top hindi blogs
Showing posts with label फांसी. Show all posts
Showing posts with label फांसी. Show all posts

Saturday, January 5, 2013

क्या हो बलात्कारियों की सज़ा -- फांसी का फंदा या डॉक्टर की सुई !


गाँव में अक्सर देखते थे कि कैसे गायों के बछड़ों को ज़वान होते ही पशु चिकित्सालय ले जाकर मेकेनिकल कासट्रेशन करा दिया जाता था। इस प्रक्रिया में बछड़े के अंडकोषों को एक मशीन से दबाकर क्रश कर दिया जाता था जिससे कुछ ही दिनों में अंडकोष सिकुड़ कर अट्रोफिक हो जाते थे। इसके बाद न बांस होता था , न बजती थी बांसुरी। यानि युवा बैल की न सिर्फ प्रजनन क्षमता ख़त्म हो जाती थी बल्कि उसकी यौन इच्छा भी ख़त्म हो जाती थी।  लेकिन उसकी शारीरिक ताकत पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़ने से , वह किसान के लिए खेती के काम में पूर्ण उपयोगी रहता था। 

आजकल दामिनी के बलात्कारियों को सज़ा देने के मुद्दे पर जम कर बहस हो रही है। जहाँ अधिकांश लोगों की पुकार है कि इन दरिंदों को फांसी की सज़ा होनी चाहिए , वहीँ केमिकल या फिजिकल कासट्रेशन की भी बात हो रही है। अमेरिका सहित कई देशों में बलात्कारियों के लिए इस सज़ा का प्रावधान है।  कासट्रेशन का मुख्य उद्देश्य दोषी को गाय के बछड़े की तरह यौन क्षमता से वंचित करना है ताकि वह भविष्य में यह कुकर्म न कर सके। लेकिन क्या यह सही है और इससे वांछित न्याय मिलने की सम्भावना है , इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। 

कासट्रेशन :

केमिकल कासट्रेशन में मनुष्य को एंटीएंड्रोजेनिक इंजेक्शन लगाये जाते हैं। ये इंजेक्शन एक डॉक्टर द्वारा लगाये जाते हैं जिनका असर तीन से छै महीने तक ही रहता है। यानि ये बार बार लगाने पड़ते हैं और जब तक लगाते  रहेंगे तब तक यह अपना असर दिखाते रहेंगे। इनके प्रभाव से मनुष्य के शरीर में टेस्टोस्टिरोंन हॉर्मोन की मात्रा कम हो जाती है। फलस्वरूप उसकी मर्दानी ताकत ख़त्म हो जाती है यानि वह सेक्स करने के काबिल नहीं रहता। न उसमे सेक्स की इच्छा रहती है और न ही क्षमता। चिकित्सा के क्षेत्र में इनका उपयोग ऐसे रोगियों में किया जाता है जिनकी यौन इच्छा अप्राकृतिक रूप से अत्यधिक होती है। ज़ाहिर है , यह रोगी द्वारा स्वयं उपचार कराने की इच्छा ज़ाहिर करने पर ही इस्तेमाल किया जाता है। इन दवाओं का विपरीत प्रभाव भी होता है जो काफी कष्टदायक हो सकता है। इनमे हड्डियों का कमज़ोर होना , हृदय रोग और महिलाओं जैसे शारीरिक परिवर्तन प्रमुख हैं। यह इलाज़ महंगा होता है। हालाँकि इंजेक्शन या गोलियों द्वारा किया गया कासट्रेशन रिवर्सिबल होता है। 

फिज़िकल कासट्रेशन में अंडकोषों को स्थायी तौर पर नष्ट करने से या सर्जिकलि काट देने से नामर्दी भी स्थायी होती है। इसलिए इसे सज़ा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि अपने देश में इसका इस्तेमाल शायद ही कभी किया गया हो। लेकिन अमेरिका और युरोपियन देशों में कैदियों को कभी कभी यह सज़ा सुनाई जाती है। 

क्या कासट्रेशन एक उपयुक्त तरीका है ? 

अक्सर बलात्कार में बिना रज़ामंदी के अवांछित सम्भोग ही नहीं होता बल्कि शारीरिक हिंसा, मार पीट, अपहरण और चोट आदि भी होते हैं। अपराध इन सभी श्रेणियों में भी होता है। इसलिए सज़ा भी कई काउंट्स पर दी जाती है। कासट्रेशन से यौन क्षमता तो ख़त्म हो जाती है लेकिन शारीरिक क्षमता में कोई कमी नहीं होती। ऐसा मनुष्य और भी खतरनाक हो सकता है। भले ही वह यौन सम्बन्ध न बना सके लेकिन शारीरिक तौर पर शक्तिशाली होने से हिंसा के लायक तो रहता ही है। अधिकांश बलात्कारी हिंसक और अपराधिक प्रवृति के होते हैं। ऐसे लोग यौन क्षमता के न रहते और भी हिंसक हो सकते हैं। इसीलिए कासट्रेशन सिर्फ लम्बी कैद की सज़ा प्राप्त कैदियों में ही किया जाता है। 

बलात्कार : 

महिलाओं के प्रति इससे ज्यादा जघन्य अपराध और कोई नहीं हो सकता। इसे निसंदेह रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। इसलिए इसकी सज़ा भी सख्त से सख्त होनी चाहिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि इस दुखद घटना के बाद भी दिल्ली में बलात्कार बेख़ौफ़ हो रहे हैं। इसलिए दामिनी के अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा देकर फांसी पर टांग देना चाहिए ताकि भावी बलात्कारियों को मौत का खौफ़ नज़र आए। आशा करते हैं कि सरकार जल्दी ही संविधान में आवश्यक परिवर्तन कर इस अमानवीय सामाजिक कुकृत्य से नागरिकों को सुरक्षित रखने की दिशा में तत्परता से कार्यवाही करेगी।  

Friday, November 23, 2012

कैसा लगता होगा पल पल मौत का इंतज़ार करना ?


एक डॉक्टर के रूप में हमने अनेक मौतें देखी हैं. कभी मृत शरीर , कभी अंतिम सांसें लेता रोगी तो कभी असाध्य रोग से पीड़ित बीमार जिसके बचने की सम्भावना न के बराबर . कोई हमारे ही हाथों में दम तोड़ता , किसी को बचा पाने में सफल. एक डॉक्टर के लिए यह सब एक रूटीन सा बन जाता है. इसमें भावनाओं से ज्यादा विवेक, बुद्धि और ज्ञान का इस्तेमाल होता है . इसलिए डॉक्टर अक्सर ऐसी स्थिति में इमोशनल होकर काम नहीं करते. मृत्यु को इतने करीब से शायद कोई और नहीं देख पाता होगा. 

असाध्य रोग से ग्रस्त एक रोगी को भी डॉक्टर्स कभी सच्ची , कभी झूठी दिलासा देते हुए एक आस बनाये रखते हैं. उम्मीद बनी रहने से रोगी का मनोबल बना रहता है. इस कारण, भले ही मृत्यु को टाला नहीं जा सकता हो , मृत्यु के डर को तो कम किया ही जा सकता है. रोगी और रोगी के रिश्तेदारों को भी मानसिक रूप से तैयार होने का समय मिल जाता है. आखिर , मृत्यु एक अटल सत्य है. 

कसाब को फंसी देने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठना लाजिमी है की क्या मृत्यु दंड होना चाहिए. इस विषय पर बहस चलती रही है और चलती रहेगी . विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है. हालाँकि , यह सच है की मनुष्य अनुशासित तभी रहता है जब उसे अनुशासन तोड़ने पर सज़ा का डर होता है. सज़ा में मौत की सज़ा का डर सबसे ज्यादा रहता है. और मौत की सज़ा में फांसी शब्द सबसे ज्यादा डरावना लगता है. गले में रस्सी का फंदा डालकर जब लटकाया जाता है , तब शरीर के बोझ से गर्दन की रीढ़ की हड्डी अचानक टूट जाती है और मनुष्य के शरीर का मस्तिष्क से सम्बन्ध टूटने से मृत्यु हो जाती है. बेशक ऐसा एक पल में हो जाता है , इसलिए व्यक्ति को दर्द या तकलीफ महसूस करने का समय ही नहीं मिलता. 

ऐसे में एक सवाल मन में उठता है. जहाँ एक रोगी को मृत्यु से पहले अंतिम साँस तक जिंदगी की उम्मीद बनी रहती है , वहीँ फांसी का इंतज़ार करते कैदी को मृत्यु सामने साफ दिखाई देती है. इस हालात में उसके मन में क्या विचार आते होंगे ? कैसा लगता होगा पल पल मौत का इंतज़ार करना ? क्या कसाब जैसे खुंखार आतंकवादी को भी मौत का खौफ महसूस हुआ होगा ?