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Friday, April 13, 2012

गोरी तू मत जा मेले में -- ४० साल पुराना एक हरियाणवी लोक गीत .

घर में पहली बार ट्रांजिस्टर उस समय आया था जब भारत पाकिस्तान युद्ध चल रहा था -- शायद १९७१ वाले युद्ध के समय . ताऊ जी आर्मी में थे , इसलिए रोज ध्यान से युद्ध के समाचार सुने जाते . बाद में शांति स्थापना होने के बाद रोज शाम को कृषि दर्शन कार्यक्रम सुना जाता . हर वीरवार को ग्रामीण भाईयों के लिए फरमाईशी कार्यक्रम होता. उन दिनों एक हरियाणवी युग्ल गीत बहुत मशहूर हुआ था जो परिवार नियोजन पर आधारित था .

कुछ समय पहले दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र में रेबीज पर एक इन्टरव्यु देने के लिए गया तो पुरानी यादें ताज़ा हो गई . कार्यक्रम के संचालक महोदय से उस गीत का जिक्र किया तो उन्हें भी याद आ गया . उनसे उस गीत की एक रिकोर्डिंग देने की फ़रमाइश की, लेकिन अभी तक प्राप्त नहीं हुई है . फिर ऐसे ही हमने सोच कर याद करने की कोशिश की तो जो याद आया , वह प्रस्तुत है .
इस गीत में पत्नी मेला जाने की जिद कर रही है और पति उसे जाने के लिए मना कर रहा है . दोनों के तर्क वितर्क पर आधारित यह युग्ल गीत कुछ इस प्रकार था :


पिया मैं जांगी मेले में
पिया मैं जांगी मेले में
मने करणे सें चारों धाम
बीत गी उम्र तमाम
पिया जाण दे ----

गोरी तू मत जा मेले में
गोरी तू मत जा मेले में
उड़े जां सें मूरख लोग
फ़ैल ज्या रोग
रै गोरी राहण दे ----


अगड़ पड़ोसन सारी जा ली
मन्ने भी दे जाण पिया
पहर तागड़ी झुमके कंठी
सुणना लहरा बीन का
तीरथ धाम करे बिन पिया
माणस ना किसे दीन का

कितके सुणे बीन के लहरे
सहम चोट खा बैठेगी
-----------------
-----------------
हो ज्या लीरम लीर चीर
कंठी नै भी तुडवा बैठेगी


घणे बालकां नै तंग कर दी
गंगा न्हा कै आउंगी
काली कम्बली आले बाबा
कै मैं भेंट चढ़ाऊँगी
और औलाद नहीं चाहिए बस
इब तै पिंड छुड़ाउंगी

या तै बात घणी मामूली
तडके कैम्प में चालांगे
जिंदगी सुखी बनावन खातिर
ओपरेशन करवा ल्यांगे
दब कै बाहवें रज कै खावें
आनंद मौज उड़ा ल्यांगे


गोरी तू मत जा मेले में ----
पिया मैं ना जां मेले में ---
गोरी मज़ा ना मेले में --
पिया मैं ना जां मेले में ----


यह गीत आधा ही है . बाकि याद नहीं आ रहा . कुछ पंक्तियाँ भी छूट गई हैं . गीत को पूरा करने वाले के लिए एक ईनाम निश्चित है .


नोट : फ़िलहाल हम श्रीमती जी के साथ इस ऊहापोह में लगे है कि आज उन्हें कौन सा मेला दिखाने ले जाएँभई आज हमारी २८ वीं वैवाहिक वर्षगांठ जो है


Monday, April 9, 2012

उपचार ऐसे भी होता है ---

काम का टेंशन जब बढ़ जाता है , तब हम तो कविता लिखने बैठ जाते हैं . आजकल ब्लॉगजगत में भी टेंशन बढ़ा हुआ नज़र आ रहा है . ऐसे में प्रस्तुत हैं , कुछ स्व रचित लतीफ़े, टेंशन कम करने के लिए :

)

महिला
डॉक्टर से : डॉक्टर साहब , मेरे पति सारी रात नींद में बडबडाते हैं कोई दवा दीजिये
डॉक्टर : ये दवा दे रहा हूँ रोज सुबह पानी के साथ लेनी है आपके पति बडबडाना बंद कर देंगे
महिला : नहीं डॉक्टर , ऐसी दवा दीजिये कि ये साफ बोलना शुरू कर दें पता तो चले कि ये नींद में किसका नाम लेते हैं
डॉक्टर : ये दवा आपके पति के लिए नहीं , आपके लिए है

2)

आदमी डॉक्टर से : डॉक्टर साहब मेरी पत्नी सारी रात नींद में शेरनी की तरह गरजते हुए खर्राटे मारती है इसका कोई इलाज है ?
डॉक्टर : इन्हें दिन में गरजने का अवसर दीजिये , खर्राटे अपने आप बंद हो जायेंगे

3)

डॉक्टर (चार बच्चों की माँ ) रोगी से : आपकी उम्र कितनी है ?
महिला : जी २० साल .
डॉक्टर : कितने साल से ?

4)

पनघट की पनिहारियाँ याद आती हैं
सुबह जब पत्नी फ़रमान सुनाती है --

अज़ी चला जायेगा , पीने का पानी भर लीजिये

5 )

और अब एक सवाल : यदि कामवाली बाई एक दिन ना आए तो सबसे ज्यादा परेशानी घर में किस को होती है और क्यों ?




Wednesday, March 21, 2012

बार बार दिन ये आए , बार बार दिल ये गाए ---चुनाव .


हर वर्ष के आरंभ में हम डॉक्टर्स अपनी संस्था , दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों के चुनाव कराते हैं . मार्च अंत तक जहाँ एक तरफ वित्तीय वर्ष का अंत होता है , वहीँ हमारे भी चुनावों की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है . इस दौरान चुनावों की सरगर्मी में जो देखने को मिलता है , वही प्रस्तुत है एक हास्य कविता के रूप में :


वज़न हमारा पांच किलो बढ़ जाता है
ड़ी एम् ऐ का जब, चुनाव पास आता है .

कभी लंच, कभी डिनर, कभी दोनों
खाने पीने का रोज, जुगाड़ हो जाता है .

मिलते हैं सब गले जैसे बिछड़े बरसों के
साल भर का सारा, प्यार उमड़ आता है .

करते हैं बेसब्री से , इंतज़ार फ़रवरी का
एक महीना बिना खर्चे निकल जाता है .

उड़ाते हैं सब चिकन मटन व फिश टिक्का
बोतल कोई दारू की, आधी निगल जाता है .

मचता है शोर तब मयखाने में
जब दीवाना कोई होश खो जाता है .

नेता लोग देते हैं भाषण जोशीले
अपना काम तो कविता से चल जाता है .

लड़ें वो जिनके पास है ज्यादा पैसा
बंदा तो बस मुफ्त में मौज उडाता है .

टल जाएँ चुनाव ग़र सर्वसम्मति से
चीटिंग सी लगती है , लॉस हो जाता है .

रहता है यही एक अफ़सोस 'तारीफ'
चुनाव साल में बस एक बार आता है .

नोट : यह ग़ज़ल पढ़कर हो सकता है , शायद हमें कभी चुनाव का टिकेट न मिले .


Saturday, March 3, 2012

मोबाईल होता तो मिस काल मार कर पता चल जाता लेकिन--


एक कामकाजी व्यक्ति के लिए सुबह का समय बड़ा हेक्टिक रहता है । और यदि पति पत्नी दोनों को ऑफिस जाना हो , फिर तो निश्चित ही भागम भाग होती है ।
घर से निकलने से पहले एक तो यह सुनिश्चित करना पड़ता है, आपने अपनी सारी एक्स्सेसरिज रख ली या नहीं जैसे:
बटुआ ,कंघी , गाड़ी की चाबी, घडी , मोबाईल -

और यदि आप महिला हैं तो एक्स्सेसरिज की लिस्ट और भी लम्बी हो जाती है ।

लेकिन हमारे लिए तो एक और अत्यंत आवश्यक वस्तु है जिसे हम भूलना अफोर्ड नहीं कर सकते ।
और वह है --हमारा चश्मा । वैसे तो अब हम घर में चश्मा खाली टी वी देखने के लिए ही लगाते हैं ।


उस दिन पत्नी हम से पहले निकल गई थी हम ज़रा पीछे रह गए थे । हमने जल्दी जल्दी सारी तैयारियां की और चलने लगे तो अचानक ध्यान आया कि कुछ मिसिंग है।
सिक्युरिटी गार्ड की तरह सब जगह हाथ मारकर देखा सब कुछ रख लिया था।
तभी अचानक हाथ चेहरे पर गया तो पाया कि चश्मा तो पहना ही नहीं था।
सोचा अच्छा हुआ अभी पता चल गया वर्ना गड़बड़ हो जाती ।
अब शुरू हुई चश्मा ढूँढने की कवायद -- जितनी भी जगहें थी रखने की या काम करने की, सभी जगह देखा मगर कहीं नहीं मिला।
जब कहीं नहीं मिला तो घबराहट होने लगी क्योंकि उसके बगैर और सब कुछ कर सकते थे लेकिन ड्राईव करना तो शराब पीकर ड्राईव करने जैसा हो जाता।
सोचा यदि नहीं मिला तो छुट्टी करनी पड़ेगी
इतिहास में शायद पहली बार होगा जब सी एल लेने की वज़ह चश्मा मिलना होगी

घबराहट में दोबारा मूंह पर हाथ फिराकर देखा लेकिन नतीजा तो ज़ीरो ही रहा।
सारा घर ढूंढ मारा लेकिन ज़नाब चश्मे जी जाने कहाँ गायब हो गए ।
मोबाईल होता तो मिस काल मार कर पता चल जाता लेकिन चश्में का क्या करते।

अब तो यह मिस्ट्री सी हो गई कि गया तो कहाँ गया --कहीं कामवाली ने झाड़ू मारकर कूड़े में तो नहीं डाल दिया।
अब बस एक ही जगह रह गई थी और उसे चेक करने के लिए जैसे ही हम रसोई में गए तो ये लो --
महाशय वहां विराजमान थे , माइक्रोवेव के ऊपर।
इसे वहां देखकर हमें अपनी लिखी हुई ये पूर्व प्रकाशित रचना याद आ गई :

एक दिन घर पे फोन आया
बेटे ने उठाया
मैंने पूछा, बेटा कौन था
बोला उसी आंटी का फोन था
जो फोन पर भी मचाती है शोर
और घंटों करती है बोर।


मैंने पूछा, क्या फरमा रही थी
बोला, मम्मी को बुला रही थी
मैंने बोल दिया,
काम के बोझ की मारी
मम्मी प्यारी, सोफे पर पस्त हैं ।
और दो घंटे से, एक के बाद एक
सास बहु के सीरिअल देखने में व्यस्त हैं ।

मैंने कहा, सही कहा भय्ये
हमेशा सच बोलना चाहिए।

फ़िर वो कहने लगी
अच्छा पापा को ही बुला दो
वो क्या कहीं कविता सुना रहे हैं
बेटा बोला आंटी, वो भी व्यस्त हैं
किचन में रोटियां बना रहे हैं।

मैंने कहा, बेटा ज़रा दिमाग से
काम लिया होता
अच्छा होता, यदि कोई और
बहाना लगा दिया होता।

बेटा बोला,
बोलने से पहले तोलना चाहिए
अभी अभी तो आपने कहा ,
हमेशा सच बोलना चाहिए !!!!


नोट :
नज़र के चश्मे दो तरह के होते हैं :

एक जो मायोपिया में इस्तेमाल होते हैं यानि जब दूर की नज़र कमज़ोर हो । यह अक्सर बचपन या युवावस्था में होता है और सारे दिन लगाना पड़ता है।

दूसरा वो जो प्रेस्बयोपिया यानि पास की नज़र ठीक करने के लिए पहनना पड़ता है । यह अनिवार्य रूप से बढती उम्र के साथ होता है , अक्सर ४५ की आयु के बाद । इसे सिर्फ पढने या पास की चीज़ें देखने के लिए प्रयोग किया जाता है, इसकी ज़रुरत युवावस्था में नहीं पड़ती।

लेकिन यदि आपको मायोपिया है तो भी ४५ वर्ष की आयु के बाद आपको भी पास की नज़र के लिए चश्मा लगाना पड़ेगा ।

ऐसी अवस्था में आपके विकल्प हैं :

* बाइफोकल या प्रोग्रेसिव लेंस
* दो अलग चश्में --एक पास के लिए , दूसरा दूर के लिए

लेकिन एक और आसान विकल्प है --आप दूर के लिए चश्मा इस्तेमाल करें और पास का पढने या देखने का काम चश्मा हटाकर करें ।

अब हम तो यही करते हैं, इसलिए अब घर में चश्मा सिर्फ टी वी देखने के लिए ही इस्तेमाल करना पड़ताहै।