मेहरबानियों पर ताउम्र जीते रहे,
मुफ्त मिलती रही हम पीते रहे।
मुफलिसी का दौर इस तरहां गुजरा,
पैरहन फटते रहे हम सीते रहे।
उम्र गुजार दी यूं फ़ाक़ामस्ती में,
लोग उधार देते रहे हम लेते रहे।
काम कभी कोई अपना रुका नहीं,
हाथ मगर दोनों देखो सदा रीते रहे।
इश्क का रिस्क उठाते भी तो कैसे,
जिंदगी में क्या कम फजीहते रहे।
इस कान से सुना दूसरे से निकाला,
बाखबर फिर भी देते नसीहतें रहे।
इक दिन तो ख़ाक में मिलना है लाजिमी,
चलो दोस्त अभी तो हंसते मुस्कराते रहें।


No comments:
Post a Comment