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Friday, November 1, 2019

भ्रष्टाचार पर एक हास्य व्यंग पैरोडी --


प्रस्तुत है, प्रसिद्ध हास्य व्यंग कवि श्री आशकरण अटल जी की एक दिलचस्प हास्य व्यंग कविता पर आधारित एक हास्य व्यंग पैरोडी कविता :

एक बिन बुलाये कवि ने,
कवि सम्मेलन में एंट्री ली।
कवि जी अभी मंच पर पहुंचे भी नहीं ,
कि संयोजक ने उसे पहले ही संभाल लिया,
और सवाल किया।

आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?
जी मैं समझा नहीं, कहाँ क्या कर रहे हैं।
आप यहाँ इस कवि सम्मेलन में क्या कर रहे हैं ?
जी हम यहाँ कविता सुनाने आये हैं।
क्या बुलाने पर आये हैं ?
जी नहीं, हम बिन बुलाये स्वयं ही चले आये हैं।
क्या आपको पता है, बिन बुलाये कविता सुनाने पर
आपको पैसे नहीं मिलेंगें ?
जी, पता है।
जब आपको पता था कि बिन बुलाये
कविता सुनाने पर आपको पैसे नहीं मिलेंगे,
तो फिर आप यहाँ क्यों आये ?
जी, राष्ट्र हित में आये।

अच्छा, कविता सुनाकर आप क्या करेंगे ?
जी, कविता सुनाकर हम चले जायेंगे।
क्या कभी फिर आएंगे ?
जी अवश्य आएंगे।
आप जबरदस्ती कवितायेँ कब तक सुनाते रहेंगे ?
जी जब तक हमें बिना बुलाये,
आप कवि सम्मेलन कराते रहेंगे।
आप निशुल्क कविता सुनाकर,
ये आर्थिक त्याग क्यों कर रहे हैं ?
जी राष्ट्रहित में कर रहे हैं।

आखिर आप मुफ्त कविता क्यों सुनाते हैं ,
जबकि कविता सुनकर आप कुछ धन राशि कमा सकते हैं। 
क्योंकि हम गवर्न्मेंट सर्वेंट हैं ,
आप चाहें तो हमें सरकारी बाबू कहकर भी बुला सकते हैं।
और सरकारी बाबू सीट छोड़कर,
पैसा कमाने कहीं नहीं जाते हैं।
क्योंकि नेताओं की तरह वे भी
कुर्सी पर बैठे बैठे ही बिक जाते हैं।
और खुले आम निडर होकर दोनों हाथों से ,
विशुद्ध करमुक्त धन कमाते हैं।

क्या इस परम्परा को निभाया जाना चाहिए ?
और बाकि कवियों को भी राष्ट्र हित में ,
मुफ्त कविता सुनाने के लिए ,
आगे आना चाहिए , आगे आना चाहिए !

नोट : साभार आशकरण अटल जी।


Friday, July 5, 2013

किस किस ने की इन्सान की ऐसी की तैसी ---


घर में ऐ सी, दफ्तर ऐ सी,
गाड़ी भी ऐ सी।
इस ऐसी ने कर दी,
सेहत की ऐसी की तैसी।

नेता भ्रष्ट, अफसर भ्रष्ट ,
इससे बाबू भी ग्रस्त।
इस भ्रष्टाचार ने कर दी,
संसार की ऐसी की तैसी।

चाय का पैसा, पानी का पैसा ,
चाय पानी का पैसा।
इस पैसे ने कर दी ,
इमान की ऐसी की तैसी।

दवा का खर्च , दारू का खर्च
दवा दारू का खर्च।
इस खर्च ने कर दी ,
इन्सान की ऐसी की तैसी।


पैदल से परहेज़, कारों का क्रेज़ ,
आफ़त है रोड रेज़ ।
इस आफ़त ने कर दी ,
शराफ़त की ऐसी की तैसी ।  


यार मतलब के, मतलब की यारी ,
बिन मतलब रिश्ते भारी।
इस मतलब ने कर दी ,
आपसी रिश्तों की ऐसी की तैसी।      

जान नहीं, नहीं पहचान,
बस हो जान पहचान।
इस समाधान ने कर दी ,
इम्तिहान की ऐसी की तैसी।     

वधु बिन शादी, शादी बिन प्यार,
बिन शादी लिव इन यार।
इस व्यवहार ने कर दी ,
संस्कार की ऐसी की तैसी।

दुष्ट इन्सान, रुष्ट भगवान ,
बलिष्ठ हुआ तूफ़ान।
इस तूफ़ान ने कर दी ,
सुन्दर जहान की ऐसी की तैसी।          


Tuesday, July 2, 2013

कुछ लोगों की वज़ह से सारे प्रोफेशन को बदनाम न करें --- डॉक्टर्स डे पर विशेष।


डॉ बी सी रॉय की याद में मनाये जाने वाले डॉक्टर्स डे पर सुबह सुबह फेसबुक पर डॉक्टर्स के बारे में मित्रों के विचार पढ़कर बड़ा मूड ख़राब हुआ। इन्हें पढ़कर हम जैसे दिल से कभी न लगाने वाले के भी दिल को सचमुच धक्का सा लगा कि मित्रगण भी डॉक्टर्स के बारे में ऐसा विचार रखते हैं। इस अवसर पर हमने भी अस्पताल में सभी डॉक्टर्स की मीटिंग बुलाई थी, संबोधित करने के लिए। आइये आपको भी अवगत कराते हैं, इस अवसर पर हुई मंत्रणा से :

मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के समय अक्सर सीनियर्स फ्रेशर्स से एक सवाल पूछते हैं -- डॉक्टर क्यों बनना चाहते हो ? इस पर अक्सर फ्रेशर्स का ज़वाब होता है -- मरीजों की सेवा करने के लिए। यह सुनकर सभी जमकर ठहाका लगाते हैं -- देखो यह देशभक्त मरीजों की सेवा करना चाहता है। फ्रेशर को उस समय इस ठहाके का अर्थ समझ नहीं आता। समझ में आता है जब वह शिक्षा पूर्ण कर सड़क पर आता है , जीविका उपार्जन के लिए।

हमने आठवीं पास कर जब नवीं कक्षा में बायोलोजी विषय चुना तब लोगों न कहा -- अच्छा डॉक्टर बनना चाहते हो ! तब जाकर हमें पता चला कि बायोलोजी लेने से डॉक्टर बनते हैं। लेकिन आजकल न सिर्फ अभिभावक बल्कि बच्चे भी पैदा होते ही करियर की बात करने लगते हैं और इसके प्रति अत्यंत जागरूक होते हैं। हालाँकि आजकल मेडिकल और इंजीनियरिंग के अलावा छात्रों के सामने और बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं,फिर भी मेडिकल प्रोफेशन का आकर्षण अभी भी बरक़रार है। इसलिए अभी भी डॉक्टर्स को क्रीम ऑफ़ द सोसायटी कहा जाता है।

हमने जब मेडिकल में एडमिशन लिया तब कोचिंग की न सुविधा थी , न ही सामर्थ्य। लेकिन अब बच्चे को अभिभावक नवीं कक्षा से ही मेडिकल एडमिशन की कोचिंग के लिए तैयार कर देते हैं। विधालय के साथ साथ चार साल की कोचिंग बच्चों के लिए कितना बड़ा बोझ होता है , यह आसानी से समझा जा सकता है। कमरतोड़ मेहनत और लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी एडमिशन की कोई गारंटी नहीं होती। एडमिशन हो गया तो पांच वर्ष के लिए सारी दुनिया को भूलकर किताबी कीड़ा बनना पड़ता है। इस बीच ग्रेजुएशन करते करते पी जी की तैयारी शुरू हो जाती है। फिर दो साल की कोचिंग , पी जी एडमिशन के लिए। जिसे नहीं मिलता , वह प्राइवेट अस्पताल में पैसा देकर पी जी करता है जिसके लिए कितना रुपया देना पड़ता है , यह बताना भी संभव नहीं।

तीन साल तक पी जी करने के बाद तीन वर्ष की सीनियर रेजीडेंसी करनी पड़ती है। इसके बाद एक डॉक्टर फेकल्टी या कंसल्टेंट की पोस्ट के लिए एलिजिबल होता है। इस समय तक उसकी उम्र करीब ३० वर्ष हो चुकी होती है। लेकिन सरकारी अस्पताल में मुश्किल से १ % लोगों को जॉब मिलता है। बाकि सभी प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करते हैं जहाँ आजकल डी एम् / एम सी एच की डिग्री के बिना आप घुस ही नहीं सकते। यानि फिर दो साल की एक और डिग्री जिसकी सीट्स बहुत कम होती हैं। इस तरह यदि भाग्य ने पूर्ण साथ दिया तो ३५ वर्ष की आयु में एक डॉक्टर अपनी जिंदगी शुरू करता है।

जो डॉक्टर इतना सब हासिल नहीं कर पाते उनके लिए एक ही रास्ता है कि वो लाखों रूपये लगाकर एक क्लिनिक खोल कर जनरल प्रेक्टिस करें जहाँ उनका कॉम्पिटिशन होता है अंगूठा छाप / झोला छाप क्वेक्स से जिन पर सरकार का भी कोई नियंत्रण नहीं है। सारे रूल्स रेगुलेशंस भी क्वालिफाइड डॉक्टर्स पर ही लागु होते हैं। दिन रात की मेहनत के बाद भी सारे डॉक्टर्स अच्छा पैसा कमा लेते हों , ऐसा भ्रम ही है।

बेशक डॉक्टर्स भी इन्सान ही होते हैं और उनकी भी ज़रूरतें वही होती हैं जो बाकि सब की होती हैं। हालाँकि भ्रष्टाचार से प्रभावित होने को कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता, और न ही शिक्षा पर अत्यधिक खर्च होने से भ्रष्ट होने का तर्क स्वीकार्य है। फिर भी , वर्तमान परिवेश में जहाँ रोगी एक कस्टमर होता है और उसे कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट में डॉक्टर के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान प्राप्त है, ऐसे में डॉक्टर का अतिरिक्त सावधान होना अनिवार्य है। नतीजन , उपचार की कीमत बढ़ जाती है। हालाँकि, डॉक्टर्स में भी ऐसे कई मिल जायेंगे जो हिप्पोक्रेटिक ओथ को भूलकर सिर्फ पैसे के पीछे दौड़ते हैं। फिर भी एक डॉक्टर ही होता है जो दर्द से तड़पते , कराहते या घायल रोगी को अपनी योग्यता से नया जीवन प्रदान करता है।

आज भले ही उपचार की अनेक तकनीक या विधाएं उपलब्ध हों , लेकिन बात जब शल्य चिकित्सा की आती है तब एक एलोपेथिक डॉक्टर निश्चित ही भगवान से कम नहीं होता। बाई पास सर्जरी हो या सिजेरियन , ऑर्गन ट्रांसप्लांट हो या डायलिसिस , आई वी एफ से संतान उत्पत्ति का सुख मिले या लासिक से दृष्टि दोष से मुक्ति , आधुनिक चिकित्सा का कोई विकल्प नहीं है। ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े मरीज़ के रिश्तेदारों के लिए डॉक्टर सिर्फ और सिर्फ भगवान ही होता है क्योंकि उस समय रोगी की जिंदगी लगभग उसी के हाथों में होती है। ज़ाहिर है , रोगी को भी डॉक्टर पर विश्वास कर अपनी जिंदगी उसे सौपनी पड़ती है। अंत में किसी विरले केस को छोड़कर लगभग सभी रोगी जब निश्चेतना से बाहर आते हैं तब उसकी सांसें किसी दूसरी जिंदगी से कम नहीं होती।

अत: मित्रो , सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के वातावरण में रह कर भी डॉक्टर्स हमारे जीवन दाता होते हैं, इस बात से नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में सिर्फ भड़ास निकालने के लिए डॉक्टर्स को दोष न देकर, आइये उस भगवान से प्रार्थना करें कि कभी इस भगवान के पास जाना न पड़े, क्योंकि यदि जाना ही पड़ा तो यही भगवान आपको उस भगवान के पास असमय जाने से रोक सकता है। लॉन्ग लिव डॉक्टर्स !             

नोट : अच्छे बुरे लोग सभी जगह होते हैं , इसलिए कुछ लोगों की वज़ह से सारे प्रोफेशन को बदनाम न करें , यही गुजारिश है ।    

   

Friday, February 24, 2012

क्या भगवान को भी फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाना चाहिए ?


पिछली पोस्ट में भ्रष्टाचार पर लिखी ग़ज़ल को आपने पसंद किया दरअसल यह एक ऐसा ज़टिल मुद्दा है जिसका निकट भविष्य में कोई निश्चित समाधान नज़र नहीं आता । भ्रष्ट लोग अपने भ्रष्ट आचरण में मग्न रहते हुए निश्चिन्त रहते हैं जबकि सदाचारी व्यक्ति को भ्रष्ट प्रणाली में कदम कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । यह पानी में रहकर मगरमच्छ से वैर जैसी स्थिति हो जाती है ।

कहते हैं भगवान के घर में देर है लेकिन अंधेर नहीं यानि बुरे कर्म करने वालों को सज़ा तो मिलती है लेकिन देर से । हालाँकि देर से न्याय मिलना तो न्याय से वंचित रहने जैसा है ।

अब देखिये , एक व्यक्ति जो जीवन भर शराफ़त के रास्ते पर चलता रहा, कभी भी कोई बुरा काम नहीं किया , उसे तरह तरह की मुसीबतों में घिरा देखकर यही लगता है कि इसके साथ ऐसा क्यों हुआ । अक्सर ऐसी स्थिति में यही कहा जाता है कि ज़रूर पिछले जन्म में बुरे कर्म किये होंगे । या फिर पिछले बुरे कर्मों का फल भुगतना पड़ रहा है । यानि जो बुरे कर्म इतने पहले किये थे कि किसी को भी याद नहीं , उनका फल अब भुगत रहे हैं जबकि अब वह सत्य मार्ग पर चल रहा है ।

दूसरी ओर हर तरह से पापी , दुराचारी और भ्रष्ट लोग मौज उड़ाते नज़र आते हैं । ज़ाहिर है , उनके पिछले कर्म अच्छे रहे होंगे जिनका फल अभी मिल रहा है । आजकल ऐसे ही लोगों की संख्या बढती जा रही है ।

लेकिन इस विरोधाभास की स्थिति से एक भ्रामक सन्देश उत्पन्न होता है । और वो यह कि आप कुछ भी करिए , कोई फर्क नहीं पड़ता । यदि गलत तरीके से पैसा बनाया जा सकता है तो बनाइये । वैसे भी पैसे का महत्त्व दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है । यदि आपके पास पैसा है तो डरना कैसा । पैसे की ताकत से आप जिसे चाहे खरीद सकते हैं ।

यही कारण है कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करना आसान नहीं है । हमारी सामाजिक , राजनीतिक और न्यायिक प्रणाली ऐसी है कि भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध करना और भ्रष्टाचारी को सज़ा दिलाना लगभग असंभव सा लगता है ।

ऐसे में आशा की एक ही किरण दिखाई देती है, ईश्वर का न्याय लेकिन उसमे भी देर होने से न्याय के साथ न्याय नहीं हो पाता। यदि पापी को सज़ा नहीं मिली तो पाप करने से कौन डरेगा ! और जब सज़ा मिली , तब तक वह पापी ही नहीं रहा । फिर सज़ा तो पापी को मिली ही नहीं

ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या भगवान को भी हमारे न्यायालयों की तरह फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाना चाहिए ?
शायद लगता तो ऐसा ही है ।
इस बारे में आपका क्या कहना है ?


Monday, January 2, 2012

खाली शुभकामनाओं से काम नहीं चलेगा, शुभ काम भी करने पड़ेंगे --

एक और वर्ष भूतकाल की गर्त में चला गया रह गई तो बस यादें , कुछ खट्टी , कुछ मीठी अब आशा भरी नज़र से देखते हैं वर्ष २०१२ की ओर

शुभकामनाओं का दौर ज़ारी है कोई तहे दिल से , कोई दिल की उपरी सतह से महज़ औपचारिकता वश , कोई ब्लॉग पर , कोई एस एम एस द्वारा , कोई फोन कर --एक दूसरे को शुभकामनायें दिए जा रहे हैं

सामाजिक सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए यह ज़रूरी भी है हालाँकि --

हर वर्ष आता है नया साल
हर
वर्ष होता है यही हाल
करते
हैं हम कुछ संकल्प
फिर
भूल जाते हैं हर साल

हमने जनवरी २००९ को यह ब्लॉग बनाया था पहली पोस्ट --नव वर्ष की शुभकामनायें -- जनवरी को पोस्ट की थी इस कविता में हमने बहुत सारी शुभकामनायें की थी, सभी के लिए

आज देखते हैं, तीन साल बाद कितनी कामनाएं पूर्ण हुई : ( एक हास्य व्यंग कविता )

गुजर गया एक और साल
कर गया देश का वो हाल

मुक्ति मिली सभी को भूख से
लत छूटी किसी की घूस से

ग़रीब कुंवारे कुपोषण में पलते रहे
शरीफ़ बेचारे शोषण में जलते रहे

जनता को चावल दाल मिले
दो रूपये किलो कोई माल मिले

भ्रष्टाचार के दानव से जनता भी हार गई
पोलियो से बचे रहे , पर महंगाई मार गई

लोकपाल को ना मत मिले
अन्ना से ना मुंबईकार हिले .

राजा का काणीमोढी से हुआ मेल
खेल खेल में कलमाड़ी पहुंचे जेल

माल्या की उड़ान में गई फिशर
डॉलर के आगे रुपया हुआ बेअसर

सैफ को इंतज़ार कराती रही करीना
धुड़की दे गई सलमान को कटरीना

ऐश्वर्या भी हिरोइन की हिरोइन होती
पर अमिताभ के हाथ में गई पोती

विलायत में टीम इण्डिया के बिक गए भांडे
क्योंकि वादा करके मुकर गई पूनम पांडे

बिग बॉस की तब बढ़ गई टी आर पी
साड़ी पहन सन्नी जब बन गई सावित्री .

पुलिस को के ४७ मिली
बुल्लेट प्रूफ जेकेट मिली

पर कसाब की चलती रही साँस
अफज़ल को मिलती रही आस

भूल गए सब संसद के जांबाज़ शहीदों को
रहे ताकते शंका से , शर्मा के ज़ज्बातों को

इस भ्रष्टतंत्र में लोकतंत्र होता रहा बदहाल
पर स्विस बैंकों के खाते, रहे मालामाल

इन्सान की इंसानियत जब जाग जाएगी
नव वर्ष की कामना तभी शुभ हो पायेगी .

आओ सब मिलकर अभी , करें यही संकल्प
इस वर्ष के संकल्प करें , कर्मों का कायाकल्प .

देखते हैं , वर्ष २०१२ विश्व के लिए क्या लेकर आया है
खाली शुभकामनाओं से काम नहीं चलेगा, शुभ काम भी करने पड़ेंगे तभी यह नव वर्ष मंगलकारी होगा

Friday, November 4, 2011

हम मच्छर नहीं इंसान के बुरे कर्म हैं--



पिछले
कुछ वर्षों से दीवाली के आस पास एक अजीबोग़रीब नज़ारा देखने को मिल रहा हैदशहरे और दीवाली के मध्य काल में दिल्ली में लाखों करोड़ों महीन मच्छर लाईट के सामने जाते हैं और सुबह सब के सब ज़मीन पर बिखरे नज़र आते हैंहमारी लिफ्ट के सामने से कम से कम एक डोंगा भर ये मच्छर हम रोज उठाकर फेंकते हैं
लेकिन आश्चर्यज़नक रूप से दीवाली के बाद पूर्ण रूप से गायब हो जाते हैं

इसी पर हमने एक अनुमानित शोध कार्य किया जो प्रस्तुत है एक कविता के रूप में :

)

एक दिन कामवाली बाई
घर आते ही बड़बड़ाई ।

बाबूजी , ये द्वार पर कौन मेहमान खड़े हैं ,
हैं तो लाखों करोड़ों , पर सब बेज़ान पड़े हैं ।

ये कहाँ से और क्यों आते हैं
हम तो समझ नहीं पाते हैं ।

ऊपर से इनका नाज़ुक मिजाज़ देखिये ,
रोज सेंसेक्स की तरह लुढ़क जाते हैं ।

मैंने कहा बेटा , ये बिन बुलाये मेहमान
जो बेज़ान हो गए हैं ,
ये स्वतंत्र भारत के वो नागरिक हैं
जो अपनी पहचान खो गए हैं ।

इनका जन्म लेना भी
कुदरत की बड़ी माया है ।
इनके लघु जीवन पर पड़ी
ग्लोबल वार्मिंग की छाया है ।

ग्लोबल वार्मिंग से इनके जींस में
परिवर्तन हो गया है ।
इसीलिए कुछ नेताओं की तरह इनका भी
अस्तित्त्व ही खो गया है ।

)

उस दिन शाम रंगीन होते ही
वो फिर आ गए ।
दीवाने परवाने से
हर विद्धुत शमा पर छा गए ।

मैंने पूछा --आप कौन हैं
कहाँ से आए हैं , क्यों आए हैं ?

उनमे से एक जो ज्यादा ख़बरदार था
शायद उस झुण्ड का सरदार था ।

बोला --हम उत्तर भारत से आए हैं
रोजी रोटी की तलाश में, दिल्ली के आसरे ।

हमने कहा --आइये, आपका स्वागत है
अरे हम नहीं हैं बेरहम बेशर्म बावरे ।

हम दिल्लीवाले दिल वाले हैं
मेहमान नवाज़ी के साये में पाले हैं ।
तभी तो दिल्ली के द्वार
सभी के लिए खुले हैं ।

लेकिन यह तो बताईये
आप रोज क्यों चले आते हैं ?
वो बोला --हम तो इंसानी सभ्यता की
चकाचौंध से खिंचे चले आते हैं ।

लेकिन इस रौशन दुनिया को
इतना असभ्य और मतलबपरस्त पाते हैं ।

कि कहीं राख न हो जाये जलकर
अपनी ही लौ में शमा ,
इसीलिए पतंगा बन
खुद ही पस्त हो जाते हैं ।

देखिये ये जो हमारी खेप
अभी उड़कर आई है ।
ये मच्छर नहीं,
देश में बढती महंगाई है ।

सामने वाली लाईट पर
जो इनकी भरमार है ।
वह दरअसल देश में
फैला भ्रष्टाचार है ।

और जो ज़मीं पर बिखरा
इनका सामान है ।
वो असल में इंसान का
गिरा हुआ ईमान है ।

हमें मच्छर समझना
आपका भ्रम है ।
क्योंकि हम मच्छर नहीं
इंसान के बुरे कर्म हैं ।


नोट : यह रचना तब लिखी थी जब मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हमले हो रहे थे

Wednesday, June 8, 2011

जब हमने मंदी और भ्रष्टाचार पर मूंछें कुर्बान कर दीं----

दो साल पहले आर्थिक स्थिति में आई मंदी की मार से सारा विश्व त्रस्त हो गया था ।
उसी समय हम हिम्मत करके अपनी मूंछें साफ कर क्लीन शेवन हो गए थे ।
इसी अवसर पर यह रचना लिखी थी जो आज भी तर्कसंगत लगती है ।



एक मित्र हमारे
नेता सबसे न्यारे
मूंछें रखते भारी
सदा सजी संवारी ।

कोई छेड़ दे मूंछों की बात
तुरंत लगा मूछों पर तांव
फरमाते
मूंछें होती है मर्द की आन
और मूंछ्धारी , देश की शान ।
जिसकी जितनी मूंछें भारी
समझो उतना बड़ा ब्रह्मचारी ।

फिर एक दिन
मूंछें कटवा डाली
डेढ़ इंच थी लम्बी
डेढ़ मिलीमीटर करवा डाली ।

मैंने पूछा मित्र ,
अब क्या विचार बदल गए हैं
निरूपा राय के प्रशंसक
क्या मल्लिका सहरावत के
उपासक बन गए हैं ?

वो बोला दोस्त ,
मेरी और मल्लिका की प्रोब्लम
बढती महंगाई है ।
इसलिए मल्लिका ने ड्रेस
और मैंने मूंछें , डाउनसाइज़ करवाई हैं ।

फिर एक सुहाने सन्डे
जोश में आकर
मूंछ मुंडवाकर
बन गए मुंछमुंडे ।

मैंने कहा मित्र , अब क्या है टेंशन
माना कि साइज़ जीरो का है फैशन
और फैशन भी है नेनो टेक्नोलोजी का शिकार
तो क्या मल्लिका को छोड़
अब मेडोना के भक्त हो गए हो यार ?

वो बोला दोस्त , ये फैशन नहीं
रिसेशन की मार है ।
जिससे पीड़ित सारा संसार है ।
और मैंने भी मूंछें नहीं कटवाई हैं
ये तो कोस्ट कटिंग करवाई है ।



अरे ये तो घर की है खेती
फिर निकल आएगी ।
पर सोचो जिसकी नौकरी छूटी
क्या फिर मिल पाएगी ?

वो देखो जो सामने बेंच पर बैठा है
अभी ऑफिस से पिंक स्लिप लेकर लौटा है ।

और ये जो फुटपाथ पर लेटा है
शायद किसी किसान का बेटा है ।

दो दिन हुए सौराष्ट्र से आया है
तब से एक टूक भी नहीं खाया है ।

कृषि प्रधान देश में ये जो नौबत आई है
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।
अन्न के भरे पड़े हैं भंडार
फिर भी देश में भुखमरी छाई है !

ग़र देश के नेता करें विचार
और मिटे भ्रष्टाचार
तो कोई न जग में भूखा हो
फुटपाथ पर न सोता हो ।
सर्वत्र सम्पन्नता हो , न हो कोई कमी
फिर किसी भूखे बच्चे की मां की
आँखों में ,बेबसी की न हो नमी ।

माना कि मूंछें मर्द की आन हैं
मूंछ्धारी देश की शान हैं ।
मगर इस ग्लोबल रिसेशन से
समाज में फैले करप्शन से
ग़र मिले मुक्ति ,
तो ये मूंछें , एक नहीं
बारम्बार कुर्बान हैं , बारम्बार कुर्बान हैं ।