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Tuesday, April 7, 2026

हंसने की फरियाद...

 एक महफिल में

कविता सुनाने की जब फरमाइश आई,

हमने अपनी बेस्ट हास्य कविता सुनाई।

पर उस दिन तो मैं ऐसा फंसा,

श्रोता एक भी ना हंसा।

फिर ख्याल आया कि आजकल

हास्य कविता सुनाते ही कौन हैं।

शायद इसीलिए सब श्रोता मौन हैं। 

यही सोचकर हमने दर्जनों चुटकले भी सुनाए,

पर श्रोता ज़रा भी ना मुस्कराए।


भई हंसते भी कैसे, सब घबराए थे,

अपनी अपनी पत्नी संग जो आए थे।

और पत्नियां सब चुप बैठी थीं,

जाने किस टेंशन में ऐंठी थीं।

शायद पति ने झुमके दिला दिए सस्ते,

फिर बिना पत्नी की परमिशन के

भला कैसे हंसते।

हमने निर्णय लिया कि पहले महिलाओं को समझाएंगे,

फिर हम ही समझ गए कि भैया जो पत्नी के सामने हंस सके

ऐसे पति कहां से आयेंगे।


हमारी भी प्रॉब्लम ये कि हम हास्य कवि,

ठहाकों की फरियाद नहीं करते।

बाकी कवियों की तरह

तालियों के लिए हुंकार नहीं भरते।

कि जो सच्चा देशभक्त है

वो अगली पंक्ति पर तालियां जरूर बजाएगा।

हमने सोचा, अब मजा आएगा,

चलो बोलते हैं,

भाइयों बहनों चाचा काका,

अगले जोक पर ठोको ठहाका।

पर हाय रे किस्मत, जोक किसी को ना जँचा,

क्योंकि श्रोता फिर एक ना हंसा।


अब हमने महिलाओं की ओर रुख किया

और प्रश्न किया,

कृपया हाथ उठाएं जिस जिस के पति ने 

लॉकडाउन में झाड़ू पोंछा लगाया,

पत्नियां भी सभी पतिव्रता निकली

एक ने भी हाथ नहीं उठाया।

खाली गया ये भी जो तंज था कसा,

क्योंकि श्रोता अब भी एक ना हंसा।


भई हंसते भी कैसे,

कोई अपनी या अपनों की बीमारी से त्रस्त हैं,

कोई बेरोजगार है तो कोई जॉब के तनाव से ग्रस्त है।

इस मृत्युलोक में सुखी लोग नज़र ही कहां आते हैं,

इसीलिए हम तो सबको यही समझाते हैं।

कि उम्र एक नम्बर है, नम्बर ज़िंदगी नहीं,

जिंदगी में खुश रहने पर कोई पाबंदी नहीं। 

हंसने हंसाने का ही दोस्तो नाम है जिंदगी,

खुल कर हंसो, हंसने में कोई शर्मिंदगी नहीं। 


क्योंकि जब आप हंसते हैं तब अपना तनाव हटाते हैं,

जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं,

हंसना हंसना भी एक लाभकारी काम है दुनिया में,

इसलिए हम तो सदा हंसी की ही दवा पिलाते हैं। 

Monday, September 30, 2024

हाय रे बुढ़ापा...

 वज़न घटा, पके आम से पिचके गाल, 

देख आइने में खुद का हाल घबराने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा इतराने लगे हैं। 


रफ्ता रफ्ता सर के बाल हुए हलाल,

बचे खुचे सूरजमुखी से बिखरने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा निखरने लगे हैं। 


सूखी फसल बालों की, बची खरपतवार,

उसे भी खिज़ाब से काला कर बंदर लगने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा सुंदर लगने लगे हैं। 


मुंह में बचे दांत नहीं, ओरिजिनल आंख नहीं, 

खामख्वाह हरदम जवां होने का दम भरने लगे हैं,

पर पत्नी कहती है,अब आप ज्यादा हैंडसम लगने लगे हैं। 


दिल्ली को छोड़, बने हरियाणा के हरियाणवी,

अक्ल से और शक्ल से हरियाणवी जाट दिखने लगे हैं,

और पत्नी कहती है, अब आप ज्यादा स्मार्ट लगने लगे हैं। 


ना काम ना धाम, करते बस आराम ही आराम,

अपनी मर्ज़ी से खाते पीते और सोते जगने लगे हैं,

पत्नी कुछ भी कहे, हम फ़ाक़ामस्ती में मस्त रहने लगे हैं। 


बिना रोज लड़े पत्नी से अब तो भूख भी नहीं लगती,

पर जो पहले नहीं किया उसका इजहार करने लगे हैं, 

जीवन के पतझड़ में पत्नी से ज्यादा प्यार करने लगे है। 






Thursday, August 1, 2024

हास्य कवि...

 पत्नी पर कविता सुनाओ तो पत्नी नाराज़ हो जाती है,

बालों पर कविता सुनाओ तो दोस्तों की हालत नासाज हो जाती है।


धर्म पर कविता सुनाओ तो

लोग सांप्रदायिक फसाद में फंस जाते हैं,

नेताओं पर कविता सुनाओ तो दोस्त ही खेमों में बंट जाते हैं। 


यही सोचकर आजकल हास्य कवि मंचों पर,

कविता नहीं, केवल चुटकले सुनाते हैं। 😅

Saturday, May 25, 2024

तोड़ मरोड़ कर :

 

हमारी परेशानी को तुम क्या समझोगे दोस्त,

हम जब गुजरते हैं कब्रिस्तान से,

तो मुर्दे भी उठकर कहने लगते हैं,

डॉक्टर साहब, एक कविता तो सुनाते जाओ। 

😅

Monday, May 6, 2024

कुछ और मुक्तक...

 समय दिन महीने और साल दिखा देता है, 

जमा घटा गुना और भाग सिखा देता है। 

ये स्मार्ट फोन कुछ ज्यादा ही नौटी हो गया है,

पत्नी की कॉल को भी जंक कॉल बता देता है। 


क्वारेंटिन और डिस्टेंसिंग जैसे शब्द अब यक्ष हो गए,

आइसोलेशन में पति पत्नी के जुदा शयन कक्ष हो गए। 

कोरोना की ऐसी तैसी, पत्नी तो इस बात से खुश है कि,

लॉकडाउन में पति और बेटा गृह कार्यों में दक्ष हो गए। 


गृह कार्य करने से  स्वास्थ्य सुधर जाता है,

जोड़ सलामत रहते हैं, वजन घट जाता है। 

हम भी लॉकडाउन में पतले कैसे हुए,

ये राज़ तो हमें अब समझ में आता है। 


रोज सोचते हैं सेहत बनाने कल से जिम जाएंगे,

या सुबह शाम पार्क की सैर करने ही चले जाएंगे।

परंतु पत्नी कहती है, घर के काम काज किया करो,

वरना मेरी तरह ही हाथ पैरों के जोड़ जाम हो जाएंगे। 


हर साल दीवाली पर ऑड इवन की बात होती है,

दिन भर भारी प्रदूषण और घनी काली रात होती है।

अकेले नहीं पर गाड़ी में पत्नी संग मुंह पर मास्क हो,

सोचता हूं क्या सच में पत्नी इतनी खतरनाक होती है।











Monday, April 29, 2024

कुछ मज़ेदार मुक्तक...


बच्चों को शोर मचाते देख कर झुंझलाने लगे हैं,

बात बात पर संगी साथियों को गरियाने लगे हैं।

किसी भी बात पर कभी बिना बात आता है गुस्सा,

लगता है हम सत्तर साल से पहले ही सठियाने लगे हैं। 


आजकल मैं ना कोई काम करता हूं,

बस दिन भर केवल आराम करता हूं।

जब आराम करते करते थक जाता हूं,

तो सुस्ताने को फिर से आराम करता हूं। 


आज के युवाओं में देशप्रेम की लौ जलती ही नहीं,

पॉश एरिया के मतदान केंद्रों में भीड़ दिखती ही नहीं। 

हम बड़े जोश से मतदान करने गए पर कर ना सके,

अधिकारी बोला, शक्ल आधार कार्ड से मिलती ही नही। 


गर्म कपड़ों को जब अलमारी में रख देते हैं धोकर,

मायूस से देखते हैं जब रोज सुबह उठते हैं सोकर। 

कि सर्दी खत्म होते ही गर्म कपड़े ऐसे वेल्ले हो गए हैं,

जैसे सेवानिवृत होने के बाद होते हैं सरकारी नौकर। 


जाने क्यों कुछ लोग बालों पर खिजाब लगाते हैं,

सिर के सफेद बाल तो अनुभव का अहसास दिलाते हैं,

एक सफेद बालों वाले युवक ने जब हमें अंकल कहा,

तब जाना कि भैया बाल धूप में भी सफेद हो जाते है।


आधुनिकता ने लोगों की जिंदगी को ही मोड़ दिया है,

रहा सहा कोरोना ने आपसी रिश्तों को भी तोड़ दिया है,

घर में पति और बाहर बुजुर्गों की बात कोई नहीं सुनता,

इसलिए हमने तो भैया अब बोलना ही छोड़ दिया है। 














Saturday, March 23, 2024

चचा छक्कन के केले...

 चाचा छक्कन जब सुबह से 

आराम करते करते थक गए

तो यकायक उन्हें गोल गप्पे याद आ गए।

यह सोचकर ही चचा एक बार तो शरमा गए।

आखिर औरों को हाइजीन का पाठ पढाते थे आप,

फिर खुद कैसे करते ये पाप। 


तभी याद आया कि वो मिठाई वाला

तो ग्लव्ज पहनकर खिलाता है। 

और स्वाद भी नंबर वन पर आता है। 

सोचा चलो चलते हैं लेके राम का नाम,

इसी बहाने वॉक करके हो जाएगा व्यायाम। 

लेकिन वहां गोल गप्पे का काउंटर खाली पड़ा था,

उसकी जगह एक बड़ा सा टेंट गड़ा था। 

चारों ओर बिखरी थीं गुज्जियां ही गुज्जियाँ,

हाइजीन की तो फिर उड़ रही थीं धज्जियां। 

होली तो अभी तीन दिन थी दूर,

फिर जाने लोगों में किस बात का था सुरूर। 


चाचा ने सोचा, खोमचा वाला भी तो खिलाता है,

और चटकारे लेकर खाने में सचमुच बड़ा मज़ा आता है।

खोमचे वाले तो दिखाई दिए अनेक,

पर हर एक पर भीड़ बड़ी थी,

वो मिठाई वाले की कस्टमर नारियां,

अब सब खोमचे वाले के पास खड़ी थीं। 

अब तो गोल गप्पे का पानी देखकर

मुंह में पानी आने लगा था।

लेकिन इसका भी डर सताने लगा था,

कि खुले में गोल गप्पे कैसे खाएंगे।

कोई जान पहचान वाला दिख गया

तो क्या मुंह दिखाएंगे। 


बस फिर मन में एक कसक लिए

मुंह में आए पानी को सटक, 

चचा वहां से खिसक लिए।

अभी जा ही रहे थे सर झुकाए,

मन ही मन शरमाए,

तभी रेहड़ी पर रखे केले दिखे,

तो चाचा ने फौरन एक दर्जन खरीद लिए,

और घर की राह पर निकल लिए। 


अब चचा छक्कन हर आधे घंटे में 

एक केला खाए जा रहे हैं,

और मन में हिसाब लगाए जा रहे हैं,

कि पत्नी के आने तक कितने बचेंगे,

या बचेंगे भी नहीं, यदि पत्नी देर से आई।

वैसे भी उन्हें केले पसंद हैं ही नहीं,

उनको खिला देंगे वही मिठाई वाले की मिठाई। 

और इस तरह गोल गप्पे के चक्कर में

चचा एक दर्जन केले गप गए,

पहले आराम कर के थके थे, 

अब केले खाकर पस्त हो गए। 

और आराम से लंबी तान मस्त सो गए। 


Friday, June 25, 2021

छपास का मारा , भोला कवि बेचारा --


एक बड़े हास्य कवि की किताब देख ,  

बक्से में बंद हमें, 

अपनी हास्य कविताओं की याद आई,

तो हमने फ़ौरन प्रकाशक महोदय को कॉल लगाईं।  

और कहा भाई, 

हम भी छोटे मोटे हास्य कवि कहलाते हैं ,

पर लगता है आप तो सिर्फ 

मोटे कवियों की किताब ही छपवाते हैं।   

क्या आप हमारी कवितायेँ छपा पाएंगे ?

वो बोले ये तो हम ,

आपकी कवितायेँ पढ़कर ही बता पाएंगे। 


हमने कहा अच्छा ये तो समझाइये 

आपकी क्या शर्तें हैं 

और छापने का क्या लेते हैं। 

वो बोला 

हम कोई ऐसे वैसे प्रकाशक नहीं हैं,

हम छापने का कुछ लेते नहीं बल्कि देते हैं। 

हमने अपनी ख़ुशी जताई 

और कहा भाई 

लगता है हमारी आपकी कुंडली मिलती है ,  

क्योंकि हम भी कविता सुनाने का कुछ लेते नहीं 

बल्कि अपनी जेब से देते हैं।  


पर अब ज़रा काम की बात पर आइये ,

और ये बताइये कि ,

यदि पसंद नहीं आई तो क्या आप 

हमारी कवितायेँ वापस करेंगे, 

या अपने पास ही धर लेंगे। 

वो बोला टेक्नोलॉजी का ज़माना है ,  

आप अपनी कवितायेँ हमे ई मेल कर दीजिये,

हम ई मेल से ही वापस कर देंगे।   

उनकी ईमानदारी हमे बहुत भाई , 

और कॉपीराइट की चिंता मन से निकाल , 

सारी कवितायेँ फ़ौरन ई मेल से भिजवाईं। 


अब बैठे हैं इंतज़ार में क्योंकि,

अभी तक ना कवितायेँ वापस आईं, 

और ना ही मंज़ूरी आई।  

Thursday, October 15, 2020

पत्नी और कविता --

 

एक दिन एक महिला बोली, 

आप पत्नी विषय पर कविता क्यों नहीं सुनाते हैं ! 


हमने कहा हम पत्नी पर कविता लिखते तो हैं, 

पर सुनाने से घबराते हैं।  


एक बार पत्नी पर लिखी कविता पत्नी को सुनाई , 

गलती ये हुई कि अपनी को सुनाई।  


उस दिन ऐसी मुसीबत आई कि हमें घर छोड़कर जाना पड़ा , 

और सारा दिन फुटपाथ पर बिताना पड़ा। 


तब से हम पत्नी विषय पर कविता तो सुनाते हैं , 

पर अपनी को भूलकर भी नहीं सुनाते हैं।   

  

Thursday, June 6, 2019

चलो ज़रा हंस लिया जाये --

१.

अमीर पत्नी गरीब कवि पति से :  मेरे पास कोठी है , बंगला है , गाड़ी है , साड़ी है , हीरे हैं , जवाहरात हैं।  तुम्हारे पास क्या है !
कवि पति : मेरे पास कविता है , रचना है , कल्पना है , गीत है , नगमा है और नज़मा भी है।

कवि जी अब फुटपाथ पर रहते हैं।

२.

लेबर डे पर पत्नी पति से : देखो कल तापमान ४५ को पार कर गया।  अब आप आज ही ऐ सी की सर्विस कराइये , स्विच ख़राब है , वो भी बदलवाना पड़ेगा , और ये ट्यूब लाइट तो जलती ही नहीं।  फ्रिज में सारी बोतलें खाली पड़ी हैं, भर देना।  अच्छा ऑफिस जाते समय ये चैक जमा कराते जाना।  और शाम को सब्ज़ी लेते आना।  कभी कुछ काम भी कर लिया करो। 

बेटा  :  पापा, मज़दूर दिवस की बधाई।

३.

पत्नी ( दूर से चिल्ला कर ) : अज़ी कहाँ हो !
पति :  अब क्या हुआ ! मैं यहाँ बैठा हूँ शांति के साथ।
पत्नी कमरे में आकर : हे भगवान ! मैं तो डर ही गई थी। आप तो अकेले बैठे हैं।  कहाँ है शांति ?
पति : उसी को तो खोज रहा हूँ।

अगले दिन से कामवाली बाई की छुट्टी हो गई।

४.

पति ( बड़े प्यार से ) :  अज़ी आप बुरा ना माने तो मैं एक दो दिन के लिए मायके हो आऊं !
पति : भाग्यवान, तुलसी दस को छोड़कर भला कौन ऐसा पति होगा जो पत्नी के मायके जाने पर बुरा मानेगा !

पत्नी का मायके जाना कैंसिल।  

Monday, March 26, 2018

पति पत्नी इक दूजे से पूरे होते हैं ---



मैसाज कराकर बॉडी का मन में हरियाली हो गई ,
मैसाज के चक्कर में पर म्हारी घरवाली खो गई।

इत् उत् जाने कित कित ना ढूंढा पर हम हार गए,
इंतज़ार में उनके हम तीन कप कॉफी डकार गए।

तन का तनाव किया था जो कम फिर बढ़ने लगा,
अब तन के साथ मन पर भी संताप चढ़ने लगा।

हमने मुनादी करा दी कि एक अनहोनी हो गई है ,
किसी को दिखे तो बताओ हमारी पत्नी खो गई है।

आखिर मिली साड़ी की दुकान पर खड़ी थी उदास ,
क्योंकि फोन उनके पास था और कार्ड़ हमारे पास।

हमारे पास नहीं था मोबाईल तो फोन कैसे करती ,
उनके पास नहीं था कार्ड तो खरीदारी कैसे करती।

इसीलिए पति पत्नी इक दूजे के बगैर अधूरे होते हैं ,
सच तो यही है कि पति पत्नी इक दूजे से पूरे होते हैं।


Saturday, December 23, 2017

दिल तो अभी बच्चा है जी ...

जिंदगी के तीन पड़ाव -- पूर्वव्यापी।

१) बचपन :

ये दिल तो बच्चा है जी।
दिल तो अभी बच्चा है जी।
जो काम कभी नहीं किये ,
उन्हें करने की इच्छा है जी।

किसी बगिया से आम तोड़ कर लाएं ,
कभी पेड़ से चढ़ अमरुद तोड़ कर खाएं।
गन्ने के खेत से गन्ना चुराकर चूसें ,
कोल्हू के गन्ने का ताज़ा रस पी जाएँ।

पर गांव की नदी में कूदने में गच्चा है जी ,
क्योंकि अपुन तैरने में अभी कच्चा है जी।

२) जवानी :

कभी पब , बार और डिस्को में जाते ,
किसी हसींना को देख सीटी बजाते ।
कभी रात रात भर घर से गायब रहते ,
लेट क्लास का घर में बहाना बनाते ।

काहे अपनी सच्चाई पर इतना गुमान है ,
नेकी छोड़ यार , दिल तो अभी जवान है।

३ ) बुढ़ापा  :

ना किसी से बैर , ना ही किसी से यारी ,
धर्म कर्म करने की उम्र हो गई हमारी।
मोह माया के जाल से मुक्त हो जाएँ ,
ख़त्म हो जाये जब सारी जिम्मेदारी ।

दिल को संभालें वरना, टूटना पक्का है जी ,
दिल ना अब जवान है , न ये बच्चा है जी।

Sunday, December 20, 2015

ऑटोग्राफ प्लीज़ ---



कल एक कवि सम्मेलन में हमने, कविता जैसा कुछ सुनाया ,
श्रोताओं का तो पता नहीं भैया, पर अपुन को बड़ा मज़ा आया।
हम बन गए प्रोफेशनल कवि , कुछ ऐसा होने लगा अहसास ,
जब आयोजक ने हमारे हाथ में, एक मोटा लिफाफा थमाया।

हमने सोचा अच्छा है , चलो इस गरीब का भला हो जायेगा ,
कुछ नहीं तो लिफाफा ही ,किसी शादी में काम आ जायेगा।
लेकिन नोट दिखे तो ये सोच कर फ़ौरन जेब के किये हवाले ,
कुछ हाथ नहीं लगेगा, ग़र श्रीमती जी को पता चल जायेगा।


उधर कवि सम्मेलन के बाद कुछ युवाओं ने कर दिया घेराव ,
किसी ने लेखन के टिप्स मांगे, किसी को था ऑटोग्राफ का चाव।  
अभी तक तो साइन और सिग्नेचर ही सदा करते आये थे हम ,
अब ऑटोग्राफ कहाँ से लाएं , ये सोचकर ही होने लगा तनाव।

एक युवक बोला ,
सर बहुत ठण्ड लगती है ,सर्दी में नहाने का कोई उपाय बतायें ,
हमने कहा इतनी मज़बूरी है तो आप स्वेटर पहन कर नहायें।
वो बोला सर कमाल है , यह कैसा दिया अज़ीबो ग़रीब ज़वाब है ,
हमने कहा जब सवाल ही ग़रीब है तो अमीर ज़वाब कहाँ से लायें।

अरे नर्म नौनिहालो तुम्हे गर्म पानी से भी नहाने में लगता है डर ,
ज़रा उनकी तो सोचो जो सियाचिन की ऊंचाइयों पर रहते हैं बेघर।
माइनस २० डिग्री में भी डटे रहते है प्रहरी बर्फ की चादर ओढ़कर ,
गोलियों की बरसात में भी सीमाओं की रक्षा करते है होकर निडर।

माना कि आज की युवा पीढ़ी के लोग हमें रूढ़िवादी समझते हैं ,
लेकिन जिन्हे जीवन का अनुभव है वो बात यथार्थवादी करते हैं।  
पथभ्रष्ट मत हो जाना पश्चिमी सभ्यता की नकल करते करते ,
हम भारतीय विपरीत परिस्थितयों में भी सदा आशावादी रहते हैं।



Wednesday, November 18, 2015

डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।

प्रस्तुत हैं , डॉक्टर और रोगी के बिगड़ते संबंधों पर कुछ पैरोडी  हँसिकाएँ : एक नया प्रयोग।  

१)
अय डाक्टर , चल दवा लिख !
झूठा बिल , फर्ज़ी मेडिकल बना ! 
पी एम रिपोर्ट बदल ,
अजन्मी बेटी का गला दबा ! 
अपनी फीस ले ,
अय डाक्टर , चल झूठा बिल बना ! 

२) 

मैं चाहे ये खाऊँ , मैं चाहे वो खाऊँ 
मैं चाहे जिम छोडूं ,
मैं चाहे दारू के अड्डे पे जाऊं , 
चाहे वेट बढ़े , चाहे पेट बढ़े ,
डाक्टर को दिखाऊँ ना दिखाऊँ , 
मेरी मर्ज़ी ! 

३)

अस्पताल मे 
छोड़ गया बेटा , मुझे 
हाय अकेला छोड़ गया ! 
सब देखते रहे तमाशा ,
मैं सड़क पे घायल ,
पड़ा पड़ा दम तोड़ गया ! 

४)

तू मेरा ईश्वर है , 
तू मेरा रक्षक है ! 
पर फीस मांगी तो  
तू पूरा भक्षक है ! 

५) 

होटल मे टिप् दे देंगे पूरे एक हज़ार , 
जुए मे हम भले ही हज़ारों जाएं हार , 
पर दो चार दिन गर पड़ जाएं बीमार,
तो तो तो तेरी तो ,
अय डाक्टर , चल दवा खिला ,
इंजेक्शन लगा , पर बिल ना बना ! 





Sunday, June 28, 2015

इक हम ही नहीं हैं तन्हा, पत्नि के सताये हुए ---


चार कवि मित्र आपस में बैठे बातें कर  रहे थे । सब अपनी अपनी पत्नी की बातें सुनाने लगे। हालाँकि , यह काम अक्सर महिलाएं किया करती हैं लेकिन कवि ही ऐसे पुरुष होते हैं जो अपनी घरवाली की बातें सरे आम कर सकते हैं।  देखा जाये तो बहुत से कवियों की रोजी रोटी का माध्यम ही यही चर्चा है।
  
1) पहला कवि  :

मेरी पत्नी मुझ से इस कद्र प्यार करती है,
कि रात रात भर जाग कर मेरा इंतजार करती है।

एक रात जब मैं एक बजे तक भी घर नहीं आया,
उसकी नींद खुली तो मेरे मोबाईल पर फोन लगाया।

और बड़े प्यार से बोली -- अज़ी कहाँ हो ,
क्या आज विचार नहीं है घर आने का !

जिसने फोन उठाया वो बोला मेडम ,
भला ये भी कोई वक्त है घर बुलाने का !

इसी कहा सुनी में उसकी बीबी जाग गई
और इतनी लड़ी झगड़ी कि सुबह होते ही घर छोड़कर भाग गई।


2) दूसरा कवि :

मेरी पत्नी तो ऐसा कमाल करती है
कि बात बात पर मिस काल करती है।

लेकिन मेरा फोन एक ही रिंग पर उठाती है,
फिर फोन पर ही मुझे समझाती है।

अज़ी ज़रा बुद्धि का इस्तेमाल कर लिया होता ,
दो पैसे की बचत हो जाती, यदि एक मिस काल कर दिया होता।  


३) तीसरा कवि :

मेरी पत्नी भी बस कमाल करती है ,
मेरा इतना ज्यादा ख्याल रखती है !

कि एक दिन जब मैं जल्दी में मोबाईल घर भूल आया ,
उसकी नज़र पड़ी तो मेरी परेशानी का ख्याल आया।

और ये बात मुझे बताने को फ़ौरन उसने ,
अपने मोबाईल से मेरे मोबाईल पर फोन मिलाया।


४) चौथा कवि :


मेरी पत्नी तो बड़ी हाई टेक हो गई है ,
मोडर्न टेक्नोलोजी में इस कद्र खो गई है !

कि सारी शॉपिंग क्रेडिट कार्ड से करती है ,
सारे बिल भी अपने ही  कार्ड से भरती है।

फिर जब बिल आता है हजारों का,
तो उसकी पेमेंट मेरे कार्ड से करती है।

इस पर भी कहती है--मियां क्यों इतने मायूस हो गए हैं।
एक पैसा तो खर्च नहीं करते, आजकल आप बड़े कंजूस हो गए हैं।    

कवियों की बातें सुनकर हमें यही लगा कि --

इक हम ही नहीं हैं तन्हा, पत्नी के रुलाये हुए ,
और भी हैं ज़माने में , इस ग़म के सताये हुए ! 

नोट : नोट : पति पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं।  लेकिन थोड़ा हंसी मज़ाक जीवन में रास घोल देता है।  
( कौन सी ज्यादा पसंद आई , ज़रा बताएं ! )


Thursday, September 12, 2013

काश किसी गुरु की कृपा हम पर भी होती ---


टी वी पर बाबाओं की धूम देख कर समझ नहीं आता कि हालात पर हसें या रोयें ! फिर सोचा चलो कविता ही रची जाये :


ज़वानों की  जुबानी सुनी, लाख तरकीबें अपनाई,
पर ज़वानी जो गई एक बार, फिर लौट कर ना आई !

दिल में थी आरजू कि लहराएँ अपनी भी जुल्फें,
हेयर कटिंग भी हमने तो हबीब के सैलून से कराई !

बालों को रंगाया कभी रोगन कभी मेहंदी से,
पर अब तो सर पर बाल ही कितने बचे हैं भाई !

गालों पर कराया फेसियल शहनाज़ का ,
लेकिन झुर्रियों में ज़रा सी कमी तक ना आई !

चेहरे पर लगाया वैदिक एंटी सन लोशन ,
काम बाबा रामदेव की ज़वानी क्रीम भी ना आई !

हसीनों संग करते थे कनअंखियों से आँख मिचोली ,
अब मोतिया बिंद से ही बंद है इन आँखों की बिनाई !

आसां नहीं है दुनिया में आसाराम बन जाना ,
हाथ मलते रह जाओगे ग़र गुरु कृपा ही ना आई !

खामख्वाह दम भरते हैं ज़वानी का ' तारीफ ' ,
साँस रुक जाती है जब लट्ठ लेकर सामने आती है ताई !

नोट : कृपया इसे शुद्ध हास्य के रूप में ही पढ़ें। अर्थ का अनर्थ निकालकर आत्मविश्वास न खोएं।  


Wednesday, May 8, 2013

ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें --


कॉलेज के दिनों में खूब हँसते थे , गाते थे और मस्ती करते थे। दोस्तों में केंद्र बिंदु हम ही होते थे। डॉक्टर बनने के बाद भी यह क्रम जारी रहा। सब मित्र हमारे ही इर्द गिर्द रहकर सामंजस्य बनाये रखते थे। फिर कुछ वर्षों की दुनियादारी निभाने के बाद अस्पताल में नए लोगों से पाला पड़ा। यहाँ भी हमारे साथ हंसने हंसाने का दौर चलता रहा। कुछ लोग तो हमारे पास आते ही हंसने के लिए थे। जो कभी भी कहीं भी नहीं हँसते थे , वे हमारे साथ बैठकर हंसने का कोटा पूरा करते थे।

अक्सर देखने में आता है कि अधिकांश लोग हंसने में बड़ी कंजूसी करते हैं। हमारे एक मित्र , बाल रोग चिकित्सक , हमेशा परेशांन रहते। लेकिन हमारे पास आकर थोड़ी देर के लिए अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाते। फिर एक दिन दूसरे अस्पताल में विभाग अध्यक्ष बन गए। लेकिन अभी भी हाल वही , माथे पर सलवटें , चेहरे पर चिंता के भाव , कंधे झुके हुए, मानो जिंदगी का सारा बोझ वही ढो रहे हैं।

यहाँ ब्लॉगिंग में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं। हालाँकि ब्लॉगिंग करने का ध्येय सबका भिन्न हो सकता है , पसंद नापसंद भी भिन्न हो सकती है, लेकिन हास परिहास और आमोद प्रमोद के बिना ब्लॉग जिंदगी बड़ी सूनी सूनी सी लग सकती है। गत वर्ष हिंदी ब्लॉगर्स में काफी उथल पुथल हुई , कई लोग ब्लॉगिंग छोड़ फेसबुक की ओर हो लिए, कुछ ने नाता ही तोड़ लिया। कई धुरंधर माने जाने वाले ब्लॉगर्स की अनुपस्थिति से नए ब्लॉगर्स के विकास में बाधा उत्पन्न हुई।

ऐसे में एक ब्लॉगर बंधु ने फिर से माहौल को खुशनुमा बनाने की दिशा में प्रयास करना आरम्भ किया है जिसका प्रभाव भी दिखाई दे रहा है। ताऊ के नाम से प्रसिद्द श्री पी सी रामपुरिया का हास्य विनोद, ब्लॉगिंग को फिर से दिलचस्प बना रहा है। ताऊ कविता नहीं करते लेकिन उनकी कल्पना शक्ति किसी बड़े कवि से कम नहीं है। अक्सर लोग हैरानी में पड़ जाते हैं कि ताऊ के पास ऐसे खुरापाती आइडियाज आखिर आते कहाँ से हैं।


ताऊ पी सी रामपुरिया ( मुदगल ) : 


हिंदी ब्लॉगजगत में जब भी ताऊ का नाम आता है , मन में मौज मस्ती की जैसे धारा प्रवाहित होने लगती है। ताऊ की ब्लॉग पहेलियाँ सभी ब्लॉगर्स का ऐसा मानसिक व्यायाम कराती थी जैसे कोई ८१ खानों वाला क्रॉसवर्ड पज़ल करता है। एक चिकित्सक की दृष्टि से देखें तो यह एक्षरसाइज़ करने वालों को एल्ज़िमर्स डिसीज होने का खतरा कम से कम रहता है।

हालाँकि पिछले एक आध साल से ताऊ की ब्लॉगिंग सक्रियता पर ताई का अंकुश लगा रहा और ताऊ ''चैरिटी बिगिन्स एट होम '' के सिद्धांत का पालन करते हुए पूर्णतया ताई सेवा में लीन रहे जिससे पूरे ब्लॉग जगत में मायूसी सी छाई रही। लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ताई ने अब धर्म कर्म में व्यस्त होकर ताऊ पर से ब्लॉगिंग प्रतिबन्ध हटा दिया है और अब ताऊ पूर्ण रूप से स्पेनिश बुल की तरह बलमस्त होकर मैदान में कूद पड़ा है , बुल फाइटर्स को दिन में रंगीन तारे दिखाने के लिए।

ताऊ को देखा कहीं ! : 

ताऊ की एक ख़ास बात यह है कि आज तक उन्हें कोई पहचान नहीं पाया। हमें भी ताऊ से बस एक मुलाकात का अवसर मिला था लेकिन यह देखकर हैरान रह गए कि --

न टोपी , न पगड़ी 
न मूंछ , न दाढ़ी।  
न लट्ठ , न डंडा 
न ताबीज़, न गंडा।   
न बन्दर सी शक्ल , 
न छछूंदर सी अक्ल। 
न चेहरा काला ,
न गले में माला। 
न तन पर धोती, न चुनर,
न ताऊ, न ताऊ की उम्र। 
न देखा बुड्ढा खूंसट हठीला , 
दिखा एक बांका ज़वान सजीला।  


अक्सर हम ब्लॉगर्स स्वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने का भ्रम पाले रहते हैं। लेकिन ताऊ का प्रोफाइल पढ़कर हमारे तो ज्ञान चक्षु खुल गए और अब हम खुद को ज्ञानी समझने की भूल नहीं करते।

'' हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं !'' 

ताऊ अपना अमूल्य ज्ञान प्रदान करें या न करें , लेकिन एक बात निश्चित है कि बिना ज्ञान बघेरे भी ताऊ ब्लॉग जगत को अपने जिंदादिल लेखन से जीने की सही राह दिखा रहे हैं।

दो दिन की है जिंदगी, 
यूँ ही कट जायेगी ,  
कुछ रोने में, कुछ सोने में। 
जीने का मज़ा है ,  
जिंदादिल होने में।   

आइये ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें -- हम भी। 
सबके जीवन में समस्याएं होती हैं , कठिनाइयाँ होती हैं , लेकिन जो इनका सामना करते हुए भी माहौल को खुशनुमा बनाये रखे , उसे ताऊ कहते हैं।  


         

Thursday, July 19, 2012

चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए ---


यह पोस्ट कल प्रकाशित होनी थी . लेकिन अकस्मात काका -- राजेश खन्ना की मृत्यु का दुखद समाचार पढ़कर , उनके सम्मान में इसे स्थगित कर दिया था .

इस रविवार से हास्य का हमारा पसंदीदा कार्यक्रम आरंभ हुआ .हालाँकि इसे घर में बस हम ही देखते हैं . लेकिनपहले दिन मिमिकरी आर्टिस्ट ही नज़र आए. हालाँकि कल प्रसारित एपिसोड में हमारे ही एक युवा कवि मित्र दिल्ली के चिराग जैन ने हमारी ही स्टाइल में जोक्स सुनाकर खूब दिल बहलाया .

हास्य कवि वो कवि होते हैं जो पूर्ण रूप से न तो कविता करते हैं , न हास्य कलाकारों जैसी ड्रामेबाजी . बल्कि हास्य और कविता की मिली जुली प्रस्तुति करते हैं . अब पहले जैसे हास्य कवि तो नहीं रहे जैसे काका हाथरसी , हुल्लड़ मुरादाबादी , शैल चतुर्वेदी और ॐ प्रकाश आदित्य जी , जो महज़ अपनी हास्य कविताओं से खूब हंसाते थे , गुदगुदाते थे. आजकल के हास्य कवि चुटकलेबाज़ी का सहारा लेकर पहले हंसाते हैं , फिर कविता सुनाते हैं . उस पर कोई हँसे तो हंस ले वर्ना चुटकलों ने अपना काम तो कर ही दिया था .

वैसे कविता द्वारा हँसाना बड़ा मुश्किल और गंभीर काम है .

पिछली पोस्ट में आपने दूसरे कवियों की रचनाओं पर आधारित हास्य का मज़ा लिया . अब लीजिये , स्वरचित रचनाओं का आनंद . टिप्पणियों में कई मित्रों की शंका का समाधान करते हुए इतना बता देते हैं -- हमारे छात्र हमें बहुत पसंद करते हैं क्योंकि उनका इस तरह का मनोरंजन सिर्फ हम ही करते हैं . यहाँ यह भी जान लीजिये -- इस मामले में हम काका हाथरसी के अनुयायी हैं .

एक कविता जो होली पर लिखी थी , आप पढ़ भी चुके होंगे . लेकिन अब हमारी आवाज़ में :




और अंत में -- पब्लिक डिमांड पर दोबारा एंट्री हुई -- एक और कविता के साथ -- नव वर्ष की शुभकामनायें .



क्योंकि हम प्रोफेशनल कवि नहीं हैं , इसलिए मंच पर आने का अवसर तो कम ही मिलता है . लेकिन जब भी मिलता है , कोशिश यही रहती है -- लोगों को हंसाया जाए . क्योंकि हमारा मानना है -- जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव हटाते हैं, और जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव भगाते हैं .


आओ आज इक काम किया जाए
चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए !


Sunday, July 15, 2012

मिलकर ठुमके लगाओ , तो ग़ज़ल होती है -- कवियों की वाणी, हमारी जुबानी !


आज
रविवार १५ जुलाई से हास्य कार्यक्रम ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज ५ शुरू हो रहा है . यह लाइफ ओ के चैनल परलाफ इंडिया लाफ के नाम से रात १० बजे दिखाया जायेगा . इत्तेफ़ाक से जब हमें पता चला तो हम भी पहुच गए ऑडिशन देने . हमें विश्वास दिलाया गया , आपको एक हफ्ते में ज़रूर बुलाएँगे . हफ्ते तो कई बीत गए लेकिन बुलावे का फोन नहीं आया . एक बार पहले भी ऐसा हो चुका है जब डायरेक्टर के साथ दो बार इंटरव्यू के बाद भी अंतत : बुलावा नहीं आया . आखिर यह मान कर ही दिल समझाना पड़ा -- यह आवश्यक नहीं , सफलता हर बार अवश्य मिले .

टीचर्स कार्निवल के फोटो दिखा कर हमने वादा किया था , आपको अपनी क्लिप्स दिखाने का . क्लिप्स अब मिल चुकी हैं . भले ही सारे देश को हंसाने का अवसर नहीं मिला, अपने अस्पताल के छात्र और डॉक्टर्स ने खूब एन्जॉय किया . यहाँ आपको बता दें --यह कार्यक्रम बहुत मौज मस्ती भरा, चुलबुला , ताबड़ तोड़ और वाइब्रेंट होता है . इसलिए शायद आपको पहली नज़र में शॉक लग सकता है .
लीजिये , आप भी आनंद लीजिये . मौका और दस्तूर देख कर जो सही लगा , वही प्रस्तुत किया है .

1) इस क्लिप में प्रस्तुत हैं , कुछ चुनिन्दा बुजुर्ग कवियों की चंद पंक्तियाँ , अपने अंदाज़ में :








२) हमारा काव्य सफ़र शुरू हुआ था काका हाथरसी की कवितायेँ सुनकर. उन्ही को समर्पित करते हुए, ये चार छंद :



नोट : आज बस इतना ही . यदि झेलने में दिक्कत न हुई हो तो बताइयेगा , दो क्लिप्स अगली पोस्ट में लगा देंगे .


Wednesday, March 21, 2012

बार बार दिन ये आए , बार बार दिल ये गाए ---चुनाव .


हर वर्ष के आरंभ में हम डॉक्टर्स अपनी संस्था , दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों के चुनाव कराते हैं . मार्च अंत तक जहाँ एक तरफ वित्तीय वर्ष का अंत होता है , वहीँ हमारे भी चुनावों की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है . इस दौरान चुनावों की सरगर्मी में जो देखने को मिलता है , वही प्रस्तुत है एक हास्य कविता के रूप में :


वज़न हमारा पांच किलो बढ़ जाता है
ड़ी एम् ऐ का जब, चुनाव पास आता है .

कभी लंच, कभी डिनर, कभी दोनों
खाने पीने का रोज, जुगाड़ हो जाता है .

मिलते हैं सब गले जैसे बिछड़े बरसों के
साल भर का सारा, प्यार उमड़ आता है .

करते हैं बेसब्री से , इंतज़ार फ़रवरी का
एक महीना बिना खर्चे निकल जाता है .

उड़ाते हैं सब चिकन मटन व फिश टिक्का
बोतल कोई दारू की, आधी निगल जाता है .

मचता है शोर तब मयखाने में
जब दीवाना कोई होश खो जाता है .

नेता लोग देते हैं भाषण जोशीले
अपना काम तो कविता से चल जाता है .

लड़ें वो जिनके पास है ज्यादा पैसा
बंदा तो बस मुफ्त में मौज उडाता है .

टल जाएँ चुनाव ग़र सर्वसम्मति से
चीटिंग सी लगती है , लॉस हो जाता है .

रहता है यही एक अफ़सोस 'तारीफ'
चुनाव साल में बस एक बार आता है .

नोट : यह ग़ज़ल पढ़कर हो सकता है , शायद हमें कभी चुनाव का टिकेट न मिले .