आज एच टी में करन थापर का पुलिस बेरिकेडिंग पर लिखा दिलचस्प लेख पढ़कर हमें अपनी सालों पहले लिखी एक हास्य व्यंग कविता याद आ गई। लीजिये आप भी पढ़िए और देखिये कितनी समानताएं हैं दोनों में।
सड़क पर पुलिस के बैरिकेड गड़े थे ,
ट्रैफिक जाम में फंसे हम बेचैन खड़े थे ।
मैंने एक पुलिसवाले से पूछा, भई कितने आतंकवादी पकड़े ?
वो बोला -एक भी नहीं , सुबह से ख़ाली खड़े हैं ठण्ड में अकड़े ।
मैंने कहा तो फिर इसे हटाओ, क्यों बेकार समय की बर्बादी करते हो ।
वो बोला -चलो थाने, मुझे तो तुम्ही कोई आतंकवादी लगते हो ।
मैंने कहा --थाने क्यों चलूँ ,मैंने क्या जुर्म किया है ?
वो बोला -नहीं किया तो करो, मैंने कब मना किया है ।
पर ज़नाब जुर्माना तो देना पड़ेगा ,
तुमने इक पुलिसवाले का वक्त घणा लिया है ।
अरे यदि तुमने मुझे बातों में ना जकड लिया होता ,
तो अब तक मैंने एक आध आतंकवादी तो ज़रूर पकड़ लिया होता ।
अब कैसे करूँगा मैं भरे पूरे परिवार का भरण पोषण ,
जब आतंकवादी ही न मिला, तो कैसे मिलेगा आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन ।
अच्छा मोबाईल पर बात करने का निकालो एक हज़ार रूपये जुर्माना ।
मैंने कहा -मेरे पास तो मोबाईल है ही नहीं,मैं तो ऍफ़ एम् पर गुनगुना रहा था गाना ।
तो फिर ये बताओ आपने गाड़ी पचास के ऊपर क्यों चलाई ?
मैंने कहा -ये खटारा ८६ मोडल चालीस के ऊपर चलती ही कहाँ है भाई ।
रेडलाईट के १०० मीटर के अन्दर हॉर्न तो ज़रूर बजाया होगा ।
मैंने कहा -हॉर्न तो तब बजाता जब हॉर्न कभी लगवाया होता ।
फिर तो चलान कटेगा गाड़ी में हॉर्न ही नहीं है ,
मैंने कहा --सामने से हट जाओ, इसमें ब्रेक भी नहीं है ।
इस पर वो बोला - आपकी गाड़ी के शीशे ज़रुरत से ज्यादा काले हैं ।
मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा ज़नाब, आप भी इन्स्पेक्टर बड़े निराले हैं ।
ज़रा आँखों से काला चश्मा हटाओ, और आसमान की ओर नज़र घुमाओ।
अरे यह तो कुदरत की माया है, काले शीशे नहीं , शीशे में काले बादलों की छाया है ।
थक हार कर वो बोला, अच्छा कम्प्रोमाइज कर लेते हैं ।
चलो सौ रूपये निकालो, जुर्माना डाउनसाइज कर देते हैं ।
पर सौ रूपये किस बात के, यह बात समझ नहीं आई ?
वो बोला दिवाली का दिन है, अब कुछ तो शर्म करो भाई ।
अरे घर से बार बार फोन करती है घरवाली।
दो दिन से यहाँ पड़े हैं, हमें भी तो मनानी है दिवाली ।
मैंने कहा -यह बात थी तो हमारे अस्पताल चले आते ।
और हम से दो चार दिन का नकली मेडिकल ले जाते ।
यह कह कर तो मैंने उसका गुस्सा और जगा दिया ।
वो बोला मैं गया था, लेकिन आपके सी एम् ओ ने भगा दिया ।
और अब जो खाई है कसम , वो कसम नहीं तोडूंगा।
और मां कसम उस अस्पताल के डॉक्टर को नहीं छोडूंगा ।
और जब मुक्ति की कोई युक्ति समझ न आई ।
तो अगले साल का प्रोमिस देकर ही जान छुड़ाई ।
अगले दिन मैं घर से बिना सीट बेल्ट बांधे ही निकल पड़ा था ।
वो पुलिसवाला उसी जगह उसी चौराहे पर मुस्तैद खड़ा था ।
पर उस दिन वो निश्चिंत था , अपनी धुन में मस्त था ।
उसने मुझे न टोका , न गाड़ी के सामने आकर रोका ।
क्योंकि भले ही कोई आतंकवादी न मिला हो
इस वर्ष दिवाली पर कोई बम नहीं फूटा ।
हमारे पुलिस वाले कितनी विषम परिस्थितियों में काम करते हैं ।
इसके लिए हम इनको कोटि कोटि सलाम करते हैं ।

