गाँव की पगडंडी पर एक महिला चली जा रही थी । सामने से साईकल पर आते एक युवक ने कहा -- अरी बुढियासामने से हट जा । महिला बोली -- भाई, बुढिया तो नहीं थी पर बीमारी ने बना दी । बेशक , शरीर में कोई रोग लगजाए तो मनुष्य समय से पहले ही बूढा हो जाता है । लेकिन रोग न भी हो तो क्या बूढ़े नहीं होते ?
हालाँकि बुढ़ापे की ओर अग्रसर होना किसी को अच्छा नहीं लगता । इसीलिए सभी ज़वान बने रहने की जी तोड़कोशिश करते हैं । एक ज़माना था जब ब्यूटी पार्लर सिर्फ महिलाओं के लिए ही होते थे । लेकिन अब लगता हैमहिलाओं से ज्यादा ब्यूटी ट्रीटमेंट का शौक पुरुषों को है ।
कुछ भी हो लेकिन जब तक आप स्वयं को ज़वान समझते रहें , तब तक अंकल जी कहलाना बिल्कुल नहीं भाता ।हमने यह अनुभव किया अभी कुछ दिन पहले , मार्केट में सब्जी खरीदते हुए जब किसी ने हमें अंकल कह करपुकारा । और तभी मन में उपजी यह ग़ज़ल । हालाँकि ग़ज़ल अक्सर गंभीर विषय पर लिखी जाती है । लेकिन क्याकरें , अपनी तो आदत है ना हर बात में मजाक ढूँढने की ।
जब कोई हमको अंकल जी कहता है ।
आँखें चुंधिया हों या घुटनों में कड़ कड़
दिल तो अपना अब भी धक् धक् करता है ।
बचपन बीता जाने कब यौवन आया
अब इस नाते से गुजरा सा लगता है ।
काला कर डाला बालों को रोगन से
पर ये साला सर ही गंजा दिखता है ।
बूढा ना समझो गलती से भी जानम
बंदा ये अब भी दम भर दम रखता है ।
कह पागल या पुल बांधो 'तारीफों' के
दिल अपना हरदम हंसने को करता है ।
नोट : यह छोटी सी ग़ज़ल श्री देवेन्द्र पाण्डे जी के ब्लॉग पर होली के अवसर पर पढ़े एक हास्य लेख सेप्रेरित होकर लिखी है ।


