top hindi blogs
Showing posts with label डॉक्टर्स. Show all posts
Showing posts with label डॉक्टर्स. Show all posts

Monday, December 11, 2017

दोष डॉक्टर्स का नहीं , अस्पतालों का है ---


यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। कुछ ऐसी ही हालत हो गई है आजकल मेडिकल प्रॉफ़ेशन की।  नोबल प्रॉफ़ेशन कहलाये जाने वाले चिकित्सा जगत में डॉक्टर्स को कभी भगवान माना जाता था।  लेकिन अब नहीं , बल्कि अब तो डॉक्टर्स पर आए दिन हमले और दुर्व्यवहार होते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण है आम जनता के लिए समुचित चिकित्सा सम्बन्धी सेवाओं का उपलब्ध न होना। हमारे देश में मुख्य रूप से चिकित्सा सेवाएं दो तरह से प्रदान की जा रही हैं।  एक सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरीज।  दूसरे प्राइवेट अस्पताल , नर्सिंग होम्स और क्लिनिक्स।  लेकिन जब से निजी अस्पतालों पर कॉर्पोरेट का कब्ज़ा हुआ है तब से न सिर्फ छोटे नर्सिंग होम्स बंद हो गए हैं या बंद होने की कगार पर हैं , बल्कि इन फाइव स्टार अस्पतालों का एक छत्र राज होता जा रहा है।  अधिकांश प्राइवेट अस्पताल बड़े बिजनेस घरानों द्वारा चलाये जा रहे हैं।  उनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना होता है।  बेशक , बड़ी इन्वेस्टमेंट द्वारा ये अस्पताल सब तरह के आधुनिक उपकरण और सुविधाएँ मुहैया कराने में सफल रहते हैं , लेकिन यहाँ इलाज कराना इतना महंगा पड़ता है कि या तो यह आम आदमी की पहुँच से बाहर होता है या फिर वे अपना पेट काटकर इलाज कराते हैं।

लेकिन अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर के भी जब या तो रोगी की मृत्यु हो जाती है या ज़रुरत से ज्यादा और अपेक्षित रूप से ज्यादा बड़ा बिल सामने आता है तो रोगी के सम्बन्धी दुर्व्यवहार पर उतर आते हैं।  हालाँकि लोगों को इस तरह स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने का कोई अधिकार नहीं है , और मार पीट तथा तोड़ फोड़ तो निश्चित ही गैर कानूनी है।  लेकिन अक्सर भावनाओं में बहकर लोग यह धृष्टता कर बैठते हैं। रोगियों के रिश्तेदारों की इन प्रतिक्रियाओं को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता और न्यायालय द्वारा उन पर यथोचित कानूनी कार्यवाई करने का प्रावधान है। लेकिन इस के बावजूद कभी कभी तोड़ फोड़ की बड़ी घटनाएं घट जाती हैं जो निंदनीय हैं।

जहाँ जनता को भी यह समझना होगा कि वास्तव में डॉक्टर्स भगवान नहीं होते।  वे केवल उपचार करते हैं और सही उपचार से अधिकांश रोगी रोगमुक्त भी हो जाते हैं।  लेकिन डॉक्टर्स किसी को भी अमर नहीं कर सकते।  डॉक्टर क्या भगवान भी किसी को अमर नहीं बनाता।  यदि ऐसा होता तो दुनिया में किसी की मृत्यु ही नहीं होती। एक डॉक्टर केवल रोग का उपचार करता है , दर्द का निवारण करता है और गंभीर रोगों का भी दवा या शल्य चिकित्सा द्वारा उपचार कर रोगी को रोगमुक्त करता है।  लेकिन जितनी आयु विधाता ने निश्चित कर दी , उस से एक दिन ज्यादा भी कोई नहीं जिन्दा रख सकता।  यह बात जनता को समझानी पड़ेगी और उन्हें समझनी पड़ेगी।

तथापि चिकित्सा जगत को भी अपनी कार्यप्रणाली में कुछ सुधार लाना आवश्यक हैं। अति आधुनिक कॉर्पोरेट अस्पतालों को सिर्फ अपने आर्थिक लाभ के बारे में न सोचकर , अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व के बारे में भी सोचना होगा। यदि पैसा ही कमाना है तो और बहुत से व्यवसाय हैं।  कम से कम चिकित्सा को धंधा और अस्पतालों को पैसा कमाने की मशीन तो न बनाया जाये। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि कोई भी डॉक्टर जान बूझ कर कभी किसी रोगी के साथ लापरवाही नहीं बरतता।  बल्कि सरकारी हो या प्राइवेट , हर डॉक्टर के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक और सुखद अनुभव होता है जब उसका रोगी उसके उपचार से ठीक हो जाता है। रोगी का सही उपचार करना सभी डॉक्टर्स के लिए एक चुनौती होती है जिसे स्वीकार करना एक डॉक्टर का पेशा ही नहीं बल्कि धर्म होता है और हर डॉक्टर उसे बखूबी निभाने की कोशिश करता है।

यहाँ सरकार की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। भले ही आम आदमी के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है , लेकिन एक ओर रोगियों की बढ़ती संख्या और दूसरी ओर स्टाफ और सुविधाओं की कमी , सरकारी अस्पतालों में उपचार में बाधा उत्पन्न करते हैं। यदि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स और अन्य कर्मियों की संख्या समुचित हो तो किसी को भी उपचार से वंचित न होना पड़े।  दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज बहुत महंगा पड़ता है।  हालाँकि , अधिकांश बड़े प्राइवेट अस्पतालों को सरकार से भूमि कम दाम पर उपलब्ध कराई गई है , ताकि वे गरीबों का इलाज नियमनुसार निशुल्क कर सकें , लेकिन सरकार इस नियम को लागु करने में लगभग विफल रही है। इसलिए सभी अस्प्तालों में २५ % बाह्य विभाग और १०% बेड्स गरीबों के लिए उपलब्ध होने का प्रावधान होने के बावजूद , बहुत कम रोगी ही इसका लाभ प्राप्त करने में सफल रहते हैं। 

इस मामले में मीडिया का रोल भी बहुत महत्त्वपूर्ण रहता है।  अक्सर मीडिया एक छोटी सी घटना को बहुत बड़ी दुर्घटना का रूप देकर सनसनी फ़ैलाने का प्रयास करता है।  यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया को अपना उत्तरदायित्त्व समझते हुए जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि प्रचंड प्रतिस्पर्धा के ज़माने में समाचारों को बढ़ चढ़ कर दिखाना जैसे उनकी मज़बूरी सी बन गई है।   

कहते हैं शराब ख़राब नहीं होती , खराबी पीने वाले में होती है।  यदि कोई पीकर उधम मचाये या नाली में गिरा मिले तो यह पीने वाले की कमी है।  इसी तरह चिकित्सा जगत में अक्सर डॉक्टर्स का कोई कसूर नहीं होता। जहाँ सरकारी डॉक्टर्स को अत्यधिक रोगियों की संख्या का सामना करना पड़ता है , वहीँ प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टर्स को प्रबंधन की अनुचित मांगों को मानते हुए विवशतापूर्ण वातावरण में काम करना पड़ता है। इसीलिए अक्सर सरकारी अस्प्तालों में इलाज में कमी और प्राइवेट अस्पतालों में अनावश्यक टैस्ट्स और ओवर ट्रीटमेंट का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यदि कहीं कमी रहती है तो वो क्रमश: सरकार और कॉर्पोरेट में मालिकों के प्रबंधन और कार्य प्रणाली में होती है। इसलिए किसी भी दुर्घटना या इलाज में कौताही के आरोप पर डॉक्टर्स के विरुद्ध आँख बंद कर कार्यवाई करना अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। डॉक्टर्स समाज का सबसे ज्यादा शिक्षित और प्रशिक्षित हिस्सा है।  इन्हे यूँ बदनाम न किया जाये और जीवन भर के कठिन परिश्रम का ऐसा इनाम न दिया जाये कि उन्हें समाज में लज़्ज़ित होना पड़े।

यहाँ यह कहना सर्वथा अनुचित नहीं होगा कि डॉक्टर्स को भी हिप्पोक्रेटिक ओथ के अंतर्गत अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समाज और रोगियों की सेवा में तत्पर रहते हुए ईमानदारी और श्रद्धापूर्वक अपना काम करना चाहिए।  

Tuesday, May 9, 2017

अब डॉक्टर्स ताइकोंडो द्वारा मुकाबला करेंगे उपद्रवी तत्वों का ---


जब हम नए नए डॉक्टर बने थे , और हमारा शारीरिक व्यायाम का शौक पुनर्जीवित हुआ , तब हमने जे एन यू में देश में पहली बार आयोजित होने वाली ताइकोंडो ट्रेनिंग में भाग लेना शुरू कर दिया। करीब दो महीने तक बन्दर की तरह हा हू करते हुए बड़ा अच्छा लगने लगा था और हम खुद को ब्रूस ली का छोटा भाई समझने लगे थे। लेकिन इस बीच वहां छात्रों की हड़ताल हो गई और हमारा ट्रेनिंग प्रोग्राम बंद हो गया। हालाँकि इस बीच देश में पहली बार दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अखिल भारतीय ताइकोंडो चैम्पियनशिप का आयोजन हुआ जिसमे हमने बतौर डॉक्टर ड्यूटी की थी।

पता चला है कि आजकल डॉक्टरों पर रोजाना होने वाले हमलों से परेशांन होकर AIIMS ने अपने रेजिडेंट डॉक्टर्स को ताइकोंडो की ट्रेनिंग देना का विचार बना लिया है। अच्छा है , और कुछ नहीं तो इससे डॉक्टर्स का स्वास्थ्य भी सही रहेगा और उनमे आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। हालाँकि यह रोगियों के रिश्तेदारों के साथ होने वाले झगड़ों से कैसे बचायेगा , यह समझ में नहीं आ रहा। क्या अब डॉक्टर्स झगड़ा करने वाले रिश्तेदारों को मार्शल आर्ट्स द्वारा धूल चटाया करेंगे !

इस समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है। सुरक्षा की दृष्टि से यदि बाउंसर्स रखे जाएँ तो बेहतर होगा , क्योंकि उनकी उपस्थिति ही उपद्रवी लोगों को हतोत्साहित करेगी। मार पीट की नौबत ही नहीं आएगी। आखिर , कानून को कोई भी अपने हाथ में नहीं ले सकता। लेकिन इसके साथ साथ जनता को भी जागरूक करना होगा। यह समझाना होगा कि डॉक्टर्स भगवान नहीं होते। वे आपका बुखार उतार सकते हैं , आपका दर्द ठीक कर सकते हैं , किसी गंभीर बीमारी से दवाओं या ऑप्रेशन द्वारा निज़ात दिला सकते हैं , लेकिन विधाता ने जितने दिन आपके लिए लिखे हैं , उन्हें नहीं बढ़ा सकते। यदि ऐसा कर सकते तो दुनिया में किसी की मृत्यु ही नहीं होती। इसलिए रोगी की मृत्यु के लिए डॉक्टर्स को दोषी मानना सर्वथा अनुचित है।

दूसरी ऒर डॉक्टर्स को भी अपने व्यवहार में सावधानी बरतनी चाहिए। हमने जो अपने सीनियर्स से सीखा , वही हम अपने जूनियर्स को सदा बताते थे कि एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए तीन गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है :
१. Availability -- यानि आप अपने मरीज़ों के लिए हमेशा उपलब्ध रहें , विशेषकर जब उन्हें आपकी आवश्यकता सबसे ज्यादा हो जैसे एमरजेंसी में।
 २. Affability --- यानि मृदु व्यवहार। यदि आप रोगी से प्यार और सहानुभूति से बात करेंगे तो उसका आधा रोग तो तभी ठीक हो जायेगा।
 ३. Ability --- यानि योग्यता। बेशक एक डॉक्टर को अपने काम में निपुण और सुशिक्षित होना चाहिए । इस व्यवसाय में लापरवाही और अज्ञानता के लिए कोई जगह नहीं।
 यदि हमारे डॉक्टर्स इन तीन बातों का ध्यान रखें तो ये रोजाना होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं स्वात: ही बंद हो जाएँगी।

Thursday, July 19, 2012

चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए ---


यह पोस्ट कल प्रकाशित होनी थी . लेकिन अकस्मात काका -- राजेश खन्ना की मृत्यु का दुखद समाचार पढ़कर , उनके सम्मान में इसे स्थगित कर दिया था .

इस रविवार से हास्य का हमारा पसंदीदा कार्यक्रम आरंभ हुआ .हालाँकि इसे घर में बस हम ही देखते हैं . लेकिनपहले दिन मिमिकरी आर्टिस्ट ही नज़र आए. हालाँकि कल प्रसारित एपिसोड में हमारे ही एक युवा कवि मित्र दिल्ली के चिराग जैन ने हमारी ही स्टाइल में जोक्स सुनाकर खूब दिल बहलाया .

हास्य कवि वो कवि होते हैं जो पूर्ण रूप से न तो कविता करते हैं , न हास्य कलाकारों जैसी ड्रामेबाजी . बल्कि हास्य और कविता की मिली जुली प्रस्तुति करते हैं . अब पहले जैसे हास्य कवि तो नहीं रहे जैसे काका हाथरसी , हुल्लड़ मुरादाबादी , शैल चतुर्वेदी और ॐ प्रकाश आदित्य जी , जो महज़ अपनी हास्य कविताओं से खूब हंसाते थे , गुदगुदाते थे. आजकल के हास्य कवि चुटकलेबाज़ी का सहारा लेकर पहले हंसाते हैं , फिर कविता सुनाते हैं . उस पर कोई हँसे तो हंस ले वर्ना चुटकलों ने अपना काम तो कर ही दिया था .

वैसे कविता द्वारा हँसाना बड़ा मुश्किल और गंभीर काम है .

पिछली पोस्ट में आपने दूसरे कवियों की रचनाओं पर आधारित हास्य का मज़ा लिया . अब लीजिये , स्वरचित रचनाओं का आनंद . टिप्पणियों में कई मित्रों की शंका का समाधान करते हुए इतना बता देते हैं -- हमारे छात्र हमें बहुत पसंद करते हैं क्योंकि उनका इस तरह का मनोरंजन सिर्फ हम ही करते हैं . यहाँ यह भी जान लीजिये -- इस मामले में हम काका हाथरसी के अनुयायी हैं .

एक कविता जो होली पर लिखी थी , आप पढ़ भी चुके होंगे . लेकिन अब हमारी आवाज़ में :




और अंत में -- पब्लिक डिमांड पर दोबारा एंट्री हुई -- एक और कविता के साथ -- नव वर्ष की शुभकामनायें .



क्योंकि हम प्रोफेशनल कवि नहीं हैं , इसलिए मंच पर आने का अवसर तो कम ही मिलता है . लेकिन जब भी मिलता है , कोशिश यही रहती है -- लोगों को हंसाया जाए . क्योंकि हमारा मानना है -- जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव हटाते हैं, और जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव भगाते हैं .


आओ आज इक काम किया जाए
चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए !


Sunday, July 15, 2012

मिलकर ठुमके लगाओ , तो ग़ज़ल होती है -- कवियों की वाणी, हमारी जुबानी !


आज
रविवार १५ जुलाई से हास्य कार्यक्रम ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज ५ शुरू हो रहा है . यह लाइफ ओ के चैनल परलाफ इंडिया लाफ के नाम से रात १० बजे दिखाया जायेगा . इत्तेफ़ाक से जब हमें पता चला तो हम भी पहुच गए ऑडिशन देने . हमें विश्वास दिलाया गया , आपको एक हफ्ते में ज़रूर बुलाएँगे . हफ्ते तो कई बीत गए लेकिन बुलावे का फोन नहीं आया . एक बार पहले भी ऐसा हो चुका है जब डायरेक्टर के साथ दो बार इंटरव्यू के बाद भी अंतत : बुलावा नहीं आया . आखिर यह मान कर ही दिल समझाना पड़ा -- यह आवश्यक नहीं , सफलता हर बार अवश्य मिले .

टीचर्स कार्निवल के फोटो दिखा कर हमने वादा किया था , आपको अपनी क्लिप्स दिखाने का . क्लिप्स अब मिल चुकी हैं . भले ही सारे देश को हंसाने का अवसर नहीं मिला, अपने अस्पताल के छात्र और डॉक्टर्स ने खूब एन्जॉय किया . यहाँ आपको बता दें --यह कार्यक्रम बहुत मौज मस्ती भरा, चुलबुला , ताबड़ तोड़ और वाइब्रेंट होता है . इसलिए शायद आपको पहली नज़र में शॉक लग सकता है .
लीजिये , आप भी आनंद लीजिये . मौका और दस्तूर देख कर जो सही लगा , वही प्रस्तुत किया है .

1) इस क्लिप में प्रस्तुत हैं , कुछ चुनिन्दा बुजुर्ग कवियों की चंद पंक्तियाँ , अपने अंदाज़ में :








२) हमारा काव्य सफ़र शुरू हुआ था काका हाथरसी की कवितायेँ सुनकर. उन्ही को समर्पित करते हुए, ये चार छंद :



नोट : आज बस इतना ही . यदि झेलने में दिक्कत न हुई हो तो बताइयेगा , दो क्लिप्स अगली पोस्ट में लगा देंगे .


Thursday, July 5, 2012

जिंदगी वास्तव में जिन्दादिली का नाम है -- डॉक्टर्स भी क्या खूब जीया करते हैं !


इन्सान यदि काम ही काम करता रहे तो जीवन नीरस होने लगता है .यह बात डॉक्टर्स पर भी लागु होती है . इसीलिए अस्पताल के साथ जुड़े मेडिकल कॉलेज में हर वर्ष मार्च के महीने में एक फेस्टिवल मनाया जाता है . ३-४ दिन तक चलने वाले इस कल्चरल फेस्टिवल के अंतिम दिन एक विशेष कार्यक्रम रखा जाता है --टीचर्स कार्निवल . इस रंगारंग कार्यक्रम में कॉलेज और अस्पताल के शिक्षक और वरिष्ठ डॉक्टर्स मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं और दर्शक / श्रोता होते हैं छात्र . यह अपने आप में एक अद्भुत और निराला अनुभव होता है .


हम भी इस कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं . पहले बैठकर संगीत , नृत्य और नाटकों का मज़ा लेते हैं . यहाँ -- एम् एस और प्रिंसिपल के साथ .
.


हॉल छात्रों और स्टाफ से खचाखच भरा होता है .

कार्यक्रम की शुरुआत में एक सुन्दर नवयौवना का मनमोहक नृत्य देखकर सब आत्म विभोर हो गए .


इन युवा डॉक्टर्स ने सुन्दर सालसा कर समां बांध दिया .



रेजिडेंट डॉक्टर्स द्वारा सामूहिक नृत्य .


भीड़ इतनी ज्यादा हो जाती है की खड़े होने को भी जगह मुश्किल से ही मिलती है .


नृत्य अब जोरों पर है .


गायनी डिपार्टमेंट की नाटिका हमेशा सबको मदहोश करने वाली होती है .


घूंघट में डॉक्टर्स ! अपनी सांस्कृतिक परंपरा का निर्वाह करते हुए .


लेकिन जल्दी ही पर्दा हट जाता है .


बच्चों के डॉक्टर्स ने किया भांगड़ा !


एक बार जो मस्ती छाई तो पूरा डिपार्टमेंट डांस करने लगा .


बारी तो हमारी भी आई , हास्य कविता सुनाने की . यह गंभीर मुद्रा इस बात की सूचक है की हास्य उत्पन्न करना एक बेहद गंभीर मामला है . साथ ही , यह तूफ़ान आने से पहले की शांति दर्शा रही है .
अब हमने क्या सुनाया --यह तो राज़ ही रह जायेगा क्योंकि अभी तक मूवी क्लिप्स नहीं बन पाए हैं .


Tuesday, March 13, 2012

होली के आफ्टर इफेक्ट्स ---


इत्तेफाक
ही रहा कि होली के मौसम में कवियों की तरह हम भी बहुत व्यस्त रहे कई मित्रों से होली पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी न हो सका । आशा करता हूँ कि नाराज़ नहीं होंगे । ये रहे हमारी व्यस्ताओं के साक्षात नमूने :

) मार्च :

अस्पताल में बाल रोग विभाग द्वारा स्नातकोत्तर चिकित्सा छात्रों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । ३ मार्च को इसका उद्घाटन हुआ । उद्घाटन समारोह में अस्पताल के सभी उच्च प्रशासनिक अधिकारीगण उपस्थित थे ।

दीप प्रज्वलन करते हुए सभी अधिकारीगण

कार्यक्रम का संचालन करते हुए हमने भी एक सन्देश छात्रों तक पहुंचा ही दिया । हमने कहा कि इस ट्रेनिंग के बाद आप परीक्षा पास करने में तो अवश्य सक्षम हो जायेंगे । लेकिन एक अच्छा डॉक्टर बनने से पहले एक अच्छा इन्सान बनना चाहिए । तभी आप एक अच्छे डॉक्टर बन पाएंगे । हमारे एक प्रोफ़ेसर कहा करते थे कि एक डॉक्टर में तीन गुण होने चाहिए --) availability ) affability ) ability .

) मार्च :

रविवार को दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन द्वारा एक हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया । इस का संचालन भी हमें ही करना था । लेकिन एन वक्त पर कुछ असमंजस्य की स्थिति उत्पन्न हो गई ।

हास्य कवि सम्मेलन से पहले डी एम ऐ के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट ( बाएं ), प्रेजिडेंट ( दायें ) और एक कवयित्री साहिबा के साथ गंभीर वार्तालाप करते हुए ।

खैर , हमने सभी मेहमान कवियों का स्वागत करते हुए और सभी औपचारिकतायें निभाते हुए कार्यक्रम का शुभारम्भ किया ।

फिर श्रोताओं के साथ बैठकर कवियों को सुना ।
इस बीच कवयित्री साहिबा ने हमें भी आमंत्रित किया कविता सुनाने के लिए । बेशक रंग तो खूब जमा ।


अंत में सब कवियों को शॉल भेंटकर सम्मानित किया गया । कवियों में प्रमुख थे --जानी मानी कवयित्री डॉ सरोजिनी प्रीतम और वयोवृद्ध ग़ज़लकार एवम व्यंगकार डॉ शेर जंग गर्ग
और इस तरह सभी विवादों से बचते हुए हमने इस हास्य कवि सम्मेलन को सफल बनाया ।

) मार्च :

आर्य समाज मंदिर में एक कवि सम्मेलन का आयोजन था । एक परिचित बुजुर्ग कवि को मंच संचालन करना था । हमें भी आमंत्रित कर लिया गया । बाद में पता चला जितने कवि बाहर से बुलाए गए थे उनसे ज्यादा आर्य समाज के सदस्य लोगों में से कविता सुनाने को आतुर थे । उस पर ग़ज़ब यह कि संचालक महोदय को लगा कि पता नहीं बाद में अवसर मिले या न मिले , इसलिए पहले स्वयं ही सुना डाला जाए । खैर किसी तरह कार्यक्रम निपट गया । शायद यह उनका पहला अवसर था । इसलिए कोई फोटो भी उपलब्ध नहीं हो सका । दरअसल, फोटोग्राफर था ही नहीं ।


) मार्च :

अस्पताल में कार्य समाप्त करने के बाद घर के लिए प्रस्थान करने से पहले हमने एक छोटा सा होली मिलन रखा जिसमे सभी उच्च अधिकारियों समेत प्रशासनिक स्टाफ भी शामिल हुआ ।

गुलाल से चेहरे रंगने के बाद एक अलग ही नज़ारा नज़र आ रहा था ।
लोगों की फरमाइश थी कि कविता सुनाई जाए लेकिन एम एस साहब ने ही इतना लम्बा भाषण दे दिया कि फिर कुछ और सुनने की शक्ति ही नहीं बची ।

) मार्च :

होली वाले दिन पूर्वी दिल्ली के डॉक्टर्स संस्था के भवन में एकत्रित होकर होली खेलते हैं । खाना , पीना , हँसना , हँसाना --सब चलता है । इस बार बाहर से हास्य कलाकार बुलाए गए थे । जमकर हँसना हँसाना हुआ ।


नादान पत्नी :

एक व्यक्ति होली खेल कर घर आया
आते ही घर का दरवाज़ा खटखटाया ।

अन्दर से पत्नी की आवाज़ आई
मैंने पहचाना नहीं , तुम कौन हो भाई ?

पति गुर्राया , अरे बंद करो ये टें टें
भई दरवाज़ा खोलो , ये तो मैं हूँ मैं ।

पत्नी बोली , हाय राम यदि आप खड़े हैं यहाँ
तो वो कौन है जो बैठा चाय पी रहा है वहां ।

पति बोला ,
अब ये डुप्लीकेट पति कहाँ से आ गया ।
पत्नी बोली ,
पता नहीं , पर बैठा बैठा दस गुज्जियाँ खा गया ।

अच्छा हुआ मैं सही वक्त पर चला आया
वर्ना ज़ालिम जाने क्या जुल्म कर जाता ।

पत्नी बोली हाँ जी ,
यदि आप थोड़ी देर और ना आते --
तो वो सारे गुलाबजामुन भी खा जाता ।

और इस तरह ख़त्म हुआ यह होली का सीजनअब फिर वही अस्पताल , वही मरीज़ , वही मर्ज़ जो गर्मियां शुरू होने के साथ ही बढ़ने लगते हैंप्राइवेट डॉक्टर्स के लिए भले ही यह कमाई का सीजन होता हो , हमारे लिए तो अत्यधिक काम का समय होता है

नोट : हमारे देश में होली के बाद सावन के आने तक कोई त्यौहार नहीं होतातीज़ से पर्वों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता हैशायद इसका सम्बन्ध तपती गर्मी से रहा होगा


Monday, February 6, 2012

लोदी गार्डन में पिकनिक --दे हर उम्र में ज़वानी का अहसास---


सुखी
रहने के लिए स्वस्थ रहना ज़रूरी है । और स्वस्थ रहने के लिए ज़रूरी है खुश रहना । ख़ुशी मिलती है जब मौसम सुहाना हो और दोस्तों का साथ हो ।
रविवार को सुबह तो बादल छाए थे लेकिन दिन चढ़ने के साथ ही मौसम खुशगवार होने लगाऐसे में हमने भी कुछ पुराने दोस्तों के साथ पिकनिक का प्रोग्राम बना लिया --लोदी गार्डन में

बरसों गुजर गए थे यूँ मित्र मंडली में मिल बैठ कर पिकनिक मनाये और खाना खाए ।
जीवन के इस पड़ाव पर जब बच्चे बड़े हो जाते हैं , तब या तो वे पास नहीं होते या उनके शौक अलग होते हैं । ऐसे में दोस्तों का साथ ज्यादा काम आता है ।

लोदी गार्डन --लोदी एस्टेट में बना ये पार्क , एक तरफ़ जोरबाग, दूसरी तरफ़ खान मार्केट और लोदी एस्टेट की वी आई पी जेन्ट्री का चहेता पार्क है। यहाँ सुबह शाम डिप्लोमेट्स, नेतागण और ब्यूरोक्रेट्स आपको घुमते नज़र आयेंगे, अक्सर अपने कुत्तों के साथ। हालाँकि दिन में , ये प्रेमी युगलों का अस्थायी वास बना रहता है।

लोदी गार्डन के मुख्य आकर्षण हैं, सिकंदर लोदी (१४७४-१५२६) के समय के बने गुम्बद।

पूर्वी गेट से घुसते ही दायीं ओर नज़र आता है यह शीश गुम्बद
इसमें ५०० साल पुराने नीले रंग के शीशे की टाइल्स अभी तक देखी जा सकती हैं. इस गुम्बद में आठ कब्रें बनी हैं, किसकी, ये कोई नहीं जानता॥


शीश गुम्बद


बायीं ओर है यह बड़ा गुम्बद --आयताकार गुम्बद के चारों ओ़र चार द्वार नुमा झरोखे हैं, जिनसे पार्क का चारों दिशाओं का बेहद खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।

बड़ा गुम्बद

इन दोनों गुम्बदों के बीच हमने अपना डेरा जमाया । खुले आसमान के नीचे बैठकर खाने का आनंद ही कुछ और है । कुल दस लोग थे , एक को छोड़कर सभी डॉक्टर । ज़ाहिर है , खूब जमी महफ़िल भी ।



खाने के बाद मर्द लोग चल दिए पार्क की सैर पर

सूखे पेड़ के बीच से दिख रहा है , शीश गुम्बद



सिकंदर लोदी का मकबरा



पूर्ण विवरण यहाँ है



अहाते के अन्दर



मकबरे से बाहर निकलते ही नज़र आती है यह झील जिसमे दूर नज़र आ रहा है , आठपुला । यह पुल अकबर के ज़माने का है जिसे एक नाले के ऊपर बनाया गया था जो दक्षिण की ओर जाकर बारापुला नाले से मिलता था और अंत में यमुना में जाकर गिरता था ।


आठपुला से झील का दृश्य



यहीं पर लगा है यह लोदी गार्डन का नक्शा



थोडा वापस आकर बना है यह रोज गार्डन या वाटिका जहाँ रंग बिरंगे गुलाब के फूल खिले थे । हालाँकि आजकल विकास की आंधी ने गुलाबों की खुशबू छीन ली है ।



पूरा चक्कर लगाकर हम वापस पहुँच गए बड़ा गुम्बद --



और शीश गुम्बद के पास

अंत में, देखिये ये छोटा सा बंगला नुमा कॉटेज , जो प्रवेश द्वार के पास बना हुआ है, घने पेडों के बीच. सामने छोटा लेकिन बहुत हरा भरा बगीचा, चारों ओ़र हरियाली। खिड़कियों में रखे पोधों के गमले, बहुत मनोरम द्रश्य प्रस्तुत करते हुए. कुल मिलकर बहुत ही सुन्दर।



खूबसूरत टॉयलेट कॉम्प्लेक्स

और इस तरह बीता कल का दिन, एक नए कल की चुस्ती और स्फूर्ति प्रदान करते हुए

नोट : लोदी गार्डन की कुछ विशेष तस्वीरें यहाँ देखी जा सकती हैं .



Thursday, April 8, 2010

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर मिला , डॉक्टरों को सम्मान ---

सतयुग , त्रेता युग, द्वापर युग और अब कलयुग
कलयुग यानि काला युग। काला धंधा , काला धन , काला अंतर्मन ।
यही तो है कलयुग का प्रभाव।

इस प्रभाव से कोई भी क्षेत्र नहीं बचा है। यहाँ तक कि चिकित्सा जगत पर भी इसका प्रभाव पड़ा है ।

तभी तो मानवीय और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है ।

लेकिन फिर भी , अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं , जो अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए मानव हित में कार्यरत हैं

इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस पर दिल्ली सरकार ने ऐसे ही कर्मठ कर्मयोगी स्वास्थ्यकर्मियों को स्टेट अवार्ड(राजकीय पुरूस्कार ) से सम्मानित किया ।

मैं जब जूनियर डॉक्टर था तब हमारे सर्जरी के हैड , भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री चरण सिंह जी के दामाद , डॉ जे पी सिंह, जिनका मैं प्रिय छात्र रहा , कहा करते थे कि एक डॉक्टर में तीक्वालितिज ( गुणों ) का होना अति आवश्यक है। और वो हैं :

१) अवेलेबिलिटी यानि उपलब्धता । आपको अपने रोगियों के लिए समय पर उपलब्ध रहना चाहिए ।
२) अफेबिलिती यानि म्रदुभाशिता । मरीजों के प्रति आपका व्यवहार अच्छा होना चाहिए ।
३) एबिलिटी यानि क़ाबलियत

अब अहम् बात यह है कि सबसे आवश्यक है उपलब्धता , फिर आपका व्यवहार । इन दो गुणों से ही आप मरीज़ का भरोसा जीत लेते हैं । इसी से इलाज़ में आसानी रहती है

लेकिन मेरा मानना है कि ये तीन गुण सिर्फ डॉक्टरों में ही नहीं , बल्कि सभी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों में भी होने चाहिए ।

और इन्ही गुणों को मुद्दे नज़र रखते हुए दिल्ली सरकार ने दिल्ली के डॉक्टरों , नर्सों और अन्य पैरामेडिकल कर्मचारियों को सम्मानित किया । आइये हमारे अस्पताल के जिन लोगों को सम्मान मिला , उनसे आपका परिचय कराते हैं

डॉ श्रीधर द्विवेदी

डॉ द्विवेदी , मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष हैं । साथ ही प्रिवेंटिव कार्डियोलोजी क्लिनिक और आर टी क्लिनिक केभी इंचार्ज हैं। इसके अलावा धूम्रपान विरोधी , नशा उन्मूलन और अडोलेसेंत कार्डियोलोजी जैसे विषयों पर भी कामकर रहे हैं। डॉ द्विवेदी जी जन जागरूकता व्याखान ( पब्लिक अवेयरनेस लेक्चर ) का भी आयोजन हर माह करते हैं, जिनमे क्षेत्र के आम लोगों को सरल भाषा में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी प्रदान की जाती है।

डॉ द्विवेदी एक अच्छे कवि भी हैं। आपकी लिखी कविता आपने भी पढ़ी होगी , इस ब्लॉग पर।

एक सात्विक जीवन के धनी , डॉ द्विवेदी अत्यंत म्रदुभाशी और खुशदिल इंसान हैं। मरीजों के प्रति उनका समर्पण अत्यंत सराहनीय है। एक बार उनसे मिलकर देखें , आप भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे

डॉ एस वी मधु :

डी ऍम एन्दोक्राइनोलोजि यानि सुपर स्पेशलिस्ट । आप अस्पताल के डायबिटीज के अकेले सुपर स्पेशलिस्ट हैं।और अब अस्पताल में एक अत्याधुनिक डायबिटीज सेंटर खोलने के लिए सफल प्रयास में जुटे हैं।

डॉ मधु यहाँ सबसे चहेते डॉक्टरों में से एक हैं। हों भी क्यों नहीं , उनमे ऊपर बताई गई तीनों क्वालितिज कूट कूटकर भरी हुई हैं। इसीलिए अस्पताल के किसी भी कर्मचारी को स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श या सेवा की ज़रुरत होतीहै तो सब उन्ही के पास जाते हैं । डॉ मधु एक सीधे सादे और सरल जीवन में विश्वास रखते हैं और अपने काम के प्रति समर्पित हैं।

श्री भारत भूषण :

मेडिकल सोश्यल वर्कर । सही मायने में उन्हें एक समाज सेवक कहना चाहिए । सरकारी नौकरी में रहते हुए भी अपने काम को अपना फ़र्ज़ ही नहीं उत्तरदायित्व समझते हैं। इसीलिए आउट ऑफ़ वे जाकर भी मरीजों की सेवा में लीन रहते हैं। एक अच्छे भाषाविद , लेखक और संयोजक के रूप में अस्पताल में सभी सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों में अग्रणी रहते हैं। हैल्थ एजुकेशन में डिप्लोमा लेकर जन जागरूकता के कार्यों में हमेशा सक्रिय भाग लेते हैं।

सम्मान पुरुस्कार वितरण समारोह में उपस्थित थे --दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी , स्वास्थ्य मंत्री डॉ किरण वालिया जी , प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्री जे पी सिंह जी , डीन डॉ के अगरवाल , और डाइरेक्टर डी एच एस डॉ भट्टाचार्जी

इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और , लेकिन पिछली बार २००८ में हुए सम्मान समारोह में स्टेट अवार्ड हमें भी मिला था ।
अब अपने बारे में क्या कहें , जो भी हैं , जैसे भी हैं , एज इज वेयर इज कंडीशन में आपके सामने हैं।

Friday, March 26, 2010

मलाई वो खा रहे हैं , हम तो खाली उंगलियाँ चाट रहे हैं --

पिछली पोस्ट में मैंने एक बेहद गंभीर मुद्दे को एक पहेली के रूप में उठाया था । इस पर कुछ बड़ी दिलचस्प टिप्पणियां पढने को मिली। श्री जी के अवधिया जी , मिहिरभोज जी , ऍम वर्मा जी , अंतर सोहिल , ललित शर्मा जी , डॉ मनोज मिस्र जी , डॉ महेश सिन्हा जी , चंदर सोनी, और श्री सतीश सक्सेना जी की टिप्पणियां पढ़कर स्वत्त : चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।

हमारे अप्रवासी मित्रों ने शिकायत की कि उन्हें क्यों दूर रखा गया इस पहेली से । आदरणीय अदा जी , राज भाटिया जी , नीरज रोहिला जी, दिगंबर नासवा जी, और शिखा वार्ष्णे जी और समीर लाल जी को तो पता ही है कि असलियत क्या है।

श्री अविनाश जी, गोदियाल जी और जे सी जी का ज़वाब तो एकदम सटीक था और दिलचस्प भी।

मैं श्री संजय भास्कर , कृष्ण मुरारी प्रसादजी , बबली जी, डॉ अजित गुप्ता जी, और डॉ रूप चाँद शास्त्री जी, काज़ल कुमार जी , खुशदीप सहगल और रचना दीक्षित जी का भी आभारी हूँ जिन्होंने अपने विचार प्रकट किये इस मुद्दे पर।

एक आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई डॉ अनुराग की टिपण्णी प्राप्त कर। पहली बार उनको अपने ब्लॉग पर पाकर हम तो धन्य हो गए।
अब जानिए पहेली का ज़वाब :
आपने सही पहचाना , फोटो में हम ही हैं। ये फोटो कनाडा के क्यूबेक शहर में लिए गया था । कार हमारे मित्र डॉ वर्मा की है । पेट्रोल भी उन्होंने ही भरा । हम तो खाली फोटो खिंचवा रहे हैं।

जी हाँ, जैसा आप में कई मित्रों ने कहा , वहां गैस स्टेशन पर कोई अटेंडेंट नहीं होता । बस क्रेडिट कार्ड डालो , राशी पंच करो , गैस (पेट्रोल) भरो और चल दो।
अब यह नहीं पता कि किसी के पास कार्ड न हो तो ?
अब ज़रा सोचिये यदि ये सिस्टम यहाँ भी जाये तो क्या होगायहाँ तो लोग टी ऍम मशीन को ही उठा ले जाते हैं

आइये अब बात करते हैं असली मुद्दे की। विषय था -डॉक्टरों द्वारा विदेश पलायन।

पलायन : बेहतर विकल्प के लिए प्रस्थान

अब यह भले ही गाँव से शहर की ओर हो या गरीब प्रदेश से महानगर की ओर या फिर विकासशील देश से विकसित देश की ओर।
पलायन मजदूर का हो या डॉक्टर , इंजिनियर का --मकसद सबका एक ही है । बेहतर विकल्प
और इसमें बुराई भी क्या है । भाई अगर पलायन न हुआ होता तो क्या आज यह विकास हुआ होता । मनुष्य आज भी स्टोन एज की तरह गुफाओं में रह रहा होता।

लेकिन डॉक्टरों के पलायन की बात में थोडा फर्क है । प्रस्तुत हैं कुछ तथ्य मेडिकल प्रोफेशन के बारे में :

डॉक्टरों को क्रीम ऑफ़ सोसाइटी कहा जाता है । हो भी क्यों नहीं --सबसे कठिन परीक्षा पास करके दाखिला मिलता है , मेडिकल कॉलिज में ।
शिक्षा अवधि भी ५ साल । फिर एक साल इंटर्नशिप । तीन साल पोस्ट ग्रेजुएशन । तीन साल सीनियर रेजीडेंसी । तब कहीं जाकर स्पेस्लिस्ट बनते हैं। सुपर स्पेस्लिस्ट बनने के लिए और दो साल की पढ़ाई।

यानि एक जेनेरल फिजिशियन २५ में , स्पेस्लिस्ट ३० में और सुपर स्पेस्लिस्ट ३५ साल की आयु में जाकर बनता है। उसके बाद भी पढ़ाई कभी ख़त्म नहीं होती क्योंकि सबसे ज्यादा जल्दी बदलाव मेडिकल नोलेज में ही आता है।

रिटर्न : डॉक्टर बनकर सरकारी नौकरी १० % से भी कम को मिलती है । बाकी को प्राइवेट प्रैक्टिस ही करनी पड़ती है । लेकिन उसके लिए २०-३० लाख कहाँ से आयेंगे ।

छोटे मोटे नर्सिंग होम आर ऍम ओ का काम तो देते हैं लेकिन सैलरी बस १०-१५०००

अपनी क्लिनिक खोलो तो मुकाबला होता है आर ऍम पी से या नीम हकीमों से ।
कुछ ही डॉक्टर हैं जो अच्छा खासा कमा पाते हैं।

हालात : एक डिस्पेंसरी में एक या दो डॉक्टर --मरीज़ ३००-४०० प्रतिदिन। अस्पताल में भी ६०००-८००० मरीज़ ओ पी डी में प्रतिदिन। एक रोगी को देखने के लिए समय सिर्फ १.५-२ मिनट।

प्रोफ़ेसर को भी वे सुविधाएँ नहीं जो एक मल्टी नॅशनल कंपनी में आम कार्यकर्ता को मिलती हैं

आबादी : भले ही हर साल ३५००० डॉक्टर बनते हैं लेकिन ११७ करोड़ आबादी वाले देश में प्रति एक लाख आबादी पर बस ५०-६० डॉक्टर की रेशो। जबकि विकसित देशों में यही अनुपात है २५०-३०० डॉक्टर प्रति एक लाख आबादी।
९० % डॉक्टर शहरों में जहाँ सिर्फ ३० % आबादी रहती है
गाँव में जाये भी तो कैसे --जहाँ कोई सुविधा नहीं , उसके अपने लिए , परिवार के लिए , बच्चों की शिक्षा के लिए ।

ऐसे में यदि हमारे डॉक्टर बाहर की हरियाली की ओर न देखें तो क्या करें ।

वहां : एक एक इंसान की कीमत। एक जेनेरल फिजिसियन की क्लिनिक में सभी आधुनिक सुविधाएँ। २०-३० रोगी प्रतिदिन --नियुक्त समय पर --मोटी कमाई ---एथिकल प्रैक्टिस --प्रोफेशनल संतुष्टि।

उस पर विकास की सभी आधुनिक सुविधाओं का उपभोग। सब को एक समान। कोई भीड़ भाड़ नहीं --नियमों का पालन करता यातायात --ओन लाइन सारे काम --कोई नटवर लाल नहीं।

कुछ पारिवारिक और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, लेकिन वे सभी के लिए बराबर हैं।

जी हाँ , कुछ ऐसा ही द्रश्य होता है विकसित देशों में ।
फिर क्यों न जो सामर्थ्य रखते हैं , वे पलायन न करें।

लेकिन जिम्मेदार कौन ? हमारी व्यवस्था ? मेडिकल प्रोफेशन की ओर सरकार की उदासीनता ? या फिर बढती हुई उपभोगता ?

कुछ भी हो , हम बेहतरीन डॉक्टर बनाकर विदेशों को सौंप रहे हैंमलाई वो खा रहे हैंहम तो खाली उंगलियाँ चाट रहे हैं
इस बारे में अप्रवासी भारतीय मित्रों कि राय जानना चाहूँगा। आपका स्वागत है।