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Friday, May 19, 2017

सिगरेट और शराब में कौन ज्यादा ख़राब --

हमने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर लोगों से सिगरेट और शराब में कौन ज्यादा ख़राब विषय पर सबका जवाब माँगा था।  अधिकांश लोगों ने सिगरेट को ज्यादा ख़राब बताया , हालाँकि जैसा कि अपेक्षित था, कई महिला मित्रों ने शराब को ज्यादा ख़राब बताया।  आइये देखते हैं क्यों सिगरेट ज्यादा ख़राब है।

* लत : सिगरेट और शराब , दोनों की ही लत बहुत ख़राब होती है।  लेकिन जहाँ सिगरेट की लत बहुत आसानी से लग जाती है , वहीँ शराब की लत हज़ारों में किसी एक को लगती है। दोनों की शुरुआत अक्सर कॉलेज की दिनों में यार दोस्तों के साथ होती है।  लेकिन यदि एक बार आपने सिगरेट पीना सीख लिया , यानि इन्हेल करना आ गया , तो उसका नशा भले ही हल्का सा होता है , लेकिन ऐसी आदत पड़ जाती है कि फिर छोड़ना बहुत मुश्किल होता है। किसी ने कहा है -- it is very easy to stop smoking , and I have done it so many times .

* स्वास्थ्य प्रभाव :  सिगरेट के धुंए में सैकड़ों ऐसे केमिकल्स होते हैं जो हानिकारक होते हैं।  इसमें सबसे ज्यादा है निकोटीन जो नशे का कारण बनती है जिससे हमारे दिल की धड़कन तेज होती है , बी पी बढ़ता है और हृदय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा तार जैसे अनेक हानिकारक पदार्थ होते हैं जिनसे कैंसर जैसी भयंकर बीमारी हो सकती है।  धूम्रपान से फेफड़े ख़राब होते हैं जिससे आपको टी बी , ब्रोंकाइटिस , दमा और कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं।  धूम्रपान असमय मृत्य का दूसरा सबसे बड़ा कारण होता है। लेकिन संयत मात्रा में शराब का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता , बल्कि फायदेमंद भी हो सकता है।  विशेषकर रैड वाइन को हृदय के लिए अच्छा माना गया है। सिर्फ क्रोनिक एल्कोहोलिज्म में लीवर ख़राब होने की सम्भावना होती है।

* सामाजिक प्रभाव  : सिगरेट पीने से २५ % धुआं आस पास खड़े या बैठे लोगों को प्रभावित करता है , जिसे पैसिव स्मोकिंग कहते हैं।  लेकिन शराब में ऐसा कोई दोष नहीं है। जो लोग शराब पीकर नालियों में पड़े रहते हैं , या घर आकर पत्नी के साथ मार पीट करते हैं , या पक्के शराबी होकर घर को बर्बाद कर देते हैं , उनका अपना व्यक्तित्व ही ख़राब होता है , इसमें शराब का दोष नहीं होता।

* यह बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज में धूम्रपान को आज भी सहजता से लिया जाता है , बल्कि गांवों में तो इसे इज़्ज़त का प्रतीक माना जाता है।  जबकि शराब को हीन भावना और नीची नज़र से देखा जाता है और शराब पीने वालों को विलेन की तरह देखा जाता है। सच तो यह है कि खराबी शराब में नहीं , बल्कि पीने वाले में होती है यदि शराब पीकर वह कोई हुड़दंग करता है।

अंत में यही कहेंगे कि यदि आप धूम्रपान करते हैं तो आज ही छोड़ दीजिये , क्योंकि जैसा कि एक कार्डिओलॉजिस्ट फ्रेंड ने लिखा , एक एक सिगरेट भी स्वास्थ्य को हानि पाहुंचाती है।  और यदि शराब नहीं पीते तो मत पीजिये , लेकिन यदि पीते हैं तो संयम से ही पीयें।      


Thursday, July 18, 2013

सीमित मात्रा में यह आनंद देती है लेकिन अधिक मात्रा में हर लेती है ---


वैसे तो इस कलियुग में सात्विक प्रवृति के लोग मुश्किल से ही मिलते हैं, लेकिन शराब एक ऐसी चीज़ है जो सात्विक पुरुष को भी राजसी अवस्था में परिवर्तित कर देती है और अति हो जाये तो मनुष्य को तामसी स्तर पर ले आती है। लेकिन इस मृत्युलोक में रहकर कभी कभी राजसी ठाठ बाठ का भोग लगाने से बच पाना आसान नहीं होता क्योंकि एक इन्सान के लिए देवता बनना या बने रहना संभव नहीं है।

शराब में मूल रूप से एथाइल एल्कोहोल होता है जो ह्यूमेन फिजियोलोजी में एक नर्वस स्टीमुलेंट का काम करता है। यानि इसके सेवन से नर्वस सिस्टम पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि हमारे शरीर के विभिन्न अंग तेजी से काम करने लग पड़ते हैं। इसलिए पल्स , बी पी , साँस आदि सब तेज हो जाते हैं , पसीना आने लगता है , गर्मी का अहसास होता है। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मष्तिष्क पर पड़ता है जिस का पहला प्रभाव है यूफोरिया / मूड एलिवेशन / रिमूवल ऑफ़ इनहिबिशन। शराब का यही गुण है जिसके लिए आम तौर पर इसके शौक़ीन इसका सेवन करते हैं। इसी को पीने वालों की भाषा में सुरूर कहते हैं।

सुरूर से समाधी तक :

शराब के पहले पैग के बाद पीने वाला रिलेक्स्ड हो कर मस्त हो जाता है। पहले जो लोगों के बीच शरमाया सा बैठा था और किसी से बात करने में हिचकिचा रहा था , अब खुलने लगता है और बातचीत में हिस्सा लेने लगता है। यह इनहिबिशन ख़त्म होने की वज़ह से होता है। दूसरे पैग के बाद आप पूर्ण रूप से विचार विमर्श में मशगूल हो जाते हैं। तीसरे के बाद तो आप को चुप कराना ही मुश्किल हो सकता है। और चौथे पांचवें के बाद आपके बोलने का न कोई तर्क होता है , न कोई आपको सुन रहा होता है। इसके बाद भी यदि आपने एक पैग और ले लिया तो कहीं पड़े ही नज़र आयेंगे और हो सकता है कोई कुत्ता या तो आपका मूंह चाट रहा होगा या उसे जन सुविधा का संसाधन मानते हुए अपना काम कर निकल जायेगा।

बेशक , पश्चिमी देशों की भांति न तो शराब हमारे भोजन का अहम हिस्सा है , न हमारी संकृति का। लेकिन हमारे देश में इसे सदा ही जश्न का एक माध्यम माना गया है। इसलिए शादी हो या पार्टी या कोई अन्य समारोह , डिनर में हार्ड ड्रिंक्स का होना अनिवार्य सा हो गया है। ऐसे में यदि आप शराब नहीं पीते तो स्वयं को ऐसा महसूस करते हैं जैसे शादीशुदा लोगों के बीच आप अकेले कुंआरे फंस गए हैं। देखा गया है कि किसी भी समारोह में अधिकांश लोग मदिरापान कर रहे होते हैं , जिससे प्रतीत होता है कि इसे हमारे समाज में भी स्वीकृति प्राप्त है।

वैसे तो शराब पीने की सलाह नहीं दी जा सकती लेकिन यदि आप शौक रखते हैं तो शराब पीकर आप लाफिंग स्टॉक न बने , इसके लिए निम्नलिखित कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी है :

* कभी भी खाली पेट न पीयें , वर्ना बहुत जल्दी चढ़ जाएगी। साथ ही स्नैक्स लेते रहें , जिससे एब्जौर्प्शन धीरे हो जायेगा और आप ज्यादा देर तक सभ्य दिखते रहेंगे।
* पीने में जल्दबाजी न करें , धीरे धीरे पीयें न कि गटागट।
*  कुछ लोग पहला पैग ही लार्ज ( पटियाला ) बना लेते हैं। यह पियक्कड़ होने की निशानी है। बेहतर है स्मॉल पैग ही बनायें।
* कभी भी अन्जान लोगों के बीच बैठकर न पीयें , यह खतरनाक हो सकता है और आप लुट भी सकते हैं।
* जहाँ तक हो सके, अकेले बैठकर न पीयें। हालाँकि कुछ लोग नियमित रूप से घर में ही अकेले पीते हैं , विशेषकर फौजी लोग। लेकिन  इससे आदत पड़ने की सम्भावना बढ जाती है जो हानिकारक हो सकती है।
* यदि आपको ड्राइव करना है तो बेहतर है कि या तो आप न पीयें या अपने साथ कोई ऐसा रखें जो स्वयं न पीता हो। यह आपकी जान और माल दोनों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।
* स्वास्थ्य और कानून , दोनों की दृष्टि से एक दिन में दो स्माल पैग ( ६० एम् एल ) से ज्यादा नहीं लेना चाहिए।
* हैंगओवर से बचने के लिए खाने में टमाटर का सेवन खूब करें। यह एल्कोहल को जल्दी मेटाबोलाइज कर शरीर से निकाल देता है जिससे सुबह तक आप फिट महसूस करते हैं। इसीलिए ब्लडी मेरी कॉकटेल हमें भी बहुत सही लगती है क्योंकि इसमें टमाटर जूस होता है।
* पानी की मात्रा भी प्रचुर रखने से डीहाइडरेशन नहीं होता और सर दर्द नहीं होता।
* कभी भी देसी दारू न पीयें , इसमें ज़हर ( मिथाइल एल्कोहल ) हो सकता है जो जान लेवा भी हो सकता है।

यदि आप उपरोक्त बातों का ध्यान रखेंगे तो निश्चित ही आप शराब के खतरों से बचे रहकर इसका आनंद उठा सकते हैं।

अब देखते हैं शराब के गुण और अवगुण : 

* कहते हैं -- सीमित मात्रा में यह आनंद देती है लेकिन अधिक मात्रा में हर लेती है। कभी कभार शादियों या पार्टियों में पीने से आम तौर पर कोई नुकसान नहीं होता विशेषकर यदि कंट्रोल रखा जाये। एक या दो स्माल पैग रोजाना पीने से भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इस मात्रा में रेड वाइन कॉलेस्ट्रोल को कम करती है और एक तरह से स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालती है। हालाँकि कॉलेस्ट्रोल कम करने का यह तरीका सही नहीं ठहराया जा सकता।

* शराब का सबसे बड़ा अवगुण है इसकी लत पड़ जाना। यह व्यक्ति विशेष और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। लेकिन एक बार क्रॉनिक एल्कोहोलिक होने के बाद छोड़ना या सुधार लाना अत्यंत मुश्किल होता है।
शराबी व्यक्ति का न सिर्फ स्वयं का स्वास्थ्य बल्कि घर बार का बर्बाद होना लाज़िमी है।

* क्रॉनिक एल्कोहोलिज्म से लीवर ( यकृत / जिगर ) खराब हो जाता है जिसे सिरोसिस कहते हैं। सिरोसिस से लीवर फंक्शन ख़त्म हो जाते हैं , पेट में पानी भर जाता है , कई जगह से खून आने लगता है और अंत में लीवर फेल होकर या तो कोमा में चले जाते हैं या मृत्यु ही हो जाती है। लीवर सिरोसिस का कोई उपचार नहीं है।

* देखा जाये तो शराब एक मीठा ( स्वाद में कड़वा ) ज़हर है जो धीरे धीरे मनुष्य को हलाल करता है। लेकिन तभी जब शराब ही जिंदगी बन जाये। इसके दुष्परिणाम लम्बे समय के बाद नज़र आते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए बेहतर है कि समय रहते चेत जाएँ और इसे सिर्फ ख़ुशी का माध्यम बनायें न कि मातम का।

नोट : हमारे देश में २५ वर्ष की आयु से कम लोगों को मदिरापान की अनुमति नहीं है। लेकिन आजकल क्या हो रहा है , यह आप समाचारों में देख और पढ़ ही रहे हैं। ज़रा संभालिये अपने बच्चों को।                     

                     

Monday, July 15, 2013

नाम यूँ ही बदनाम है बेचारी शराब का ---


शराब एक ऐसी चीज़ है जिस पर सदियों से शायरों ने अनगिनत शे'र लिखे हैं , गीतकारों ने गीत लिखे हैं , जो उच्च समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक होती है , मध्यम वर्ग में जश्न का जरिया और निम्न वर्ग में जिंदगी बर्बाद करने का साधन। इसका सेवन भी आदि काल से होता आया है। आदि मानव से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न रूपों में शराब का उत्पादन और सेवन होता आया है। कहीं शराब को खराब माना जाता है , कहीं शराब और शबाब साथ मिलकर नवाबों की शान बनती है। लेकिन ख़राबी शराब में होती है या शराबी में , यह हमेशा बहस का विषय बना रहता है।

बात बहुत पुरानी है। तब हमने नया नया जॉब ज्वाइन किया था। एक दिन डॉक्टर्स के किसी कार्यक्रम का निमंत्रण मिला जिसमे कार्यक्रम के बाद कॉकटेल डिनर का आयोजन था। उन दिनों में कॉकटेल शब्द को बहुत बड़ा माना जाता था। ज़ाहिर है , शराब का सेवन अपेक्षाकृत इतना कॉमन नहीं था जितना आजकल हो गया है। इसलिए इस तरह के निमंत्रण को पाना एक सौभाग्य माना जाता था। हमने जब अपने एक वरिष्ठ साथी डॉक्टर को इसके बारे में बताया तो उनकी बांछें खिल गई और हम भी खुश हो गए कि चलिए कोई साथ तो मिला जो साकी का भी काम करेगा।   

कार्यक्रम में हम तो तन्मयता से भाषण सुन रहे थे और हमारे साथी बार बार घूमकर यह देख रहे थे कि शराब खुली कि नहीं। क्योंकि देर हो चुकी थी और लोगों को बेचैनी होने लगी थी , इसलिए अंतत: भाषण ख़त्म होने से थोड़ा पहले कॉकटेल काउंटर खुल गया। यह पता चलते ही हमारे साथी महाशय दौड़ पड़े और जब तक हम वहां पहुंचे तब तक वो जाने कितने पैग उदरस्थ कर चुके थे। जब हमने जाकर देखा तो पाया कि कुछ लोग उन्हें घेर कर खड़े थे और सब अपना अपना गिलास उन्हें सौंप रहे थे और वो भी गटागट बॉटम अप किये जा रहे थे। यह पागलपन देखकर हम तो सकते में आ गए। हमने उन्हें बड़ी मुश्किल से सब से दूर किया , लेकिन तब तक जो होना था वो हो चुका था। आखिर किसी तरह हमने जल्दी जल्दी कुछ खाया और उनकी सुध ली तो उन्हें चारों खाने चित पाया। अंत में उनके स्कूटर को अन्दर पार्क कर उन्हें एक ऑटो में डालकर रात के बारह बजे हमने उन्हें उनके घरवालों को सौंपा और अपने घर की ओर रवाना हुए।     

ऐसा नहीं है कि शराब ऐसी खराब चीज़ है कि इसका सेवन पाप समझा जाये। दरअसल ख़राबी पीने वाले के व्यवहार में होती है। इस घटना से कई बातें उजागर होती हैं जो शराब का सेवन करने वालों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनके बारे में और शराब से होने वाले फायदे और नुकसान के बारे में अगली पोस्ट में। फ़िलहाल आप इस लतीफे का आनंद लीजिये : 

एक आदमी डॉक्टर के पास गया और बोला -- डॉ साहब मेरे पेट में दर्द रहता है।
डॉक्टर ने उसका मुआयना किया और कहा -- क्या आप शराब पीते हैं ?
रोगी बोला -- जी सच बोलूँगा , वो तो मैं पीता हूँ।
डॉक्टर -- देखिये शराब पीने से आपका ज़िगर ख़राब हो गया है और पेट में पानी भी भर गया है।
रोगी -- लेकिन डॉक्टर साहब पानी तो मैं पीता ही नहीं फिर पेट में पानी कैसे ! अच्छा याद आया शुरू में जब मैंने पीना शुरू किया था तब पानी मिलाकर पीता था लेकिन चढ़ जाती थी। तब से मैंने पानी पीना ही छोड़ दिया।
डॉक्टर -- लेकिन अब आपको छोड़नी पड़ेगी।
रोगी -- डॉक्टर साहब , प्लीज छोड़ने के लिए मत कहिये। हाँ , कम कर सकता हूँ।
डॉक्टर -- ठीक है , रोज कितना पीते हो ?
रोगी -- जी झूठ नहीं बोलूँगा , बस चार पीता हूँ।
डॉक्टर -- चलिए आज से तीन कर दीजिये , फिर दो सप्ताह बाद दो और --
रोगी -- ठीक है डॉक्टर साहब , लेकिन दो से कम मत कीजियेगा क्योंकि पूरी बोतल एक पैग में आ ही नहीं सकती।

नोट : असली शराबी वो होता है जो बेड टी की जगह चाय का कप नहीं बल्कि पैग लेकर बैठता है।       


Friday, April 5, 2013

कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या ---


होली के कुछ दिन बाद शाम का समय था। अस्पताल से घर जाते हुए सड़क पर ट्रैफिक बहुत मिला। ऊपर से सड़क पर पुलिस के बैरिकेड, मानो स्पीड कम करने के लिए बस इन्ही की ज़रूरत थी। ऐसे ही एक बैरिकेड के आगे एक मनुष्य सा दिखने वाला जीव बैठा हिल डुल रहा था। मैला कुचैला , होली के रंगों में रंगा लेकिन बेहद गन्दा। सामने एक अद्धे जैसी बोतल रखी थी जिसमे गोल्डन रंग का कोई द्रव्य भरा था। बोतल आधी खाली थी। कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या पेशाब। दूसरी सम्भावना ज्यादा लग रही थी क्योंकि वह मानव जीव हवा में हाथ घुमाते हुए खुद से बातें किये जा रहा था। ज़ाहिर था, वह कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त पुराना रोगी था।

ऐसे में एक विचार मन में आकर कुलबुलाने लगा कि इस बन्दे का क्या किया जाना चाहिए। यदि विभिन्न पहलुओं पर गौर करें तो कुछ बातें सामने आती हैं :

१) कानून की दृष्टि से : 

कानूनन उसे उठाकर किसी अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिये जहाँ उसका उचित उपचार किया जा सके। तद्पश्चात उसे किसी अनाथालय या सेवा आश्रम में सहारा मिलना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि ऐसा करेगा कौन। आजकल सब को भागमभाग रहती है। अपने काम ही नहीं संभाले जाते , फिर कोई किसी आवारा की ओर क्यों देखेगा। पुलिस को भी कहाँ फुर्सत है अपराधियों से जो दिल्ली की सड़कों पर एक ढूंढो तो सौ मिलते हैं।    

२) चिकित्सा की दृष्टि से :   

मरीज़ कितना भी गन्दा हो , किसी भी हालत में हो, भले ही शरीर में कीड़े पड़े हों , एक चिकित्सक के लिए वह एक रोगी ही है। उसकी पूरी चिकित्सीय देखभाल करना एक डॉक्टर का फ़र्ज़ है।
लेकिन ऐसे रोगी को डॉक्टर्स भी नहीं देखना चाहते। भर्ती कर भी लिया तो एक दो दिन में बेड खाली कराने का प्रयास रहता है। डॉक्टर्स भी क्या करें , सरकारी अस्पतालों में पहले ही एक बेड पर दो दो तीन तीन मरीज़ पड़े होते हैं। वे गंभीर रोगियों का इलाज़ करें या ऐसे रोगी पर ध्यान दें।      

३) मानवता की दृष्टि से : 

हर मनुष्य को जीने का अधिकार है। असहाय, बीमार और कष्ट भोगते हुए इन्सान के प्रति उदारता सभी मनुष्यों का फ़र्ज़ है और इंसानियत का तकाज़ा है।
लेकिन हमारे जैसे देश में जहाँ इन्सान थोक के भाव पैदा होते हैं , वहां भला एक ऐसे व्यक्ति की क्या कीमत होगी जो खुद किसी काम का नहीं।   

कुछ इसी तरह के विचार मन में विचरने लगे। यानि यदि आप इंसानियत और कानून का पालन करते हुए उसे किसी अस्पताल में भर्ती करा भी दें तो क्या होगा। कुछ दिन और यथासंभव उपचार के बाद उसे भगा दिया  
जायेगा या वह खुद ही भाग जायेगा। पुराने मानसिक रोगी को मानसिक रोगों के अस्पताल के अलावा और कहीं रखा भी नहीं जा सकता। शारीरिक रोगों का उपचार तो संभव है लेकिन मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसे रोगी को स्वस्थ करना अक्सर संभव नहीं होता।  

इन हालातों में ऐसे मनुष्य का जिन्दा रहना किस के लिए उपयोगी है ? देश के लिए, या समाज के लिए ? परिवार के लिए, या स्वयं के लिए ? वैसे तो ऐसे रोगी का न कोई परिवार होता है , न समाज।  ऐसे रोगी हकीकत की दुनिया से दूर एक अलग ही दुनिया में विचरते रहते हैं जिसका हकीकत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता। फिर उसका जिन्दा रहने का क्या उद्देश्य है ?
वह न सिर्फ समाज पर बल्कि स्वयं पर भी एक बोझ है। ऐसी निरुद्देश्य जिंदगी का क्या फायदा ?

क्या ऐसे में कुछ अलग हटकर सोचा जा सकता है ? यही अहम सवाल है !     
            

Saturday, December 11, 2010

शराब एक अभिशाप --बेटे की पुकार, मां के नाम ---

शादियों का मौसम है। साथ ही क्रिसमस और नव वर्ष की धूम ।
ऐसे में एक पुत्री ने पिता को ई मेल भेजी , जिसका हिंदी अनुवाद कर प्रस्तुत कर रहा हूँ ।



आज एक पार्टी थी माँ
मुझे याद था तुम्हारा कहा
शराब नहीं पीना बेटा
मैंने खाली सोडा लिया माँ ।

मुझ पर तुम्हारे भरोसे पर
मुझे गर्व हुआ था माँ
लोग कहते ही रहे पर
मैंने पीकर गाड़ी नहीं चलाई माँ ।

जानता हूँ मैंने सही किया माँ
जानता हूँ तुम हमेशा सही होती हो
पार्टी अब ख़त्म होने को है माँ
सब चल दिए हैं अपने घर को।

कार में बैठते सोचता हूँ माँ
घर आ जाऊँगा सही सलामत
तुमने जो संस्कार दिए हैं माँ
जिम्मेदार बनाया है मुझे हर वक्त ।

जब मैं गाड़ी लेकर निकला माँ
और सड़क किनारे पर आया
दूसरी गाड़ी ने नहीं देखा माँ
और पत्थर की तरह टकराया ।

अब मैं सड़क पर पड़ा हूँ माँ
सुन रहा पुलिस वाले की पुकार
दूसरे ने पी रखी है यार
पर भुगतना पड़ा मुझे है माँ ।

मैं यहाँ पड़ा मर रहा हूँ माँ
काश कि तुम आ पाती
ऐसा क्यों हुआ माँ
क्यों बुझ गई मेरी जीवन बाती ।

चारों ओर खून बिखरा है माँ
सारा ही मेरा अपना है
डॉक्टर कह रहा है माँ
मुश्किल मेरा बचना है ।

बस इतना जान लो माँ
मैंने नहीं पी थी एक भी घूँट
उसी ने पी थी उसी पार्टी में
लेकिन खतरा मेरी जान को माँ ।

यह सही नहीं है माँ
मैं यहाँ मरने को हूँ पड़ा
मुझे मारने वाला खड़ा खड़ा
बस मुझे देख रहा है माँ ।

भैया को बोलना रोये नहीं माँ
पापा को सहारा देना अपना
और जब मैं स्वर्ग में जाऊं माँ
मेरी कब्र पर अच्छा बच्चा लिखना।

किसी ने उसे बोला क्यों नहीं माँ
कि पीकर गाड़ी नहीं चलाते
काश किसी ने बोला होता
तो आज मैं जिन्दा होता माँ ।

अब सांस रुकने लगी है माँ
डर सा लग रहा है अभी
पर तुम रोना नहीं कभी
तुम हमेशा मेरे साथ रही माँ ।

मरने से पहले मेरा
एक आखिरी सवाल है माँ
मैंने पीकर कभी गाड़ी नहीं चलाई
फिर मरने की मेरी ही बारी क्यों आई ?

क्यों माँ , आखिर क्यों माँ ?


नोट : यह सन्देश है जो सब तक पहुंचे और पालन हो तो कुछ जिंदगियां असमय ही काल की ग्रास होने से बच सकती हैं ।