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Thursday, November 14, 2013

खाली पड़ा पिज़रा हंसा , चला गया उड़ के --- एक श्रद्धांजलि .


पुराने ज़माने में  हरियाणा में लोकगीतों का बड़ा महत्त्व होता था।  गायकों को भजनी कहा जाता था ।  किसी भी विशेष अवसर पर भजनियों को बुलाकर संगीतमय कार्यक्रम ही मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन होता था. भजनी भी दो तरह के गीत या गाने सुनाते थे -- एक पौराणिक गाथाओं से सम्बंधित जिनमे धार्मिक और दार्शनिक सामग्री ज्यादा होती थी . दूसरे रोमांटिक गीत जिन्हे रागनी कहा जाता था . लेकिन सामाजिक कार्यक्रमों मे सिर्फ भजन ही सुनाये जाते थे .


लोकगीतों के गायकों मे लक्ष्मीचंद ( लखमीचंद ) का नाम बड़ा मशहूर था . हमारे पिताजी को भी गाने का बड़ा शौक था . आवाज़ भी अच्छी थी और गाते भी अच्छा थे . उन्ही से अक्सर राजा हरिश्चंद्र के किस्से से लिया गया एक गीत हम सुना करते थे जिसमे सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र सत्‍य पर कायम रहने के लिये अपना सारा राज पाट छोड़ कर एक शमशान भूमि मे नौकरी करने लगता है. एक दिन उनकी रानी उनके बेटे की लाश लेकर दफनाने के लिये आती है जिसे सांप ने काट लिया था . लेकिन राजा शमशान कर मांगता है जिसे वह देने मे असमर्थ रहती है . आखिर लाश के पास बैठी रोने लगती है तब राजा कहता है :

सुनता ना कोई रे , यूं रोवना फिज़ूल है,
विपदा की मारी तेरै, ममता की भूल है !  

खाली पड़ा पिज़रा हंसा , चला गया उड़ के, 
जाये पीछे फेर कोई , आया नहीं मूड के ! 
पांच तत्व जुड़ के सारी, काया का स्थूल है !  
विपदा की मारी तेरै, ममता की भूल है !  

इसी तरह के अनेक गाने हम पिताजी से सुनते आये थे . सिर्फ गाने ही नहीं , उनका हरियाणवी ह्यूमर भी गज़ब का था जो हमारे भी बहुत काम आया . रोज सुबह पार्क की ६-७ किलोमीटर की सैर करना उनके लिये आम बात थी . एक दिन पार्क की पगडंडी पर चलते हुए एक शख्श दो बार सामने से बिना नमस्ते किये हुए निकल गया . तीसरी बार पिताजी ने पकड़ लिया और बोले -- क्यों भाई , तू कोए लाट साब है या डी सी लगा हुआ है ! वो हैरान होकर बोला -- क्यों साहब , कोई गलती हो गई क्या ? पिताजी बोले -- भाई तू तीन बार सामने से गुजर गया , ना दुआ ना सलाम ! ये कोई बात हुई ! अब वो बेचारा क्या बोलता -- सॉरी बोल कर पीछा छुड़ाया . 

उनकी ऐसी ही दबंग बातों से सारे क्षेत्र मे उनका दबदबा आज भी कायम है ! आज उनकी तीसरी पुण्य तिथि है . सच है कि हंस के उड़ जाने के बाद वो कभी वापस नहीं आता ! लेकिन उनकी यादें ओर उनसे सीखे गए सबक सदा याद रहेंगे . 

Wednesday, December 12, 2012

मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देने --


शनिवार को एक बजे अस्पताल से निकला ही था कि एक फोन आया -- डॉ साहब , मैं आपके अस्पताल से ही बोल रहा हूँ। आप निकल गए क्या ? मैंने पूछा -- आप कौन बोल रहे हैं? वो बोले -- मैं आपके पिताजी का दोस्त बोल रहा हूँ। आपसे मिलना था। मैंने पूछा -- कोई काम था क्या ? बोले -- नहीं , बस आपसे मिलना था , क्या पांच मिनट के लिए आ सकते हैं ? मैं अस्पताल से करीब एक किलोमीटर दूर जा चुका था और ट्रैफिक भी बहुत था। इसलिए थोड़ी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। मैंने पूछा -- आप कहाँ रहते हैं ? उन्होंने बताया -- मैं आगरा में रहता हूँ। आपके पिताजी के निधन के बारे में पता चला तो आपसे मिलना चाहता हूँ। आप बस पांच मिनट के लिए आ सकें तो ! अब तक उनकी आवाज़ रुंध चुकी थी।

मैंने फ़ौरन गाड़ी मोड़ी और वापस आ गया। दुआ सलाम के बाद चाय पानी के साथ उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वो पिताजी के साथ उनके दफ्तर में काम करते थे। दोनों ने एक साथ आई सी एम् आर ज्वाइन किया , और एक साथ रिटायर हुए। बाद में एक साथ दोनों को मलेरिया रिसर्च सेंटर में काम करने का अवसर मिला। पिताजी से उनके विचार बहुत मिलते थे और दोनों गहरे दोस्त थे।

परिचय के बाद असली मुद्ददे पर आते हुए उन्होंने कहा -- मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र  देने। वहां पता चला कि दराल साहब नहीं रहे। वहां से मालूम कर आपके पुराने अस्पताल गया। किसी ने आपके पुराने ऑफिस का पता बताया और वहां पहुंचा तो आपकी जगह बैठे डॉक्टर ने बताया कि आप यहाँ मिलेंगे। दराल साहब जैसे आदमी नहीं रहे , यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। मैंने बताया कि विश्वास तो हमें भी नहीं होता कि ऐसे व्यक्तित्त्व वाला व्यक्ति भी संसार छोड़ कर जा सकता है। लेकिन क्या करें , दुनिया की रीति है , कोई अमर नहीं रह सकता।

फिर काफी देर तक घर परिवार की बातें चलती रही। 82 वर्ष की आयु में भी वे दिल्ली एक शादी में आये थे। आगरा में पति पत्नी अकेले रहते हैं। बेटे बेटी सब अपनी गृहस्थी में व्यस्त अलग अलग शहरों में रहते हैं। उनका स्टेमिना देखकर लगा कि पुराने लोगों का स्वास्थ्य नई पीढ़ी के मुकाबले कितना बेहतर होता है। सभी प्रकार के व्यसनों से दूर रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करना ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

अंत में विदा लेते हुए उन्होंने कहा -- आप से मिल लिया , ऐसा लगा जैसे मैं दराल साहब से ही मिल लिया। उनके मित्र प्रेम के आगे मैं तो नतमस्तक था। और पिताजी की मृत्यु के दो साल बाद उनके करीबी दोस्त से मिलकर मुझे लगा जैसे साक्षात पिताजी ही भेष बदलकर सामने आ खड़े हुए हों , मुझे गर्व से एम् एस की कुर्सी पर बैठे हुए देखने के लिए। यदि जीवित होते तो वे भी आज 82 वर्ष के होते। 


Wednesday, November 17, 2010

एक शेर दिल इंसान , जिन्होंने जिंदगी एक शेर की तरह जी --

पिछली पोस्ट में --
तो मूढ़ था , परिस्थितियां लेकिन अवसर ही ऐसा था कि हम न कह ही नहीं सकते थे । इसलिए राम का नाम लेते हुए हम भी पहुँच ही गए ब्लोगर मिलन में ---
----- विवरण आज ही पोस्ट कर दिया है , क्योंकि क्या जाने कल अवसर मिले मिले

ये पंक्तियाँ थीं पिछली पोस्ट में पहली और आखिरी ।

अब यह पूर्वाभास था या अंतर्मन की आवाज़ , या फिर चिकित्सीय दृष्टिकहना मुश्किल है

लकिन अगले दिन गुडगाँव जाते हुए , रास्ते में ही भाई का फोन आया कि पिताजी नहीं रहे ।

लगा जैसे एक युग का अंत हो गया

पिताजी का १४ नवम्बर को दिन के ११-२५ बजे स्वर्गवास हो गया

गत वर्ष जन्मदिन के अवसर पर ।
वो जो कार्यरत रहते हुए , परिवार के उत्थान के लिए कार्य करते रहे । सेवा निवृत होकर समाज के लिए काम करते रहे ।
जिन्होंने अपने साहस और मज़बूत इरादों से न सिर्फ अपने गाँव में विकास कार्यों में अपना योगदान दिया , बल्कि शहर में भी एक मज़बूत स्तम्भ की तरह सामाजिक कार्यों को अपना सर्वस्व प्रदान किया ।

गाँव में १९६० में पक्की सड़क , १९८० में फिरनी ( बाई पास ) का रुका हुआ कार्य , १९९० में गाँव के लोगों की फंसी हुई ज़मीन को डीनोटिफाई कराना आदि ऐसे कार्य थे जिनमे उनका भरपूर योगदान रहा

शहर में सेवा निवृत होकर पहले १० साल मयूर विहार और सन २००० से गुडगाँव के सेक्टर २३ में रहकर वे समाज के लिए ही कार्य करते रहे ।
सभी तरह की सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहकर उन्होंने गुडगाँव के सबसे बड़े सेक्टर को विकसित करने में जी जान से कोशिश की ।

रोज सुबह शाम चार किलोमीटर में फैले सेक्टर का राउंड लेना , कहीं कोई समस्या नज़र आने पर तुरंत कार्यवाही करना , किसी के भी दुःख तकलीफ में आगे बढ़कर मदद करना , मजदूरों और छोटे छोटे दुकानदारों के हितों का ख्याल रखना , सुबह पार्क में सैर करते हुए एक एक व्यक्ति से मिलकर उसका हाल चाल पूछना ---ये ऐसे कार्य थे जिनकी वज़ह से उन्हें सेक्टर का एक एक व्यक्ति जानता और सम्मान करता है

पिछली कई दिनों से सैकड़ों लोगों से मिलकर यही लगा कि वो सेक्टर की जान थे ।
उनके गाए भजन औरों के साथ हमें भी याद हैं ।
बड़े सुरीले स्वर में गाते थे --

सुनता ना कोई रे , यूँ रोवना फ़िज़ूल है
विपदा की मारी तेरे , ममता की भूल है
खाली पड़ा पिंज़रा हंसा , चला गया उड़ कर
जाये पीछे फिर कोई , आया नहीं मुड़कर
पांच तत्व जुड़कर सारी काया का स्थूल है ---

उन्होंने अपनी जिंदगी में साहस और हिम्मत का जो परिचय दिया , उससे यही लगता है कि उन्होंने जिंदगी एक शेर की तरह जी ।

रविवार २१-११-२०१० को .०० बजे , इस दिवंगत आत्मा को श्रधांजलि देने के लिए परिवार ने प्रार्थना सभा का आयोजन किया है , निवास स्थान पर
और तद्पश्चात , उनकी इच्छानुसार भोजन का आयोजन किया है