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Saturday, March 23, 2024

चचा छक्कन के केले...

 चाचा छक्कन जब सुबह से 

आराम करते करते थक गए

तो यकायक उन्हें गोल गप्पे याद आ गए।

यह सोचकर ही चचा एक बार तो शरमा गए।

आखिर औरों को हाइजीन का पाठ पढाते थे आप,

फिर खुद कैसे करते ये पाप। 


तभी याद आया कि वो मिठाई वाला

तो ग्लव्ज पहनकर खिलाता है। 

और स्वाद भी नंबर वन पर आता है। 

सोचा चलो चलते हैं लेके राम का नाम,

इसी बहाने वॉक करके हो जाएगा व्यायाम। 

लेकिन वहां गोल गप्पे का काउंटर खाली पड़ा था,

उसकी जगह एक बड़ा सा टेंट गड़ा था। 

चारों ओर बिखरी थीं गुज्जियां ही गुज्जियाँ,

हाइजीन की तो फिर उड़ रही थीं धज्जियां। 

होली तो अभी तीन दिन थी दूर,

फिर जाने लोगों में किस बात का था सुरूर। 


चाचा ने सोचा, खोमचा वाला भी तो खिलाता है,

और चटकारे लेकर खाने में सचमुच बड़ा मज़ा आता है।

खोमचे वाले तो दिखाई दिए अनेक,

पर हर एक पर भीड़ बड़ी थी,

वो मिठाई वाले की कस्टमर नारियां,

अब सब खोमचे वाले के पास खड़ी थीं। 

अब तो गोल गप्पे का पानी देखकर

मुंह में पानी आने लगा था।

लेकिन इसका भी डर सताने लगा था,

कि खुले में गोल गप्पे कैसे खाएंगे।

कोई जान पहचान वाला दिख गया

तो क्या मुंह दिखाएंगे। 


बस फिर मन में एक कसक लिए

मुंह में आए पानी को सटक, 

चचा वहां से खिसक लिए।

अभी जा ही रहे थे सर झुकाए,

मन ही मन शरमाए,

तभी रेहड़ी पर रखे केले दिखे,

तो चाचा ने फौरन एक दर्जन खरीद लिए,

और घर की राह पर निकल लिए। 


अब चचा छक्कन हर आधे घंटे में 

एक केला खाए जा रहे हैं,

और मन में हिसाब लगाए जा रहे हैं,

कि पत्नी के आने तक कितने बचेंगे,

या बचेंगे भी नहीं, यदि पत्नी देर से आई।

वैसे भी उन्हें केले पसंद हैं ही नहीं,

उनको खिला देंगे वही मिठाई वाले की मिठाई। 

और इस तरह गोल गप्पे के चक्कर में

चचा एक दर्जन केले गप गए,

पहले आराम कर के थके थे, 

अब केले खाकर पस्त हो गए। 

और आराम से लंबी तान मस्त सो गए। 


Monday, March 16, 2020

इस साल गले मिलने को गले ही नहीं मिले --


हर साल होली पर मिलते थे हर एक से गले,
इस साल गले मिलने वाले वो गले ही नहीं मिले।  

कोरोना का ऐसा डर समाया दिलों में,
कि दिलों में ही दबे रह गए सब शिकवे गिले।

पडोसी पार्क में बुलाते रहे पकौड़े खाने को,
डरे सहमे लोग अपने अपने घरों से ही नहीं हिले।

ना निकली बस्ती में मस्तों की टोली,
ना पिचकारी ना रंग गुलाल ही लगे भले। 

ना रंग बरसे ना भीगी किसी की चुनड़िया,
लेकर गुलाल बुजुर्ग भी बैठे रह गए पेड़ों तले।

गुमसुम से रहे कवि जेब रह गई खाली,
होली के कवि सम्मलेन भी जब कल पर टले।

होलिका तो जल गई होली दहन में ,
ये मुए कोरोना वायरस फिर भी नहीं जले।

जले मगर मकान और दुकानें तो बहुत ''दोस्तों'',
अब दुआ करो कि कोरोना नहीं सद्भावना फूले फले।

Wednesday, March 11, 2020

बुरा ना मानो होली है , टी वी प्रोग्राम्स --


हमें अभी अहसास हुआ कि हम पिछली चार बार से हर वर्ष टी वी पर होली मनाते आये हैं। प्रस्तुत हैं कुछ झलकियां : 




२०१७ की होली , यू पी के एक चैनल पर।






२०१८ की होली, दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर। 





२०१९ की होली, आज तक के तेज चैनल पर.




२०२० की होली, CCN DEN चैनल पर।   




साल में एक बार ही सही, टी वी पर प्रोग्राम देना अच्छा लगता है। 


Wednesday, March 20, 2019

हैप्पी होली --






होली पर्व है
मस्ती में आने का।

खाने खिलाने का ,
पीने पिलाने का।

हंसने हंसाने का ,
और सबको प्यार से गले लगाने का।

हैप्पी होली !!!!!

Sunday, March 4, 2018

बुरा ना मानो होली है --




तन को तो रंग डाला,
मन पर भी रंगत लाओ, तो होली है।

जो दिलों से न उतर पाये ,
रंग वो प्यार के चढ़ाओ, तो होली है।

गले तो रोज पड़ते हो यार ,
कभी प्यार से गले लगाओ, तो होली है। 

रोज नाचते हो जिसके इशारों पर ,
होली में संग उसे भी नचाओ, तो होली है।

भगौड़े बन कर बैठे हैं जो विदेश में ,
उन धन्ना सेठों को वापस लाओ, तो होली है।

'कुमारों' को तो रोज सुनते हो ,
कभी 'दरालों' को भी बुलाओ, तो होली है।


Thursday, March 28, 2013

पता चला वो पड़ोसी नहीं , पड़ोसन थी---


होली त्यौहार है मौज मस्ती का , खाने खिलाने का , पीने पिलाने का , हंसने हंसाने का और सबको प्यार से गले लगाने का। इस अवसर पर हमारे यहाँ तो होली के दिन सब लोग जो होली खेलते हैं , नीचे सेन्ट्रल पार्क में इकट्ठे हो जाते हैं और सामूहिक रूप से होली खेलते हैं। बच्चे , बड़े , बूढ़े और महिलाएं अपनी अपनी टोलियों में होली का आनंद लेते हैं।

इस बार हमारी सोसायटी ने डी जे का भी प्रबंध किया था। छोटे बच्चों के लिए बाथ टब और बड़े बच्चों के लिए सीधा पानी का पाइप और सब के लिए ठंडाई। बुजुर्गों के लिए बेंच जो ११ बजे तक खाली पड़े थे।    



सोसायटी में होली का शुभारभ : चित्र बालकनी से सेटेलाईट द्वारा ! :)

इस वर्ष निकट सम्बन्धियों और मित्रों में कई लोगों का आकस्मिक देहांत होने से होली खेलने का मूड नहीं बन रहा था। दोनों बच्चे भी बाहर होने से घर भी सूना सूना सा लग रहा था। हालाँकि हमने तो एक दिन पहले दिन में  अस्पताल में और शाम को एक मित्र की सोसायटी में हुए कवि सम्मेलन में हास्य कवितायेँ सुनाकर होली का  आनंद ले लिया था। लेकिन श्रीमती जी को थोड़ी मायूसी सी हो गई जब हमने कहा कि छोड़ो क्या करेंगे होली मनाकर।  आखिर तय हुआ कि चलो पहले एक दूसरे को तो गुलाल लगा लें , फिर सोचा जायेगा।  



                                 
                                                                      होली से पहले


इस फोटो में आपको कुछ विशेष नज़र आ रहा है ? शायद सिर्फ प्यार करने वाले ही समझ पायें !

खैर रंग लगाकर मन कुछ प्रसन्न हुआ तो सोचा कि चलिए चलते हैं और होली खेलते हैं सब के साथ। आखिर लाइफ़ हैज टू गो ओन।  फिर :

होली खेलने को हम घर से निकले
और जब एक पडोसी नज़र आये।
हमने उनके गालों पर गुलाल लगाया
और प्यार से गले मिलने को हाथ बढाए।
पर तभी हम चौंके , हाथ अपने रोके।
क्योंकि आन पड़ी एक अड़चन थी ,
पता चला वो पड़ोसी नहीं , पड़ोसन थी।

होली पर यही समस्या हर जगह आती है। रंग में रंगे चेहरे पहचानना ही मुश्किल हो जाता है। समूह में तो और भी विकट समस्या होती है। एक बार रंग लगाने के बाद याद भी नहीं रहता कि पहले लगाया था या नहीं। हमने तो इसका एक तरीका सोचा और हरा गुलाल लेकर गए जो और किसी के पास नहीं था। इसलिए जिसके भी चेहरे पर हरा रंग नहीं था , उसके चेहरे पर रंग लगाते गए। थोड़ी देर बाद सभी के चेहरे हरे भरे नज़र आ रहे थे।          

                                                                                               
अंत में नहाने धोने , और रंग उतारने के बाद सामूहिक भोज का आयोजन  था। जो लोग होली खेलने नहीं आए थे , अब वे भी सपरिवार सहभोज का आनंद ले रहे थे। शुद्ध सात्विक भोजन कर अब घर जाकर आराम करने का समय था। अब तक फेसबुक पर भी फेसबुकियों की भीड़ लग चुकी थी। हमने भी एक फोटो फेसबुक पर टांगा और व्यस्त हो गए लाइक पर लाइक करने में।

लेकिन इस सब के बीच हम सुबह से ही देख रहे थे हलवाई के लोगों को खाना बनाने की तैयारी करते हुए। जब सोसायटी के सब लोग होली मनाने में व्यस्त थे, तब सुबह से ही ये लोग अपने काम में व्यस्त थे। जहाँ होली के दिन सब दुकानें बंद रहती हैं , वहीँ इन बेचारों की न कोई छुट्टी थी , न होली मिलन। रह रह कर यही गाना याद आ रहा था :

सब की किस्मत , अपनी अपनी
कोई हँसे , कोए रोये ----

शायद यही इस नश्वर संसार की रीति है। यहाँ सब अपनी अपनी किस्मत लेकर आते हैं। लेकिन आपकी किस्मत आपके अपने कर्म बनाते हैं। बस यही याद रखना ज़रूरी है।      


Tuesday, March 26, 2013

चश्मे पे जब हो जाये , रंगों की बौछार---


1)

होली के हुडदंग में,  भांति भांति के रंग
रंगों की बौछार में , मस्ती लाये भंग ।
मस्ती लाये भंग की , इक छोटी सी गोली,
कि शर्मा जी की घरवाली , वर्मा जी संग होली।
हंस कर बोले वर्मा जी , बुरा ना मानो शर्मा जी,
होली है भई होली , ये तो होली है भई होली।  


2)

चश्मे पे जब हो जाये , रंगों की बौछार
सतरंगी नज़र आये , ये सारा संसार।
ये सारा संसार , फिर लगे सुनेहरा
गोरा दिखे काला , काला हरा भरा।
कह डॉक्टर कविराय, ना बुरा मनाना ,
होली पर सबको हंसकर गले लगाना।


3)

जेम्स, जावेद, श्याम और संता, रंगों में नहाएं
जात धर्म को छोड़कर , सब पर मस्ती छाये।
सब पर मस्ती छाये मिलकर आपस में गले ,
बरसों के बिछड़े भी जब सब होली पे मिलें।
आओ भैया भूल जाएँ सब गुजरे शिकवे गिले
होली के बहाने फिर आज, दिल से दिल मिलें।

सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें।


Tuesday, March 13, 2012

होली के आफ्टर इफेक्ट्स ---


इत्तेफाक
ही रहा कि होली के मौसम में कवियों की तरह हम भी बहुत व्यस्त रहे कई मित्रों से होली पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी न हो सका । आशा करता हूँ कि नाराज़ नहीं होंगे । ये रहे हमारी व्यस्ताओं के साक्षात नमूने :

) मार्च :

अस्पताल में बाल रोग विभाग द्वारा स्नातकोत्तर चिकित्सा छात्रों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । ३ मार्च को इसका उद्घाटन हुआ । उद्घाटन समारोह में अस्पताल के सभी उच्च प्रशासनिक अधिकारीगण उपस्थित थे ।

दीप प्रज्वलन करते हुए सभी अधिकारीगण

कार्यक्रम का संचालन करते हुए हमने भी एक सन्देश छात्रों तक पहुंचा ही दिया । हमने कहा कि इस ट्रेनिंग के बाद आप परीक्षा पास करने में तो अवश्य सक्षम हो जायेंगे । लेकिन एक अच्छा डॉक्टर बनने से पहले एक अच्छा इन्सान बनना चाहिए । तभी आप एक अच्छे डॉक्टर बन पाएंगे । हमारे एक प्रोफ़ेसर कहा करते थे कि एक डॉक्टर में तीन गुण होने चाहिए --) availability ) affability ) ability .

) मार्च :

रविवार को दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन द्वारा एक हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया । इस का संचालन भी हमें ही करना था । लेकिन एन वक्त पर कुछ असमंजस्य की स्थिति उत्पन्न हो गई ।

हास्य कवि सम्मेलन से पहले डी एम ऐ के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट ( बाएं ), प्रेजिडेंट ( दायें ) और एक कवयित्री साहिबा के साथ गंभीर वार्तालाप करते हुए ।

खैर , हमने सभी मेहमान कवियों का स्वागत करते हुए और सभी औपचारिकतायें निभाते हुए कार्यक्रम का शुभारम्भ किया ।

फिर श्रोताओं के साथ बैठकर कवियों को सुना ।
इस बीच कवयित्री साहिबा ने हमें भी आमंत्रित किया कविता सुनाने के लिए । बेशक रंग तो खूब जमा ।


अंत में सब कवियों को शॉल भेंटकर सम्मानित किया गया । कवियों में प्रमुख थे --जानी मानी कवयित्री डॉ सरोजिनी प्रीतम और वयोवृद्ध ग़ज़लकार एवम व्यंगकार डॉ शेर जंग गर्ग
और इस तरह सभी विवादों से बचते हुए हमने इस हास्य कवि सम्मेलन को सफल बनाया ।

) मार्च :

आर्य समाज मंदिर में एक कवि सम्मेलन का आयोजन था । एक परिचित बुजुर्ग कवि को मंच संचालन करना था । हमें भी आमंत्रित कर लिया गया । बाद में पता चला जितने कवि बाहर से बुलाए गए थे उनसे ज्यादा आर्य समाज के सदस्य लोगों में से कविता सुनाने को आतुर थे । उस पर ग़ज़ब यह कि संचालक महोदय को लगा कि पता नहीं बाद में अवसर मिले या न मिले , इसलिए पहले स्वयं ही सुना डाला जाए । खैर किसी तरह कार्यक्रम निपट गया । शायद यह उनका पहला अवसर था । इसलिए कोई फोटो भी उपलब्ध नहीं हो सका । दरअसल, फोटोग्राफर था ही नहीं ।


) मार्च :

अस्पताल में कार्य समाप्त करने के बाद घर के लिए प्रस्थान करने से पहले हमने एक छोटा सा होली मिलन रखा जिसमे सभी उच्च अधिकारियों समेत प्रशासनिक स्टाफ भी शामिल हुआ ।

गुलाल से चेहरे रंगने के बाद एक अलग ही नज़ारा नज़र आ रहा था ।
लोगों की फरमाइश थी कि कविता सुनाई जाए लेकिन एम एस साहब ने ही इतना लम्बा भाषण दे दिया कि फिर कुछ और सुनने की शक्ति ही नहीं बची ।

) मार्च :

होली वाले दिन पूर्वी दिल्ली के डॉक्टर्स संस्था के भवन में एकत्रित होकर होली खेलते हैं । खाना , पीना , हँसना , हँसाना --सब चलता है । इस बार बाहर से हास्य कलाकार बुलाए गए थे । जमकर हँसना हँसाना हुआ ।


नादान पत्नी :

एक व्यक्ति होली खेल कर घर आया
आते ही घर का दरवाज़ा खटखटाया ।

अन्दर से पत्नी की आवाज़ आई
मैंने पहचाना नहीं , तुम कौन हो भाई ?

पति गुर्राया , अरे बंद करो ये टें टें
भई दरवाज़ा खोलो , ये तो मैं हूँ मैं ।

पत्नी बोली , हाय राम यदि आप खड़े हैं यहाँ
तो वो कौन है जो बैठा चाय पी रहा है वहां ।

पति बोला ,
अब ये डुप्लीकेट पति कहाँ से आ गया ।
पत्नी बोली ,
पता नहीं , पर बैठा बैठा दस गुज्जियाँ खा गया ।

अच्छा हुआ मैं सही वक्त पर चला आया
वर्ना ज़ालिम जाने क्या जुल्म कर जाता ।

पत्नी बोली हाँ जी ,
यदि आप थोड़ी देर और ना आते --
तो वो सारे गुलाबजामुन भी खा जाता ।

और इस तरह ख़त्म हुआ यह होली का सीजनअब फिर वही अस्पताल , वही मरीज़ , वही मर्ज़ जो गर्मियां शुरू होने के साथ ही बढ़ने लगते हैंप्राइवेट डॉक्टर्स के लिए भले ही यह कमाई का सीजन होता हो , हमारे लिए तो अत्यधिक काम का समय होता है

नोट : हमारे देश में होली के बाद सावन के आने तक कोई त्यौहार नहीं होतातीज़ से पर्वों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता हैशायद इसका सम्बन्ध तपती गर्मी से रहा होगा


Friday, March 9, 2012

अंजानी (ब्लॉग) राहों पर चलना संभल के ---


होली के अवसर पर हर वर्ष डॉक्टर्स की विभिन्न संस्थाएं अपने अपने क्षेत्र में होली मनाती हैं । रात को होने वाले कार्यक्रम में कॉकटेल डिनर होता है । बात उस समय की है जब हमारी नई नई नौकरी लगी थी । हमने अपने साथ काम करने वाले एक बुजुर्ग डॉक्टर को भी आमंत्रित कर लिया । उनके लिए यह एक नया अनुभव था । जब ड्रिंक्स शुरू होने का समय आया तो मुफ्त की शराब देखकर वह बावला हो गया और गटागट कई पैग पी गया । उसके बाद वह एक ऐसे समूह के साथ वार्तालाप में लीन हो गया जिसमे वह किसी को नहीं जानता था । उनसे बस यही गलती हो गई । उन लोगों ने जब देखा कि यह बंदा उल्लू बन रहा है तो उन्होंने उसे पैग पर पैग देने शुरू कर दिए । थोड़ी ही देर में हमारे डॉक्टर साहब नशे में धुत्त होकर टॉयलेट में पड़े थे । अंतत: हमें ही उन्हें ऑटो में डालकर घर छोड़कर आना पड़ा ।

उस दिन हमने भी एक सबक लिया कि कभी भी अंजान लोगों के साथ मिलकर दारू नहीं पीनी चाहिए

बचपन से लेकर अब तक और भी कई बातें सीखीं हैं जैसे :

* किसी अंजान व्यक्ति से लेकर कुछ खाना नहीं चाहिए विशेषकर सफ़र में
* किसी अंजान व्यक्ति पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए
* चापलूसों से सावधान रहना चाहिए विशेषकर जो ज़रुरत से ज्यादा मीठी मीठी बातें कर रहे हों
* गाड़ी में किसी को लिफ्ट नहीं देनी चाहिए विशेषकर अकेली महिला को

जब से मंच पर आने लगे हैं तब से पब्लिक स्पीकिंग के बारे में कई बातें सीखीं हैं । इसमें सबसे विशेष है कि कभी भी किसी व्यक्ति का मज़ाक इस तरह नहीं उड़ाना चाहिए कि उसे बुरा लगे ।

आखिर मज़ाक और उपहास में अंतर होता है
विशुद्ध हास्य में सौम्यता होती है कि छिछोरापन

होली एक त्यौहार है मौज मस्ती का , रंगों उमंगों का , खाने खिलाने का , पीने पिलाने का , हंसने हंसाने का , मिलने मिलाने का और सबको प्यार से गले लगाने का

होली मनाने के तरीके भी अलग अलग होते हैं । कहीं रंग गुलाल से मनाई जाती है , कहीं पानी से । कहीं लठमार होली होती है तो कहीं कोलड़ा मार । कहीं कहीं गोबर और कीचड़ में सनकर भी होली खेली जाती है हालाँकि ऐसी होली हमने कभी नहीं खेली

लेकिन इस होली पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ जब हमने एक अंजान ब्लोगर के आमंत्रित करने पर उनके ब्लॉग पर हास्य की चंद पंक्तियाँ भेज दीं । अब भले ही वो एक जाने माने ग़ज़लकार , हास्य कलाकार या व्यंगकार हों , लेकिन हमारे लिये वो और उनके लिए हम अंजान ही तो थे ।

फिर हमारे साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ जो हम सोच भी नहीं सकते थे कि कोई ऐसा करने की सोच भी सकता है

अफ़सोस तो तब हुआ जब कुछ अपने मित्र भी वहां चुस्कियां लेते नज़र आए

आखिर एक बार फिर यही समझ आया कि ब्लोग्स पर भी किसी अंजान व्यक्ति पर भरोसा नहीं किया जा सकता
वैसे भी इस आभासी दुनिया में अक्सर लोगों की फितरत छुपी ही रहती है

नोट : हम जानते हैं कि अक्सर गलती करने वाले को गलती करने का अहसास नहीं होता ही अक्सर उसकी ऐसी मंशा होती हैलेकिन गलती से की गई गलती भी गलती ही कहलाएगी

Tuesday, March 6, 2012

होलिका तो होलिका , कहीं रावण भी जल न पाए --



कुछ
वर्ष पहले दिल्ली में होली के अवसर पर मौसम में हुए बदलाव पर एक कविता लिखी थी जो शायद आज भी उतनी ही तर्कसंगत लगती है


जनता को चिंता सता रही थी ,

क्योंकि होली करीब आ रही थी।
पर पानी की किल्लत थी भारी
कैसे खेलेगी होली जनता बेचारी ।

ऊपर वाले ने आसमान से देखा,
धरा पर उड़ती धूल, तालों में सूखा।
मासूम चेहरे गर्मी से झुलस रहे थे ,
नाजुक पौधे धूप में सूख रहे थे।

मैली होकर सूख रही थी गंगा,
जमना का तल भी हो रहा था नंगा।
नल के आगे झगड़ रही थी ,
शान्ति,पारो और अमीना।

नाजुक बदन कोमल हाथों में लिए बाल्टी ,
मिस नीना चढ़ रही थी जीना।


ये तो कलियुग का प्रकोप है , उपरवाले ने सोचा,
और करूणावश पसीजने से अपने मन को रोका।
पर कलियुग पर आपके कर्मों का पलडा था भारी ,
इसीलिए धरती पर उतरी इन्द्र की सवारी।

फ़िर छमछम बरसा पानी , धरती की प्यास बुझाई ,
पर होलिका दहन में बड़ी मुसीबत आई।
मिट्टी के तेल से, मुश्किल से जली होली,

हमने सोचा इस बरस होली तो बस होली।

पर देखिये चमत्कार, कुदरत ने फ़िर से बदला रूप,
और होली के दिन बिखर गई, नर्म सुहानी धूप।
फ़िर जेम्स, जावेद, श्याम और संता ने मिल कर खेली होली,
और शहर में धर्मनिरपेक्षता की जम कर तूती बोली।

युवा है कलियुग अभी, कहीं जवां हो न जाए,
और मानव के जीवन में इक दिन ऐसा आए,
कि होलिका तो होलिका, रावण भी जल न पाये।
सत्कर्मों को अपनाइए,
बस यही है एक उपाय

आप सब को एक सौहार्दपूर्ण होली की हार्दिक शुभकामनायें

Sunday, March 27, 2011

आज बस यूँ ही ---होली के आफ्टर इफेक्ट्स --

लगता है , ब्लॉग जगत में होली का खुमार अभी उतरा नहीं है । इसी कड़ी में छोटा सा योगदान अपना भी ।
आज बस यूँ ही , कुछ शे'र लिखने की कोशिश की है ।


इक शोर सा उठा है मयख़ाने में
फिर कोई दीवाना होश खो बैठा ।

या खुदा ये कैसा आलम है
या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।

करें क्या उनसे हम शिकवा
ख़ता कोई हमीं से हुई होगी ।

दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता


ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।


बस आज इतना ही , अगली पोस्ट में एक और प्रयोग ।

Sunday, March 20, 2011

होली का हो हल्ला --सीधा प्रसारण होली के मैदान से --

होली के शुभ अवसर पर आइये आपको ले चलते हैं, अपने मोहल्ले में जहाँ सब मिलकर होली खेल रहे हैं
और दिखाते हैं होली के मैदान से --आँखों देखा हाल


गुलाब , मोतिया , चन्दन , केसर
रंग टेसू पलाश के फूलों से लेकर ,

जब पहुँच गए सपत्नीक मोहल्ले में
फिर रंग जमाया भांग के हो हल्ले में ।

गुप्ता , शर्मा, वर्मा जी को रंगों में नहलाए
रसगुल्ले , गुलाबजामुन , गुज्जियाँ खूब उडाए ।

रंग बिरंगी भीड़ में फिर , पत्नी को टटोला
जो पत्नी सी लगी तो , हाथ पकड़कर बोला ।

अज़ी अब चलिए भी , बहुत हो गई होली
वो भी मारे ख़ुशी ख़ुशी , संग हमारे होली।

घर जाकर प्रेमपूर्वक , जब उनका रंग छुड़ाया
रंग उड़ा चेहरे का और , सर अपना चकराया ।

हम ये कैसा गड़बड़ घोटाला कर आए थे
पत्नी की बदले पड़ोसन को पकड़ लाए थे ।

अपनी तो मद-मस्त थी , मर्दों की टोली
पर समझ न आया ,कि वो क्यों संग होली ।

मांफी मांग हमने फिर , भाभी जी की चाय बनाई
तभी द्वार पर धर्मपत्नी की , कड़क आवाज़ दी सुनाई ।

हमने कहा भाग्यवान , एक अनहोनी हो गई है ।
वो बोली पता है जी , शर्मा जी की पत्नी खो गई है ।

पत्नी वियोग में शर्मा जी, बहुत घबराए हैं
१०० नंबर पर रिपोर्ट लिखाने , यहीं आए हैं ।

यह सुनकर अपने हाथ पैर, पत्थर से जकड़े गए
लगा रंग उतारकर भी हम तो , रंगे हाथ पकडे गए ।

अब बाहर पडोसी संग खड़ी, पत्नी भड़क रही है
अन्दर पड़ोसन मज़े से बैठी , चाय सुड़क रही है ।

अब आप ही ज़रा बताएं , हम जाएँ तो कहाँ जाएँ ?
कहाँ जाकर मूंह छुपायें , कैसे इज्ज़त बचाएं ? ? ?

होली के दोहे :


होली के हुडदंग में, भांति भांति के रंग
रंगों की बौछार में, मस्ती लाये भंग


रंग गुलाल और भंग से , ऐसी रंगत आए
ऊंच नीच को छोडके , सब पर मस्ती छाए


शर्मा संग वर्मा जी , सबको रंगे जाएं
गोरे काले रंग में , एक नज़र सभी आएं



चश्मे पर जब हो जाये , रन्गों की बौछार
सतरंगी नज़र आये , ये सारा सन्सार


भेद भाव को भूलके , मीठे बोलें बोल
अहंकार को त्याग के, रस बरसायें घोल



आप सब को होली की हार्दिक शुभकामनायें और बधाई