Thursday, June 27, 2013

एक बार फिर वो -- जो अब फेसबुकिया बन गए हैं।


अभी ब्लॉग पर अरविन्द मिश्र जी का लेख पढ़कर फिर वही मुद्दा मन में मचलने लगा कि क्यों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग छोड़कर फेसबुक आदि की ओर जा रहे हैं। लेकिन यह चर्चा यहीं जारी रहे। हमें तो कुछ दिन से फेसबुक पर सक्रियता से जो देखने को मिला , वह प्रस्तुत है इस हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जिसमे हास्य कम, व्यंग ज्यादा नज़र आएगा लेकिन हालात पर खरा उतरेगा।  

१)

वो
सुबह सवेरे , मूंह अँधेरे
उठती है ,
चाय नाश्ता बनाकर
बच्चों को नहला धुलाकर,
टिफिन लगाती है,
बच्चों के साथ
बच्चों के पिता का।
फिर बिठा आती है, बच्चों को
स्कूल बस में ,
अच्छे नागरिक बनाने की चाह में।
फिर करती है
पति को बाय बाय
और बैठ जाती है खुद
सजने संवरने, नहा धोकर।
आखिर उसे भी तो काम पर लगना है।
९ से ५ तक का
क्या हुआ ग़र काम घर पर है ,
यही तो है कॉर्पोरेट कल्चर !
पढ़ती है, लिखती है, टिपियाती है
आँख बंद कर सैकड़ों
चटके लगाती है,
आखिर यह फेसबुकियाना भी
बड़ा चाटू काम है।
दिन भर के काम के बाद
चलो अब आराम किया जाये !
द्वार पर घंटी बजी है ,
अरे पति देव के आने का समय हो गया !
हे राम , अगले जन्म में पत्नि न बनाना
काम ही काम , एक मिनट का नहीं आराम !


२)

वो
सूट बूट पहन कर
फ्रेंच परफ्यूम लगाकर
बालों में करके तीन बार कंघी ,
बैठ जाता है सरकारी कुर्सी पर।
फ़ाइल से पहले खोलता है प्रोफाइल
फेसबुक पर ,
आखिर , स्टेटस अपडेट को
एक घंटा जो बीत गया है।
जाने कितने अपडेट, न्यूज, व्यूज
मिस हो गए होंगे।
ये मुआ दफ्तर भी इतना दूर क्यों है !
आजकल काम भी बहुत बढ़ गया है।
पी एम किसे बनाना है
कैसे चलेगा देश, दिन रात
सताती है यह चिंता।
अभी तो एक घंटा भी हुआ नहीं
कि बड़े साहब का आ गया बुलावा,
लगता है इन्हें देश की कोई चिंता नहीं।
अभी तो बीस लाइक और
चिपकाई हैं चालीस स्माइली,
कमेन्ट न दिए तो आयेंगे कहाँ से।
आखिर, एक हाथ ले, एक हाथ दे, का सिद्धांत
यहाँ से बेहतर कहाँ लागु होता है।
लेकिन यह सिद्धांत साहब को
जाने क्यों समझ नहीं आता है।
देश भक्तों की राहों में
हमेशा आई है रुकावटें ,
चलो फिर लग जाएँ फेसबुक पर
इस छोटे से मीटिंग ब्रेक के बाद।
सरकारी दफ्तर में, काम का आउट पुट
कहाँ निकल पाता है।
सुबह से लगा पायें हैं बस
बारह अपडेट्स।
उफ़ ये मीटिंग्स, लगता है
देश का विकास नहीं होने देंगी।
अब तो उठने में ही भलाई है ,
सरकार भी कहाँ देती है ओवर टाइम !
पत्नि जाने क्यों द्वार खोलने में
लगा रही है देर,
नादान ये भी नहीं जानती कि
पतिदेव थके हारे घर लौटे हैं।
चलो दफ्तर न सही, घर में ही
निपटाते हैं, काम !
आखिर , कॉपोरेट कल्चर अब
सरकारी काम में भी आ गया है।

 नोट : यह पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है। कृपया व्यक्तिगत रूप में न लिया जाये।


59 comments:

  1. ये भाई ..ई ..ई
    मेरे ३ लाइक आप पर उधार हैं ...

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  2. और एक ..एक ..दो..दो..
    इसके साथ हुए तीन
    पूरे तीन कमेन्ट भी !

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    1. सारा हिसाब आज ही करना है ! :)

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    2. आज नकद कल उधार.:)

      रामराम.

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  3. फ़ेसबुक की कविता ब्लॉग पर! क्या बात है!

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  4. हम तो पक्के फेस्बुकिये है डॉ साहेब ....अब आपकी पोस्ट पर हम इसी के द्वारा आये है ....हा हा हा हा हा हा हा

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  5. यह भी खूब रही ,अपडेट और कमेंट में ही दिन बीत जाता है
    latest post जिज्ञासा ! जिज्ञासा !! जिज्ञासा !!!

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  6. पढ़ती है, लिखती है, टिपियाती है
    आँख बंद कर सैकड़ों
    चटके लगाती है,
    आखिर यह फेसबुकियाना भी
    बड़ा चाटू काम है।
    हा हा हा.....!

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  7. अरे पति देव के आने का समय हो गया
    हे राम , अगले जन्म में पत्नि न बनाना ,

    सूट बूट पहन कर
    फ्रेंच परफ्यूम लगाकर
    बालों में करके तीन बार कंघी ,
    बैठ जाता है सरकारी कुर्सी पर।
    फ़ाइल से पहले खोलता है प्रोफाइल
    फेसबुक पर ,

    बिलकुल सही है कहीं कोई कमी नहीं है … आनंद आ गया . आभार

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  8. सत्यम शिवम सुन्दरम

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  9. आपकी पहली कविता पढकर सारे मोहल्ले की ताईयां आपको लठ्ठ लेकर ढूंढने निकल पडी हैं, सावधान हमको दोष मत दीजियेगा.:)

    रामराम.

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    1. और दूसरी रचना को पढ़कर सारे ताऊ ! :)यानि अब खैर नहीं।

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    2. हा हा हा.....कुछ रिश्वत पानी का इंतजाम करायें तो आपके छिपने का ठीकाना गुप्त रखा जा सकता है.:)

      रामराम.

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    3. आजकल सारी दुनिया पानी से परेशान है और एक आप है कि पानी की गुहार लगा रहे हैं ! :)

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    4. ये सादा पानी नही, वो नोट वाला पानी है.:)

      रामराम.

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    5. इस में हम भी शामिल है वरना पता बता देंगे डाक्टर साहब का

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  10. डिस्क्लेमर से कोई फ़र्क नही पडता, दुसरी रचना आपने ताऊ को टार्गेट करके लिखी है.:)

    रामराम.

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    1. अब देखते हैं और कितने स्वीकारते हैं ! :)

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    2. स्वीकारने नही स्वीकारने से हकीकत तो बदलने वाली नही है.

      आपने बिल्कुल पास की चीज को दूर की कौडी के रूप में पेश किया है.:)

      रामराम.

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    3. हमाम में और जन्म के समय सभी एक जैसे ही होते हैं। :)

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  11. कविता आपकी जोरदार, मजेदार है :)..परन्तु ...आजकल बड़े बड़े अख़बारों के लेख फेस बुक पर बड़े बड़े लोगों के स्टेटस पर बहस का विषय बनते हैं और इन स्टेटस पर आये कमेंट्स बड़े अखवारों में लेख के तौर पर छपते हैं. फेसबुक इतना भी हल्का नहीं रहा डॉ साब :):)

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    1. जी सही कहा। अख़बारों के चर्चे भी पढने में आ रहे हैं। :)

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    2. डॉ साहब का knife आपरेशन करके रोगी ठीक करता है और डाकू का knife स्वस्थ का जीवन समाप्त करता है। इसमें दोष knife का है या उसके प्रयोग करने वाले का? ब्लाग/फेसबुक विवाद व्यर्थ है। Blogg & Face-book are complimentary & supplementary to each-other.शिखा वार्श्नेय जी का ध्यानकर्षण सरहनीय है।

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    3. डॉ साहब के कवि साथी ने लिखा है-
      जयेन्द्र पाण्डेय लल्ला:
      "नेट पैक ख़त्म हो गया
      मेरा तो ...चैन खोगया..
      रिचार्ज हो तैयार मिला है
      फिर से संसार मिला है..

      फेसबुक ने एक बड़ा काम किया है
      व्यक्तित्व को नया आयाम दिया है...
      सोचने के तरीके को फर्क किया है
      मित्रों का.. अद्भुत संपर्क... दिया है..."

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    4. बेशक !
      लेकिन माथुर जी , यहाँ फेसबुक और ब्लॉगिंग में तुलना नहीं की गई है। सिर्फ यही कहा है कि कुछ लोग सारे दिन बस यही काम करते रहते हैं , अपना काम छोड़कर। ऐसी लत सही नहीं।

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  12. aapne to bhai arvind ji kidukhati rag par haath rakhate rakhate pata nahi kaha kaha tak haath rakh diya. ab ise padh kar ve aur avasaadgrast ho jaayege na

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    1. अरविन्द जी तो बेलेंस बनाये हुए हैं। बात उनकी है जिनका बेलेंस बिगड़ गया।

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  13. सारा सच बता दिया :)

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  14. एक ही झटके में हाले-दिल बयाँ कर दिया
    शुक्रिया करें फेसबुक का ,काम आसाँ कर दिया .....:-))

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  15. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन हर बार सेना के योगदान पर ही सवाल क्यों - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  16. फसबूकिया हो ब्लोगरी लेकिन कवितायेँ मजेदार हैं.

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  17. हम भी विचार कर रहे थे लोग केदारनाथ यात्रा पर तो नहीं न गए हैं पर क्या मालुम था कि मामला फेसबुक का हैं आभार

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  18. हे भगवान इतनी लंबी कवि‍ता ... ज़रा सांस ले लूं...

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  19. सुबह -सुबह इतना काम करने के बाद थोडा पढने / लिखने /टिपियाने का काम कर ले, दोस्तों के हाल चाल पूछ लें , मन में उठ रहे सवालों और जवाबों को साझा कर ले तो वह भी बर्दाश्त नहीं हुआ आपको . अगर इससे आपको संतुष्टि प्रदान हुई तो रोचक कविता है !! (कविता के प्रथम भाग पर )

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    1. थोडा पढने / लिखने /टिपियाने का काम कर ले --पूरा हक़ है जी। :)

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  20. Dr. Saheb, facebook bhi to Micro-Blogging hi hai. Bat Blog aur facebook ki nahin hai, bat abhivyakti ki hai ki log kya likhte hain. Achha lekhan jahan bhi hoga, padha jayega...Par apki kavitayen badi lajvab hain..Badhai !!

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    1. सही कहा यादव जी -- बात फेसबुक या ब्लॉगिंग की नहीं है , बल्कि सिर्फ फेसबुक पर सारे दिन बैठे रहने की है । इस लत के शिकार कई ब्लॉगर्स हो गए हैं।
      कविता पढ़कर कहीं न कहीं सच्चाई भी सब को महसूस हो रही होगी। :)

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  21. हम तो बच गए है.....न तो फोन पर फेसबुक चालू कर रखा है न ही जब ब्लागिंग करते हैं तब चालू रखते हैं...हम तो अब भी ब्लॉगिंक की पोस्ट से निकले छोटे छोटे विचार फेसबुक की दीवार पर टांग आते हैं....

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  22. फेसबुक का अपना ही नशा है ... अभी तक तो अपने आप को बचा रक्खा है आगे पता नहीं ...
    आपकी लाजवाब हास्य रचना गुदगुदा गई डाक्टर साहब ... वैसे ये घर घर की कहानी बन गई है आज ...

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    1. रोहित जी , नास्वा जी , बचे ही रहें तो अच्छा है। टाइम खोटी करने में भला क्या रखा है !

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  23. फेस बुक नशेडी बनते जा रहे है लोग और लोगों में भी हूँ, फेश्बुकियो के मन की बात लिखी है...कोई ५० को लाइक करो तो रेटून में १० आते है वैसे घाटे का सौदा ही है..

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  24. आप कहीं भी लिखिये यदि आप सर्वकालिक लिखेंगे तब ही आप को बार बार पढ़ा जायेगा चाहे वो फेसबुक हो या ट्वीटर या हो ब्लॉग या फिर छाप डालें पुस्तक और ध्यान रहे गुलरी जी शायद ज्यादा नहीं लिख पाए किन्तु किसी से कहें तेरी कुड़माई हो गई तो सीधा जवाब आएगा देखता ...........गुलेरी जी ... बाकि तो सब समझदार हैं @@@@@@@@

    डॉ साहब टिपण्णी अरविन्द जी के लेख सहित आपको समर्पित आपने सदैव विचारोत्तेजक विचार दिए हैं प्रणाम

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  25. मुख चिठ्ठे को बक्षी है आपने अतिरिक्त रौनक .मुख पत्रा बांचने वालों की बराबरी चिठ्ठा और चिठ्ठाकार क्या खाके करेगा ,मुख पत्रा आगे आगे बढेगा ...ॐ शान्ति बढ़िया बिम्ब प्रतिबिम्ब मुख पत्रे बोले तो फेस बुक और फेस्बुकियों को वैसे ये शब्द बुकि अब किर्केटीय हो गया है .

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  26. जोरदार मजेदार कविता

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  27. अब मोहल्ले में चुगलियां नही होती .फेस बुक पर होती हैं सारी गॉसिप , आज माँ को पता हो न हो .फेसबुक पर सबको पता होता हैं के आज फलां फलां जगह गये . अब घरेलू महिलाओ के लिय तो सबसे अच्चा टाइम पास हैं फेस बुक ........ क्युकी न अब कोई सिलाई करनी होती है न कोई बुनाई , :)) फिर भी फेस बुक कई मायने में काम की चीज हैं :))

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  28. जी सही कहा। जब कोई काम न हो तो फेसबुक बड़े काम की चीज़ है। :)

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