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Friday, February 7, 2020

कामना करता हूँ कि इस साल के चुनाव में --


कामना करता हूँ कि इस साल के चुनाव में --

सब नेताओं की मुरादें पूरी हों,
ना किसी की इच्छाएं अधूरी हों।

उम्मीदवारों को कम से कम ५% मत मिलें ,
ना जब्त हो, सभी को वापस जमानत मिले।

सर्वोत्तम पार्टी को अच्छा जनमत मिले,
जनमत भी ऐसा कि पूर्ण बहुमत मिले।

जनता को आटा चावल दाल मिले,
और दो रूपये किलो हर माल मिले। 

बेघर को झुग्गी डालने की डगर मिले,
जल्दी ही झुग्गी की जगह पक्का घर मिले। 

अनाधिकृत घर का मालिकाना हक़ मिले,
मालिक को बिजली पानी नेट मुफ्त मिले। 

सब्ज़ी मार्किट में सस्ता प्याज मिले ,
और बैंक खातों में ज्यादा ब्याज मिले।

लेकिन ये सब मिलें ना मिलें,
पर कामना करता हूँ कि --

शहर में शांतिपूर्ण चुनाव हो,
ना कोई सांप्रदायिक तनाव हो।

ना कोई मतदाता भयभीत हो,
और अंतत: लोकतंत्र की जीत हो।

Monday, November 25, 2019

महा चुनावों पर एक पैरोड़ी ---


नगरी नगरी , होटल होटल , छुपता जाये बेचारा ,
ये सियासत का मारा  ....

चुनावों तक का साथ था इनका , जीतने तक की यारी,
आज यहाँ तो कल उस दल में , घुसने की तैयारी।
नगरी नगरी , होटल होटल ----

मंत्री पद के पीछे क्यों हैं , ये नेता सब पगले ,
यहाँ की ये कुर्सी नहीं मिलेगी , ग़र होटल से निकले ।
नगरी नगरी , होटल होटल ----

कदम कदम पर नेता बैठे , अपना हाथ बढ़ाये ,
सियासत के खेल में जाने , कौन कहाँ मिल जाये।
नगरी नगरी , होटल होटल ---

काले नोटों में बिकता हो, जहाँ दलों का प्यार ,
वोट्स भी बेकार वहां पर , वोटर भी बेकार।
नगरी नगरी , होटल होटल  ----

उन जैसों के भाग में लिखा , कुर्सी का वरदान नहीं ,
जिसने उनको नेता चुना वो , अवसर है मतदान नहीं।
नगरी नगरी , होटल होटल ---




Monday, April 16, 2018

अध्यक्ष के चुनाव में फूलवालों की होड़ ...

सभा समाप्त होते ही :

नव निर्वाचित अध्यक्ष पर फूल मालाओं की जो लगी झड़ी।
सारे श्रोताओं में फोटो खिंचवाने की जैसे होड़ सी लग पड़ी।

देखते देखते श्रोताओं से सारा मंच खचाखच भर गया ,
मैं तो ये प्रेमासक्त अद्भुत नज़ारा देखकर ही डर गया।

एक श्रोता दूसरे श्रोताको धकाकर आगे बढ़ रहा था।
दूसरा फोटो के लिए तीसरे के काँधे पर ही चढ़ रहा था।

भीड़ अध्यक्ष के अगल बगल जब तक एक कतार लगाती ,
तब तक पहली कतार के आगे एक और कतार लग जाती।

एक बार हम भी छलांग मार करीब जाने में सफल हो गए। 
पर तभी एक जोरदार धक्का खाकर गिरे और विफल हो गए।

आलम ये थे कि इधर धड़ाधड़ फोटो खींचे जा रहे थे,
उधर हम कभी दाएं कभी बाएं धकियाये जा रहे थे।

और लोग तो जंगल में हिरणों की तरह कुलांचे मारते रहे ,
हम बस शेर की तरह शिकार को हाथ से जाते देखते रहे।

फोटोग्राफर भी बेचारा दे दनादन फोटो उतार रहा था ,
हमें तो पूरा शक था कि पट्ठा खाली फलैश मार रहा था।

वैसे फोटो खिंचवाने को हम भी १5 बार ट्राई मार चुके थे,
पर मायूस से खड़े थे क्योंकि आखिरी ट्राई भी हार चुके थे।

हमें संघर्ष करते देख एक सज्जन की नज़र हम पर पड़ गई ,
पर कुछ लम्बूओं के सामने हमारी तो हाईट ही कम पड़ गई।

तभी हमें महमूद ग़ज़नवी का इतिहास याद आया ,
और १७ वीं बार प्रहार करने का प्रयास याद आया।

आखिरकार १७वीं बार में हम भी कामयाब हो गए ,
और अध्यक्ष जी के साथ कैमरे में आबाद हो गए। 

Saturday, April 12, 2014

कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया ....


पिछले आम चुनाव मे हम वोट डालने से वंचित रह गए थे . लेकिन कुछ महीने पहले हुए दिल्ली के विधान सभा चुनाव मे लोगों का उत्साह देखकर हम भी आश्वस्त हो गए थे कि अब घर बैठे रहने का समय नहीं रहा . और कुछ हो ना हो , 'आप' के चुनावी मैदान मे आने से दिल्ली और सम्पूर्ण देश मे चुनावों मे वोटों की % संख्या तो निश्चित ही बढ़ गई है . इसलिये इस बार हमने भी द्रढ निश्चय और पक्का इरादा बना लिया था कि अपने मताधिकार का पूर्ण उपयोग करेंगे . 

लेकिन एक छोटी सी समस्या आ रही थी कि वोट किसे दिया जाये . क्या पार्टी के नाम पर वोट दें , या पी एम उम्मीदवार के नाम पर . या फिर व्यक्ति विशेष के गुणों के आधार पर वोट दी जाये . इस बार सवाल ज़रा कठिन सा लग रहा था . आखिर देश के भविष्य का सवाल था . देश को चलाने के लिये एक स्थायी सरकार चाहिये , एक योग्य प्रधान मंत्री और उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत चाहिये . लेकिन हमारे इकलौते वोट से तो हार जीत का फैसला होना नहीं था . उस पर श्रीमती जी का भी पता नहीं था कि किसे वोट देंगी . अब डर यही था कि यदि हम दोनो ने अलग अलग वोट दिये तो दोनो की वोट ही आपस मे कट जाएंगी . 

जब श्रीमती जी से हमने इसका ज़िक्र किया तो उन्होने मानव अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि अपनी मर्ज़ी से वोट देने का अधिकार उन्हे भी प्राप्त है . आखिर स्वतंत्र भारत मे उन्हे भी तो यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वो अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकें . हमने कहा भाग्यवान , आपको पूर्ण अधिकार है लेकिन हम तो बस यह कह रहे थे कि कृपया आप हमारी वोट ना काटें . यह तभी संभव है जब आप उन्ही को वोट दें जिन्हे हम चाहते हैं . और क्योंकि उन्होने स्वयं अभी तक यह निर्णय नहीं लिया था कि किसे वोट दें , इसलिये बेहतर तो यही था कि हमारी बात मान लें . 

वैसे हमने भी जिंदगी मे कई चुनाव लड़े हैं और लड़वाये भी हैं . इसलिये वोट मांगने का अनुभव हमे भी बहुत रहा है . लेकिन पत्नी से वोट मांगना वास्तव मे बड़ा मुश्किल और एक चुनौतीपूर्ण काम था . फिर भी , हमने अपने सारे अनुभव का उपयोग करते हुए और घर मे ही चुनाव प्रचार करते हुए आखिर श्रीमती जी को मना ही लिया कि वो हमारे कहे अनुसार ही वोट देंगी . सरकार ने चुनावी दिन को छुट्टी का दिन घोषित कर दिया था , लेकिन उसे छुट्टी मे परिवर्तित करना हमारे हाथ मे था . इसलिये हमने निर्णय लिया कि सुबह सैर करने के पश्चात ७ बजे मतदान केन्द्र खुलते ही सबसे पहले वोट डालकर हम निवृत हो जायेंगे . वैसे भी यह आवश्यक नहीं कि नहा धोकर ही वोट डाली जा सकती थी . लेकिन केन्द्र पर जाकर देखा कि हमारे पड़ोसी तो हमसे भी पहले वोट डाल कर जा चुके थे . फिर भी , वोट डालकर ९ बजे तक हमने भी अपनी स्याही सुसज्जित उंगली का फोटो फ़ेसबुक के कहने पर फ़ेसबुक पर डाल कर अपनी देशभक्ति की अमिट छाप अंकित करा दी . 
अब कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया

Wednesday, March 21, 2012

बार बार दिन ये आए , बार बार दिल ये गाए ---चुनाव .


हर वर्ष के आरंभ में हम डॉक्टर्स अपनी संस्था , दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों के चुनाव कराते हैं . मार्च अंत तक जहाँ एक तरफ वित्तीय वर्ष का अंत होता है , वहीँ हमारे भी चुनावों की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है . इस दौरान चुनावों की सरगर्मी में जो देखने को मिलता है , वही प्रस्तुत है एक हास्य कविता के रूप में :


वज़न हमारा पांच किलो बढ़ जाता है
ड़ी एम् ऐ का जब, चुनाव पास आता है .

कभी लंच, कभी डिनर, कभी दोनों
खाने पीने का रोज, जुगाड़ हो जाता है .

मिलते हैं सब गले जैसे बिछड़े बरसों के
साल भर का सारा, प्यार उमड़ आता है .

करते हैं बेसब्री से , इंतज़ार फ़रवरी का
एक महीना बिना खर्चे निकल जाता है .

उड़ाते हैं सब चिकन मटन व फिश टिक्का
बोतल कोई दारू की, आधी निगल जाता है .

मचता है शोर तब मयखाने में
जब दीवाना कोई होश खो जाता है .

नेता लोग देते हैं भाषण जोशीले
अपना काम तो कविता से चल जाता है .

लड़ें वो जिनके पास है ज्यादा पैसा
बंदा तो बस मुफ्त में मौज उडाता है .

टल जाएँ चुनाव ग़र सर्वसम्मति से
चीटिंग सी लगती है , लॉस हो जाता है .

रहता है यही एक अफ़सोस 'तारीफ'
चुनाव साल में बस एक बार आता है .

नोट : यह ग़ज़ल पढ़कर हो सकता है , शायद हमें कभी चुनाव का टिकेट न मिले .


Wednesday, February 15, 2012

चुनावों के सीजन में हमारी भी बल्ले बल्ले --


देश में चुनावों का माहौल चल रहा हैनेताओं की चहल पहल चारों ओर नज़र रही हैफ़रवरी के माह में दिल्ली में भी डॉक्टरों के चुनाव हर साल होते हैंदिल्ली मेडिकल एसोसिएशन में करीब १४००० डॉक्टर सदस्य हैंहर वर्ष एक प्रेजिडेंट और दो वाइस प्रेजिडेंट की पोस्ट्स के लिए जमकर संघर्ष होता है

वोटिंग के लिए सेन्ट्रल दिल्ली के अलावा चारों कोनो में मतदान केंद्र बनाये जाते हैंपूर्वी दिल्ली का मतदान केंद्र यह है --


हमारी ब्रांच ने बहुत मेहनत कर चार मंजिला अपना भवन बनाया हैयहीं पर सब आते हैं वोट डालने


भवन के द्वार पर दोनों ओर दोनों पार्टियों के उम्मीदवार खड़े हो जाते हैं अपने सहयोगियों के साथदोपहर तक एक एक कर वोटर आते हैंलेकिन दोपहर के बाद क्लिनिक बंद होने पर भीड़ लग जाती है

डॉक्टर्स के जीवन में चुनाव एक ऐसा समय होता है जब सब मिलकर उम्मीदवार के खर्चे पर पार्टियों में मौज उड़ाते हैंअक्सर अधिकतर डॉक्टर्स दो खेमों में बंटे होते हैंलेकिन काफी ऐसे भी होते हैं जो इधर होते हैं , उधरबल्कि जहाँ मिला अवसर, बे पेंदे के लोटे की तरह लुढ़क जाते हैं

सच पूछा जाए तो सर्दियों का सीजन चुनाव का सीजन यानि पार्टियों का सीजन होता है
इसीलिए अक्सर सर्दियों में हमारा भी वज़न - किलो बढ़ जाता है

मतदान शिविर का नज़ारा भी बड़ा मनोरंजक होता है
एक मोटे ताज़े बन्दे को देखकर एक बोलता है -- गईवोट गईबॉस ये तो पक्की हमारी है
इस पर दूसरा बोलता है --छोड़ यार , साला दारू तो हमारी पीता है , वोट उन्हें दे जाता है

लेकिन दिल के अन्दर कुछ भी हो , वोट मांगने में डॉक्टर्स भी किसी नेता से कम नहीं होतेहाथ जोड़कर इतना मीठा बोलते हैं कि एक दिन ही सही , आम आदमी को भी खास होने का अहसास होता है

९९ % लोग निर्णय लेकर ही आते हैं कि किसे वोट देनी हैफिर भी मतदान स्थल पर वोटर पर सब ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे उनकी जिंदगी उसी के हाथ में हो

लेकिन वोटिंग के मामले में यारी दोस्ती काम नहीं आतीअक्सर व्यक्तिगत जीवन में जो मित्र होते हैं , वोट दूसरी पार्टी को देते हैंऐसे लोग आँख बचाकर निकलने की कोशिश करते हैंकुछ तो ऐसे मूंह फेरकर निकल जाते हैं जैसे पहचानते ही हों


खाने का इंतज़ाम चुनाव वाले दिन भी किया जाता हैयह सुविधा शायद डॉक्टर्स के चुनाव में ही देखने को मिलती है

पिछले दस साल से हम भी चुनावों में सक्रीय रूप से भाग लेते रहे हैंपूर्वी दिल्ली में अपनी पार्टी की कोर कमिटी में आते हैंहालाँकि बड़े नेताओं की तरह स्वयं कभी चुनाव नहीं जीता , लेकिन सर्वसम्मति से ब्रांच के वाइस प्रेजिडेंट ज़रूर रह चुके हैं
अब हम भी किंग मेकर का ही काम करते हैंयानि दूसरों को लड़ाते हैं

एक ख़ुशी की बात यह रही कि १२ फ़रवरी को हुए चुनाव में हमारी पार्टी का उम्मीदवार प्रेजिडेंट का चुनाव जीत गया और एक वाइस प्रेसिडेंट का
फिर अगले दिन पार्टी तो होनी ही थी

पूरे जोर शोर से जश्न मनाया गया
इस फोटो में हम इसलिए नहीं है कि फोटो तो हमीं ने खिंचा है मोबाईल से



और विजयी उम्मीदवारों का विधिवत स्वागत किया गया
ढोल और नगाड़ों की ताल पर सब झूम कर नाचेसेबरस , सोमरस-- सब का सेवन करते हुए जश्न चलता रहा

और इस तरह एक और साल के लिए डॉक्टर्स के हितों के लिए संघर्ष करने के लिए टीम तैयार हो गई

किसी भी संस्था के लिए एक एसोसिएशन का होना अत्यंत आवश्यक होता हैइसका काम होता है संस्था के सदस्यों के हितों की रक्षा करना
मेडिकल प्रोफेशन में भी बहुत सी समस्याएँ हैं जिन्हें आम आदमी नहीं समझ सकता

नर्सिंग होम का पंजीकरण , पी एन डी टी एक्ट , निवासीय कॉलोनियों में क्लिनिक्स की वैधता , कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट में डॉक्टर्स का प्रोटेक्शन आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनसे हर प्राइवेट प्रेक्टिशनर को जूझना पड़ता है

साथ ही मेडिकल नॉलेज में निरंतर हो रहे परिवर्तन से सब को सूचित रखने के लिए सी एम् , सेमिनार्स , कॉन्फेरेन्स आदि का आयोजन , सभी पर्वों और राष्ट्रीय दिवसों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करना और अवसर मिलने पर सदस्यों के लिए मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन एसोसिअशन द्वारा किया जाता है

आशा है कि इस वर्ष भी हम चिकित्सा समाज के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य करने में सफल होंगे