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Monday, November 4, 2024

दीवाली, नए रूप में ...

 दीवाली पर्व था मिलने मिलाने का,

खाने पीने, उपहार देने और पाने का। 

किंतु दीवाली अब डिजिटल हो ली है,

उपहार की जगह अब बधाईयों ने ले ली है,

जो प्रत्यक्ष नहीं अब आभासी हो गई हैं। 

व्यक्तिगत नहीं, वो सामूहिक हो गई हैं। 


ना कार्ड ना ई मेल ना एस एम एस करके 

बस वॉट्सएप ग्रुप्स में आती हैं भर भर के।

ग्रुप में पांच दस हों या मेंबर हों सौ पचास कहीं,

बधाई देते हैं सब, पर लेता कोई एक भी नहीं। 

जब कोई नहीं इसको लेता है,

फिर जाने क्यों कौन किसको देता है।


ऐसा हो गया है हाल, 

मानो चरितार्थ हो गई ये कहावत,

कि नेकी कर कुएं में डाल। 

कौन देखता है किसने दी किसने नहीं दी,

किसने देखा और किसने अनदेखी की। 

यह न कोई देखता है, न देखने की जरूरत है,

इस डिजिटल युग में इंसान की यही असली सूरत है। 

Saturday, November 6, 2021

दीवाली का बदलता रूप -


ना मैं कहीं गया, ना कोई मेरे घर आया,

क्या बताऊँ, दीवाली का पर्व कैसे मनाया। 


ना कोई गिफ्ट ना ग्रीटिंग कार्ड ना लैटर,

ना कोई ई मेल ना कोई फोन ही आया।


कभी जाते थे मंत्री और अफसरों के घर, 

अब अपने ही घर बैठ आराम फ़रमाया।   


कभी आते थे सैंकड़ों संदेश मोबाइल पर,

अब एक एस एम एस तक नहीं आया।


पर भरा पड़ा है मोबाइल रंग बिरंगे चित्रों से,

मानो सबने पर्व वाट्सएप्प पर हो मनाया। 


एक एक ने सौ सौ को दी चित्रों सहित बधाई,

सौ सौ ने फिर सौ सौ को सन्देश पहुंचाया।    


दर्ज़नों ग्रुप्स के हज़ारों मित्रों का जज़्बा जब,

आंखें बंद कर देखा तो पागल मन भर आया। 


प्रदूषण और कोरोना ने ऐसा हाल किया "दराल", 

कि क्या बताऊँ, हमने दीवाली पर्व कैसे मनाया। 






Friday, October 26, 2018

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ---



किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई !

तीन तीन नौकरों की मेहनत लगी थी ,
साथ में मशीनों की मशक्कत लगी थी ।
वक्त की पाबन्दी की दिक्कत सच्ची थी ,
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी।

नकली फूलों से धूल की धुलाई मार गई,
कई फालतू सामान की फेंकाई मार गई।
खाली खड़े खड़े टांगों की थकाई मार गई,
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।

वैसे तो हम मोदी जी के भक्त बड़े थे ,
स्वच्छता अभियान के भी पीछे पड़े थे।
पॉलिटिक्स में 'आप' के ना साथ कड़े थे,
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।

डर डर करते लाइट्स की सफाई मार गई,
गमलों में सूखे पौधों की छंटाई मार गई।
घर भर के साफ पर्दों की धुलाई मार गई ,
नौकर बनाके हमें आपकी भौजाई मार गई।

किताबों पे देखा कि काफी धूल चढ़ी थी,
मिली वो चीज़ें जो अर्से से खोई पड़ी थी।
क्या रखें क्या फेंकें ये मुसीबत बड़ी थी ,
उस पर डंडा लेकर हाथ में बीवी खड़ी थी।

वाट्सएप के लेखों की लंबाई मार गई,
आभासी संदेशों की बधाई मार गई ।
दोस्तों के फोन्स की बेरुखाई मार गई ,
जूए में हारे हज़ारों की बुराई मार गई।

दफ्तर में जब हम बड़े अफ़सर होते थे ,
दीवाली पर कमाई के अवसर होते थे ।
जाने अनजाने लोग गिफ्ट्स लाते थे ,
हम भी बॉस और मंत्री जी के घर जाते थे ।

पीछे छूटे गिफ्ट्स की लुटाई मार गई ,
दफ्तर में होते जश्न की जुदाई मार गई।
लोगों से बिछड़े ग़म की तन्हाई मार गई ,
रिटायर होकर दफ्तर से विदाई मार गई।

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ धर्म की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई !

Wednesday, November 2, 2016

दीवाली कैसे मनाएं ताकि प्रदुषण से बच पाएं ---


पिछले एक सप्ताह से हम दीवाली पर ही लिखे जा रहे हैं। बेशक दीवाली एक ऐसा हर्ष उल्लास का पर्व है जिसे छोटे बड़े , गरीब अमीर और हर जाति और धर्म के लोग बड़े शौक और चाव से मनाते हैं। दशहरा से लेकर दीवाली तक बाज़ारों की रौनक , घरों की साफ़ सफाई और लोगों का आपस में मिलना और मिलकर उपहारों का आदान प्रदान जीवन में एक नया उत्साह और स्फूर्ति भर देता है।
दीवाली पर सारा जहाँ रौशन हो जाता है और बहुत खूबसूरत लगता है , भले ही बिजली की लड़ियाँ चाइनीज ही क्यों न हों। आखिर रात भर रंग बिरंगी लाइट्स की रिम झिम देखते ही बनती है। दीये और मोमबत्ती तो पल दो पल की रौशनी देते हैं , फिर अमावस्य का घनघोर अंधकार। इसलिए बिजली से चलने वाली विद्युत शमा से रौशन जहान एक रात के लिए तो ज़न्नत सा ही लगने लगता है।
लेकिन कुछ सही नहीं है तो वो है पटाखों और बमों से होने वाला वायु और ध्वनि प्रदुषण। सब कुछ जानते हुए भी पढ़े लिखे लोग भी स्वार्थ के वशीभूत होकर भावनाओं में बहकर अच्छे बुरे के ज्ञान को भूल जाते हैं और इस धरा को विष धरा बनाने पर तुल जाते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दशहरा की तरह हम दीवाली की आतिशबाज़ी भी निर्दिष्ट स्थान पर सामूहिक रूप से मनाएं। साथ ही इन सभी स्थलों पर बड़े बड़े एयर प्यूरीफायर लगा दें जिससे कि सारा प्रदुषण साथ साथ ही ख़त्म किया जा सके। इस तरह कम लागत में दीवाली पर शारीरिक और मानसिक दीवाला निकलने से बच पाएंगे हम।


Wednesday, October 26, 2016

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ---

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ रक्षा की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई !
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ! -----

तीन तीन नौकरों की मेहनत लगी थी ,
साथ में मशीनों की मशक्कत लगी थी ।
वक्त की पाबन्दी की दिक्कत सच्ची थी ,
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी।
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी। ----

नकली फूलों से धूल की धुलाई मार गई,
कई फालतू सामान की फेंकाई मार गई।
खाली खड़े खड़े टांगों की थकाई मार गई,
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।----

वैसे तो हम मोदी जी के भक्त बड़े थे ,
स्वच्छता अभियान के भी पीछे पड़े थे।
पॉलिटिक्स में 'आप' के ना साथ कड़े थे,
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।----

डर के करते लाइट्स की सफाई मार गई,
गमलों में सूखे पौधों की छंटाई मार गई।
घर भर के साफ पर्दों की धुलाई मार गई ,
अफसर को बनाके नौकर लुगाई मार गई।
अफसर को बनाके नौकर लुगाई मार गई।

किताबों पे देखा कि काफी धूल चढ़ी थी,
मिली वो चीज़ें जो अर्से से खोई पड़ी थी।
क्या रखें क्या फेंकें ये मुसीबत बड़ी थी ,
उस पर डंडा लेकर बीवी सर पर खड़ी थी।
उस पर डंडा लेकर बीवी सर पर खड़ी थी।

अपने लिखे नोट्स की लिखाई मार गई,
वो लव एन्ड बेल्ली की बिकाई मार गई।
अपनी ग्रेज एनेटॉमी से जुदाई मार गई ,
फिर कबाड़ी की तराज़ू की तुलाई मार गई।

बाजारों में नारियों की भीड़ बड़ी थी।
दुकानें भी सामानों से भरी पड़ी थी।
चीनी बहिष्कार की ये शुभ घड़ी थी।
मेड इन इंडिया चेपियों की लगी झड़ी थी।  

वाट्सएप के लेखों की लंबाई मार गई,
आभासी संदेशों की बधाई मार गई ।
दोस्तों के फोन्स की जुदाई मार गई ,
जूए में हारे लाखों की हराई मार गई।

दफ्तर में हम जब बड़े अफ़सर होते थे ,
दीवाली पर कमाई के अवसर होते थे ।
जाने अनजाने लोग गिफ्ट्स लाते थे ,
खुद बॉस और मंत्री जी के घर जाते थे ।

अब बिछड़े गिफ्ट्स की कमाई मार गई ,
दफ्तर में होते जश्न की जुदाई मार गई।  
लोगों से बिछड़े ग़म की तन्हाई मार गई ,
रिटायर होकर दफ्तर से विदाई मार गई।

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ रक्षा की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई !
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई ! -----







Friday, November 1, 2013

दीवाली के मच्छरों पर एक सामाजिक शोध कविता ---


दीवाली पर मच्छरों की भरमार पर प्रस्तुत है एक पूर्व प्रकाशित रचना :




एक दिन हमारी कामवाली बाई
सुबह सुबह घर आते ही बड़बड़ाई ।

बाबूजी, ये द्वार पर कौन मेहमान खड़े हैं ,
हैं तो लाखों करोड़ों, पर सब बेज़ान पड़े हैं ।

ये कहाँ से आते हैं, क्यों आते हैं,
हम तो समझ ही नहीं पाते हैं ।

और इनका नाज़ुक मिजाज़ देखिये ,
रोज रूपये की तरह लुढ़क जाते हैं ।

मैंने कहा बेटा, ये बिन बुलाये मेहमान जो बेज़ान हो गए हैं,
ये स्वतंत्र भारत के वो नागरिक हैं जो अपनी पहचान खो गए हैं ।

इनका तो जन्म लेना भी कुदरत की बड़ी माया है ।
क्योंकि इनके लघु जीवन पर प्रदूषण की पड़ी छाया है ।

प्रदुषण से परिवर्तित इनका अस्तित्त्व हो गया है ।
इसीलिए नेताओं की तरह इनका भी व्यक्तित्व खो गया है ।

उस दिन शाम रौशन होते ही वो फिर आ गए ।
दीवाने परवाने से हर विद्धुत शमा पर छा गए ।

मैंने पूछा -- आप कौन हैं
कहाँ से आए हैं, और क्यों आए हैं ?

उनमे से एक जो ज्यादा ख़बरदार था,
शायद उस झुण्ड का सरदार था ।

बोला --हम उत्तर भारत से आए हैं,
रोजी रोटी की तलाश में, दिल्ली के आसरे ।

हमने कहा आइये, आपका स्वागत है,
अरे हम नहीं हैं बेरहम बेशर्म बावरे ।

हम दिल्लीवाले दिल वाले हैं, मेहमान नवाज़ी के साये में पाले हैं ।
तभी तो दिल्ली के द्वार सभी के लिए खुले हैं ।

लेकिन यह तो बताईये, आप रोज रोज क्यों चले आते हैं ?
वो बोला हम तो इंसानी सभ्यता की चकाचौंध से खिंचे चले आते हैं ।

लेकिन इस रौशन दुनिया को
इतना असभ्य और मतलबपरस्त पाते हैं ।

कि जल कर राख ना हो जाये अपनी ही लौ में शमा ,
इसलिए हम तो पतंगा बन, खुद ही पस्त हो जाते हैं ।

देखिये ये जो हमारी खेप अभी उड़कर आई है ।
ये सही में मच्छर नहीं, देश में बढती महंगाई है ।

सामने वाली लाईट पर जो इनकी भरमार है ।
वह दरअसल देश में फैला हुआ भ्रष्टाचार है ।

और जो ज़मीं पर बिखरा इनका सामान है ।
वो असल में इंसान का गिरा हुआ ईमान है ।

अरे हमें मच्छर समझना आपका भ्रम है ।
क्योंकि हम मच्छर नहीं इंसान के बुरे कर्म हैं ।

जिस दिन इंसान में इंसानियत जाग जायेगी !
हमारी ये नस्ल लुप्त हो खुद ही भाग जायेगी !

Monday, November 26, 2012

घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये ---


बहुत समय से हास्य काविता लिखने का समय और विषय नहीं मिल रहा था. हालाँकि दीवाली पर उपहारों के आदान प्रदान पर लिखने का बड़ा मूड था. इस बार अवसर मिल ही गया. आप भी आनंद लीजिये : 


जब भी दीवाली, सर पर चढ़ आती है 
साहब के दिल की, धड़कन बढ़ जाती है।   

जाने इस बार कितनी गिफ्ट्स आयेंगी 
कम रह गई तो घर में, क्या इज्ज़त रह जाएगी।

दीवाली की गिफ्ट्स का फंडा भी सिंपल होता है 
भई यह तो अफसरों का, स्टेटस सिम्बल होता है।   

पिछले साल दीवाली पर हो गया ट्रांसफर
दीवाली  की गिफ्ट,  आधी रह गई घटकर।  

पहले जो लोग तीन तीन पेकेट लेकर आये थे
अब वो तीन महीने से नज़र तक नहीं आये थे।   

लेन देन का तो सारा हिसाब ही खो गया 
ऊपर से पत्नी का भी मूड ख़राब हो गया।   

तुनक कर बोली -- यदि दफ्तर में और टिक जाते 
तो निश्चित ही दस बीस पेकेट, और मिल जाते ।   

गिफ्ट की संख्या रूपये की कीमत सी घट गई 
अज़ी पड़ोसी के आगे अपनी तो नाक ही कट गई।   

आप यहाँ हारे नेता से अकेले पड़े हैं 
पड़ोसी के द्वार पर देखो, दस बन्दे खड़े हैं।   

बाजु वाले शर्मा जी भी बने बैठे हैं शेर 
घर के आगे लगा है, खाली डिब्बों का ढेर।  

सा'ब को अब फिर लग रहा था घाटे का डर
इस बार फिर आ गया था, ट्रांसफर का नंबर।   

मन में ऊंचे नीचे राजसी विचार आने लगे 
सपने में फिर रंग बिरंगे, उपहार आने लगे।    

नए दफ्तर में सा'ब ने शान से मिठाई मंगवाई 
फिर सारे स्टाफ को बुलाकर, शान से दी बधाई।   

सूट बूट पहनकर बैठे लगाकर रेशमी टाई  
पर ताकते रह गए, गिफ्ट एक भी ना आई।   

बैठे रहे अकेले कुर्सी पर लेते हुए जम्हाई  
खाली एस एम् एस पर ही मिलती रही बधाई।    

खीज कर सा'ब ने अपने पी ऐ को डांट लगाई
उसने जब बताया , तो ये बात समझ में आई।

जो कोंट्रेक्टर सप्लायर दफ्तर में चक्कर लगाते थे
वही तो दीवाली पर मोटी मोटी गिफ्ट लेकर आते थे।    

लेकिन अब  बेचारे सारे क़र्ज़ में धंसे पड़े है 
डॉलर के चक्कर में सबके पैसे फंसे पड़े है।  

इनकी सेवाओं का तो हम पर ही क़र्ज़ है 
सर आपका लेने का नहीं , देने का फ़र्ज़ है।

पुरुषों को दवा दारू की दो  घूँट देनी चाहिए 
महिलाओं को लेट आने की, छूट देनी चाहिए।

घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये
खुद भी करिए हमें भी, मनमानी करने दीजिये।

सरकारी नौकर तो बेचारा बेसहारा होता है ,
दफ्तर में बॉस और घर में बीबी का मारा होता है।

यह सुनकर बॉस का दिल भावनाओं से भर आया,
इसलिए सारे स्टॉफ को बुलवाकर लंच  करवाया।


कभी दीवाली पर मिलना, मिलकर बातचीत करना 
और भेंट का आदान प्रदान, दिलों में भरता था प्यार।  
अब घर बैठे ही मोबाईल या नैट पर  करते हैं चैट,  
और दीवाली के उपहार, बन कर रह गए हैं व्यापार।   


नोट : कृपया इसे कवि की कल्पना ही समझें . इसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या अजीवित व्यक्ति या घटना से नहीं है.  

Wednesday, November 14, 2012

दे दनादन -- चाइनीज़ बमों से मारे हिन्दुस्तानी मच्छर !


इस वर्ष दीवाली से ठीक पहले सप्ताहंत आने से दीवाली मनाना थोड़ा आसान रहा .  अक्सर इन दिनों में सडकों और बाज़ारों में  भारी भीड़ रहती है जिससे अक्सर भारी जाम लग जाते हैं।  घंटों जाम में फंसे रह कर जश्न मनाने का जोश ही ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे सारा शहर ही सडकों पर निकल पड़ा हो। 
आइये देखते देखते हैं ,  दीवाली के विविध आयाम :            


शनिवार : को अस्पताल में आधी छुट्टी होती है। 


अस्पताल में स्टाफ  ने कमरों को खूबसूरती से सजाकर रंग जमा दिया। ऊपर लैब का एक दृश्य।





हमारे कार्यालय को भी तबियत से सजाया गया था।
ऐसे में हमने भी स्टाफ के लिए एक छोटी सी पार्टी आयोजित कर सब को खुश कर दिया। यह अलग बात है कि उन्हें बदले में हमारी कविता झेलनी पड़ी। हालाँकि यह एक छोटी सी ही कीमत थी चुकाने के लिए।


रविवार : 


शाम को सी एस ओ आई में दीवाली मेले का आयोजन किया गया था। यहाँ अन्य संसाधनों के अतिरिक्त एक ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया था। दिल्ली के सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक श्री राहत अली खान ने अपनी ग़ज़लों से सबका मन मोह लिया। 




इस बार क्लब को बहुत बढ़िया तरीके से सजाया गया था। हरे भरे लॉन और पार्किंग को खाली कराकर विस्तार से मेले का आयोजन किया गया था। खाना और पीना , दोनों बढ़िया थे। बस पीने के लिए साकी स्वयं ही बनना पड़ा। ( जूस की बात कर रहे हैं )

सोमवार : 

कई दिनों से मॉल जाने की सोच रहे थे। आखिर सोमवार तक सडकों पर यातायात कम हो गया था। इसलिए नोयडा के ग्रेट इण्डिया प्लेस मॉल की सजावट भी देखने लायक थी।  





रंग बिरंगी लाइटों से सजा मॉल ऐसा अहसास दिला रहा था जैसे हम किसी विदेशी मूल में घूम रहे हों।


हालाँकि मॉल में भीड़ भड़क्का बिल्कुल नहीं था।



हमें तो यह सकून ही दे रहा था।


छोटी दीवाली के दिन सोसायटी में भोज का इंतजाम किया गया था। अड़ोस पड़ोस के सभी पड़ोसियों से एक ही जगह मिलकर दीवाली मुबारक हो गई। फिर देर रात तक बच्चे डी जे पर थिरकते हुए मस्ती करते रहे।


दीवाली : 

सरकार ने 10 बजे के बाद पटाखे न चलने का आह्वान किया था। लेकिन-- इट हेपंस ओनली इन इण्डिया -- यहाँ सरकार की सुनता ही कौन है। रात 8 बजे तक शांति सी महसूस हो रही थी। लगा जैसे दिल्ली वाले समझदार हो गए हैं। लेकिन फिर ऐसा जुनून शुरू हुआ कि 11 बजते बजते चरम सीमा पर पहुँच गया।



हम तो अपनी बालकनी से बस उड़ते हुए धुएं को देखते रहे। ठा ठा ,  धां धां , धड़ाम की आवाज़ों के बीच देखते रहे दूसरों को फूंकते हुए, आराम से कमाए गए हराम के पैसे को . 




लेकिन दीपों और लाइटों से होती हुई जगमगाहट मन को बहुत सुख प्रदान कर रही थी।



वैसे तो दिल्ली के अस्पतालों को पटाखों से जले हुओं के इलाज के लिए पूर्ण रूप से तैयार किया गया था , लेकिन ऐसा होने से बचाना तो डॉक्टर्स के हाथ में नहीं था। कहीं कहीं दुर्घटनाएं भी हुई।




बिल्कुल साफ दिखने वाली सड़क पर अब घना धुआं छा गया था। आखिर यह तो होना ही था।
अफ़सोस तो यह है कि फूलझड़ी और अनार जिन्हें सुरक्षित माना जाता है , वे ही सबसे ज्यादा धुआं छोड़ते हैं।
हालाँकि ध्वनि प्रदूषण होता है चाइनीज़ बमों से।

आखिर हमने दिखा दिया कि हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा धार्मिक प्रवृति के लोग होते हैं। वैसे यदि आप किसी से पूछें कि आप पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं तो शायद ही कोई इसका कारण बता पाए । ज़ाहिर है, सब छोड़ रहे हैं इसलिए हम भी छोड़ रहे हैं। बस यही मॉब मेंटालिटी हमें दूसरों से अलग बनाती है।  


Friday, November 4, 2011

हम मच्छर नहीं इंसान के बुरे कर्म हैं--



पिछले
कुछ वर्षों से दीवाली के आस पास एक अजीबोग़रीब नज़ारा देखने को मिल रहा हैदशहरे और दीवाली के मध्य काल में दिल्ली में लाखों करोड़ों महीन मच्छर लाईट के सामने जाते हैं और सुबह सब के सब ज़मीन पर बिखरे नज़र आते हैंहमारी लिफ्ट के सामने से कम से कम एक डोंगा भर ये मच्छर हम रोज उठाकर फेंकते हैं
लेकिन आश्चर्यज़नक रूप से दीवाली के बाद पूर्ण रूप से गायब हो जाते हैं

इसी पर हमने एक अनुमानित शोध कार्य किया जो प्रस्तुत है एक कविता के रूप में :

)

एक दिन कामवाली बाई
घर आते ही बड़बड़ाई ।

बाबूजी , ये द्वार पर कौन मेहमान खड़े हैं ,
हैं तो लाखों करोड़ों , पर सब बेज़ान पड़े हैं ।

ये कहाँ से और क्यों आते हैं
हम तो समझ नहीं पाते हैं ।

ऊपर से इनका नाज़ुक मिजाज़ देखिये ,
रोज सेंसेक्स की तरह लुढ़क जाते हैं ।

मैंने कहा बेटा , ये बिन बुलाये मेहमान
जो बेज़ान हो गए हैं ,
ये स्वतंत्र भारत के वो नागरिक हैं
जो अपनी पहचान खो गए हैं ।

इनका जन्म लेना भी
कुदरत की बड़ी माया है ।
इनके लघु जीवन पर पड़ी
ग्लोबल वार्मिंग की छाया है ।

ग्लोबल वार्मिंग से इनके जींस में
परिवर्तन हो गया है ।
इसीलिए कुछ नेताओं की तरह इनका भी
अस्तित्त्व ही खो गया है ।

)

उस दिन शाम रंगीन होते ही
वो फिर आ गए ।
दीवाने परवाने से
हर विद्धुत शमा पर छा गए ।

मैंने पूछा --आप कौन हैं
कहाँ से आए हैं , क्यों आए हैं ?

उनमे से एक जो ज्यादा ख़बरदार था
शायद उस झुण्ड का सरदार था ।

बोला --हम उत्तर भारत से आए हैं
रोजी रोटी की तलाश में, दिल्ली के आसरे ।

हमने कहा --आइये, आपका स्वागत है
अरे हम नहीं हैं बेरहम बेशर्म बावरे ।

हम दिल्लीवाले दिल वाले हैं
मेहमान नवाज़ी के साये में पाले हैं ।
तभी तो दिल्ली के द्वार
सभी के लिए खुले हैं ।

लेकिन यह तो बताईये
आप रोज क्यों चले आते हैं ?
वो बोला --हम तो इंसानी सभ्यता की
चकाचौंध से खिंचे चले आते हैं ।

लेकिन इस रौशन दुनिया को
इतना असभ्य और मतलबपरस्त पाते हैं ।

कि कहीं राख न हो जाये जलकर
अपनी ही लौ में शमा ,
इसीलिए पतंगा बन
खुद ही पस्त हो जाते हैं ।

देखिये ये जो हमारी खेप
अभी उड़कर आई है ।
ये मच्छर नहीं,
देश में बढती महंगाई है ।

सामने वाली लाईट पर
जो इनकी भरमार है ।
वह दरअसल देश में
फैला भ्रष्टाचार है ।

और जो ज़मीं पर बिखरा
इनका सामान है ।
वो असल में इंसान का
गिरा हुआ ईमान है ।

हमें मच्छर समझना
आपका भ्रम है ।
क्योंकि हम मच्छर नहीं
इंसान के बुरे कर्म हैं ।


नोट : यह रचना तब लिखी थी जब मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हमले हो रहे थे

Monday, October 31, 2011

ट्रैफिक जाम में फंसे हम बेचैन खड़े थे---

दिल्ली की दीवाली की एक खास बात यह है कि दशहरे के बाद से ही सड़कों पर पुलिस के बैरिकेड लगने शुरू हो जाते हैं । यह सिलसिला तब से ज्यादा हुआ है जब कुछ वर्ष पूर्व दीवाली पर बम धमाकों में कई लोगों की जान चली गई । हालाँकि इससे यातायात में बहुत बाधा पड़ती है और लम्बे जाम लग जाते हैं ।
प्रस्तुत है , ऐसे ही एक जाम में फंसे होकर उत्तपन हुई एक हास्य कविता :


भाग १ :

सड़क पर पुलिस के
बैरिकेड गड़े थे ,
ट्रैफिक जाम में फंसे
हम बेचैन खड़े थे ।

मैंने एक पुलिसवाले से पूछा,
भई कितने आतंकवादी पकड़े ?
वो बोला -एक भी नहीं ,
सुबह से ख़ाली खड़े हैं ठण्ड में अकड़े ।

मैंने कहा तो फिर इसे हटाओ,
क्यों बेकार समय की बर्बादी करते हो ।
वो बोला -चलो थाने,
मुझे तो तुम्ही कोई आतंकवादी लगते हो ।

मैंने कहा --थाने क्यों चलूँ ,मैंने क्या जुर्म किया है ?
वो बोला -नहीं किया तो करो,मैंने कब मना किया है ।
पर जुर्माना तो देना पड़ेगा ,
तुमने इक पुलिसवाले का वक्त घणा लिया है ।

अरे यदि तुमने मुझे
बातों में ना जकड लिया होता ,
तो अब तक मैंने एक आध
आतंकवादी तो ज़रूर पकड़ लिया होता ।

अब कैसे करूँगा मैं
परिवार का भरण पोषण
जब आतंकवादी ही न मिला
तो कैसे मिलेगा आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन ।

अच्छा मोबाईल पर बात करने का
निकालो एक हज़ार रूपये जुर्माना ।
मैंने कहा -मेरे पास तो मोबाईल है ही नहीं
मैं तो ऍफ़ एम् पर गुनगुना रहा था गाना ।

तो फिर आपने गाड़ी
पचास के ऊपर क्यों चलाई ?
मैंने कहा -ये खटारा ८६ मोडल
चालीस के ऊपर चलती ही कहाँ है भाई ।

रेडलाईट के १०० मीटर के अन्दर
हॉर्न तो ज़रूर बजाया होगा ।
मैंने कहा -हॉर्न तो तब बजाता
जब हॉर्न कभी लगवाया होता ।

फिर तो चलान कटेगा
गाड़ी में हॉर्न ही नहीं है ,
मैंने कहा --सामने से हट जाओ
इसमें ब्रेक भी नहीं है ।

फिर बोला - आपकी गाड़ी के शीशे
ज़रुरत से ज्यादा काले हैं ।
मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा ज़नाब
आप भी इन्स्पेक्टर बड़े निराले हैं ।

ज़रा आँखों से काला चश्मा हटाओ
और आसमान की ओर नज़र घुमाओ।
अरे यह तो कुदरत की माया है
काले शीशे नहीं , शीशे में काले बादलों की छाया है ।

थक हार कर वो बोला
अच्छा कम्प्रोमाइज कर लेते हैं ।
चलो सौ रूपये निकालो
जुर्माना डाउनसाइज कर देते हैं ।

पर सौ रूपये किस बात के
यह बात समझ नहीं आई ?
वो बोला दिवाली का दिन है
अब कुछ तो शर्म करो भाई ।

अरे घर से बार बार
फोन करती है घरवाली।
दो दिन से यहाँ पड़े हैं
हमें भी तो मनानी है दिवाली ।

मैंने कहा -यह बात थी तो
हमारे अस्पताल चले आते ।
और हम से दो चार दिन का
नकली मेडिकल ले जाते ।

यह कह कर तो मैंने उसका
गुस्सा और जगा दिया ।
वो बोला मैं गया था
लेकिन आपके सी एम् ओ ने भगा दिया ।

और अब जो खाई है कसम
वो कसम नहीं तोडूंगा।
और मां कसम उस अस्पताल के
डॉक्टर को नहीं छोडूंगा ।

और जब मुक्ति की
कोई युक्ति समझ न आई ।
तो अगले साल का प्रोमिस
देकर ही जान छुड़ाई ।

भाग -२ :

अगले दिन मैं घर से
बिना सीट बेल्ट बांधे ही निकल पड़ा था ।
वो पुलिसवाला उसी जगह
उसी चौराहे पर मुस्तैद खड़ा था ।

पर उस दिन वो पस्त था
अपनी धुन में मस्त था ।
उसने मुझे न टोका
न सामने आकर रोका ।

क्योंकि भले ही कोई
आतंकवादी न मिला हो
इस वर्ष दिवाली पर
कोई बम नहीं फूटा ।

हमारे पुलिस वाले कितनी विषम
परिस्थितियों में काम करते हैं ।
इसके लिए हम इनको
कोटि कोटि सलाम करते हैं ।

Thursday, October 27, 2011

जिंदगी के सफ़र के साथ दीवाली का बदलता स्वरुप ---

एक और दीवाली आकर चली गई एक बार फिर हमने वायु और ध्वनि प्रदूषण से परिपूर्ण बड़े उत्साह से दीवाली का जश्न मनाया

लेकिन दीवाली हमेशा ऐसी थी

आज शांति के साथ बैठकर जब हमने दीवाली मनाई तो बचपन की बहुत याद आई ।
आईये देखते हैं , किस तरह बदलता रहा दीवाली का स्वरुप हमारी जिंदगी के सफ़र के साथ ।

१९६०-१९७०

बचपन में गाँव में दीवाली पर हम मशाल जलाते थे । घरों की छतों पर घी के दिए जलाये जाते थे जो तेज हवा की वज़ह से थोड़ी देर में ही बुझ जाते थे । कभी कभार मोमबत्तियां भी जलाई जाती थी ।
लेकिन पटाखे होते थे , मिठाई
कोई उपहार लेने देने की रिवाज़ भी नहीं थीयह शायद संसाधनों की कमी के कारण रहा होगा

गाँव में हमारे दादाजी हर वर्ष दीवाली पर खील बांटते थे । बाज़ार से एक बोरा भर कर लाया जाता था जो इतना बड़ा होता था कि यदि उसमे गेहूं भरे होते तो कम से कम तीन क्विंटल आ जाते ।
फिर दीवाली के दिन सारे गाँव को आमंत्रित किया जाता और दादाजी अपने हाथों से सबको खील बांटते ।
एक वर्ष खील न मिलने से केले बांटे गए । इतने बड़े केले मैंने जिंदगी में फिर कभी नहीं देखे ।

१९७०-१९८०

इस बीच हम शहर आ गए । यहाँ दीवाली पर पटाखे छोड़े जाते थे । मिठाई के नाम पर मिक्स मिठाई की बड़ी रिवाज़ थी । आस पड़ोस में सब एक दूसरे को एक थाली में कुछ खील और कुछ मिठाई के पीस डालकर, पूजा के प्रसाद के रूप में आदान प्रदान करते थे ।

सभी घरों से लगभग एक जैसा प्रसाद होता था । बड़ा अज़ीब लगता था । क्योंकि अक्सर सबसे घटिया और सस्ती मिठाई को ही दिया जाता था ।
हमारे घर में कोई लड़की या छोटा बच्चा न होने से प्रसाद लौटाने में बड़ी दिक्कत आती थी । यह काम कोई नहीं करना चाहता ।

दीवाली पर जगमगाहट करने के लिए मोमबत्तियां खूब जलाई जाती थी ।
साथ ही ज़ीरो वाट के बल्बों की लड़ी बनाकर लगाते तो रंगत आ जाती ।

१९८० -२०००

इस दौरान हम भी जॉब में सेटल हो गए थे । बाल बच्चे भी हो गए थे । यार दोस्त और सामाजिक सम्बन्ध भी बन गए थे । अत: अब पटाखों के साथ बिजली की तरह तरह की लड़ियाँ लगाकर घर को खूब सजाया जाने लगा ।
मिठाई के साथ अब उपहारों का आदान प्रदान शुरू हुआ । मित्र लोग गिफ्ट लेकर आते और हम बदले की गिफ्ट लेकर उनके घर जाते । अक्सर यह देखा जाता कि जो जितने की गिफ्ट लाया , उसको उतने की गिफ्ट तो दी ही जाए ।

कुछ सालों में रंग बिरंगी फालतू की गिफ्ट्स से घर भर गयाअब यह तय करना मुश्किल होने लगा कि गिफ्ट में क्या दिया जाए

और एक दिन गिफ्ट्स का यह आदान प्रदान एक बोझ सा लगने लगा ।
बहुत से लोगों से बस एक ही दिन का मिलना रह गया तो लगा कि यह क्या बकवास है ।
सब तरह की वाहियात वस्तुएं दीवाली पर आसानी से बिक जाती थी । और घर में किसी काम नहीं आती थी ।

इस बीच मिठाइयों का लेन देन कम हो चुका थाउसकी गह ड्राई फ्रूट्स ने ले ली थी

२०००-२०१०

इन दिनों में चाइनीज बम और पटाखों ने बाज़ार पर आधिपत्य कर लिया था । वायु में प्रदूषण बढ़ने लगा था ।
लेन देन में मिठाई आउट हो चुकी थी । ड्राई फ्रूट्स का बोल बाला रहा साथ ही दो दो तीन तीन गिफ्ट एक साथ देने की रिवाज़ चल पड़ी । ज़ाहिर है , सम्पन्नता की छाप दीवाली पर दिखाई देने लगी ।

लेकिन दीवाली पर बढ़ते ट्रैफिक और उससे होने वाले जाम में फंसकर घंटों बर्बाद होते । आना जाना मुश्किल होने लगा । रस्मे रिवाजें निभाना अब बड़ा सर दर्द बन गया था ।

ऐसे में धीरे धीरे हमने लेन देन बंद करना शुरू किया । शुरू में बड़ा अटपटा लगता था किसी से गिफ्ट लेकर रखना और वापसी में न लौटाना । लेकिन और कोई रास्ता नहीं बचा था ।
इसलिए दो तीन साल में सब लेन देन बंद कर दिया ।

अब बड़ा अफसर होने के नाते कोई गिफ्ट ले ही आए तो क्या करेंवर्ना हमने तो दीवाली पर आराम से शांति (रेखा ) के साथ घर पर बैठना शुरू कर दिया है


२०११--

और इस वर्ष फैसला किया है कि अब से दीवाली पर सारी फ़िज़ूलखर्ची बंद ।
अब बस घर की साफ सफाई के साथ रौशनी से सजाया जायेगा और रंगोली बनाकर , शाम को पूजा के साथ लक्ष्मी जी की आराधना कर दीवाली सम्पूर्ण होगी ।

लेकिन सोसायटी के सभी कर्मचारियों की बख्शीश दुगनी कर दी है ताकि किसी ज़रूरतमंद के काम आए और उसे भी दीवाली आने की ख़ुशी हो ।

सभी मित्रों को फोन , एस एम् एस , ई-मेल और ब्लॉग द्वारा मुबारकवाद तो दे ही दी जाती है । आखिर ज़माना भी तो हाई टेक हो गया है ना ।

नोट : दीवाली के बदलते स्वरुप पर आप क्या सोचते हैं , बताइयेगा ज़रूर

Monday, October 24, 2011

दीवाली और घरवाली ने मिलकर सारी अफ़सरी उतार दी --

हमारे एक पडोसी मित्र दिल्ली सरकार में उच्च पद पर आसीन हैं । एक दिन उनकी पत्नी को दिल में धड़कन बढ़ने लगी और बेचैनी होने लगी । हमने उनका मुआयना किया और सलाह दी कि तुरंत अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए ।
हमारे सुझाव पर उन्हें दिल्ली के एक पुराने नामी अस्पताल में हमारे ही मित्र कार्डियोलोजिस्ट की देख रेख में भर्ती करा दिया गया । डॉक्टर ने तुरंत उन्हें सी सी यू में भर्ती कर लिया ।

अगले दिन हम उनसे मिलने पहुंचे । पूछा--क्या हाल है ? बोले--भैया, मेडम तो सी सी यू में बेड पर लेटी हैं और हमने सारी रात यहाँ कॉरिडोर में बेंच पर बैठ कर बिता दी ।

डॉक्टर ने आज हमारी सारी अफ़सरी निकाल दी

इस वर्ष दीवाली पर हमारा भी कुछ यही हाल हुआ ।
हुआ यूँ कि श्रीमती जी ने जिद्द पकड़ ली कि इस बार तो घर में डेंटिंग पेंटिंग करा कर रहेंगे । हमें भी उनकी जिद्द के आगे झुकना पड़ा ।
अच्छे भले साफ सुथरे घर को सौंप दिया गया पेंटरों को । और पूरा सप्ताह निकल गया लेकिन उन्होंने निकलने का नाम नहीं लिया ।

पूरे एक सप्ताह घर का और हमारा जो हाल रहा , उसे देखकर हमें भी यही लगा --
इस वर्ष दीवाली और घरवाली ने मिलकर हमारी भी सारी अफ़सरी उतार दी


हालाँकि कुछ सीखने को भी मिला


चमचमाते मकान में भी कुछ कोने , क्षेत्र और जगहें ऐसे होते हैं जहाँ धूल, कूड़ा करकट और मैल छुपा रहता है

दीवाली के बहाने वहां की भी सफाई हो जाती है


कभी कभी सोचता हूँ --घर का छुपा मैल तो हम निकाल लेते हैं , दीवाली पर

लेकिन हमारे मन और मष्तिष्क में जो मैल छुपा है ना -- ईर्ष्या और द्वेष का , काम और क्रोध का , लोभ और मोह का --उसे कब और कैसे निकालेंगे ?

Sunday, November 7, 2010

दीवाली के आफ्टर इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स---

यह दीवाली भी चली गई और रह गए दीवाली के आफ्टर इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स

उपहार :

* दफ्तर के बड़े बाबू का हुआ बड़ा खराब मूढ़ दीवाली पर।
दीवाली से एक महीना पहले फर्टाइल सीट से हो गया ट्रांसफर

दीवाली के उपहारों की संख्या १०% रह गई घटकर


* दीवाली गिफ्ट्स का हाल भी ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणियों जैसा होता है ।
एक हाथ दे , एक हाथ ले

* जो माल कभी नहीं बिकता , वो दीवाली पर आसानी से निकल जाता है ।
बस पैकेजिंग सुन्दर होनी चाहिए ।


* दीवाली गिफ्ट्स तभी तक सुन्दर लगती हैं , जब तक पेपर में लिपटी रहती हैं ।
उसके बाद खोदा पहाड़ , निकला चूहा ।

बधाईयाँ :

पहले देते थे लोग बधाईयाँ मिलकर
अब बनाकर भेज देते हैं मोबाइल पर
ग्रुप एस एम् एस ।


दीवाली पर जगमगाहट :

दीवाली से पहले

दीवाली की सुहानी संध्या

दीवाली के बाद

दीवाली से अगले दिन की वीरानी भोर

जाने कितनी सांसें समय से पहले ही थम जाएँगी
जब साफ़ हवा में सांस ले सकें
वो सुबह जाने कब आएगी ?

क्यों नहीं मना सकते
हम दीवाली बिना शोर शराबा और प्रदूषण के ?


कुछ इस तरह ।

आखिर लक्ष्मी जी को भी तो यही पसंद है ।


Wednesday, November 3, 2010

दीवाली और आज के रावण के दस रूप ---

एक बार फिर दीवाली पास आ गई है । वातावरण में पर्व का उत्साह दिखाई दे रहा है । लेकिन साथ ही जगह जगह पुलिस के बैरिकेड इस बात का अहसास दिला रहे हैं कि पांच साल पहले जो हादसा हुआ था दीवाली पर , वह फिर न हो जाए । उधर दिल्ली की मुख्य मंत्री महोदया ने फिर दिल्ली वालों से अपील की है कि दीवाली बिना पटाखों के मनाएं, ताकि इससे होने वाले शोर और प्रदूषण से बचा जा सके ।

इस अवसर पर लिखी एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

रावण वध कर विजयी भव , जब श्री राम अयोध्या आए थे ,
अधर्म पर धर्म की जीत पर, तब सबने घी के दीप जलाये थे

दीवाली का पर्व अब हो गया है धुआं धुआं ,
खोये का स्वाद भी खो गया है जाने कहाँ ,
नहीं लगती अब पटाखों की आवाज़ मधुर
जब से धमाकों में घुली है, चीख पुकार यहाँ

अब बदल गया है पर्व ये , दीवाली का पावन ,
तब कण कण में थे राम , अब जन जन में है रावण

और कौन हैं ये रावण ?

काम, क्रोध, मद , लोभ, में डूबी गहन आबादी ,
महंगाई , प्रदूषण और भ्रष्टाचार की बर्बादी ,
मासूमों का खून बहाते आतंकवादी ,
धर्म , प्रान्त और जात पात पर विष पिलाते अवसरवादी

पावन मात्रभूमि को जिसने किया कुरूप ,
यही हैं वो आज के रावण के दस रूप

किन्तु रावण भी हम हैं , और हमीं हैं राम ,
जो अंतररावण को मारे , वही कहलाए श्री राम

आइये आज यह संकल्प लें कि हम इस वर्ष भी दीवाली बिना पटाखों के मनाएंगे ताकि अपना शहर ध्वनि और वायु प्रदूषण से बचा रहे

ताकि अस्थमा और दिल के रोगी सकून से रह सकें और पूर्णतया स्वस्थ लोग भी स्वस्थ रह सकें


आप सब को दीवाली की हार्दिक शुभकामनायें