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Thursday, June 17, 2021

कहां चले बाबूजी बनकर --

 रिटायरमेंट के बाद सबसे ज्यादा बेकद्री कपड़ों की होती है। बेचारे अलमारी में ऐसे मुंह लटकाकर टंगे रहते हैं, मानो कह रहे हों, सरजी कभी हमारी ओर भी देख लिया करो। ऐसी भी क्या बेरुख़ी है। रिटायर होते ही हमसे मुंह मोड़ लिया। रिटायर आप हुए हैं, हम नही। बूढ़े आप हुए होंगे, हम नही , हम तो अभी भी जवान और उतने ही हसीन हैं।

अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि भैया रिटायरमेंट के बाद तुम्हे ही नही, आदमी को भी कोई नही पूछता। कभी गलती से जूते जुराब भी पहनने लगो तो घरवाले ही टोक देते हैं कि कहां चले बाबूजी बनकर। अब तो ऐसा लगने लगा है कि रोजाना शेव करने की भी क्या ज़रूरत है। हफ्ते में दो या तीन बार शेव बना लेना ही काफी है। वैसे तो दो जोड़ी टी शर्ट्स और नेकर में बढ़िया काम चल रहा है। लेकिन यदि कभी ऑनलाइन कविता सुनाने के लिए कमीज़ पहननी भी पड़े तो नीचे लुंगी या पायजामा ही काफी है।

अब तो भैया वो गाना याद आता है :
तेरी और मेरी, एक कहानी,
हम दोनों की कद्र, किसी ने ना जानी।

अब तो ये आलम है कि अलमारी खोलते ही सारे कपड़े मिलके एक साथ चीखते हैं, सा'ब अब तो लॉक डाउन भी खुल गया, अब तो हमे कहीं घुमा लाओ। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाते हैं कि भाई सरकार ने अभी पार्क, पब्स, बार्स, सिनेमा हॉल्स, स्विमिंग पूल, कल्चरल एक्टिविटीज आदि नही खोले हैं। मियां तनिक शांति रखो, वे दिन फिर आएंगे, जब हम तुम दोनों मिलकर बाहों में बाहें डालकर घूमा करेंगे।

6 comments:

  1. वाह!!!
    मजेदार कटु सत्य....
    लाजवाब हास्य लेख।

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  2. सारे कपड़े एक साथ चीखते हैं 😂😂😂😂😂
    वैसे आप तो हर समय टिपटॉप नज़र आते हैं ।

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    1. हा हा हा। वो पुरानी बात है।

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