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Wednesday, July 9, 2014

मनुष्य अपने मित्रों से जाना पहचाना जाता है ---


जो ख़ुशी में इतराये ना ,
ग़म से कभी घबराये ना !
ऐसे शख्स का संग भी ,
सत्संग जैसा होता है !

जो ख़ुशी में बुलाये ना ,
ग़म में साथ निभाए ना !
ऐसे शख्स का याराना ,
नादानों जैसा होता है !


जो दिल की बात बताये ना,
दिल की लगी को भुलाये ना !
ऐसे शख्स से दिल लगाना ,
आत्मघात जैसा होता है !




Wednesday, December 12, 2012

मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देने --


शनिवार को एक बजे अस्पताल से निकला ही था कि एक फोन आया -- डॉ साहब , मैं आपके अस्पताल से ही बोल रहा हूँ। आप निकल गए क्या ? मैंने पूछा -- आप कौन बोल रहे हैं? वो बोले -- मैं आपके पिताजी का दोस्त बोल रहा हूँ। आपसे मिलना था। मैंने पूछा -- कोई काम था क्या ? बोले -- नहीं , बस आपसे मिलना था , क्या पांच मिनट के लिए आ सकते हैं ? मैं अस्पताल से करीब एक किलोमीटर दूर जा चुका था और ट्रैफिक भी बहुत था। इसलिए थोड़ी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। मैंने पूछा -- आप कहाँ रहते हैं ? उन्होंने बताया -- मैं आगरा में रहता हूँ। आपके पिताजी के निधन के बारे में पता चला तो आपसे मिलना चाहता हूँ। आप बस पांच मिनट के लिए आ सकें तो ! अब तक उनकी आवाज़ रुंध चुकी थी।

मैंने फ़ौरन गाड़ी मोड़ी और वापस आ गया। दुआ सलाम के बाद चाय पानी के साथ उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वो पिताजी के साथ उनके दफ्तर में काम करते थे। दोनों ने एक साथ आई सी एम् आर ज्वाइन किया , और एक साथ रिटायर हुए। बाद में एक साथ दोनों को मलेरिया रिसर्च सेंटर में काम करने का अवसर मिला। पिताजी से उनके विचार बहुत मिलते थे और दोनों गहरे दोस्त थे।

परिचय के बाद असली मुद्ददे पर आते हुए उन्होंने कहा -- मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र  देने। वहां पता चला कि दराल साहब नहीं रहे। वहां से मालूम कर आपके पुराने अस्पताल गया। किसी ने आपके पुराने ऑफिस का पता बताया और वहां पहुंचा तो आपकी जगह बैठे डॉक्टर ने बताया कि आप यहाँ मिलेंगे। दराल साहब जैसे आदमी नहीं रहे , यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। मैंने बताया कि विश्वास तो हमें भी नहीं होता कि ऐसे व्यक्तित्त्व वाला व्यक्ति भी संसार छोड़ कर जा सकता है। लेकिन क्या करें , दुनिया की रीति है , कोई अमर नहीं रह सकता।

फिर काफी देर तक घर परिवार की बातें चलती रही। 82 वर्ष की आयु में भी वे दिल्ली एक शादी में आये थे। आगरा में पति पत्नी अकेले रहते हैं। बेटे बेटी सब अपनी गृहस्थी में व्यस्त अलग अलग शहरों में रहते हैं। उनका स्टेमिना देखकर लगा कि पुराने लोगों का स्वास्थ्य नई पीढ़ी के मुकाबले कितना बेहतर होता है। सभी प्रकार के व्यसनों से दूर रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करना ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

अंत में विदा लेते हुए उन्होंने कहा -- आप से मिल लिया , ऐसा लगा जैसे मैं दराल साहब से ही मिल लिया। उनके मित्र प्रेम के आगे मैं तो नतमस्तक था। और पिताजी की मृत्यु के दो साल बाद उनके करीबी दोस्त से मिलकर मुझे लगा जैसे साक्षात पिताजी ही भेष बदलकर सामने आ खड़े हुए हों , मुझे गर्व से एम् एस की कुर्सी पर बैठे हुए देखने के लिए। यदि जीवित होते तो वे भी आज 82 वर्ष के होते। 


Wednesday, May 2, 2012

क्या आप भी फेसबुकिया ब्लॉगिंग कर रहे हैं ?


पिछली पोस्ट में फेसबुक और ब्लॉगिंग पर जमकर चर्चा हुई . अधिकांश ब्लॉगर्स का यही मानना है -- फ़ेसबुक पर मौज मस्ती का माहौल ज्यादा रहता है जबकि ब्लॉग्स पर गंभीर और सार्थक लेखन किया जाता है . हालाँकि कुछ मित्रों का यह मानना है --फ़ेसबुक पर आपका लेखन आपके मित्रों की लिस्ट पर निर्भर करता है, जो सही भी है .

हमें तो मूल रूप से यही अंतर नज़र आया -- फ़ेसबुक फास्ट फ़ूड जोइंट की तरह है जहाँ तुरंत खाना परोसा जाता है लेकिन सेहत के लिए सही नहीं होता . जैसे लन्दन में होने वाले ओलंपिक्स को मैक डोनाल्डस स्पोंसर कर रहा है और वहां के डॉक्टर्स ने ऐतराज़ जताया है -- ओलंपिक्स को स्पोंसर , जंक फ़ूड खिलाने वाले क्यों कर रहे हैं ! इसी तरह फ़ेसबुक पर जंक मेटीरियल बहुत मिल जायेगा जिससे आपका हाजमा ही ख़राब होगा . फ़ेसबुक पर सार्थक लेखन उसी तरह अल्पसंख्या में हैं , जैसे देश में पारसी आबादी .

ब्लॉग्स पर सभी तरह का लेखन हो रहा है . अधिकतर लोग अपनी ओर से बढ़िया लिखने का प्रयास करते हैं . सभी तरह की सामग्री भी मौजूद है . लगभग हर विषय पर आपको कोई न कोई लेख , जानकारी या लिंक मिल जायेगा .

लेकिन जिस तरह फ़ेसबुक पर कुछ लोग अच्छा लिखने की कोशिश करते हैं भले ही अल्पसंख्यक हैं , उसी तरह ब्लॉगिंग में भी कुछ लोग यदा कदा ऐसे विषयों पर अनावश्यक बहस शुरू कर दते हैं जिससे पूरे ब्लॉगजगत का माहौल ख़राब हो जाता है .
आजकल जो एनोटोमिकल लेख या कवितायेँ पढने को मिल रही हैं , वे निश्चित ही सुस्वाद नहीं कही जा सकती . किसी ने एक कविता लिखी , मित्रों ने हाय तौबा मचा दी . मित्रों के मित्र अचानक शत्रु जैसे व्यवहार करने लगे .

ऐसे में टिप्पणियों का बहुत बड़ा महत्त्व होता है . विवादास्पद लेख पर एक बार तो सैंकड़ों टिप्पणियां आ जाएँगी . लेकिन विषय को लम्बा खींचने पर अधिकांश समझदार ब्लॉगर कन्नी काट जाते हैं . यह ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखकर ही पता चल जाता है , पोस्ट पसंद आई या नहीं .

ब्लॉगिंग में भी फ़ेसबुक की तरह मित्रों का एक समूह बन जाता है . फर्क सिर्फ यह है --फ़ेसबुक पर आप पहले मित्र बनाते हैं , फिर उनसे वार्तालाप होने लगता है . ब्लॉग पर धीरे धीरे एक दूसरे के लेखन से प्रभावित होकर पाठक आपस में मित्र बनते हैं . लेकिन जब कोई मित्र ही ऐसी पोस्ट लिख दे जिस से आप इत्तेफाक न रखते हों या सहमत न हों , तब क्या किया जाए ! सहमत आप हो नहीं सकते , निंदा करने से अक्सर लोग बुरा मान जाते हैं . ज़ाहिर है , कवियों की तरह ब्लॉगर भी अत्यंत संवेदनशील होते हैं . ऐसे में चुप रहना ही सही लगता है . हालाँकि इसे भी भी लोग कायरता की निशानी कहने लगते हैं . लेकिन चुप रहना या टिप्पणी न देना भी असहमति का सूचक है .

ज़रा सोचिये , आप ब्लॉगिंग क्यों करते हैं ?

* अपनी अभिव्यक्ति की तमन्ना को पूरा करने के लिए ?
* या ज्ञान बाँटने के लिए ?
* परोपकार या सामाजिक सेवा करने के लिए ?
* मित्र बनाने के लिए ?
* या टाइम पास करने के लिए ?

भई हम तो ब्लॉगिंग करते हैं -- डीस्ट्रेस (तनावमुक्त) करने के लिए . हमारे लिए तो यह एक मेडिटेशन जैसा कार्य है . इसीलिए प्रोफाइल में लिखा है --हँसते रहो , हंसाते रहो . जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव भगाते हैं . जो हंसाते हैं , वे दूसरों के तनाव हटाते हैं .

सभी मित्रों से यही अनुरोध है -- कृपया ब्लॉगिंग को फेसबुकिया न बनायें .