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Tuesday, December 27, 2011

मिर्ज़ा ग़ालिब --मुग़लों के ज़माने का एक शायर जिन्हें आज भी याद किया जाता है --

दिल्ली के चांदनी चौक की गली बल्लीमारान में दो सौ मीटर जाकर दायें हाथ को आती है गली कासिम जान। इसके बाएं हाथ पर मोड़ से तीसरा या चौथा मकान है--ग़ालिब की हवेली । हालाँकि ग़ालिब यहाँ किराये पर ही रहते थे , लेकिन इस मकान का एक हिस्सा सरकार ने लेकर एक संग्राहलय बना दिया है ।


प्रवेश द्वार से घुसते ही दायें हाथ को एक कमरा है । सामने दो हिस्से हैं । दायाँ प्राइवेट प्रोपर्टी है , बाएं हाथ का हिस्सा ग़ालिब का निवास था ।


छोटा सा ही घर था । बीच में एक आँगन , जिसके बायीं ओर दो कमरे --एक छोटा शायद रसोई या लाइब्रेरी रहा होगा ।
ना कोई देखने वाला था , न दिखाने वाला ।


आँगन की एक दिवार पर यह बोर्ड परिचय देता हुआ ।



सामने वाली दीवार पर एक उर्दू कप्लेट ।



कमरों की दीवारों पर लगे पत्थर ओरिजिनल हैं । ईंटें मरम्मत कर लगाई गई हैं ।




बड़े कमरे से छोटा कमरा मिला हुआ है जिसमे छोटी सी लाइब्रेरी बनी है ।




बड़े कमरे में तीन स्टोर नुमा कमरे से हैं जिनमे संग्रह है । एक में यह मूर्ति -साथ में हम ।




नीचे वाले स्टोर्स के ऊपर भी स्टोर जैसे बने हैं ।



प्रवेश द्वार के पास वाले कमरे में मिर्ज़ा ग़ालिब की मूर्ति की स्थापना की गई है ।




ग़ालिब की मूर्ति ।



मूर्ति के पीछे टंगा है उनका आखिरी फोटो ।



ग़ालिब के लिखे दो लेटर ।



एक दीवार पर उस समय के विशिष्ट लोगों के फोटो लगे हैं । इसके अलावा उनकी मज़ार और अनुवंशाव्ली की भी तस्वीरें लगी हैं ।

परिचय :

आगरा में जन्मे ग़ालिब का परिवार शाही सम्बन्ध रखता था । १३ साल में नवाबी परिवार में शादी हुई । सात बच्चे हुए लेकिन सभी पहले साल में ही गुजर गए ।

ग़ालिब ने कभी कोई काम धंधा नहीं किया । उनकी गुजर बसर शाही अनुदान , दोस्तों की मदद और क़र्ज़ लेकर ही होती थी । शायद इसीलिए लिखा ---

क़र्ज़ की पीते थे लेकर और जानते थे
कि रंग लाएगी हमारी फ़ाकामस्ती एक दिन ।

शराब और जुआ खेलने के भी शौक़ीन थे । जुआ खेलने के चक्कर में जेल भी हो आए ।
उनका कहना था कि जिसने शराब नहीं पी , जुआ नहीं खेला और जेल नहीं गया या फिर माशूक के जूते नहीं खाए --वह शायर हो ही नहीं सकता ।

रोज कहता हूँ न जाऊँगा कभी घर उसके
रोज उस कूचे में इक काम निकल आता है ।

अब पता नहीं कौन से कूचे की बात करते थे । वैसे इस क्षेत्र में तो गलियां ही गलियां हैं , कहीं कहीं तो ऐसी कि स्कूटर भी न जा पाए ।

उनको देखे से जो आ जाती है मूंह पे रौनक
वो समझते हैं , बीमार का हाल अच्छा है ।

वे किस के बीमार थे , इसका ज़िक्र कहीं नहीं आता । बेग़म के तो होने से रहे ।

पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती ।

इसमें उनकी निराशा झलक रही है ।
शायद यह वह समय रहा होगा जब मुग़ल साम्राज्य में उथल पुथल हो गई थी ।

ये न थी हमारी किस्मत के बिसाले यार होता
अगर और जीते रहते , यही इंतजार होता ।

पता नहीं किस के लिए लिखा था ।

२७ दिसंबर १७९७ को जन्मे ग़ालिब का आज जन्मदिन है । इस अवसर पर दिल्ली सरकार द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं ।