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Wednesday, January 17, 2018

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

काश कि स्विस बैंकों की एक ब्रांच ऊपर भी होती ...

धन दौलत जोड़ते रहे जिंदगी भर जोड़कर पाई पाई  ,
बच्चों की जिंदगी बनाने में अपनी सारी जिंदगी बिताई।
एक पल भी ना जी पाए जिंदगी भर कभी खुद के लिए ,
अंत समय बच्चों ने ही उस धन संपत्ति पर नज़र गड़ाई।

डायबिटीज के मरीज़ हैं , मीठा कभी खा नहीं सकते,
ब्लड प्रैशर भी रहता है , नमक का परहेज हैं रखते।
शरीर का वज़न है भारी , बीवी घी भी खाने नहीं देती,
जो धन दौलत कमाई थी, वो भी साथ ले जा नहीं सकते।

दुनिया की रीति है कि बच्चों से ही घर बसता है ,
तिनका तिनका जोड़कर इक मकान बनता है।
कभी एक कमरे में रहता था छै लोगों का परिवार ,
अब बच्चों बिना छै कमरों का घर वीरान लगता है। 

Sunday, August 25, 2013

जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है , वह केवल अपना हिंदुस्तान है---


विकास और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के कारण अब हमारे देश में भी मनुष्यों की औसत आयु ७० वर्ष से ज्यादा हो गई है. हमारे मित्रों और निकट सम्बन्धियों में ही चार पांच ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति हैं जिनकी उम्र ८० से ज्यादा है.  ज़ाहिर है , देश में ६० वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की संख्या निरंतर बढती जा रही है. ऐसे में परिवारों , समाज और देश की नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है, ताकि देश के बुजुर्गों का यथोचित ख्याल रखा जा  सके.

हमारे जीवन में बड़े बूढों का बहुत महत्त्व होता है. ये  वर्तमान के बुजुर्ग ही हैं जिन्होंने हमारे वर्तमान को सुनहरा बनाने के लिए भूतकाल में अपना वर्तमान न्यौछावर किया था. आज जब हम समर्थ हैं और  वे असमर्थ होने लगे हैं , तब उनका सहारा बनकर यह क़र्ज़ चुकाना हमारा फ़र्ज़ है.

कहते हैं , जितनी आवश्यक विधालय और कॉलेज में ग्रहण की गई  शिक्षा है , उतनी ही आवश्यक घर में बड़े बूढों से ली गई अनौपचारिक शिक्षा है. जहाँ औपचारिक शिक्षा हमें  भौतिक विकास और प्रगति की राह पर ले जाती है , वहीँ अनौपचारिक शिक्षा नई पीढ़ी में संस्कारों का संचार करती है, जिससे हमारा नैतिक विकास होता है. हम भाग्यशाली हैं कि हमारे देश में  अभी भी हमारे संस्कार जीवित हैं. इसीलिए यहाँ अभी भी पारिवारों में पारस्परिक प्रेम और सौहार्द नज़र आता है.

माना कि विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है ,
और अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है.
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है ,
वह केवल अपना हिंदुस्तान है.               

लेकिन देखने में आता है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ अब संयुक्त परिवार समाप्त होते जा रहे हैं. शहरों में एकल ( न्यूक्लियर फैमिली ) परिवार भी तभी तक रहते हैं , जब तक बच्चे विधालय में पढ़ते हैं. एक बार कॉलेज में आने के बाद अक्सर दाखिला किसी दूर दराज़ शहर के कॉलेज में हो गया तो बच्चा सदा के लिए दूर हो जाता है. और घर में रह जाते हैं बस पति पत्नि। ये भी तभी तक साथ होते हैं जब तक दोनों जिन्दा हैं. लेकिन बुढ़ापे के साथ कई तरह की शारीरिक, मानसिक , सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी आने लगती हैं. ऐसे में उनका बच्चों पर आश्रित होना स्वाभाविक सा है.

बुढ़ापे में सबसे बड़ी समस्या है , एकाकीपन। संयुक्त परिवारों में भी देखने में आता है कि बुजुर्गों से बात करने वाला कोई नहीं होता। जहाँ कामकाजी पति पत्नि अपने अपने काम में व्यस्त रहते हैं , वहीँ बच्चों को बुजुर्गों की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। ऐसे में बुजुर्गों में सबसे ज्यादा सम्भावना अवसाद पैदा होने की रहती है. अवसाद से अनेकों शारीरिक और मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं. वैसे भी इस उम्र में आकर ब्लड प्रेशर , मधुमेह , हृदय रोग , जोड़ों का दर्द , शारीरिक और मानसिक कमजोरी आदि ऐसे रोग हैं जो स्वत ; ही मनुष्य को घेर लेते हैं.

ज़ाहिर है , बुजुर्गों को अपनी संतान के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है. जिन्होंने अपनी उंगली पकड़ाकर आपको चलना सिखाया , बुढ़ापे में उन्ही को आपके सहारे की आवश्यकता होती है. विकसित देशों में लोग वर्ष में एक बार मदर्स डे / फादर्स डे आदि मनाकर अपना कर्तव्य पूर्ण समझ लेते हैं. लेकिन इस मानसिकता का प्रभाव हमारे समाज पर न पड़े , इसके लिए हमें अपनी संस्कृति को याद रखते हुए सचेत रहना पड़ेगा . याद रहे कि आज के युवा कल के  बुजुर्ग हैं और आज के बच्चे कल के युवा। यह जीवन चक्र यूँ ही चलता रहता है.

नोट : एक अरसे से भाषण देने का अवसर नहीं मिला था. सोचा काव्य अभिव्यक्ति की तरह क्यों न ब्लॉग पर ही भाषण दे दिया जाये !  
         


Thursday, August 2, 2012

राखी हो, कलाई हो,पर जब बांधने वाला कोई नहीं न हो --


रक्षाबंधन एक ऐसा त्यौहार है, जिस दिन दफ्तर और अस्पताल सभी खाली पड़े होते हैं , लेकिन बसें और मेट्रो भरी होती हैं . ज़ाहिर है , महिलाएं राखी बांधने के लिए और पुरुष राखी बंधवाने के लिए छुट्टी कर लेते हैं . लेकिन कुछ हमारे जैसे भी होते हैं जो इस दिन कभी छुट्टी नहीं करते . कारण-- न कोई बुआ थी न कोई सगी बहन . हालाँकि चचेरी बुआ और बहनों के रहते कभी राखी पर बहन की कमी महसूस नहीं हुई . समय से पहले ही राखियाँ डाक या कुरियर द्वारा पहुँच जाती हैं . फिर बच्चों के साथ बैठकर हंसी ख़ुशी राखी का त्यौहार मना लिया जाता है .

लेकिन इस वर्ष दोनों बच्चे बाहर होने की वज़ह से घर में रह गए हम दोनों -- पति पत्नी . पहली बार महसूस हुआ -- राखी किससे बंधवायेंगे ! श्रीमती जी तो सुबह सुबह पूर्ण रूप से भ्राता स्नेहमयी होकर तैयार हो चुकी थी . वैसे भी उनसे कहा भी नहीं जा सकता था .
डर था -- कहीं उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो हम तो बेवक्त ही मारे जायेंगे .
लेकिन परेशानी तो वास्तविक थी -- राखी कैसे बांधी जाएगी . पत्नी जी ने सुझाव दिया -- पड़ोसन से बंधवा लीजिये . हमने कहा -- भाग्यवान रिश्ता बनाना तो आसान हो

ता है , परन्तु निभाना मुश्किल .
वैसे भी पड़ोसन को भाभी जी तो कहा जा सकता है , बहन नहीं .
फिर याद आया -- अस्पताल में सिस्टर्स की भरमार होती है . लेकिन उनका हाल भी हाथी के दांतों जैसा होता है -- खाने के और, दिखाने के और . बैंक में कुछ काम था --सोचा वहीँ किसी से अनुरोध कर लेंगे . लेकिन फिर ध्यान आया -- आज के दिन किसी भी दफ्तर में कोई भी महिला दिखाई ही कहाँ देती है . आखिर , यही लगा --इस बार राखी तो खुद ही बांधनी पड़ेगी .

ऐसे में हमें याद आया -- डॉक्टर बनने के बाद हमारे सामने दो विकल्प थे . या तो हम फिजिसियन बनते , या सर्जन . लेकिन चीर फाड़ में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही , इसलिए सर्जन बनने का सवाल ही नहीं था . लेकिन यदि सर्जन होते तो सर्जिकल नॉट बनाना तो अवश्य आता. फिर किसी के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती और राखी बांधने में अपनी ही दक्षता काम आ जाती .

अब हमें लगा -- भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद स्वयं करते हैं . सोचा कुछ भी हो जाए , राखी तो स्वयं ही बांधनी है . हमने श्रीमती जी से ही अनुरोध किया -- सर्जिकल नॉट सिखाने के लिए . उनका तो यह रोज का ही काम है . उन्होंने बड़े सहज भाव से दो सेकण्ड में बांध कर दिखा दिया . हमने भी सोचा --
करत करत अभ्यास के , जड़मति होत सुजान . इसलिए लग गए अभ्यास करने . आधे घंटे की मेहनत के बाद आखिर बांधना आ ही गया .




फिर तैयार होकर , राखी बांधकर हमने श्रीमती जी के हाथ का बना हलुआ प्रसाद के रूप में चखा . शाम को टी वी पर समाचारों में नकली घी और खोये से बनी मिठाइयों के बारे में देखकर तय कर लिया था -- कोई मिठाई नहीं खरीदी जाएगी . इसलिए कड़ाह प्रसाद ही बेस्ट ऑप्शन लगा .
और इस तरह रक्षाबंधन का त्यौहार मनाकर हम पहुँच गए , खाली पड़े अस्पताल में खाली बैठने के लिए .

लेकिन कलाई सूनी नहीं थी .

पश्चिमी सभ्यता और हमारी संस्कृति में यही सबसे बड़ा अंतर है . हमारे पर्व सामाजिक और पारिवारिक गठबंधन को द्रढ़ता प्रदान करते हैं . भाई बहन बचपन में कितने ही लड़ते रहे हों , बड़े होकर रिश्ते की मिठास को कभी नहीं भूलते . प्रेम और विश्वास की एक मज़बूत डोर से बंधे रहते हैं . अपनी अपनी जिंदगी में कितना ही संघर्षरत क्यों न हों , ख़ुशी और ग़म के अवसर पर सदा साथ रहते हैं . यही पारस्परिक स्नेह और सम्मान हमें पश्चिमी देशों से अलग बनाता है .

माना, विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है
अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है .
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है
वह केवल अपना हिन्दुस्तान है !

सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं .

नोट : इस अवसर पर एक पल उनके लिए भी सोचें जिनका दुनिया में कोई नहीं होता .