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Monday, October 11, 2021

शिक्षित होकर भी अशिक्षित हो गया --

 

आदि मानव जब शिक्षित हो गया,

शिक्षित होकर वो विकसित हो गया।

 

विकसित होकर किये ऐसे कारनामे

कारनामों से खुद प्रतिष्ठित हो गया।  

 

प्रतिष्ठित होकर जुटाए सुरक्षा के साधन,

सुरक्षा के साधनों में वो प्रशिक्षित हो गया। 

 

प्रशिक्षित हुआ इन संसाधनों में इस कदर

कि सम्पूर्ण विश्व ही असुरक्षित हो गया।  

 

असुरक्षित होकर अब तो सोच :"तारीफ़"

शिक्षित होकर भी तू अशिक्षित हो गया। 



Tuesday, September 3, 2019

यदि देश में विकास लाना है तो जनता को अनुशासित होना पड़ेगा --


बचपन में अक्सर नेताओं और मंत्रियों को विदेश जाते देखते थे जो सरकारी खर्चे पर अपने विभाग से सम्बंधित विषय पर जानकारी प्राप्त करने के लिए विदेश का दौरा बनाते थे।  उनके साथ परिवार के सदस्य और विभाग के ऑफिसर्स भी जाते थे। इस तरह हर दौरे पर सरकार के लाखों रूपये खर्च होते थे जो आज के करोड़ों के बराबर होते होंगे। 
लेकिन अपने स्वयं के खर्चे पर विदेश जाकर जो हमने देखा तो पाया कि विदेशों की विकसित व्यवस्था का ज़रा सा भी प्रभाव या अनुसरण यहाँ नज़र नहीं आता। ऐसा प्रतीत होता है कि ये दौरे मात्र सैर सपाटे के लिए ही उपयोग में लाये गए।  आइये देखते हैं टोरंटो कनाडा जैसे शहर में किस तरह की नागरिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं जो हमारे यहाँ नहीं हैं।

सड़कें :

टोरंटो की सड़कें एकदम साफ और समतल हैं।  कहीं कोई गड्ढा नज़र नहीं आता। शहर हो या हाइवे , गाड़ियां सुचारु रूप से चलती हैं। तापमान में बदलाव के कारण सडकों में दरारें अवश्य आती हैं लेकिन इन्हे तुरंत भर दिया जाता है। ज़ाहिर है, सडकों में लगायी गई सामग्री उत्तम गुणवत्ता और बिना किसी मिलावट के होती है। सड़क पर कोई वाहन चालक हॉर्न नहीं बजाता। सभी शांति के साथ बत्ती हरी होने का इंतज़ार करते हैं।  स्टॉप लाइन को कोई पार नहीं करता। पैदल लोगों के लिए भी ज़ेबरा क्रॉसिंग पर लाइट होती है जिस पर हाथ बना होता है।  जहाँ लाइट नहीं होती वहां वाहन चालक पैदल को प्राथमिकता देते हैं। वहां की सडकों पर पैदल चलने वालों का पूरा ध्यान रखा जाता है।  यदि किसी को चोट लग जाये तो भारी जुर्माना होता है। सडकों पर मुख्यतया कारें ही चलती हैं।  हाइवे पर कुछ ट्रक भी नज़र आ जायेंगे। आपको एक भी गाड़ी पर कोई खरोंच या डेंट नज़र नहीं आएगा। सभी कारें साफ और चमचमाती हुई नज़र आती हैं। इन्हे धोने के लिए ऑटोमेटेड वाशिंग स्टेशन्स होते हैं जिसमे कार में ही बैठकर जाना पड़ता है। 

सार्वजनिक परिवहन :

शहर में कारें भी चलती हैं।  लेकिन बसें भी बहुतायत में हैं। बसों के अलावा ट्राम भी चलते हैं। दोनों का एक कॉमन टिकट होता है जिसे एक ही दिशा में  जाने के लिए अंत तक उपयोग में लाया जा सकता है।  टिकट खुद ही लेना पड़ता है। यहाँ सब ईमानदारी से टिकट खरीदते हैं।  बिना टिकट पकड़े जाने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।  हालाँकि हमें एक भी टिकट चेकर नज़र नहीं आया। शहर से बाहर सबअर्ब जाने के लिए ट्रेन चलती है जो बहुत ही आरामदायक है।  सबअर्ब में रहने वाले गाड़ी स्टेशन पर पार्क करते हैं और ट्रेन द्वारा डाउनटाउन में काम करने आते हैं। 

पार्किंग :

गाड़ियां सिर्फ पार्किंग में ही पार्क होती हैं। सडकों पर भी एक साइड में पार्किंग स्लॉट्स बने होते हैं जिसमे आप गाड़ी पार्क कर सकते हैं।  वहीँ साथ में पेमेंट के लिए किऑस्क बना होता है जिसमे कार्ड से पेमेंट कर टिकट ले लिया जाता है।  कहीं किसी भी पार्किंग में कोई अटेंडेंट नहीं होता। सब जगह ईमानदारी से स्वचालित होता है। 

सफाई :

शहर में कहीं भी कूड़ा या कूड़े के ढेर नज़र नहीं आते।  यहाँ कदम कदम पर डस्टबिंस रखे होते हैं जिनमे सामान्य कचरा और रिसाईक्लेबल वेस्ट अलग अलग डालना होता है। कूड़ा कभी ओवरफ्लो नहीं करता। कूड़ा ले जाने वाले ट्रक भी नज़र नहीं आते क्योंकि शायद वे रात में खाली किये जाते हैं। घरों में भी वेस्ट सेग्रिगेशन ईमानदारी से किया जाता है। हर घर में तीन तरह के बैग्स होते हैं। एक में आर्गेनिक वेस्ट दूसरे में प्लास्टिक आदि और तीसरे में सामान्य पेपर आदि।     

ड्रेनेज सिस्टम:

यहाँ अक्सर बारिश होती रहती है।  लेकिन पानी की निकासी इतनी बढ़िया है कि कहीं पानी इकठ्ठा नहीं हो पाता। कहीं कोई ओपन ड्रेन्स नज़र नहीं आती। सारा ड्रेनेज सिस्टम अंडरग्राउंड है। नालियां ब्लॉक होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 

शिष्टाचार :

वैसे तो यहाँ सब अपने आप में मस्त रहते हैं।  कोई किसी के काम में दखलअंदाज़ी नहीं करता। लेकिन सार्वजानिक स्थानों पर सब शिष्टाचार निभाते हैं।  पंक्ति में अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। कोई धक्का मुक्की नहीं करता।  बस या ट्रेन में पहले उतरने वाले उतरते हैं ,फिर चढ़ने वाले चढ़ते हैं। 

लगभग २८ लाख की आबादी वाले शहर टोरंटो में विश्व के लगभग सभी देशों से आये लोग रहते हैं। इनमे चीनी, भारतीय, फिलिपिनी , जापानी लोग बहुत हैं। लगभग ५० % गोर लोग हैं।  लेकिन सभी मिलजुल कर रहते हैं। जून से अगस्त तक के महीने गर्मियों के होते हैं जिनमे स्कूलों की भी छुट्टियां होती हैं। इस समय में यहाँ के लोग आउटडोर लाइफ को  एन्जॉय करते हैं।  सर्दियाँ अक्सर बहुत ठंडी होती हैं। लेकिन सभी घर फुल्ली एयर कण्डीशंड होने के कारण आरामदायक रहते हैं। 

भारत में १ सितम्बर से मोटर वेहिकल एक्ट लागु होने पर कुछ लोग बहुत हो हल्ला मचा रहे हैं। उनका कहना है कि अब पुलिस को ज्यादा रिश्वत देनी पड़ेगी।  यह बहुत अफसोसजनक विचारधारा है। यदि हमें अपने शहर और देश को भी विकसित देशों की तरह उच्च श्रेणी में लाना है और रहने लायक बनाना है तो जनता को अनुशासित होना पड़ेगा। जब तक जनता अपनी सोच नहीं बदलेगी , तब तक खाली सरकार के भरोसे रहकर कुछ उपलब्धि प्राप्त नहीं हो पायेगी। सरकार को भी भ्रष्ट तंत्र से जनता को मुक्ति दिलानी होगी ताकि सार्वजनिक कार्यों पर खर्च होने वाला पैसा कार्यों पर ही खर्च हो सके , न कि भ्रष्ट अफसरों और ठेकेदारों की तिजोरियों में समा जाये।       





  

Monday, June 18, 2018

देश को कैसे विकास की राह पर आगे ले जाएँ ---


हमारे देश की सबसे बड़ी और जन्मदाता समस्या है जनसँख्या। १३० + करोड़ की जनसँख्या में जिस तरह निरंतर वृद्धि हो रही है, उससे यह निश्चित लगता है कि अगले ५ वर्षों में हम चीन को पछाड़ कर विश्व के नंबर एक देश हो जायेंगे। लेकिन जिस तरह के हालात हमारे देश में हैं, उससे बढ़ती जनसँख्या अन्य समस्याओं की जन्मदाता बन जाती है। महंगाई , बेरोजगारी , संसाधनों की कमी , प्रदुषण और भ्रष्टाचार इसी की अवैध संतानें हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। हालाँकि निसंदेह देश का विकास सरकार के हाथ में है, लेकिन सिर्फ सरकार को दोष देना सर्वथा अनुचित है। जब तक देश के लोग अपना कर्तव्य नहीं समझेंगे और उसका पालन नहीं करेंगे , तब तक हालात बद से बदतर ही होते जायेंगे।

१. जनसँख्या :  १९८० के बाद जनसँख्या वृद्धि दर भले ही २.०  से घटकर 1.२ हो गई हो , लेकिन तथ्य बताते हैं कि पिछले ४० सालों में जनसँख्या लगभग दोगुनी हो गई है। २१वीं सदी में लगभग ३० % जनसँख्या बढ़ी है। इतनी स्पीड से कोई देश नहीं बढ़ रहा। ज़ाहिर है, बढ़ती जनसँख्या में गरीबों की संख्या ही ज्यादा बढ़ रही है।  आज देश में ८०% लोगों की आय न्यूनतम वेतन के बराबर या उससे भी कम है।  भले ही हमारे देश में करोड़पति और अरबपति लोगों की संख्या भी बहुत है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से तो हम नीचे और नीचे ही जा रहे हैं।

२. भ्रष्टाचार :  इस मामले में भी हम दूसरे देशों की अपेक्षा काफी आगे हैं। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त है। निजी संस्थानों और उपक्रमों में भी पैसा कमाना ही उद्देश्य रह गया है। नेता हों या ब्यूरोक्रेसी , अफसर हो या चपरासी , सभी अपना दांव लगाते रहते हैं।  कोई भी विभाग भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। सरकारी नौकरी हो या कोई  हो , पैसा या सिफारिश लगाकर काम कराना लोगों की आदत सी बन गई है।

३. कर चोरी : किसी भी देश या राज्य में अनंत काल से राजा या सरकारें जनता के लिए कार्य करने हेतु जनता से कर वसूलते आये हैं। यदि कर की राशि जनहित में खर्च की जाये तो इसमें कोई बुराई भी नहीं, बल्कि एक आवश्यक प्रक्रिया है। लेकिन हमारे देश में कर की चोरी करना एक आम बात है।  ऐसा लगता है कि सरकारी नौकरों को छोड़कर जिनका कर श्रोत पर ही काट लिया जाता है , कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से कर नहीं चुकाता।  भले ही आयकर हो या  बिक्री कर या फिर संपत्ति कर , कर चोरी एक आम बात है। बिना कर चुकाए सरकार से विकास की उम्मीद रखना भी एक बेमानी है। यहाँ सरकार का भी कर्तव्य है कि जनता से लिया गया कर देश के कार्यों में इस्तेमाल किया जाये न कि नेताओं और बाबुओं की जेब भरने के काम आये।     

४. नैतिकता : किसी भी देश में पूर्ण विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश के नागरिक नैतिक रूप से सशक्त ना हों। अक्सर हम बहुत सी समस्याओं को सरकार के भरोसे छोड़ देते हैं। जब तक सरकारी काम को भी हम अपना काम समझकर नहीं करेंगे, तब तक विकास में बढ़ाएं उत्पन्न होती रहेंगी।

५. अनुशासन : आज हमारे देश में अनुशासन की सबसे ज्यादा कमी है। घर हो या बाहर , सडकों पर , दफ्तरों में और अन्य सार्वजानिक स्थानों पर हमारा व्यवहार अत्यंत खेदपूर्ण रहता है।  सडकों पर थूकना , कहीं भी पान की पिचकारी मारना , खुले में पेशाब करना , गंदगी फैलाना , यातायात के नियमों का पालन न करना आदि ऐसे कार्य हैं जो हमें सम्पन्न होते हुए भी अविकसित देश की श्रेणी की ओर धका रहे हैं।   

६. अपराध : जनसँख्या अत्यधिक होने से अपराध भी बढ़ते हैं। लेकिन इसमें ज्यादा दोष है न्यायिक प्रणाली में ढील होना।  इंसान डर से ही डरता है।  डर सजा का या फिर जुर्माने का।  यदि डर ही न हो तो कोई भी इंसान बेईमान और हैवान बन सकता है।  विदेशों में कानून का सख्ताई से पालन किया जाता है।  इसलिए वहां कानून का उल्लंघन करने वालों की संख्या कम रहती है। लेकिन यहाँ चोरी , डकैती , लूटपाट , हत्या , बलात्कार और अपहरण जैसी वारदातें करते हुए अपराधी लोग ज़रा भी नहीं डरते। जांच पड़ताल में खामियां और न्याय में देरी  से बहुत से अपराधी साफ बरी हो जाते हैं जिससे अपराधियों का हौंसला और बढ़ जाता है।   

ज़ाहिर है, यदि हमें अपने देश को विकास की राह पर अग्रसर रखना है तो हमें सरकार पर पूर्णतया निर्भर न रहते हुए अपने फ़र्ज़ का पालन करते हुए विकास में अपना योगदान देना होगा।  तभी हमारा देश विकास की रह पर आगे बढ़ सकता है। वर्ना अमीर और अमीर होते जायेंगे और गरीब बहुत गरीब।  यह बिगड़ती हुई  सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था कभी भी विनाश की जड़ बन सकती है।    
    

Monday, November 30, 2015

विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश---


कल चाणक्य पुरी में अशोक होटल के सामने नेहरू पार्क के एक कोने में बने PSOI कल्ब में आयोजित पैलेट फैस्ट २०१५ में जाकर १९७५ - १९८० के दौरान अपने कॉलेज के समय की यादें ताज़ा हो गईं।  वहीँ पास ही चाणक्य सिनेमा हॉल में देखी अनेकों फ़िल्में जिन्हे देखने के लिए अक्सर मेनेजर के पास जाकर सिफारिश लगाकर टिकटें लेनी पड़ती थी।  या फिर ग्रेटर कैलाश में अर्चना सिनेमा हॉल में रॉजर मूर की जेम्स बॉन्ड की अनेकों फ़िल्में , जॉहन ट्रेवोल्टा की सेटरडे नाइट फीवर और अन्य अनेक इंगलिश फ़िल्में जो हमने फ्रंट स्टाल में बैठकर देखी थी ६५ पैसे की टिकेट लेकर।  बोनी एम और एब्बा ग्रुप के गाने जिन्हे आज भी सुनकर तन और मन नृत्य करने लगता है।

निश्चित ही दक्षिण दिल्ली का यह पॉश इलाका सदा ही मन लुभाता रहा है।  आखिर बचपन और जवानी के २० साल हमने यहीं गुजारे थे। इस क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों के निवासियों में उतना ही अंतर दिखाई देता है जितना झुमरी तलैया और मुंबई के हीरानन्दानी क्षेत्र में।  फिल्मों या फैशन शोज में दिखाई जाने वाली पोशाकें पहने सिग्रेट और बियर पीती लड़कियां सिर्फ यहाँ ही दिखाई दे सकती हैं।




उधर सभी ५ सितारा होटलों और जाने माने फ़ूड चैन रेस्ट्रां के एग्जोटिक व्यंजन चखने के लिए आये खाये पीये अघाये कुछ मोटे कुछ थुलथुल लोगों की भीड़ को देखकर कहीं ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमारे देश में कहीं गरीबी भी है।  भूख भले ही न हो , लेकिन भूख लगाने के लिए सूप और स्टार्टर्स से शुरुआत करके मुख्य भोजन करने के बीच मनोरंजन के लिए एक ऊंची सी स्टेज पर एक्रोबेटिक्स करता एक पंजाबी मुंडा चिंघाड़ कर गाता हुआ युवा वर्ग को तालियां बजाने और साथ गाने के लिए लगातार उकसा रहा था।  बेशक हम जैसे नॉट सो युवा भी इसका भरपूर आनंद उठा रहे थे।





आजकल मोबाईल कैमरे ने तो जैसे कल्चर ही बदल दिया है।  सबके हाथों में तने कैमरे पल पल फोटो खींचते हुए इन पलों को कैमरे में कैद किये जा  रहे थे। लेकिन सबसे ज्यादा पॉपुलर तो सेल्फ़ी हो गई है।  हम भी जब सेल्फ़ी ले रहे थे तो एक बहुत ही सुन्दर सी कन्या ने हमें देखा तो बोली , लाइए मैं फोटो ले देती हूँ।  उसकी सुंदरता देखकर श्रीमती जी की तो आँखें ही चुंधिया गई।  लेकिन हमने प्यार से उसका धन्वाद करते हुए कहा कि बेटा फोटो तो हो गई। हालाँकि अंग्रेजी स्टाइल में देसी हसीनाओं को देखकर तो किसी की भी आँखों की पुतलियाँ फ़ैल सकती हैं।



यही है दिल्ली का ग्लेमर वर्ल्ड। आम आदमी के एकदम नज़दीक , लेकिन इतना दूर।
यहाँ एक ही जगह पर ऊंची अट्ठालिकाएँ और झोंपड़ पट्टी , फटेहाल भिखारी और कपडे फाड़ कर पहनने वाले शहरी एक साथ नज़र आते हैं।  ज़ाहिर है , विकसित और अविकसित समाज का संगम हमारा देश एक विकासशील देश है और लम्बे समय तक रहने वाला है, ऐसे आसार नज़र आते हैं।






Sunday, July 1, 2012

दुनिया में कंजूस आदमी सबसे दयालु इन्सान होता है -- क्या आप भी हैं




पूर्वी दिल्ली के एक शानदार मॉल की सबसे उपरी मंजिल पर खड़ा मैं देख रहा था नीचे की चहल पहल -- आते जाते , हँसते मुस्कराते , इठलाते चहकते --- युवा नर नारी , कोई हाथों में हाथ डाले , कोई कोने में खड़े होकर चिपियाते, फुसफुसाते ( कड्लिंग ), -- लेकिन सब खुश -- बाहर की दुनिया से बेखबर .

कितनी अजीब बात थी -- बाहर की दुनिया में कहीं पानी नहीं , कहीं बिजली -- पेट्रोल ज्यादा महंगा या सब्जियां -- गर्मी से परेशान काम पर जाते लोग या ट्यूशन के लिए जाते छात्र .
लेकिन यहाँ बस एक ही दृश्य -- सब खुश , मग्न , चिंतारहित, पूर्णतया मित्रवत .

कुछ पल के लिए खो सा गया अतीत की यादों में . याद आने लगा वो समय जब प्री मेडिकल में था -- एक रुपया प्रति सप्ताह जेब खर्च मिलता -- खर्च होता ही नहीं था . कहाँ किसे फुर्सत थी केन्टीन में बैठने की . सभी तो करियर बनाने में लगे रहते थे . लेकिन महीने के अंत में एक फिल्म ज़रूर देखते और पार्टी हो जाती .

फिर मेडिकल कॉलेज में आ गए -- जेब खर्च बढ़कर दस रूपये प्रति सप्ताह हो गया . अब रोज एक चाय और समोसा हो जाता था . कभी कभार शाम को टहलते हुए पास की आई एन ऐ मार्केट में चले जाते , छोले बठूरे खाने . तीन रूपये में बड़े स्वादिष्ट छोले बठूरे मिलते थे . लेकिन अक्सर जेब में दस रूपये डालकर जाते और उस दुकान के सामने दो चक्कर लगाकर बस
चक्षु पान कर ही लौट आते . मन में विचार बना लिया था -- ऐसा करने से दृढ इच्छा शक्ति का विकास होता है .

अब कभी कभी लगता है -- इच्छा शक्ति कुछ ज्यादा ही दृढ हो गई है . खर्च करने का मन ही नहीं करता . बच्चे भी हँसते हैं और कंजूस कहने लगे हैं . सोचता हूँ , शायद सही ही कहते हैं . कहाँ गई वो खर्च करने की आदत ! फिर लगता है इसके लिए जिम्मेदार हालात हैं . वेतन सीधा बैंक में चला जाता है . सारे बिलों का भुगतान ओंनलाइन हो जाता है . श्रीमती जी सारी शौपिंग अपने क्रेडिट कार्ड से कर आती है और फिर उसका बिल हमारे कार्ड से भरने की नाकाम कोशिश करती हैं . अंतत : भुगतान तो चेक से हो ही जाता है .

अब देखा जाए तो कैश खर्च करने का अवसर ही नहीं मिलता . इसलिए अपनी तो आदत ही छूट गई है हाथ से पैसे देने की .
लेकिन यहाँ मॉल में आकर एक अलग ही दुनिया देखने को मिलती है . लोग दुकानों में कम , बाहर घूमते या बैठे ज्यादा नज़र आते हैं . सर्दी हो या गर्मी या आंधी आए या तूफ़ान -- मॉल के अन्दर तो सब ऐ सी ही होता है . इसलिए मौसम की मार नहीं झेलनी पड़ती . कोई यह भी नहीं पूछता --आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? या कर क्या रहे हैं ? ऐसा स्वछन्द वातावरण स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार मॉल कल्चर आने के बाद ही मिला है .

पिछले दस सालों में दिल्ली और देश की जैसे कायापलट ही हो गई है. एस्केलेटर या इलिवेटर पर खड़े होकर लगता ही नहीं हम भारत में हैं . चमचमाते फर्श और दीवारें , उम्दा साफ सफाई , टॉयलेट्स भी आधुनिक -- लगता है जैसे इम्पोर्टेड शब्द अब शब्दावली से ही हट गया हो .




इस बौलिंग ऐले को देख कर तीन साल पहले कनाडा यात्रा की याद आ गई जब पहली बार हमने वहां बौलिंग की थी . अब यहाँ ही यह सुविधा देख कर अत्यंत रोमांच हो रहा था .




साथ ही विशाल शीशे की खिड़की से बाहर मेट्रो लाइन पर जाती मेट्रो को देख कर तो जैसे स्वर्गिक आनंद की अनुभूति हो रही थी . सोच कर भी अजीब लग रहा था , यह वही क्षेत्र है जहाँ कुछ साल पहले गंदगी ही गंदगी दिखाई देती थी . लेकिन अब मेट्रो ने सब पलट कर रख दिया था .




लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित किया -- फ़ूड कोर्ट ने . इत्तेफ़ाकन इस मॉल में हमारा आना कम ही हुआ है . इसलिए सारा मॉल घूमकर देखने के बाद जब पहुंचे खाने की जगह तो वहां का नज़ारा देखकर हत्प्रध रह गए . पांच बजे भी लगभग सारी टेबल्स भरी थी . ९० % लोग हमारे बच्चों की उम्र के थे . लोग क्या , यूँ समझिये ब़ोय्ज, गर्ल्स , बॉय फ्रेंड , गर्ल फ्रेंड और कुछ खाली फ्रेंड्स -- सब मज़े से बैठे खाते पीते हुए गप्पें हांक रहे थे . कुछ तो होमवर्क और त्युसन भी वहीँ बैठकर पढ़ रहे थे . पति पत्नी तो कम ही दिखाई दिए . फिर भी , कोई किसी की तरफ नहीं देख रहा था --यह देखकर हमें भी अच्छा लगा वर्ना ताका झांकी से तो हमें भी परेशानी होती रही है .




अब बारी आई खाने की . शाम के पांच बजे ज्यादा कुछ तो नहीं खाया जा सकता था . अब हम अंग्रेज़ तो हैं नहीं , जो शाम होते ही रात का खाना खा लें ( सपर ) . काफी खोज बीन करने पर हमें पसंद आये --गोल गप्पे ( पानी पूरी ) . यूँ तो यह आइटम खाए हुए सालों हो चुके थे क्योंकि इन्हें खिलाने का विशेष तरीका हमें नहीं भाता . लेकिन यहाँ की बात कुछ और थी . यहाँ हाथ में ग्लव्ज पहनकर काम किया जा रहा था . हालाँकि जब प्लेट सामने आई तो पता चला -- गोल गप्पे खिलाने वाला भी हम में से ही किसी को बनना पड़ेगा . आखिर श्रीमती जी ने यह काम किया और हमने गोल गप्पे गपने का .

यहाँ आकर यही लगा --जब तक हम रूटीन लाइफ में उलझे रहते हैं , तब तक जीवन की रंगीनियों को भूले रहते हैं . अब जब यहाँ भी सब कुछ उपलब्ध है तो क्यों न इन सुविधाओं का फायदा उठाते हुए जीवन में रस घोलते हुए आनंद लिया जाए . आखिर , ज्यादा पैसा बचा कर भी क्या करना है . आज की युवा पीढ़ी से सीखते हुए कुछ मौज मस्ती पर भी खर्च करना चाहिए . वैसे भी एक दिन सब यहीं रह जाना है .

सारांश : जो व्यक्ति जितना ज्यादा कंजूस होता है , वह उतना ज्यादा दयालु होता है . क्योंकि वह अपना सब कुछ दूसरों के लिए छोड़ जाता है .


Saturday, May 21, 2011

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है--




बचपन
में शेर की कहानियां सुनने का बड़ा शौक था जब भी ताउजी फ़ौज से छुट्टी आते, मेरी एक ही जिद होती , शेर की कहानी सुनने की

आज बरसों बाद जब अपने पसंदीदा टी वी चैनल डिस्कवरी पर जंगलों में विचरते शेर , बाघ , चीते आदि देखता हूँ , तो बहुत रोमांचित हो उठता हूँ

मन ही मन धन्यवाद भी करता हूँ उस वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर का जो महीनों या साल भर जंगल में रहकर जंगली जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करता है और उनकी जीवनी पर फिल्म बनाता है, जिसे हम अपने ड्राइंग रूम के आराम में बैठकर एक घंटे में देख कर प्रफुल्लित होते हैं

इन फिल्मों को देखकर मुझे अक्सर वह कहावत याद जाती है--मैन इज सोशल एनीमल ( मनुष्य एक सामाजिक जानवर है )

सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि क्या मनुष्य को जानवर कहना उचित है

आइये देखते हैं जंगली जानवरों और मनुष्य के व्यवहार में समानताएं और भिन्नताएं

) हाथी : जंगल का सबसे बड़ा जानवर :

हाथी प्राय: झुण्ड में रहते हैं एक झुण्ड में बीसियों हाथी --नर और मादाएं तथा बच्चे --सब मिलकर रहते हैं सभी हाथी मिलकर झुण्ड के बच्चों की रखवाली करते हैं


फोटो नेट से

लेकिन सबसे भारी और शक्तिशाली होने के बावजूद हाथी कभी कभी शेरों के शिकार बन जाते हैं

कभी कोई हाथी उदंडता से व्यवहार करने लगे तो उसे झुण्ड से निकाल दिया जाता है झुण्ड से निकला अकेला हाथी पागल जैसा हो जाता है जो बड़ा उत्पाद मचाता है और मनुष्यों को हानि पहुंचा सकता है


) जंगली भैंसे --दूसरे भारी जानवर :

भैंसे सैंकड़ों और हजारों की संख्या में झुण्ड बना कर रहते हैं बड़े और शक्तिशाली नर भैंसे झुण्ड के रक्षक होते हैं और मिलकर दुश्मन का मुकाबला करते हैं बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा मादा पर होता है लेकिन समय पर सब एक होकर खड़े हो जाते हैं

ये भी कभी कभी मांसाहारियों के शिकार बन जाते हैं , विशेषकर बीमार , बूढ़े या झुण्ड से अलग हुए बच्चे

) शेर --जंगल का राजा :

ये भी समूह बनाकर रहते हैं लेकिन शेरों के झुण्ड में सभी मादाएं होती हैं , साथ में बच्चे नर एक ही होता है जो झुण्ड का सरदार होता है यह बबर शेर शानदार , शक्तिशाली और सर्व शक्तिमान होता है इसका काम केवल मादाओं को गर्भवती करना होता है इसका समूह की सभी शेरनियों पर आधिपत्य होता है कोई दूसरा शेर समूह पर तभी कब्ज़ा कर सकता है जब सरदार बूढा हो जाए और उसमे लड़ कर जीतने की क्षमता रहे

शेरों के समूह में शिकार का काम अक्सर मादाएं ही करती हैं जो मिलकर शिकार करती हैं लेकिन शिकार मिलने के बाद खाने का हक़ पहले सरदार को ही होता है उसके बाद ही बाकि खा सकते हैं

शेरों का नया सरदार आते ही पहले समूह के बच्चों को मार देता है जिससे कि वह शेरनियों से अपनी स्वयं की संतान पैदा कर सके

) बिग कैट्स --बाघ , चीता , तेंदुआ :

इनके व्यवहार में अंतर होता है इनमे नर मादा के पास अक्सर प्रजनन के समय ही आता है और गर्भवती होने के बाद छोड़कर चला जाता है इसके बाद बच्चे पैदा होने से लेकर उनका पालन पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी मादा की ही रह जाती है

इनके बच्चों को सिर्फ दूसरे परभक्षियों बल्कि अपनी प्रजाति के दूसरे नरों से भी खतरा होता है

मादा बच्चों को खाना खिलाती है , उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखती है और तब तक उनकी देखभाल करती है जब तक वे खुद शिकार करना नहीं सीख जाते यह काम भी मादा ही करती है

बड़े होने पर एक दिन ये बच्चे मां को छोड़ स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी बसर करने निकल पड़ते हैं


) भेड़िये , जंगली कुत्ते और अन्य मांसाहारी तथा हिरन , जेबरा और अन्य शाकाहारी जानवर --ये सब भी प्राय बड़े समूहों में रहते हैं , मिलकर साथ चलते हैं और अपने झुण्ड से अलग नहीं होते

इन सब जानवरों में एक समानता है --सदियों से इनका व्यवहार एक जैसा ही है जो जैसा है , वो वैसा ही है समय के साथ इनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है

अब देखते हैं मानविक व्यवहार :

पृथ्वी पर मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो सर्वाधिक विकसित और उन्नत है अपने दिमाग का प्रयोग करते हुए उसने अपने लिए सुख के सभी संसाधन जुटा लिए हैं

बेशक मनुष्य विकास की कड़ी में जानवरों से ही विकसित हुआ है लेकिन अब वह एक पूर्ण रूप से सामाजिक प्राणी बन चुका है

मनुष्य का परिवार होता है , खानदान होता है , जाति , धर्म और देश भी होता है
मनुष्य भी अपने बच्चों का लालन पालन करने में व्यस्त रहता है स्त्री पुरुष दोनों मिलकर घर चलाते हैं

सदियों से मनुष्य भी हाथी , भैंसे और अन्य शाकाहारी जानवरों की तरह रहता आया है संयुक्त परिवार में रहते हुए समाज के नियमों का पालन करता आया है बच्चों को संरक्षण और बड़ों को सम्मान मिलता आया है

लेकिन इक्कीसवीं सदी का मनुष्य बदल रहा है अब वह बिग किट्स की तरह व्यवहार करने लगा है

लिव इन रिलेशनशिप रखने लगा है

छोटी छोटी बात पर तलाक लेने लगा है

बिन ब्याही किशोरी मां और बच्चे को पालती एकल मां को देखकर कैसा लगता है ?

अब बड़े होते ही बच्चे भी अपने रास्ते पर निकल जाते हैं

वृद्ध मात पिता की हालत उस शेर जैसी होती है जिसकी शक्ति क्षीण होने से उसका दबदबा ख़त्म हो जाता है

परिवार टूट जाते हैं संयुक्त परिवार देखने को नहीं मिलते

शहर में लाखों लोग रहते हुए भी लोग अकेले होते हैं

इन्सान अब बदल गया है

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है

क्या यही है विकास का इनाम ?

क्या हम शाकाहारी जानवरों से ही कुछ सीख पाएंगे ?