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Thursday, December 30, 2021

डॉक्टर्स की हड़ताल पर एक हास्य व्यंग रचना --

अभी अस्पताल से फोन आया, 

फोन करने वाले ने फ़रमाया, 

डॉक्टर साहब को अस्पताल में बुला रहे हैं।  

जूनियर डॉक्टर्स की हड़ताल है, 

इसलिए साहब की ड्यूटी लगा रहे हैं।  


फोन जिस मेड ने सुना, 

वो यूँ तो मेड इन इंडिया की पात्रा थी, 

किंतु एम ऐ पोल साइंस की छात्रा थी।  

बोली, 

काहे इस उम्र में साहब से काम करा रहे हैं !  

हड़ताल बच्चों ने की है और, 

सज़ा उनके मात पिता को दिला रहे हैं।  


एक ओर तो उन्हें कोरोना वारियर कहते हैं, 

पर तीन का काम दो रेजिडेंट्स से करा रहे हैं।  

अरे ज़रा सोचो  समझो, 

ये कोर्ट कचहरी का चक्कर छोड़ो,

और तुरंत पी जी एडमिशन खोलो, 

वरना हम आपको बता रहे हैं, 

तीसरी लहर लेकर समझो,

ओमिक्रोन महाराज बस आ रहे हैं।  


वैसे रिटायर होकर भी साहब सदा तैयार हैं, 

किंतु अभी व्यस्त हैं, किचन में रोटियां बना रहे हैं।  



 

 

Thursday, June 17, 2021

कहां चले बाबूजी बनकर --

 रिटायरमेंट के बाद सबसे ज्यादा बेकद्री कपड़ों की होती है। बेचारे अलमारी में ऐसे मुंह लटकाकर टंगे रहते हैं, मानो कह रहे हों, सरजी कभी हमारी ओर भी देख लिया करो। ऐसी भी क्या बेरुख़ी है। रिटायर होते ही हमसे मुंह मोड़ लिया। रिटायर आप हुए हैं, हम नही। बूढ़े आप हुए होंगे, हम नही , हम तो अभी भी जवान और उतने ही हसीन हैं।

अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि भैया रिटायरमेंट के बाद तुम्हे ही नही, आदमी को भी कोई नही पूछता। कभी गलती से जूते जुराब भी पहनने लगो तो घरवाले ही टोक देते हैं कि कहां चले बाबूजी बनकर। अब तो ऐसा लगने लगा है कि रोजाना शेव करने की भी क्या ज़रूरत है। हफ्ते में दो या तीन बार शेव बना लेना ही काफी है। वैसे तो दो जोड़ी टी शर्ट्स और नेकर में बढ़िया काम चल रहा है। लेकिन यदि कभी ऑनलाइन कविता सुनाने के लिए कमीज़ पहननी भी पड़े तो नीचे लुंगी या पायजामा ही काफी है।

अब तो भैया वो गाना याद आता है :
तेरी और मेरी, एक कहानी,
हम दोनों की कद्र, किसी ने ना जानी।

अब तो ये आलम है कि अलमारी खोलते ही सारे कपड़े मिलके एक साथ चीखते हैं, सा'ब अब तो लॉक डाउन भी खुल गया, अब तो हमे कहीं घुमा लाओ। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाते हैं कि भाई सरकार ने अभी पार्क, पब्स, बार्स, सिनेमा हॉल्स, स्विमिंग पूल, कल्चरल एक्टिविटीज आदि नही खोले हैं। मियां तनिक शांति रखो, वे दिन फिर आएंगे, जब हम तुम दोनों मिलकर बाहों में बाहें डालकर घूमा करेंगे।

Tuesday, July 21, 2020

मूंछों पर कोरोना की मार --



एक मित्र हमारे ,
बन्दे सबसे न्यारे।

मूंछें रखते भारी   ,
सदा सजी संवारी ।

कोई छेड़ दे मूंछों की बात ,
फरमाते लगा कर मूछों पर तांव।

भई मूंछें होती है मर्द की आन ,
और मूंछ्धारी , देश की शान ।

जिसकी जितनी मूंछें भारी ,
समझो उतना बड़ा ब्रह्मचारी ।



फिर एक सुहाने सन्डे ,
जोश में आकर , मूंछ मुंडवाकर ,
बन गए मुंछ मुंडे।


मैंने कहा मित्र , अब क्या है टेंशन ,
माना कि साइज़ जीरो का है फैशन।

और फैशन भी है नेनो टेक्नोलोजी का शिकार ,
तो क्या ब्रह्मचर्य को छोड़ इस उम्र में ,
अब बसाने निकले हो घर संसार ।


वो बोला दोस्त , ये फैशन नहीं ,
रिसेशन की मार है ।
जिससे पीड़ित सारा संसार है ।

और मैंने भी मूंछें नहीं कटवाई हैं ,
ये तो खाली कॉस्ट कटिंग करवाई है ।

अरे ये तो घर की है खेती ,
फिर निकल आएगी ।

पर सोचो जिसकी नौकरी छूटी ,
क्या फिर मिल पाएगी ?

वो देखो जो सामने बेंच पर बैठा है ,
अभी अभी पिंक स्लिप लेकर लौटा है ।

और ये जो फुटपाथ पर लेटा है ,
शायद किसी मज़दूर का बेटा है ।

दो दिन हुए शहर से गांव आया है ,
तब से एक टूक भी नहीं खाया है ।

कृषि प्रधान देश में ये जो नौबत आई है,
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।

अरे अन्न के भरे पड़े हैं भंडार ,
फिर क्यों मची खाने की दुहाई है !


ग़र देश की जनता में हो अनुशासन ,
लॉक डाउन के नियमों का करें पालन।

हाथ धोते रहें बार  बार ,
बाहर जाएँ तो मास्क पहने हर बार। 

लक्ष्मण रेखा का ना अतिक्रमण हो ,
फिर कभी ना कोरोना का संक्रमण हो।

देश जब कोरोना मुक्त हो जायेगा ,
खुशहली का वो दौर फिर आएगा।

जनता जब भय मुक्त हो जाएगी,
तो भैया ये मूंछें भी तब लम्बी हो जाएँगी ।


माना कि मूंछें मर्द की आन हैं ,
मूंछ्धारी देश की शान हैं ।

मगर इस मंदी की मार से ,
कोरोना से मचे हाहाकार से ,
ग़र सबको मिले मुक्ति ,
तो ये मूंछें , एक नहीं ,
बारम्बार कुर्बान हैं , बारम्बार कुर्बान हैं ।


Friday, November 1, 2019

भ्रष्टाचार पर एक हास्य व्यंग पैरोडी --


प्रस्तुत है, प्रसिद्ध हास्य व्यंग कवि श्री आशकरण अटल जी की एक दिलचस्प हास्य व्यंग कविता पर आधारित एक हास्य व्यंग पैरोडी कविता :

एक बिन बुलाये कवि ने,
कवि सम्मेलन में एंट्री ली।
कवि जी अभी मंच पर पहुंचे भी नहीं ,
कि संयोजक ने उसे पहले ही संभाल लिया,
और सवाल किया।

आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?
जी मैं समझा नहीं, कहाँ क्या कर रहे हैं।
आप यहाँ इस कवि सम्मेलन में क्या कर रहे हैं ?
जी हम यहाँ कविता सुनाने आये हैं।
क्या बुलाने पर आये हैं ?
जी नहीं, हम बिन बुलाये स्वयं ही चले आये हैं।
क्या आपको पता है, बिन बुलाये कविता सुनाने पर
आपको पैसे नहीं मिलेंगें ?
जी, पता है।
जब आपको पता था कि बिन बुलाये
कविता सुनाने पर आपको पैसे नहीं मिलेंगे,
तो फिर आप यहाँ क्यों आये ?
जी, राष्ट्र हित में आये।

अच्छा, कविता सुनाकर आप क्या करेंगे ?
जी, कविता सुनाकर हम चले जायेंगे।
क्या कभी फिर आएंगे ?
जी अवश्य आएंगे।
आप जबरदस्ती कवितायेँ कब तक सुनाते रहेंगे ?
जी जब तक हमें बिना बुलाये,
आप कवि सम्मेलन कराते रहेंगे।
आप निशुल्क कविता सुनाकर,
ये आर्थिक त्याग क्यों कर रहे हैं ?
जी राष्ट्रहित में कर रहे हैं।

आखिर आप मुफ्त कविता क्यों सुनाते हैं ,
जबकि कविता सुनकर आप कुछ धन राशि कमा सकते हैं। 
क्योंकि हम गवर्न्मेंट सर्वेंट हैं ,
आप चाहें तो हमें सरकारी बाबू कहकर भी बुला सकते हैं।
और सरकारी बाबू सीट छोड़कर,
पैसा कमाने कहीं नहीं जाते हैं।
क्योंकि नेताओं की तरह वे भी
कुर्सी पर बैठे बैठे ही बिक जाते हैं।
और खुले आम निडर होकर दोनों हाथों से ,
विशुद्ध करमुक्त धन कमाते हैं।

क्या इस परम्परा को निभाया जाना चाहिए ?
और बाकि कवियों को भी राष्ट्र हित में ,
मुफ्त कविता सुनाने के लिए ,
आगे आना चाहिए , आगे आना चाहिए !

नोट : साभार आशकरण अटल जी।


Monday, April 16, 2018

अध्यक्ष के चुनाव में फूलवालों की होड़ ...

सभा समाप्त होते ही :

नव निर्वाचित अध्यक्ष पर फूल मालाओं की जो लगी झड़ी।
सारे श्रोताओं में फोटो खिंचवाने की जैसे होड़ सी लग पड़ी।

देखते देखते श्रोताओं से सारा मंच खचाखच भर गया ,
मैं तो ये प्रेमासक्त अद्भुत नज़ारा देखकर ही डर गया।

एक श्रोता दूसरे श्रोताको धकाकर आगे बढ़ रहा था।
दूसरा फोटो के लिए तीसरे के काँधे पर ही चढ़ रहा था।

भीड़ अध्यक्ष के अगल बगल जब तक एक कतार लगाती ,
तब तक पहली कतार के आगे एक और कतार लग जाती।

एक बार हम भी छलांग मार करीब जाने में सफल हो गए। 
पर तभी एक जोरदार धक्का खाकर गिरे और विफल हो गए।

आलम ये थे कि इधर धड़ाधड़ फोटो खींचे जा रहे थे,
उधर हम कभी दाएं कभी बाएं धकियाये जा रहे थे।

और लोग तो जंगल में हिरणों की तरह कुलांचे मारते रहे ,
हम बस शेर की तरह शिकार को हाथ से जाते देखते रहे।

फोटोग्राफर भी बेचारा दे दनादन फोटो उतार रहा था ,
हमें तो पूरा शक था कि पट्ठा खाली फलैश मार रहा था।

वैसे फोटो खिंचवाने को हम भी १5 बार ट्राई मार चुके थे,
पर मायूस से खड़े थे क्योंकि आखिरी ट्राई भी हार चुके थे।

हमें संघर्ष करते देख एक सज्जन की नज़र हम पर पड़ गई ,
पर कुछ लम्बूओं के सामने हमारी तो हाईट ही कम पड़ गई।

तभी हमें महमूद ग़ज़नवी का इतिहास याद आया ,
और १७ वीं बार प्रहार करने का प्रयास याद आया।

आखिरकार १७वीं बार में हम भी कामयाब हो गए ,
और अध्यक्ष जी के साथ कैमरे में आबाद हो गए। 

Tuesday, May 17, 2016

एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल ---


प्रस्तुत है , एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल :

सुबह :

पत्नी : अज़ी सुनते हो , आज कामवाली बाई नहीं आएगी और डस्टिंग करने वाली भी अभी तक नहीं आई।  अब आप सम्भालो , मेरा टाइम हो गया ऑफिस का। ज़रा जल्दी से मेरा लंच पैक कर दो।  

पति : ठहरो , मैं ऐ टी एम से पैसे निकाल लाऊं ।  

पत्नी : अरे आप तो रिटायर्ड आदमी हैं।  अब आपको पैसों की क्या ज़रुरत है ? दस बीस रूपये चाहिए तो मेरे पर्स से निकाल लिया करो। वैसे भी आप ने क्या खर्च करना है , हमेशा से कंजूस के कंजूस ही तो रहे हो।
 
पति : हमें दो शर्ट और दो पैंट खरीदनी हैं।  सारी पुरानी हो गई।

पत्नी : ओहो ! आप भी अब कौन से नए रह गए हैं। और क्या करना है नए कपड़ों का ! आपने कौन सा ऑफिस जाना है ! वैसे भी गर्मी का मौसम है , कहाँ जाओगे इस मौसम में।  घर में बैठो आराम से नेकर और बनियान पहनकर।  

पति : अच्छा ब्रेड तो ले आऊं नाश्ते के लिए।

पत्नी : ठीक है।  लेकिन सारे दिन घर में रहते हो।  अब ये मत करना कि बैठे बैठे सारे दिन खाते ही रहो।  वेट बढ़ जायेगा , पेट बढ़ जायेगा , बी पी बढ़ जायेगा और शुगर भी बढ़ जाएगी।  फिर घूमोगे डॉक्टरों के चक्कर लगाते।
अच्छा सुनो , बाहर कपडे सूख रहे हैं, थोड़ी देर में उतार लेना और धोबी को प्रैस के लिए दे देना। लेकिन सीधे करके देना।  और सुनो , ये करना , वो करना , बहुत काम पड़े हैं , बस टाइम वेस्ट मत करना।

फिर शाम को ऑफिस से आने के बाद :

आप तो कमाल हो जी। मैं ऑफिस गई , तब भी आप अख़बार पढ़ रहे थे , अब आई हूँ तब भी अख़बार ही पढ़ रहे हो। आखिर ऐसा क्या है इस मुए अख़बार में !
अच्छा बताओ , दिन भर क्या किया आपने ?
अरे ये क्या , फ्रिज में सब कुछ वैसा का वैसा ही रखा है।  आपने तो कुछ खाया ही नहीं।  हे भगवान , मैंने कहा था ये दाल ख़त्म कर देना , खराब हो जाएगी।  लेकिन आपको तो कोई फ़िक्र है ही नहीं।  
और कपडे ! वहीँ बाहर जल रहे हैं धूप में। आपके भरोसे तो कुछ भी छोड़ना बेकार है। कितने बेकार बेकाम आदमी हो , पता नहीं सरकार कैसे झेल रही थी आपको।  मुफ्त में तनख्वाह दे रही थी।
जब देखो तब अख़बार या मोबाईल पर फेसबुक और वाट्सएप। इसके अलावा तो कोई काम ही नहीं है आपको। अब तो उठ लो , मुझे पानी ही पिला दो।

अगले दिन छुट्टी के दिन डॉक्टर के पास :

डॉक्टर साहब , मेरे पति सारी रात नींद में बड़बड़ाते हैं , कोई अच्छी सी दवा दीजिये।
डॉक्टर : ये दवा लिख रहा हूँ , केमिस्ट से ले लेना।  रोज एक गोली सुबह शाम लेनी है।  आपके पति बड़बड़ाना बंद  कर देंगे।
पत्नी : नहीं नहीं डॉक्टर साहब , आप तो कोई ऐसी दवा दीजिये कि ये साफ साफ बोलना शुरू  दें।  पता तो चले कि ये नींद में किसका नाम लेते हैं।
डॉक्टर : बहन जी , ये दवा आपके पति के लिए नहीं , आपके लिए है। आप उन्हें दिन में बोलने का मौका दें , वे नींद में बड़बड़ाना अपने आप बंद  कर देंगे।  

नोट : यह गर्मी में टाइम पास के लिए लिखा गया हास्य व्यंग है।  इसका किसी जीवित या अजीवित व्यक्ति से कोई  सम्बन्ध नहीं है।



Wednesday, February 17, 2016

पत्नी वो होती है जो ---


पत्नी वो होती है जो ,
बोल बोल कर, पति की बोलती बंद कर दे ,
फिर बोले कि आप कुछ बोलते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो  ,
पहले बच्चे को खिला खिला कर बीमार कर दे ,
फिर डॉक्टर से कहे कि ये कुछ खाता क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शॉपिंग तो पति के कार्ड से  करे, उनके कार्ड से ही सारे बिल भरे ,
फिर पति से शिकायत करे कि आप कुछ खर्च करते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शादी  या पार्टी के लिए सजने संवरने में खुद घंटों लगाये ,
पर लेट होने पर पति से कहे कि आप जल्दी तैयार होते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
बीस रूपये की सब्ज़ी खरीदे , और दस की हरी मिर्च धनिया मुफ्त ले ,
फिर पति से कहे कि खाली हाथ खड़े हो, आप कुछ पकड़ते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
ऑड दिन भी ईवन नंबर की गाड़ी चलाये , पति को करे बाय ,
और कहे कि आप एक ऑड नंबर की गाड़ी खरीदते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
घर पर रहे तो पति से कहे , ये मत खाना वो मत खाना ,
पर मायके से आये तो कहे कि आप पीछे से कुछ खाते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिंदगी होती है पर जीने नहीं देती, नशा होती है पर पीने नहीं देती ,
लेकिन जब पति पीकर घर आये तो कहे कि आप समझते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिसकी सब बातें मांफ होती हैं, जो चुपके से कान में कहती है ,
मैं बहुत बोर करती हूँ ना , पर आप कभी बोर होते क्यों नहीं ! !



Thursday, December 31, 2015

जब साल सोलवां आएगा ---


१ जनवरी २००९ को हमने अपना ब्लॉग बनाया था और पहली पोस्ट डाली थी - नव वर्ष की शुभकामनायें।  आज सात साल पूरे हुए और ये ५०० वीं पोस्ट है।  ७ साल का ये सफ़र बहुत बढ़िया रहा , जिसमे हमें लेखन का अच्छा अनुभव हुआ , नए दोस्त मिले और अनेकों लाभदायक पोस्ट लिखने का अवसर मिला।  लेकिन अब हिंदी ब्लॉगिंग में लोगों की कम होती रूचि और फेसबुक / वाट्सएप आदि सोशल मिडिया के कारण ब्लॉग पर पाठकों के ना आने से ब्लॉगिंग में आकर्षण नहीं रहा।  अत : यह हमारी आखिरी पोस्ट है , जो अपने मन पसंद विषय हास्य व्यंग पर आधारित एक समसामयिक कविता के रूप में प्रस्तुत है :

आमचंद्र कह गए सभी से , जब साल सोलवां आएगा ,
पत्नी करेगी कार ड्राईव और , पति खड़ा रह जायेगा।

एक बात नहीं हैं समझे, ग़र पत्नी संग कार में बैठे ,
पति के संग से कैसे हवा में,  प्रदुषण बढ़ जायेगा ।

छूटे सारे वी आई पी ,  ग़र नहीं तू वी ओ पी भी ,
ईवन ऑड के चक्कर से भैया , फिर नहीं बच पायेगा।

बहुत करी है सबने मस्ती , दस बजे आते थे अक्सर ,
दफ़्तर में सरकारी अफ़सर , अब आठ बजे आ जायेगा।  

ग़र कभी हो पत्नी संग जाना , पेट दर्द का करो बहाना ,
सीट पर लेटो रोगी बनकर , चालान नहीं कट पायेगा।

एक तरीका और है भैया , ओढ़ दुपट्टा बन जाओ मैया ,
ग़र ना हो दाढ़ी रामदेव सी, कोई पकड़ नहीं पायेगा ।

ज़हर भरा दिल्ली की हवा में , धुँआ धुआं है सारी फ़िज़ा में ,
ग़र नहीं तू संभला 'तारीफ' ,  चैन से साँस नहीं ले पायेगा।

नोट : दिल्ली में वायु प्रदुषण चरम सीमा पर है।  उसे कम करने में सभी का सहयोग अपेक्षित है।

नव वर्ष २०१६ के सभी पाठकों को हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएं।  

Saturday, April 12, 2014

कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया ....


पिछले आम चुनाव मे हम वोट डालने से वंचित रह गए थे . लेकिन कुछ महीने पहले हुए दिल्ली के विधान सभा चुनाव मे लोगों का उत्साह देखकर हम भी आश्वस्त हो गए थे कि अब घर बैठे रहने का समय नहीं रहा . और कुछ हो ना हो , 'आप' के चुनावी मैदान मे आने से दिल्ली और सम्पूर्ण देश मे चुनावों मे वोटों की % संख्या तो निश्चित ही बढ़ गई है . इसलिये इस बार हमने भी द्रढ निश्चय और पक्का इरादा बना लिया था कि अपने मताधिकार का पूर्ण उपयोग करेंगे . 

लेकिन एक छोटी सी समस्या आ रही थी कि वोट किसे दिया जाये . क्या पार्टी के नाम पर वोट दें , या पी एम उम्मीदवार के नाम पर . या फिर व्यक्ति विशेष के गुणों के आधार पर वोट दी जाये . इस बार सवाल ज़रा कठिन सा लग रहा था . आखिर देश के भविष्य का सवाल था . देश को चलाने के लिये एक स्थायी सरकार चाहिये , एक योग्य प्रधान मंत्री और उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत चाहिये . लेकिन हमारे इकलौते वोट से तो हार जीत का फैसला होना नहीं था . उस पर श्रीमती जी का भी पता नहीं था कि किसे वोट देंगी . अब डर यही था कि यदि हम दोनो ने अलग अलग वोट दिये तो दोनो की वोट ही आपस मे कट जाएंगी . 

जब श्रीमती जी से हमने इसका ज़िक्र किया तो उन्होने मानव अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि अपनी मर्ज़ी से वोट देने का अधिकार उन्हे भी प्राप्त है . आखिर स्वतंत्र भारत मे उन्हे भी तो यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वो अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकें . हमने कहा भाग्यवान , आपको पूर्ण अधिकार है लेकिन हम तो बस यह कह रहे थे कि कृपया आप हमारी वोट ना काटें . यह तभी संभव है जब आप उन्ही को वोट दें जिन्हे हम चाहते हैं . और क्योंकि उन्होने स्वयं अभी तक यह निर्णय नहीं लिया था कि किसे वोट दें , इसलिये बेहतर तो यही था कि हमारी बात मान लें . 

वैसे हमने भी जिंदगी मे कई चुनाव लड़े हैं और लड़वाये भी हैं . इसलिये वोट मांगने का अनुभव हमे भी बहुत रहा है . लेकिन पत्नी से वोट मांगना वास्तव मे बड़ा मुश्किल और एक चुनौतीपूर्ण काम था . फिर भी , हमने अपने सारे अनुभव का उपयोग करते हुए और घर मे ही चुनाव प्रचार करते हुए आखिर श्रीमती जी को मना ही लिया कि वो हमारे कहे अनुसार ही वोट देंगी . सरकार ने चुनावी दिन को छुट्टी का दिन घोषित कर दिया था , लेकिन उसे छुट्टी मे परिवर्तित करना हमारे हाथ मे था . इसलिये हमने निर्णय लिया कि सुबह सैर करने के पश्चात ७ बजे मतदान केन्द्र खुलते ही सबसे पहले वोट डालकर हम निवृत हो जायेंगे . वैसे भी यह आवश्यक नहीं कि नहा धोकर ही वोट डाली जा सकती थी . लेकिन केन्द्र पर जाकर देखा कि हमारे पड़ोसी तो हमसे भी पहले वोट डाल कर जा चुके थे . फिर भी , वोट डालकर ९ बजे तक हमने भी अपनी स्याही सुसज्जित उंगली का फोटो फ़ेसबुक के कहने पर फ़ेसबुक पर डाल कर अपनी देशभक्ति की अमिट छाप अंकित करा दी . 
अब कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया

Sunday, September 15, 2013

रंग जो लाई हैं दुआएं , अब उतरने न पाए --

ब्लॉगिंग और फेसबुक की जंग में फेसबुक जीतता नज़र आ रहा है. इसका कारण है लगभग सभी ब्लॉगर्स का फेसबुक की ओर प्रस्थान करना।  हमने जान बूझकर फेसबुक पर भी अधिकांश ब्लॉगर्स को ही मित्र बनाया है. लेकिन सभी ब्लॉगर मित्र फेसबुक पर नहीं हैं , इसलिए उनके लिए प्रस्तुत हैं , फेसबुक पर प्रकाशित कुछ एकल पंक्तियाँ जो कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं :
   
* अब तो अडवाणी जी को भी समझ आ गया होगा कि भा ज पा में सिर्फ कुंवारे ही पी एम बन सकते हैं !

   यह अलग बात है कि यह फ़ॉर्मूला अब उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी भी अपना रहे हैं.  

* कभी कभी ऐसा लगता है , कि हम इस समाज में रहने योग्य ही नहीं !        
                                                                                                
  लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ !                                                             
                                                                                                
* लखनऊ में : पहले आप ! पहले आप !  दिल्ली में : पहले मैं ! पहले मैं !      
                                                                                               
  जाने दिल्लीवाले इतने मिमियाते क्यों हैं !                                          
                                                                                                                                                                                              
* टी वी पर देखा तो ये ख्याल आया : क्यों न डॉक्टरी छोड़कर हम भी कृपा       दृष्टि से ही उपचार करना शुरू कर दें !                                                   
                                                                                                 
 लेकिन सोचते हैं यदि कृपा नहीं आई तो पब्लिक क्या हस्र करेगी !                
                                                                                                
* यदि ज़रूरी मीटिंग के बीच पत्नी का फोन आ जाये तो आप क्या करेंगे ?   
                                                                                                क्या करेंगे जब एक ओर कुआँ हो और दूसरी ओर खाई !                        
                                                                                              
* अक्सर दंगों में मरने वाले मासूम ही होते हैं.                                      
                                                                                              
   नामासूम ना मालूम किस जहाँ में छुप जाते हैं !                                 
                                                                                              
* आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे !                                        
                                                                                              
   दुआ तो रंग ले आई. अब यही देखना है कि यह रंग कब तक टिकता है !    
                                                                                              
* कितना आसां है आसाराम बन जाना।                                              
                                                                                              
   हम तो राम बनने की आस में जीते हैं !                                            
                                                                                              
* दुनिया में दिमाग वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन व्यापक दिमाग वाले   बहुत कम मिलते हैं.                                                                      
                                                                                               
   आखिर दिमाग की बात है , समझने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा।          
                                                                                              
* फेसबुक ही एक ऐसा माध्यम है जहाँ अक्सर लाइक का मतलब लाइक नहीं होता !                                                                                        
                                                                                               
फेसबुक ने हर हालात में हमें खुश रहना सिखा दिया है.                            
                                                                                               
* यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू पा ले, तो सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है।                                                                                           
                                                                                              
यह अलग बात है कि मोक्ष धाम में करने को कोई काम नहीं होता।             
                                                                                              
* बापू की ज़वानी का राज़ क्या है --- हम भी आश्चर्यचकित हैं !                 

आश्चर्यचकित तो इस बात से भी हैं कि अब बापुओं पर भी ज़वानी रहती है.  


और अंत में एक सवाल जिस पर आपने पूरा शब्द कोष ही सामने ला कर रख दिया --सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल को हिंदी में क्या कहेंगे ! इस पर चर्चा अगली पोस्ट में.    



नोट : ब्लॉगिंग और फेसबुक में जंग अभी जारी है.देखते हैं आगे क्या होता है !  



Tuesday, July 23, 2013

कवि हर हाल में अपना फ़र्ज़ निभाते हैं ---


एक दिन एक कवि मित्र का फोन आया,
बोले भाया।

हम एक हास्य कवि सम्मेलन करा रहे हैं।
उसमे आपको भी बुला रहे हैं ।

लेकिन हम कुछ दे नहीं पाएंगे ,
क्या फिर भी आप कविता सुना पाएंगे ?

हमने कहा भैया, हम कुछ लेकर नहीं सुनाते हैं,
हम वो कवि हैं जो कुछ न कुछ पल्ले से देकर ही सुनाते हैं।

आप हमें अवश्य बुलाइये,
और हमारे लायक कोई सेवा हो तो निसंकोच बतलाइये।

चाहें तो कवियों के लिए ताकत की दवा लिखवा लें,
या फिर सौ दो सौ श्रोताओं का मुफ्त बी पी चेक करवा लें।

कहिये आप हम से क्या सेवा करवाएंगे,
वो बोले , यह तो आपकी कविता सुनकर ही बता पाएंगे।  



कविता सुनाने की जब हमारी बारी आई
अभी हमने आधी कविता ही थी सुनाई,

कि श्रोता जोर जोर से तालियाँ बजाने लगे।
यह देखकर हम और भी जोश में आने लगे।

लेकिन जब शोर हद से ज्यादा होने लगा
और हमें भी कुछ कुछ समझ में आने लगा,

तो हमने कहा मित्रो , आप काहे शोर मचा रहे हैं ,
आखिर लाख रूपये की कविता, हम मुफ्त में सुना रहे हैं।

तभी एक श्रोता की आवाज़ आई ,
अरे मांफ करो भाई।

भले ही टैक्सी का किराया हमसे ले जाइये,
पर मेहरबानी करके आप बैठ जाइये।  



हमने बैठकर माथे का पसीना पोंछा,
और साथ बैठे कवि से पूछा।

भई इतनी गर्मी में भी माइक पर तेज रौशनी क्यों डालते हैं,
जबकि श्रोता तो आराम से अँधेरे में बैठते हैं।

कवि बोला, जब आप जैसे कवि श्रोताओं को बोर करते हैं ,
तब श्रोता सड़े टमाटर और अंडे उछालते हैं।

और निशाना सही जगह पर लगे ,
इसलिए कवि पर तेज रौशनी डालते हैं।

श्रोताओं को इसलिए मिलता अँधेरे का सहारा है ,
ताकि आप देख न पायें, कि टमाटर किसने मारा है।

आपने सही किया जो कहते ही बैठ गए
वर्ना जाने क्या हाल होता।

हमने कहा भैया, यदि  टमाटर हमें लग जाता,
तो चेहरा थोड़ा और लाल हो जाता।

पर यदि निशाना चूक जाता ,
तो सोचिये आपका क्या हाल होता।

मियां बर्ड फ्लू हो जाता , कच्चे अंडे खाकर ,
और फ़ूड पोइजनिंग हो जाती , ग़र पड़े सड़े टमाटर।

अब समझ में आया ,
ये अंडे और सड़े टमाटर कहाँ जाते हैं।

कुछ पट्ठे इकट्ठे कर सारे सड़े
अंडे टमाटर, बिहार के स्कूलों में बेच आते हैं ।



हम तो इतना कहेंगे यारो, मारो जम कर मारो
पर यार अंडे टमाटर अच्छी क्वालिटी के तो मारो।

उन्हें जब हम कवि देश के कुपोषित बच्चों को खिलाएंगे ,
तो उन बच्चों के एनीमिक चेहरे भी टमाटर से लाल हो जायेंगे।  


पैसों के लिए भ्रष्टाचारी भले ही , अपना ईमान गिराते हैं ,
लेकिन कवि हर हाल में दोस्तों, सदा अपना फ़र्ज़ निभाते हैं।


Monday, July 15, 2013

नाम यूँ ही बदनाम है बेचारी शराब का ---


शराब एक ऐसी चीज़ है जिस पर सदियों से शायरों ने अनगिनत शे'र लिखे हैं , गीतकारों ने गीत लिखे हैं , जो उच्च समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक होती है , मध्यम वर्ग में जश्न का जरिया और निम्न वर्ग में जिंदगी बर्बाद करने का साधन। इसका सेवन भी आदि काल से होता आया है। आदि मानव से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न रूपों में शराब का उत्पादन और सेवन होता आया है। कहीं शराब को खराब माना जाता है , कहीं शराब और शबाब साथ मिलकर नवाबों की शान बनती है। लेकिन ख़राबी शराब में होती है या शराबी में , यह हमेशा बहस का विषय बना रहता है।

बात बहुत पुरानी है। तब हमने नया नया जॉब ज्वाइन किया था। एक दिन डॉक्टर्स के किसी कार्यक्रम का निमंत्रण मिला जिसमे कार्यक्रम के बाद कॉकटेल डिनर का आयोजन था। उन दिनों में कॉकटेल शब्द को बहुत बड़ा माना जाता था। ज़ाहिर है , शराब का सेवन अपेक्षाकृत इतना कॉमन नहीं था जितना आजकल हो गया है। इसलिए इस तरह के निमंत्रण को पाना एक सौभाग्य माना जाता था। हमने जब अपने एक वरिष्ठ साथी डॉक्टर को इसके बारे में बताया तो उनकी बांछें खिल गई और हम भी खुश हो गए कि चलिए कोई साथ तो मिला जो साकी का भी काम करेगा।   

कार्यक्रम में हम तो तन्मयता से भाषण सुन रहे थे और हमारे साथी बार बार घूमकर यह देख रहे थे कि शराब खुली कि नहीं। क्योंकि देर हो चुकी थी और लोगों को बेचैनी होने लगी थी , इसलिए अंतत: भाषण ख़त्म होने से थोड़ा पहले कॉकटेल काउंटर खुल गया। यह पता चलते ही हमारे साथी महाशय दौड़ पड़े और जब तक हम वहां पहुंचे तब तक वो जाने कितने पैग उदरस्थ कर चुके थे। जब हमने जाकर देखा तो पाया कि कुछ लोग उन्हें घेर कर खड़े थे और सब अपना अपना गिलास उन्हें सौंप रहे थे और वो भी गटागट बॉटम अप किये जा रहे थे। यह पागलपन देखकर हम तो सकते में आ गए। हमने उन्हें बड़ी मुश्किल से सब से दूर किया , लेकिन तब तक जो होना था वो हो चुका था। आखिर किसी तरह हमने जल्दी जल्दी कुछ खाया और उनकी सुध ली तो उन्हें चारों खाने चित पाया। अंत में उनके स्कूटर को अन्दर पार्क कर उन्हें एक ऑटो में डालकर रात के बारह बजे हमने उन्हें उनके घरवालों को सौंपा और अपने घर की ओर रवाना हुए।     

ऐसा नहीं है कि शराब ऐसी खराब चीज़ है कि इसका सेवन पाप समझा जाये। दरअसल ख़राबी पीने वाले के व्यवहार में होती है। इस घटना से कई बातें उजागर होती हैं जो शराब का सेवन करने वालों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनके बारे में और शराब से होने वाले फायदे और नुकसान के बारे में अगली पोस्ट में। फ़िलहाल आप इस लतीफे का आनंद लीजिये : 

एक आदमी डॉक्टर के पास गया और बोला -- डॉ साहब मेरे पेट में दर्द रहता है।
डॉक्टर ने उसका मुआयना किया और कहा -- क्या आप शराब पीते हैं ?
रोगी बोला -- जी सच बोलूँगा , वो तो मैं पीता हूँ।
डॉक्टर -- देखिये शराब पीने से आपका ज़िगर ख़राब हो गया है और पेट में पानी भी भर गया है।
रोगी -- लेकिन डॉक्टर साहब पानी तो मैं पीता ही नहीं फिर पेट में पानी कैसे ! अच्छा याद आया शुरू में जब मैंने पीना शुरू किया था तब पानी मिलाकर पीता था लेकिन चढ़ जाती थी। तब से मैंने पानी पीना ही छोड़ दिया।
डॉक्टर -- लेकिन अब आपको छोड़नी पड़ेगी।
रोगी -- डॉक्टर साहब , प्लीज छोड़ने के लिए मत कहिये। हाँ , कम कर सकता हूँ।
डॉक्टर -- ठीक है , रोज कितना पीते हो ?
रोगी -- जी झूठ नहीं बोलूँगा , बस चार पीता हूँ।
डॉक्टर -- चलिए आज से तीन कर दीजिये , फिर दो सप्ताह बाद दो और --
रोगी -- ठीक है डॉक्टर साहब , लेकिन दो से कम मत कीजियेगा क्योंकि पूरी बोतल एक पैग में आ ही नहीं सकती।

नोट : असली शराबी वो होता है जो बेड टी की जगह चाय का कप नहीं बल्कि पैग लेकर बैठता है।       


Monday, July 8, 2013

जब से 'वो' न रहा , साड्डा दिल नहीं लगदा पा जी ---


पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर टमाटर महिमा का गुणगान बहुत जोरों पर है। फेसबुकिये मित्र भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन खुल कर कर रहे हैं। इन्ही विचारों से उपजी है यह हास्य व्यंग रचना। टमाटर मिलें या न मिलें , आप पढ़कर ही स्वाद लीजिये :    

प्याज़ ने कहा आलू से --

कभी हम तुम और 'वो' , 
मिलकर बनाते थे भाजी।  
अब जब से 'वो' न रहा , 
साड्डा दिल नहीं लगदा पा जी।  

हर तरकारी के दिन फिरते हैं भैया, 
कभी हम बने थे किंग मेकर।  
लेकिन लगता है इस बार, 
बाज़ी मार ले जायेंगे टमाटर। 

इन्सान की जान से ज्यादा , 
टमाटर की कीमत हो गई है।    
यार इन लालुओं के सामने 
अपनी तो इज्ज़त ही खो गई है। 

लोग लोन लेकर खरीद रहे हैं, 
टमाटर, वो भी बिना ब्याज के।   
नादाँ ये भी नहीं जानते कि ,
भाजी क्या स्वाद बिना प्याज़ के।   

लेकिन अब हमारे आस पास भी ,
कोई ख़रीदार नहीं आता। 
टमाटर के लिए बहाते हैं ,
हमें देख कोई आंसू नहीं बहाता।  

लाल रंग से ही सब घबराने लगे हैं ,
आजकल टमाटर भी रुलाने लगे हैं।  

रुपया गिरा, सोना गिरा , ईमान गिर गया है। 
पर टमाटर ऐसा चढ़ा, दिमाग ही फिर गया है। 

सट्टे में भी दांव पर अब यही मिस्टर लगते हैं , 
अब तो रिश्वत में भी बस टमाटर चलते हैं। 

हर रोज सब्जी मार्किट में चोरियां हो रही हैं , 
पर चोरी सिर्फ टमाटर की बोरियां हो रही हैं।  

लगता है अब तो सरकार को भी ये ज़हमत उठानी पड़ेगी , 
मिनिस्टरों की घटाकर, टमाटरों की सुरक्षा बढ़ानी पड़ेगी।    


Thursday, June 27, 2013

एक बार फिर वो -- जो अब फेसबुकिया बन गए हैं।


अभी ब्लॉग पर अरविन्द मिश्र जी का लेख पढ़कर फिर वही मुद्दा मन में मचलने लगा कि क्यों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग छोड़कर फेसबुक आदि की ओर जा रहे हैं। लेकिन यह चर्चा यहीं जारी रहे। हमें तो कुछ दिन से फेसबुक पर सक्रियता से जो देखने को मिला , वह प्रस्तुत है इस हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जिसमे हास्य कम, व्यंग ज्यादा नज़र आएगा लेकिन हालात पर खरा उतरेगा।  

१)

वो
सुबह सवेरे , मूंह अँधेरे
उठती है ,
चाय नाश्ता बनाकर
बच्चों को नहला धुलाकर,
टिफिन लगाती है,
बच्चों के साथ
बच्चों के पिता का।
फिर बिठा आती है, बच्चों को
स्कूल बस में ,
अच्छे नागरिक बनाने की चाह में।
फिर करती है
पति को बाय बाय
और बैठ जाती है खुद
सजने संवरने, नहा धोकर।
आखिर उसे भी तो काम पर लगना है।
९ से ५ तक का
क्या हुआ ग़र काम घर पर है ,
यही तो है कॉर्पोरेट कल्चर !
पढ़ती है, लिखती है, टिपियाती है
आँख बंद कर सैकड़ों
चटके लगाती है,
आखिर यह फेसबुकियाना भी
बड़ा चाटू काम है।
दिन भर के काम के बाद
चलो अब आराम किया जाये !
द्वार पर घंटी बजी है ,
अरे पति देव के आने का समय हो गया !
हे राम , अगले जन्म में पत्नि न बनाना
काम ही काम , एक मिनट का नहीं आराम !


२)

वो
सूट बूट पहन कर
फ्रेंच परफ्यूम लगाकर
बालों में करके तीन बार कंघी ,
बैठ जाता है सरकारी कुर्सी पर।
फ़ाइल से पहले खोलता है प्रोफाइल
फेसबुक पर ,
आखिर , स्टेटस अपडेट को
एक घंटा जो बीत गया है।
जाने कितने अपडेट, न्यूज, व्यूज
मिस हो गए होंगे।
ये मुआ दफ्तर भी इतना दूर क्यों है !
आजकल काम भी बहुत बढ़ गया है।
पी एम किसे बनाना है
कैसे चलेगा देश, दिन रात
सताती है यह चिंता।
अभी तो एक घंटा भी हुआ नहीं
कि बड़े साहब का आ गया बुलावा,
लगता है इन्हें देश की कोई चिंता नहीं।
अभी तो बीस लाइक और
चिपकाई हैं चालीस स्माइली,
कमेन्ट न दिए तो आयेंगे कहाँ से।
आखिर, एक हाथ ले, एक हाथ दे, का सिद्धांत
यहाँ से बेहतर कहाँ लागु होता है।
लेकिन यह सिद्धांत साहब को
जाने क्यों समझ नहीं आता है।
देश भक्तों की राहों में
हमेशा आई है रुकावटें ,
चलो फिर लग जाएँ फेसबुक पर
इस छोटे से मीटिंग ब्रेक के बाद।
सरकारी दफ्तर में, काम का आउट पुट
कहाँ निकल पाता है।
सुबह से लगा पायें हैं बस
बारह अपडेट्स।
उफ़ ये मीटिंग्स, लगता है
देश का विकास नहीं होने देंगी।
अब तो उठने में ही भलाई है ,
सरकार भी कहाँ देती है ओवर टाइम !
पत्नि जाने क्यों द्वार खोलने में
लगा रही है देर,
नादान ये भी नहीं जानती कि
पतिदेव थके हारे घर लौटे हैं।
चलो दफ्तर न सही, घर में ही
निपटाते हैं, काम !
आखिर , कॉपोरेट कल्चर अब
सरकारी काम में भी आ गया है।

 नोट : यह पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है। कृपया व्यक्तिगत रूप में न लिया जाये।


Friday, May 31, 2013

इट्स वेरी ईजी टू स्टॉप स्मोकिंग , एंड आई हैव डन इट सो मेनी टाइम्स ---


धूम्रपान रहित दिवस पर आज प्रस्तुत है , एक पूर्व प्रकाशित रचना। अस्पताल एक धूम्रपान निषेद्ध क्षेत्र होता है। फिर भी लोग बीड़ी सिग्रेट पीते नज़र आते हैं। कानून की दृष्टि में यह अपराध है जिसमे १०० से ५०० रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है। ऐसे ही अभियान के दौरान जब लोगों को धूम्रपान करते पकड़ा, तब लोगों ने धूम्रपान करने के क्या क्या बहाने बताये, इसी पर लिखी है यह हास्य- व्यंग कविता।        



अस्पताल के प्रांगण में, ओ पी डी के आँगन में
जेठ की धूप में जले पेड़ तले,
कुछ लोग आराम कर रहे थे ।
करना मना है ,फिर भी मजे से धूम्रपान कर रहे थे ।

एक बूढ़े संग बैठा उसका ज़वान बेटा था
बूढा बेंच पर बेचैन सा लेटा था ।

साँस भले ही धोंकनी सी चल रही  थी
मूंह में फिर भी बीड़ी जल रही थी ।

बेटा भी बार बार पान थूक रहा था
बैठा बैठा वो भी सिग्रेट फूंक रहा था ।

एक बूढा तो बैठा बैठा भी हांफ रहा था
और हांफते हांफते साथ बैठी बुढिया को डांट रहा था ।

फिर डांटते डांटते जैसे ही उसको खांसी आई
उसने भी जेब से निकाल, तुरंत बीड़ी सुलगाई।

मैंने पहले बूढ़े से कहा बाबा , अस्पताल में बीड़ी पी रहे हो
चालान कट जायेगा,
वो बोला बेटा, गर बीड़ी नहीं पी, तो मेरा तो दम ही घुट जायेगा ।

डॉ ने कहा है, सुबह शाम पार्क की सैर किया करो
और खड़े होकर लम्बी लम्बी साँस लिया करो ।

लम्बे लम्बे कश लेकर वही काम कर रहा हूँ ।
खड़ा खड़ा थक गया था , लेटकर आराम कर रहा हूँ ।

मैंने बेटे से कहा --भई तुम तो युवा शक्ति के चीते हो
फिर भला सिग्रेट क्यों पीते हो ?

वो बोला बाबा की बीमारी से डर रहा हूँ
सिग्रेट पीकर टेंशन कम कर रहा हूँ ।

मैंने कहा भैये -
टेंशन के चक्कर में मत पालो हाईपरटेंशन
वरना समय से पहले ही मिल जाएगी फैमिली पेंशन ।

एक बोला मुझे तो बीड़ी बिल्कुल भी नहीं भाती है
पर क्या करूँ इसके बिना टॉयलेट ही नहीं आती है ।

दूसरा बोला सर बिना पिए, मूंह में बांस हो जाती हैं
एक दो सिग्रेट पी लेता हूँ, तो गैस पास हो जाती है ।

एक युवक हवा में धुएं के गोल गोल छल्ले बना रहा था
पता चला वो लड़का होने की ख़ुशी में ख़ुशी मना रहा था ।

कुछ युवा डॉक्टर भी सिग्रेट के कश भर रहे थे ,
मूंह में सिग्रेट दबा गर्ल फ्रेंड को इम्प्रेस कर रहे थे।


कुछ लोग ग़म में पीते हैं , कुछ पीकर ख़ुशी मनाते हैं ।
कुछ लोग दम भर पीते हैं , फिर दमे से छटपटाते हैं ।

भले ही जेब में पैसे नहीं रिक्शा लायक घर जाने को।
लेकिन बण्डल माचिस ज़रूर मिलेगी बीड़ी सुलगाने को।   

ये धूम्रपान की आदत , आसानी से कहाँ छूटती है
पहले सिग्रेट हम फूंकते हैं , फिर सिग्रेट हमें फूंकती है।


नोट : किसी ने कहा है -- इट्स वेरी ईजी टू स्टॉप स्मोकिंग , एंड आई हैव डन इट सो मेनी टाइम्स।  






Wednesday, July 25, 2012

मूंह से निकली बात , कमान से निकला तीर और सर के उड़े बाल -- कभी वापस नहीं आते ?



जैसे किसान को अपनी लहलहाती फसल को देख कर और पिता को अपने ज़वान होते बेटे को देख कर आनंद आता है, वैसे ही एक पुरुष के सर पर काली जुल्फों की छटा देख कर आनंद आता है .
कॉलिज के दिनों में जब अपनी बुल्लेट पर बिना हेलमेट के बैठकर धड़ धड़ करते हुए मोटरसाईकल दौड़ाते थे , तब सर सर करती हवा सर के बालों के साथ अठखेलियाँ करती तो खुद को किसी फिल्म स्टार से कम नहीं समझते--- एक रास्ता है जिंदगी , जो थम गए तो कुछ नहीं .

फिर धीरे धीरे सर पर बालों की आबादी ऐसे कम होती गई जैसे देश में ईमानदार लोगों की . जहाँ पहले दिन में बस तीन बार बालों में कंघी करते थे , अब हर तीस मिनट बाद करनी पड़ती है . अब तो कंघी करते समय बच्चे भी हँसते हुए कहते हैं -- पापा , सर पर चार तो बाल हैं , और आधे घंटे से लगे हुए हैं कंघी करने में . ऐसे में हम तो यही कहते हैं -- बेटा , प्रेसियस चाइल्ड की देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है .

लेकिन हर बार जब हेयर कटिंग के लिए जाते हैं तो हज्ज़ाम को यही कहना पड़ता है -- भाई बस थोड़े से यहाँ वहां काटने हैं . वो भी मुस्कराता हुआ कहता है -- बाबूजी , समझ गया . लेकिन जल्दी ही उसकी मुस्कराहट ,झुंझलाहट में बदल जाती है क्योंकि जिस काम को वह दो मिनट का काम समझ रहा था , उसमे उसे आधा घंटा लग जाता है . कभी यहाँ से , कभी वहां से काटते काटते अक्सर हमारे बाल थोड़े से ही रह जाते हैं . घर जाते हैं तो यही सुनना पड़ता है -- पट्ठे बना दिए पट्ठे ने .

इस बार जैसे ही हम कुर्सी पर बैठे बाल कटवाने के लिए , बायीं ओर की कुर्सी पर बैठा एक ख़ुदा का बंद शुरू हो गया अपने मोबाईल पर जोर जोर से गप्पें मारने . लगता है हम हिन्दुस्तानियों को बात बात पर शोर मचाने की बड़ी ख़राब आदत है . सारे समय उसकी चपड़ चपड़ सुनते रहे . अंत में उसने मोबाईल पर एक सन्देश पढ़कर सबको खबर दी -- यहाँ भूकंप आया है . अब तक हम गर्दन घुमाने की हालत में आ चुके थे . घूम कर उसे देखा तो पाया की एक २४ -२५ साल का काला कलूटा , भारी भरकम राक्षस सा दिखने वाला लड़का फेस पैक लगाये बैठा था . उसे देख कर मन हुआ की कहूँ -- भूकंप नहीं भाई , यह तो आपने अपना पैर ज़मीन पर पटका है . लेकिन उसका डील डौल , चेहरे पर झलकती क्रूरता और मानसिक दिवालिया देख कर हमने अपने सेन्स ऑफ़ ह्यूमर पर नियंत्रण रखना ही सही समझा .


सैलून से बाहर निकले तो एक बार फिर वही लुटे लुटे से महसूस कर रहे थे . सोचा , आखिर कब तक ऐसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे . दिल ने कहा -- कुछ करते क्यों नहीं, कुछ लेते क्यों नहीं . लेकिन हमें ध्यान आया पिछली बार भी मन में ठान लिया था कुछ करने का और पहुँच गए थे अपने अस्पताल के त्वचा रोग विभाग के अध्यक्ष के पास किसी नुश्खे की तलाश में . लेकिन जब उनकी चमकती चाँद देखी, तो बिना कुछ कहे , करे और लिए ही वापस आ गए थे .
फिर याद आया नज़फगढ़ का नवाब -- वीरेन्द्र सहवाग . कैसे उन्होंने कुछ दिन टीम से बाहर रहने का फायदा उठाते हुए अपनी खोई हुई बहार वापस पा ली थी . लेकिन पत्नी जी ने बताया -- जानते हैं उनके पुनर्रोपित एक एक बाल की कीमत ७५० रूपये है . यह सुनकर हमारी तो लुटिया ही डूब गई . सोचा सब कुछ लुटा कर वापस भी आए तो क्या पाएंगे . हालाँकि श्रीमती जी अब भी जब कभी सुबह कंघी करने के बाद कंघी में दो बाल देख लेती हैं तो कहती हैं -- लो कर दिया ना सुबह सुबह १५०० /- का नुकसान .

रोज होते इस नुकसान की चिंता में घुले जा रहे हम इस बार दृढ निश्चय कर चुके थे कुछ करने का .
तभी हमें ध्यान आया , जब हम नए नए डॉक्टर बने थे तब हमारे एक साथी को दिल्ली के एक पौश इलाके में नई नई खुली एक क्लिनिक में ३०,००० रूपये मासिक सैलरी पर काम मिला था जबकि हमें मिलते थे मात्र २००० /-. उस क्लिनिक में किसी नई तकनीक से सर के उड़े बालों को दोबारा पाने की गारंटी दी जाती थी . खर्चा मात्र ६००० -१००००/ -. वह तो बाद में पता चला -- वह कोई जादुई इलाज नहीं बल्कि एक दवा थी जिसे घोलकर सर पर लगाया जाता था .


हालाँकि उस दवा का इस्तेमाल हम भी अनमने से कई बार कर चुके हैं . लेकिन शायद दिल से न करने की वज़ह से फायदा नहीं हुआ . यही सोचकर हम पहुँच गए केमिस्ट के पास और मांगी वो दवा . केमिस्ट ने पूछा -- २% या ५ & ? अब हमने यह तो सोचा ही नहीं था , सो पूछा -- दोनों में क्या फर्क है ? ज़वाब दिया पास खड़ी एक सुन्दर सी , नवयौवना ने -- अक्सर २ % को ही रिकोमेंड किया जाता है -- मैंने भी २ % ही इस्तेमाल किया है . ५ % वाली से चक्कर आ सकते हैं . उसकी भोली अदा पर मन ही मन मुस्कराते हुए हमने भी बड़े भोलेपन से उसका शुक्रिया अदा किया और पूछा -- कितना फायदा हुआ ? वो बोली -- जब तक लगाते रहो तब तक तो फायदा होता है . हमने भी २ % वाली एक शीशी खरीदी और सजा दिया अपने कमरे में .


अब रोज सुबह नहा धोकर जब श्रीमती जी इश्वर की स्तुति कर रही होती हैं , तब हम शीशी खोलकर अपने उजड़े चमन की सेवा सुश्रुवा में लगे होते हैं . साथ ही श्रीमती जी से भी अनुरोध करते हैं -- अपनी प्रार्थना के साथ , भगवान से दो चार बाल हमारे लिए भी मांग लें .

अब देखते हैं -- हमारी सेवा और श्रीमती की प्रार्थना कब और कितना रंग लाती है !






हालाँकि डरते भी हैं --कहीं ज्यादा रंग ले आई और ऐसे हो गए तो ! यह उसी दवा का साइड इफेक्ट है .

अंत में , पूर्व प्रकाशित एक क्षणिका :

हेयर कटिंग सैलून की
आरामदेह कुर्सी पर बैठा
मैं ईर्षा रहा था ,
बाजु में बैठे युवक की लहलहाती
ज़ुल्फों को देख कर .
तभी , हमारा केश खज़ाना देख
दूसरी ओर बैठे
एक हम उम्र के चेहरे पर
वही भाव उभर आए .
उसका ग़म देख कर , मैं अपना ग़म भूल गया !

नोट : दवा का नाम मुफ्त में नहीं बताया जायेगा . कीमत आप स्वयं निर्धारित कर लें .




Thursday, June 28, 2012

मैं तो पानी पीता ही नहीं ---


पिछली पोस्ट में गंभीर विचार विमर्श के बाद अब कुछ थोड़ा मस्ती का माहौल बनाया जाए . इसी उद्देश्य से अपना टाइम खोटी कीजिये, बिना किसी शिकायत के .

रोजाना की तरह डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक में बैठे थे . तभी एक मरीज़ आया और बोला -- डॉक्टर साहब पेट में बहुत दर्द रहता है . पेट बढ़ता भी जा रहा है . कोई उपाय बताइए .
डॉक्टर साहब ने पूरा मुआयना किया और पूछा -- शराब पीते हो ?
मरीज़ बोला -- डॉक्टर साहब , झूठ नहीं बोलूँगा , वो तो मैं पीता हूँ .
डॉक्टर : देखिये , शराब पीने की वज़ह से आपका ज़िगर ख़राब हो गया है . और पेट में पानी भी भर गया है .
मरीज़ : डॉ साहब , ज़िगर तो ठीक है लेकिन पेट में पानी कैसे भर गया ? मैं तो पानी पीता ही नहीं . मैं तो दारू भी नीट पीता हूँ .

फिर कुछ सोचकर मरीज़ बोला -- डॉ साहब , याद आया बचपन में जब पीना शुरू किया था तब पानी मिलाकर पीता था . पहले व्हिस्की ली पानी के साथ , पर वो चढ़ गई . फिर रम पीने लगा, लेकिन वो भी चढ़ जाती थी . फिर मैंने वोदका लेनी शुरू कर दी पानी के साथ . लेकिन जब वो भी चढ़ गई , तो मैंने पानी पीना ही छोड़ दिया .

डॉक्टर : नहीं नहीं , देखिये आपको शराब बंद करनी पड़ेगी .
मरीज़ : डॉ साहब , प्लीज़ बंद करने के लिए मत कहिये , मैं मर जाऊंगा . हाँ , कम कर सकता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा कितनी पीते हो ?
मरीज़ : जी झूठ नहीं बोलूँगा --बस चार पैग पीता हूँ .
डॉक्टर : अच्छा आज से तीन कर दो और दो हफ्ते बाद आकर मिलो .
दो सप्ताह बाद---
डॉक्टर : अब कैसा लग रहा है ?
मरीज़ ; जी कुछ आराम तो है पर अभी भी दर्द रहता है .
डॉक्टर : ठीक है , आज से दो पैग ही लेना .
मरीज़ : ठीक है डॉ साहब . लेकिन दो से कम मत करना . वो क्या है ना, पूरी बोतल एक पैग में आ ही नहीं सकती .

एक महीने तक मरीज़ वापस नहीं आया . फिर एक दिन घूमता घूमता क्लिनिक पहुंचा तो देखा --बाहर एक तख्ती टंगी थी जिस पर लिखा था -- डॉक्टर इज आउट . मरीज़ ने कम्पाउन्दर से पूछा --क्या डॉ साहब कहीं बाहर गए हैं . वो बोला -- नहीं अन्दर हैं , खुद ही देख लो . मरीज़ ने अन्दर जाकर देखा --डॉ साहब कुर्सी पर चित पड़े हैं . उसने हाथ से हिलाकर उन्हें उठाया तो देखते ही डॉक्टर बोला --अरे तुम ! फिर आ गए ! मरीज़ बोला --नहीं नहीं डॉक्टर साहब , मैं अब ठीक हूँ . मैंने पीनी छोड़ दी है . बस कभी कभी पेट में दर्द होता है . डॉक्टर बोला --चिंता नहीं करना . मैं अभी सूई लगाता हूँ . तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे .
डॉक्टर ने सिरिंज भरा और लगा दिया कूल्हे में जैसे भैंस को इंजेक्शन लगाते हैं .

अगले दिन मरीज़ फिर आया तब डॉक्टर पूरे होश हवास में था . देखते ही बोला -तुम फिर आ गए .
मरीज़ बोला --डॉक्टर साहब , आपकी दुआ से मैं अब बिल्कुल सही हूँ . बस ये पूछने आया था --कल जो आपने सूई लगाई थी , उसे कब निकालेंगे ?

और अंत में :

असली शराबी वो कहलाये ,
जो पीने की शुरुआत करे बचपन में नीट बियर से ,
और इक दिन नीट व्हिस्की पीता नज़र आए ,
और इसका कारण ये बतलाये,
भई क्या करें आज ड्राई डे है . इसलिए नो वाटर , नो सोडा , नो आइस .