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Friday, June 24, 2022

प्रकृति से भयंकर छेड़ छाड़ --

 कंडाघाट से चैल जाने वाली सड़क यूं तो रूरल एरिया से होकर जाती है। लेकिन सारे रास्ते पड़ने वाले गांवों/घरों में अब होटल/रिजॉर्ट/होम स्टे खुल गए हैं। ज़ाहिर है, मेन रोड़ पर प्रॉपर्टी सदा ही सोना उगलती रही है। लेकिन जो सबसे ख़तरनाक बात देखी वो थी रास्ते मे पड़ने वाली एक पहाड़ी नदी का दोहन। चैल से लगभग 15 किलोमीटर पहले एक गांव पड़ता है जो अब कस्बा बन गया है। दो पहाड़ों के बीच बहती एक छोटी सी जलधारा के किनारे बसा यह गांव सतपुला कहलाता है। यहां तलहटी में नदी को पार करने के लिए एक पुल बना है जिसके द्वारा एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक जाया जाता है। शायद इसी से यह नाम पड़ा होगा।

2015 में जब यहाँ आये थे तब यह पुल टूट गया था। इसलिए सारी गाड़ियां नदी में उतरकर नदी को पार करती थीं। दोनो ओर सीधी ढलान पर कच्चा रास्ता बहुत कठिन था। लेकिन गांव वालों ने इसे ब्लेसिंग इन डिसगाइज समझकर व्यवसायिक लाभ उठाते हुए नदी किनारे चाय पानी के अनेक किओस्क/ ढाबे खोल दिये। गाड़ीवालों के उत्साह को देखते हुए नदी के बीचों बीच टेबल चेयर भी डाल दीं। लोग भी पानी मे पैर लटकाकर बड़े मजे से चाय पकौड़ों का आनंद लेते थे। नदी का पानी भी साफ था।
लेकिन इस बार देखा कि पुल तो सही सलामत था और सारा ट्रैफिक वहीं से गुज़र रहा था, लेकिन नदी का पाट अब एक कैम्पिंग साइट बन गया था। नदी के एक किनारे तो वही पुराने ढाबे थे, लेकिन दूसरी ओर आधुनिक टेन्टेड कैम्प्स बन गए थे। लगभग एक किलोमीटर तक बीसियों कैम्प बने थे। आगे की ओर तो बहुमंज़िला रिजॉर्ट/ होटल भी बने थे। एक 4-5 फुट ऊंची दीवार शायद यह सोचकर बनाई गई थी कि यदि बाढ़ आ जाये तो कैम्प्स को नुकसान न हो। हालांकि पहाड़ों में जब बादल फटता है तो 4 क्या, 40 फुट ऊंची दीवार भी काम नहीं आती।
सबसे खराब बात ये पता चली कि इन सभी होटल्स का सीवर नदी में ही जा रहा था। ऊपर की ओर जहां से नदी निकलती थी, वहां तो बिलकुल नदी के ऊपर होटल बने थे। कोई हैरानी नहीं थी कि नदी का पानी काला क्यों देख रहा था।
अब सोचने की बात ये है कि किसने इज़ाज़त दी होगी इस अतिक्रमण के लिए। क्या प्रशासन आंखे बंद कर के बैठा है। या सब मिलीभगत से हो रहा है। पता चला कि सब प्रॉपर्टीज वहां के प्रभावशाली लोगों की हैं। यानी रक्षक ही भक्षक हो गए हैं। फिर आम जन भी क्षणिक आनंद के चक्कर मे अपना फर्ज़ भूल रहे हैं, आने वाली पीढ़ी के लिए।
प्रकृति का ऐसा निर्मम दोहन कहीं और देखा है क्या !
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Monday, January 30, 2017

प्रकृति सबसे बड़ा डॉक्टर है ---



चिकित्सा के क्षेत्र में अक्सर कहा जाता है -- we treat , he cures . यानि डॉक्टर्स का कहना होता है कि हम सिर्फ इलाज़ करते हैं , रोगी को ठीक तो वो ऊपरवाला ही करता है। यह सच है कि एक डॉक्टर केवल इलाज़ कर के एक सीमा तक ही स्वास्थ्य लाभ में रोगी की सहायता कर सकता है। इसलिए डॉक्टर भगवान नहीं होता। वह किसी को निश्चित अवधि के बाद सांसें नहीं दे सकता। यह सब कुछ प्रकृति या भगवान के हाथ में है।

लेकिन चिकित्सा के मामले में कई ऐसी स्थितियां और परिस्थितियां भी होती हैं जहाँ डॉक्टर उपचार करने का प्रयास कर सकता है और सफल भी हो जाता है।  परंतु यदि डॉक्टर द्वारा इलाज़ न भी किया जाये , तो भी प्रकृति स्वयं ही रोग को ठीक कर देती है। यह हमारे लिए प्रकृति की देन है।  आइये , जानते हैं ऐसी ही शारीरिक समस्याओं में बारे में जब बिना इलाज़ के भी हम ठीक हो सकते हैं :

१ )  दस्त या आंत्रशोध : दस्त यानि डायरिया एक ऐसा रोग है जो रोग न होकर आंत्र संक्रमण के विरुद्ध शरीर की एक प्रतिक्रिया है।  यानि जब भी आँतों में कोई बाहरी संक्रमण होता है तो हमारी आंतें उस संक्रमण को बाहर धकेल कर उससे छुटकारा पाने का प्रयास करती हैं।  इस प्रक्रिया में शरीर का कुछ पानी और साल्ट्स का ह्रास अवश्य होता है , जिसे हम डायरिया या दस्त कहते हैं।

दस्तों का न कोई उपचार है , न ही अक्सर कोई आवश्यकता होती है। संक्रमण निष्काषित होने पर यह स्वतः ही ठीक हो जाता है।  इसलिए दस्तों में दवा देने की कोई ज़रुरत नहीं होती।  केवल पानी और साल्ट की कमी को पूरा करने के लिए ORS की आवश्यकता होती है।

२ ) वायरल फीवर : वायरस के संक्रमण से होने वाला बुखार सेल्फ लिमिटिंग होता है।  यानि यह आम तौर पर १ से ७ दिन अपने आप ठीक हो जाता है।  इसलिए इसके इलाज़ में किसी विशेष दवा की आवश्यकता नहीं होती।

बस तापमान को कम रखने के लिए पैरासिटामोल की गोली ही काफी है।  

३ )  Chalazion : यह एक मेडिकल टर्म है।  यह वास्तव में आँखों की पलकों में एक गाँठ के रूप में दिखाई देती है। इसकी शुरुआत होती है पलक में मौजूद मीबोमिअन ग्लैंड ( तेल ग्रंथि ) में संक्रमण होने से।  अक्सर ऐसा आँखों पर गंदे हाथ लगने से होता है। शुरू में ग्रंथि में सूजन और तेज दर्द होता है।  इस अवस्था में एंटीबायोटिक्स से इसे ठीक किया जा सकता है।  लेकिन एक बार पुराना हो गया तो तेल ग्रंथि में रुकावट होने से एक गांठ बन जाती है जिसमे न दर्द होता है , न ही कोई और तक़लीफ़।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है।  इसलिए रोगी डॉक्टर के पास जाता है।

अक्सर डॉक्टर इसका ऑप्रेशन करने की सलाह देते हैं। क्योंकि इस पर एंटीबायोटिक्स का कोई प्रभाव नहीं होता।

लेकिन इस दशा में किसी उपचार की ज़रुरत नहीं होती। बस साफ रुई को गर्म  पानी में डुबोकर दिन में कई बार इसकी सिकाई करें , कुछ ही दिनों में यह गांठ गायब हो जाएगी। बिलकुल चमत्कारिक ढंग से।

४ ) Ganglion  :  यह भी एक गांठ जैसी ही होती है जो अक्सर हाथ पर या हथेली के जोड़ के पास बन जाती है।  इसमें भी कोई दर्द नहीं होता।  न ही इससे कोई हानि होती है।  लेकिन देखने में भद्दी लगती है या कभी कभी चोट आदि लगने से परेशानी हो सकती है।

डॉक्टर इसके इलाज़ के लिए या तो सिरिंज से इसका पानी निकाल कर पट्टी बाँध देंगे या ऑप्रेशन द्वारा काट कर निकाल देंगे। अक्सर इसमें स्टीरॉयड्स का इंजेक्शन लगाकर भी इलाज़ किया जाता है।  लेकिन इन सबके बाद भी दोबारा होने की सम्भावना काफी ज्यादा रहती है।

लेकिन यदि इसमें कोई दर्द नहीं है और डॉक्टर ने इसे गैंगलिओन ही बताया है तो चिंता की कोई बात नहीं है।  क्योंकि अक्सर यह कुछ समय के बाद स्वयं ही पिघल जाती है और अचानक गायब हो जाती है।  प्रकृति का एक और चमत्कार।

५ )  मस्से ( warts ) : अक्सर हाथों पर या चेहरे पर बन जाते हैं। अक्सर इनमे कोई दर्द नहीं होता लेकिन देखने में भद्दे लगते हैं।  ये भी एक वायरल संक्रमण के कारण होते हैं।  

डॉक्टर इन्हें तरह तरह से ठीक करते हैं लेकिन यदि इलाज़ नहीं भी किया जाये तो कुछ ही दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं।  अक्सर पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स दर्द करते है और चलना मुश्किल कर देते हैं।  कई बार इनका ऑप्रेशन करना पड़ सकता है।

यदि दर्द नहीं है तो कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।  कुछ समय बाद ये स्वयं ठीक हो जायेंगे। पैर के तलवे में होने वाले वार्ट्स होमिओपैथी के इलाज़ से जल्दी ठीक हो जाते हैं।

इस तरह प्रकृति रोगों से स्वयं ही हमारा बचाव करती है।  लेकिन इसके लिए एक बार डॉक्टर से परामर्श कर यह सुनिश्चित अवश्य करा लें कि रोग का निदान सही है।  यदि निदान गलत हुआ तो बहुत हानि भी हो सकती है क्योंकि किसी भी रोग का इलाज़ यदि जल्दी किया जाये तो ठीक होने की सम्भावना ज्यादा रहती है।  इसलिए सेल्फ ट्रीटमेंट कभी नहीं करना करना चाहिए।  जो भी करें , डॉक्टर की देख रेख में ही करें ।  

Friday, May 28, 2010

कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है ---

हमारा देश एक विशाल देश है। यहाँ जितनी विविधताएँ और अनेकतायें देखने को मिलती हैं , उतनी शायद कहीं और नहीं मिलेंगी। उत्तर में हिमालय पर्वत श्रंखला , दक्षिण में कन्याकुमारी में मिलते तीन तीन सागर , पश्चिम में सूखा रेगिस्तान और पूर्व में सबसे अधिक बारिस वाला क्षेत्र

इसीलिए हमारा देश पर्यटकों के लिए स्वर्ग समान है

लेकिन यही हाल आम जिंदगी में भी देखने को मिलता है ।
फर्क बस इतना है कि इस विविधता से स्वर्ग के साथ नर्क के भी यहाँ होने का अहसास होता है

कहीं जगमगाते शहर हैं , तो कहीं अँधेरे में डूबे झोंपड़ पट्टी वाले सूखे से गाँव ।
शहरों में भी ऊंची ऊंची आलीशान कोठियों की छाया में बसी झोंपड़ियाँ ।
कुछ इतने अमीर कि पूरा शहर खरीद लें , कुछ इतने गरीब कि एक रोटी भी नसीब नहीं ।
कहीं डिस्को पर थिरकते नौजवान , तो कहीं ३५ की उम्र में बूढ़े लगने वाले खों खों करते बीमार ।
कहीं मंदिर, मस्जिद , गुरूद्वारे और गिरिजाघर में भक्तजन तो कहीं छोटी छोटी कोठरियों में देह व्यापार करती बालाएं।
कोई मदर टेरेसा , महात्मा गाँधी , या विनोबा भावे सा सच्चा समाज सेवक , तो कोई देश को घुन और दीमक की तरह चट कर जाने वाला भृष्ट देशद्रोही ।

ये सब यहाँ एक साथ नज़र आते हैं ।

इनमे से ज्यादातर मानव निर्मित कुंठाएं हैं । हालाँकि , कुछ प्रकृति की भी देन हैं । यह जानकर आश्चर्य होता है कि कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है

अब इस नीचे वाले चित्र को ही देखिये । एक ही पेड़ का आधा भाग हरा , और आधा सूखा । यह तो ऐसा हो गया जैसे दो भाइयों में एक अमीर और दूसरा गरीब । यानि प्रकृति में भी दोहरे मांप दंड !


यह चित्र मैंने १९९४ में लिया था । इसमें दूर क्षितिज के पास समुद्र का पानी नज़र आ रहा है । बीच में घनी हरियाली । और यह पेड़ एक पहाड़ी पर था । यहाँ देश विदेश से रोज सैंकड़ों पर्यटक घूमने आते हैं । यह स्थान समुद्र के बीच में है ।

क्या आप बता सकते हैं इस जगह का नाम ? और इस वृक्ष की ऐसी दशा क्यों है ?