ना कोई देखने वाला था , न दिखाने वाला ।
परिचय :
आगरा में जन्मे ग़ालिब का परिवार शाही सम्बन्ध रखता था । १३ साल में नवाबी परिवार में शादी हुई । सात बच्चे हुए लेकिन सभी पहले साल में ही गुजर गए ।
ग़ालिब ने कभी कोई काम धंधा नहीं किया । उनकी गुजर बसर शाही अनुदान , दोस्तों की मदद और क़र्ज़ लेकर ही होती थी । शायद इसीलिए लिखा ---
क़र्ज़ की पीते थे लेकर और जानते थे
कि रंग लाएगी हमारी फ़ाकामस्ती एक दिन ।
शराब और जुआ खेलने के भी शौक़ीन थे । जुआ खेलने के चक्कर में जेल भी हो आए ।
उनका कहना था कि जिसने शराब नहीं पी , जुआ नहीं खेला और जेल नहीं गया या फिर माशूक के जूते नहीं खाए --वह शायर हो ही नहीं सकता ।
रोज कहता हूँ न जाऊँगा कभी घर उसके
रोज उस कूचे में इक काम निकल आता है ।
अब पता नहीं कौन से कूचे की बात करते थे । वैसे इस क्षेत्र में तो गलियां ही गलियां हैं , कहीं कहीं तो ऐसी कि स्कूटर भी न जा पाए ।
उनको देखे से जो आ जाती है मूंह पे रौनक
वो समझते हैं , बीमार का हाल अच्छा है ।
वे किस के बीमार थे , इसका ज़िक्र कहीं नहीं आता । बेग़म के तो होने से रहे ।
पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती ।
इसमें उनकी निराशा झलक रही है ।
शायद यह वह समय रहा होगा जब मुग़ल साम्राज्य में उथल पुथल हो गई थी ।
ये न थी हमारी किस्मत के बिसाले यार होता
अगर और जीते रहते , यही इंतजार होता ।
पता नहीं किस के लिए लिखा था ।
२७ दिसंबर १७९७ को जन्मे ग़ालिब का आज जन्मदिन है । इस अवसर पर दिल्ली सरकार द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं ।

