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Wednesday, December 12, 2012

मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देने --


शनिवार को एक बजे अस्पताल से निकला ही था कि एक फोन आया -- डॉ साहब , मैं आपके अस्पताल से ही बोल रहा हूँ। आप निकल गए क्या ? मैंने पूछा -- आप कौन बोल रहे हैं? वो बोले -- मैं आपके पिताजी का दोस्त बोल रहा हूँ। आपसे मिलना था। मैंने पूछा -- कोई काम था क्या ? बोले -- नहीं , बस आपसे मिलना था , क्या पांच मिनट के लिए आ सकते हैं ? मैं अस्पताल से करीब एक किलोमीटर दूर जा चुका था और ट्रैफिक भी बहुत था। इसलिए थोड़ी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। मैंने पूछा -- आप कहाँ रहते हैं ? उन्होंने बताया -- मैं आगरा में रहता हूँ। आपके पिताजी के निधन के बारे में पता चला तो आपसे मिलना चाहता हूँ। आप बस पांच मिनट के लिए आ सकें तो ! अब तक उनकी आवाज़ रुंध चुकी थी।

मैंने फ़ौरन गाड़ी मोड़ी और वापस आ गया। दुआ सलाम के बाद चाय पानी के साथ उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वो पिताजी के साथ उनके दफ्तर में काम करते थे। दोनों ने एक साथ आई सी एम् आर ज्वाइन किया , और एक साथ रिटायर हुए। बाद में एक साथ दोनों को मलेरिया रिसर्च सेंटर में काम करने का अवसर मिला। पिताजी से उनके विचार बहुत मिलते थे और दोनों गहरे दोस्त थे।

परिचय के बाद असली मुद्ददे पर आते हुए उन्होंने कहा -- मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र  देने। वहां पता चला कि दराल साहब नहीं रहे। वहां से मालूम कर आपके पुराने अस्पताल गया। किसी ने आपके पुराने ऑफिस का पता बताया और वहां पहुंचा तो आपकी जगह बैठे डॉक्टर ने बताया कि आप यहाँ मिलेंगे। दराल साहब जैसे आदमी नहीं रहे , यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। मैंने बताया कि विश्वास तो हमें भी नहीं होता कि ऐसे व्यक्तित्त्व वाला व्यक्ति भी संसार छोड़ कर जा सकता है। लेकिन क्या करें , दुनिया की रीति है , कोई अमर नहीं रह सकता।

फिर काफी देर तक घर परिवार की बातें चलती रही। 82 वर्ष की आयु में भी वे दिल्ली एक शादी में आये थे। आगरा में पति पत्नी अकेले रहते हैं। बेटे बेटी सब अपनी गृहस्थी में व्यस्त अलग अलग शहरों में रहते हैं। उनका स्टेमिना देखकर लगा कि पुराने लोगों का स्वास्थ्य नई पीढ़ी के मुकाबले कितना बेहतर होता है। सभी प्रकार के व्यसनों से दूर रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करना ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

अंत में विदा लेते हुए उन्होंने कहा -- आप से मिल लिया , ऐसा लगा जैसे मैं दराल साहब से ही मिल लिया। उनके मित्र प्रेम के आगे मैं तो नतमस्तक था। और पिताजी की मृत्यु के दो साल बाद उनके करीबी दोस्त से मिलकर मुझे लगा जैसे साक्षात पिताजी ही भेष बदलकर सामने आ खड़े हुए हों , मुझे गर्व से एम् एस की कुर्सी पर बैठे हुए देखने के लिए। यदि जीवित होते तो वे भी आज 82 वर्ष के होते। 


Saturday, August 11, 2012

श्याम की बंसी पुकारे किसका नाम ---


देश विदेश में श्री कृष्ण जी का जन्मदिन जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है . श्री कृष्ण द्वापर में अवतरित हुए थे . कहते हैं , जिस दिन उन्होंने मानव देह का परित्याग किया , उसी दिन से कलियुग का प्रारंभ हुआ . गीतानुसार इसे करीब ५००० वर्ष पूर्व माना जाता है . हालाँकि प्रजापति ब्रह्मा कुमारियों के अनुसार सारी सृष्टि का काल ही ५००० वर्ष है यानि १२५० वर्ष के चार युग मिलाकर हर ५००० वर्ष में नई सृष्टि की रचना होती है . यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो ईसा पूर्व कुछ ही हज़ार वर्ष का इतिहास प्रमाणिक रूप
में उपलब्ध है .

सच्चाई कुछ भी हो , लेकिन जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन पर सारे देश में खूब रौनक रहती है . स्कूलों , कॉलोनियों और मंदिरों में भक्तिपूर्ण वातावरण सबके दिल ओ दिमाग पर छा जाता है . बचपन में जब गाँव में रहते थे , हर जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते थे . दिन में तरह तरह के पकवान बनाये जाते लेकिन हम बस देखते ही रह जाते क्योंकि खाने को तो रात बारह बजे ही मिलते थे . दि
न में शाम के समय दूध के साथ फलाहार अवश्य होता था . लेकिन रात होते ही नींद आ जाती और नींद में ही उठाकर भोजन कराया जाता . तब तक भूख भी ख़त्म हो जाती . अगले दिन उठने पर याद नहीं आता, रात में खाना कब खाया था .

हमारी सोसायटी के मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव हर साल धूम धाम से मनाया जाता है .

हमारी याद में शायद पहली बार ऐसा हुआ -- जब दिन भर जन्माष्टमी का आनंद लेने के बाद रात १२ बजे जब सबने भोग लगाया , तब हमने केक काटा, अपने जन्मदिन का . और खाया खिलाया -- हम पति पत्नी ने एक दूसरे को. इत्तेफाक से १० अगस्त को हमारे ससुर जी का जन्मदिन होता है ,जिसे हमने दिन में ही मना लिया था .

केक खाते समय पत्नी ने हमें कान्हा कह कर पुकारा तो हमने पत्नी से एक सवाल पूछा -- आप हमारी रुक्मणी हैं, या राधा , या मीरा -- या फिर ऑल इन वन ? क्या होना चाहिए उनका ज़वाब ?


Tuesday, December 27, 2011

मिर्ज़ा ग़ालिब --मुग़लों के ज़माने का एक शायर जिन्हें आज भी याद किया जाता है --

दिल्ली के चांदनी चौक की गली बल्लीमारान में दो सौ मीटर जाकर दायें हाथ को आती है गली कासिम जान। इसके बाएं हाथ पर मोड़ से तीसरा या चौथा मकान है--ग़ालिब की हवेली । हालाँकि ग़ालिब यहाँ किराये पर ही रहते थे , लेकिन इस मकान का एक हिस्सा सरकार ने लेकर एक संग्राहलय बना दिया है ।


प्रवेश द्वार से घुसते ही दायें हाथ को एक कमरा है । सामने दो हिस्से हैं । दायाँ प्राइवेट प्रोपर्टी है , बाएं हाथ का हिस्सा ग़ालिब का निवास था ।


छोटा सा ही घर था । बीच में एक आँगन , जिसके बायीं ओर दो कमरे --एक छोटा शायद रसोई या लाइब्रेरी रहा होगा ।
ना कोई देखने वाला था , न दिखाने वाला ।


आँगन की एक दिवार पर यह बोर्ड परिचय देता हुआ ।



सामने वाली दीवार पर एक उर्दू कप्लेट ।



कमरों की दीवारों पर लगे पत्थर ओरिजिनल हैं । ईंटें मरम्मत कर लगाई गई हैं ।




बड़े कमरे से छोटा कमरा मिला हुआ है जिसमे छोटी सी लाइब्रेरी बनी है ।




बड़े कमरे में तीन स्टोर नुमा कमरे से हैं जिनमे संग्रह है । एक में यह मूर्ति -साथ में हम ।




नीचे वाले स्टोर्स के ऊपर भी स्टोर जैसे बने हैं ।



प्रवेश द्वार के पास वाले कमरे में मिर्ज़ा ग़ालिब की मूर्ति की स्थापना की गई है ।




ग़ालिब की मूर्ति ।



मूर्ति के पीछे टंगा है उनका आखिरी फोटो ।



ग़ालिब के लिखे दो लेटर ।



एक दीवार पर उस समय के विशिष्ट लोगों के फोटो लगे हैं । इसके अलावा उनकी मज़ार और अनुवंशाव्ली की भी तस्वीरें लगी हैं ।

परिचय :

आगरा में जन्मे ग़ालिब का परिवार शाही सम्बन्ध रखता था । १३ साल में नवाबी परिवार में शादी हुई । सात बच्चे हुए लेकिन सभी पहले साल में ही गुजर गए ।

ग़ालिब ने कभी कोई काम धंधा नहीं किया । उनकी गुजर बसर शाही अनुदान , दोस्तों की मदद और क़र्ज़ लेकर ही होती थी । शायद इसीलिए लिखा ---

क़र्ज़ की पीते थे लेकर और जानते थे
कि रंग लाएगी हमारी फ़ाकामस्ती एक दिन ।

शराब और जुआ खेलने के भी शौक़ीन थे । जुआ खेलने के चक्कर में जेल भी हो आए ।
उनका कहना था कि जिसने शराब नहीं पी , जुआ नहीं खेला और जेल नहीं गया या फिर माशूक के जूते नहीं खाए --वह शायर हो ही नहीं सकता ।

रोज कहता हूँ न जाऊँगा कभी घर उसके
रोज उस कूचे में इक काम निकल आता है ।

अब पता नहीं कौन से कूचे की बात करते थे । वैसे इस क्षेत्र में तो गलियां ही गलियां हैं , कहीं कहीं तो ऐसी कि स्कूटर भी न जा पाए ।

उनको देखे से जो आ जाती है मूंह पे रौनक
वो समझते हैं , बीमार का हाल अच्छा है ।

वे किस के बीमार थे , इसका ज़िक्र कहीं नहीं आता । बेग़म के तो होने से रहे ।

पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती ।

इसमें उनकी निराशा झलक रही है ।
शायद यह वह समय रहा होगा जब मुग़ल साम्राज्य में उथल पुथल हो गई थी ।

ये न थी हमारी किस्मत के बिसाले यार होता
अगर और जीते रहते , यही इंतजार होता ।

पता नहीं किस के लिए लिखा था ।

२७ दिसंबर १७९७ को जन्मे ग़ालिब का आज जन्मदिन है । इस अवसर पर दिल्ली सरकार द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं ।


Thursday, October 6, 2011

इश्क में तेरे यूँ नाकाम हैं ---

एक इश्किया ग़ज़ल , जो लिखनी तो बहुत पहले चाहिए थी , लेकिन लिखी आज है ।

आप जब से मन को छलने लगे
ख्वाब तब से दिल में पलने लगे ।

डूब कर हुस्न में यूँ खोये रहे
साथ दोस्तों का भी खलने लगे ।

प्यार में तेरे यूँ नाकाम हैं
काम सारे कल पे टलने लगे ।

छोड़ कर दुनिया को तेरे लिये
आँख बंद कर हम तो चलने लगे ।

ग़ैर नज़र जो उठे उनकी तरफ
डाह से दिल अपना जलने लगे ।

लालची तो इतने ना थे कभी
नोट फिर क्यों पर्स में गलने लगे ।

प्यार में जो 'तारीफ' बने "तरु"
फूल पतझड़ में भी खिलने लगे ।
( तरु = लव टरी )

( चौधराइन को समर्पित , जिनका आज जन्मदिन है )।
बीस साल बाद एक बार फिर श्रीमती जी का जन्मदिन दशहरे के दिन आया है ।

नोट
: ग़ज़ल को सीधी सादी, सरल भाषा में लिखा है । क्या करें , टेढ़ी मेढ़ी कठिन भाषा आती भी नहीं ।

Monday, August 22, 2011

क्या आपको अन्ना कहलाने का हक़ है ? जन्माष्टमी विशेष --

आज सारे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना लहर चल रही है ।
जहाँ भी देखो --अन्ना ही अन्ना । मैं भी अन्ना --तू भी अन्ना । अन्ना टोपी -अन्ना टी शर्ट --यहाँ तक कि अन्ना टैटू भी --जैसे एक फैशन सा बन गया है ।

कौन है यह अन्ना ? यह अन्ना क्या है ?

अन्ना कोई व्यक्ति नहीं , यह एक सोच है --विचार है , एक प्रणाली है , व्यवहार है ।

बेशक भ्रष्टाचार के विरुद्ध वर्षों से दबी भावनाएं बाहर आ रही हैं । आम आदमी जो स्वयं को निसहाय महसूस करता है , आज सड़कों पर निकल आया है अपना रोष प्रकट करने ।

लोगों के विशाल जुलूस में चेहरे नज़र आते हैं --छात्रों के , युवाओं के , गृहणियों के , महंगाई से त्रस्त आम कामकाजी लोगों के , छोटे मोटे व्यवसायिक लोगों के ।

समर्थन में आगे आ रहे हैं --स्कूली बच्चे , मुंबई के डिब्बावाले , किन्नर -सभी वर्ग के लोग ।

उनके चेहरे पर वर्षों की यातना नज़र आती है , शोषण नज़र आता है और कूट कूट कर भरा हुआ रोष नज़र आता है ।

रोष प्रणाली की असंवेदनशीलता पर , अपने असहाय होने का , वर्षों तक शोषित होने का ।
अन्ना के रूप में सबको एक मसीहा नज़र आता है । इसीलिए आज हज़ारों की तादाद में लोग सड़कों पर निकल पड़े हैं, घर का आराम छोड़कर ।

लेकिन साथ ही कुछ सवाल भी उठते हैं । हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार है कहाँ ।
देश में ? समाज में ? या स्वयं अपने अन्दर ?

क्या एक टोपी पहनने से आप अन्ना बन सकते हैं ?

क्या आपको अन्ना कहलाने का हक़ है यदि आप :

* कोई काम बिना रिश्वत लिए नहीं करते ?
* सरकारी नौकर हैं लेकिन हर काम में कमीशन चाहते हैं ?
* डॉक्टर हैं लेकिन बिल बढ़ाने के लिए गैर ज़रूरी टेस्ट करवाते हैं ?
* वकील या ज़ज़ हैं और झूठ को सच कर देते हैं ?
* अध्यापक हैं लेकिन विधालय में कम और घर पर ट्यूशन ज्यादा पढ़ाते हैं ?
* व्यापारी हैं पर हर चीज़ में मिलावट करते हैं ?
* ठेकेदार हैं लेकिन घटिया माल लगाकर सबकी जान खतरे में डालते हैं ?
* पुजारी हैं लेकिन बुरी नज़र डालते हैं ?
* समाज सेवक हैं लेकिन दान की राशि से सबसे पहले अपना घर भरते हैं ?
* भक्त हैं , मंदिर में पूजा करते हैं , फिर कुकर्म करते हैं ?

क्या सिर्फ हमारे नेता या आला अफसर ही भ्रष्ट हैं ?
यहाँ आत्म निरीक्षण की ज़रुरत है ।

जन्माष्टमी विशेष :

आज श्री कृष्ण जी का जन्मदिन है ।
श्री कृष्ण--- जिनका जीवन ही संसार के लिए एक वरदान रहा ।
जिन्होंने माखन चोर के रूप में वात्सल्य , गोपियों और राधा संग रास लीला कर प्रेम बरसा कर , मित्र के रूप में सुदामा से दोस्ती निभाकर , और अर्जुन के सारथी के रूप में विश्व को गीता का ज्ञान देकर मृत्युलोक वासियों का मार्गदर्शन किया है ।

आइये उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए निस्वार्थ भावना से अपना कर्म करते हुए आज हम सही रूप में अन्ना बनने का प्रयास करें ।

ईशांक दराल

आज जहाँ सारा देश कान्हा का जन्मदिन मना रहा है । वहीँ परिवार में सबसे बड़े पुत्र और एक समय आस पड़ोस में दसियों लड़कियों में अकेले लड़के होने के नाते सभी आंटियों और दीदियों द्वारा प्यार से कान्हा कहलाये जाने वाले हमारे सुपुत्र का भी आज जन्मदिन है ।

ईशांक जो इंजीनियरिंग का फ़ाइनल वर्ष का छात्र है , आज २१ वर्ष का हो गया है ।


Thursday, August 11, 2011

उम्र पचपन की , दिल बचपन का --

बचपन गाँव में गुजरा . फिर शहर में रहने लगे तो छुटियाँ गाँव में ही बीतती . उन दिनों में भी गाँव में अपना फार्म हाउस था --जी हाँ दादाजी ने गाँव से बाहर दो बीघा खेत में मकान बनाया था . गाँव के पनघट में जब पानी सूख गया तो आधे गाँव द्वारा हमारे फार्म हाउस में लगे हैण्ड पम्प का पानी ही पीने के लिए प्रयोग किया जाने लगा .


गर्मियों की छुट्टियों में पानी लेने आई रंग बिरंगी पोशाक धारण किये पनिहारियों को निहारना निर्मल आनंद की अनुभूति प्रदान करता था .

गाँव की औरतें वैसे जैसे भी रहें , लेकिन पानी भरने जाते समय अपनी सबसे बढ़िया ड्रेस पहन कर आती थी .नई नवेली दुल्हन के तो क्या कहने . घूंघट समेत वस्त्रों से भले ही सारा शरीर ढका हो , लेकिन सिर्फ हाथों को ही देखकर अंदाज़ा हो जाता था कि फलाने की बहु कितनी सुन्दर है .

अब यह हमारी मजबूरी थी कि हमारे घर में हमारे लिए तो बस चाचियाँ , ताइयां और दादियाँ ही थी --बहु कोई नहीं थी .होती भी कैसे --सारे भाई बहनों में सबसे बड़े , खानदान के सबसे बड़े चिराग हमी तो थे .

उसपर ऐसे शर्मीले कि हमारे शर्मीलेपन पर शर्म भी शर्मशार हो जाए .

फिर एक दिन अचानक बड़े हो गए . शहर में रहने लगे . गाँव पूर्ण रूप से छूट गया . शर्माना भी थोडा कम हुआ . जाने कैसे मंच से दोस्ती हो गई . डॉक्टर होने के साथ साथ कब लाफ्टर चैम्पियन , हास्य कवि , और मंच संचालक बन गए , पता ही नहीं चला ।

लेकिन आज भी जब कभी गाँव की किसी चाची या ताई से मुलाकात होती है और वो प्यार से सर पर हाथ रख कर पुचकारती है , तो उसी तरह शर्माकर बच्चा सा महसूस करता हूँ ।

आज उम्र भले ही पचपन की हो गई हो , लेकिन दिल में कहीं न कहीं एक बच्चा अभी भी जिन्दा है ।

शायद यही जिन्दादिली का अहसास कराता रहता है ।

Wednesday, October 6, 2010

वो हंसती हैं तो----

वो
हंसती हैं
तो
खिल उठते हैं
खुशबू लिए
३२ किस्म के फूल।

वो
मुस्कराती हैं
तो
झनझना उठते हैं
दिल की
वीणा के तार ।

थिरकने लगते हैं
लबों पर
हजारों हसीन तराने ।

वो
उदास होती है
तो
उठता है
दर्द सीने में
ज्यों
सिकुड़ गई हों
नसें
दिल
की दीवारों में ।



ये हैं वो , जिनका आज जन्मदिन है ।

Thursday, August 12, 2010

आखिर क्यों हो गई दिल से लिखी पोस्ट स्वाहा ---

हमारे दादाजी घुड़सवारी के बड़े शौक़ीन थे । एक दिन उन्होंने एक शानदार घोड़ी खरीदी । देखने वालों में से किसी ने कहा --बड़ी किस्मत वाली घोड़ी है । देखना नौ महीने के अन्दर आपको पोता मिलेगा । वैसा ही हुआ --ठीक नौ महीने बाद मेरा जन्म हुआ । खानदान में अपनी पीढ़ी की सबसे बड़ी संतान ।

इस तरह पूरे खानदान के करीब १५ भाईयों के ३० बच्चों के हम जन्मजात ताऊ बन गए ।

११ अगस्त को हमारा जन्मदिन था । १० तारीख शाम को श्री पाबला जी का फोन आया --पहली बार फोन पर बात हुई । पहचानने का सवाल ही नहीं था । हम भी हैरान थे कि एक दिन पहले भला कौन हो सकता है बधाई देने वाला । और जब यही बात पाबला जी ने भी कही तो हम फ़ौरन ताड़ गए कि ऐसा व्यक्ति तो एक ही हो सकता है । और इस तरह हुई शुरुआत बधाई संदेशों की ।

हमने भी इस अवसर पर एक पोस्ट लिख डाली और सुबह के लिए सड्युल कर दी ।

अब देखिये इत्तेफाक पर इत्तेफाक ।

* १० अगस्त को ही मालूम पड़ा कि हमारीवाणी पर वायरस अटैक हुआ है ।
* उसी दिन हमने अपने हिंदी प्रेम को आगे बढ़ाते हुए फायर फोक्स का हिंदी वर्जन डाउन लोड कर लिया ।
* ११ अगस्त को ब्लोगिंग में पहचान बनने के बाद प्रथम जन्मदिन ।
* इसी दिन पोस्ट प्रकाशित । सोचा इस बार ब्लॉग दोस्तों के साथ ही मनाएंगे जन्मदिन ।

लेकिन फिर शुरू हुआ निराशाओं का दौर ।

पहली बार ऐसा हुआ कि पोस्ट पब्लिश होने के साढ़े तीन घंटे बाद पहली टिपण्णी आई -श्री रजनीश परिहार जी की। हालाँकि इस बीच श्री समीर लाल जी और ललित जी की इ-मेल आ चुकी थी ।

हमें लगा कि शायद हमारीवाणी का असर हमारे ब्लॉग पर भी पड़ गया है ।

इसी बीच इत्तेफ्क से अक्षिता पाखी की पोस्ट पर ध्यान गया और जाना कि कुछ प्रोब्लम है । लेकिन वहां श्री पाबला जी की जन्मदिन विशेष पोस्ट छपी थी --आज डॉ टी एस दराल का जन्मदिन है ।

लेकिन यह क्या , यहाँ तो टिप्पणियों की भरमार नज़र आ रही थी । सभी जाने माने ब्लोगर साथियों ने हमें अपनी बधाई और शुभकामनायें भेजी हुई थी । लेकिन इन दोस्तों में से सिर्फ खुशदीप सहगल और गोदियाल जी ने हमारी पोस्ट पढ़ी और बधाई दी । शाम को डॉ सिन्हा जी की भी टिप्पणी आई ।

अब यह तो और भी मिस्ट्री बन गई कि यह क्या हुआ कि एक तरफ तो ४२ बधाई सन्देश और दूसरी तरफ हमारे ब्लॉग पर मात्र ५ पुराने दोस्तों ने बधाई सन्देश भेजे ।

खैर बधाइयाँ तो मिल ही चुकी थी ।

लेकिन मिस्ट्री के चक्कर में दिल से लिखी गई एक पोस्ट स्वाहा हो गई ।

फिर भी इत्तेफाक यही ख़त्म नहीं हुआ ।

शाम को जन्मदिन मनाने का कार्क्रम तो था , बच्चों और विशेष मेहमानों के साथ ।
लेकिन ४ से ६ बजे तक इतनी बारिस हुई कि चारो ओर पानी भर गया । टी वी पर देखकर घर से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं हुई ।

और इस तरह हम घर में ही रहकर चाय के साथ पकौड़े खाते रहे ।

२५ साल पुरानी तमन्ना अब जाकर पूरी हुई --कि बाहर बारिस हो रही हो --हम हों वो हों और तीसरा कोई न हो---बालकनी में बैठे हों --साथ में चाय पकौड़े --और हाथ में सिगरेट ।

बस सिगरेट के ज़हर को छोड़ और सब साथ था ।

इस तरह मनाया हमने जन्मदिन ।

अब इसमें भी कोई ग्रहों का चक्र था या नहीं , यह तो संगीता पुरी जी ही बता सकती हैं ।


नोट : शाम को ललित शर्मा जी , राजीव तनेजा जी और यशवंत मेहता के साथ ठहाके लगाकर जन्मदिन का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ ।

आप की बधाई और शुभकामनाओं के लिए सभी नए और पुराने मित्रों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ।

अब एक सवाल :
* यदि आप किसी से प्यार करते हैं तो बोलिए आई लव यू ।
* कभी कभी प्यार करने वाला आई लव यू बोल नहीं पाता ।
* लेकिन यदि आप प्यार एक से करें और आई लव यू किसी दूसरे को बोलें तो ---

आपके ज़वाब का इंतजार रहेगा ।

अभी अभी पता चला है एक नए विश्व कीर्तिमान के बारे में । इस पर वार्ता अगली पोस्ट में ।