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Wednesday, July 30, 2025

एक शहर की सड़कें ...

एक साल में तीन चुनाव,

हर चुनाव में जागती एक उम्मीद।

कि तीन सालों से टूटी सड़कें,

अब तो सज संवर ही जाएंगी।


चंबल के बीहड़ों सी ऊबड़ खाबड़,

बारिशों में बरसाती नाला बनी सड़कें,

सावन आने से दस दिन पहले,

आखिर संवर ही गईं,

बिटुमन की काली चादर ओढ़कर।


ठेकेदार अब रोज मंदिर जाता है,

प्रसाद चढ़ाकर दुआ मांगता है,

पेमेंट होने तक सड़क की सलामती की।

आखिर अगले ही दिन,

सड़क की सतह पर उभर आईं थीं रोड़ियां।


दुनिया में परमानेंट कुछ भी नहीं,

फिर ये तो बेचारी इमरजेंसी सड़क है,

भ्रष्ट अफसरों द्वारा बनाई गई,

भ्रष्ट नेताओं की लाज रखने के लिए। 

Wednesday, March 15, 2017

इस शहर के लोग ---


लोग पैट पालने का शौक तो पाल लिया करते हैं ,
लेकिन पैट का पेट फुटपाथ पर साफ़ कराते हैं जिस पर खुद चला करते हैं।
फिर कहीं पैर में पैट का पेट त्याग न लग जाये ,
इस डर से इस शहर में लोग सर उठाकर नहीं , सर झुकाकर चला करते हैं।

लोग गऊ को गौ माता तो कह कर बुलाया करते हैं ,
लेकिन कूड़ा कचरा खाने को उन्हें सडकों पर आवारा छोड़ दिया करते हैं।
फिर कहीं पावन गोबर में गाड़ी के टायर न सन्न जाएँ ,
इस डर से इस शहर में लोग सडकों पर गाड़ी जिग जैग चलाया करते हैं।

लोग जंक फ़ूड खाने का शौक तो रख लिया करते हैं ,
लेकिन प्लास्टिक के रैपर और खाली बोतल सड़क पर ही फेंक दिया करते हैं।
फिर गंदगी से कहीं महामारी न फ़ैल जाये ,
इस डर से नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को ही सारा दोष दिया करते हैं।

लोग बड़ी बड़ी गाड़ियां तो सडकों पर चलाया करते हैं ,
लेकिन बेतरतीब चलाते ट्रैफिक के नियमों का पालन नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं ज़रा सा छूने पर इज़्ज़त न चली जाये ,
इस डर से इस शहर के लोग रोड रेज़ में मरने मारने पर उतर आया करते हैं।

लोग बड़े बड़े मंचों पर बड़ी बड़ी बातें तो बनाया करते हैं ,
लेकिन मुसीबत में फंसे किसी मुसीबत के मारे की मदद नहीं किया करते हैं।
फिर कहीं कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्कर में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग अक्सर नज़र बचाकर निकल जाया करते हैं।  

लोग बेटी बचाओ आंदोलन तो चलाया करते हैं ,
लेकिन बेटे की चाहत में अजन्मे बच्चे का लिंग परिक्षण कराया करते हैं।
फिर कहीं स्वास्थ्य विभाग की नज़र में न आ जायें ,
इस डर से इस शहर के लोग चोरी चुपके से गर्भपात भी कराया करते हैं।

इस शहर के लोग मौज मस्ती से जीया करते हैं ,
लेकिन इनकम टैक्स , सेल्स टैक्स और वैट की चोरी किया करते हैं।
फिर कहीं इनकम टैक्स विभाग की जाँच में न फंस जाएँ ,
इस डर से इस शहर के लोग बात बात पर रिश्वत लिया दिया करते हैं।



Saturday, February 8, 2014

शहर की शादियों में संवेदनहीनता ---


अभी तक हमें यही अहसास परेशान कर रहा था कि आजकल लोग शादी का कार्ड तो कुरियर से भेज देते हैं लेकिन स्वयं व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित नहीं करते।  ऐसे में मेहमान के लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है यह निर्णय लेने में कि जाया जाये या नहीं। लेकिन हाल ही में एक ऐसा  अनुभव हुआ जिसे देख कर शादियों के बारे में गम्भीरता से सोचने पर मज़बूर होना पड़ा।

हुआ यूँ कि एक मित्र सपत्नीक निमंत्रण देने आए और जोर देकर शामिल होने का आग्रह किया।  साथ में एक डिब्बा तथाकथित मिठाई भी दे गए। पुराने मित्र थे , इसलिए न जाने का कोई कारण ही नहीं था। हालाँकि घर से दूर था लेकिन समय बहुत उपयुक्त लगा।  पूरा  विवरण कुछ इस प्रकार रहा :

कार्ड पर लिखा था :

बारात असेम्बली -- शाम ६ बजे
विवाहस्थल के लिए प्रस्थान --- ७ बजे
दूरी --- २०० मीटर

घर से दूरी ---- २५ -३० किलोमीटर शहर के बीच
समय लगा --- २ घंटे
असेम्बली पॉइंट --- पौने दस बजे -- कोई नहीं मिला
विवाहस्थल पर --- रात दस बजे -- न दूल्हा , न घरवाले
साढ़े दस बजे -- दूल्हा गेट पर
रात ग्यारह बजे -- दूल्हा प्रवेश

रात ग्यारह बजे दूल्हे के प्रवेश के साथ खाना खोल दिया गया।  इस बीच मेट्रो से आने वाले बाराती प्रस्थान कर चुके थे , चाट पकोड़ी खाकर।  ज़ाहिर है , लिफाफा भी उनकी ज़ेब में ही रह गया।  अब हो सकता है कि अगले दिन घर जाकर देना पड़े।  हमने भी कुछ छुट पुट खाकर ठंडा पीया और इंतज़ार करते रहे कि कोई घरवाला दिखे तो लिफाफा सौंपें और घर का रास्ता नापें जिसमे फिर एक घंटा लगना निश्चित था और अगले दिन फिर ऑफिस जाना भी आवश्यक था।  आखिर मित्र के बेटे की शादी की ख़ुशी में सरकारी अवकाश होने की सम्भावना तो निश्चित ही नहीं थी।

बारात तो सारी की सारी पहले ही अंदर थी।  दुल्हे के साथ थी तो बस एक घोड़ी , दो चार रिश्तेदार और बाकि बैंड वाले।  लेकिन इन्ही चार रिश्तेदारों ने सड़क पर चक्का जाम कर सब का खाना ख़राब कर रखा था।  सर्दी में भी पसीना बहाते हुए ये जाँबाज़ गेट के बाहर ही आधे घंटे तक ऐसे डटे रहे जैसे लोंगोवाल की लड़ाई में हमारे रण बांकुरे अपनी जान की परवाह किये बगैर जमे रहे थे। हमने भी मित्र को उस भीड़ में ढूंढ निकाला और बड़ी आत्मीयता से बधाई देने लगे।  लेकिन मित्र न जाने किस पिनक में थे कि लगा जैसे पहचाना ही न हो।  वैसे भी हमें तो नाचने का शौक कभी नहीं रहा , इसलिए वहां से हटकर मिष्ठान खाने के लिए आगे बढ़ लिए।

लेकिन इस रिहाई से पहले एक अत्यंत आवश्यक काम भी करना था , लिफाफा सौंपने का।  अक्सर यह काम हमें सबसे कठिन काम लगता है।  एक तो वैसे ही लिफाफा देते हुए अज़ीब सा लगता है।  ऊपर से लेते हुए मेज़बान के  नखरे देखकर तो ऐसा महसूस होता है जैसे हम कोई गुनाह कर रहे हों। लेकिन इस महत्त्वपूर्ण कार्य करने के बाद ऐसा रिलीफ मिलता है जैसे सर से कोई बोझ उतर गया हो।  फिर भी हमने देखा है कि अक्सर लिफाफा देने वालों की भीड़ सी लग जाती है और पहले मैं पहले मैं की  नौबत सी आ जाती है।

आखिर उस दिन भी सफलतापूर्वक लिफाफा विसर्जन के बाद जब हमने प्रस्थान करने की सोची तो पत्नी श्री की फरमाइश आई कि अरे हमने दूल्हा दुल्हन को तो देखा ही नहीं। हमने श्रीमती जी को लगभग खींचते हुए अपनी एक कविता सुनाते हुए गाडी में बिठाया और ड्राइवर को कहा कि चलो , हो गई शादी :

इस भीड़ भाड़ में कौन है अपना कौन पराया
किसने निमंत्रण स्वीकारा,  कौन नहीं आया !

दूल्हा कैसा दिखता है, दुल्हन की कैसी सूरत है
यह न कोई देखता है , न देखने की ज़रुरत है !

आजकल मेहमानों को दूल्हा दुल्हन से प्यारा होता है खाना
और मेज़बानों को सम्बन्धियों से ज्यादा प्यारा नाच गाना !

इसी अफ़साने की शिकार प्रेम संबंधीं की ख्वाहिश हो गई है ,
और शादियां आजकल काले धन की बेख़ौफ़ नुमाइश हो गई हैं !



Saturday, January 29, 2011

यहाँ हैल्थ की मज़बूरी है, वहां वैल्थ की मज़बूरी है--



हमारे देश की ७१ % जनता गाँव में रहती है । करीब ३८ % गरीबी की रेखा से नीचे रहते हैं ।
शहर और गाँव के , अमीरों और गरीबों के जीवन में कितना अंतर होता है और कितनी समानताएं होती हैं , यह वही जान सकता है जिसने दोनों ही जिंदगियों को करीब से देखा हो ।

प्रस्तुत है ऐसी ही एक रचना जो आपको रूबरू कराएगी जीवन की विषमताओं से ।


सूखी
रोटी ये भी खाते हैं , वे भी खाते हैं।
डाइटिंग ये भी करते हैं , वे भी करते हैं।
जो डाइटिंग अमीरों का शौक है ,
वही गरीबों के जीवन का खौफ है।

मज़बूरी
यहाँ भी हैं, मज़बूरी वहां भी है।
यहाँ हैल्थ की मज़बूरी है, वहां वैल्थ की मज़बूरी है ।
मक्की सरसों गाँव में हालात की बेबसी दर्शाता है ।
वही शहर के आलिशान रेस्तरां में डेलिकेसी कहलाता है ।
जई की जो फसल गाँव में , पशुओं को खिलाई जाती है
वही शहर में ओट मील बनके, ऑस्ट्रेलिया से मंगाई जाती है ।

फटे कपडे विलेजर्स का तन ढकने का , एकमात्र साधन है
कपडे फाड़कर पहनना , शहर के टीनेजर्स का लेटेस्ट फैशन है ।

यहाँ सिक्स पैक एब्स के लिए रात भर ट्रेड मिल पर पसीना बहाते हैं
वहां किसानों के एब्स मेहनत के पसीने से खुद ही उभर आते हैं।
मज़बूर ये भी हैं , मज़बूर वे भी हैं
यहाँ हैल्थ की मज़बूरी है, वहां वैल्थ की मज़बूरी है।



वहां मूंह अँधेरे जाते हैं , जोहड़ जंगल
यहाँ घर में ही कक्ष का आराम है ।

वहां काम पर जाते हैं , पैदल चलकर
यहाँ पैदल चलना भी एक काम है।
गाँव की उन्मुक्त हवा में , किसानों के ठहाके गूंजते हैं
यहाँ हंसने के लिए भी लोग, लाफ्टर क्लब ढूंढते हैं।
वहां पीपल की शीतल छाँव से मंद मंद पुरवाई का मेल
यहाँ एयर की कंडीशन ऐसी कि एयर कंडिशनर भी फेल।

जो किसान अन्न उगाता है , एक दिन धंस जाता है
रोटी की तलाश में , और क़र्ज़ के भुगतान में
वहीँ शहरी उपभोक्ता फंस जाता है
कोलेस्ट्रोल के प्लौक में, और मधुमेह के निदान में ।
यहाँ भी मज़बूरी है , वहां भी मज़बूरी है
यहाँ हैल्थ की मज़बूरी है, वहां वैल्थ की मज़बूरी है ।

नोट : यह रचना आपको जानी पहचानी लगेगी । यह पहले प्रकाशित रचना का मूल रूप है ।


Saturday, May 22, 2010

यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है ---

ब्लोगिंग में आजकल जो गहमा गहमी , वाद विवाद और आरोप प्रत्यारोप हो रहे हैं , उनसे अलग कुछ ऐसे मित्र ब्लोगर भी हैं जो सभी विवादों से दूर निर्विकार भाव से हिंदी सेवार्थ कार्य में लीन हैं। ऐसे ही एक मित्र हैं , मुंबई में रहने वाले श्री नीरज गोस्वामी जी , जो नियमित रूप से प्रसिद्ध शायरों , ग़ज़लकारों और कवियों की पुस्तकों और रचनाओं से परिचय कराते रहते हैं ।

हमारे देश में लगभग ७२ % लोग गावों में रहते हैं । वहां ज्यादातर लोग गरीबी में वास करते हैं । हालाँकि इसका मतलब यह नहीं कि गाँव में सभी गरीब और शहर में सिर्फ अमीर ही रहते हैं । कुल मिलाकर गाँव और शहरों में गरीबों की संख्या , अमीरों की संख्या से कहीं ज्यादा है।

मन हुआ कि इस अमीरी -गरीबी और गाँव -शहर के अंतर पर एक रचना लिखी जाये ।
मैंने ये विचार नीरज भाई के सामने रखा और उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर एक कविता बना डाली । गुस्ताखी करते हुए इस के साथ थोड़ी छेड़ छाड़ कर , आपके सन्मुख रख रहा हूँ ।

( ये = अमीर , वे /वो = गरीब , यहाँ = शहर , वहां =गाँव )

सूखी रोटी 'ये' भी खाते
सूखी रोटी 'वे ' भी खाते ।
डाइटिंग से 'ये' वज़न घटाते
भूखा रह वे दुबला जाते ।
इनको साइज़ जीरो का शौक
उनको बस सर्वाइवल का खौफ ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


मक्की सरसों जब 'वे' खाएं
गावों में बेबस कहलायें।
पर शहरों में चला के ऐसी
खाते 'ये' कह ' डेलिकेसी' ।
जई फसल जो ढोर हैं खाते
ओट मील ये कह उसे मंगाते ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


जिम में जा 'ये' एब्स बनाते
'वो' महनत से खुद गठ जाते।
कपडे फाड़ ये करते फैशन
उनको तन ढकने का टेंशन ।
पैदल चल वो काम पे जाएं
यहाँ पैदल चलना भी काम कहाए।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


वो हँसते हैं लगा ठहाके
ये हंसने को क्लब हैं जाते ।
वो पीपल की छाँव में रहते
दुःख पाकर भी गाँव में रहते ।
होती क्या जाने पुरवाई
'ये' ऐ सी में रहते भाई ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।

वो किसान जो अन्न उगाये
क़र्ज़ में खुद ही फंस जाये।
बीच में जब लाला आए
उसी अन्न से धन कमाए।
फिर बी पी डायबिटीज हो जाए
खाना कुछ भी खा ना पाए ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


दोनों ही बस ये चाहें
'वो' से हम 'ये' हो जाएँ
'ये' से हम 'वो' हो जाएँ।
लेकिन न ये वो बन पायें
न ही वो ये बन पायें
जो जैसे हैं , वैसे रह जाएं ।

ये भी हैं मजबूर, वो भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


यह प्रयास कैसा लगा , बताइयेगा ज़रूर।