एक और दीवाली आकर चली गई । एक बार फिर हमने वायु और ध्वनि प्रदूषण से परिपूर्ण बड़े उत्साह से दीवाली का जश्न मनाया । लेकिन दीवाली हमेशा ऐसी न थी । आज शांति के साथ बैठकर जब हमने दीवाली मनाई तो बचपन की बहुत याद आई ।
आईये देखते हैं , किस तरह बदलता रहा दीवाली का स्वरुप हमारी जिंदगी के सफ़र के साथ ।
१९६०-१९७० बचपन में गाँव में दीवाली पर हम
मशाल जलाते थे । घरों की छतों पर घी के दिए जलाये जाते थे जो तेज हवा की वज़ह से थोड़ी देर में ही बुझ जाते थे । कभी कभार मोमबत्तियां भी जलाई जाती थी ।
लेकिन न पटाखे होते थे , न मिठाई । कोई उपहार लेने देने की रिवाज़ भी नहीं थी । यह शायद संसाधनों की कमी के कारण रहा होगा । गाँव में हमारे दादाजी हर वर्ष दीवाली पर
खील बांटते थे । बाज़ार से एक बोरा भर कर लाया जाता था जो इतना बड़ा होता था कि यदि उसमे गेहूं भरे होते तो कम से कम तीन क्विंटल आ जाते ।
फिर दीवाली के दिन सारे गाँव को आमंत्रित किया जाता और दादा
जी अपने हाथों से सबको खील बांटते ।
एक वर्ष खील न मिलने से केले बांटे गए । इतने बड़े केले मैंने जिंदगी में फिर कभी नहीं देखे ।
१९७०-१९८० इस बीच हम शहर आ गए । यहाँ दीवाली पर पटाखे छोड़े जाते थे । मिठाई के नाम पर
मिक्स मिठाई की बड़ी रिवाज़ थी । आस पड़ोस में सब एक दूसरे को एक थाली में कुछ खील और कुछ मिठाई के पीस डालकर, पूजा के प्रसाद के रूप में आदान प्रदान करते थे ।
सभी घरों से लगभग एक जैसा प्रसाद होता था । बड़ा अज़ीब लगता था । क्योंकि अक्सर सबसे घटिया और सस्ती मिठाई को ही दिया जाता था ।
हमारे घर में कोई लड़की या छोटा बच्चा न होने से प्रसाद लौटाने में बड़ी दिक्कत आती थी । यह काम कोई नहीं करना चाहता ।
दीवाली पर जगमगाहट करने के लिए मोमबत्तियां खूब जलाई जाती थी ।
साथ ही ज़ीरो वाट के बल्बों की लड़ी बनाकर लगाते तो रंगत आ
जाती ।
१९८० -२००० इस दौरान हम भी जॉब में सेटल हो गए थे । बाल बच्चे भी हो गए थे । यार दोस्त और सामाजिक सम्बन्ध भी बन गए थे । अत: अब पटाखों के साथ बिजली की तरह तरह की लड़ि
याँ लगाकर घर को खूब सजाया जाने लगा ।
मिठाई के साथ अब उपहारों का आदान प्रदान शुरू हुआ । मित्र लोग गिफ्ट लेकर आते और हम बदले की गिफ्ट लेकर उनके घर जाते । अक्सर यह देखा जाता कि जो जितने की गिफ्ट लाया , उसको उतने की गिफ्ट तो दी ही जाए ।
कुछ सालों में रंग बिरंगी फालतू की गिफ्ट्स से घर भर गया । अब यह तय करना मुश्किल होने लगा कि गिफ्ट में क्या दिया जाए । और एक दिन गिफ्ट्स का यह आदान प्रदान एक बोझ सा लगने लगा ।
बहुत से लोगों से बस एक ही दिन का मिलना रह गया तो लगा
कि यह क्या बकवास है ।
सब तरह की वाहियात वस्तुएं दीवाली पर आसानी से बिक जाती थी । और घर में किसी काम नहीं आती थी ।
इस बीच मिठाइयों का लेन देन कम हो चुका था । उसकी जगह ड्राई फ्रूट्स ने ले ली थी । २०००-२०१० इन दिनों में
चाइनीज बम और पटाखों ने बाज़ार पर आधिपत्य कर लिया था । वायु में प्रदूषण बढ़ने लगा था ।
लेन देन में मिठाई आउट हो चुकी थी । ड्राई फ्रूट्स का बोल बाला रहा
। साथ ही दो दो तीन तीन गिफ्ट एक साथ देने की रिवाज़ चल पड़ी । ज़ाहिर है , सम्पन्नता की छाप दीवाली पर दिखाई देने लगी ।
लेकिन दीवाली पर बढ़ते ट्रैफिक और उससे होने वाले जाम में फंसकर घंटों बर्बाद होते । आना जाना मुश्किल होने लगा । रस्मे रिवाजें निभाना अब बड़ा सर दर्द बन गया था ।
ऐसे में धीरे धीरे हमने लेन देन बंद करना शुरू किया । शुरू में बड़ा अटपटा लगता था किसी से गिफ्ट लेकर रखना और वापसी में न लौटाना । लेकिन और कोई रास्ता नहीं बचा था ।
इसलिए दो तीन साल में सब लेन देन बंद कर दिया ।
अब बड़ा अफसर होने के नाते कोई गिफ्ट ले ही आए तो क्या करें । वर्ना हमने तो दीवाली पर आराम से शांति (रेखा ) के साथ घर पर बैठना शुरू कर दिया है ।
२०११-- और इस वर्ष फैसला किया है कि अब से दीवाली पर सारी फ़िज़ूलखर्ची बंद ।
अब बस घर की साफ सफाई के साथ रौशनी से सजाया जायेगा और रंगोली बनाकर , शाम को पूजा के साथ लक्ष्मी जी की आराधना कर दीवाली सम्पूर्ण होगी ।
लेकिन सोसायटी के सभी कर्मचारियों की बख्शीश दुगनी कर दी है ताकि किसी ज़रूरतमंद के काम आए और उसे भी दीवाली आने की ख़ुशी हो ।
सभी मित्रों को फोन , एस एम् एस , ई-मेल और ब्लॉग द्वारा मुबारकवाद तो दे ही दी जाती है । आखिर ज़माना भी तो हाई टेक हो गया है ना ।
नोट : दीवाली के बदलते स्वरुप पर आप क्या सोचते हैं , बताइयेगा ज़रूर ।