनका तो एक ही बच्चा है ,

बूढी अम्मा समझती है 

बेटे की दूरी और दूरी की मज़बूरी।  


बस मोतियाबिंद से धुंधलाई आँखों की 

सूखी पलकों में ,

अश्क का एक कतरा अटक गया है। 

कॉरिडोर और धुंधला नज़र आ रहा है , 

शायद कोई आ रहा है, 

या फिर 

कोई आने जाने वाला जा रहा है।   


नोट : यह रचना किसी को रुला भी सकती है।    

Saturday, July 23, 2022

प्रेशियस चाइल्ड की देखभाल --

आज फिर हमने कटिंग कराई,

आज फिर अपनी हुई लड़ाई।

हमनें कहा नाई से,

बाल ज़रा कुछ तो काटो भाई।


ले लो भले ही जितना माल चाहिए,

वो बोला,

काटने के लिए भी तो बाल चाहिए।

सिर पर चार बाल हैं, क्या छाटूँ,

समझ नहीं आता किसे छोडूं किसे काटूं।


जब पैसे देने की बारी आई,

तो हमने दलील सुनाई,

कि अब पैसे भी अनुपात में ही लो भाई।

वो बोला, जनाब

कीमत तो चार बाल की भी पूरी देनी पड़ती है,

आखिर प्रेशियस चाइल्ड की देखभाल

तो सबसे ज्यादा करनी पड़ती है।

Friday, July 15, 2022

आम के आम और गुठलियों के भी दाम --


हमने जो कहा पत्नी से एक कप चाय पिलाने को,

वो एक डोंगा दे गई मलाई से मक्खन बनाने को । 


अब हम बैठे बैठे चाय के इंतज़ार में भुनभुना रहे हैं,

एक घंटे से मलाई को गोल गोल घुमाए जा रहे हैं ।


चलाते चलाते हमें बचपन में दादी की रई याद आ गई,

मिक्सी क्या खराब हुई घुमाते घुमाते नानी याद आ गई।  


घी निकालने को भी कितने ताम झाम करने पड़ते हैं,

रिटायर्ड बंदे को देखो कैसे कैसे काम करने पड़ते हैं। 


मक्खन निकला पर थक कर हमारी क्या शक्ल बन गई,

अब एक हाथ पतला है और दूसरे की मसल्स बन गई। 


एक घंटे की मशक्कत के बाद मामला संभल पाया है। 

शुक्र है कि मक्खन के साथ छाछ भी निकल आया है। 


चाय मलाई के चक्कर में अपनी तो पत्नी से ठन गई,

पर मक्खन निकालते निकालते ये तो ग़ज़ल बन गई।