पूर्वी दिल्ली के एक शानदार मॉल की सबसे उपरी मंजिल पर खड़ा मैं देख रहा था नीचे की चहल पहल -- आते जाते , हँसते मुस्कराते , इठलाते चहकते --- युवा नर नारी , कोई हाथों में हाथ डाले , कोई कोने में खड़े होकर चिपियाते, फुसफुसाते ( कड्लिंग ), -- लेकिन सब खुश -- बाहर की दुनिया से बेखबर .
कितनी अजीब बात थी -- बाहर की दुनिया में कहीं पानी नहीं , कहीं बिजली -- पेट्रोल ज्यादा महंगा या सब्जियां -- गर्मी से परेशान काम पर जाते लोग या ट्यूशन के लिए जाते छात्र .
लेकिन यहाँ बस एक ही दृश्य -- सब खुश , मग्न , चिंतारहित, पूर्णतया मित्रवत .
कुछ पल के लिए खो सा गया अतीत की यादों में . याद आने लगा वो समय जब प्री मेडिकल में था -- एक रुपया प्रति सप्ताह जेब खर्च मिलता -- खर्च होता ही नहीं था . कहाँ किसे फुर्सत थी केन्टीन में बैठने की . सभी तो करियर बनाने में लगे रहते थे . लेकिन महीने के अंत में एक फिल्म ज़रूर देखते और पार्टी हो जाती .
फिर मेडिकल कॉलेज में आ गए -- जेब खर्च बढ़कर दस रूपये प्रति सप्ताह हो गया . अब रोज एक चाय और समोसा हो जाता था . कभी कभार शाम को टहलते हुए पास की आई एन ऐ मार्केट में चले जाते , छोले बठूरे खाने . तीन रूपये में बड़े स्वादिष्ट छोले बठूरे मिलते थे . लेकिन अक्सर जेब में दस रूपये डालकर जाते और उस दुकान के सामने दो चक्कर लगाकर बस
चक्षु पान कर ही लौट आते . मन में विचार बना लिया था -- ऐसा करने से दृढ इच्छा शक्ति का विकास होता है .
अब कभी कभी लगता है -- इच्छा शक्ति कुछ ज्यादा ही दृढ हो गई है . खर्च करने का मन ही नहीं करता . बच्चे भी हँसते हैं और कंजूस कहने लगे हैं . सोचता हूँ , शायद सही ही कहते हैं . कहाँ गई वो खर्च करने की आदत ! फिर लगता है इसके लिए जिम्मेदार हालात हैं . वेतन सीधा बैंक में चला जाता है . सारे बिलों का भुगतान ओंनलाइन हो जाता है . श्रीमती जी सारी शौपिंग अपने क्रेडिट कार्ड से कर आती है और फिर उसका बिल हमारे कार्ड से भरने की नाकाम कोशिश करती हैं . अंतत : भुगतान तो चेक से हो ही जाता है .
अब देखा जाए तो कैश खर्च करने का अवसर ही नहीं मिलता . इसलिए अपनी तो आदत ही छूट गई है हाथ से पैसे देने की .
लेकिन यहाँ मॉल में आकर एक अलग ही दुनिया देखने को मिलती है . लोग दुकानों में कम , बाहर घूमते या बैठे ज्यादा नज़र आते हैं . सर्दी हो या गर्मी या आंधी आए या तूफ़ान -- मॉल के अन्दर तो सब ऐ सी ही होता है . इसलिए मौसम की मार नहीं झेलनी पड़ती . कोई यह भी नहीं पूछता --आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? या कर क्या रहे हैं ? ऐसा स्वछन्द वातावरण स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार मॉल कल्चर आने के बाद ही मिला है .
पिछले दस सालों में दिल्ली और देश की जैसे कायापलट ही हो गई है. एस्केलेटर या इलिवेटर पर खड़े होकर लगता ही नहीं हम भारत में हैं . चमचमाते फर्श और दीवारें , उम्दा साफ सफाई , टॉयलेट्स भी आधुनिक -- लगता है जैसे इम्पोर्टेड शब्द अब शब्दावली से ही हट गया हो .
इस बौलिंग ऐले को देख कर तीन साल पहले कनाडा यात्रा की याद आ गई जब पहली बार हमने वहां बौलिंग की थी . अब यहाँ ही यह सुविधा देख कर अत्यंत रोमांच हो रहा था .
साथ ही विशाल शीशे की खिड़की से बाहर मेट्रो लाइन पर जाती मेट्रो को देख कर तो जैसे स्वर्गिक आनंद की अनुभूति हो रही थी . सोच कर भी अजीब लग रहा था , यह वही क्षेत्र है जहाँ कुछ साल पहले गंदगी ही गंदगी दिखाई देती थी . लेकिन अब मेट्रो ने सब पलट कर रख दिया था .
लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित किया -- फ़ूड कोर्ट ने . इत्तेफ़ाकन इस मॉल में हमारा आना कम ही हुआ है . इसलिए सारा मॉल घूमकर देखने के बाद जब पहुंचे खाने की जगह तो वहां का नज़ारा देखकर हत्प्रध रह गए . पांच बजे भी लगभग सारी टेबल्स भरी थी . ९० % लोग हमारे बच्चों की उम्र के थे . लोग क्या , यूँ समझिये ब़ोय्ज, गर्ल्स , बॉय फ्रेंड , गर्ल फ्रेंड और कुछ खाली फ्रेंड्स -- सब मज़े से बैठे खाते पीते हुए गप्पें हांक रहे थे . कुछ तो होमवर्क और त्युसन भी वहीँ बैठकर पढ़ रहे थे . पति पत्नी तो कम ही दिखाई दिए . फिर भी , कोई किसी की तरफ नहीं देख रहा था --यह देखकर हमें भी अच्छा लगा वर्ना ताका झांकी से तो हमें भी परेशानी होती रही है .
अब बारी आई खाने की . शाम के पांच बजे ज्यादा कुछ तो नहीं खाया जा सकता था . अब हम अंग्रेज़ तो हैं नहीं , जो शाम होते ही रात का खाना खा लें ( सपर ) . काफी खोज बीन करने पर हमें पसंद आये --गोल गप्पे ( पानी पूरी ) . यूँ तो यह आइटम खाए हुए सालों हो चुके थे क्योंकि इन्हें खिलाने का विशेष तरीका हमें नहीं भाता . लेकिन यहाँ की बात कुछ और थी . यहाँ हाथ में ग्लव्ज पहनकर काम किया जा रहा था . हालाँकि जब प्लेट सामने आई तो पता चला -- गोल गप्पे खिलाने वाला भी हम में से ही किसी को बनना पड़ेगा . आखिर श्रीमती जी ने यह काम किया और हमने गोल गप्पे गपने का .
यहाँ आकर यही लगा --जब तक हम रूटीन लाइफ में उलझे रहते हैं , तब तक जीवन की रंगीनियों को भूले रहते हैं . अब जब यहाँ भी सब कुछ उपलब्ध है तो क्यों न इन सुविधाओं का फायदा उठाते हुए जीवन में रस घोलते हुए आनंद लिया जाए . आखिर , ज्यादा पैसा बचा कर भी क्या करना है . आज की युवा पीढ़ी से सीखते हुए कुछ मौज मस्ती पर भी खर्च करना चाहिए . वैसे भी एक दिन सब यहीं रह जाना है .
सारांश : जो व्यक्ति जितना ज्यादा कंजूस होता है , वह उतना ज्यादा दयालु होता है . क्योंकि वह अपना सब कुछ दूसरों के लिए छोड़ जाता है .