में उपलब्ध है .
सच्चाई कुछ भी हो , लेकिन जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन पर सारे देश में खूब रौनक रहती है . स्कूलों , कॉलोनियों और मंदिरों में भक्तिपूर्ण वातावरण सबके दिल ओ दिमाग पर छा जाता है . बचपन में जब गाँव में रहते थे , हर जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते थे . दिन में तरह तरह के पकवान बनाये जाते लेकिन हम बस देखते ही रह जाते क्योंकि खाने को तो रात बारह बजे ही मिलते थे . दि
न में शाम के समय दूध के साथ फलाहार अवश्य होता था . लेकिन रात होते ही नींद आ जाती और नींद में ही उठाकर भोजन कराया जाता . तब तक भूख भी ख़त्म हो जाती . अगले दिन उठने पर याद नहीं आता, रात में खाना कब खाया था .

हमारी सोसायटी के मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव हर साल धूम धाम से मनाया जाता है .
हमारी याद में शायद पहली बार ऐसा हुआ -- जब दिन भर जन्माष्टमी का आनंद लेने के बाद रात १२ बजे जब सबने भोग लगाया , तब हमने केक काटा, अपने जन्मदिन का . और खाया खिलाया -- हम पति पत्नी ने एक दूसरे को. इत्तेफाक से १० अगस्त को हमारे ससुर जी का जन्मदिन होता है ,जिसे हमने दिन में ही मना लिया था .
केक खाते समय पत्नी ने हमें कान्हा कह कर पुकारा तो हमने पत्नी से एक सवाल पूछा -- आप हमारी रुक्मणी हैं, या राधा , या मीरा -- या फिर ऑल इन वन ? क्या होना चाहिए उनका ज़वाब ?

