प्रस्तुत है, प्रसिद्ध हास्य व्यंग कवि श्री आशकरण अटल जी की एक दिलचस्प हास्य व्यंग कविता पर आधारित एक हास्य व्यंग पैरोडी कविता :
एक बिन बुलाये कवि ने,
कवि सम्मेलन में एंट्री ली।
कवि जी अभी मंच पर पहुंचे भी नहीं ,
कि संयोजक ने उसे पहले ही संभाल लिया,
और सवाल किया।
आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?
जी मैं समझा नहीं, कहाँ क्या कर रहे हैं।
आप यहाँ इस कवि सम्मेलन में क्या कर रहे हैं ?
जी हम यहाँ कविता सुनाने आये हैं।
क्या बुलाने पर आये हैं ?
जी नहीं, हम बिन बुलाये स्वयं ही चले आये हैं।
क्या आपको पता है, बिन बुलाये कविता सुनाने पर
आपको पैसे नहीं मिलेंगें ?
जी, पता है।
जब आपको पता था कि बिन बुलाये
कविता सुनाने पर आपको पैसे नहीं मिलेंगे,
तो फिर आप यहाँ क्यों आये ?
जी, राष्ट्र हित में आये।
अच्छा, कविता सुनाकर आप क्या करेंगे ?
जी, कविता सुनाकर हम चले जायेंगे।
क्या कभी फिर आएंगे ?
जी अवश्य आएंगे।
आप जबरदस्ती कवितायेँ कब तक सुनाते रहेंगे ?
जी जब तक हमें बिना बुलाये,
आप कवि सम्मेलन कराते रहेंगे।
आप निशुल्क कविता सुनाकर,
ये आर्थिक त्याग क्यों कर रहे हैं ?
जी राष्ट्रहित में कर रहे हैं।
आखिर आप मुफ्त कविता क्यों सुनाते हैं ,
जबकि कविता सुनकर आप कुछ धन राशि कमा सकते हैं।
क्योंकि हम गवर्न्मेंट सर्वेंट हैं ,
आप चाहें तो हमें सरकारी बाबू कहकर भी बुला सकते हैं।
और सरकारी बाबू सीट छोड़कर,
पैसा कमाने कहीं नहीं जाते हैं।
क्योंकि नेताओं की तरह वे भी
कुर्सी पर बैठे बैठे ही बिक जाते हैं।
और खुले आम निडर होकर दोनों हाथों से ,
विशुद्ध करमुक्त धन कमाते हैं।
क्या इस परम्परा को निभाया जाना चाहिए ?
और बाकि कवियों को भी राष्ट्र हित में ,
मुफ्त कविता सुनाने के लिए ,
आगे आना चाहिए , आगे आना चाहिए !
नोट : साभार आशकरण अटल जी।


