top hindi blogs
Showing posts with label पार्क. Show all posts
Showing posts with label पार्क. Show all posts

Wednesday, November 12, 2014

आओ , जीव जंतुओं से ही कुछ सीख लिया जाये ... एक लघु चित्रकथा !


दोपहर का समय , सूरज लगभग सर पर , अक्टूबर माह की तेज लेकिन सुहानी धूप और हरा भरा पार्क ! वायु का प्रवाह ना के बराबर होने से झील का साफ पानी एकदम स्थिर ! पानी मे आस पास के पेड़ों का प्रतिबिम्ब झील की सुंदरता को बढ़ाते हुए ! कुल मिलाकर एक नयनाभिराम दृश्य मन को शांति और सकूं पहुंचाता हुआ ! ऐसे मे दूध सी सफेद बतखों का एक झुण्ड पार्क की हरी घास से निकल कर पानी की ओर बढ़ता हुआ जैसे किसी राजा की पंक्तिबद्ध सेना युद्ध के मैदान की ओर जाती हुई !  


झुण्ड के सबसे आगे झुण्ड के सरदार और उसके पीछे सेनापति सबसे पहले पानी मे अवतरित हुए तो झील के शांत पानी मे ऐसी तरंगें पैदा हुई जैसे किसी षोडशी को देखकर किसी तरुण के दिल मे उत्पन्न होती हैं ! पेड़ों की छाया भी जैसे प्रेमासक्त नागिन सी लहराने सी लगी ! छपाक की आवाज़ ने कानों मे ऐसा मधुर स्वर घोल दिया जैसे किसी संगीतकार की बांसुरी की धुन पर किसी तबलची ने धाप छोड़ी हो ! पार्क की खामोशी मे छई छप्पा छई की तान जैसे वातावरण मे गूँजने लगी ! 





फिर एक अनुशासित बटालियन की तरह बतखों का समूह चल पड़ा अपनी मंज़िल की ओर जैसे सरदार ने सबको कोई मूक संदेश दे दिया हो ! झील के गहरे नीले पानी मे सफेद रंग की बतखें मोतियों सी चमक रही थी ! पानी की सतह पर वे जैसे स्‍वत: ही तैर और चल रही थी ! पानी की तरंगों का दायरा अब फैलता जा रहा था जो पानी मे बनी बाकि छवियों को लहराता सा जा रहा था !




बतखें अब अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गई थी ! शायद यह उनकी जीविका का रोजमर्रा का हिस्सा था क्योंकि उन्हे मालूम था कि चारा कहाँ मिलने वाला था ! चारा डालने वाले भी जैसे तैयार ही बैठे थे ! 


अब सब तन्मयता से चुग्गा चुगने मे व्यस्त हो गई थी ! दाना खाने मे उनकी तत्परता देखते ही बनती थी ! लेकिन अब वे अकेली नहीं थी ! पानी मे रहने वाले अन्य जीव भी इस प्रक्रिया मे शामिल हो गए थे ! जिसका दांव लग रहा था वही मूँह मे दाना दबोच लेता था ! इंसान और अन्य जीव जंतुओं मे यह मूक रिश्ता बड़ा दिलचस्प लग रहा था ! मनुष्य उन्हे खाते देख कर खुश थे और वे मनुष्य के हाथों दावत पाकर !    



क्या हम सभ्य समाज मे रहने वाले सभी जीवों मे सबसे ज्यादा विकसित प्राणी इंसान बनकर इन जलस्थलचर प्राणियों की तरह बिना लड़े झगड़े मिल जुल कर नहीं रह सकते !!  


Thursday, June 5, 2014

विकास की आंधी ने संस्कारों को चूर चूर कर दिया है ---


रोज शाम होते ही बीवी गुहार लगाती है, 
पार्क की सैर करने के गुण समझाती है !
हार कर एक दिन हमने भी गाड़ी उठाई ,
और पत्नी को संग बिठा, पार्क की ओर दौड़ाई !   
गेट से घुसते ही , फुटपाथ पर कदम रखते ही 
सोचा कि चलो अब काम पर लगा जाये , 
पेट और वेट घटाने को ज़रा तेज चला जाये ! 
तभी गांव याद कर मन मे विचार आया,  
कि यह भी कैसा मुकाम है !
वहां काम पर जाते थे पैदल चलकर,
यहाँ पैदल चलना भी एक काम है !
पार्क मे पैदल चलकर हम केलरिज जलाते हैं, 
लेकिन पैदल चलने के लिये बैठकर कार मे जाते हैं !

लेकिन पार्क का नज़ारा भी अज़ब होता है, 
टहलने वालों मे जिसे देखो वही बेढब होता है ! 
फिट बंदे तो नज़र ही कहाँ आते हैं,
क्योंकि फिट होते हैं आदमी खास,
और खास आदमी फिटनेस पाने, 
पार्क मे नहीं , ए सी जिम मे जाते हैं ! 
और आम आदमी के पास नहीं होता वक्त,  
वो बेचारे तो शाम के वक्त ठेला लगाते हैं !

पार्क मे आने वाले तो होते हैं मिडल क्लास,
और मिडल क्लास ना आम होते हैं ना खास 
उनके पास नहीं जिम के लायक पैसा होता है,
पर पास करने के लिये वक्त ज्यादा होता है ! 
उम्र निकल जाती है जिंदगी को ढोते ढोते,
पहले पालते हैं बच्चे और फिर पोती पोते !  
सेहत की ओर ध्यान ही कहाँ जा पाता है,
घर का भार उठाते उठाते शरीर का भार बढ़ जाता है ! 
फिर घेर लेते है बी पी, शुगर और आरथ्राईटिस,  
और सेहत की हो जाती है टांय टांय फिस ! 
रिटायर होते होते ज़वाब दे जाते हैं घुटने,
इसलिये वॉक के नाम पर पार्क जाते हैं बस टहलने ! 

एक पेड़ के नीचे दस बूढ़े बैठे बतिया रहे थे,
सुनने वाला कोई नहीं था पर सब बोले जा रहे थे ! 
भई उम्र भर तो सुनते रहे बीवी और बॉस की बातें,
दिन मे चुप्पी और नींद मे बड़बड़ाकर कटती रही रातें ! 
अब सेवानिवृत होने पर मिला था बॉस से छुटकारा,
बरसों से दिल मे दबा गुब्बार निकल रहा था सारा !

वैसे भी बुजुर्गों को मिले ना मिले रोटी का निवाला ,
पर मिलना चाहिये कोई तो उनकी बातें सुनने वाला ! 
लेकिन बहू बेटा व्यस्त रहते हैं पैसा कमाने की दौड़ मे , 
और बच्चे कम्प्यूटर पर सोशल साइट्स के गठजोड़ मे !
विकास की आंधी ने संस्कारों को चूर चूर कर दिया है , 
एक ही घर मे रहकर भी परिवारों को दूर कर दिया है ! 

फिर एक साल बाद :
उसी पेड़ तले वही बुजुर्ग बैठे बतिया रहे थे,
लेकिन आज संख्या में आधे नज़र आ रहे थे।
अब वो बातें भी कर रहे थे फुसफुसा कर,
चहरे पर झलक रहा था एक अंजाना सा डर।
शायद चिंतन मनन हो रहा था इसका,
कि अब अगला नंबर लगेगा किसका।
पार्क में छोटे बच्चों की नई खेप दे रही थी दिखाई,
शायद यह आवागमन ही जिंदगी की रीति है भाई।



Sunday, January 10, 2010

जब पहली बार मुझे डी डी ए पर गर्व महसूस हुआ --दिल्ली के एक हरित क्षेत्र की सैर ---

यूँ तो कॉलिज के दिनों में अक्सर उसके पास से जाना होता था। लेकिन किस्मत देखिये की सारी ज़वानी गुज़र गयी और हम एक बार भी इस जगह फटक तक न सके। लेकिन कहते हैं न की दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। इसी तरह जब तक संयोग नहीं होता तब तक आप कुछ नहीं कर सकते । फिर भले ही वो किसी पार्क में जाना ही क्यों न हो ।

उस दिन दिल्ली यूनिवर्सिटी के नोर्थ कैम्पस में कुछ काम था। हमारे पास दो घंटे का फ्री टाइम था। श्रीमती जी ने कहा ---हमें कैम्पस ही घुमा दो । लेकिन गाड़ी में बैठे बैठे , ५-१० मिनट में ही सारा चक्कर पूरा हो गया। तभी हम उस जगह पहुँच गए जहाँ के बारे में हमने सिर्फ सुना ही था । जाने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई ।

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एकदम साथ लगा हुआ , डी डी ए ( दिल्ली विकास प्राधिकरण ) द्वारा विकसित एवम अनुरक्षित ये हरित क्षेत्र :


यहाँ खड़ी पचासों मोटरसाइकिलों को देखते ही अंदाज़ा हो जाता है की ये स्थान युवाओं के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। कारें तो बस इक्का दुक्का ही थी।

गेट से घुसते ही ये ये रास्ता ऐसा लगता है, मानो जंगल से होता हुआ किसी राजा के किले की और जा रहा हो।

लेकिन जल्दी ही घना जंगल शुरू हो जाता है। पेड़ पर बैठा ये बन्दर हमें ऐसे देख रहा था , जैसे कह रहा हो ---
इस ताज़ा नौज़वानों के स्वर्ग में ये भूतपूर्व नौज़वान कहाँ से आ गए।
जी हाँ, यहाँ आने वाले लगभग सभी एक दम ताज़ा ताज़ा ज़वानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाले ही होते हैं।
ये तो हमारी बहादुरी ही थी की हम सैकड़ों शरमाई सी , शकुचाई सी नज़रों का सामना करते हुए , यहाँ विचरण करते रहे।
थोडा आगे चलने पर हम पहुंचे इस स्थल पर जहाँ वृक्षारोपण का बोर्ड लगा था। बायीं तरफ जाने पर ऐसा कोई स्थल तो नहीं मिला ।

हाँ, एक नवयुवक अपने ज़वानी के सुनहरे सपनों को साकार करने का प्रयास ज़रूर कर रहा था , जो हमें देखकर झिझक गया।

घने जंगल में ये बेगन बेलिया का पेड़ लाल और गुलाबी रंग के फूलों से लदा अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था ।
और ये जर्मन शेफर्ड भी घूमने आया था ,अपने मालिक के साथ। ये तो हमें इसके मालिक से ही पता चला।
हालाँकि ये पता नहीं चल सका की मालिक इसको घुमाने लाया था या ये मालिक को।

इस बम्बू द्वार के आगे तो एक झील थी, जिसका नाम ही इतना भयंकर था की रोंगटे खड़े हो गए। जी हाई, वहां लिखा था --खूनी खान झील।

खैर हम आगे बढे , और घनी हरियाली में खो से गए।
ये लताएँ देखकर तो किसी का भी मन टार्ज़न बनने का कर सकता था। लेकिन हमने अपनी उफनती भावनाओं को रोका , ये सोचकर की कहीं कोई हड्डी चटक गयी या मुड भी गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

खूनी खान झील के किनारे ये हरियाली देखकर मन बाग़ बाग़ हुआ जा रहा था।

इस पेड़ को देखकर तो ऐसा लगा मानो सारी पुरवाई बस इसी के लिए चली हो। सारा पेड़ पश्चिम की तरफ झुका हुआ था, अकेला ।

अब तक तो हमारा भी मन कर आया था एक फोटू खिंचवाने का। घूम घूम कर पेट अन्दर हो गया और भूख भी लग आई।


और सच मानिये इतनी स्वादिष्ट चाट जो हमने वहां खाई, आज तक कहीं नहीं खाई थी। बस बंदरों ने नाक में दम कर दिया था। अब चाट वाला तो एक डंडी हाथ में देकर खिसक लिया। और हम डरते डरते चाट खा रहे थे। हमारी श्रीमती जी तो बंदरों से इतना डरती हैं, जितना तो हम कोकरोच से भी नहीं डरते।



वैसे भी कोकरोच भले ही बाहर से घिनोने दिखते हों, लेकिन एक बार पंख हटाओ तो अन्दर से उतने ही साफ़ सुथरे होते हैं। ये हमने प्री-मेडिकल में कोकरोच का डिसेक्शन करते हुए देखा था।

और अंत में यह बोर्ड, मानो जिंदगी का सन्देश देता हुआ।


पेड़ों की छाया, जैसे माँ का आँचल।
इनसे मिलती ओक्सिजन , जैसे माँ का स्तन पान।
यहाँ बैठकर, घूमकर वैसा ही सुकून मिलता है, जैसा माँ की गोद में बैठकर मिलता है।



कमला नेहरु रिज़ दिल्ली यूनिवर्सिटी और रिंग रोड के बीच सैंकड़ों एकड़ में फैला हुआ शायद दिल्ली का सबसे बड़ा पार्क है। इसे पार्क कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ कोई खुला स्थान नहीं है। बस पेड़ ही पेड़ चरों ओर । इतनी हरियाली की दिल बोले हडिप्पा !



पहली बार मुझे दिल्ली विकास प्राधिकरण पर गर्व महसूस हुआ।



नोट : कुछ और फोटो देखने के लिए चित्रकथा पर भी देखें।