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Monday, June 29, 2026

कितने दुखद ये हालात हैं...

 फुटपाथ पर बच्चों का सोना,

मंदिर में चढ़ावे का चांदी सोना,

और मंगेतर का प्रेमी के संग होना,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं।  


प्रेम में पागल लड़की से शादी,

हनीमून के लिए पर्वतों की वादी,

और नीले ड्रम की बढ़ती आबादी,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


बुढ़ापे में घर में अकेला होना,

रिटायर्ड शख्स के पास पैसा होना,

और फ्रॉड कॉल पर भरोसा होना,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


सड़कों पर दौड़ती काली थार,

गुड़गांव के रईसजादों का व्यवहार,

और रोड़ रेज में तू तू मैं मैं के आसार,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


*आजकल के दुखद समाचारों पर आधारित।

Monday, June 15, 2026

ग़ज़ल के कद्रदान अभी बाकी हैं...

 बड़े से मॉल की आंखों में चुभ रही है जो,

गली के मोड़ पे इक छोटी दुकान अभी बाकी है।


हर शख़्स इस शहर में नज़र आता है ग़मगीन,

शुक्र है कुछ चेहरों पर मुस्कान अभी बाकी है।


पोथी पढ़ पढ़ कर इल्म तो बहुत कर लिया हासिल,

पर असल जिंदगी का इम्तिहान अभी बाकी है।


जिसे भी देखो वही दिखाई देता है यहां नेता,

तसल्ली है कुछ लोगों में ईमान अभी बाकी है।


रिश्वतखोरी के दलदल में भी रहते पाक साफ,

वो खुद्दार जिनमें आत्मसम्मान अभी बाकी है।


हैरान ना हो देखकर मुर्दों की मुर्दानगी,

शहर के कुछ मर्दों में जान अभी बाकी है।


वक्त ने कुछ तो भर दिए जो दिए थे जालिमों ने,

उन बेदर्द जख्मों के कुछ निशान अभी बाकी हैं।


रुकसत हुआ वो शख्स जो महीनों से पड़ा था बीमार,

फुटपाथ पर उसका बस कुछ सामान अभी बाकी है।


मत सोचो गुजर गया जल जमी से वो जलजला,

हार्मोज के सागर में उफनता तूफान अभी बाकी है।


बिसराने वाले तो बहुत मिल जाएंगे डॉ दराल,

तू लिखता चल तेरी लेखनी के कद्रदान अभी बाकी हैं। 

Wednesday, June 3, 2026

अभिलाषा...

 अभिलाषा:

ए ज़िंदगी,

ज़रा आहिस्ता चल।

क्यों बेतहाशा भागती है,

बदहवास दौड़े जाती है।

ज़रा रुक, दम भर तो ठहर,

ऐसी भी क्या जल्दी है।

कुछ आराम कर लूं,

एक आध पड़ाव पार कर लूं,

एक रत्न अवार्ड जेब में धर लूं।

ए आई भी तो अभी आई है,

ज़रा रूबरू तो होने दे।

रईसों की भीड़ में शुमार तो होने दे।

क्यों बेवज़ह दौड़े जाती है,

अरमानों को पीछे छोड़े जाती है।

चल, ज़रूर चल,

पर ज़रा आहिस्ता चल,

ए ज़िंदगी।