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Monday, July 6, 2026

केवल हास्य के लिए...

 कुदरत का पुरुषों पर ये कैसा कुदरती अत्याचार है,

पत्नी को पति से लड़ने का मिला विशेषाधिकार है।

आधुनिक सुशिक्षित पत्नियां पति के बराबर कमाती हैं,

लेकिन सारी शॉपिंग की पेमेंट्स पति से ही कराती हैं।


फिर भी पत्नी पति को समझती है दाल बराबर,

ऊपर से पति को समझाती हैं ये बात बताकर।

कि शाकाहारी लोगों में दाल भी ज़रूरी है,

क्योंकि प्रोटीन की मात्रा तो इसी में पूरी है।


पति गर रिएक्ट करे तो पत्नी नाराज हो जाती हैं,

बिना लड़े तो उनकी तबियत ही खराब हो जाती है।

इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल वे बखूबी करती हैं,

दो दिन भी पति से ना लड़ें तो भूख ही नही लगती हैं।


पत्नियां लड़ कर ही ज़िंदगी का भरपूर मज़ा लेती हैं,

कोई बहाना ना मिले तो बिना बहाने भी लड़ लेती हैं।

पुरुष बेचारे तो बस मन मसोस कर ही रह जाते हैं,

इस नियमित पत्नी पीड़ा को चुपचाप सह जाते हैं।


पत्नियों को यह विशेषाधिकार पतियों ने ही दिया है,

शिक्षा ने पतियों को सहनशील होना जो सिखा दिया है।

किंतु इक्कीसवीं सदी में पति भी जागरूक हो गए हैं,

शहरों में पत्नी पीड़ित संघ बनाकर संगठित हो गए हैं।

आखिर पतियों को भी चैन से जीने का अधिकार चाहिए,

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