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Wednesday, January 15, 2014

सादा और अनुशासित जीवन , खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है ---



आप २५ वर्ष के युवा हों या ५० वर्ष के अधेड़ , मामला जब दिल का आता है तो सभी आयु वर्ग के लोग दिल के टूटने से घायल होते हैं।  जहाँ पहले अलग अलग आयु में दिल टूटने के कारण भी अलग अलग होते थे , वहीँ आजकल ये दूरियां मिट सी गई हैं और हर आयु में दिल की स्थिति नाज़ुक सी ही बनी रहती है।  
यानि आजकल  युवाओं को भी प्रौढ़ आयु वर्ग के रोग लगने लगे हैं।  यह आधुनिक जीवन शैली का ही परिणाम है कि आजकल युवाओं को भी ह्रदयाघात ( हार्ट अटैक ) होने लगे हैं।   

क्यों होता है हृदयाघात : 

कहते हैं पेड़ अपने फल नहीं खाते , नदियां अपना पानी नहीं पीती।  लेकिन यह भी सच है कि रसोइये को भी खाना खाना पड़ता है , डॉक्टर भी बीमार पड़ते हैं। दिल का मामला भी कुछ इसी तरह का होता है।  सारे शरीर को रक्त पहुंचाने वाले दिल को स्वयं के लिए भी रक्त की आवश्यकता होती है।  



यह काम जो नसें करती हैं उन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहते हैं।  हृदय से एओर्टा द्वारा रक्त सारे शरीर में जाता है।  इसी से निकलती हैं दो धमनियां जिन्हे दायीं और बायीं कोरोनरी आर्टरी कहते हैं।  ये अलग अलग शाखाओं में बंटकर सारे हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुंचाती हैं। यदि इनमे कहीं भी रुकावट पैदा हो जाये तो रक्त प्रवाह में बाधा आ सकती है जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त हृदय के उत्तकों तक नहीं पहुँच पाता । ऐसे में  ऑक्सीजन और ऊर्ज़ा के भूखे उत्तक चिल्लाने लगते हैं जिसे एंजाइना कहते हैं।

मूलत: एंजाइना हृदय की एक  पुकार है आपको याद दिलाने के लिए कि उसे भी खुराक चाहिए जो पूरी नहीं हो पा रही है।  यदि अब भी आपने नहीं सुना तो यह पुकार सदा के लिए शांत हो जाती है , हार्ट अटैक के रूप में।

एंजाइना के लक्षण : 

अक्सर छाती में बायीं ओर होने वाले दर्द को एंजाइना समझा जाता है।  लेकिन सिर्फ दर्द ही नहीं बल्कि किसी भी तरह की चुभन , जलन या भारीपन भी एंजाइना हो सकता है।  इसके अलावा बायीं ओर दांत में दर्द , कंधे में दर्द या बाजु में होने वाला दर्द भी एंजाइना हो सकता है।  पसलियों के बीच पेट के ऊपरी हिस्से ( एपीगेस्ट्रियम) में होने वाले दर्द या जलन को अक्सर एसिडिटी मान लिया जाता है जबकि यह भी एंजाइना हो सकता है।  दर्द के साथ यदि पसीना भी आ गया है या घबराहट होने लगी है या दिल में धड़कन महसूस हो रही है तो यह एंजाइना होने के स्पष्ट संकेत हैं।

कारण : 

हमारे शरीर की धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल का जमाव निरंतर होता रहता है।  यह बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। यूँ तो कॉलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक पदार्थ है लेकिन इसकी अत्यधिकता भी उतनी ही हानिकारक है।  धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल जमने से इनमे अवरुद्ध पैदा होता है जो रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है।  रक्त प्रवाह कम होने से शरीर के विभिन्न अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  लेकिन इसका सबसे ज्यादा कुप्रभाव  हृदय पर ही पड़ता है।  हृदय में यह एंजाइना के रूप में सामने आता है।  लेकिन यदि इस तरह की अवरुद्ध धमनी में अचानक कोई रुकावट आ जाये तो हार्ट अटैक हो जाता है। अक्सर ऐसा क्लॉट बनने से होता है।

कारक : 

हृदयाघात में फैमिली हिस्ट्री बहुत महत्त्वपूर्ण है।  यानि यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु हृदयाघात से हुई है या निकट सम्बन्धियों में हृदय रोग है तो आप भी रिस्क पर हैं।  इसके अलावा निष्क्रिय जीवन शैली , मोटापा , हाई बल्ड प्रेशर , डायबिटीज , हाई कॉलेस्ट्रॉल , धूम्रपान ,  मानसिक तनाव आदि ऐसे कारक हैं जो हृदयरोग को बढ़ावा देते हैं।

रोकथाम : 

नियमित व्यायाम , आहार नियंत्रण , नियंत्रित वज़न , बल्ड प्रेशर और शुगर कंट्रोल और तनाव रहित जीवन जीने से हृदयाघात की सम्भावना निश्चित रूप से कम हो जाती है। नियमित रूप से ४५ मिनट की पैदल  यात्रा सबसे बढ़िया व्यायाम है।  खाना उतना ही खाया जाये जितना आवश्यक है।  यानि सिर्फ जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जीयें ।  मोटा होना सेहतमंद नहीं सेहतबंद होने की निशानी है।  धूम्रपान से हीरो नहीं ज़ीरो होने का रास्ता खुलता है। अंतत : घर का बना खाना ही सर्वोत्तम है, पिज़्ज़ा, बर्गर , मोमोज , नूडल्स आदि तत्काल आहार सेवा जीवन का अंतकाल है।   

उपचार : 

फिर भी यदि एंजाइना हो ही जाये तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।  सबसे पहले ई सी जी किया जायेगा , लेकिन एंजाइना होने पर एंजिओग्राफी लगभग आवश्यक हो जाती है।  इस टेस्ट से धमनी में रुकावट की स्थिति और गम्भीरता का पता चलता है।  यदि रुकावट चिकित्सा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पायी जाती है तो स्टेंट डालना आवश्यक होता है।

हार्ट अटैक : 

हार्ट अटैक होने पर तुरंत पास के हॉस्पिटल में जाना चाहिए। ऐसे में एक एक मिनट कीमती होता है।  अक्सर हार्ट अटैक धमनी में क्लॉट बनने से अचानक हुई रुकावट के कारण होता है।  ऐसे में इंजेक्शन द्वारा क्लॉट को विघटित करने का प्रयास किया जाता है।  इसे थ्रोम्बोलाइजेशन कहते हैं।  क्लॉट के घुलने से बंद हुई धमनी खुल जाती है और रक्त प्रवाह होने लगता है।  इस तरह हृदय की मांसपेशियाँ मृत होने से बच जाती हैं।  यह कम एक घंटे में हो जाये तो सर्वोत्तम है , हालाँकि ३ घंटे तक भी फायदा होने की सम्भावना रहती है। लेकिन जितना जल्दी किया जायेगा ,  फायदा भी उतना ज्यादा होगा।

आधुनिक अस्पतालों में जहाँ एंजिओग्राफी की सुविधा होती है वहाँ तुरंत स्टेंट डालकर धमनियों को खोल दिया जाता है।  यह एक बढ़िया ईलाज़ है और आजकल बहुत उपयोग में लाया जा रहा है।  लेकिन दो से ज्यादा धमनियों में ब्लॉक होने पर बाईपास सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। हालाँकि , उम्र भर दवाईयों का दास तो फिर भी होना ही पड़ता है।

इसलिए रोकथाम में ही भलाई है।  सादा और अनुशासित जीवन ,  खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है।   


Wednesday, August 22, 2012

सावन भादों की फुहार और तरह तरह के बुखार --


सावन में सावन की फुहारें हमेशा सभी को लुभाती रही हैं . लेकिन इस वर्ष सावन में न सावन की काली घटा ही देखने को मिली , न सावन की फुहारें . हालाँकि इसकी कमी भादों में आकर दूर हो गई . इस वर्ष भादों भी दो महीने तक रहेगा . शायद इसीलिए अब खूब बारिस हो रही है .

काली घटा छाए, मोरा जिया ललचाये
ऐसे में कहीं कोई मिल जाए , हाए ---

सावन में यह गाना किसी नवयुवती के अधरों पर स्वत: ही आ जाता है . लेकिन कोई मिला हो या न मिला हो , इस मौसम में कुछ और मिलने वाले बिन बुलाये मेहमान की तरह आ मिलते हैं और दुःख देकर चले जाते हैं . ऐसे ही बिन बुलाये मेहमान हैं वाइरस और मच्छर जो इस मौसम में तरह तरह की बीमारियाँ लेकर आते हैं . और नतीजा होता है -- बुखार .

इस मौसम में बुखार के कारण :

१) वाइरल फीवर :

सबसे मुख्य और आम कारण है -- वाइरल बुखार . अक्सर इसमें पहले जुकाम और गला ख़राब होता है , साथ में बुखार आ जाता है . यह आम तौर पर ३-४ दिन में ठीक हो जाता है . लेकिन कभी कभी सेकंडरी इन्फेक्शन होने से ज्यादा दिन भी लग सकते हैं . विशेषकर डायबिटीज में यह सम्भावना ज्यादा रहती है . वाइरल फीवर बिना जुकाम और गला ख़राब के भी हो सकता है जिसमे सर दर्द और बदन दर्द होता है . यह ज्वर अक्सर १- ७ दिन में उतर जाता है .

उपचार : बुखार के लिए सर्वोत्तम है -- पेरासिटामोल की गोली जो वयस्कों में एक गोली हर ४-६ घंटे में ली जा सकती है . साथ ही तेज बुखार होने पर हाइड्रोथेरपी की जा सकती है . इसका तरीका यहाँ देखा जा सकता है . इसके अतिरिक्त जुकाम के लिए एंटीहिस्टामिनिक ली जा सकती है . सेलाइन गार्ग्ल्स करने से गले में आराम आएगा . यदि खांसी ज्यादा हो जाए तो एंटीबायोटिक्स देनी पड़ेंगी .

२) मलेरिया : इस मौसम में मच्छरों की भरमार होने से सबसे ज्यादा खतरा रहता है मलेरिया होने का . हालाँकि मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा चुका है . लेकिन इस वर्ष फिर से मलेरिया के काफी रोगी देखने में आ रहे हैं .
मलेरिया में बुखार जाड़े के साथ आता है यानि जब बुखार बढ़ने लगता है तब रोगी को ठण्ड लगती है और कंपकपी आने लगती है . अक्सर बुखार एक या दो दिन में उतरकर फिर चढ़ता है . ऐसे में तुरंत मलेरिया के लिए खून की जाँच करानी चाहिए .

३) डेंगू : मच्छरों की एक दूसरी किस्म से होता है डेंगू, जिसमे बुखार के साथ सर दर्द और आँखों के पीछे दर्द होता है और शरीर में लाल दाने उभर आते हैं जिसे रैश कहते हैं . यह प्लेटलेट्स कम होने से होता है . ज्यादा कम होने पर रक्त रिसाव भी हो सकता है .

४) चिकनगुन्या : यह भी डेंगू की तरह मच्छर के काटने से ही होता है . लेकिन इस बुखार में जोड़ों में दर्द ज्यादा होता है जो महीनों तक भी रह सकता है .

विशेष सावधानी की बातें :

मलेरिया को छोड़कर , सभी तरह के वाइरल फीवर सेल्फ लिमिटिंग होते हैं यानि स्वत: ठीक हो जाते हैं . दवा सिर्फ लक्षणों के आधार पर दी जाती है . लेकिन डॉक्टर की सलाह लेना अनिवार्य होता है क्योंकि स्वयं इलाज़ करने से कहीं चूक हो सकती है जो खतरनाक भी हो सकती है . हालाँकि कुछ बातों का विशेष ध्यान आवश्यक होता है
जैसे --
* वाइरल फीवर में एस्प्रिन कभी नहीं लेनी चाहिए . सबसे उपयुक्त पेरासिटामोल है .
* शरीर में पानी की कमी न हो , इसलिए द्रव पदार्थों जैसे सादा पानी , दूध , चाय आदि का सेवन करते रहना चाहिए
* हल्का खाना लेना भी ज़रूरी है ताकि कमज़ोरी न हो और पोषण मिलता रहे .
* अक्सर एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता नहीं होती . लेकिन यदि गला ज्यादा खराब हो जाए , या गले में दर्द होने लगे तो डॉक्टर की सलाह पर उचित दवा लेनी चाहिए .
* अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक्स लेने से बचना चाहिए . ये न सिर्फ हानिकारक हो सकती है , बल्कि रेजिस्टेंस भी पैदा हो सकता है जिससे भविष्य में इसकी उपयोगिता ख़त्म हो सकती है .

एक दिलचस्प बात :

अक्सर देखा गया है -- वाइरल फीवर एक डॉक्टर की रेप्युटेशन बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है . इसकी वज़ह है इसका १-७ दिन में स्वत: ठीक हो जाना . लेकिन क्योंकि कोई नहीं जानता , बुखार एक दिन में उतरेगा या ७ दिन में , इसलिए यह कहना मुश्किल होता है की कब उतरेगा . ऐसे में जब एक रोगी एक डॉक्टर से ६ दिनों तक इलाज़ कराकर बुखार न उतरने से दुखी हो जाता है , तब वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास चला जाता है . फिर उस का बुखार एक दिन में उतर जाता है . रोगी समझता है बुखार उस डॉक्टर की दवा से उतरा है . बस समझिये वह रोगी उस डॉक्टर का भक्त बन गया जबकि बुखार उतरने में उस डॉक्टर का कोई रोल था ही नहीं .

हालाँकि यह बात सिर्फ डॉक्टर ही समझता है . आप भी समझ लेंगे तो और भी अच्छा रहेगा .


Sunday, July 29, 2012

क्या हो , जब आना चाहे और आ ना पाए --- एक समस्या जो पुरुषों में कॉमन है !

इन्सान पर तरह तरह के प्रैशर होते हैं -- बचपन से लेकर बुढ़ापे तक . बचपन में पढाई का प्रैशर , ज़वानी में ज़वानी का , किसी को अत्यधिक काम का प्रैशर , किसी को काम न मिलने का। किसी को कमाई का प्रैशर , किसी को कमाई को छुपाने का , किसी को ब्लड प्रैशर , किसी को दिमागी प्रैशर। 

लेकिन कुछ प्रैशर ऐसे भी ओते हैं जो आए तो मुसीबत ,न आए तो मुसीबत। 

सुबह सुबह एक दिन जब अस्पताल पहुंचा तो देखा , कहीं से कराहने की आवाज़ आ रही थी। ध्यान से देखने पर पता चला -- एक वृद्ध गेट के सामने झाड़ियों में बैठा था और कराह रहा था। उसकी स्थिति और परिस्थिति देखकर हम समझ गए -- यह भी प्रैशर में है।  लेकिन प्रैशर था कि कम ही नहीं हो रहा था। बेचारा दर्द के मारे कराह रहा था। 

ज़रा सोचिये , आपको अचानक शौच या मूत्र आ जाए और आप कर ही न पायें। यूँ तो प्रकृति ने इन्हें थामे रखने के लिए उपयुक्त प्रबंध किये हैं लेकिन एक सीमा के बाद थामे रखना असंभव हो जाता है। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी होती है जब आप करना तो चाहते हैं, उपयुक्त स्थान भी मिल जाता है , लेकिन फिर भी मूत्र वित्सर्जन नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति अक्सर पुरुषों के साथ आती है। 

क्या कारण होते हैं इस स्थिति के ?

अक्सर मूत्र या मूत्र नली में संक्रमण से ऐसी स्थिति आती है जब जलन की वज़ह से मूत्र वित्सर्जन में दिक्कत आती है। लेकिन वृद्ध पुरुषों में एक विशेष स्थिति होती है जिसे हम कहते हैं --प्रोस्टेट एनलार्जमेंट। यानि प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब में रुकावट पैदा होने लगती है जो अक्सर ५५-६० की उम्र से ऊपर के लोगों को होती है। 

चित्र गूगल से साभार

प्रोस्टेट :

यह पुरुषों के शरीर में मूत्र नली के साथ एक ग्रंथि होती है जिससे एक विशेष श्राव निकलता है जिससे मूत्र मार्ग गीला रहता है। वीर्य का करीब २० % भाग प्रोस्टेट में बनता है। प्रोस्टेट वीर्य को स्टोर करके भी रखता है। लेकिन समय के साथ इसका साइज़ बढ़ता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब यह पेशाब में रुकावट पैदा करने लगता है। इसे बी एच पी कहते हैं -- बिनाइन हाइपरप्लेजिया ऑफ़ प्रोस्टेट। यह बढती उम्र के साथ अवश्यम्भावी है। लगभग आधे मर्दों को ५० वर्ष की आयु तक पहुँचने पर यह समस्या आ सकती है। समय के साथ प्रोस्टेट का साइज़ बढ़ता जाता है। ७० -८० की उम्र तक इसमें कैंसर बनने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। इसमें कैंसर बनने की सम्भावना उम्र के साथ बढती रहती है। ८० वर्ष की आयु के ८० % लोगों को प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है। हालाँकि यह बहुत धीरे धीरे होता है , इसलिए पता भी नहीं चलता। अक्सर यह पोस्ट मॉर्टम पर ही पता चलता है। लेकिन कभी कभी यह तेजी से भी बढ़ सकता है जो खतरनाक हो सकता है। 

बी एच पी के लक्षण :

प्रोस्टेट बढ़ जाने से पेशाब करने में दिक्कत होने लगती है। जहाँ पहले आपको पेशाब करने में २-३ मिनट्स लगते थे , अब यह समय बढ़ने लगता है। पेशाब की धार भी पतली और एक से ज्यादा हो सकती है। लेकिन सबसे मुख्य लक्षण है -- पेशाब की शुरुआत होने में देरी -- यानि आप करना तो चाहते हैं लेकिन पेशाब हो ही नहीं रहा , जैसा इस वृद्ध के साथ हो रहा था। ऐसे में यदि प्रैशर ज्यादा हो या ब्लैडर फुल हो तो दर्द के मारे जान सी निकल जाती है। 
फ़ुल ब्लैडर में रुकावट होने पर एक इमरजेंसी की स्थिति बन जाती है। ऐसे में अक्सर मरीज़ को अस्पताल आना पड़ता है। 
अन्य लक्षण हैं -- पेशाब बार बार आना , अचानक प्रैशर बन जाना , रात में बार बार पेशाब के लिए उठना, जलन होना आदि।  

यदि पेशाब रुक जाए तो क्या करें ?

यूरिनल में रिलैक्स होकर बैठने या खड़े होने की कोशिश करें। अक्सर बहते पानी की आवाज़ से मदद मिलती है। पेट के निचले हिस्से पर गर्म कपड़ा रखने से भी पेशाब आने में सहायता मिलती है। 
इमरजेंसी होने पर तो अस्पताल जाना ही पड़ेगा। 
अस्पताल में पहले कैथिटर डालकर पेशाब निकाला जाता है। लेकिन कभी कभी कैथिटर भी नहीं घुस पाता। ऐसे में सीधे ब्लैडर में सूई डालकर प्रैशर कम किया जाता है। लम्बे समय के लिए कैथिटर डालकर छोड़ दिया जाता है। बेशक रोगी के लिए अत्यंत कष्टदायक स्थिति होती है। 

उपचार :

प्रोस्टेट का साइज़ पढने पर इसका ऑपरेशन आवश्यक हो जाता है। इसके लिए आजकल कई तकनीक हैं जिसमे चीर फाड़ नहीं करनी पड़ती। हालाँकि अत्यधिक बढ़ने पर ओपन ऑपरेशन ज़रूरी हो सकता है। 

आजकल सबसे पहले दवाओं से उपचार करते हैं जिनके परिणाम काफी अच्छे हैं और सर्जरी को टाला जा सकता है।
बिना सर्जरी किये भी कई तकनीक हैं जिनसे प्रोस्टेट को जला दिया जाता है जिनमे प्रमुख हैं -- लेज़र , ऊष्मा या विकिरण द्वारा प्रोस्टेट का इलाज। 

ट्रांस युरेथ्रल रिसेक्शन ऑफ़ प्रोस्टेट में पेशाब के रास्ते नली डालकर प्रोस्टेट को खुरच कर निकाल दिया जाता है। 

लेकिन साइज़ ज्यादा बड़ा होने या कैंसर होने पर ओपन सर्जरी की ज़रुरत पड़ सकती है। 

प्रोस्टेट कैंसर :

इसकी जाँच के लिए ५० से ऊपर के सभी पुरुषों को पी एस ऐ ( PSA ) की रक्त जाँच करानी चाहिए , विशेषकर यदि कोई लक्षण हों। बढ़ा हुआ पी एस ऐ कैंसर की सम्भावना को उजागर करता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। 

कैसे बचें :

प्रोस्टेट कैंसर अमेरिका और यूरोप में बहुतायत में पाया जाता है जहाँ यह दूसरे नंबर पर आता है , फेफड़ों के कैंसर के बाद। इसमें रैड मीट और अत्यधिक शराब के सेवन का रोल होता है , साथ ही जेनेटिक कारण भी होता है। शुक्र है , एसिया और हमारे देश में यह विरला ही होता है। इसका एक कारण शाकाहारी भोजन और सादा जीवन हो सकता है। 

एक दिलचस्प पहलु :

ऐसा माना गया है , नियमित रूप से इजेकुलेशन करते रहने से प्रोस्टेट कैंसर होने की सम्भावना काफी कम हो जाती है। हालाँकि अनेक पार्टनर्स के साथ सम्भोग करने से सम्भावना बढती है। इसलिए एक विवाहित पुरुष के लिए ज़रूरी है , गीतानुसार ब्रह्मचर्य का पालन करना यानि संबंधों में नैतिक ईमानदारी बरतना। 
यह अलग बात है , एक उम्र के बाद पति पत्नी में भी यौन सम्बन्ध धीरे धीरे कम हो जाते हैं। लेकिन यह तो आप पर ही निर्भर करता है , आप अपने आप को कितना ज़वान या बूढा समझते हैं !


Saturday, May 12, 2012

ज़रा संभल के --- स्वास्थ्य के मामले में चमत्कार नहीं होते .


शायद हमारा देश ही एक ऐसा देश होगा जहाँ रोगों का इलाज करने के लिए दादी नानी से लेकर साधु बाबा तक सभी चिकित्सक का काम धड़ल्ले से करते हैं . न सिर्फ मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धतियाँ ही अनेक हैं , बल्कि यहाँ बिना किसी डिग्री धारण किये और बिना सरकार से मान्यता प्राप्त किये अनेकों सिद्ध पुरुष , स्व घोषित चिकित्सक और घराने/ सफ़ाखाने मोटी रकम वसूल कर धर्मभीरु और मूढमति जनता को लूटते हुए मिल जायेंगे .

आजकल टी वी पर भी ऐसे अनेकों कार्यक्रम दिखाई देने लगे हैं जहाँ कोई ज्योतिषी, पंडित जी , टेरो कार्ड रीडर , वास्तु एक्सपर्ट , साधु , बाबा या कोई भी पहचान रहित बंदा पेट के कीड़ों से लेकर कैंसर तक का शर्तिया इलाज करने का दावा करते हैं .

हमें तो सबसे ज्यादा हास्यस्पद तब लगता है जब एक ज्योतिषी अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाता है और फोन पर किसी की स्वास्थ्य समस्या सुनकर तुरंत computerized इलाज बता देता है .

एक हरियाणवी लाला तो हर बीमारी का इलाज घर में मिलने वाले मसालों से ही बता देता है . माना हल्दी बड़ी गुणकारी है लेकिन हर तरह के रोग इसके सेवन से ठीक हो जाते तो सैकड़ों दवा निर्माण कम्पनियाँ ( pharmaceutical firms ) बंद न हो जाएँ . ऊपर से ज़नाब हर फोन करने वाले को यह भी बताते हैं , हमारा पैकेज खरीद लो , शर्तिया फायदा होगा . पैकेज भी सौ दो सौ का नहीं बल्कि तीन से चार हज़ार रूपये का . हम तो इस कार्यक्रम को बस दो चार मिनट के लिए एक हास्य कार्यक्रम के रूप में देखते हैं .

एक और कार्यक्रम जो टी वी पर बहुत लोकप्रिय रहा है वह है किसी बाबा द्वारा आयोजित किये गए सत्संग का सीधा प्रसारण या रिकोर्ड किया हुआ प्रसारण . ऐसा कोई एक बाबा नहीं है . पिछले दस पंद्रह सालों में अनेक बाबाओं ने देश की जनता को अपनी प्रतिभा से भ्रमित कर न सिर्फ अपना दास भक्त बना लिया है बल्कि आज उनका करोड़ों का व्यापार चल रहा है . यह सोच कर भी हैरानी होती है , कैसे कोई गोल गप्पे खाकर / खिलाकर अपनी मुश्किलों का हल निकाल सकता है . लेकिन बाबा ने कहा और भक्त ने आँख बंद कर विश्वास कर लिया. आखिर एक सुखी जीवन के लिए १०००-१५००/- भला क्या मायने रखते हैं .

हमारे देशवासियों की सबसे बड़ी कमजोरी है , चमत्कारों में विश्वास रखना . हालाँकि सभी ओर से निराश होकर मनुष्य अपना विवेक खो जाता है . लेकिन आशा के विरुद्ध आस रखना कहीं न कहीं चमत्कारिक आस्थाओं को ही जन्म देता है . इन्हीं आस्थाओं और अंध विश्वास का फायदा उठाते हैं ये ढोंगी बाबा और धर्म गुरु जिनके पास निश्चित रूप से विलक्षण बुद्धि तो होती है . इस कलियुग में जो दूसरों को बेवक़ूफ़ बना सकता है , वही सिद्ध है ,वही भगवान है , उसी की पूजा होती है -- तन , मन और धन से .

आइये देखते हैं कुछ रोगों से सम्बंधित कुछ विशेष उदाहरण :

एपिलेप्सी :

कई वर्ष पहले ऋषिकेश में एक क्लिनिक का बड़ा बोलबाला था जहाँ एपिलेप्सी का इलाज किया जाता था . इसके संस्थापक और मुख्य चिकित्सक न तो डिग्रीधारी चिकित्सक थे , न मान्यता प्राप्त . फिर भी अख़बारों के मुख्य प्रष्ठ पर बड़े बड़े विज्ञापन आते थे जिनमे उन्हें राष्ट्रपति के ऑनरेरी फिजिसियन होने का दावा किया जाता था . सबसे आश्चर्यजनक बात थी तथाकथित डॉक्टर द्वारा पहली खुराक अपने हाथों से खिलाया जाने का आगृह . फिर तीन महीने की दवा एक साथ --मात्र ५०००-६००० रूपये में .
अंत में इस धोखाधड़ी का भंडा भोड़ हुआ और डॉक्टर साहब को जेल .

सत्य : एपिलेप्सी का इलाज चमत्कारिक नहीं है . एलोपेथी में कई तरह की दवाएं हैं , जिनके सेवन से तीन साल में एपिलेप्सी हमेशा के लिए ठीक हो जाती है . लेकिन ये दवाएं डॉक्टर की देख रेख में ही लेनी चाहिए क्योंकि इनके साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जो हानि कर सकते हैं .

एस्थमा :
हैदराबादी मछली :
इसके बारे में तो सभी ने सुना होगा . एक परिवार जिन्दा मछली में कोई दवा मिलाकर रोगियों को खिलाता है . देश में अलग अलग जगह कैम्प लगाये जाते हैं जहाँ दूर दूर से निराश रोगी इलाज कराने आते हैं . जो शाकाहारी हैं या जिन्दा मछली नहीं निगल सकते , उन्हें दवा केले में मिलाकर खिलाई जाती है . इलाज भले ही मुफ्त में किया जाता हो , लेकिन लोग किराया लगाकर कैम्प तक पहुँचते हैं .
अब सोचने की बात यह है , यदि केले में लेने से उतना ही फायदा होता है जितना मछली में, तो जिन्दा मछली क्यों खिलाई जाती है . क्या है यह दवा ? कितने लोगों को फायदा हुआ है ? यह कोई नहीं जानता .

सत्य :
एस्थमा एक अनुवांशिक रोग है जो परिवारों में चलता है . इसका कोई इलाज नहीं है लेकिन सही दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है . यदि सही तरीके से इलाज न किया जाए तो जान भी जा सकती है , विशेष कर अक्युट अटैक में . इन्हेलर्स के इस्तेमाल से बहुत फायदा होता है . लेकिन इसका इलाज भी एक्सपर्ट की देख रेख में ही कराना चाहिए .

पीलिया ( जौंडिस ) :

यह एक वाइरल संक्रमण है जिससे लीवर ( यकृत ) की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं . लेकिन यह सेल्फ लिमिटिंग होता है . यानि एक से डेढ़ महीने में अपने आप लीवर सेल्स पुनर्जीवित हो जाती हैं . इलाज में सिर्फ बेड रेस्ट और खाने का ध्यान रखना होता है .

लेकिन रोग को ठीक करने के लिए अनेक नीम हकीम जड़ी बूटियों से शर्तिया इलाज का दावा करते हैं . जाने माने ब्लॉगर भाई अविनाश वाचस्पति जी ने स्वयं अपनी दास्ताँ सुनाते हुए लिखा , किस तरह एक ठग ने उनसे हजारों रूपये झाड़ लिए और शरीर में जो रिएक्शन हुई उसके इलाज में उन्हें अलग से पैसा खरचना पड़ा और दर्द सहन करना पड़ा . अंत में हमारी सलाह पर उन्होंने सही जगह इलाज कराया और आज वो लगभग पूर्णतया सही हो चुके हैं .

सत्य : पीलिया का कोई इलाज नहीं होता . यह स्वत : सही हो जाता है . हालाँकि क्रॉनिक हिपेटाईटिस में इलाज ज़रूरी है जो महंगा भी है . लेकिन किसी भी झाड़ फूंस , तंत्र मंत्र या चमत्कारिक दवा के चक्कर में न पड़ें .

ऐसा नहीं है , एलोपेथी ही एक पद्धति है उपचार की . आयर्वेद और होमिओपेथी में भी कई रोगों का अच्छा उपचार होता है . हालाँकि यह क्रॉनिक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है . लेकिन जो विकास एलोपेथी में हुआ है और जो क्रांतिकारी अनुसन्धान यहाँ हुआ है , उसका कोई मुकाबला नहीं है .
अक्सर रोगी यहाँ वहां से सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर गलत हाथों में अपनी जिंदगी थमा देते हैं . यह अत्यंत हानिकारक होता है . उपचार हमेशा सुशिक्षित , मान्यता प्राप्त और क्वालिफाइड डॉक्टर से ही कराना चाहिए . आखिर , यह जिंदगी एक ही बार मिलती है .

नोट : यह पोस्ट जन साधारण के हित में लिखी गई है . किसी व्यक्ति विशेष, समूह या पद्धति के विरुद्ध नहीं है . कृपया अपना विवेक इस्तेमाल करें .




Sunday, December 11, 2011

दूध पीते बच्चे बनें दूध पीते बड़े ---

हरियाणा और पंजाब के लोग घी और दूध के बड़े शौक़ीन होते हैं । हों भी क्यों नहीं , शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को अतिरिक्त ऊर्जा की ज़रुरत पड़ती है । जितनी ऊर्जा देसी घी में होती है उतनी और किसी खाद्य पदार्थ में नहीं होती । घी मिलता है दूध से । दूध मिलता है गाय भैंसों से । भैंस का दूध गाय के दूध की तुलना में ज्यादा गाढ़ा और ऊर्जावान होता है । इसकी वज़ह है भैंस के दूध में गाय के दूध से ज्यादा वसा और प्रोटीन का होना ।

दूध न सिर्फ एक संतुलित आहार है , बल्कि ३-४ महीने तक के बच्चे के लिए सम्पूर्ण आहार भी है । दूध का अधिकांश भाग पानी होता है लेकिन इसमें ७-७.५ % वसा और ९ % एस एन ऍफ़ होता है । एस एन ऍफ़ यानि नॉन फैट सोलिड्स ।

नॉन फैट सोलिड्स :

दूध में वसा के अतिरिक्त जो अन्य पदार्थ होते हैं वे हैं --लैक्टोज (52%), प्रोटीन (36%), मिनरल्स (10%) और विटामिन्स (1.7%)।

वसा से सर्वाधिक , ९ केल्रिज प्रति ग्राम ऊर्जा मिलती है जबकि प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से ४ केल्रिज प्रति ग्राम ऊर्जा मिलती है ।

इनके अतिरिक्त मां के दूध में रोग निरोधक पदार्थ ( इम्यूनोग्लोबुलिंस ) भी होते हैं जो बच्चे को कई तरह के रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं ।

दूध में सबसे ज्यादा काम का मिनरल होता है --कैल्सियम जो हड्डियों को मज़बूत बनाता है । इसीलिए डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को दूध अवश्य पीना चाहिए ।

जहाँ गाँव में दूध एक ही किस्म का मिलता है -गाय या भैंस का दूध ,वहीँ शहरों में दूध अनेक प्रकार के मिलते हैं ।

फुल क्रीम मिल्क : इसमें वसा की मात्रा लगभग ६ - ७.५ % होती है ।
टोंड मिल्क : इसमें फैट ३ % होता है ।
डबल टोंड मिल्क : इसमें फैट कंटेंट बस १.५ % ही होता है ।

लेकिन सभी प्रकार के दूध में एस एन ऍफ़ ९ % ही होता है । दूध की गुणवत्ता दूध में एस एन ऍफ़ की मात्रा से ही मांपी जाती है ।

एक हैरानी की बात यह है कि विकसित देशों में जहाँ फुल क्रीम दूध सस्ता और टोंड दूध महंगा मिलता है , वहीँ हमारे देश में फुल क्रीम महंगा , टोंड उससे सस्ता और डबल टोंड सबसे सस्ता मिलता है ।
कुपोषण वहां भी होता है , और यहाँ भी । क्योंकि वहां ज़रुरत से ज्यादा खाने को मिलता है , यहाँ ज़रुरत से कम ।

कौन सा दूध बढ़िया है ?

शहरों में जहाँ जीवन शैली बहुत निष्क्रिय होती है , दूध में ज्यादा वसा से मिलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा मोटापे को जन्म देती है । इसलिए ज़रूरी है कि दूध में वसा की मात्रा कम से कम हो ।

इसलिए शहरी लोगों को डबल टोंड दूध ही पीना चाहिए । इसमें एस एन ऍफ़ की मात्रा ९ % होने से बाकि सभी पोषक तत्त्व भरपूर मात्रा में मिलते हैं । और सस्ता भी है ।

यानि बचत की बचत और सेहत भी रहे दुरुस्त ।

दूध की कुछ विशेषताएं :

* दूध का सफ़ेद रंग इसमें पाई जाने वाली प्रोटीन --केसीन और कैल्सियम फोस्फेट के मिश्रण की वज़ह से होता है .
* केसीन हीट रेजिस्टेंट होती है , यानि दूध को गर्म करने से खराब नहीं होती .
* गाय के दूध में हल्का पीलापन इसमें मौजूद कैरोटीन की वज़ह से होता है .
* कुछ लोगों को दूध हज्म नहीं होता यानि दूध पीने से पेट में गैस या दस्त लग जाते हैं . यह लैक्टोज का पाचन न होने की वज़ह से होता है . ऐसी हालत में दूध की बजाय दही खानी चाहिए . दही में दूध के सभी गुण पाए जाते हैं और लैक्टो बैसिलाई लैक्टोज को लैक्टिक एसिड में परिवर्तित कर देते हैं जिससे दही का स्वाद भी खट्टा लगता है .
* पैसच्युराईजेशन से दूध संक्रमण रहित रहता है . इसके लिए दूध को ७२ डिग्री सेन्टीग्रेड तक गर्म कर एकदम ४ डिग्री तक ठंडा किया जाता है .
*इस तरह पैकेट बंद पैसच्युराइज्द दूध स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम होता है और सुरक्षित भी . जबकि खुले दूध में सभी तरह की मिलावट और गंदगी मिली होने की सम्भावना रहती है .

अक्सर बच्चे दूध पीने में आना कानी करते हैं . अब यह आप पर निर्भर करता है की आप किस तरह बच्चों को दूध पीने के लिए राज़ी करते हैं .

नोट : अगली पोस्ट में पढ़िए --दूध से आम के आम , और गुठलियों के दाम ।

Thursday, October 27, 2011

जिंदगी के सफ़र के साथ दीवाली का बदलता स्वरुप ---

एक और दीवाली आकर चली गई । एक बार फिर हमने वायु और ध्वनि प्रदूषण से परिपूर्ण बड़े उत्साह से दीवाली का जश्न मनाया ।

लेकिन दीवाली हमेशा ऐसी न थी ।

आज शांति के साथ बैठकर जब हमने दीवाली मनाई तो बचपन की बहुत याद आई ।
आईये देखते हैं , किस तरह बदलता रहा दीवाली का स्वरुप हमारी जिंदगी के सफ़र के साथ ।

१९६०-१९७०

बचपन में गाँव में दीवाली पर हम मशाल जलाते थे । घरों की छतों पर घी के दिए जलाये जाते थे जो तेज हवा की वज़ह से थोड़ी देर में ही बुझ जाते थे । कभी कभार मोमबत्तियां भी जलाई जाती थी ।
लेकिन न पटाखे होते थे , न मिठाई ।
कोई उपहार लेने देने की रिवाज़ भी नहीं थी । यह शायद संसाधनों की कमी के कारण रहा होगा ।

गाँव में हमारे दादाजी हर वर्ष दीवाली पर खील बांटते थे । बाज़ार से एक बोरा भर कर लाया जाता था जो इतना बड़ा होता था कि यदि उसमे गेहूं भरे होते तो कम से कम तीन क्विंटल आ जाते ।
फिर दीवाली के दिन सारे गाँव को आमंत्रित किया जाता और दादाजी अपने हाथों से सबको खील बांटते ।
एक वर्ष खील न मिलने से केले बांटे गए । इतने बड़े केले मैंने जिंदगी में फिर कभी नहीं देखे ।

१९७०-१९८०

इस बीच हम शहर आ गए । यहाँ दीवाली पर पटाखे छोड़े जाते थे । मिठाई के नाम पर मिक्स मिठाई की बड़ी रिवाज़ थी । आस पड़ोस में सब एक दूसरे को एक थाली में कुछ खील और कुछ मिठाई के पीस डालकर, पूजा के प्रसाद के रूप में आदान प्रदान करते थे ।

सभी घरों से लगभग एक जैसा प्रसाद होता था । बड़ा अज़ीब लगता था । क्योंकि अक्सर सबसे घटिया और सस्ती मिठाई को ही दिया जाता था ।
हमारे घर में कोई लड़की या छोटा बच्चा न होने से प्रसाद लौटाने में बड़ी दिक्कत आती थी । यह काम कोई नहीं करना चाहता ।

दीवाली पर जगमगाहट करने के लिए मोमबत्तियां खूब जलाई जाती थी ।
साथ ही ज़ीरो वाट के बल्बों की लड़ी बनाकर लगाते तो रंगत आ जाती ।

१९८० -२०००

इस दौरान हम भी जॉब में सेटल हो गए थे । बाल बच्चे भी हो गए थे । यार दोस्त और सामाजिक सम्बन्ध भी बन गए थे । अत: अब पटाखों के साथ बिजली की तरह तरह की लड़ियाँ लगाकर घर को खूब सजाया जाने लगा ।
मिठाई के साथ अब उपहारों का आदान प्रदान शुरू हुआ । मित्र लोग गिफ्ट लेकर आते और हम बदले की गिफ्ट लेकर उनके घर जाते । अक्सर यह देखा जाता कि जो जितने की गिफ्ट लाया , उसको उतने की गिफ्ट तो दी ही जाए ।

कुछ सालों में रंग बिरंगी फालतू की गिफ्ट्स से घर भर गया । अब यह तय करना मुश्किल होने लगा कि गिफ्ट में क्या दिया जाए ।

और एक दिन गिफ्ट्स का यह आदान प्रदान एक बोझ सा लगने लगा ।
बहुत से लोगों से बस एक ही दिन का मिलना रह गया तो लगा कि यह क्या बकवास है ।
सब तरह की वाहियात वस्तुएं दीवाली पर आसानी से बिक जाती थी । और घर में किसी काम नहीं आती थी ।

इस बीच मिठाइयों का लेन देन कम हो चुका था । उसकी जगह ड्राई फ्रूट्स ने ले ली थी ।

२०००-२०१०

इन दिनों में चाइनीज बम और पटाखों ने बाज़ार पर आधिपत्य कर लिया था । वायु में प्रदूषण बढ़ने लगा था ।
लेन देन में मिठाई आउट हो चुकी थी । ड्राई फ्रूट्स का बोल बाला रहा । साथ ही दो दो तीन तीन गिफ्ट एक साथ देने की रिवाज़ चल पड़ी । ज़ाहिर है , सम्पन्नता की छाप दीवाली पर दिखाई देने लगी ।

लेकिन दीवाली पर बढ़ते ट्रैफिक और उससे होने वाले जाम में फंसकर घंटों बर्बाद होते । आना जाना मुश्किल होने लगा । रस्मे रिवाजें निभाना अब बड़ा सर दर्द बन गया था ।

ऐसे में धीरे धीरे हमने लेन देन बंद करना शुरू किया । शुरू में बड़ा अटपटा लगता था किसी से गिफ्ट लेकर रखना और वापसी में न लौटाना । लेकिन और कोई रास्ता नहीं बचा था ।
इसलिए दो तीन साल में सब लेन देन बंद कर दिया ।

अब बड़ा अफसर होने के नाते कोई गिफ्ट ले ही आए तो क्या करें । वर्ना हमने तो दीवाली पर आराम से शांति (रेखा ) के साथ घर पर बैठना शुरू कर दिया है ।


२०११--

और इस वर्ष फैसला किया है कि अब से दीवाली पर सारी फ़िज़ूलखर्ची बंद ।
अब बस घर की साफ सफाई के साथ रौशनी से सजाया जायेगा और रंगोली बनाकर , शाम को पूजा के साथ लक्ष्मी जी की आराधना कर दीवाली सम्पूर्ण होगी ।

लेकिन सोसायटी के सभी कर्मचारियों की बख्शीश दुगनी कर दी है ताकि किसी ज़रूरतमंद के काम आए और उसे भी दीवाली आने की ख़ुशी हो ।

सभी मित्रों को फोन , एस एम् एस , ई-मेल और ब्लॉग द्वारा मुबारकवाद तो दे ही दी जाती है । आखिर ज़माना भी तो हाई टेक हो गया है ना ।

नोट : दीवाली के बदलते स्वरुप पर आप क्या सोचते हैं , बताइयेगा ज़रूर ।

Sunday, October 16, 2011

यहाँ नर होना भी गुनाह हो सकता है ---


सन २०११ की जनगणना अनुसार देश में मेल फीमेल रेशो ९४० है यानि १००० पुरुषों पर ९४० महिलाएं । केवल केरल और पोंडिचेरी में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है । बाकि सभी राज्यों में पुरुषों की संख्या ज्यादा है । आश्चर्यजनक रूप से मेल फीमेल रेशो केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे कम है , जैसे दमन दीव -६१८, दादर और नागर हवेली --७७५, चंडीगढ़ --८१८ . दिल्ली मे भी यह रेशो ८६६ ही है ।

महिलाओं की संख्या कम होने का मुख्य कारण है, पुत्र की चाह । पुत्र प्राप्ति के लिए अक्सर लोग लिंग जाँच कराकर फिमेल फीटस को अबोर्ट करा देते हैं ।
इसे रोकने के लिए सरकार ने पी एन ड़ी टी एक्ट लागु किया हुआ है । इसके बावजूद भी यह रेशो बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुई है । हालाँकि कुछ फर्क तो आया है ।

क्या आप जानते हैं जो दूध हम पीते हैं , वह कहाँ से आता है । ज़ाहिर है , यह हमारे गाँव और डेरियों से आता है जहाँ पशु पालन होता है । दूध की अधिकांश मात्रा भैसों से आती है । इसका कारण यह है कि जहाँ गाँव में भैंस लगभग हर घर में होती हैं , वहीँ गाय बहुत कम लोग पालते हैं । गायें दूध भी कम देती है और उनके दूध में वसा और प्रोटीन की मात्रा भी कम होती है ।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जहाँ भैंस गाँव के लगभग हर घर में मिलती है , वहीँ भैंसा सारे गाँव में बस एक ही होता है । और उसका काम सिर्फ प्रजनन करना ही होता है । यदि गलती से दूसरा भैंसा आ भी जाये तो पहला भैंसा उसे मार मार कर भगा देता है जैसे जंगल में एक शेर दूसरे शेर को मार भगाता है । यह सत्य हरियाणा और दिल्ली के गाँव में मुख्य रूप से देखा जा सकता है । हालाँकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भैसा गाड़ी में जोतने के काम में लाया जाता है ।

इस तरह गाँव में भैंसें अनेक और भैंसा एक ही होता है ।

ऐसा कैसे संभव होता है ?

होता यह है कि भैंस से पैदा होने वाले बच्चों में मेल फीमेल की रेशो तो लगभग बराबर ही होती है ।फीमेल( कटिया ) को तो प्यार से पाला पोसा जाता है क्योंकि बड़ा होकर वह दूध देती है । लेकिन मेल ( कटड़ा ) बच्चे को थोडा सा बड़ा होते ही बेच दिया जाता है ।
अक्सर खरीदने वाले इन्हें खरीद कर बूचरखाने में ले जाते हैं और वही उनका अंतिम पड़ाव होता है ।

गाँव के घरों में रह जाती हैं सिर्फ फिमेल ( कटिया ) जो बड़ी होकर भैंस बनती है और दूध देकर मालिक के रोजगार का साधन बनती है ।

इस तरह मानव जाति ने अपने फायदे को ध्यान में रख कर भैसों की प्रजाति पर नियंत्रण रखा हुआ है ।

पृथ्वी पर सबसे ज्यादा विकसित प्राणी ने दूसरे प्राणियों की नियति अपने हाथ में कर रखी है ।

भैंसों की प्रजाति में नर और मादा का यह अनुपात सही है या गलत --फैसला आपका ।



Friday, September 30, 2011

झोला छाप ही नहीं , सड़क छाप डॉक्टर भी होते हैं ---

यह तो हम सभी जानते हैं कि जिनके पास मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं होती, लेकिन फिर भी मेडिकल प्रैक्टिस करते हैं , उन्हें झोला छाप डॉक्टर कहते हैं । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके पास न तो डिग्री होती है , न वे प्रैक्टिस करते हैं , फिर भी लोगों का इलाज करते हैं ।

आपने जगह जगह सड़क किनारे टेंट लगा देखा होगा , जिस पर लिखा होगा ----खानदानी सफाखाना ।
या फिर --पहलवान --हड्डी जोड़ तोड़ इलाज ।
या बसों में दवा बेचते भिखारी जैसे लोग ।
और तो और , यदि आप मनाली जैसे हिल स्टेशन पर घूमने जाएँ तो झोला टांगे कोई चरसी सा दिखने वाला व्यक्ति आकर कहेगा --साब थोड़ी सी दूँ --एक बार इस्तेमाल कर के देखिये !

इन्हें सड़क छाप डॉक्टर कह सकते हैं ।

आइये मिलते हैं , कुछ ऐसे ही सड़क छाप डॉक्टरों से :

दृश्य १ :

करीब बीस साल पहले की बात है । मैं बस में बैठा चंडीगढ़ की ओर जा रहा था । अम्बाला के पास बस एक ढाबे पर रुकी तो चलने से पहले बस में एक ऐसा ही व्यक्ति घुस आया और लगा अपनी सुनाने ।
साहेबान , ज़रा ध्यान दीजिये --क्या आपके दांत में कीड़ा है --डॉक्टर की फीस देकर तंग आ चुके हैं --कोई फायदा नहीं हो रहा --घबराइए नहीं --हमारे पास इसका इलाज है ।
एक आदमी से बोला --क्या आपके दांत में कीड़ा लगा है ?
आदमी बोला -जी हाँ ।
साहेबान देखिये , अभी आपके सामने इनके दांत का कीड़ा बाहर आता है एक मिनट में ।
उसके बाद उसने एक छोटी सी शीशी निकाली, उसमे से एक तिल्ली पर द्रव की एक बूँद लगाई और व्यक्ति के मूंह में लगा दिया । थोड़ी देर बाद उसने मूंह खोलने के लिए कहा और ये लो तिल्ली पर एक छोटा सा तिनका जैसा लगा था जिसे दिखाकर बोला --लीजिये साहेबान कीड़ा बाहर आ गया । न कोई ऑपरेशन , न कोई चीर फाड़ और कीड़ा बाहर ।
यदि आप के या आप के किसी रिश्तेदार के दांत में कीड़ा लगा हो तो एक शीशी ले जाइये --कीमत मात्र पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी दस शीशियाँ बिक गई । पचास रूपये संभाल वह चुपचाप नीचे उतर कर गायब हो गया ।

दृश्य २ :

एक छोटे से कस्बे में सड़क पर एक कोने में एक जगह लोगों की भीड़ लगी थी । गोल दायरे में खड़े लोगों के बीच एक मदारी सा व्यक्ति तमाशा दिखा रहा था । फर्क बस इतना था की उसके पास जमूरा नहीं था , बल्कि खुद ही तमाशा दिखाने में लगा था ।
पहले उसने एक कटोरी में पानी लिया । फिर उसमे थोडा लाल रंग मिला दिया । फिर बोला --

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --आपकी आँखें दुखनी आई हों तो आप डॉक्टर के पास जाते हैं । डॉक्टर अपनी फीस ले लेता है लेकिन आपको कोई आराम नहीं आता । आप निराश हो जाते हैं । फिर डॉक्टर बदलते हैं --फिर फीस . फिर कोई आराम नहीं ।

लेकिन निराश न होइये --हमारे पास ऐसा इलाज है जो आँख की हर लाली को मिटा देगा ।
इसके बाद उसने कटोरी के पानी में दो चार बूँद किसी द्रव की डाली --और ये लो , पानी का रंग साफ हो गया ।

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --एक बार तालियाँ हो जाएँ --हमारे इलाज की कोई काट नहीं --नकली साबित करने वाले को हज़ार रूपये का इनाम --और इस इलाज की कीमत --साहेबान कोई १०० रूपये नहीं --पचास भी नहीं --दस भी नहीं --ज़नाब इसकी कीमत है बस पांच रूपये --जी हाँ , सिर्फ पांच रूपये , पांच रूपये , पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी बीस शीशियाँ बिक गई ।

उसके बाद उसने दूसरा तमाशा शुरू किया --

फिर एक कटोरी में पानी -- पानी में एक पाउडर सा डाला --थोड़ी देर में पानी जमकर जैली जैसा हो गया --एक युवक से कहा , इसे उल्टा करके देखो -- जितना मर्जी हिला लो , एक कतरा भी नहीं गिरेगा ---

हम बच्चे थे , कुछ समझ नहीं पाए ।

लेकिन देखते ही देखते उसकी सारी शीशियाँ बिक गई ।

नोट : सड़क छाप डॉक्टर ही नहीं होते , मरीज़ भी होते हैं ।


Tuesday, September 27, 2011

जब दिल की धड़कन बढ़ने लगे और रुकने का नाम ना ले ---

बचपन में गाँव में जब भी कोई बीमार होता तो वैद्ध को बुलाया जाता । दूर से आता था , इसलिए आने पर बच्चों को साथ में दिखा दिया जाता । बच्चे के नाखून देखकर वैद्ध जी बड़ी शान से बताते --इसको खून की कमी है --इसके पेट में कीड़े हैं । उसकी बात सोलह आने सच होती । वैसे भी गाँव के बच्चों में पेट में कीड़े अक्सर हो जाते हैं , खुले में सौच करने की वज़ह से ।

थोड़े बड़े हुए तो नाड़िया वैद्ध के बारे में जाना । बहुत पहुंचे हुए वैद --सिर्फ नाड़ी देखकर ही सारी बिमारियों का इलाज करने वाले । सोचकर ही हैरानी होती थी --यह ऐसे कैसे जान लेते हैं सब ।

डॉक्टर बने तो पता चला --नाड़ी देख कर क्या पता चलता है । और क्या नहीं ।

नाड़ी यानि पल्स --डॉक्टर आम तौर पर रेडियल पल्स का इस्तेमाल करते हैं , रोगी के रोग के बारे में जानने के लिए । इसे हाथ के अंगूठे से थोडा ऊपर उंगली से महसूस किया जाता है ।

नाड़ी से क्या पता चलता है ?

* नाड़ी की गति --सामान्य या तेज या धीमी .
* नाड़ी की नियमितता .
* वोल्यूम और पल्स प्रेशर .
* विशेष किस्म की पल्स .

गति :

फास्ट पल्स ( टेकिकार्डिया ) यानि नाड़ी का तेज चलना । इसके मुख्य कारण होते हैं :

* बुखार --आम तौर पर एक डिग्री फारेन्हाईट तापमान बढ़ने से पल्स १० तक बढ़ जाती है ।
* खून की कमी --एनीमिया .
* हाईपरथायरायडिज्म --इसमें सोते हुए भी पल्स तेज चलती है ।
* नर्वसनेस , बेचैनी, डर
* हाई या लो बी पी
* डीहाईडरेशन ( शरीर में पानी की कमी )
* एक्सरसाइज
* सिगरेट और शराब का अत्यधिक सेवन
* विशेष हृदय रोग

स्लो पल्स के कारण :

* हाईपोथायरायडिज्म
* एथलीट्स
* कुछ दवाईयों का असर जैसे बीटा ब्लोकर्स
* हार्ट ब्लॉक तथा अन्य हृदय रोग
* पोइजनिंग
* टायफोइड ( मियादी बुखार )

इस तरह नाड़ी से मुख्य रूप से सिर्फ नाड़ी का तेज या धीमा होना ही जाना जा सकता है । यह जानकारी कुछ रोगों के निदान में सहायक सिद्ध होती है ।
लेकिन एक जनरल फिजिशियन इससे ज्यादा कुछ नहीं जान सकता । हालाँकि कार्डियोलोजिस्ट कुछ विशेष परिस्थितयों में हृदय रोग से सम्बंधित जानकारी जुटा सकते हैं ।

अब आप ही सोचिये कि एक वैद्ध जो अक्सर अंगूठा छाप या दो चार क्लास पास होता था , उसे नाड़ी देख कर क्या पता चलता होगा ।

लेकिन हमारी जनता भी इतनी भोली रही है कि बस
वैद्ध जी ने कहा और हमने मान लिया । हालाँकि उपचार में विश्वास भी बहुत काम आता है लेकिन उसके लिए भी कोई तो आधार होना चाहिए ।
विशेष :

अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं कि --दिल धड़कने लगा । अब यह किसी सुंदरी को देख कर हो या किसी भयंकर दृश्य को देख कर । लेकिन अचानक दिल की धड़कन महसूस होने लगती है । वैसे तो दिल तब तक धड़कता है जब तक साँस है । लेकिन साँस की तरह दिल की धड़कन का भी तभी पता चलता है , जब यह अचानक तेज हो जाये । इसे पैल्पिटेशन ( palpitation) कहते हैं ।

यदि यह लगातार रहे और अपने आप ठीक न हो तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह किसी गंभीर रोग का लक्षण हो सकता है ।