पिछली पोस्ट में फेसबुक और ब्लॉगिंग पर जमकर चर्चा हुई . अधिकांश ब्लॉगर्स का यही मानना है -- फ़ेसबुक पर मौज मस्ती का माहौल ज्यादा रहता है जबकि ब्लॉग्स पर गंभीर और सार्थक लेखन किया जाता है . हालाँकि कुछ मित्रों का यह मानना है --फ़ेसबुक पर आपका लेखन आपके मित्रों की लिस्ट पर निर्भर करता है, जो सही भी है . हमें तो मूल रूप से यही अंतर नज़र आया -- फ़ेसबुक फास्ट फ़ूड जोइंट की तरह है जहाँ तुरंत खाना परोसा जाता है लेकिन सेहत के लिए सही नहीं होता . जैसे लन्दन में होने वाले ओलंपिक्स को मैक डोनाल्डस स्पोंसर कर रहा है और वहां के डॉक्टर्स ने ऐतराज़ जताया है -- ओलंपिक्स को स्पोंसर , जंक फ़ूड खिलाने वाले क्यों कर रहे हैं ! इसी तरह फ़ेसबुक पर जंक मेटीरियल बहुत मिल जायेगा जिससे आपका हाजमा ही ख़राब होगा . फ़ेसबुक पर सार्थक लेखन उसी तरह अल्पसंख्या में हैं , जैसे देश में पारसी आबादी .
ब्लॉग्स पर सभी तरह का लेखन हो रहा है . अधिकतर लोग अपनी ओर से बढ़िया लिखने का प्रयास करते हैं . सभी तरह की सामग्री भी मौजूद है . लगभग हर विषय पर आपको कोई न कोई लेख , जानकारी या लिंक मिल जायेगा .
लेकिन जिस तरह फ़ेसबुक पर कुछ लोग अच्छा लिखने की कोशिश करते हैं भले ही अल्पसंख्यक हैं , उसी तरह ब्लॉगिंग में भी कुछ लोग यदा कदा ऐसे विषयों पर अनावश्यक बहस शुरू कर दते हैं जिससे पूरे ब्लॉगजगत का माहौल ख़राब हो जाता है .
आजकल जो एनोटोमिकल लेख या कवितायेँ पढने को मिल रही हैं , वे निश्चित ही सुस्वाद नहीं कही जा सकती . किसी ने एक कविता लिखी , मित्रों ने हाय तौबा मचा दी . मित्रों के मित्र अचानक शत्रु जैसे व्यवहार करने लगे .
ऐसे में टिप्पणियों का बहुत बड़ा महत्त्व होता है . विवादास्पद लेख पर एक बार तो सैंकड़ों टिप्पणियां आ जाएँगी . लेकिन विषय को लम्बा खींचने पर अधिकांश समझदार ब्लॉगर कन्नी काट जाते हैं . यह ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखकर ही पता चल जाता है , पोस्ट पसंद आई या नहीं .
ब्लॉगिंग में भी फ़ेसबुक की तरह मित्रों का एक समूह बन जाता है . फर्क सिर्फ यह है --फ़ेसबुक पर आप पहले मित्र बनाते हैं , फिर उनसे वार्तालाप होने लगता है . ब्लॉग पर धीरे धीरे एक दूसरे के लेखन से प्रभावित होकर पाठक आपस में मित्र बनते हैं . लेकिन जब कोई मित्र ही ऐसी पोस्ट लिख दे जिस से आप इत्तेफाक न रखते हों या सहमत न हों , तब क्या किया जाए ! सहमत आप हो नहीं सकते , निंदा करने से अक्सर लोग बुरा मान जाते हैं . ज़ाहिर है , कवियों की तरह ब्लॉगर भी अत्यंत संवेदनशील होते हैं . ऐसे में चुप रहना ही सही लगता है . हालाँकि इसे भी भी लोग कायरता की निशानी कहने लगते हैं . लेकिन चुप रहना या टिप्पणी न देना भी असहमति का सूचक है .
ज़रा सोचिये , आप ब्लॉगिंग क्यों करते हैं ?
* अपनी अभिव्यक्ति की तमन्ना को पूरा करने के लिए ?
* या ज्ञान बाँटने के लिए ?
* परोपकार या सामाजिक सेवा करने के लिए ?
* मित्र बनाने के लिए ?
* या टाइम पास करने के लिए ?
भई हम तो ब्लॉगिंग करते हैं -- डीस्ट्रेस (तनावमुक्त) करने के लिए . हमारे लिए तो यह एक मेडिटेशन जैसा कार्य है . इसीलिए प्रोफाइल में लिखा है --हँसते रहो , हंसाते रहो . जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव भगाते हैं . जो हंसाते हैं , वे दूसरों के तनाव हटाते हैं .
सभी मित्रों से यही अनुरोध है -- कृपया ब्लॉगिंग को फेसबुकिया न बनायें .