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Monday, June 15, 2026

ग़ज़ल के कद्रदान अभी बाकी हैं...

 बड़े से मॉल की आंखों में चुभ रही है जो,

गली के मोड़ पे इक छोटी दुकान अभी बाकी है।


हर शख़्स इस शहर में नज़र आता है ग़मगीन,

शुक्र है कुछ चेहरों पर मुस्कान अभी बाकी है।


पोथी पढ़ पढ़ कर इल्म तो बहुत कर लिया हासिल,

पर असल जिंदगी का इम्तिहान अभी बाकी है।


जिसे भी देखो वही दिखाई देता है यहां नेता,

तसल्ली है कुछ लोगों में ईमान अभी बाकी है।


रिश्वतखोरी के दलदल में भी रहते पाक साफ,

वो खुद्दार जिनमें आत्मसम्मान अभी बाकी है।


हैरान ना हो देखकर मुर्दों की मुर्दानगी,

शहर के कुछ मर्दों में जान अभी बाकी है।


वक्त ने कुछ तो भर दिए जो दिए थे जालिमों ने,

उन बेदर्द जख्मों के कुछ निशान अभी बाकी हैं।


रुकसत हुआ वो शख्स जो महीनों से पड़ा था बीमार,

फुटपाथ पर उसका बस कुछ सामान अभी बाकी है।


मत सोचो गुजर गया जल जमी से वो जलजला,

हार्मोज के सागर में उफनता तूफान अभी बाकी है।


बिसराने वाले तो बहुत मिल जाएंगे डॉ दराल,

तू लिखता चल तेरी लेखनी के कद्रदान अभी बाकी हैं। 

Monday, April 20, 2026

एक ग़ज़ल...

 मेहरबानियों पर ताउम्र जीते रहे,

मुफ्त मिलती रही हम पीते रहे।

मुफलिसी का दौर इस तरहां गुजरा,

पैरहन फटते रहे हम सीते रहे।

उम्र गुजार दी यूं फ़ाक़ामस्ती में,

लोग उधार देते रहे हम लेते रहे।


काम कभी कोई अपना रुका नहीं,

हाथ मगर दोनों देखो सदा रीते रहे।

इश्क का रिस्क उठाते भी तो कैसे,

जिंदगी में क्या कम फजीहते रहे।


इस कान से सुना दूसरे से निकाला,

बाखबर फिर भी देते नसीहतें रहे।

इक दिन तो ख़ाक में मिलना है लाजिमी,

चलो दोस्त अभी तो हंसते मुस्कराते रहें। 

Tuesday, August 12, 2025

ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है ...

 जन्मदिन पर दोस्तों की दुआएं हों,

और अपनों का साथ हो,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बच्चे केक मंगवाएं,

और केक काटने में पत्नी हाथ बंटाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बेटी विदेश से फूल भिजवाए,

और एक प्यार सा संदेश पहुंचाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


पुत्र केक खिलाए, पुत्रवधू फोटो खींचे,

और पत्नी केक खिलाकर गाल पर केक लगाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


वर्षों के साथी डॉक्टर, ब्लॉगर, और कवि मित्र साथ हंसें मुस्कुराएं,

और जिंदगी सत्तरवें साल में प्रवेश कर जाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है। 

Wednesday, March 4, 2020

छोटी बह्र की ग़ज़ल --


फ़िल्मी मशहूर हस्तियों और मॉडल्स के परिधान देखकर उपजी ये छोटी बह्र की ग़ज़ल :

वस्र छै गज रंगा ,         ( वस्र = वस्त्र )
तन फिर भी नंगा।

कहने को मैया ,
मैली क्यों गंगा।

मन में रख विग्रह ,       ( विग्रह = वैर / शत्रुता )
कर दें कब दंगा ।

धर्म के हैं गुरु ,
मत लेना पंगा ।

जग में हो अमन ,
मन रहता चंगा।

तज दे हर व्यसन ,
बीड़ी  या   छंगा ।        ( छंगा छाप तम्बाकु )

नोट : मैट्रिक क्रम = २,२,२,२,२ 

Wednesday, September 25, 2019

फेसबुक के चक्कर में ब्लॉगिंग भूल गए --

फेसबुक पर हम इतना झूल गए,
के कविता ही लिखना भूल गए।

जिसे देनी थी जीवन भर छाया ,
उस पेड़ को सींचना भूल गए।

मतलब में अपने कुछ ऐसे डूबे,
देश पर मर मिटना भूल गए ।

नींद में देखते रहे जिसे रात भर ,
आँख खुली तो वो सपना भूल गए।

बड़े भोले थे जाल में जा फंसे ,
फंसे तो पर निकलना भूल गए।

आँखों पर ऐसा पर्दा पड़ा यारो,
भीड़ में कौन है अपना भूल गए।

Friday, August 18, 2017

कितना आसाँ है आसाराम बन जाना ---



मेरा मेरा करती है दुनिया सारी,
मोहमाया से मुक्ति पाओ , तो जाने ।

कितना आसाँ है आसाराम बन जाना ,
राम बनकर दिखलाओ , तो जाने।

दावत तो फाइव स्टार थी लेकिन,
भूखे को रोटी खिलाओ , तो जाने ।

राह जो दिखाई है ज्ञानी बनकर,
खुद भी चलकर दिखाओ , तो जाने ।

देवी देवता बसते हैं करोड़ों यहाँ,
इंसान बन कर दिखलाओ , तो जाने ।

रुलाने वाले तो लाखों मिल जायेंगे,
किसी रोते को हंसाओ, तो जाने ।

फेसबुक पे तो रोज़ लिखते हो 'यार'',
कभी साथ बैठ गपियाओ , तो जाने।




Tuesday, July 25, 2017

जिंदगी की दौड़ एक मृगमरीचिका है ---


तंग गलियारों में ही गुजरती रही ,
ये जिंदगी भी कितनी तन्हा सी रही।

खोलो कभी मन के बंद दरवाज़ों को,
मिलकर बैठो और बतियाओ तो सही।

जिंदगी गुजर जाती है ये सोचते सोचते,
तू अपनी जगह सही मैं अपनी जगह सही।

क्यों दौड़ते हो धन दौलत के पीछे बेइंतहा,
ये बेवफा कभी मेरी कभी तेरी होकर रही।

इज़्ज़त , सौहरत , दौलत तो बहुत कमाई ,
मन का सुख चैन पर कभी मिला ही नहीं।

जिंदगी की दौड़ मृगमरीचिका है 'दोस्त',
भला इसे कोई कभी पकड़ पाया है कहीं ।  

Monday, May 23, 2016

एक ग़ज़ल ---

१)

भरी जवानी में धर्म कर्म करने लगे हैं ,
मियाँ जाने किस जुर्म से डरने लगे हैं !

जो कहते थे दुनिया में नहीं है ईश्वर कहीं ,
मुसीबत पड़ी तो रामा रामा करने लगे हैं। 


वो ना डरते थे करने से दुष्कर्म कभी , 
अब जिन्दा ही पल पल मरने लगे हैं।  

सब लेकर जायेंगे जैसे , जो धन कमाया ,
बक्सों में सारा ऐसे , सामां भरने लगे हैं।

रहते आये थे सदा कूलर ऐ सी की छाया में ,
जब गर्म लू लगी तो झरने से झरने लगे हैं।

आया वो हूनर जब हाथों में 'तारीफ़' के ,
दुःख दर्द हम रोगियों के हरने लगे हैं । 

२) 

जब मोह भंग हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर लंगोटी हो और खाने को दो रोटी ,
बस एक पिंट बीयर चाहिए पीने के लिए ।

लत्ते, कपड़े, घड़ी, गॉगल्स, गिफ्ट में देते हैं लोग , 
रिटायर्ड बन्दे को क्या चाहिए तन ढकने के लिए ।  

सुबह से बैठे थे खाली , कुछ नहीं था करने को ,
मैडम एक गठरी कपडे दे गई प्रैस करने के लिए।

अब नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजर करने के लिए ।  

बड़े काम के थे , नाकाम नहीं आज भी 'तारीफ़', 
बस जौहरी की नज़र चाहिए, परखने के लिए।   

Thursday, November 17, 2011

जब से मशहूर हो गया हूँ ---


कभी कभी सोचता हूँ , एक आम आदमी होना कितना अच्छा है । यूँ तो हम भी भारत सरकार के एक बड़े अफसर हैं । लेकिन निश्चित ही रोजमर्रा की जिंदगी में तो एक आम आदमी ही हैं । इसीलिए जहाँ जी चाहे जा सकते हैं , जो जी चाहे कर सकते हैं । भीड़ में खड़े होकर तमाशा देख सकते हैं । मॉल घूम सकते हैं । पार्क की सैर कर सकते हैं , सब बिना रोक टोक ।

लेकिन जो सेलेब्रिटी बन जाते हैं, चाहे वो टी वी कलाकार हों या फ़िल्मी हस्तियाँ या फिर बड़े नेता जी --क्या वे घूम सकते हैं अपने ही स्वतंत्र देश में स्वछंदता से


कैसा लगता होगा उनको यूँ अपनी ही छवि में कैद होकर रहना । अब यह तो वही बता सकते हैं या फिर कभी हम भी सेलेब्रिटी बने तो पता चलेगा । लेकिन यह इस जीवन में तो संभव नहीं लगता । इसके लिए तो दोबारा ही जन्म लेना पड़ेगा ।


फिर भी कल्पना करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं


और कल्पना करने पर देखिये कुछ इस तरह समझ आया :


अपनों से दूर हो गया हूँ
जब से मशहूर हो गया हूँ ।

करते हैं सब यही शिकायत
मैं अब मग़रूर हो गया हूँ ।

देते इसका ज़वाब खुदी को
थक कर अब चूर हो गया हूँ ।

बचने को भीड़ से कहीं भी
अब तो मजबूर हो गया हूँ

लगता है यूँ मुझे, सुखों से
सच में अब दूर हो गया हूँ ।

फीकी "तारीफ" ये हंसी है
ग़म से भरपूर हो गया हूँ ।

नोट : इस चमक धमक के पीछे कितना एकाकीपन , कितनी असुरक्षा की भावना और कितने ग़म छुपे रहते हैं , यह शायद किसी को पता नहीं चलता होगा
भई हम तो आम आदमी ही अच्छे

Thursday, October 6, 2011

इश्क में तेरे यूँ नाकाम हैं ---

एक इश्किया ग़ज़ल , जो लिखनी तो बहुत पहले चाहिए थी , लेकिन लिखी आज है

आप जब से मन को छलने लगे
ख्वाब तब से दिल में पलने लगे ।

डूब कर हुस्न में यूँ खोये रहे
साथ दोस्तों का भी खलने लगे ।

प्यार में तेरे यूँ नाकाम हैं
काम सारे कल पे टलने लगे

छोड़ कर दुनिया को तेरे लिये
आँख बंद कर हम तो चलने लगे ।

ग़ैर नज़र जो उठे उनकी तरफ
डाह से दिल अपना जलने लगे ।

लालची तो इतने ना थे कभी
नोट फिर क्यों पर्स में गलने लगे ।

प्यार में जो 'तारीफ' बने "तरु"
फूल पतझड़ में भी खिलने लगे ।
( तरु = लव टरी )

( चौधराइन को समर्पित , जिनका आज जन्मदिन है )
बीस साल बाद एक बार फिर श्रीमती जी का जन्मदिन दशहरे के दिन आया है

नोट
: ग़ज़ल को सीधी सादी, सरल भाषा में लिखा हैक्या करें , टेढ़ी मेढ़ी कठिन भाषा आती भी नहीं

Thursday, June 10, 2010

क्यों नींद उनको सारी रात नहीं आती----

भाई तिलक राज कपूर जी का लेख पढ़कर ग़ज़ल लिखना सीखने का प्रयास किया है । इस में मत्ला और मक्ता सहित सिर्फ पांच शेर (अश`आर ) कहे हैं । इसमें काफिया --आत है जैसे गात , रात , बात आदिरदीफ़ है --नहीं आती । पहले शेर यानि मत्ला में काफिया और रदीफ़ दोनों मिसरों (पंक्तियाँ ) में हैं । बाकि में सिर्फ दूसरे मिसरा में । सभी शेर स्वतंत्र हैं । इसलिए इसे ग़ज़ल ही कहेंगे ।

पसीने की गंध गात नहीं आती
नींद उनको सारी रात नहीं आती ।

वो काम करते नहीं जब तलक
काम के बदले सौगात नहीं आती ।

क्या बताऊँ उनको मैं जात अपनी
सिवा इंसानियत कोई जात नहीं आती ।

नेता हम भी बन जाते लेकिन
सच को छोड़ बात नहीं आती ।

ज़ज्बा लड़ने का बहुत है `तारीफ`
शैतान को देनी मात नहीं आती ।

अब यह प्रयास कैसा रहा , यह तो ग़ज़ल के जानकार ही बता सकते हैंआपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा